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आप भगवान राम की शक्ति देखिए, इमारतें नष्ट हो गईं… क्या कुछ नहीं हुआ : मोदी

नरेंद्र मोदी, अयोध्या, रामआखिरकार भारतीय इतिहास की वह महान घटना सफलतापूर्वक संपन्न हुई। आखिरकार अयोध्या में भगवान श्रीराम मंदिर का भूमिपूजन कार्यक्रम हो चुका है, जिसके लिए हिन्दुओं ने सदियों तक सन्घर्ष और इन्तजार किया और इसके यजमान बने भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदर दास मोदी!
अनुष्ठान के दौरान जब संकल्प लिया गया तो पुरोहितों द्वारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ‘राष्ट्रप्रमुख, सम्पूर्ण राष्ट्र के प्रतिनिधि’ के तौर पर यजमान के रूप में आह्वान किया गया और कहा कि यह भारत का सौभाग्य ही है कि भारत माता ने इस कार्य के लिए अपने सपूत को चुना है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अयोध्या में राम मंदिर भूमिपूजन के दौरान ‘जय श्री राम’ के जयघोष से अपने सम्बोधन की शुरुआत की। पीएम मोदी ने कहा कि बरसों से टाट और टेंट के नीचे रह रहे हमारे रामलला के लिए अब एक भव्य मंदिर का निर्माण होगा। टूटना और फिर उठ खड़ा होना, सदियों से चल रहे इस व्यतिक्रम से रामजन्मभूमि आज मुक्त हो गई है। उन्होंने कहा कि राम मंदिर के लिए चले आंदोलन में अर्पण भी था, तर्पण भी था, संघर्ष भी था, संकल्प भी था।


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पीएम नरेंद्र मोदी ने कहा कि जिनके त्याग, बलिदान और संघर्ष से आज ये स्वप्न साकार हो रहा है, जिनकी तपस्या राममंदिर में नींव की तरह जुड़ी हुई है, को उन सबको नमन करते हैं। उन्होंने याद दिलाया कि राम हमारे मन में गढ़े हुए हैं, हमारे भीतर घुल-मिल गए हैं। कोई काम करना हो, तो प्रेरणा के लिए हम भगवान राम की ओर ही देखते हैं। उन्होंने कहा कि आप भगवान राम की अद्भुत शक्ति देखिए, इमारतें नष्ट कर दी गईं, अस्तित्व मिटाने का प्रयास भी बहुत हुआ, लेकिन राम आज भी हमारे मन में बसे हैं, हमारी संस्कृति का आधार हैं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अयोध्या में उपस्थित अतिथियों को संबोधित करते हुए कहा कि यहाँ आने से पहले उन्होंने हनुमानगढ़ी का दर्शन किया। उन्होंने कहा कि राम के सब काम हनुमान ही तो करते हैं, राम के आदर्शों की कलियुग में रक्षा करने की जिम्मेदारी भी हनुमान जी की ही हैं और हनुमान जी के आशीर्वाद से श्री राममंदिर भूमिपूजन का ये आयोजन शुरू हुआ है। उन्होंने आश्वासन दिया कि श्रीराम का मंदिर हमारी संस्कृति का आधुनिक प्रतीक बनेगा।
पीएम ने कहा कि अयोध्या का मंदिर हमारी शाश्वत आस्था और हमारी राष्ट्रीय भावना का प्रतीक बनेगा, और ये मंदिर करोड़ों-करोड़ लोगों की सामूहिक संकल्प शक्ति का भी प्रतीक बनेगा। उन्होंने कहा कि इस मंदिर के बनने के बाद अयोध्या की सिर्फ भव्यता ही नहीं बढ़ेगी, इस क्षेत्र का पूरा अर्थतंत्र भी बदल जाएगा। यहाँ हर क्षेत्र में नए अवसर बनेंगे, हर क्षेत्र में अवसर बढ़ेंगे। पीएम ने कहा कि जब पूरी दुनिया से लोग यहाँ आएँगे, पूरी दुनिया प्रभु राम और माता जानकी का दर्शन करने आएगी।



