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महाराष्ट्र : सोनू सूद BJP का एजेंट महाराष्ट्र सरकार को बुरा दिखाने के लिए कर रहे अच्छा काम : कांग्रेस

सोनू सूद
आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
बॉलीवुड एक्टर सोनू सूद ने पिछले कुछ हफ्तों से एक ऐसा जिम्मा उठाया हुआ है, जिसके लिए उन्हें चारों तरफ से तारीफें मिल रही हैं। लॉकडाउन में फँसे बेबस प्रवासी मजदूरों को सोनू बस का इंतजाम कर उनके घर भेजने का काम कर रहे हैं।
लेकिन इस बीच वे कांग्रेसियों के निशाने पर आ गए हैं। इसका कारण सोनू सूद का महाराष्ट्र के राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी से मिलना है। सोनू सूद ने शनिवार (मई 30, 2020) को राजभवन में राज्यपाल से मुलाकात की थी।
सोनू सूद ने राज्यपाल से मुलाकात कर उन्हें घर पहुँचाए जा रहे प्रवासी मजदूरों के बारे में जानकारी दी। इस दौरान सोनू सूद ने राज्यपाल को यह भी बताया कि वह कैसे प्रवासियों को घर पहुँचा रहे हैं और उनके लिए भोजन की व्यवस्था कर रहे हैं। राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी ने सोनू सूद के इस अच्छे काम की सराहना की और उन्हें पूरा सहयोग देने का आश्वासन दिया।
इसके तुरंत बाद सोनू सूद के ऊपर कांग्रेस समर्थकों ने हमला बोला। उन्होंने सोनू सूद को बीजेपी का एजेंट करार देते हुए कहा कि वो अच्छा काम इसलिए कर रहे हैं, ताकि राज्य में कांग्रेस, एनसीपी और शिवसेना की सरकार को बुरा दिखाया जा सके।
कहते हैं न कि 'गुड़ खाएं, खुलखुलों से परहेज करें', जो कांग्रेस पर सटीक बैठती है। यानि जब सोनू अच्छा काम कर रहे हैं, फिर किस आधार पर आलोचना की जा रही है, समझा जा सकता है। क्योकि मोदी विरोध में कांग्रेस को यह नहीं मालूम चल रहा कि हमें किसे, कब, कैसे और क्यों विरोध करे?  

सोनू सूद की तुलना अन्ना हजारे के साथ भी की गई, जिन्होंने इंडिया अगेंस्ट करप्शन आंदोलन शुरू किया, जिसके कारण अंततः आम आदमी पार्टी का निर्माण हुआ।


इतना ही नहीं, उन्हें खलनायक भी बनाया गया, क्योंकि केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी एवं अन्य भाजपा नेताओं ने उनके काम की तारीफ की और उनके काम में मदद भी की।
भाजपा नेता भी लगातार लोगों की मदद कर रहे हैं। भाजपा दिल्ली के प्रवक्ता तेजिंदर पाल सिंह बग्गा लॉकडाउन शुरू होने के बाद से ही दिल्ली में फँसे प्रवासियों की राशन आदि देकर मदद पहुँचा रहे हैं। वहीं, सोनू सूद के काम की प्रशंसा कांग्रेस नेता और पंजाब के मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह ने भी की थी।


इसी तरह, ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने भी उनके प्रयासों की सराहना की थी।

उन पर ‘उच्च जाति के हिन्दू’ होने के लिए हमला किया गया। अब कोई इन सिरफिरों से पूछे "क्या भारत में हिन्दू होना पाप है?" कदम-कदम पर साम्प्रदायिकता करना कांग्रेस की फितरत बन चुकी है। 


जल्द ही इसमें कांग्रेस मिशनरी भी शामिल हो गए और सोनू सूद पर निशाना साधने लगे।
कुछ लोगों ने तो यह भी आगाह किया कि वे उनकी तारीफ करने से परहेज करें, क्योंकि अगर वह भविष्य में भाजपा में शामिल हो जाते हैं तो फिर क्या होगा।

