Showing posts with label media phobia. Show all posts
Showing posts with label media phobia. Show all posts

हाथरस मामला : पीड़िता के भाई ने ही की हत्या: अधिवक्ता AP सिंह का दावा

अधिवक्ता एपी सिंह आरोपितों की तरफ से
इस केस में पैरवी करेंगे (फाइल फोटो)
भागवत गीता में स्पष्ट लिखा है, "विनाश काले विपरीत बुद्धि", जो हाथरस में हुए हंगामे ने फिर से चरितार्थ कर दिया। योगी विरोधी उत्तर प्रदेश में दंगा करवाने के उद्देश्य से अपने दलाल मीडिया से जातिवाद की मनगारंध आग फ़ैलाने का प्रयास कर रहे थे। लेकिन जैसे-जैसे जाँच आगे बढ़ रही है, सच्चाई सामने आने लगने से योगी विरोधियों और इनकी दलाल मीडिया को शर्मिंदा होना पड़ रहा है। अपनी TRP बढ़ाने को लालायित मीडिया को भ्रामक खबरें फ़ैलाने से पहले मौके पर मौजूद होने पर जमीनी हकीकत से रूबरू होना था, ना कि योगी विरोधियों के हाथ खेलकर भाजपा शासित राज्य में हिंसा फ़ैलाने में मददगार होना। अगर किसी कारण से राज्य में हिंसा हो गयी होती, कौन जिम्मेदार होता?कहाँ लुप्त हो गयी इनके खोजी पत्रकारों की पत्रकारिता? मीडिया अपनी नींद तब भी नहीं जागी, जब पीड़ित परिवार सीबीआई और नार्को जाँच से पीछे हट रहा है। विपरीत इसके आरोपी परिवार सीबीआई और नार्को दोनों जांचों की मांग कर रहा है। मीडिया को इन्हीं कारणों से बिकाऊ और दलाल कहा जाता है। 
भाजपा शासित राज्य में जिस उत्सुकता से मीडिया लगी हुई थी, वही मीडिया राजस्थान में हुए बलात्कारों पर क्यों मौन रही, वह इस लिए कि वहां आरोपी मुस्लिम समाज से हैं? आखिर ये दोगलापन किस लिए? क्यों नहीं यही मुस्तैदी राजस्थान में दिखाई? अब जिस तरह हाथरस कांड की सच्चाई सामने आ रही है, क्या उस मीडिया पर, जो सच्चाई से कोसों मील दूर सियासतखोरों के हाथ खेल रही थी, जनता यकीन करेगी? इन चैनलों ने अपनी विश्वसनीयता पर प्रश्न चिन्ह लगवा लिया है। 
हाथरस मामले में आरोपितों के वकील एपी सिंह ने पीड़ित परिवार पर बड़े आरोप लगाए हैं। उन्होंने इसे ‘ऑनर किलिंग’ का मामला बताते हुए कहा कि पीड़िता को उसके भाई ने ही मारा है। साथ ही वकील एपी सिंह ने इस मामले का राजनीतिकरण करने के भी आरोप लगाए। उन्होंने आरोप लगाया कि घटना के एक सप्ताह बाद जब नेताओं ने पीड़ित परिवार से मुलाकात की, उसके बाद ही बलात्कार का मामला दर्ज किया गया।

वकील एपी सिंह ने कहा कि उन्होंने आरोपितों के परिजनों से बातचीत की है और साथ ही कहा कि अब तक मेडिकल रिपोर्ट में बलात्कार की कोई पुष्टि नहीं हुई है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, निर्भया मामले के दो वकील एक बार फिर से आमने-सामने हो सकते हैं। निर्भया के दोषियों के खिलाफ पैरवी करने वाली वकील सीमा समृद्धि कुशवाहा ने हाथरस पीड़िता का केस लड़ने का ऐलान किया है।

एपी सिंह ने बताया कि आरोपितों के वकील के अलावा भारतीय क्षत्रिय महासभा के अध्यक्ष व पूर्व केंद्रीय मंत्री मानवेंद्र सिंह ने भी उनसे सपर्क कर के इस मामले में आरोपितों की तरफ से केस लड़ने को कहा है। मानवेन्द्र सिंह ने कहा है कि उनका संगठन वकील की फीस भरने के लिए धन इकठ्ठा करेगा। उन्होंने एससी-एसटी एक्ट के दुरूपयोग का आरोप लगाते हुए कहा कि सवर्ण समाज को बदनाम करने के लिए ऐसा किया जा रहा है, जिससे राजपूत समाज आहत हुआ है।

वहीं पीड़ित परिवार की तरफ से सीमा समृद्धि कुशवाहा ने वकालतनामे पर हस्ताक्षर भी कर दिया है। उन्होंने कहा है कि वो सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर के इस मामले की सुनवाई दिल्ली स्थानांतरित करने की माँग करेंगी। उन्होंने कहा कि वो हाथरस की बेटी को न्याय दिलाएँगी और दोषियों को सज़ा मिलेगी लेकिन ये तब तक संभव नहीं हो पाएगा, जब तक मामला उत्तर प्रदेश से बाहर नहीं जाता।

उधर हाथरस मामले की जाँच कर रही SIT को इस मामले में रिपोर्ट सौंपने के लिए 10 दिनों का अतिरिक्त समय दिया गया है। इससे पहले बुधवार (अक्टूबर 7, 2020) को ही रिपोर्ट सौंपी जानी थी।गृह सचिव भगवान स्वरूप इस SIT की अगुवाई कर रहे हैं। SIT ने गाँव में जाकर इस मामले की पूरी छानबीन की है। इस मामले में यूपी सरकार सीबीआई जाँच की सिफारिश भी कर चुकी है। SIT ने चश्मदीदों के साथ क्राइम सीन क रिक्रिएट भी किया था।

अवलोकन करें:-

हाथरस : क्या न्याय’ माँग रहे कांग्रेस ‘दलित नेता’ उदित राज पिकनिक मनाने गए हैं?

NIGAMRAJENDRA.BLOGSPOT.COM
हाथरस : क्या न्याय’ माँग रहे कांग्रेस ‘दलित नेता’ उदित राज पिकनिक मनाने गए हैं?

