Showing posts with label CHANDRASHEKHAR. Show all posts
Showing posts with label CHANDRASHEKHAR. Show all posts

अयोध्या में राम मन्दिर के लिए मोदी सरकार का साहसिक कदम

अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण के मसले पर मोदी सरकार ने बड़ा कदम उठाया है। केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में रिट पिटीशन दायर की है। राम मंदिर निर्माण के मुद्दे पर प्रस्ताव को लेकर केंद्र सरकार सुप्रीम कोर्ट पहुंची है। लगभग 0.3 एकड़ भूमि जो कि विवादित है उसे छोड़कर शेष 70 एकड़ भूमि जो अधिग्रहित की गई थी, उसे मालिकों को वापस किया जा सकता है और यह 70 एकड़ भूमि है जिसे मोदी सरकार ने याचिका के माध्यम से अधिग्रहित करने की परमिशन मांगी है।
केंद्र सरकार ने 70 एकड़ जमीन अधिकृत की है। बाबरी मस्जिद-राम जन्मभूमि पर यथास्थिति के आदेश वापस लेने की अर्जी है। अर्जी में कहा गया है कि 2.77 एकड़ जमीन पर निर्माण का अधिकार मिले। सरकार ने हिन्दू पक्षकारों को दी जमीन रामजन्म भूमि न्यास को देने की अपील की है।

अयोध्या की कौन सी जमीन लौटाना चाहती है मोदी सरकार?

अयोध्या में राम मंदिर और बाबरी मस्जिद विवाद मामले में मोदी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से गैर- विवादित जमीन 67 एकड़ जमीन को उसके मालिकों को लौटाने की इजाजत मांगी है. केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से मांग की है कि यथास्थिति को हटाते हुए 67 एकड़ गैर विवादित जमीन को उसके मालिकों को वापस करने की अनुमति दी जाए. 1993 में अयोध्या में विवादित स्थल सहित आसपास की करीब 70 एकड़ जमीन का केंद्र सरकार ने अधिग्रहण किया था.
हालांकि, केंद्र सरकार ने अपनी याचिका में कहा है कि अयोध्या मामले में महज 0.313 एकड़ जमीन पर ही विवाद है और बाकी जमीन पर यथास्थिति रखने की जरूरत नहीं है. सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में कहा है कि अयोध्या में विवादित स्थल के आस-पास की हिंदू पक्षकारों की जो जमीन अधिग्रहित की गई थी, उसे रामजन्मभूमि न्यास को सौंप दिया जाए.
नरसिम्हा राव सरकार ने किया था अधिग्रहण
बता दें कि 6 दिसंबर, 1992 में अयोध्या में बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद तत्कालीन नरसिम्हा राव सरकार ने 1993 में अध्यादेश लाकर विवादित स्थल और आस-पास की जमीन का अधिग्रहण किया था. इसमें 40 एकड़ जमीन रामजन्मभूमि न्यास की है. केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट की याचिका में कहा कि हम चाहते हैं कि इसे उन्हें वापस कर दी जाए ताकि विवादित भूमि तक पहुंचने का रास्ता वगैरह बनाया जा सके.
सही मालिक को जमीन लौटाएगी सरकार
हालांकि, इस्माइल फारुकी मामले में सुप्रीम कोर्ट ने ही कहा है कि जो जमीन बचेगी उसे उसके सही मालिक को वापस करने की जिम्मेदारी केंद्र सरकार पर है. उस दौरान सुप्रीम कोर्ट ने इस्माइल फारुखी जजमेंट में 1994 में तमाम दावेदारी वाले अर्जी को बहाल कर दिया था. कोर्ट ने जमीन को सरकार के पास ही रखने को कहा था और आदेश दिया था कि जिसके पक्ष में फैसला आएगा उसके बाद सरकार जिनकी जमीनें हैं, उन्हें सौंप दे.
अवलोकन करें:--
इस वेबसाइट का परिचय
NIGAMRAJENDRA.BLOGSPOT.COM
पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर जी ने अयोध्या के रामजन्मूभि पर राम मंदिर बनाने का निर्णय ले लिया था। राजीव गांधी को ....