मई 31, 2020 को एक और कपोल कल्पना को हवा दी गई कि चूँकि उन्होंने अखिल भारतीय बंजारा सेवा संघ के अध्यक्ष शंकर पवार की मदद की, जिन्होंने कभी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के साथ अपनी तस्वीर क्लिक करवाई थी, तो इसका मतलब है कि प्रवासियों को घर पहुँचाने में वह निश्चित रूप से भाजपा की कठपुतली है। 2017 में शंकर पवार के बेटे सनी पवार ने ठाणे चुनाव में भाजपा उम्मीदवार के रूप में लड़ा था।


बॉलीवुड अभिनेता सोनू सूद उन प्रवासियों के लिए बसों की व्यवस्था कर रहे हैं जो देश के अन्य हिस्सों में फँस गए हैं। उन्होंने सैकड़ों बसों की व्यवस्था की है और हजारों प्रवासी श्रमिकों को घर भेजा है। वह लगातार बिना रुके ये काम कर रहे हैं और अब तो उन्होंने एक हेल्पलाइन नंबर भी इसके लिए जारी कर दिया है।
अब उनके सभी अच्छे काम उनके राजनीतिक झुकाव की कोरी कल्पना के तहत सोशल मीडिया पर एक विशेष वर्ग द्वारा संदेह के घेरे में है।

सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई के बाद शेखर गुप्ता के द प्रिंट ने श्रमिक ट्रेनों के किराए पर परोसा झूठ