भारतीय जनता पार्टी के आईटी सेल प्रमुख अमित मालवीय ने हाथरस पीड़िता के भाई से पूछताछ की माँग की है। उन्होंने कहा है कि आरोपित और पीड़ित परिवार के बीच कई फोन कॉल हुए। अक्टूबर 2019 से मार्च 2020 के बीच लड़की के भाई के नाम से रजिस्टर्ड फोन नंबर से 100 से अधिक फोन कॉल किए गए थे। 19 वर्षीय पीड़िता का भाई कथित तौर पर आरोपित के संपर्क में था। अमित मालवीय ने कहा कि यह मामला आपसी रंजिश का परिणाम हो सकता है।

राजस्थान : बारां की रेप पीड़िता के चुभते सवाल : राहुल गाँधी मेरे पास क्यों नहीं आ सकते? ‘मुझमें और हाथरस की बेटी में क्या फर्क? ’

आज उत्तर प्रदेश में घटने वाली किसी भी अप्रिय घटना को योगी विरोधी अपने बिकाऊ मीडिया के सहयोग से इतना उछालते हैं, मानो अब से पहले कभी कोई ऐसी घटना ही नहीं हुई। लेकिन योगी विरोधी यह भूल रहे हैं कि उत्तर प्रदेश से अधिक गैर-भाजपाई राज्यों में हो रही हैं, लेकिन राहुल, प्रियंका और इनका समर्थक मीडिया चुप्पी साधे रहता है, आखिर यह दोहरा मापदंड क्यों?
उत्तर प्रदेश के हाथरस की घटना को लेकर पूरे देश में विरोध हुआ। सभी ने इस घटना पर जम कर विरोध और बहस की लेकिन इस बीच कुछ कुछ घटनाएँ पीछे छूट गईं। ऐसी ही एक घटना हुई थी राजस्थान के बारां जिले में, जहाँ एक महिला को बंधक बना कर उनके साथ सामूहिक दुष्कर्म की वारदात को अंजाम दिया गया।

इस बीच पीड़िता ने राहुल गाँधी से सवाल पूछा है कि वह यहाँ (बारां) क्यों नहीं आते हैं? पिछले कुछ समय से राजस्थान में महिलाओं के साथ ज़्यादती के कई मामले सामने आए हैं, लेकिन वहाँ की घटनाओं पर सभी ने मौन धारण कर रखा है। 

न्यूज़ नेशन में प्रकाशित ख़बर के मुताबिक़ पीड़िता ने राहुल गाँधी को संबोधित करते हुए कई बातें कहीं। पीड़िता ने पूछा:

“राहुल गाँधी बारां क्यों नहीं आ सकते हैं? राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत तक दूसरे राज्य में घटनाएँ होने पर वहाँ जाते हैं, लेकिन अपने ही प्रदेश में स्थित बारां नहीं आते हैं। मुझमें और हाथरस की बेटी में क्या फर्क है, अन्याय तो मेरे साथ भी हुआ है। मैं भी हाथरस की बेटी जैसी हूँ। मैं चाहती हूँ कि मेरे साथ भी न्याय हो, राहुल गाँधी और प्रियंका गाँधी यहाँ (बारां) आएँ। मेरे मामले पर भी सुनवाई हो और मुझे भी न्याय मिलना चाहिए।”  

इसके बाद पीड़िता ने आपबीती सुनाई। उन्होंने बताया कि 1 जुलाई 2020 को दो लोग आए और कहा कि उनके माता-पिता ने खेत पर बुलाया है। इसके बाद आरोपित पीड़िता को उसके घर वालों के पास लेकर जाने के बदले डरा-धमका कर श्योपुर ले गए।

वहाँ उन्होंने पीड़िता को महीनों तक एक कमरे में बंद कर दिया और उसके साथ बलात्कार किया। पीड़िता ने यह भी बताया कि आरोपितों ने उसके साथ जबरदस्ती करके शादी के कागज़ पर हस्ताक्षर भी करा लिए थे। इसके अलावा आरोपित रात के वक्त पीड़िता के साथ मारपीट भी करते थे।

तमाम कोशिशों के बाद पीड़िता उनके चंगुल से छूट कर बाहर आई, तब उसने 7 अगस्त को सीसवाली थाना क्षेत्र में इस मामले की शिकायत दर्ज कराई थी। इस मामले में पुलिस का रवैया भी बेहद लापरवाही भरा है और अभी तक एक भी आरोपित गिरफ्तार नहीं किया गया है। पीड़िता ने इस मामले में पुलिस अधीक्षक से भी मदद की गुहार लगाई थी।

वहीं पुलिस ने अक्टूबर 3 को इस मामले पर बयान देते हुए कहा था कि पीड़िता 1 जुलाई से लापता थी। वह 7 अगस्त को पुलिस थाने आई थी और उसने बलात्कार व अपहरण की शिकायत दर्ज कराई थी। फ़िलहाल इस मामले में जाँच जारी है, आरोपित अभी पुलिस की गिरफ्त से बाहर हैं। अधिकारियों का अपने बचाव में कहना था कि कोरोना वायरस महामारी के चलते जाँच में समय लगा।

इस दौरान पुलिस अधीक्षक ने जाँच कर रहे पुलिस अधिकारी का स्थानांतरण भी कर दिया था। पीड़िता ने बताया कि बलात्कार करने वाले आरोपित उसे और उसके परिवार वालों को लगातार धमकी दे रहे हैं। जिसके चलते उसे और उसके पूरे परिवार को अपना घर तक छोड़ना पड़ गया। पिछले 2 महीने से पीड़िता और उसका परिवार अपने रिश्तेदार के घर रह रहा है और आरोपित बेख़ौफ़ होकर घूम रहे हैं।

पीड़िता के चाचा का कहना था कि पुलिस बिलकुल सहयोग नहीं कर रही है। जब उन्होंने पीड़िता की मेडिकल जाँच के लिए निवेदन किया तब थानाध्यक्ष ने कहा, “क्या मैं तुम्हारा नौकर हूँ? क्या मैं इस लड़की का मिट्टी का पुतला बना कर थाने में लगवा दूँ।”

सबसे ज़्यादा हैरानी की बात यह है कि पुलिस ने इस मामले में अभी तक कोई कार्रवाई नहीं की है। आरोपितों ने डरा-धमका कर शादी के लिए साइन तक करा लिया है और लगातार धमकियाँ दे रहे हैं।

हाथरस : 100 करोड़ की फंडिंग, जातीय दंगों और हिन्दुओं में फूट डालने की साजिश

हाथरस मामले में योगी सरकार को भेजी गई खुफिया जाँच रिपोर्ट में कई चौंकाने वाले खुलासे सामने आए हैं। जाँच एजेंसियों को योगी सरकार के खिलाफ खतरनाक साजिश के अहम सुराग मिले हैं। हाथरस के बहाने योगी सरकार को बदनाम करने के लिए बड़ी साजिश रचने की बात सामने आ रही है। मामले में उत्तर प्रदेश सरकार ने रविवार (अक्टूबर 4, 2020) को आईपीसी की विभिन्न धाराओं के तहत FIR दर्ज की है।

