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प्रणय रॉय और राधिका भी अडानी को बेचेंगे NDTV की अपनी हिस्सेदारी: AMG मीडिया नेटवर्क का हिस्सा बढ़कर 65% हो जाएगा

नई दिल्ली टेलीविजन लिमिटेड यानी NDTV के संस्थापक प्रणय रॉय (Prannoy Roy) और राधिका रॉय (Radhika Roy) ने 23 दिसंबर 2022 को एक बयान जारी कहा कि उन्होंनेे अपने अधिकांश शेयर गौतम अडानी को बेचने का फैसला किया है। इस डील के पूरी होने के बाद NDTV में अडानी की हिस्सेदारी बढ़कर लगभग 65% हो जाएगी।

अपनी हिस्सेदारी को बेचने को लेकर उन्होंने संयुक्त बयान में कहा, “हालिया ओपन ऑफर के बाद AMG मीडिया नेटवर्क अब NDTV की सबसे बड़ी एकल शेयरहोल्डर है। नतीजतन, आपसी समझौते से हमने NDTV में अपने अधिकतर शेयरों को AMG मीडिया नेटवर्क को बेचने का फैसला किया है।”

उन्होंने यह भी कहा, “ओपन ऑफर लॉन्च होने के बाद से गौतम अडानी के साथ हमारी चर्चा रचनात्मक रही है। हमारी तरफ से दिए गए सभी सुझावों को उन्होंने सकारात्मक रूप से और खुलेपन के साथ स्वीकार किया है। हम NDTV और इसकी पूरी असाधारण टीम को विकास के अगले चरण में देखने के लिए उत्सुक हैं, जिस पर भारत गर्व कर सकता है।”

NDTV में प्रणय रॉय और राधिका रॉय की कुल हिस्सेदारी 32.26 प्रतिशत है। दोनों ने 5 प्रतिशत शेयर बचाते हुए शेष 27.26 शेयर बेचने का फैसला किया है। वहीं, गौतम अडानी की स्वामित्व वाली AMG मीडिया नेटवर्क के पास इसका 37.44 प्रतिशत हिस्सा है। यह डील पूरी होने के बाद अडानी ग्रुप NDTV में सबसे बड़ा शेयर होल्डर बन जाएगा और यह हिस्सेदारी बढ़कर 64.70% हो जाएगी।

प्रणय रॉय और राधिका रॉय के बयान सामने आने के बाद NDTV के शेयर में उछाल देखने को मिली। 23 दिसंबर 2022 को NTDV के शेयर 2.50 प्रतिशत की उछाल के साथ 339.95 रुपए पर बंद हुए। अडानी ग्रुप द्वारा NDTV को खरीदने की प्रक्रिया शुरू करने के बाद से कंपनी के शेयर में 16 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि दर्ज की गई है।

NDTV के पूर्व पत्रकार ने शिवसेना नेता एकनाथ शिंदे पर की अपमानजनक टिप्पणी, चैनल की भी उधेड़ी बखिया

                                                     नदीम अहमद काज़मी के ट्विटर बायो का स्क्रीनशॉट
महाराष्ट्र में जारी सियासी उठापटक के बीच पत्रकार नदीम अहमद काजमी ने ट्विटर पर शिवसेना के बागी नेता एकनाथ शिंदे का अपमान किया और उनका मजाक उड़ाया। हालाँकि, जब यह बताया गया कि वह NDTV के लिए काम नहीं करता है, तो पत्रकार अपने पूर्व चैनल की ही बखिया उधेड़ने लगा। दरअसल, काजमी इस वक्त एनडीटीवी में काम नहीं करते हैं। चैनल ने उन्हें (काजमी) वर्ष 2017 में ही निकाल दिया था, लेकिन उनके ट्विटर बायो में अभी भी वर्किंग विद एनडीटीवी लिखा हुआ है, जिससे किसी को भी भ्रम हो सकता है कि वह इस विवादास्पद चैनल के लिए काम कर रहे हैं।

महाराष्ट्र में मचे घमासान से सेक्युलरिस्ट्स में बैचेनी होना स्वाभाविक है, लेकिन उन्हें नहीं मालूम की पटकथा तो भाजपा को सत्ता से दूर रखने के लिए कांग्रेस से हाथ मिलाने वाले दिन ही लिख दी गयी थी। जिस तरह से महाराष्ट्र में हिन्दू विरोधी हरकतें होनी शुरू हुई थी, वह इस पटकथा को और अधिक शक्ति दे रही थी। सेक्युलरिस्ट्स यह भूल गए कि एकतरफा सेकुलरिज्म चलने के दिन लद चुके हैं।  

खैर, नदीम अहमद काजमी ने 22 जून 2022 को शिंदे के खिलाफ एक अपमानजनक ट्वीट किया था, जो इस वक्त अपने सभी विधायकों के साथ असम के गुवाहाटी में रेडिसन ब्लू होटल में डेरा जमाए हुए हैं। पत्रकार ने ट्वीट किया, “शालीनता मायने रखती है… शिंदे फिर से एक ऑटो चालक बनेंगे… बस मेरे शब्दों पर गौर करें।”

एनडीटीवी के तथाकथित पूर्व पत्रकार ने शिंदे को नीचा दिखाने के लिए उनके अतीत का सहारा लिया। एकनाथ शिंदे कभी मुंबई से सटे ठाणे शहर में एक ऑटो-रिक्शा चालक थे। 1980 में, वह शिवसेना सुप्रीमो बालासाहेब ठाकरे से प्रभावित हुए थे। वह राज्य की राजनीति में अपनी सफलता के पीछे पार्टी संस्थापक बाला साहेब ठाकरे का कई बार आभार जता चुके हैं। शिंदे ने एक कार्यकर्ता के रूप में अपनी राजनीतिक पारी की शुरुआत की थी। वह अपने संगठनात्मक कौशल और जनसमर्थन के बल पर शिवसेना के शीर्ष नेताओं में शुमार हो गए। चार बार विधायक रह चुके शिंदे, महा विकास अघाड़ी (एमवीए) सरकार में शहरी विकास और पीडब्ल्यूडी विभागों को संभालते हैं। 58 वर्षीय शिंदे ने राजनीति में कदम रखने के बाद बेहद कम समय में महाराष्ट्र के ठाणे-पालघर में शिवसेना के प्रमुख नेता के तौर पर अपनी पहचान बनाई। उन्हें जनता से जुड़े मुद्दों को आक्रामक तरीके से उठाने के लिए पहचाना जाता है।