2.77 एकड़ विवादित जमीन की क्या है स्थिति?

गौरतलब है कि अयोध्या विवाद मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच ने 30 सितंबर, 2010 को फैसला दिया था. अयोध्या में 2.77 एकड़ की विवादित जमीन को 3 हिस्सों में बांट दिया था, जिसमें रामलला विराजमान वाला हिस्सा हिंदू महासभा को दिया गया. दूसरा हिस्सा निर्मोही अखाड़े को और तीसरा हिस्सा सुन्नी वक्फ बोर्ड को दिया गया है. हाई कोर्ट के इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई, जिसके बाद 9 मई, 2011 को सुप्रीम कोर्ट ने यथास्थिति बरकरार रखने का आदेश दिया था. इस मामले में अब सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई होनी है.

केके मुहम्मद जिसने बाबरी मस्जिद के नीचे दबे राम मंदिर को ढूंढा था

अयोध्या में राम जन्मभूमि के मालिकाना हक़ को लेकर 1990 में पहली बार पूरे देश में बहस ने जोर पकड़ा था। इसके पहले 1976-77 में पुरातात्विक अध्ययन के दौरान अयोध्या में होने वाली खुदाई में हिस्सा लेने के लिए मुझे भी भेजा गया। प्रो बीबी लाल की अगुवाई में अयोध्या में खुदाई करने वाली आर्कियोलॉजिस्ट टीम में दिल्ली स्कूल ऑफ आर्कियोलॉजी के 12 छात्रों में से एक मैं भी था। उस समय के उत्खनन में हमें मंदिर के स्तंभों के नीचे के भाग में ईंटों से बनाया हुआ आधार देखने को मिला। हमें हैरानी थी कि किसी ने इसे कभी पूरी तरह खोदकर देखने की जरूरत नहीं समझी। ऐसी खुदाइयों में हमें इतिहास के साथ-साथ एक पेशेवर नजरिया बनाए रखने की भी जरूरत होती है। खुदाई के लिए जब मैं वहां पहुंचा तब बाबरी मस्जिद की दीवारों में मंदिर के खंभे साफ-साफ दिखाई देते थे। मंदिर के उन स्तंभों का निर्माण ‘ब्लैक बसाल्ट’ पत्थरों से किया गया था। स्तंभ के नीचे भाग में 11वीं और 12वीं सदी के मंदिरों में दिखने वाले पूर्ण कलश बनाए गए थे। मंदिर कला में पूर्ण कलश 8 ऐश्वर्य चिन्हों में एक माने जाते हैं।
6 दिसंबर 1992 को कारसेवकों ने
बाबरी मस्जिद के ढांचे को ध्वस्त कर दिया था।
1992 में बाबरी मस्जिद ढहाए जाने के ठीक पहले इस तरह के एक या दो स्तंभ नहीं, बल्कि कुल 14 स्तंभों को हमने करीब से देखा। उस दौरान भी वहां पर कड़ी पुलिस सिक्योरिटी हुआ करती थी और मस्जिद में प्रवेश मना था। लेकिन खुदाई और रिसर्च से जुड़े होने के कारण हमारे लिए किसी प्रकार का प्रतिबंध नहीं था। खुदाई के लिए हम करीब दो महीने अयोध्या में रहे। यह समझना बिल्कुल भी मुश्किल नहीं था कि बाबर के सिपहसलार मीर बाकी ने कभी यहां रहे विशाल मंदिर को तुड़वाकर उसके टुकड़ों से ही बाबरी मस्जिद बनवाई रही होगी। खुदाई से मिले सुबूतों के आधार पर मैंने 15 दिसंबर 1990 को बयान दिया कि बाबरी मस्जिद के नीचे मंदिर के अवशेष को मैंने खुद देखा है। उस समय माहौल गरम था। हिंदू और मुसलमान दो गुटों में बंटे थे। कई नरमपंथियों ने समझौते की कोशिश की, लेकिन तब तक विश्व हिंदू परिषद का आंदोलन बढ़ चुका था। बाबरी मस्जिद हिंदुओं को देकर समस्या का समाधान करने के लिए उदारवादी मुसलमान तैयार थे, लेकिन इसे खुलकर कहने की किसी में हिम्मत नहीं थी।
इस सन्दर्भ में अवलोकन करें:--
मुगलवाद को जिस तरह भारत में ज़िंदा रखा जा रहा है और वोट के भूखे नेता कट्टरपंथियों के आगे शीश झुकाते हैं, विश्व में भारत को एक मजाक बना दिया है, विश्व इन करतूतों की वजह से हम पर हँसता है। मक्का जिसे इस्लाम का तीर्थ कहा जाता है, भारत में मुगलों के हिमायती जवाब दें कि मक्का में बानी बिलाल मस्जिद कहाँ है? जहाँ सजदा किए बिना हज पूरा नहीं होता था। किसी माई के लाल में हिम्मत है, सऊदी सरकार के विरुद्ध एक लब्ज़ निकाल सकें। भारत में मुगलों के लिए विधवा-विलाप करने वाले सऊदी सरकार के विरुद्ध मुँह खोलने का अर्थ भलीभाँति जानते है कि कहीं हमारे हज के जाने पर वहाँ की सरकार प्रतिबन्ध न लगा दे। भारत में ही कह सकते हैं "हमारा सिर सिर्फ अल्लाह के आगे झुकता है, किसी और के आगे नहीं", अब कोई इनसे पूछे सऊदी सरकार के विरुद्ध क्यों नहीं ? सऊदी सरकार के आगे झुक गया न सिर, इससे बड़ा प्रमाण और क्या चाहिए?
About this website
NIGAMRAJENDRA.BLOGSPOT.COM
पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर जी ने अयोध्या के रामजन्मूभि पर राम मंदिर बनाने का निर्णय ले लिया था। राजीव गांधी को ....