खुफिया रिपोर्ट के मुताबिक प्रदेश में सांप्रदायिक दंगे भड़काने की साजिश भी रची गई थी। इसके लिए बकायदा फंडिंग की बात भी सामने आई है। यूपी सरकार को भेजी गई खुफिया रिपोर्ट में कहा गया है कि चूँकि पीड़िता दलित थी, इसलिए हाथरस के बहाने उत्तर प्रदेश में जातीय और सांप्रदायिक उन्माद पैदा करने की कोशिश की जा रही है।

दंगे भड़काने के लिए अफवाहों और फर्जी सूचनाओं का सहारा लिया जा रहा। साजिश में पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI), सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (SDPI) और सरकार के निशाने पर रहे माफियाओं की मिलीभगत के ठोस सबूत मिले हैं। प्रदेश में अराजकता पैदा करने के लिए बड़े पैमाने पर फंडिंग की बात भी सामने आ रही है। इस रिपोर्ट में योगी सरकार को बदनाम करने के लिए 100 करोड़ रुपए की फंडिंग की बात भी सामने आ रही है।

उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के कार्यकाल में हो रहे महिलाओं के शील भंग होने पर इस तरह कोहराम नहीं मचा, जो आज हाथरस कांड में देखने को मिल रहा है। ये दोहरा मापदंड वास्तव में किसी बड़ी साज़िश होने का प्रमाण स्वयं प्रस्तुत कर रहे हैं।  

बताया जा रहा है कि पीड़ित लड़की की जीभ काटे जाने, अंग-भंग करने और गैंगरेप से जुड़ी तमाम अफवाहें उड़ा कर नफरत की आग भड़काने की कोशिश की गई। वहीं अफवाह फैलाने के लिए ढेरों वेरिफाइड सोशल मीडिया अकाउंट का भी इस्तेमाल किया गया। जाँच एजेसियाँ वेरिफाइड अकाउंट्स का ब्योरा तैयार करने में जुटी हैं।

ऐसे में प्रश्न यह भी होता है कि जब पीड़िता की जीभ काट दी थी, फिर पीड़िता ने पुलिस को बयान कैसे दिया? परिवार सीबीआई और नार्को टेस्ट से क्यों पीछे भाग रहा है, जबकि आरोपित परिवार इन्हीं जांचों के लिए मांग कर रहा है?

बताया गया कि हाथरस साजिश में CAA को लेकर हुए उपद्रव में शामिल रहे संगठनों की भूमिका के भी सबूत मिले हैं। उपद्रवियों के पोस्टर लगाए जाने, उपद्रवियों से वसूली कराए जाने और घरों की कुर्की कराने जाने की सीएम योगी की कार्रवाइयों से परेशान तत्वों ने बड़ी साजिश रची। इस दौरान कथित गैंगरेप पीड़ित लड़की से जुड़ी तमाम अफवाहें उड़ा कर मामले को तूल दिया गया।

इसके साथ ही हाथरस के पीड़ित परिवार को सरकार के खिलाफ भड़काने की साजिश का भी पर्दाफाश हुआ है, जिसके सबूत के तौर पर कई ऑडियो टेप पुलिस के हाथ लगे है। जाँच एजेंसियों ने ऑडियो टेप का संज्ञान लेकर जाँच शुरू कर दी है। ऑडियो टेप में कुछ राजनीतिक दलों के साथ ही कुछ पत्रकारों की भी आवाज शामिल है। इन ऑडियो टेप से पीड़ित परिवारों को सरकार के खिलाफ भड़काने के लिए 50 लाख से लेकर एक करोड़ रुपए तक का लालच दिया गया।

ऑडियो टेप से खुलासा हुआ है कि सीएम से पीड़ित परिवार की बातचीत के तुरंत बाद एक महिला पत्रकार ने उन्हें भड़काया। उन्होंने कथित तौर पर कहा कि अगर सीएम की बात मान ली तो पुलिस म्हें ही अपराधी साबित कर देगी। इस बातचीत के बाद परिवार दहशत में आ गई।

अवलोकन करें:-

हाथरस : योगी विरोधी पहुंचे UNSC

NIGAMRAJENDRA.BLOGSPOT.COM
हाथरस : योगी विरोधी पहुंचे UNSC
कुछ लोगों को दूसरे की फटी में पैर फंसाने की आदत होती है, जो उत्तर प्रदेश के मु

ऑडियो टेप की फोरेंसिक जाँच रिपोर्ट आते ही भड़काने वालों का पॉलीग्राफ और नार्को की तैयारी में जाँच एजेंसियाँ जुटी हैं। पीड़ित परिवार द्वारा नार्को और पॉलीग्राफ टेस्ट और सीबीआई जाँच से मना करने पर रिपोर्ट में सवाल उठाए गए हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि आरोपित पक्ष हर तरह की जाँच के लिए तैयार है।

मोदी-योगी सरकार को बदनाम करने के लिए इस्लामी मुल्कों की फंडिंग

ख़ुफ़िया एजेंसियों को इस मामले में बड़े सुराग हाथ लगे हैं। इसके लिए एमनेस्टी इंटरनेशनल के साथ-साथ कई इस्लामी मुल्कों ने भी फंडिंग की थी। रातोंरात ‘जस्टिस फॉर हाथरस’ नाम से एक वेबसाइट भी बना ली गई थी। इस वेबसाइट पर विरोध प्रदर्शन की आड़ में देश-प्रदेश में दंगे करने और उसके बाद उससे बचने के तौर-तरीके बताए गए थे।

अफवाहों का बाजार गर्म करने के लिए मीडिया के साथ-साथ सोशल मीडिया का भी भरपूर उपयोग किया गया था। ख़ुफ़िया एजेंसियों के अनुसार, ‘जस्टिस फॉर हाथरस’ नामक वेबसाइट को एक साजिश के तहत सुर्ख़ियों में लाया गया और हजारों लोग देखते ही देखते इससे जुड़ गए। इस वेबसाइट से जुड़े लोगों में से अधिकतर की आईडी फर्जी निकली है। इस वेबसाइट के डिटेल्स खँगालने के बाद इस मामले में और भी खुलासे हो सकते हैं।

‘न्यूज़ 18’ की खबर के अनुसार, जिस तरह से अमेरिका में अश्वेत नागरिक जॉर्ज फ्लॉयड की मौत के बाद दंगे भड़क गए थे, ठीक उसी तरह से उत्तर प्रदेश को दंगों की आग में झोंकने की तैयारी थी। मुस्लिम मुल्कों और इस्लामी कट्टरपंथी संगठनों ने हिन्दू समुदाय में फूट डालने के लिए फंडिंग की थी। ये भी सामने आया है कि हाथरस पर बनाई गई वेबसाइट के पीछे सीएए विरोधियों और देशविरोधी तत्वों का हाथ था, जो मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से बदला लेना चाहते थे।