एक यूजर वरुण शर्मा (@LogicalHindu_) ने अपने ट्विटर हैंडल पर काजमी के ट्विटर बायो के स्क्रीनशॉट के साथ उसका अपमानजनक ट्वीट का स्क्रीनशॉट साझा किया है। इस बायो में वह खुद को अभी भी एनडीटीवी का पत्रकार बताता है। वरुण शर्मा ने चैनल की एडिटोरियल डायरेक्टर सोनिया सिंह, कंसल्टिंग एडिटर निधि राजदान और न्यूज एंकर गार्गी रावत अंसारी को टैग करते हुए लिखा, “नदीम काजमी NDTV के पत्रकार हैं। अपने साथियों को शालीनता, शिष्टाचार और नैतिकता सिखाने वाली सोनिया सिंह, निधि राजदान और गार्गी रावत आप पर गर्व है।”

ट्विटर यूजर वरुण शर्मा ने अपने दूसरे ट्वीट में प्रेस क्लब ऑफ इंडिया को टैग करते हुए पूछा कि क्या वे अपने महासचिव नदीम अहमद काजमी द्वारा की गई टिप्पणी का समर्थन करते हैं।

NDTV की एडिटोरियल डायरेक्टर सोनिया सिंह ने वरुण शर्मा के ट्वीट का जवाब देते हुए कहा, “नदीम अहमद काज़मी 2017 से एनडीटीवी के साथ नहीं हैं।”

सोनिया सिंह के जवाब से काजमी का चैनल को लेकर पुराना जख्म फिर से ताजा हो गया और उन्होंने एनडीटीवी के लिए बेहद निम्नस्तरीय भाषा का प्रयोग किया। काजमी ने लिखा, “मामला विचाराधीन है। अदालत में पेश नहीं होने पर एनडीटीवी पर 10 हजार जुर्माना लगाया गया है कृपया अपने वकीलों से पता करें। धन्यवाद।” एक अन्य ट्विटर यूजर ने उनसे पूछा कि उनके और एनडीटीवी के बीच ऐसा क्या गलत हुआ है? इस पर काजमी ने दावा किया कि 2017 में चैनल ने ​उन्हें निकाल दिया था, जबकि उन्होंने दो दशक तक चैनल में अपना सर्वश्रेष्ठ योगदान दिया।

वह यही नहीं रुके उन्होंने अपने दर्द बयाँ करते हुए आगे कहा, “मैं संस्थान के साथ पूरी ईमानदारी के साथ 2 दशक तक मजबूती से खड़ा रहा। अपने कर्तव्यों से पीछे नहीं हटा। लेकिन आप जानते हैं.. उस वक्त मुझे बहुत कष्ट हुआ जब मुझे दिल्ली छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा। 58 साल की उम्र में जीवन के अंतिम पड़ाव पर मेरे पास आय का कोई साधन नहीं है।”                                              

काजमी ने खुद शिकायत की थी कि चैनल ने उन्हें गलत तरीके से निकाल दिया था। ऐसे में यह बेहद हैरान करने वाली बात है कि वह फिर भी खुद को एनडीटीवी का पत्रकार बताते हैं। उनके ट्विटर बायो में 2017 के बाद से यानी 5 सालों से एनडीटीवी लिखा हुआ है। यही नहीं उनके लिंक्डइन प्रोफाइल में भी लिखा है कि वह ‘एनडीटीवी में असाइनमेंट‘ पर हैं।

महाराष्ट्र में शिवसेना के संस्थापक बाल ठाकरे से लेकर उद्धव ठाकरे के खास मानें जाने वाले एकनाथ शिंदे ने उद्धव ठाकरे का सारा खेल बिगाड़ दिया है। विधायकों के पाला बदलने से शिवसेना प्रमुख एक तरफ छटपटा रहे हैं और विधायकों की तलाश में मुंबई का चप्पा-चप्पा छान मार रहे हैं। उद्धव ठाकरे की नाक के नीचे से निकल बागी नेता एकनाथ शिंदे के खेमे में शामिल हो रहे हैं, लेकिन शिवसेना प्रमुख को इसकी भनक भी नहीं लग पा रही है। इस बौखलाहट में शिवसेना को समझ नहीं आ रहा है कि वह क्या करें और क्या बोले? शिवसेना ने अपने मुख पत्र ‘सामना’ के संपादकीय में मौजूदा सियासी तूफान को ‘स्वप्न दोष’ की तरह बताया है। पार्टी ने अपने बागियों को चेताया है कि समय रहते सावधान हो जाएँ, वरना उन्हें कचरे में फेंक दिया जाएगा।

‘95% आतंकी संगठन इस्लाम से’: डेटा सुन कर नाराज़ हुआ NDTV का एंकर, कहा – दुनिया में अरबों मुस्लिम, सभी शांतिपूर्ण

पैगंबर मुहम्मद पर नूपुर शर्मा के कथित बयान को लेकर NDTV (नई दिल्ली टेलीविज़न लिमिटेड) पर एक डिबेट के दौरान चैनल के पत्रकार विष्णु सोम ने विवाद खड़ा कर दिया है। सोम ने दावा किया कि इस्लामी आतंकवाद पर बात करने से आम मुस्लिमों की भावनाओं को ठेस पहुँच सकती है।

दरअसल, वामपंथी चैनल पर डिबेट के दौरान वकील और पैनलिस्ट के तौर पर उपस्थित देश रतन निगम ने संयुक्त राष्ट्र के डाटा का हवाला देते हुए तथ्यों को स्पष्ट किया। उन्होंने कहा, “घोषित आतंकवादियों में से 95% इस्लाम से हैं। और 95% आतंकवादी संगठन इस्लामिक हैं।” इस पर इस्लामिक आतंकवाद का बचाव करते हुए विष्णु सोम ने कहा, “तो क्या हम हर उस व्यक्ति को टाइपकास्ट करते हैं जो मुस्लिम हैं (उनमें से अरबों दुनिया भर में मौजूद हैं)?” इसका जबाव देते हुए निगम तंज कसते हुए कहा, “बीजेपी ये तथ्य पैदा नहीं कर रही है।”

रतन निगम द्वारा प्रस्तुत संयुक्त राष्ट्र के डाटा की भारत सरकार या जाँच/गुप्तचर एजेंसियां पुष्टि कर सकती है। 

देश रतन निगम ने नूपुर शर्मा मामले का जिक्र करते हुए जोर देकर कहा, ”मामला कोर्ट में जा चुका है। एफआईआर दर्ज कर ली गई है।” अब अदालतें तथ्यों के साथ न्याय करेंगी और ये तय करेंगी कि उनका बयान उकसावे के जवाब में था या नहीं। अब इस ट्वीट को देखिए, क्या भड़काऊ नहीं?