प्रोपगेंडा पत्रकार शेखर गुप्ता ने 'द ...
कोरोना संकट के बीच मोदी सरकार के ख़िलाफ़ बोलने के लिए मीडिया को कुछ नहीं मिल रहा तो उसका एक धड़ा श्रमिक ट्रेनों पर अपने झूठों, अटकलों और भ्रमित करने वाली रिपोर्टिंग से सवाल उठा रहा है।
28 मई को सुप्रीम कोर्ट में एक केस की सुनवाई हुई। केस मुख्यत: उन श्रमिकों से संबंधित था, जिन्हें लॉकडाउन के कारण काफी परेशानियों का सामना कर पड़ा रहा है। लेकिन, सुप्रीम कोर्ट में हुई इस केस की सुनवाई पर जो रिपोर्टिंग हुई, उसने केवल इस बात का खुलासा किया कि आखिर द प्रिंट विपक्षी दलों को फेक न्यूज फैलाने की सलाह देने के बाद खुद भी इस हथकंडे को आजमा रहा है।
दरअसल, गुरुवार (28 मई 2020) की रात प्रिंट ने एक रिपोर्ट प्रकाशित की। इस लेख में बताया गया कि मोदी सरकार ने आखिरकार इस बात को स्पष्ट कर दिया है कि वह श्रमिक ट्रेन का खर्चा नहीं उठा रही। इसका भुगतान राज्य कर रही है।
इस लेख से द प्रिंट की मंशा साफ थी। वह कहना चाहता है कि मोदी सरकार ने पहले लोगों को भ्रमित किया और अब सुप्रीम कोर्ट के सामने इस बात का स्पष्टीकरण दिया है कि वे श्रमिक एक्सप्रेस के किराए का भुगतान नहीं कर रहे, बल्कि पूरा बिल भरने का दारोमदार राज्य पर है। ध्यान रहे कि यहाँ पर ‘Entire (सम्पूर्ण)’ शब्द का प्रयोग किस तरह प्रवर्तनशील मूल्य (operative value) के लिए किया गया है। 
इस लेख के पहले पैराग्राफ से ही दिख गया कि द प्रिंट अपने पाठकों को ये बताना चाहता है कि मोदी सरकार ने पहले झूठ बोला था कि वह श्रमिक ट्रेनों का 85% प्रतिशत किराया चुकाएगी और राज्यों को 15% चुकाना होगा। अपने पहले पैराग्राफ में द प्रिंट ने केंद्र सरकार की ओर से दिए बयान को स्पष्टीकरण बताया और लिखा कि प्रवासी मजदूरों की टिकटों का भुगतान केंद्र सरकार नहीं कर रही, बल्कि इसका जिम्मा राज्य सरकारों पर है।
कुल मिलाकर किसी भी साधारण पाठक के लिए द प्रिंट ने अपने आर्टिकल में दो बातें मुख्यत: बताई है:
  1. केंद्र सरकार ने झूठ बोला।
  2. प्रवासी मजदूरों के लिए चलाई जा रही श्रमिक ट्रेनों के टिकट का ‘सम्पूर्ण’ खर्चा राज्य सरकार दे रही हैं।
बाद में द प्रिंट ने अपने आर्टिकल के आखिरी में रेलवे मंत्रालय के स्पष्टीकरण वाला हिस्सा भी जोड़ा। उन्होंने लिखा कि रेलवे ने द प्रिंट को बताया कि केंद्र सरकार सरकार ने हमेशा कहा कि वह प्रवासी मजदूरों को उनके गृह राज्य भिजवाने के लिए चलाई गई श्रमिक ट्रेनों के लिए रेलवे को 85% भुगतान करेगी और किराया संबंधी भुगतान राज्यों द्वारा किया जाएगा।
इस व्याख्या के बाद भी, जिससे श्रमिक ट्रेनों के किराए पर कोई प्रश्न ही नहीं बचता, उसे लेख में द प्रिंट ने एकदम आखिर में लिखा और उसके बाद विपक्षियों के कुछ झूठे बयानों को एजेंडा चलाने के लिए रिपोर्ट में जोड़ दिया। जबकि लेख की शुरुआत में वह अपना झूठ बोलता रहा कि सरकार ने श्रमिक ट्रेनों पर अब स्पष्टीकरण दिया है।
द प्रिंट के साथ अन्य मीडिया ने भी फैलाया झूठ 
द प्रिंट ने अपनी रिपोर्ट में बिजनेस स्टैंडर्ड का लिंक लगाया, जिसमें इसी खबर को ऐसे ही झूठ के साथ फैलाया जा रहा था, बस उसे पेश करने का तरीका अलग था। रिपोर्ट की हेडलाइन थी, “विवादों के बाद सरकार ने श्रमिकों के लिए ट्रेन का 85% किराया रेलवे को अदा किया।”
इसके बाद, लेख के दूसरे पैराग्राफ में उन्होंने भी द प्रिंट की तरह रेलवे प्रशासन के बयान को कोट किया, जिसमें उन्होंने कहा था कि श्रमिक ट्रेनों की लागत का 85% केद्रीय सरकार द्वारा वहन किया जा रहा है।
मंत्रालय के प्रवक्ता को कोट करते हुए बिजनेस स्टैंडर्ड ने लिखा, “हमने राज्यों के अनुरोध पर विशेष ट्रेनें चलाने की अनुमति दी है। हम मानदंडों के अनुसार लागत को 85-15 प्रतिशत (रेलवे: राज्यों) में विभाजित कर रहे हैं। हमने राज्यों से कभी नहीं कहा कि वे फँसे हुए मजदूरों से पैसा वसूलें।”