बाबरी मस्जिद पर दावा छोड़ने से विश्व हिंदू परिषद के पास कोई मुद्दा नहीं रह जाएगा, कुछ मुसलमानों ने ऐसा भी सोचा। इस तरह के विचारों से समस्या के समाधान की संभावना पैदा होती। ऐसी स्थिति में इतिहास और पुरातात्विक खोजबीन समस्या में सुलझाने में मददगार हो सकते थे। लेकिन खेद के साथ कहना पड़ेगा कि कट्टरपंथी मुस्लिम संगठनों की मदद करने के लिए कुछ वामपंथी इतिहासकार सामने आए और उन्होंने मुसलमानों को उकसाया वो किसी हाल में मस्जिद पर अपना दावा न छोड़ें। उन्हें यह मालूम नहीं था कि वे कितना बड़ा पाप कर रहे हैं। जेएनयू के केएस गोपाल, रोमिला थापर, बिपिन चंद्रा जैसे इतिहासकारों ने कहा कि 19वीं सदी के पहले मंदिर तोड़ने का सुबूत नहीं है। यहां तक कि उन्होंने अयोध्या को ‘बौद्घ-जैन केंद्र’ तक कह डाला। उनका साथ देने के लिए आरएस शर्मा, अनवर अली, डीएन झा, सूरजभान, प्रो. इरफान हबीब जैसे ढेरों वामपंथी इतिहासकार भी सामने आ गए। इनमें केवल सूरजभान पुरातत्वविद् थे। प्रो आरएस शर्मा के साथ रहे कई इतिहासकारों ने बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी के विशेषज्ञ के रूप में कई बैठकों में भाग लिया। मतलब साफ है कि ये वामपंथी इतिहासकार समस्या सुलझाने के बजाय आग में घी डालने में जुटे थे।
बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी की कई बैठकें भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद (ICHR) के अध्यक्ष प्रो इरफान हबीब की अध्यक्षता में हुईं। कमेटी की बैठक परिषद के सरकारी दफ्तर में करने का तत्कालीन सदस्य सचिव और इतिहासकार प्रो एमजीएस नारायण ने कड़ा विरोध भी किया। लेकिन प्रो इरफान हबीब ने उसे नहीं माना। वामपंथी इतिहासकारों ने अयोध्या की वास्तविकता पर सवाल उठाते हुए लगातार लेख लिखे और उन्होंने जनता में भ्रम और असमंजस का माहौल पैदा किया। वामपंथी इतिहासकार और उनका समर्थन करने वाली मीडिया ने समझौते के पक्ष में रहे मुस्लिम बुद्घिजीवियों को मजबूर कर दिया कि वो अपने विचार त्याग दें। वरना आज भी मुसलमानों की अच्छी-खासी आबादी है कि अयोध्या के धार्मिक महत्व को देखते हुए अगर मुस्लिम अपने पैर पीछे खींच लें तो देश के इतिहास में यह मील का पत्थर होगा। इससे आगे के लिए हिंदू-मुस्लिम झगड़ों की एक बड़ी वजह खत्म हो जाएगी। दोनों समुदायों के बीच आपसी अविश्वास भी खत्म होगा। लेकिन कॉमरेड इतिहासकारों ने यह होने नहीं दिया।
इससे एक बात स्पष्ट हो जाती है कि हिंदू या मुस्लिम कट्टरपंथ से ज्यादा वामपंथी विचार देश के लिए खतरा हैं। सेकुलर नजरिए से समस्या को देखने के बजाय वामपंथियों की आंख से अयोध्या मामले का विश्लेषण एक बड़ी भूल साबित हुई। राष्ट्र को इसकी कितनी बड़ी कीमत चुकानी पड़ी, यह अंदाजा अभी लोगों को नहीं है। इतिहास अनुसंधान परिषद (ICHR) में समस्या का समाधान चाहने वाले कई लोग थे, लेकिन इरफान हबीब के सामने वो कुछ नहीं कर सके। इरफान हबीब ने आरएसएस की तुलना आईएस जैसे आतंकवादी संगठन से की थी। आईसीएचआर