नूपुर शर्मा के बयान की अलग से जाँच की जा सकती है

निगम के तीखे जबाव से असहज विष्णु सोम डिफेंसिव मोड में आते हुए कहा, “आप मुझे उकसा सकते हैं लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि मैं जो चाहूँ कह सकता हूँ।” न्यूज एंकर ने कहा कि लोगों को अपने भाषण में संयम बरतना चाहिए। उन्होंने ये भी माना कि दूसरों को भी उकसाना नहीं चाहिए। खास बात ये है कि इन लोगों को इस्लामिक पैनलिस्ट द्वारा नूपुर शर्मा और हिन्दुओं को उकसाना स्वीकार्य है, लेकिन जब शर्मा ने इस पर रिएक्ट कर दिया तो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिमिट का उल्लंघन माना जाता है।
डिबेट के दौरान एनडीटीवी के पत्रकार ने उन परिस्थितियों को अनदेखा कर दिया, जिस कारण से टाइम्स नऊ पर डिबेट के दौरान नूपुर शर्मा को इस्लामिक धर्म की पेचीदगियों पर चर्चा करने के लिए मजबूर होना पड़ा।
इस मामले में ऑपइंडिया ने इसके लेकर रिपोर्टिंग की थी कि किस तरह से वाराणसी स्थित ज्ञानवापी विवादित ढाँचे के अंदर मिले शिवलिंग को इस्लामवादी फव्वारा बता रहे हैं। वो शिवलिंग वाली जगह को वर्षों से ‘वुजुखाना’ के तौर पर इस्तेमाल करते रहे हैं। डिबेट के दौरान हिन्दू प्रतीकों को लेकर अपमानजनक टिप्पणियाँ की गईं। इसी कारण से मजबूरन नूपुर शर्मा ने पैगंबर मुहम्मद पर टिप्पणी की।

विष्णु सोम आतंकवाद से ज्यादा ‘टाइपकास्टिंग’ की चिंता

डिबेट के दौरान अधिकतर समय विष्णु सोम मुस्लिमों का बचाव करते रहे। उन्होंने कहा कि कुछ लोगों के कार्यों के कारण पूरे समुदाय को बदनाम नहीं करना चाहिए। हालाँकि, देश रतन निगम ने जोर देकर कहा कि 95% आतंकी संगठन इस्लामिक हैं।
इस पर सोम ने माफी माँगने के अंदाज में कहा, “जिस वक्त आप कहते हैं कि दुनिया भर के 95% आतंकवादी मुस्लिम हैं या इस्लामी आस्था से हैं – मैं आँकड़े नहीं जानता, लेकिन भले ही वे सही हों। लेकिन, क्या वो नहीं कर रहे हैं, जिसके लिए हम आपको मना कर रहे हैं?” न्यूज एंकर ने आगे कहा, “आप पूरे इस्लाम को टाइपकास्ट कर रहे हैं। दुनिया में अरबों मुस्लिम हैं। वे लगभग सभी शांतिपूर्ण लोग हैं … अगर आपका इरादा पूरे आस्था को टाइपकास्ट करने का नहीं है, तो ऐसा बयान क्यों दें? यह इतना गलत नंबर है सर।” हालाँकि, निगम ने संयुक्त राष्ट्र का हावाला देते हुए बार-बार ये दावा किया कि उनका तथ्य सही है।
एनडीटीवी पत्रकार ने मजबूरन स्पष्ट करते हुए कहा, “मुझे यकीन है कि आँकड़े सही हैं, ऐसा क्यों कहते हैं? क्योंकि जिस वक्त हम ये कहते हैं ये ट्विटर पर वायरल हो जाता है”। विष्णु सोम के कुतर्कों पर फटकार लगाते हुए निगम ने कहा, “तो आप तथ्यों से भाग रहे हैं।”
बचाव की मुद्रा में एनडीटीवी पत्रकार ने कहा, “मैं डिबेट के संदर्भ में केवल इतना कह रहा हूँ कि इंटरनेट पर बहुत नफरत फैली हुई है। एक सम्मानित व्यक्ति के तौर पर जैसे ही आप ये बातें कहते हैं तो यह एक पूरे समुदाय को टाइपकास्ट करता है। क्या ऐसा नहीं है, जिससे हम भारतीय बचना चाहते हैं?”
निगम ने कहा, “तथ्यों को सामने रखना हमारा कर्तव्य है और वकील हर रोज अदालतों में ईशनिंदा करते हैं।”
इतना सुनने के बाद निगम को अनसुना कर सोम दूसरे पैनलिस्ट की तरफ सरक लिए। हालाँकि, उन्होंने स्वीकार किया कि 95% आतंकवादी (या कम से कम अधिकांश आतंकवादी) इस्लामी आस्था से संबंधित हैं। लेकिन वो उदारवादी छवि दिखाने के चक्कर में सच को स्वीकार करने से बच रहे थे।

 

‘किसान यूनियन के नेता लाल किले पर मौजूद थे, जिनके चेहरे ढके थे’: दीप सिद्धू

दिल्ली पुलिस ने गणतंत्र दिवस के दंगों के मुख्य अभियुक्तों के बारे में जानकारी देने वालों के लिए इनाम की घोषणा की है, जिसमें अभिनेता से कार्यकर्ता बना खालिस्तानी समर्थक दीप सिद्धू भी शामिल है। वहीं दूसरी तरफ, सिद्धू ने अपने फेसबुक पेज पर सनसनीखेज आरोप लगाते हुए एक और वीडियो जारी किया है। सिद्धू ने आरोप लगाया कि किसान यूनियन के नेता लाल किले में मौजूद थे, जो उन नेताओं के द्वारा किए गए दावों के विपरीत है।

उसने कहा कि उसके पास उन नेताओं के वीडियो सबूत हैं जो लाल किले में मौजूद थे और उनके चेहरे ढके हुए थे। सिद्धू ने आगे आरोप लगाया कि उन नेताओं ने स्थिति को नियंत्रित करने की कोशिश नहीं की, जिसके बाद उसे कदम उठाना पड़ा। उसने दावा किया कि अगर वह उत्तेजित प्रदर्शनकारियों को नियंत्रित नहीं करता, तो चीजें हाथ से निकल जातीं, लेकिन अब हर कोई उन्हें बलि का बकरा बना रहा है और कह रहा है कि उन्होंने लोगों को लाल किले की ओर बढ़ने के लिए उकसाया।

अब चर्चा यह भी है कि जब उन्हें 26 जनवरी घटना की जानकारी है, फिर पुलिस से साझा करने की बजाए क्यों छुपे हुए हो, निर्दोष हो तो सामने क्यों नहीं आते?