बकौल पीएम मोदी, ये महोत्सव विश्वास को विद्यमान से, नर को नारायण से, लोक को आस्था से, वर्तमान को अतीत से और स्वं को संस्कार से जोड़ने का महोत्सव है। नरेंद्र मोदी ने अयोध्या में कहा कि आज का ये दिन करोड़ों रामभक्तों के संकल्प की सत्यता का प्रमाण है। आज का ये दिन सत्य, अहिंसा, आस्था और बलिदान को न्यायप्रिय भारत की एक अनुपम भेंट है। उन्होंने कहा कि राममंदिर के निर्माण की ये प्रक्रिया, राष्ट्र को जोड़ने का उपक्रम है। पीएम ने कहा:
पीएम मोदी ने अयोध्या राम मंदिर भूमिपूजन कार्यक्रम में कहा कि श्री रामचंद्र को तेज में सूर्य के समान, क्षमा में पृथ्वी के तुल्य, बुद्धि में बृहस्पति के सदृश्य, और यश में इंद्र के समान माना गया है। श्रीराम का चरित्र सबसे अधिक जिस केंद्र बिंदु पर घूमता है, वो है सत्य पर अडिग रहना। इसीलिए श्रीराम संपूर्ण हैं। उन्होंने कहा कि उनका अद्भुत व्यक्तित्व, उनकी वीरता, उनकी उदारता उनकी सत्यनिष्ठा, उनकी निर्भीकता, उनका धैर्य, उनकी दृढ़ता, उनकी दार्शनिक दृष्टि युगों-युगों तक प्रेरित करते रहेंगे।
बकौल पीएम मोदी, राम प्रजा से एक समान प्रेम करते हैं लेकिन गरीबों और दीन-दुखियों पर उनकी विशेष कृपा रहती है। जीवन का ऐसा कोई पहलू नहीं है, जहाँ हमारे राम प्रेरणा न देते हों। भारत की ऐसी कोई भावना नहीं है, जिसमें प्रभु राम झलकते न हों। भारत की आस्था में राम हैं, भारत के आदर्शों में राम हैं! भारत की दिव्यता में राम हैं, भारत के दर्शन में राम हैं। उन्होंने कहा कि हजारों साल पहले वाल्मीकि की रामायण में जो राम प्राचीन भारत का पथ-प्रदर्शन कर रहे थे।
नरेंद्र मोदी ने आयोध्य में आगे कहा कि जो राम मध्ययुग में तुलसी, कबीर और नानक के जरिए भारत को बल दे रहे थे, वही राम आज़ादी की लड़ाई के समय बापू के भजनों में अहिंसा और सत्याग्रह की शक्ति बनकर मौजूद थे। आज भी भारत के बाहर दर्जनों ऐसे देश हैं, जहाँ की भाषा में रामकथा आज भी प्रचलित है। उन्होंने विश्वास जताया कि आज इन देशों में भी करोड़ों लोगों को राम मंदिर के निर्माण का काम शुरू होने से बहुत सुखद अनुभूति हो रही होगी।
मोदी ने सन्देश दिया कि हमें ये सुनिश्चित करना है कि भगवान श्रीराम का संदेश, हमारी हजारों सालों की परंपरा का संदेश, कैसे पूरे विश्व तक निरंतर पहुँचे। कैसे हमारे ज्ञान, हमारी जीवन-दृष्टि से विश्व परिचित हो, ये हम सबकी, हमारी वर्तमान और भावी पीढ़ियों की ज़िम्मेदारी है। उन्होंने कहा कि उन्हें विश्वास है कि श्रीराम के नाम की तरह ही अयोध्या में बनने वाला ये भव्य राममंदिर भारतीय संस्कृति की समृद्ध विरासत का द्योतक होगा। यहाँ निर्मित होने वाला राममंदिर अनंतकाल तक पूरी मानवता को प्रेरणा देगा।
संकल्प के दौरान पुरोहितों ने राष्ट्र प्रतिनिधि के रूप में नरेंद्र दामोदर दास मोदी को श्रीराम मंदिर के शिलान्यास के लिए आह्वान किया और जैसे ही भूमिपूजन कार्यक्रम सम्पन्न हुआ, पांडाल जय श्रीराम और हर हर महादेव के नारों से गूँज उठा।
वास्तव में संकल्प पूजा-अनुष्ठान का वह हिस्सा होता है, जिसमें यजमान पूरी पूजा के फल के लिए ईश्वर (देवराज इंद्र) से प्रार्थना करता है। मान्यता है कि यदि यजमान संकल्प नहीं करता है तो उसे अनुष्ठान का फल नहीं मिलता।

पता था राम मंदिर बनकर रहेगा : जस्टिस लिब्राहन

जस्टिस मनमोहन सिंह लिब्राहनअयोध्या में 5 अगस्त को भूमिपूजन की तैयारियाँ अंतिम चरण में है। इस बीच लिब्राहन आयोग के चेयरमैन जस्टिस मनमोहन सिंह लिब्राहन ने कहा है कि वे जानते थे, एक दिन अयोध्या में राम मंदिर बनकर रहेगा।
उन्होंने यह बात दैनिक जागरण के अनुराग अग्रवाल को दिए इंटरव्यू में कही है। लिब्राहन आयोग का गठन विवादित ढॉंचा गिराए जाने की घटना की जॉंच के लिए हुआ था।
मंदिर और मस्जिद को लेकर 17 साल तक चले जाँच पर पूछे गए सवाल को लेकर लिब्राहन आयोग के चेयरमैन ने कहा कि गठन यह जानने के लिए नहीं किया गया था कि अयोध्या में राम मंदिर था या बाबरी मस्जिद। आयोग को सिर्फ यह जाँच करनी थी कि विवादित ढाँचा किसने गिराया और किसके कहने पर गिराया।
भूमिपूजन को लेकर पूछे गए सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि यह बहुत अच्छी बात है कि देश के प्रधानमंत्री भूमिपूजन के लिए अयोध्या पहुँच रहे है। केंद्र सरकार सुप्रीम कोर्ट के फैसले का अनुपालन कर रही है। जो भी हो रहा है, अच्छा हो रहा है।
उन्होंने यह कहा कि मुझे तो पहले दिन से पता था कि अयोध्या में एक न एक दिन राम मंदिर का निर्माण होगा। मुझे विवादित ढाँचा गिराए जाने की जाँच 1992 में मिली, लेकिन मुझे इस बात का आभास 1981 से था कि राम मंदिर बनकर रहेगा।
एक सवाल के जवाब में जस्टिस लिब्राहन ने कहा कि लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी, दोनों ऐसे नेता हैं, जिनमें हर तरह की समझ है। उनका भाषायी ज्ञान अच्छा है। उन्हें परिस्थितियों को अपने अनुकूल करना आता है। उनकी एक विचारधारा है। दोनों ही एक परिपक्व राजनीतिक सोच के आदमी हैं। वाजपेयी अक्सर शांत रहते थे। वह इशारों में सारा काम करवा देते थे और खुद चुप बैठ जाते थे। उमा भारती और ऋतंभरा की तारीफ करते हुए उन्होंने कहा दोनों एक से बढ़कर एक हैं।
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भारत विविधताओं का देश है, इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता। घरों में बैठ राम को पूजने वाले ही अपनी कुर्सी की खातिर र....
प्रधानमंत्री बनने के बाद पहली बार नरेंद्र मोदी अयोध्या जाएँगे। पाँच अगस्त को पीएम मोदी करीब 3 घंटा रामनगरी अयोध्या में रहेंगे। भूमि पूजन के बाद वे अयोध्या में पर्यटन पर भी कार्यक्रम देखेंगे।