साथ ही कोरोना वायरस की आड़ में पुलिस-प्रशासन से बचने के ‘नुस्खे’ भी इस वेबसाइट पर बताए गए थे। इस पर बताया गया था कि चेहरे पर मास्क लगा कर दंगे करने के बाद पुलिस-प्रशासन से बचा जा सकता है क्योंकि आजकल मास्क लगाना अनिवार्य भी है। साथ ही हिन्दू समुदाय में फूट डालने और उत्तर प्रदेश को नफरत की आग में झोंकने की ‘तरकीबें’ समझाई गई थीं। वेबसाइट पर कई अन्य आपत्तिजनक सामग्रियाँ भी थीं।

इस वेबसाइट पर ‘वॉलंटियर्स’ की मदद से हेट स्पीच और भड़काऊ राजनीति करने के लिए कई सामग्रियाँ तैयार की गई थीं, ताकि देश विरोधी तत्व इसका फायदा उठा सकें। पूरी स्क्रिप्ट तैयार करने और इसकी फंडिंग में पीएफआई और एसडीपीआई जैसे संगठनों का नाम सामने आ रहा है। रविवार (अक्टूबर 4, 2020) की देर रात जैसे ही पुलिस का तलाशी अभियान और छापेमारी शुरू हुई, ये वेबसाइट अचानक से बंद हो गया।

इसके लिए फेक न्यूज़ की एक बड़ी खेप तैयार की गई थी। साथ ही फोटोशॉप्ड तस्वीरें भी डाली गई थीं, जिन्हें वायरल कर नफरत का माहौल बनाया जा सके। दंगे भड़काने के लिए छेड़छाड़ किए हुए विजुअल्स का इस्तेमाल भी किया गया था। इसमें ये भी समझाया गया था कि पुलिसकर्मियों को कैसे निशाना बनाया जाए। इसके लिए मीडिया संस्थानों और सोशल मीडिया के एकाउंट्स का भी इस्तेमाल किया गया।

इससे पहले खबर आई थी कि हाथरस के पीड़ित परिवार को सरकार के खिलाफ भड़काने की साजिश के मामले में सबूत के तौर पर कई ऑडियो टेप पुलिस के हाथ लगे हैं। जाँच एजेंसियों ने ऑडियो टेप का संज्ञान लेकर जाँच शुरू कर दी है। ऑडियो टेप में कुछ राजनीतिक दलों के साथ ही कुछ पत्रकारों की भी आवाज शामिल है। इन ऑडियो टेप से पीड़ित परिवारों को सरकार के खिलाफ भड़काने के लिए 50 लाख से लेकर एक करोड़ रुपए तक का लालच दिया गया।

विनोद कापड़ी : एजेंडा पत्रकार को नहीं है देश की सुरक्षा का ख्याल

विनोद कापड़ी के 'पीएम ने दी है क्या राहत इंदौरी को श्रद्धांजलि?' पूछने पर  पड़ी बेहिसाब गालियां – harinayakचीन की साजिशों को नाकाम करते हुए भारतीय सेना ने पैगॉन्ग सो झील के दक्षिणी हिस्से में मौजूद एक अहम चोटी पर कब्जा कर लिया। यह रणनीतिक रूप से काफी अहम मानी जाती है। इससे चीन बुरी तरह बिलबिला उठा है। 
वहीं देश के कुछ एजेंडा पत्रकारों ने अपने क्षुद्र स्वार्थों को पूरा करने के लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर ही निशाना साधने की कोशिश की है। देश और सेना के सुरक्षा हितों का ख्याल रखने बिना एजेंडा पत्रकार विनोद कापड़ी ने सरकार से सेना की रणनीति का सोशल मीडिया पर खुलासे की मांग की।
इन एजेंडा पत्रकारों द्वारा सरकार से रणनीति के बारे में पूछकर दुश्मन की मदद कर, क्या सिद्ध करना चाहते हैं? इनकी दृष्टि में देश महान है अथवा दुश्मन? ये पत्रकार चंद टुकड़ों की खातिर क्यों और किस आधार पर दुश्मन के हाथ कठपुतली बने हुए हैं? इन पाखंडी पत्रकारों से पूछा जाए कि जब देश में संकट आएगा क्या इनका (दुश्मन) आका इनको अपने देश का कोई प्रान्त इनके नाम कर देगा? यदि नहीं, फिर किस आधार पर दुश्मन की मदद कर देश को क्यों संकट में डाल रहे हैं?

 
पत्रकार विनोद कापड़ी ने ट्वीट किया, “प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी,देश को ये जानने का अधिकार है कि लद्दाख में भारत चीन सीमा पर क्या हो रहा है ? अब तक चीनी सेना को क्यों नहीं हटाया गया ? 30 अगस्त की रात चीन के दुस्साहस पर भारत क्या करने जा रहा है ? राष्ट्र की सुरक्षा,संप्रभुता और अस्मिता पर आपकी चुप्पी ख़तरनाक है।”


विनोद कापड़ी के इस ट्वीट के बाद सोशल मीडिया में लोगों उनकी नासमझी को लेकर जमकर लताड़ लगायी। कई यूजर्स ने इनकी समझ पर सवाल उठाया, तो कई लोगों ने पत्रकारिता छोड़कर सेना में जाने की सलाह दे डाली।