दो फरवरी को उसके द्वारा जारी किए गए पहले दो वीडियो में, दीप सिद्धू ने अंग्रेजी में बात की। उसने कहा कि वह सितंबर में विरोध प्रदर्शन में शामिल हुआ था और उस समय कांग्रेस, AAP और BJP सहित सभी राजनीतिक दलों ने उससे संपर्क किया था, लेकिन उसने किसी भी संबद्धता से इनकार किया।

दीप सिद्धू ने कहा कि कांग्रेस ने उसका वीडियो अपलोड किया था जो नवंबर में वायरल हो गया था, लेकिन बाद में बरखा दत्त के साथ उनके साक्षात्कार के बाद उन पर हुए अटैक के कारण इसे हटा दिया गया। सिद्धू ने अप्रत्यक्ष रूप से यह कहते हुए खालिस्तानियों के प्रति अपने झुकाव को सही ठहराने की कोशिश की कि एक लोकतांत्रिक देश में लोगों को दोनों पक्षों को सुनना चाहिए।

मुझे बलि का बकरा बनाया गया 

दीप सिद्धू ने कहा कि हालाँकि उसने लाल किले की स्थिति को नियंत्रित कर लिया था और घटना के समय वह एकमात्र ज्ञात चेहरा था, लेकिन उसे यूनियन नेताओं, विपक्षी दलों और सरकार सहित सभी ने बलि का बकरा बना दिया। उसने आगे आरोप लगाया कि इस बात का कोई सबूत नहीं है कि उन्होंने लाल किले की ओर मार्च के लिए किसी को उकसाया।

सिद्धू ने दावा किया कि उसके पास यह दिखाने के लिए सबूत है कि वह सुबह 9 बजे मार्च में शामिल हुआ था, इससे पहले नहीं, जैसा कि सभी लोग बोल रहे हैं। जब उसने शुरू किया, तब तक लोग लाल किले तक पहुँच चुके थे। सिद्धू ने कहा कि वकील होने और सुप्रीम कोर्ट में प्रैक्टिस करने के बावजूद मुकुल रोहतगी और हरीश साल्वे जैसे प्रसिद्ध वकीलों के साथ उन्हें अपने खिलाफ दर्ज मामलों के कारण पुलिस से भागना पड़ा है।

यूनियन नेता कर रहे छवि ख़राब 

दूसरे वीडियो में, सिद्धू ने दावा किया कि यूनियन के नेता अपने ‘आईटी सेल’ का इस्तेमाल कर रहे हैं ताकि उनकी गलत छवि को दिखाया जा सके। उसने कहा कि जब भी वह अपने पक्ष की बात रखना चाहता है तो आईटी सेल सक्रिय हो जाता है और उनकी बातों को दबा दिया जाता है। उसने कहा कि वह हरियाणा में विरोध स्थल के करीब रह रहा है और कभी भी वहाँ पहुँच सकता है। उसने किसान नेताओं को चुनौती दी कि वे उनके साथ इस बारे में चर्चा करें कि वे किस तरह से आंदोलन को गलत तरीके से पेश कर रहे हैं।

वीडियो का एक हिस्सा है, जहाँ उसने अपनी पूँछ पर आग के साथ भगवान हनुमान के साथ अपनी तुलना करने की कोशिश की, लेकिन वीडियो का वह हिस्सा एडिट किया गया था, और इसमें केवल जलती हुई पूँछ और ‘हनु’ नाम का संदर्भ शामिल है जिसके बाद वीडियो ट्रिम कर दिया गया था।

दीप सिद्धू ने गणतंत्र दिवस पर हुई हिंसा पर लीपापोती करने की कोशिश की। उसने दावा किया कि जब वह लाल किले की ओर बढ़ रहा था, तब सड़क पर कोई हिंसा नहीं हुई थी। उसने आरोप लगाया कि हिंसा के नाम पर मीडिया जो कुछ भी दिखा रहा है वह केवल छोटी-मोटी घटनाएँ हैं। उसने पुलिस कर्मियों पर किसी भी हमले को पूरी तरह से इनकार किया, जिसमें सैकड़ों पुलिसकर्मी घायल हो गए। जिन पर दंगाइयों ने तलवारों, डंडों और ट्रैक्टरों से हमला किया था।

मै नाराज हूँ रवीश कुमार से 

NDTV का, विशेष रूप से पत्रकार रवीश कुमार का नाम लेते हुए, सिद्धू ने कहा कि उसने सोचा था कि रवीश एक समझदार पत्रकार हैं, लेकिन जिस तरह से उन्होंने उसे अपने शो में पेश किया, वह निराशाजनक था। उन्होंने सिर्फ इसलिए कहा क्योंकि रवीश अपने प्राइम टाइम शो में उनके नाम का इस्तेमाल करना चाहते थे, उन्होंने सिद्धू से बात करने और कहानी का अपना पक्ष जानने की कोशिश नहीं की। उन्होंने यह भी दावा किया कि उन्होंने बरखा दत्त के साथ साक्षात्कार के बाद मीडिया को साक्षात्कार देना बंद कर दिया, क्योंकि वहाँ उसे गलत तरीके से दिखाया गया था।

मै साबित कर सकता हूँ किसने उकसाया 

3 फरवरी को जारी किए गए दूसरे वीडियो में सिद्धू ने दावा किया कि उसके पास इस बात का सबूत है कि प्रदर्शनकारियों को किसने उकसाया था। उसने कहा कि वह जल्द ही अपने सभी वीडियो पब्लिश करेगा, जिसमें 26 जनवरी को सुबह 4 बजे रिकॉर्ड किए गए वीडियो भी शामिल हैं। उसने दावा किया कि उसने केवल एक-दूसरे का समर्थन करने की बात की, और संगठन के नेता उकसाने लगे थे। उसने आगे कहा कि लोग चाहे वे दिल्ली से कितने भी दूर हों, गाँवों और शहरों से विरोध प्रदर्शन में शामिल हों।

लाल किला पर निशान साहेब पर कुछ गलत नहीं 

सिद्धू ने दावा किया कि लाल किला देश में सभी का है, और खाली पोल पर निशान साहब को फहराने में कोई बुराई नहीं है। हालाँकि, सिद्धू ने अपने वीडियो में यह उल्लेख नहीं किया कि खाली पोल हर 15 अगस्त को राष्ट्रीय ध्वज फहराने के लिए रिजर्व है। सिद्धू यह स्वीकार करने में भी असफल रहा कि धार्मिक ध्वज फहराने के लिए पोल के शीर्ष पर गए व्यक्ति द्वारा राष्ट्रीय ध्वज कैसे फेंका गया। वह आगे यह स्वीकार करने में असफल रहा कि सिख पवित्र चिन्ह वाले दो झंडे, एक त्रिकोणीय और दूसरा आयताकार झंडा लाल किले के गुंबद पर फहराया गया था।

NDTV ने कल्याण सिंह से पूछा :आपने गोली चलवा कर हज़ारों कारसेवकों को क्यों नहीं मरवाया?