5 अगस्त को न्यूयॉर्क के टाइम्स स्क्वायर पर मनेगा उत्सव, 17000 वर्ग फीट की एलईडी से दर्शन देंगे श्रीराम

न्यूयॉर्क, राम मंदिर
भारत विविधताओं का देश है, इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता। घरों में बैठ राम को पूजने वाले ही अपनी कुर्सी की खातिर राम का विरोध कर रहे हैं, जबकि विदेशों में बैठे भारतीय उस स्वर्णमयी समय का बहुत ही बैचेनी से प्रतीक्षा कर रहे हैं, जब अयोध्या में उनके आराध्य श्रीराम के भव्य मंदिर का शिलान्यास होगा। उन दिवंगत आत्माओं को भी सुख का अनुभव होगा, जिन निहत्तों पर उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायमसिंह यादव ने गोलियां चलवाकर मार दिया था। दशहरे पर रामलीला मंचन पंडालों में जाकर उस राम का तिलक करते हैं, जिन्हे काल्पनिक कहते थे, रामसेतु को काल्पनिक कहते थे। हालाँकि अपनी कुर्सी की खातिर अभी कोई न कोई अवरोध उत्पन्न करने का प्रयास कर रहे हैं। 
अयोध्या में 5 अगस्त को राम मंदिर का भूमि पूजन होने वाला है। इस दिन को न्यूयॉर्क में भी यादगार बनाने के लिए के लिए कोशिशे की जा रही हैं। 5 अगस्त को न्यूयॉर्क की प्रतिष्ठित इमारत टाइम्स स्क्वायर पर भगवान राम की भव्य तस्वीर प्रदर्शित होगी। 17,000 वर्ग फीट वाली एलईडी स्क्रीन पर उनकी त्रिआयामी (थ्रीडी) चित्रों का प्रदर्शन किया जाएगा।
अमेरिका-भारत सार्वजनिक मामलों की समिति के अध्यक्ष जगदीश सेव्हानी ने जुलाई 29 को बताया कि 5 अगस्त को न्यूयॉर्क में ऐतिहासिक क्षण मनाने की व्यवस्था की जा रही है, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अयोध्या में राम मंदिर की आधारशिला रखेंगे।
सेव्हानी ने पीटीआई से बातचीत की और कहा कि इस अवसर के लिए जिन प्रमुख होर्डिंगों को लीज पर लिया गया है, उनमें विशाल नैस्डैक स्क्रीन और 17,000 वर्ग फुट की रैप-अराउंड led डिस्प्लेस्क्रीन शामिल है। माना जाता है कि 17,000 वर्ग फुट की रैप अराउंड स्क्रीन टाइम्स स्क्वायर की उच्चतम रिजोल्यूशन वाली led स्क्रीन है।
5 अगस्त को सुबह 8 बजे से रात के 10 बजे तक हिंदी और इंग्लिश में ‘जय श्री राम’, भगवान राम के चित्र और वीडियो, मंदिर के डिजाइन और वास्तुकला के 3डी चित्र के साथ-साथ प्रधानमंत्री द्वारा शिलान्यास की तस्वीरें टाइम्स स्क्वायर की कई होर्डिंग्स पर प्रदर्शित की जाएँगी।
रिपोर्ट्स के अनुसार, सेव्हानी ने कहा, “प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में हिंदुओं के लिए राम मंदिर के निर्माण का सपना सच हो पाया है। 6 साल पहले तक हमने ये कभी नहीं सोचा था कि ये दिन इतनी जल्दी आएगा लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व के कारण यह दिन आ गया है और हम इसे धूमधाम से मनाना चाहते हैं।”
वे बोले, “भारतीय समुदाय के लोग भी 5 अगस्त को टाइम्स स्क्वायर पर मौजूद रहेंगे और इस खुशी के मौके पर मिठाइयाँ बाँटेंगे।” उन्होंने कहा, “यह कोई ऐसा इवेंट नहीं है, जो किसी की जिंदगी में या फिर दशकों में आता हो। बल्कि ये एक ऐसा इवेंट है जो मानव जाति के जीवन में एक बार आता है। हमें इसे एक शानदार उत्सव के तौर पर मनाना है और प्रतिष्ठित टाइम्स स्क्वायर से बेहतर जगह और क्या हो सकती है।”
9 नवंबर 2019 को सुप्रीम कोर्ट ने राम जन्मभूमि अयोध्या पर अपना ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए दशकों से लंबित इस मामले को सुलझाया था। कोर्ट ने सरकार को राम मंदिर के लिए ट्रस्ट बनाने का आदेश दिया था। इसके बाद श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट का निर्माण फरवरी में हुआ और अब 5 अगस्त को इसके भूमि पूजन की तारीख तय हुई है।