साफ है कि बिजनेस स्टैंडर्स ने भी मामले में सारी जानकारी रखते हुए, लेख के भीतर सच्चाई को बताते हुए, हेडलाइन के जरिए पाठकों को भ्रमित करने का प्रयास किया।
केन्द्र दे रही 85% खर्चा 
अगर कोई व्यक्ति आम स्थिति में ट्रेनों की टिकटों को देखता है, तो उसे मालूम चलेगा कि उसमें ये साफ लिखा होता है कि उसे चार्ज की गई राशि यात्रा के लिए खर्च की गई लागत का केवल 57% है।
मगर, श्रमिक ट्रेनों के लिए, यात्रा के दौरान सामाजिक दूरी सुनिश्चित करने के लिए केवल 2/3rd सीटें भरी जाएँगी। यानी दाई और बाई ओर की सीटें भरी जाएँगी, लेकिन बीच की सीट खाली रहेगी। इसी प्रकार टॉप और बॉटम बर्थ भी यात्रियों को दिए जाएँगे। मगर मिडिल बर्थ खाली रखा जाएगा। इनके कारण इनका शुल्क घटकर 38% हो जाएगा।
श्रमिकों को मुद्दा बनाने से पूर्व मीडिया को धरातल पर आकर सच्चाई को जानना चाहिए था, जिसे मोदी विरोधियों ने राजनीतिक प्रभाव के चलते नहीं किया। मीडिया ने लॉक डाउन के चलते हज़ारों श्रमिकों के सड़क पर आने की सच्चाई जनता के सम्मुख लाने का साहस नहीं किया, क्यों? लॉक डाउन के चलते किसने श्रमिकों को बताया कि उस अमुक स्थान से बसें चलेंगी? दूसरे, जब दिल्ली और अन्य राज्यों की सरकारें, स्वयंसेवी संस्थाएं रोज लाखों भूखों और श्रमिकों को भोजन वितरित कर रही हैं, फिर किस आधार पर एक राज्य से अपने राज्य जाने वाले श्रमिकों का यही कहना है कि "हम भूख से मर रहे हैं, हमारे पर पैसे नहीं" आदि आदि। इतना ही कई मालिकों का तो यह तक कहना है कि "अपने श्रमिकों को परिवार का हिस्सा मानते उनको किसी भी तरह की भूख-प्यास महसूस नहीं होनी दी, लेकिन जैसे ही लॉक डाउन में मिल रही छूट के चलते होटल खुलने के आसार नज़र आते देख, सारे श्रमिक भाग गए।" क्या मीडिया ने इस सच्चाई को जानने की कोशिश की? खैर, इसमें कोई राय नहीं, कि श्रमिकों पर मोदी विरोधी राजनीती कर कोरोना लड़ाई में सरकार को भटकाने का प्रयास कर रहे हैं। किसी खोजी पत्रकार ने दिल्ली, महाराष्ट्र और बंगाल आदि राज्यों में कोरोना पीड़ित और हो रही मौतों की वास्तविक संख्या सामने लाकर इन सरकारों को कटघरे में खड़ा करने का प्रयास नहीं किया, क्यों? लेकिन इस सच्चाई को छुपाने श्रमिकों को ही मुद्दा बनाकर उछाला जा रहा है। 
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दिल्ली हाई कोर्ट ने लोकनायक अस्पताल में शवों की बदत्तर स्थिति का जायजा लेने के बाद दिल्ली सरकार और तीनों नगर निगमो...
श्रमिकों के लिए चलाई गई ये विशेष ट्रेनें हैं और पूरी तरह से खाली होकर वापस होंगी, इसलिए यात्री की लागत को आधे से विभाजित किया गया है, जो कि 19% होगी। मगर बावजूद इसके भोजन और स्वच्छता जैसी यात्री सेवाओं को ध्यान में रखते हुए, राज्य सरकारों को कुल लागत का 15% भुगतान करने के लिए कहा गया था, शेष 85% केंद्र सरकार द्वारा वहन किया गया था।
15% चार्ज जो राज्य सरकार पर लगाया गया है, उसका उद्देश्य ये सुनिश्चित करना है कि राज्य सरकार भी इस मामले पर गौर करें। अगर, यात्रा को रेलवे और केंद्र सरकार मुफ्त करवा देगी तो प्रवासी मजदूरों के अलावा कई ऐसे लोगों की भीड़ इकट्ठा हो जाएगी जो एक राज्य से दूसरे राज्य में सफर करना चाहते हैं। बीते दिनों हमने ऐसे नजारे महाराष्ट्र में बांद्रा के एक मस्जिद के पास और दिल्ली में आनंद विहार में देखे। अगर 15 प्रतिशत से राज्य सरकार की भागीदारी श्रमिकों को भेजने में रहती है, तो वे इसकी जिम्मेदारी लेंगे और प्रवासी मजदूरों की स्क्रीनिंग के बाद उनकी लिस्ट के साथ सामने आएँगे। ताकि उन्हें टिकट मिल सके।
सॉलिसिटर ने आखिर क्या कहा था?
उल्लेखनीय है कि सुप्रीम कोर्ट में केस की सुनवाई के दौरान सॉलिस्टर जनरल ने कुछ चुनिंदा सवालों के जवाब दिए।