के ज्यादातर सदस्य उनसे सहमत नहीं थे, लेकिन विरोध में बोलने की हिम्मत किसी में नहीं हुई। अयोध्या मामले के पक्ष और विपक्ष में इतिहासकार और पुरातत्वविद् भी गुटों में बंटे हुए थे। बाबरी मस्जिद टूटने के बाद पड़े मलबे में जो सबसे महत्वपूर्ण अवशेष मिला था वो था-विष्णु हरिशिला पटल। इसमें 11वीं और 12वीं सदी की नागरी लिपि में संस्कृत भाषा में लिखा गया है कि यह मंदिर बाली और दस हाथों वाले (रावण) को मारने वाले विष्णु (श्रीराम विष्णु के अवतार माने जाते हैं) को समर्पित किया जाता है।
1992 में डॉ. वाईडी शर्मा और डॉ. केएन श्रीवास्तव के सर्वे में वैष्णव अवतारों और शिव-पार्वती के कुषाण जमाने (ईसा से 100-300 साल पहले) की मिट्टी की मूर्तियां मिली हैं। 2003 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ बेंच के आदेश से हुई खुदाई में करीब 50 मंदिर-स्तंभों के नीचे के भाग में ईंटों से बनाया चबूतरा मिला था। इसके अलावा मंदिर के ऊपर का आमलका और मंदिर के अभिषेक का जल बाहर निकालने वाली मकर प्रणाली भी उत्खनन में मिली थी। यूपी में पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के डायरेक्टर की रिपोर्ट में कहा गया है कि बाबरी मस्जिद के आगे के भाग को समतल करते समय मंदिर से जुड़े कुल 263 पुरातात्विक अवशेष मिले हुए। खुदाई से मिली इन तमाम सबूतों के आधार पर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग इस निर्णय पर पहुंचा कि बाबरी मस्जिद के नीचे एक मंदिर दबा हुई है। सीधे तौर पर कहें तो बाबरी मस्जिद इस मंदिर को तोड़कर उसके मलबे पर बनाई गई है। इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच ने भी यही फैसला सुनाया था।
अयोध्या में हुई खुदाई में कुल 137 मजदूर लगाए गए थे, जिनमें से 52 मुसलमान थे। बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी के प्रतिनिधि के तौर पर सूरजभान मंडल, सुप्रिया वर्मा, जया मेनन आदि के अलावा इलाहाबाद हाई कोर्ट का एक मजिस्ट्रेट भी इस पूरी खुदाई की निगरानी कर रहा था। जाहिर है इसके नतीजों पर सवाल उठाने का कोई आधार नहीं है? ज्यादा हैरानी तब हुई जब इलाहाबाद हाई कोर्ट ने मंदिर के पक्ष में फैसला सुनाया तो भी वामपंथी इतिहासकार गलती मानने को तैयार नहीं हुए। इसका बड़ा कारण यह था कि खुदाई के दौरान जिन इतिहासकारों को शामिल किया गया था वो दरअसल निष्पक्ष न होकर बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी के प्रतिनिधि के तौर पर काम कर रहे थे। इनमें से 3-4 को ही आर्कियोलॉजी की तकनीकी बातें पता थीं। सबसे बड़ी बात कि ये लोग नहीं चाहते थे कि अयोध्या का ये मसला कभी भी हल हो। शायद इसलिए क्योंकि वो चाहते हैं कि भारत के हिंदू और मुसलमान हमेशा ऐसे ही आपस में उलझे रहें।
(लेखक केके मुहम्मद भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के उत्तरी क्षेत्र के क्षेत्रीय निदेशक रह चुके हैं। यह लेख उनकी किताब ‘मैं भारतीय हूं’ का एक संपादित हिस्सा है)