मुस्लिमों के लिए अयोध्या की महत्ता नहीं, कोई औलिया या पीर यहाँ से नहीं जुड़ा: पद्मश्री मोहम्मद

केके मोहम्मद- वह मुस्लिम, जिनके हिन्दू रहनेगे सदा ऋणी
अयोध्या मामले का फैसला आने के बाद विवाद के पटाक्षेप का एएसआई (आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया) के पूर्व निदेशक के के मोहम्मद ने स्वागत किया है। उन्होंने इसे ‘सबसे अच्छा’ फैसला बताया है।
टाइम्स नाउ से बात करते हुए एएसआई (उत्तरी) के पूर्व निदेशक मोहम्मद ने कहा कि अयोध्या और जन्मभूमि हिन्दुओं के लिए वैसे ही पवित्र और महत्वपूर्ण है, जैसे मुस्लिमों के लिए मक्का और मदीना हैं। उन्होंने यह भी कहा कि मुस्लिमों के लिए इसकी उतनी ज़्यादा कोई महत्ता नहीं है, क्योंकि कोई बड़ा औलिया या पीर इस स्थान से जुड़ा नहीं रहा है।
इसके अलावा एएनआई से बात करते हुए उन्होंने कहा कि एक ‘गैंग’ ने उन्हें उस समय परेशान करना शुरू कर दिया था, जब उन्होंने कहा था कि पुरातात्विक साक्ष्य उस जगह पर मंदिर होने की ओर इंगित करते हैं।
आज अयोध्या पर फैसले की ऐतिहासिक घड़ी में मोहम्मद को याद भी खूब किया जा रहा है। हिन्दू उनके प्रति कृतज्ञता जता रहे हैं कि उन्होंने हिन्दुओं की आस्था के पक्ष में क़ानूनी सबूत ढूँढ़ निकाले।

लेखक और वैज्ञानिक आनंद रंगनाथन वह वाकया याद दिला रहे हैं जिसमें के के मोहम्मद को धमकी दी गई थी कि बाबरी का सच जनता को बताने पर उन्हें सस्पेंड कर देने की धमकी दी गई थी। इसके बाद मोहम्मद ने संस्कृत में जवाब में कहा था, “लोकसंग्रहमेवापि संपश्यन् कर्तुमर्हसि। स्वधर्मे निधनं श्रेयः…”
संक्रांत सानु और संजय दीक्षित जैसे हिंदूवादी विचारकों ने भी आज मोहम्मद के उस आरोप को याद किया कि मुस्लिम पक्ष को भी ‘सेक्युलर’ गैंग ने ही राम मंदिर के खिलाफ भड़काया था।