जयचन्दों का युग भी बहुत प्राचीन है, लेकिन इन बिकाऊ लोगों को किसी से इनका सम्मानित सूची में नाम लिखा है, नहीं सुना। ऐसे बिकाऊ कभी किसी के विश्वासपात्र बन ही नहीं सकते। ऐसे लोग कब देश को संकट में डलवा दें, कुछ कहा नहीं जा सकता। ये जिस थाली में खाते हैं, उसी में छेद करते हैं।
भारतीय सेना ने केवल पैंगोंग झील के दक्षिणी तट पर स्थित पहाड़ियां और 1962 से चीन के कब्जे में पड़ी रेकीन घाटी ही नहीं कब्जिया ली, अपितु गलवान में जो कैंप बनाकर चीनी उसमें घुसे बैठे थे वह भी लगे हाथ कैप्चर कर लिया है। इसके अलावा ऐसी भी अपुष्ट खबरें हैं कि 12-15 चीनी सैनिक निपटा दिये गए और इस समय 20 से अधिक चीनी सैनिक भारतीय सेना की मेहमाननवाजी का आनंद ले रहे हैं।
No photo description available.अब चीन को जो करना है, करले ले, वैसे भी अर्थव्यवस्था चीन के कारण कुछ खास नहीं चल रही जिसकी चिंता सरकार करे, पूरी दुनिया चीन से नाराज़ है, चीन भी जापान ऑस्ट्रेलिया वियतनाम अमेरिका ताइवान फिलीपींस सबसे पिला पड़ा है। ये सारे देश चीन से चिढ़े बैठे है। देखा जाए तो आपदा में अच्छा अवसर है चीन का फुल एंड फाइनल सेटेलमेंट करने का।
मुझे तो कोरोना काल में चीन का काल स्पष्ट दिखाई दे रहा है, चीन से युद्ध हुआ तो पाकिस्तान मुफ्त में रेला जाएगा।
पहली बार भारत को इस तरह आक्रमक देख रहा हूं।
पहले गलवान में चीनियों को पेला।
उसके बाद चीन के कई कॉन्ट्रैक्ट रद्द किए।
उसके बाद कई चाइनीज ऐप पर प्रतिबंध लगाया।
आत्मनिर्भर भारत से चीन का बॉयकॉट करना शुरू किया।
फिर भारतीय नौसेना ने हिन्द महासागर में चीन के वारशिप को खदेड़ा।
उसके बाद सीडीएस जनरल विपिन रावत का बयान कि जब सारे बातचीत के सैन्य और कूटनीति रास्ते विफल हो जाएंगे तो मिलिट्री कार्यवाही अंतिम विकल्प होगा।
उसके बाद कल सुबह न्यूज में पढ़ा कि भारत ने साउथ चाइना सी में अपना वारशिप उतार दिया है।
फिर दोपहर को ऑफिशियल खबर मिली कि भारतीय सेना ने 29-30 अगस्त को चीनियों को दुबारा रेल दिया है।
शाम होते होते पता चला कि भारतीय सेना ने एलएसी पर रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण कुछ पहाड़ियां कब्जा कर ली है।
लगता है मोदी जी ये समस्या भी सुलझाने के फुल मूड में है, चाहे सीधी उंगली से या उंगली टेढ़ी करके!
मोदी जी पहले ही कह चुके है कि, "मै इंतजार लंबा नहीं कर सकता, चुन चुन के हिसाब लेना, ये मेरी फितरत है"
ये 1962 का भारत नहीं है, 2020 का नया भारत है!

नवीन की हत्या के लिए जेहादियों को उकसाने वाली डेक्कन हेराल्ड की रिपोर्ट पर लिबरल मीडिया की चुप्पी, क्यों?

बेंगलुरु हिंसा पर डेक्कन हेराल्ड की शर्मनाक कोशिश
बेंगलुरु में एक फेसबुक पोस्ट में पैगंबर मुहम्मद के ख़िलाफ़ टिप्पणी पढ़कर आहत हुई मुस्लिम भीड़ ने अल्लाह-हू-अकबर और नारा-ए-तकबीर के नारों के बीच पथराव और आगजनी जैसी घटनाओं को अंजाम दिया। उन्होंने इस हिंसा में कॉन्ग्रेस विधायक के घर को जलाया और 60 से अधिक पुलिस वालों को घायल भी किया।
अब ऐसी स्थिति में कोई भी यही समझेगा कि इस घटना के बाद मीडिया जाहिर तौर पर इस्लामिक भीड़ के ख़िलाफ़ सख्त रुख अख्तियार करेगी और इस बात का विश्लेषण करेगी कि कैसे मुस्लिम समुदाय के लोग जरा सी बात पर दंगों के लिए तैयार हो जाते हैं। खासतौर पर ईशनिंदा के आरोपित कमलेश तिवारी की हत्या के बाद से तो यह उम्मीद मीडिया से की ही जा रही थी कि वह निष्पक्ष होकर सच्चाई बोले।
साभार Sunnah.com
हालाँकि, मीडिया ने इस बार भी ऐसा कुछ नहीं किया। उन्होंने फेसबुक पोस्ट करने वाले कॉन्ग्रेस विधायक के भतीजे नवीन को अपना निशाना बना लिया। डेक्कन हेराल्ड ने नवीन के ख़िलाफ़ एक ऐसी रिपोर्ट लिखी जिसमें उसे serial offender बताया गया है। रिपोर्ट में लिखा गया कि नवीन की यह आदत है कि वह पैगंबर मुहम्मद का अपमान करता है और उन्हें लेकर आपत्तिजनक भाषा का प्रयोग भी करता है।
डेक्कन हेराल्ड ने अपने सूत्रों का हवाला देते हुए कि विधायक अखंड श्रीनिवास मूर्ति का भतीजा नवीन का ऐसा इतिहास है जिसमें वह लगातार आपत्तिजनक कंटेंट डालकर नफरत फैलाने की कोशिश करता है। उन्होंने 5 अगस्त को पदराणयपुर की घटना के बारे में अपमानजनक सामग्री पोस्ट की थी।
पदरायणपुर हिंसा के बारे में याद दिला दें कि ये हिंसा 19 अप्रैल को भड़की थी, जब कोरोना संक्रमित के संपर्क में आने वाले अन्य लोगों ने क्वारंटाइन होने से मना कर दिया था और हंगामा भी किया था। इस पूरी हिंसा में पुलिस ने 119 लोगों को गिरफ्तार किया था।
दिलचस्प बात ये हैं कि डेक्कन हेराल्ड कहता है कि इन दोनों घटनाओं में नवीन ने भावनाओं को आहत किया। जबकि वास्तविकता ये है कि चाहे पदरायणपुर की हिंसा हो या नवीन के पोस्ट के बाद भड़की हिंसा, हर जगह मुस्लिम समुदाय के लोग उसमें शामिल रहे। लेकिन, तब भी मीडिया संस्थान ने हिंसा का विरोध नहीं किया, बल्कि नवीन को लगातार अपराध दोहराने वाला बताया।
गौर करने वाली है कि एक ओर जहाँ हजारों लोगों की भीड़ ने एक मात्र फेसबुक पोस्ट पर इतनी हिंसा भड़का दी और डेक्कन हेराल्ड तब भी नवीन को जिम्मेदार बताता रहा। तो आखिर पाठक कैसे इस बात को समझेगा कि मुस्लिम समुदाय के कट्टरपंथी कैसे काम करते हैं और कैसे एक-दूसरे को समर्थन के नाम पर बढ़ावा देते हैं। मीडिया संस्थान की यह कोशिशें बिलकुल ऐसी हैं, जैसे वह जिहादियों को उनके उद्देश्य को पूरा करने के निर्देश दे रहे हो।
मुख्यधारा का मीडिया भी वैसे तो हमेशा सच्चाई बताने की बातें करता है। लेकिन जब भी ऐसे कोई भी मौके आते हैं तो वह इनसे खुद को अलग कर लेता है। वास्तविकता में ये सब इसलिए नहीं होता कि वह इंसान के दुश्मनों की छवि निर्माण चाहते हैं। बल्कि इसलिए होता है क्योंकि संस्थान खुद को इस तरह ढाल लेते हैं कि वह अपनी निष्ठाओं को ही धोखा देने लगते हैं।
ये भी ध्यान रखने की बात है कि मुस्लिम समुदाय के सबसे घटिया तत्वों के लिए मुख्यधारा का मीडिया प्रचार तंत्र में बदल गया है। उनकी रिपोर्टें में इस बात का खास तौर पर ध्यान दिया जाता है कि वह मुस्लिम समुदाय के कट्टरपंथियों के मनमुताबिक हो और इसके लिए वह पूर्ण रूप से अपनी सारी कोशिश करते हैं।
इस संबंध में हमें याद रखना चाहिए कि आलोचकों की हत्यााओं का सिलसिला खुद पैगंबर मुहम्मद के समय से चला आ रहा है। ट्रिब्यूट, स्पॉइल्स एंड रुलरशिप (किताब अल-खराज, वाल-फे ‘वाल-इमराह में) में इस्लाम के पैगंबर के समय के दौरान एक दिलचस्प घटना का उल्लेख किया गया है।
इसमें बताया गया है कि काब बिन अल अशरफ एक ऐसा व्यक्ति था जो पैगंबर मोहम्मद पर व्यंग्य करता था और पैगंबर और उनके अनुयायियों को आहत करता था। जब उसने नबी के अपमान को न करने की बात पर इनकार किया तो मोहम्मद ने उसकी हत्या का आदेश दिया।
व्यंग्यकार को मारने के लिए मुहम्मद बिन मसमल्लाह को भेजा गया। इस घटना के बाद से यहूदियों और बहुदेववादियों को डर लग गया और वह नबी से मिलने आए। फिर एक समझौते पर हस्ताक्षर हुए कि गैर मुस्लिम कभी भी पैगंबर का अपमान नहीं करेंगे।
इस्लामिक उलेमाओं काब बिन अल अशरफ को भी सीरियल ऑफेंडर के तौर में पेश करते हैं। वे इस कहानी को ऐसे समझाते हैं कि कैसे अल्लाह ने मुहम्मद के अपमान पर शुरू में उन्हें धैर्य रखने व क्षमा करने का आदेश दिया। लेकिन जब उस समय भी उसने इस बात को नहीं माना तो उन्होंने उसे मार दिया।अब बेंगलुरु पर डेक्कन हेराल्ड की रिपोर्ट भी बिलकुल इसी तरह है।
21वीं सदी में आने के बाद भी पैगंबर के अपमान पर भयानक हिंसा की प्रथा आज भी चालू है। ऐसे में कोई मुख्यधारा मीडिया से उम्मीद की जा सकती है कि वह हिंसा की संस्कृति को खत्म करने की बात करें, जो एक समुदाय में बढ़ती ही जा रही है। लेकिन नहीं, वह तो अब भी उन लोगों की छवि निर्माण करते हैं जिन्होंनें हिंसा को जन्म दिया।
जब डेक्कन हेराल्ड ने नवीन को serial offender बताया तो यह सर्वविदित है कि आगे क्या परिणाम होंगे। कमलेश तिवारी के साथ जो हुआ इसके बाद कोई इनसे इनकार नहीं कर सकता। लेकिन तब भी ये ऐसा करने को आगे आए और ऐसा किया भी। जब बात आगे बढ़ जाएगी तो कोई भी मीडिया संस्थान के इन निष्कर्षों को दोष नहीं दे पाएगा कि ये लोग मानते थे कि पैगंबर पर बोलने के लिए नवीन को मौत की सजा हो।
एक ओर जहाँ इस पूरे मामले पर मेनस्ट्रीम मीडिया बोलने से बचती रही। वहीं डेक्कन हेराल्ड ने सभी सीमाओं को लांघ दिया है। उन्होंने नवीन को serial offender कहकर हिंसा को वाजिब ठहराया है। जिसके कारण आगे कई अनहोनी हो सकती हैं और तब मीडिया ऐसी घटनाओं पर पछतावा करने को आगे आएगा।