रहस्योघाटन: अयोध्या मुद्दा हल होता देख राजीव गाँधी ने गिराई थी चंद्रशेखर सरकार

Related image
पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर जी ने अयोध्या के रामजन्मूभि पर राम मंदिर बनाने का निर्णय ले लिया था। राजीव गांधी को जब यह पता चला कि राम मंदिर का समाधान चंद्रशेखर जी ने निकाल लिया है तो उन्होंने चंद्रशेखर सरकार से समर्थन वापस लेकर उसे गिरा दिया था! निम्न वीडियो ने धुंधली हो रहे तथ्यों को एक दम जीवित कर दिया। वास्तव में इस बात से लेशमात्र भी इंकार नहीं किया जा, कि रामजन्मभूमि मन्दिर पर जितना तत्कालीन प्रधानमन्त्री चंद्रशेखर गम्भीर थे, आज तक कोई प्रधानमन्त्री नहीं उतना गंभीर नहीं। सम्भव है, मुझे गलत/भ्रमित सूचना हो, वैसे तत्कालीन प्रधानमन्त्री चंद्रशेखर ने जो समिति बनाई थी, उसके अभी जीवित स्वामी सुब्रमण्यन, तत्कालीन कानून मन्त्री, मुलायम सिंह यादव एवं शरद पवार इसकी पुष्टि कर सकते हैं, यदि सूचना गलत है तो सार्वजानिक रूप से माफ़ी चाहता हूँ। यह बातचीत का सिलसिला इतिहासकारों के साथ होने वाले सम्वाद वाले दिन समाप्त हुआ था। मस्जिद के पक्षधर इतिहासकारों ने मामले को उलझाने का प्रयास किया था। सब कुछ शांतिपूर्वक दौर चलने उपरान्त इन चंद चाँदी की टुकड़ों के भूखे इतिहासकारो ने बातचीत के  इस दौर को खंडित करने का पाप किया था। सम्भव है इन्होने राजीव गाँधी के इशारे पर घृणित काम को अंजाम दिया हो। 
यदि राजीव गाँधी ने अपना समर्थन वापस नहीं लिया होता, और अयोध्या में राममन्दिर बन गया होता, निश्चित रूप से चंद्रशेखर ने भाजपा को बहुत पीछे छोड़ दिया होता। खैर, विधि के विधान को कौन बदल सकता हैं। फिर इतिहास में दर्ज इस घटना का जब-जब अवलोकन किया जाएगा, प्रत्येक शांतिप्रिय, चाहे वह किसी भी धर्म अथवा जाति से हो--कट्टरपंथी और छद्दम नेताओं को छोड़ कर-- रामजन्मभूमि विवाद को साम्प्रदायिक रंग देने के लिए कांग्रेस को पानी पीकर कोसेगा। 
यह बात सच है, कि मुगलवाद को जिस तरह भारत में ज़िंदा रखा जा रहा है और वोट के भूखे नेता कट्टरपंथियों के आगे शीश झुकाते हैं, विश्व में भारत को एक मजाक बना दिया है, विश्व इन करतूतों की वजह से हम पर हँसता है। मक्का जिसे इस्लाम का तीर्थ कहा जाता है, भारत में मुगलों के हिमायती जवाब दें कि मक्का में बानी बिलाल मस्जिद कहाँ है? जहाँ सजदा किए बिना हज पूरा नहीं होता था। किसी माई के लाल में हिम्मत है, सऊदी सरकार के विरुद्ध एक लब्ज़ निकाल सकें। भारत में मुगलों के लिए विधवा-विलाप करने वाले सऊदी सरकार के विरुद्ध मुँह खोलने का अर्थ भलीभाँति जानते है कि कहीं हमारे हज के जाने पर वहाँ की सरकार प्रतिबन्ध न लगा दे। भारत में ही कह सकते हैं "हमारा सिर सिर्फ अल्लाह के आगे झुकता है, किसी और के आगे नहीं", अब कोई इनसे पूछे सऊदी सरकार के विरुद्ध क्यों नहीं ? सऊदी सरकार के आगे झुक गया न सिर, इससे बड़ा प्रमाण और क्या चाहिए?
अवलोकन करें:-