ये सवाल केवल किराए ये संबंधित थे। सॉलिस्टर जनरल ने कहा कि इनका भुगतान सरकार द्वारा किया जाएगा। अब ध्यान रहे कि राज्य सरकार द्वारा दिए जा रहे 15% खर्चे में ही ये किराए का खर्चा आता है। लेकिन, फिर भी द प्रिंट ने फर्जी नैरेटिव गढ़ने के लिए और अपना एजेंडा चलाने के लिए बयानों को तोडा-मरोड़ा और हमेशा की तरह झूठी खबरें फैलाने का काम किया।
द प्रिंट के शेखर गुप्ता और एटिडर्स गिल्ड ऑफ इंडिया के प्रेसिडेंट के सामने उनकी ही वेबासइट से एक तर्क रखें- जिनका एक लंबा और कथित तौर पर सम्मानजनक कैरियर समाचार पत्रों के साथ रहा है।
एक बहुत पुराना अखबार, जैसे टाइम्स ऑफ इंडिया, जिसमें 48 पेज होते हैं और उसकी कीमत 5 रुपए होती है और इसमें भी 40% डिस्ट्रिब्यूटर्स द्वारा ले लिया जाता है। बाद में मीडिया संस्थान को केवल 2.40 रुपए मिलते हैं। अब पेज छपने की लागत 0.25 है और जब 48 पेज छपते हैं, तो कुल लागत 12 रुपए की आती है। ऐसे में कर्मचारियों और समाचार एजेंसियों का आदि भुगतान करने के लिए कुल लागत 3 रुपए है। सब मिलाकर एक अखबार 15 रुपए में तैयार होता है। तो क्या, उपभोक्ता से केवल 5 रुपए लेना, किसी भी रूप में तार्किक है क्या? जाहिर है नहीं।
ये उक्त जानकारी द प्रिंट के ही एक हालिया आर्टिकल में पब्लिश हुई है। इसलिए ये बात साफ है कि शेखर गुप्ता इन बातों को अच्छे से जानते हैं कि अखबारों को विज्ञापनों के जरिए पैसा आता है और सरकार भी अप्रत्यक्ष रूप से न केवल उन्हें एड के लिए पैसे देती है, बल्कि सब्सिडी इत्यादि से अखबारों को आर्थिक मदद देती है। और, अगर अखबार खुले में बिकता है, तो उसके प्रमोटर उसके लिए उसे भुगतान करते हैं।
अब यही तर्क, जो अखबार के लिए आता है, वही ट्रेनों के मामले में भी लागू होता है। बावजूद इसके शेखर गुप्ता की वेबसाइट मानती है कि यात्रा का किराया ही ट्रेन का आखिरी किराया होता है। इसका इस्तेमाल ट्रेन संचालित करने के लिए किया जाता है और जो पार्टी उस किराए की भरपाई करती है, वही पार्टी या सरकार पूरी किराए का भुगतान करती है।
श्रमिक ट्रेनों के मामले में, टिकटों की अंतिम कीमत कुल परिचालन लागत का सिर्फ 15% है, जैसे अखबार की अंतिम कीमत कुल परिचालन लागत का सिर्फ 33% है। फिर भी, शेखर गुप्ता की वेबसाइट बेईमानी से बताती है जैसे कि अंतिम कीमत केवल एक चीज है जो मायने रखती है।
कुछ दिनों पहले शेखर गुप्ता के द प्रिंट ने स्पष्ट रूप से सुझाव दिया था कि विपक्षी दल मोदी सरकार के बारे में फर्जी खबरें फैलाएँ ताकि वे नरेंद्र मोदी सरकार के ‘झूठों’ को काट सकें।
अब द प्रिंट की हरकतों को देखकर ऐसा लगता है कि शेखर गुप्ता की अगुवाई में मीडिया संस्थान ने जो बिंदुवार तरीके विरोधियों को बताए थे, उन पर अब वह खुद अमल करने लगा है। ताकि न केवल मोदी सरकार को बदनाम किया जा सके, अपितु विरोधियों को इसका फायदा पहुँचाया जा सके।