अयोध्या मुद्दे की सुनवाई टलना अच्छा संकेत नहीं: केशव प्रसाद मौर्य

उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य का कहना है कि अयोध्या मामले में जनवरी तक के लिए सुनवाई टलना एक अच्छा संकेत नहीं है। मामला सुप्रीम कोर्ट में है। इस पर ज्यादा कुछ कहना ठीक नहीं लेकिन इतना जरूर है हम चाहते थे कि आज से (29 अक्टूबर) से रोज सुनवाई हो।
अयोध्या मामले की 29 अक्टूबर से सुनवाई होनी थी लेकिन मामला जनवरी तक के लिए टाल दिया गया है। इस फैसले से भाजपा नेता निराश हैं और उनका कहना है कि इससे जनता के बीच गलत संदेश जाएगा।
मुद्दे पर प्रतिक्रिया देते हुए भाजपा के राज्यसभा सांसद सुब्रहमण्यम स्वामी ने कहा किसी मुद्दे पर तारीख आगे बढ़ाना कोर्ट का विशेषाधिकार है लेकिन राम मंदिर मुद्दे पर सरकार के पास संवैधानिक विकल्प मौजूद है।
29 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद भूमि मालिकाना हक विवाद मामले में दायर दीवानी अपीलों को जनवरी, 2019 में एक उचित पीठ के सामने सूचीबद्ध किया जाएगा। प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई, न्यायमूर्ति एस के कौल और न्यायमूर्ति के एम जोसफ की पीठ ने यह बात कही।
इस फैसले पर बीजेपी के कुछ नेताओं ने निराशा जताई। विनय कटियार ने कहा कि ये फैसला कांग्रेस के दबाव में लिया गया है, जबकि केशव प्रसाद मौर्य ने कहा कि इस फैसले से गलत संदेश जाएगा।
माना जा रहा है कि सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से बीजेपी पर दबाव बढ़ेगा। 2019 लोकसभा चुनाव से पहले बीजेपी के लिए ये महत्वपूर्ण होगा कि उसने राम मंदिर के निर्माण के लिए क्या-क्या कदम उठाए।
बीजेपी के अंदर से ही आवाज उठने लगी हैं कि मोदी सरकार अध्यादेश या बिल लाकर रास्ता साफ करे। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) प्रमुख मोहन भागवत भी कह चुके हैं कि सरकार को कानून बनाना चाहिए। बीजेपी सांसद सुब्रमण्यम स्वामी ने भी कहा कि सरकार को इस पर विचार करना चाहिए।
ऐसे में सवाल है कि 2019 लोकसभा चुनाव से पहले बीजेपी के सामने राम मंदिर के निर्माण को लेकर क्या-क्या विकल्प हैं।
1) अध्यादेश: सरकार अध्यादेश ला सकती है। सरकार के सहयोगी, जिसमें आरएसएस, वीएचपी और शिवसेना भी हैं, की मांग है कि अध्यादेश लाया जाए।
2) संसद में बिल लाया जाए: मोदी सरकार संसद में बिल लाकर भी कानून बना सकती है। मांग है कि आगामी शीतकालीन सत्र में बिल लाया जाए और इस संबंध में कानून बनाया जाए। बीजेपी समर्थकों की मांग है कि बीजेपी के पास अभी केंद्र और राज्य दोनों जगह बहुमत है।

3) सुप्रीम कोर्ट के फैसले का इंतजार: मोदी सरकार इस मामले को सुप्रीम कोर्ट पर भी छोड़ सकती है। अभी तक बीजेपी का यही रुख रहा है कि मामला सुप्रीम कोर्ट में है। लेकिन सुनवाई अगले साल तक टाल देने से इस पर लोकसभा चुनाव से पहले कोई फैसला आने की संभावना कम हैं। 
AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि वे अध्यादेश क्यों नहीं लाते। हमेशा धमकी देते हैं कि हम अध्यादेश लाएंगे। बीजेपी, आरएसएस, वीएचपी के सभी टॉम, डिक और हैरी यही कहते हैं। हम कहते हैं इसे लाओ, आप पावर में हो। मैं आपको अध्यादेश लाने की चुनौती देता हूं। हम लोग देखेंगे। साथ ही उन्होंने कहा कि 56 इंच का सीना है तो अध्यादेश लाकर दिखाएं। 
वहीं कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि देश के बहुत से लोगों की अपेक्षा है कि इस मामले में जल्द सुनवाई हो, हमें न्यायलय पर पूरा भरोसा है और हम उसका पूरा सम्मान करते हैं। इसके अलावा इस संदर्भ में मुझे कुछ और कहने की आवश्यकता नहीं है।
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देश की राजनीति में एक बार फिर से अयोध्या में राममंदिर मुद्दा गर्मा रहा है। हर दिन कोई न कोई नेता इस मुद्दे को हवा दे.....

भूमि विवाद मामले में दीवानी अपील इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ दायर की गई है। प्रधान न्यायाधीश ने कहा, ‘हम जनवरी में उचित पीठ के सामने अयोध्या विवाद मामले की सुनवाई की तारीख तय करेंगे।’