Babri demolition: Is Kalyan Singh guilty? - YouTube
जब अगस्त 5 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अयोध्या में भव्य राममंदिर का शिलान्यास कर रहे होंगे, हिन्दू विरोधियों के साथ-साथ NDTV भी शोकाकुल हो रहा होगा। संभव है हिन्दू होते हुए अंदर ही अंदर लाख ख़ुशी भी हो रही हो, लेकिन उजागर करना कठिन होगा। 
दिसंबर 1992 में उत्तर प्रदेश में विवादित ढॉंचे का ध्वंस के बाद कल्याण सिंह को अपनी सरकार गँवानी पड़ी थी। भले ही उनकी सरकार चली गई और बाद में कुछ कारणों से वे भाजपा से सस्पेंड भी किए गए, लेकिन राम मंदिर पर उनका स्टैंड ज्यों का त्यों रहा। एनडीटीवी के विजय त्रिवेदी को दिसंबर 2009 में दिए गए इंटरव्यू में भी ये साफ़ झलकता है। यही वो इंटरव्यू है, जिससे पता चलता है कि किस कदर एनडीटीवी रामभक्तों की लाशों पर ठहाके लगाना चाहता था।
बुधवार (अगस्त 5, 2020) को राम जन्मभूमि अयोध्या में बनने वाले भव्य राम मंदिर का भूमिपूजन कार्यक्रम है। इसमें कल्याण सिंह भी मौजूद रहेंगे। कल्याण सिंह का रुख आज भी वही है, लेकिन एनडीटीवी भी नहीं बदला है। कल को विजय त्रिवेदी रामभक्तों की लाश देखना चाहते थे, अब रवीश कुमार राम मंदिर से खार खाए बैठे हैं। आइए, आपको बताते हैं कि क्या था उस इंटरव्यू में।
दरअसल, विजय त्रिवेदी इस बात पर कल्याण सिंह को घेरने में लगे हुए थे कि आखिर ढाँचा गिरने के बाद उन्होंने उन अधिकारियों पर कार्रवाई क्यों नहीं की, जिनके रहते ये सब हुए। आखिर पुलिस अधिकारियों ने गोली चलाने का निर्देश क्यों नहीं दिया? त्रिवेदी के शब्दों का अर्थ ये था कि रामभक्तों पर गोली चला कर उनका कत्लेआम क्यों नहीं मचाया गया, वो भी एक विवादित ढाँचे को बचाने के लिए।

EXCLUSIVE- Kalyan Singh nails Mulayam Yadav on his claim about ...400 Saal Purane Kalank Babri Dhanche Ko Mitaya Aise Veer Neta The ...इस पर कल्याण सिंह ने उन्हें ये बता कर सन्न कर दिया कि उन्होंने ही अधिकारियों को सख्त आदेश दिए थे कि वहाँ जुटे लोगों पर गोली न चलाई जाए, जिसका उन्होंने पालन किया। सारा दोष अपने ऊपर लेते हुए कल्याण सिंह ने अधिकारियों को पाक-साफ़ बताया। इसके बाद एनडीटीवी के विजय त्रिवेदी ने उन्हें जो सलाह दी, वो न सिर्फ़ चैनल की हिन्दूघृणा की सोच को दर्शाता है, बल्कि राम मंदिर के प्रति उसकी घृणा को भी दिखाता है।
तब एनडीटीवी के विजय त्रिवेदी ने उन्हें कहा कि आखिर कल्याण सिंह ने गोली न चलवा कर हजारों लोगों के मारे जाने के बदले करोड़ों लोगों को बाँटने का फैसला कैसे ले लिया? यानी, एनडीटीवी अपनी एक धारणा के बदले हज़ारों रामभक्तों की लाश चाहता था। त्रिवेदी ने ये धारणा बना ली थी थी ‘लोग बँट गए’। बस इसके लिए हज़ारों श्रद्धालुओं की लाशें बिछा दी जाएँ, ऐसा उनका सोचना था।
एनडीटीवी के इस इंटरव्यू में विजय त्रिवेदी बार-बार इसी बात पर कल्याण सिंह को घेरने की कोशिश करते हुए नज़र आए कि आखिर उन्होंने कारसेवकों पर गोली क्यों नहीं चलवाई? हज़ारो लोगों के मरने’ की बात वो इतनी आसानी से कह रहे थे, जैसे कि वो सभी आतंकवादी हों। जबकि वे सभी आमजन थे। यही एनडीटीवी आतंकियों और नक्सलियों को Whitewash करता रहता है। 
इस वीडियो को भी देखिए:
सुरक्षा के इंतजाम न रहने के आरोपों और खुद के मजबूत मुख्यमंत्री की छवि पर उठे सवालों का जवाब में उदाहरण गिनाते हुए कल्याण सिंह ने कहा कि अमेरिका के राष्ट्रपति की सुरक्षा के पूरे इंतज़ाम थे लेकिन घटना घटित हो गई। इंदिरा गाँधी की सुरक्षा के पूरे इंतज़ाम थे लेकिन घटना घटित हो गई। राजीव गाँधी की सुरक्षा के पक्के इंतज़ाम थे लेकिन घटना घटित हो गई। उन्होंने इसे राष्ट्रीय गर्व का दिन भी करार दिया।
6 दिसंबर 1992 को विवादित ढाँचा गिराए जाने के 10 दिन बाद गृह मंत्रालय ने लिब्राहन आयोग का गठन किया था। इस आयोग को ज़िम्मेदारी सौंपी गई कि बाबरी मस्जिद विध्वंस में शामिल लोगों का नाम सामने आए। इस आयोग ने लगभग 17 साल बाद अपनी रिपोर्ट पेश की जिसमें कल्याण सिंह को अहम किरदार बताया था। कोर्ट की सुनवाई इस मामले में अभी तक चल रही है।
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गोधरा : जब दंगाइयों ने साबरमती एक्सप्रेस, कोच एस-6 को आग लगा दी थी गोधरा में 27 फरवरी 2002 की सुबह साबरमती एक्सप्रेस के को.....
राजस्थान के राज्यपाल के रूप में अपना कार्यकाल पूरा करने के तुरंत बाद भी उन्होंने कहा था कि अयोध्या करोड़ों भारतीयों की आस्था का केंद्रबिंदु है। अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण होता है तो इससे करोड़ों भारतीयों की इच्छा पूरी होगी। दोबारा बीजेपी का सदस्य बनने के बाद उन्होंने सभी राजनीतिक दलों को राम मंदिर मुद्दे पर अपना पक्ष स्पष्ट करने के लिए कहा था। अब वे 5 अगस्त को भव्य राम मंदिर भूमि पूजन के साक्षी बनेंगे।