आर.बी.एल.निगम श्री श्री रविशंकर ने अयोध्‍या विवाद के समाधान की पेशकश के साथ नवम्बर 16 को अयोध्‍या में सभी पक्षकारों से मुलाकात की. श्र..



आध्यात्मिक गुरु श्री श्री रविशंकर द्वारा मन्दिर मसला सुलझाने के लिए दर-दर जाना, शायद बाबरी समर्थकों को राहत दे रहा है, क्योकि उन्हें मालूम...
NIGAMRAJENDRA28.BLOGSPOT.COM
आखिर हिंदुओं से इतनी नफरत क्यों करती है कांग्रेस? इस सच्चाई को जानने के लिए निम्न लेखों का अवलोकन करें :--

SOMETIME back I used to receive a pamphlet titled “ SHAKTI SANDESH ” published from Calcutta and now another paper from Shri R.V.Bhasin , Ad...
NIGAMRAJENDRA.BLOGSPOT.COM



आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार भारत के अधिकतर लोगों का सुप्रीम कोर्ट पर से भरोसा ख़त्म होता जा रहा है, सुप्रीम कोर्ट केंद्र सरकार के हर फै...
NIGAMRAJENDRA28.BLOGSPOT.COM



आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार औरंगजेब, अन्य मुगलों तथा मुस्लिम हमलावरों ने भारत में हिन्दुओं का नरसंहार किया, हिन्दू महिलाओं के साथ बल...
NIGAMRAJENDRA28.BLOGSPOT.COM



अक्टूबर 13 को प्रणब मुखर्जी की किताब का विमोचन हुआ। उस किताब में प्रणब मुखर्जी ने यूपीए सरकार और उसकी कई नीतियों और फैसलों के बारे में जिक...
NIGAMRAJENDRA28.BLOGSPOT.COM
आर्गेनाइजर साप्ताहिक में पाठकीय पृष्ठ पर एक पत्र प्रकाशित हुआ था, कि दुबई में एक हस्पताल के विस्तार करने में एक मस्जिद रुकावट बन रही थी, सरकार ने हॉस्पिटल के विस्तार की खातिर उस मस्जिद को वहां से हटा दिया। कोर्ट में या चंद्रशेखर द्वारा गठित इस समिति में, बरहाल उस पत्र का संज्ञान लिया गया था। समाचार पत्र/पत्रिकाओं द्वारा आर्गेनाइजर के उस अंक की अचानक ऐसी माँग हुई, कि बिकने वाली रद्दी में से उस अंक को निकाला गया। 
देखिये पूरा खुलासा इस वीडियो में…