केके मुहम्मद जिसने बाबरी मस्जिद के नीचे दबे राम मंदिर को ढूंढा था

अयोध्या में राम जन्मभूमि के मालिकाना हक़ को लेकर 1990 में पहली बार पूरे देश में बहस ने जोर पकड़ा था। इसके पहले 1976-77 में पुरातात्विक अध्ययन के दौरान अयोध्या में होने वाली खुदाई में हिस्सा लेने के लिए मुझे भी भेजा गया। प्रो बीबी लाल की अगुवाई में अयोध्या में खुदाई करने वाली आर्कियोलॉजिस्ट टीम में दिल्ली स्कूल ऑफ आर्कियोलॉजी के 12 छात्रों में से एक मैं भी था। उस समय के उत्खनन में हमें मंदिर के स्तंभों के नीचे के भाग में ईंटों से बनाया हुआ आधार देखने को मिला। हमें हैरानी थी कि किसी ने इसे कभी पूरी तरह खोदकर देखने की जरूरत नहीं समझी। ऐसी खुदाइयों में हमें इतिहास के साथ-साथ एक पेशेवर नजरिया बनाए रखने की भी जरूरत होती है। खुदाई के लिए जब मैं वहां पहुंचा तब बाबरी मस्जिद की दीवारों में मंदिर के खंभे साफ-साफ दिखाई देते थे। मंदिर के उन स्तंभों का निर्माण ‘ब्लैक बसाल्ट’ पत्थरों से किया गया था। स्तंभ के नीचे भाग में 11वीं और 12वीं सदी के मंदिरों में दिखने वाले पूर्ण कलश बनाए गए थे। मंदिर कला में पूर्ण कलश 8 ऐश्वर्य चिन्हों में एक माने जाते हैं।
6 दिसंबर 1992 को कारसेवकों ने
बाबरी मस्जिद के ढांचे को ध्वस्त कर दिया था।
1992 में बाबरी मस्जिद ढहाए जाने के ठीक पहले इस तरह के एक या दो स्तंभ नहीं, बल्कि कुल 14 स्तंभों को हमने करीब से देखा। उस दौरान भी वहां पर कड़ी पुलिस सिक्योरिटी हुआ करती थी और मस्जिद में प्रवेश मना था। लेकिन खुदाई और रिसर्च से जुड़े होने के कारण हमारे लिए किसी प्रकार का प्रतिबंध नहीं था। खुदाई के लिए हम करीब दो महीने अयोध्या में रहे। यह समझना बिल्कुल भी मुश्किल नहीं था कि बाबर के सिपहसलार मीर बाकी ने कभी यहां रहे विशाल मंदिर को तुड़वाकर उसके टुकड़ों से ही बाबरी मस्जिद बनवाई रही होगी। खुदाई से मिले सुबूतों के आधार पर मैंने 15 दिसंबर 1990 को बयान दिया कि बाबरी मस्जिद के नीचे मंदिर के अवशेष को मैंने खुद देखा है। उस समय माहौल गरम था। हिंदू और मुसलमान दो गुटों में बंटे थे। कई नरमपंथियों ने समझौते की कोशिश की, लेकिन तब तक विश्व हिंदू परिषद का आंदोलन बढ़ चुका था। बाबरी मस्जिद हिंदुओं को देकर समस्या का समाधान करने के लिए उदारवादी मुसलमान तैयार थे, लेकिन इसे खुलकर कहने की किसी में हिम्मत नहीं थी।
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मुगलवाद को जिस तरह भारत में ज़िंदा रखा जा रहा है और वोट के भूखे नेता कट्टरपंथियों के आगे शीश झुकाते हैं, विश्व में भारत को एक मजाक बना दिया है, विश्व इन करतूतों की वजह से हम पर हँसता है। मक्का जिसे इस्लाम का तीर्थ कहा जाता है, भारत में मुगलों के हिमायती जवाब दें कि मक्का में बानी बिलाल मस्जिद कहाँ है? जहाँ सजदा किए बिना हज पूरा नहीं होता था। किसी माई के लाल में हिम्मत है, सऊदी सरकार के विरुद्ध एक लब्ज़ निकाल सकें। भारत में मुगलों के लिए विधवा-विलाप करने वाले सऊदी सरकार के विरुद्ध मुँह खोलने का अर्थ भलीभाँति जानते है कि कहीं हमारे हज के जाने पर वहाँ की सरकार प्रतिबन्ध न लगा दे। भारत में ही कह सकते हैं "हमारा सिर सिर्फ अल्लाह के आगे झुकता है, किसी और के आगे नहीं", अब कोई इनसे पूछे सऊदी सरकार के विरुद्ध क्यों नहीं ? सऊदी सरकार के आगे झुक गया न सिर, इससे बड़ा प्रमाण और क्या चाहिए?
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पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर जी ने अयोध्या के रामजन्मूभि पर राम मंदिर बनाने का निर्णय ले लिया था। राजीव गांधी को ....