झूठों का सरदार है राहुल गांधी ; NDTV के पत्रकार ने भी नहीं दिया साथ, कर दिया भंडाफोड़

राहुल गाँधी एडिटेड वीडियो
राहुल गाँधी zoom ऐप से प्रेस कॉन्फ्रेंस करते हुए
आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
महाराष्ट्र में कोरोना संकट के बीच कांग्रेस के ‘युवा’ नेता राहुल गाँधी ने लाइव प्रेस कॉफ्रेंस में शिवसेना से अपनी राजनीतिक दूरी बना ली। यह कल मतलब 26 मई शाम की बात है। बाद में जब फजीहत हुई तो सफाई के तौर पर एक एडिटेड वीडियो शेयर कर दी, जिसमें उन्होंने दावा किया कि ऐसा कुछ कहा ही नहीं।
हालाँकि, उनके पार्टी पेज पर शेयर की गई, लाइव प्रेस कॉन्फ्रेंस की वीडियो ने इस बात को स्पष्ट कर दिया कि उनके द्वारा साझा की गई वीडियो एडिटिड है, जिसके जरिए वह अपने फॉलोवर्स को बरगलाना चाहते हैं।
राहुल गाँधी ने कल(मई 26) देर रात लाइव कॉन्फ्रेंस की एडिटेड वीडियो को अपने ट्विटर अकॉउंट पर शेयर किया। उन्होंने इस वीडियो के साथ लिखा, “इस वीडियो को देखें कि कैसे पेड मीडिया अपने आकाओं के लिए सच्चाई को विकृत करता है और वास्तविक मुद्दों से ध्यान भटकाता है।” लेकिन, उनके इस पोस्ट पर कांग्रेसी समर्थकों को छोड़कर कुछ यूजर्स ऐसे दिखे, जिन्होंने फौरन राहुल गाँधी के झूठ को पकड़ लिया और वीडियो की प्रमाणिकता पर संदेह व्यक्त किया।
यदि हम वास्तविक प्रेस कॉनफ्रेंस की वीडियो को देखते हैं, जिसे कांग्रेस ने अपने पेज पर भी शेयर किया है, तो मालूम चलेगा कि 31:45 से 34:50 के स्लॉट पर राहुल गाँधी ने संजीत त्रिवेदी के सवालों का जवाब देते हुए महाराष्ट्र की स्थिति पर बात की।

इसके बाद दूसरे पत्रकार की बात शुरू होते ही उन्होंने वापस अपनी बात में सामंजस्य बिठाने के लिए संजीत से दोबारा कनेक्ट होकर बात की। बाद में इन्हीं दोनों के स्लॉट को मिक्स करके एडिट किया गया और उस एडिटेड वीडियो को शेयर किया गया।

वास्तविक वीडियो में राहुल गाँधी ने महाराष्ट्र में कोरोना के हालातों को देखते हुए स्पष्ट कहा कि महाराष्ट्र एक ऐसी जगह पर है, जहाँ कोरोना के सबसे ज्यादा होने की संभावना है। मगर, इसके बाद उन्होंने ये साफतौर पर कहा कि वो यहाँ एक फर्क बताना चाहते हैं कि महाराष्ट्र में वो शिवसेना को सपोर्ट कर रहे हैं, वहाँ वे निर्णायक भूमिका में नहीं है। जहाँ की स्थिति के लिए वे जवाबदेह हैं, वो जगह-पंजाब, राजस्थान, छत्तीसगढ़, पॉन्डिचेरी है। इतना ही नहीं, इसके बाद उन्होंने ये भी स्पष्ट रूप से बोला कि सरकार चलाने में और सरकार को समर्थन देने में फर्क़ होता है।

जब सोशल मीडिया पर लोगों ने इसे लेकर सवाल उठाए, तो उन्होंने कुछ मिनटों की वीडियो को शेयर कर दिया, जिसमें वे महाराष्ट्र को देश की एक प्रमुख धरोहर बोलते दिख रहे हैं और उसके मात्र 35 सेकेंड में ये भी बोल रहे हैं कि अगर उनकी सरकार महाराष्ट्र में है, तो भाजपा सवाल उठा सकती है, इसमें कोई गलती नहीं है। बल्कि उससे तो फायदा होता है, उससे तो उनकी सरकार सीख सकती है, लेकिन राज्य में बिना कोई वजह राष्ट्रपति शासन लागू करने की बातें करना तो रचनात्मक विरोध से बिलकुल अलग है।
अब इस वीडियो को लेकर सोशल मीडिया पर राहुल गाँधी और कांग्रेस की खूब फजीहत हो रही है। लोग इसी बात पर गौर करवा रहे हैं कि सच बताना था तो एडिट वीडियो शेयर करनी की क्या आवश्यकता थी? या आखिर क्यों 35 सेकेंड के बाद वीडियो में जंप है? और तो और, NDTV के पत्रकार भी राहुल गाँधी के इस एडिटेड वीडियो को लेकर कमेंट कर रहे हैं।

झूठों का सरदार है राहुल गांधी
राहुल गांधी देश के इकलौते ऐसे नेता हैं, जो हर चीज को खारिज करते हैं, लेकिन जिनके पास कोई समाधान नहीं है। राहुल गांधी प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन चीजों को खारिज करते हैं, जिसके लिए देश-दुनिया में भारत की जय-जयकार होती है। आइए उनके प्रेस कॉन्फ्रेंस के झूठ और फरेब का सामने रखते हैं
राहुल गांधी का झूठ नंबर 1
राहुल गांधी ने कहा – लॉकडाउन का मकसद फेल हो गया।
सच्चाई – रिपोर्ट से साफ है कि अगर लॉकडाउन नहीं हुआ होता, तो आज कोरोना पीड़ितों की संख्या 14 लाख से 29 लाख के बीच हो सकती थी। कोरोना से मौत की आंकड़ा भी 37 हजार से 78 हजार के बीच हो सकती थी।

झूठ नंबर – 2
राहुल गांधी बस अपने काम की चीज देखते हैं… बाकी चीजें छोड़ देते हैं। ये दोगलापन उस समय से है जब उनकी केंद्र में सरकार थी। उस समय मनमोहन सरकार ने फैसला लिया और सदन के बाहर आकर राहुल गांधी ने फैसले की उस कॉपी को फाड़ दिया था।

अगर उनके हिसाब से लॉकडाउन गलत है तो फिर उनकी ही राज्य सरकारें केंद्र सरकार के निर्णय से पहले क्यों लॉकडाउन बढ़ा रही हैं। केंद्र सरकार के निर्णय से पहले कांग्रेस शासित पंजाब और महाराष्ट्र सरकार ने लॉकडाउन बढ़ाने का निर्णय किया।
झूठ नंबर – 3
राहुल गांधी से सवाल किया गया कि महाराष्ट्र में देश के कुल संक्रमितों का एक तिहाई से बड़ा हिस्सा है। वे महाराष्ट्र के लिए कुछ प्रभावी काम क्यों नहीं करते। इस पर राहुल गांधी ने कहा महाराष्ट्र में वे निर्णायक भूमिका में नहीं हैं। तो सवाल ये है कि आखिर वो महाराष्ट्र में सरकार से बाहर क्यों नहीं हो जाते। यही नहीं अगर वे प्रभावी भूमिका में नहीं हैं तो सिर्फ सोनिया का ओरिजिनल नाम लेने पर देश के सबसे बड़े पत्रकार अर्णब गोस्वामी के खिलाफ पूरी सरकार कैसे काम करने लगी?