कश्मीर : पाकिस्तान के हाथों में खेल रहे हैं कुछ पत्रकार और चैनल

भारत के कुछ न्यूज चैनल और पत्रकार पाकिस्तानी सेना के हाथ का खिलौना बन गए हैं। कश्मीर में भारतीय सेना, अर्धसैनिक बलों और पुलिस के जवान अपनी जान पर खेलकर आतंकवादियों का सफाया करने में लगे हैं, लेकिन ये चैनल और पत्रकार भारत को ही नीचा दिखाने में लगे हैं। श्रीनगर में जुलाई 1 की सुबह आतंकवादियों ने सीआरपीएफ की टुकड़ी पर घात लगाकर हमला कर दिया। आतंकवादियों की इस गोलीबारी में एक बुजुर्ग नागरिक की गोली लगने से मौत हो गई, जबकि सुरक्षाबलों की जवाबी कार्रवाई में दो आतंकवादी ढेर हो गए।
लेकिन श्रीनगर में आजतक के पत्रकार अशरफ वानी ने एक ऐसा ट्वीट कर दिया, जिसे पाकिस्तानी सेना के लोगों ने हाथों-हाथ लेकर भारत के खिलाफ इस्तेमाल करना शुरू कर दिया। दरअसल अशरफ वानी ने आतंकी हमले में मारे गए बुजुर्ग के बेटे का बयान ट्वीट किया और लिखा कि बुजुर्ग के बेटे का कहना है कि सीआरपीएफ ने उसके पिता को कार से उतारकर गोली मार दी।

आजतक के पत्रकार अशरफ वानी के इस ट्वीट को पाकिस्तानी सेना के प्रोपेगंडा सेल ने अपने पक्ष में इस्तेमाल करने और भारतीय सुरक्षा बलों को बदनाम करने के लिए इस्तेमाल करने के स्पष्ट निर्देश दिए और फिर भारत को बदनाम करने का ये खेल शुरू हो गया। आखिर कंगाली के कगार पर खड़े पाकिस्तान का साथ देकर ये चैनल और पत्रकार भारत को ही बदनाम कर क्या पाकिस्तान से कोई मैडल अथवा राज्यसभा सीट लेने के लिए इतना घिनौना खेल खेल रहे हैं? 