बाबरी मस्जिद पर दावा छोड़ने से विश्व हिंदू परिषद के पास कोई मुद्दा नहीं रह जाएगा, कुछ मुसलमानों ने ऐसा भी सोचा। इस तरह के विचारों से समस्या के समाधान की संभावना पैदा होती। ऐसी स्थिति में इतिहास और पुरातात्विक खोजबीन समस्या में सुलझाने में मददगार हो सकते थे। लेकिन खेद के साथ कहना पड़ेगा कि कट्टरपंथी मुस्लिम संगठनों की मदद करने के लिए कुछ वामपंथी इतिहासकार सामने आए और उन्होंने मुसलमानों को उकसाया वो किसी हाल में मस्जिद पर अपना दावा न छोड़ें। उन्हें यह मालूम नहीं था कि वे कितना बड़ा पाप कर रहे हैं। जेएनयू के केएस गोपाल, रोमिला थापर, बिपिन चंद्रा जैसे इतिहासकारों ने कहा कि 19वीं सदी के पहले मंदिर तोड़ने का सुबूत नहीं है। यहां तक कि उन्होंने अयोध्या को ‘बौद्घ-जैन केंद्र’ तक कह डाला। उनका साथ देने के लिए आरएस शर्मा, अनवर अली, डीएन झा, सूरजभान, प्रो. इरफान हबीब जैसे ढेरों वामपंथी इतिहासकार भी सामने आ गए। इनमें केवल सूरजभान पुरातत्वविद् थे। प्रो आरएस शर्मा के साथ रहे कई इतिहासकारों ने बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी के विशेषज्ञ के रूप में कई बैठकों में भाग लिया। मतलब साफ है कि ये वामपंथी इतिहासकार समस्या सुलझाने के बजाय आग में घी डालने में जुटे थे।
बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी की कई बैठकें भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद (ICHR) के अध्यक्ष प्रो इरफान हबीब की अध्यक्षता में हुईं। कमेटी की बैठक परिषद के सरकारी दफ्तर में करने का तत्कालीन सदस्य सचिव और इतिहासकार प्रो एमजीएस नारायण ने कड़ा विरोध भी किया। लेकिन प्रो इरफान हबीब ने उसे नहीं माना। वामपंथी इतिहासकारों ने अयोध्या की वास्तविकता पर सवाल उठाते हुए लगातार लेख लिखे और उन्होंने जनता में भ्रम और असमंजस का माहौल पैदा किया। वामपंथी इतिहासकार और उनका समर्थन करने वाली मीडिया ने समझौते के पक्ष में रहे मुस्लिम बुद्घिजीवियों को मजबूर कर दिया कि वो अपने विचार त्याग दें। वरना आज भी मुसलमानों की अच्छी-खासी आबादी है कि अयोध्या के धार्मिक महत्व को देखते हुए अगर मुस्लिम अपने पैर पीछे खींच लें तो देश के इतिहास में यह मील का पत्थर होगा। इससे आगे के लिए हिंदू-मुस्लिम झगड़ों की एक बड़ी वजह खत्म हो जाएगी। दोनों समुदायों के बीच आपसी अविश्वास भी खत्म होगा। लेकिन कॉमरेड इतिहासकारों ने यह होने नहीं दिया।
इससे एक बात स्पष्ट हो जाती है कि हिंदू या मुस्लिम कट्टरपंथ से ज्यादा वामपंथी विचार देश के लिए खतरा हैं। सेकुलर नजरिए से समस्या को देखने के बजाय वामपंथियों की आंख से अयोध्या मामले का विश्लेषण एक बड़ी भूल साबित हुई। राष्ट्र को इसकी कितनी बड़ी कीमत चुकानी पड़ी, यह अंदाजा अभी लोगों को नहीं है। इतिहास अनुसंधान परिषद (ICHR) में समस्या का समाधान चाहने वाले कई लोग थे, लेकिन इरफान हबीब के सामने वो कुछ नहीं कर सके। इरफान हबीब ने आरएसएस की तुलना आईएस जैसे आतंकवादी संगठन से की थी। आईसीएचआर के ज्यादातर सदस्य उनसे सहमत नहीं थे, लेकिन विरोध में बोलने की हिम्मत किसी में नहीं हुई। अयोध्या मामले के पक्ष और विपक्ष में इतिहासकार और पुरातत्वविद् भी गुटों में बंटे हुए थे। बाबरी मस्जिद टूटने के बाद पड़े मलबे में जो सबसे महत्वपूर्ण अवशेष मिला था वो था-विष्णु हरिशिला पटल। इसमें 11वीं और 12वीं सदी की नागरी लिपि में संस्कृत भाषा में लिखा गया है कि यह मंदिर बाली और दस हाथों वाले (रावण) को मारने वाले विष्णु (श्रीराम विष्णु के अवतार माने जाते हैं) को समर्पित किया जाता है।
1992 में डॉ. वाईडी शर्मा और डॉ. केएन श्रीवास्तव के सर्वे में वैष्णव अवतारों और शिव-पार्वती के कुषाण जमाने (ईसा से 100-300 साल पहले) की मिट्टी की मूर्तियां मिली हैं। 2003 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ बेंच के आदेश से हुई खुदाई में करीब 50 मंदिर-स्तंभों के नीचे के भाग में ईंटों से बनाया चबूतरा मिला था। इसके अलावा मंदिर के ऊपर का आमलका और मंदिर के अभिषेक का जल बाहर निकालने वाली मकर प्रणाली भी उत्खनन में मिली थी। यूपी में पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के डायरेक्टर की रिपोर्ट में कहा गया है कि बाबरी मस्जिद के आगे के भाग को समतल करते समय मंदिर से जुड़े कुल 263 पुरातात्विक अवशेष मिले हुए। खुदाई से मिली इन तमाम सबूतों के आधार पर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग इस निर्णय पर पहुंचा कि बाबरी मस्जिद के नीचे एक मंदिर दबा हुई है। सीधे तौर पर कहें तो बाबरी मस्जिद इस मंदिर को तोड़कर उसके मलबे पर बनाई गई है। इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच ने भी यही फैसला सुनाया था।
अयोध्या में हुई खुदाई में कुल 137 मजदूर लगाए गए थे, जिनमें से 52 मुसलमान थे। बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी के प्रतिनिधि के तौर पर सूरजभान मंडल, सुप्रिया वर्मा, जया मेनन आदि के अलावा इलाहाबाद हाई कोर्ट का एक मजिस्ट्रेट भी इस पूरी खुदाई की निगरानी कर रहा था। जाहिर है इसके नतीजों पर सवाल उठाने का कोई आधार नहीं है? ज्यादा हैरानी तब हुई जब इलाहाबाद हाई कोर्ट ने मंदिर के पक्ष में फैसला सुनाया तो भी वामपंथी इतिहासकार गलती मानने को तैयार नहीं हुए। इसका बड़ा कारण यह था कि खुदाई के दौरान जिन इतिहासकारों को शामिल किया गया था वो दरअसल निष्पक्ष न होकर बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी के प्रतिनिधि के तौर पर काम कर रहे थे। इनमें से 3-4 को ही आर्कियोलॉजी की तकनीकी बातें पता थीं। सबसे बड़ी बात कि ये लोग नहीं चाहते थे कि अयोध्या का ये मसला कभी भी हल हो। शायद इसलिए क्योंकि वो चाहते हैं कि भारत के हिंदू और मुसलमान हमेशा ऐसे ही आपस में उलझे रहें।
(लेखक केके मुहम्मद भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के उत्तरी क्षेत्र के क्षेत्रीय निदेशक रह चुके हैं। यह लेख उनकी किताब ‘मैं भारतीय हूं’ का एक संपादित हिस्सा है)