झूठ नंबर – 4
राहुल गांधी ने अब लॉकडाउन में धीरे-धीरे छूट देने पर आलोचना की है। सच्चाई ये है कि राहुल गांधी ने ही पहले कहा था कि लॉकडाउन से कोई फायदा नहीं होने वाला है और लॉकडाउन लगाए जाने का विरोध किया था।

NDTV : कोरोना वायरस पर फेक न्यूज का गर्म होता बाजार

कोरोना वायरस संकट पर देश में 14 अप्रैल तक लॉकडाउन है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के राष्ट्र के नाम संबोधन के बाद से लोग सोशल डिस्टेंसिंग का पालन कर रहे हैं। घर से बाहर ना निकल कर लोग इस महामारी को मात देने की कोशिश में लगे हैं, लेकिन कुछ मीडिया हाउस फेक न्यूज से दहशत फैला कर कोरोना के खिलाफ अभियान को असफल करना चाहते हैं। कोरोना को लेकर न्यूज एजेंसी IANS के साथ NDTV और बिजनेस इनसाइडर ने यह दिखाने की कोशिश की कि भारत में कोरोना वायरस की भयावह स्थिति अगस्त के मध्य तक रह सकती है। अमेरिका की जॉन हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी और सेंटर फॉर डिजीज डायनेमिक्स, इकोनॉमिक्स एंड पॉलिसी (CDDEP) की रिपोर्ट का हवाला देकर गया कि करीब 25 करोड़ लोग इस वायरस की चपेट में आकर अस्पताल पहुंच सकते हैं।
वैसे फेक न्यूज़ चलाने में द ऑल्ट, द क्विंट भी पीछे नहीं। अपनी TRP बढ़ाने के लिए इतनी असंभव न्यूज़ प्रसारित कर रहे हैं, जिनका सच्चाई से दूर तक कोई वास्ता नहीं। इन जैसे संस्थानों ने समस्त पत्रकारिता को पीली पत्रकारिता(yellow journalism) बना दिया है। जो किसी भी देश में कभी भी विस्फोटक स्थिति ला सकता है। भारत सरकार लॉक डाउन से पूर्व सावधानी बरत रही थी, जैसे हवाई अड्डों, मेट्रो और रेलवे स्टेशन को सनेटाइज़ करना आदि आदि। इस कटु सच्चाई से इंकार भी नहीं भारत में यह संक्रामक बीमारी विदेशों से आए लोगों के कारण ही फैली; दूसरे, जिन्हें इस बीमारी की पुष्टि हो गयी, उनका इलाज करवाने की बजाए इधर-उधर छुपकर अपने साथ अन्यों को भी संक्रमित करने के कारण भी फैली।  


लेकिन जॉन हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी ने इस खबर या स्टडी से कोई लेना-देना ना होने की बात कह कर फेक न्यूज फैलाने वालों पोल खोल दी।

सोशल मीडिया पर लोगों ने एनडीटीवी को लताड़ लगानी शुरू कर दी।
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पोल खुलने के बाद एनडीटीवी ने खबर डिलीट कर दी।

स्मरण हो कि जब देश में नागरिकता संशोधक कानून विरोधी शांति के नाम धरने एवं प्रदर्शन कर रहे थे, तब भी इसी NDTV ने उपद्रवियों द्वारा अलगाववादी नारे, हिन्दुत्व, योगी, मोदी, अमित विरोधी नारे लगाए जाने को कभी उजागर नहीं किया। किस तरह इन धरने और प्रदर्शनों पर विरोधी दल पैसा पानी की बहा रहे थे, कभी NDTV, The Quint और The Alt आदि ने कभी जनता के सम्मुख नहीं रखा। विपरीत इसके उनकी अनुचित बातों का ढोल पीटते रहे।  
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ऐसे समय में, जब पूरा विश्व चाइनीज Covid-19 वायरस के संक्रमण से लड़ रहा है, देश का लेफ्ट-लिबरल मीडिया गिरोह अपने प्रोपेगंडा ...

जनता कर्फ्यू : पुलिस तो नहीं होगी घरों के बाहर? नमाज पर हुआ चुप -- राजदीप सरदेसाई