इस पूरे प्रकरण से स्पष्ट हो गया है कि भारतीय मीडिया के कुछ लोग पाकिस्तान और वहां की सेना के हाथ का खिलौना बन चुके हैं। उन्हें भारत की आन-बान से कोई मतलब नहीं है। ट्वीटर पर आजतक के पत्रकार की इस हरकत को लेकर लोगों ने जमकर लानत-मलानत की है।

‘व्यभिचारी और पागल Fuckboy थे श्रीकृष्ण, मैंने हिन्दू ग्रंथों में पढ़ा है’ : HT की सृष्टि जसवाल

सृष्टि जसवाल, HT, श्रीकृष्ण
हिंदुस्तान टाइम्स की पत्रकार सृष्टि जसवाल ने भगवान श्रीकृष्ण का किया अपमान
हिंदुस्तान टाइम्स (HT) की पत्रकार सृष्टि जसवाल के खिलाफ भगवान श्रीकृष्ण का अपमान करने के लिए भाजपा नेता गौतम अग्रवाल ने शिकायत दर्ज कराई है। HT की पत्रकार सृष्टि जसवाल ने भगवान श्रीकृष्ण का खुलेआम अपमान किया है। उन्होंने श्रीकृष्ण को व्यभिचारी, Fuckboy और फोबिया ग्रसित पागल (उन्मत्त) करार दिया था। HT की सृष्टि जसवाल का कहना है कि भगवान श्रीकृष्ण के बारे में ये सब उन्होंने हिन्दू माइथोलॉजी में पढ़ा है।
भाजपा नेता गौतम अग्रवाल ने ट्विटर पर सृष्टि के खिलाफ शिकायत दर्ज कराए जाने की जानकारी दी। उन्होंने कहा कि HT की पत्रकार ने भगवान श्रीकृष्ण का अपमान कर के हिन्दुओं की भावनाओं को ठेस पहुँचाई है, इसीलिए उन्होंने उनके खिलाफ शिकायत दर्ज कराई है। साथ ही उन्होंने सृष्टि जसवाल के ट्विटर प्रोफाइल का स्क्रीनशॉट भी शेयर किया, जहाँ उन्होने ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ का लिंक दे रखा है।

साथ ही गौतम ने ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ से पूछा है कि क्या वो सृष्टि जसवाल की आपत्तिजनक टिप्पणियों को देखते हुए उनके खिलाफ एक्शन लेंगे? साथ ही उन्होंने जनता से अपील करते हुए कहा कि वो इस ट्वीट को ज्यादा से ज्यादा शेयर करें, ताकि सृष्टि की इन अपमानजनक टिप्पणियों के खिलाफ आवाज़ उठे। साथ ही गौतम ने अपनी शिकायत की प्रति भी सोशल मीडिया पर शेयर की और सृष्टि की ट्वीट का स्क्रीनशॉट भी डाला।
अपनी शिकायत में खुद को हिन्दू आईटी सेल का सदस्य बताते हुए गौतम ने लिखा कि सृष्टि जसवाल HT से जुडी हुई हैं, जो देश-विदेश में लाखों लोगों पर प्रभाव डालता है। साथ ही उनकी ट्वीट को ‘भड़काऊ और आपत्तिजनक’ करार दिया। उन्होंने अंदेशा जताया कि ऐसे बयानों को सोशल मीडिया में डालने से सांप्रदायिक द्वेष और मजहबी दुश्मनी को बढ़ावा मिलता है। उन्होंने इस मामले में कड़ी कार्रवाई की माँग की।

The Quint की देशविरोधी पत्रकारिता : अमेरिका की तरह भारत में दंगा भड़काने की साजिश

देश में कुछ मीडिया संस्थान ऐसे हैं, जो पत्रकारिता की आड़ में देशविरोधी ताकतों को प्रोत्साहित करने में शामिल रहते हैं, और उसमें अपनी शान भी समझते हैं। ऐसी ही एक न्यूज वेबसाइट है ‘The Quint’। हिंदी और अंग्रेजी में खबरें प्रकाशित करने वाली इस वेबसाइट के संचालकों को देश की अस्मिता से खिलवाड़ करने में मजा आता है। इसके लिए वेबसाइट फेक न्यूज का सहारा लेने के साथ ही अपने पाठकों को भड़काने तक की कोशिश करती है। यह वेबासाइट अश्वेत नागरिक जॉर्ज फ्लॉयड की मौत के बाद पूरे अमेरिका में हो रहे विरोध प्रदर्शन की तरह भारत में भी दंगे कराना चाहती है।
बीजेपी नेता कपिल मिश्रा ने ‘The Quint’ की एक ऐसी ही अपील के स्क्रीनशॉट ट्विटर पर पोस्ट करते हुए लिखा है कि किस प्रकार ‘The Quint’ भारत के लोगों को उकसाकर उन्हें सड़कों पर उतर आने की अपील कर रहा है। एक ट्वीट में कपिल मिश्रा ने लिखा है – “The Quint ने देश भर में हजारों ईमेल भेजी हैं। अपील की हैं – अमेरिका की तरह भारत में सड़कों पर लोग उतरें और दंगे करें। ये सीधे सीधे देश में दंगे भड़काने की तैयारी हैं। इस तरह की ईमेल भेजने वालों की जगह जेल हैं। #DeshdrohiQuint”

कपिल मिश्रा द्वारा जो स्क्रीनशॉट शेयर किए गए हैं उनमें ‘The Quint’ की पोडाकास्ट प्रोडूसर शोरबोरी पुरकायस्था ने अपने पाठकों से अपील की है कि भारतीयों ने भी अमेरिका में जॉर्ज फ्लोएड की मौत की तर्ज पर ही भारी मात्रा में देशव्यापी विरोध प्रदर्शन क्यों नहीं किए? साथ ही उकसाने वाली भाषा में लिखा गया है कि आखिर हमें घर-घर न्याय पहुँचाने के लिए किस चीज का इन्तजार है?
इसके अलावा ‘The Quint’ की वेबाइट पर कई ऐसी खबरें प्रकाशित की गई हैं, जो देश और हिन्दू विरोधी है। इसको लेकर लोगों में काफी आक्रोश देखा जा रहा है। ट्विटर पर #DeshdrohiQuint का ट्रेंड देखने को मिला, जिसमें लोगों ने ‘The Quint’ को देशविरोधी वेबसाइट करार देते हुए तीखा हमला किया है।





ऐसा पहली बार नहीं है, जब ‘The Quint’ ने देश के हित के खिलाफ पत्रकारिता की हो। कई बार ऐसा देखने को मिला है, जब इस वेबसाइट पर विदेशी नीति और अंतर्राष्ट्रीय मामलों में सरकार की लाइन से अलग हटकर खबरें पोस्ट की जाती हैं।