रहस्योघाटन: अयोध्या मुद्दा हल होता देख राजीव गाँधी ने गिराई थी चंद्रशेखर सरकार

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पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर जी ने अयोध्या के रामजन्मूभि पर राम मंदिर बनाने का निर्णय ले लिया था। राजीव गांधी को जब यह पता चला कि राम मंदिर का समाधान चंद्रशेखर जी ने निकाल लिया है तो उन्होंने चंद्रशेखर सरकार से समर्थन वापस लेकर उसे गिरा दिया था! निम्न वीडियो ने धुंधली हो रहे तथ्यों को एक दम जीवित कर दिया। वास्तव में इस बात से लेशमात्र भी इंकार नहीं किया जा, कि रामजन्मभूमि मन्दिर पर जितना तत्कालीन प्रधानमन्त्री चंद्रशेखर गम्भीर थे, आज तक कोई प्रधानमन्त्री नहीं उतना गंभीर नहीं। सम्भव है, मुझे गलत/भ्रमित सूचना हो, वैसे तत्कालीन प्रधानमन्त्री चंद्रशेखर ने जो समिति बनाई थी, उसके अभी जीवित स्वामी सुब्रमण्यन, तत्कालीन कानून मन्त्री, मुलायम सिंह यादव एवं शरद पवार इसकी पुष्टि कर सकते हैं, यदि सूचना गलत है तो सार्वजानिक रूप से माफ़ी चाहता हूँ। यह बातचीत का सिलसिला इतिहासकारों के साथ होने वाले सम्वाद वाले दिन समाप्त हुआ था। मस्जिद के पक्षधर इतिहासकारों ने मामले को उलझाने का प्रयास किया था। सब कुछ शांतिपूर्वक दौर चलने उपरान्त इन चंद चाँदी की टुकड़ों के भूखे इतिहासकारो ने बातचीत के  इस दौर को खंडित करने का पाप किया था। सम्भव है इन्होने राजीव गाँधी के इशारे पर घृणित काम को अंजाम दिया हो। 
यदि राजीव गाँधी ने अपना समर्थन वापस नहीं लिया होता, और अयोध्या में राममन्दिर बन गया होता, निश्चित रूप से चंद्रशेखर ने भाजपा को बहुत पीछे छोड़ दिया होता। खैर, विधि के विधान को कौन बदल सकता हैं। फिर इतिहास में दर्ज इस घटना का जब-जब अवलोकन किया जाएगा, प्रत्येक शांतिप्रिय, चाहे वह किसी भी धर्म अथवा जाति से हो--कट्टरपंथी और छद्दम नेताओं को छोड़ कर-- रामजन्मभूमि विवाद को साम्प्रदायिक रंग देने के लिए कांग्रेस को पानी पीकर कोसेगा। 
यह बात सच है, कि मुगलवाद को जिस तरह भारत में ज़िंदा रखा जा रहा है और वोट के भूखे नेता कट्टरपंथियों के आगे शीश झुकाते हैं, विश्व में भारत को एक मजाक बना दिया है, विश्व इन करतूतों की वजह से हम पर हँसता है। मक्का जिसे इस्लाम का तीर्थ कहा जाता है, भारत में मुगलों के हिमायती जवाब दें कि मक्का में बानी बिलाल मस्जिद कहाँ है? जहाँ सजदा किए बिना हज पूरा नहीं होता था। किसी माई के लाल में हिम्मत है, सऊदी सरकार के विरुद्ध एक लब्ज़ निकाल सकें। भारत में मुगलों के लिए विधवा-विलाप करने वाले सऊदी सरकार के विरुद्ध मुँह खोलने का अर्थ भलीभाँति जानते है कि कहीं हमारे हज के जाने पर वहाँ की सरकार प्रतिबन्ध न लगा दे। भारत में ही कह सकते हैं "हमारा सिर सिर्फ अल्लाह के आगे झुकता है, किसी और के आगे नहीं", अब कोई इनसे पूछे सऊदी सरकार के विरुद्ध क्यों नहीं ? सऊदी सरकार के आगे झुक गया न सिर, इससे बड़ा प्रमाण और क्या चाहिए?
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