राजदीप सरदेसाई
जनता-कर्फ्यू का विरोध करते राजदीप सरदेसाई 
आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
NDTV लगता है घोर मोदी विरोधी है। जिसका प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हर हर निर्णय का विरोध करना जन्मसिद्ध अधिकार है। 
दूसरे, जिस चैनल के पत्रकार अपनी टेबल पर आतंकियों की फोटो ऐसे रखते हों, जैसे वह इनके भगवान हों, आतंकियों के साथ इमोजी-इमोजी खेलते हों, क्या उस चैनल पर विश्वास किया जा सकता है?
कोरोना वायरस को लेकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने आज शाम आठ बजे देशवासियों के नाम सन्देश दिया जिसमें उन्होंने घर से बाहर ना निकल पाने की स्थिति में गरीब कामगारों की सैलेरी जारी रखने से लेकर नवरात्रि को लेकर सन्देश दिए। लेकिन इस सब में पीएम मोदी के भाषण का सबसे महत्वपूर्ण पहलू था- जनता कर्फ्यू!
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 22 मार्च को सुबह 7 से रात नौ बजे तक‍ जनता कर्फ्यू कि बात कही। पीएम मोदी ने कहा कि मैं आज प्रत्येक देशवासी से एक और समर्थन माँग रहा हूँ। यह समर्थन जनता-कर्फ्यू लगाने के लिए था।
इस भाषण के बाद हर किसी ने अपनी-अपनी तरह से इस पर प्रतिक्रिया दी। सबसे आश्चर्यजनक यह देखना था कि ट्विटर पर अक्सर सरकार विरोधी एजेंडा और हिंदुत्व विरोधी अभियानों को लेकर सक्रीय होने वाले कुछ चुनिन्दा लोगों ने भी प्रधानमंत्री मोदी की इस माँग का समर्थन किया। लेकिन कुछ लोग अपनी घृणा की विचारधारा में इतना गहरा उतर चुके हैं कि वो कोरोना जैसी महामारी के बीच भी अपनी घृणा और सरकार विरोधी प्रोपेगेंडा के लिए जगह बना ले रहे हैं। इन्हीं में से एक नाम है इण्डिया टुडे समूह के तथाकथित पत्रकार राजदीप सरदेसाई का। ये वही राजदीप सरदेसाई है जिसे कुछ दिन पहले ही NDTV के पत्रकार रवीश कुमार ने ‘दुकानदार’ कहकर सम्बोधित किया था।
राजदीप ने जनता कर्फ्यू के आह्वाहन का मजाक बनाते हुए फ़ौरन बयान दिया कि क्या जनता कर्फ्यू के दिन पुलिस उसके घर के आगे मौजूद रहेगी? दरअसल, स्पष्ट सी बात यह है कि राजदीप जैसे लोग सदियों से चली आ रही सत्ता की गुलामी के कारण स्वयं को इतना ज्यादा सुरक्षित महसूस करने लगे हैं कि कोरोना जैसी किसी महामारी का भी ये लोग उपहास बनाते नजर आते हैं।
यह वही सभ्रांत मीडिया गिरोह है, जिसने 2014 से ही निरंतर मोदी सरकार द्वारा गरीबों के कल्याण के लिए लाई हर योजना का उपहास किया है और नतीजा यही रहा कि राजदीप हर समय थूक आसमान में उछालते ही नजर आए और वो कहाँ जाकर गिरा यह बताने की ज़रूरत नहीं है।
एक ओर जब प्रधानमंत्री मोदी जनता कर्फ्यू को उन लोगों के लिए समर्पित कर रहे हैं, जो कोरोना की वैश्विक त्रासदी के बीच भी बेहद समर्पण के साथ और सेवा भाव से लोगों का उपचार कर रहे हैं और उनकी जरूरतों का ध्यान रख रहे हैं, वहीं राजदीप सरदेसाई को यहाँ जनता कर्फ्यू एक खतरा नजर आता है। हालात तो यह हो चुके हैं कि राजदीप सरदेसाई इस जनता कर्फ्यू के विरोध में 22 मार्च को बदहवास हालात में सड़क पर दौड़ न लगाने लगें कि देखो मोदी ने कहा लेकिन कोरोना मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकता। ये ऐसा ही है जैसे मोदी अगर जहर को प्रतिबंधित कर दें तो राजदीप जैसे ही कुछ गिने-चुने लोग ख़ुशी-ख़ुशी जहर पीना स्वीकार कर लें।
अयोध्या में रामनवमी के आयोजन को लेकर रचा प्रपंच 
यही नहीं रामनवमी पर राजदीप जैसे ही प्रपंचकारियों द्वारा फैलाए जा रहे झूठ पर पूरी चर्चा करने कि हिम्मत रखने वाले इसी राजदीप ने रामनवमी के आयोजन को लेकर भी बहस छेड़ी और इसे रामनवमी बनाम शाहीन बाग़ जैसे मुहावरों में ढालने की कोशिश भी की।
शो के दौरान जब राजदीप सरदेसाई से भाजपा नेता सुधांशु त्रिवेदी ने जुमे की नमाज को लेकर सवाल किया तो राजदीप ने यह कहकर टाल दिया कि इसे शाहीन बाग़ बनाम रामनवमी मत बनाइए। आखिरी बार जब राजदीप सरदेसाई कोई मुद्दा अपनी इस धूर्त हंसी के साथ क्लोज नहीं कर पाए थे, तब वो अमेरिका के मेडिसन स्क्वायर में लोगों से घूँसा खा रहे थे। ख़ास बात यह है कि पुलिस वहाँ पर भी मौजूद नहीं थी।
इन्हीं कुछ सोशल मीडिया से उपजे हुए लिबरल वर्ग ने हाल ही में अयोध्या में रामनवमी को लेकर भी जमकर प्रोपेगंडा किया और आज राजदीप सरदेसाई भी उसी प्रोपेगंडा को दोहराते हुए देखे गए हैं। दरअसल, राणा अयूब जैसे इन्टरनेट विचारकों ने ट्विटर पर इस खबर को खूब तत्परता से फैलाया कि कोरोना के आतंक के बावजूद अयोध्या में 25 मार्च से 2 अप्रैल के बीच रामनवमी के मेले का आयोजन किया जा रहा है। इस फर्जी खबर का खंडन खुद उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने 16 मार्च को ही यह स्पष्ट कर दिया था कि 20 मार्च को ही इस बारे में सभी अधिकारियों से बातचीत के बाद कोई फैसला लिया जाएगा।
लेकिन राणा अयूब, ध्रुव राठी और राजदीप जैसे सर से पाँव तक घृणा और सत्ता विरोधी अभियान में जुटे लोगों को अपनी विश्वसनीयता से फर्क पड़ना बंद हो चुका है और राजदीप जैसे लोग इसे शर्म के बजाए विशेषाधिकार समझकर इसका खुलकर ‘उपयोग’ करते जा रहे हैं।
फिलहाल आवश्यक यह है कि प्रधानमंत्री मोदी द्वारा 22 मार्च को आयोजित किए जा रहे जनता-कर्फ्यू का हिस्सा बनें और एक-दूसरे को एहसास दिलाएँ कि इस वैश्विक आपातकाल की घड़ी में सभी लोग अपने वैचारिक विरोधाभाषों से दूर होकर एक दूसरे के साथ हैं। वास्तव में ‘वर्क फ्रॉम होम’ और लॉकडाउन जैसी स्थिति का सबसे ज्यादा दुष्प्रभाव समाज के सबसे निचले वर्ग पर पड़ता है।
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विष्णु सोम की टेबल पर ओसामा बिन लादेन का फोटो आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार कुछ वर्ष पूर्व तक जिस एनडीटीवी को निष्पक...
इसी बात को समझते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने आज के अपने भाषण में इन्हीं कुछ बिन्दुओं से देशवासियों को अवगत करवाया और कहा कि जनता कर्फ्यू के दिन दूसरों की सेवा कर रहे लोगों का 22 मार्च की शाम को 5 बजकर 5 मिनट तक करतल ध्‍वनि के साथ आभार करें। ‘सेवा परमो धर्म’ के हमारे संस्कारों को मानने वाले ऐसे देशवासियों के लिए हमें पूरी श्रद्धा के साथ अपने भाव व्यक्त करने होंगे। आप स्वयं सोचिए, देश के प्रधानमंत्री से ऐसा संदेश सुनने के बाद भी क्या किसी प्रकार की आपसी घृणा के लिए जगह शेष रह जाती है?