‘The Quint’ ने छापी कुलभूषण के बारे में झूठी खबर
‘The Quint’ ने अपने एक राष्ट्रविरोधी लेख में पाकिस्तान की जेल में बंद भारतीय नेवी के अफसर कुलभूषण जाधव को रॉ का जासूस बताने वाली मनगढ़ंत स्टोरी प्रकाशित की थी। इस स्टोरी में वेबसाइट की रिपोर्टर ने रॉ के दो पूर्व प्रमुखों के हवाले से पाकिस्तान द्वारा बंधक बनाए गए कुलभूषण जाधव को जासूस बताया था। इस लेख को पढ़कर किसी भी लिहाज से यह नहीं लगेगा कि इसे किसी हिन्दुस्तानी पत्रकार ने लिखा है, बल्कि लगेगा कि किसी पाकिस्तानी पत्रकार ने इस लेख को लिखा है। ‘The Quint’ की इस खबर ने पाकिस्तान को इस मामले में संजीवनी दे दी, पाकिस्तान के सरकारी और प्राइवेट मीडिया संस्थानों ने इसी लेख का हवाला देकर भारत के खिलाफ स्टोरी प्लांट करना शुरू कर दिया। ‘The Quint’ में जानबूझकर लिखी गई इस स्टोरी में देश हित को ताक पर रख दिया गया। पाकिस्तान के पास कुलभूषण जाधव के खिलाफ कोई पुख्ता सुबूत नहीं थे, लेकिन इस लेख के बाद पाकिस्तान को मदद मिल सकती है और ऐसे में कुलभूषण जाधव की रिहाई और जिंदगी बचने की उम्मीदें भी खत्म हो सकती हैं।
हालांकि बाद में ट्विटर और फेसबुक पर ‘The Quint’ को ब्लॉक करने की मुहिम शुरू हो गई, बड़ी संख्या में भारतीय नागरिकों ने ‘The Quint’ को ट्रोल करना शुरू कर दिया। आखिर में बगैर किसी सबूत के छापी गई झूठी स्टोरी को वेबसाइट से हटा दिया गया।
आतंकी सरगना ओसामा बिन लादेन का महिमामंडन किया
इससे पहले भी ‘The Quint’ एक खास एजेंडे के तहत खबरों को प्रकाशित करता रहा है। पिछले वर्ष मई में ‘The Quint’ ने आतंकी सरगना ओसामा बिन लादेन का महिमामंडन करते हुए खबर प्रकाशित की थी। इस खबर में दुनियाभर में हजारों लोगों को अपनी आतंकी गतिविधियों से मौत के घाट उतारने वाले ओसामा बिन लादेन का दुर्दांत आतंकी की जगह एक पति और पिता के रूप में बखान किया गया था। ‘The Quint’ की पत्रकार तरुणी कुमार ने तमाम संदर्भों का हवाला देकर ओसामा को अच्छा इंसान साबित करने की पूरी कोशिश की।
‘The Quint’ की वजह से सेना के जवान ने की खुदकुशी
‘The Quint’ की इससे भी ज्यादा खतरनाक खबर तो वह थी, जिसकी वजह से सेना के एक जवान को कथित तौर पर खुदकुशी करनी पड़ी। पुलिस ने इस मामले में ‘The Quint’ की पत्रकार पूनम अग्रवाल के खिलाफ केस भी दर्ज किया था। दरअसल ‘The Quint’ की रिपोर्टर पूनम अग्रवाल गैरकानूनी तरीके से खुफिया कैमरे के साथ नासिक छावनी एरिया में घुस गईं थी, और वहां सेना के जवान का सेवक के तौर पर काम करते हुए वीडियो बना लिया था। ‘The Quint’ ने पत्रकारिता पेशे के सभी आदर्शों को धता बताते हुए सेना के उस जवान की पहचान भी सार्वजनिक कर दी थी। ‘The Quint’ की इसी हरकत से आहत जवान ने खुदकुशी कर ली। इसके बाद सेना की तरफ से एक बयान भी जारी किया गया था।
आतंकी बुरहान वानी को बताया था कश्मीर की आवाज
प्रेस की आजादी के नाम पर ‘The Quint’ को राष्ट्रविरोधी खबरें प्रकाशित करने की आदत सी पड़ गई है। जम्मू-कश्मीर में पाकिस्तानी आकाओं की शह पर आम नागरिकों के निशाना बनाने वाले आतंकवादी बुरहान वानी को ‘The Quint’ ने ‘करिश्माई’ बताया था। इस वेबसाइट पर बुरहान वानी की तारीफ करने वाले कई लेख प्रकाशित किए गए, जिनमें उस आतंकवादी को घाटी के युवाओं का हीरो बताया गया। आपको बता दें कि जिस बुरहान वानी को ‘The Quint’ कश्मीरी युवाओं का प्रतिनिधि बता रही थी, उसे सेना के जवानों ने एक मुठभेड़ में मौत के घाट उतार दिया था।
डोकलाम विवाद पर चीन के साथ खड़ा दिखा ‘The Quint’
इस वेबसाइट ने तो जैसे विदेशी मामलों में देश की पॉलिसी का विरोध करने की ठान ली है। जब डोकलाम में चीनी सैनिकों ने भारतीय सीमा में घुसने की कोशिश की थी, तो प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में भारतीय सेना ने उन्हें पीछे जाने पर मजबूर कर दिया था। देशभर की मीडिया इसके लिए भारत सरकार और प्रधानमंत्री मोदी की तारीफ कर रही थी, लेकिन ‘The Quint’ ने चाइना के हितों की तरफदारी करते हुए लेख छापा और देश की सुरक्षा एवं अखंडता के खिलाफ जाकर राष्ट्रविरोधी काम किया।
‘The Quint’ का राष्ट्रविरोधी लेखकों का समर्थन

‘The Quint’ वेबसाइट राष्ट्रविरोधी लेख लिखने वाले लेखकों को भी प्रमोट करने में संलिप्त रही है। इस वेबासइट पर सुप्रतीक चटर्जी जैसे लेखकों को भी जगह मिली, जिन्होंने सोशल मीडिया पर प्रधानमंत्री मोदी को मारने का ऐलान करने वाले लश्कर-ए-तैय्यबा जैसे आतंकी संगठनों का समर्थन किया था। हालांकि बाद में सोशल मीडिया पर चटर्जी के खिलाफ आम लोगों के गुस्से के बाद ‘The Quint’ ने इस लेखक को अपनी साइट पर प्रतिबंधित किया।
पूरे विश्लेषण से साफ है कि किस हद तक ‘The Quint’ नाम की यह वेबसाइट भारत विरोधी ताकतों के साथ खड़ी दिखती है। पत्रकारिता के आदर्शों के उलट ‘The Quint’ हमेशा ही सरकार विरोध तत्वों को हवा देने में संलग्न रहती है। आपको यह भी बता देते हैं कि इस वेबसाइट के मालिक हैं राघव बहल, जिन्होंने टीवी18 कंपनी, रिलायंस को बेचने के बाद नई मीडिया कंपनी की नींव डाली और उसका नाम दिया दि क्विंट, अभी यह टीवी पर नहीं है और सिर्फ डिजिटल मीडिया में ही हिंदी और अंग्रेजी में वेबसाइट चलाती है, जिनकी कमान सीएनबीसी आवाज के पूर्व संपादक संजय पुगलिया के पास है।