केजरीवाल के काले कारनामे : दिल्ली से भारतीय मजदूरों का सफाया किया , अब मजदूर मार्केट पर रोहिंग्या बांग्लादेशियों का कब्जा


डॉ राकेश कुमार आर्य, संपादक : उगता भारत
अब आपको दिल्ली में लेबर का कोई काम हो तो आपको भारतीय मजदुर मिलने से रहा, मज़बूरी में आपको रोहिंग्यों बांग्लादेशियों से ही अपने काम को करवाना पड़ेगा, उनको ही पैसा देना पड़ेगा, वो ही आपके फैक्ट्री, घरों में आएंगे और आप पूरी तरह रोहिंग्यों बांग्लादेशियों पर ही डिपेंड हो जायेंगे।
दिल्ली से भारतीय मजदूरों का पलायन हो चूका है, केजरीवाल की सरकार ने कई तरह के कारनामे किये है, जिन जिन इलाकों में भारतीय मजदुर जिनमे ज्यादातर यूपी, बिहार, झारखण्ड, राजस्थान, मध्य प्रदेश के इलाकों के थे उनके घाटों के लाइट और पानी के कनेक्शन काटने शुरू कर दिए।
भारतीय मजदूरों को खाने की कमी होने लगी, केजरीवाल की सरकार ने इनको कभी खाना बाँटा ही नहीं, भारतीय मजदूरों के साथ केजरीवाल की सरकार ने बेहद अमानवीय व्यवहार किया।
(दिल्ली में कोरोना के नाम पर सीलिंग का ड्रामा : पुरानी दिल्ली में चांदनी महल थाना क्षेत्र अप्रैल 10 से आज मई 28 तक सील है, क्यों? जबकि अन्य क्षेत्रों में जहाँ से कोरोना मरीज मिल रहे हैं, केवल उसी क्षेत्र को सील किया जा रहा है, वह भी एक निश्चित अवधि के लिए, इतने लम्बे समय के लिए नहीं। क्या कारण है कि चांदनी महल थाना क्षेत्र इतने लम्बे समय से सील है। क्या नितरोज कोरोना मरीज निकल रहे हैं, जिसे दिल्ली सरकार छुपा रही है? इस क्षेत्र में कोई बैंक नहीं, लोग खर्चे के लिए कहाँ जाएं, दिल्ली सरकार कब सोंचेगी? जब तक सरकार नहीं चाहेगी, दिल्ली पुलिस अपनी मर्जी से टीन नहीं हटा सकती। (इटालिक्स जोड़ा गया है)) 
और ये इसलिए किया गया ताकि दिल्ली में भारतीय मजदुर इतने त्रस्त हो जाये की वो दिल्ली छोड़ कर पलायन कर जाये, भाग जाये और ऐसा ही हुआ, दिल्ली से अब भारतीय मजदुर अपने अपने राज्यों में पलायन कर चुके है।
वहीँ दूसरी तरह केजरीवाल की पूरी सरकार ने रोहिंग्यों बांग्लादेशियों को 3 वक्त का खाना दिया और कई इलाकों में तो इनके फर्जी आधार कार्ड भी बनाए और सरकारी जमीनों पर इनको बसा दिया।
कल ही दैनिक भास्कर ने एक रिपोर्ट छापी है जिसमे बताया गया है की दिल्ली में एक स्थान पर रोहिंग्यों को 5.2 एकड़ जमीन पर केजरीवाल की पार्टी की मदद से बसा दिया गया है, दिल्ली की 5.2 एकड़ जमीन पर रोहिंग्यों का कब्ज़ा हो चूका है।
दिल्ली से भले ही भारतीय मजदुर पलायन कर गए हो पर रोहिंग्यों बांग्लादेशियों वहीँ के वहीँ बैठे हुए है, और ये केजरीवाल की सरकार के भरोसे बैठे हुए है।
अब दिल्ली में भारतीय मजदुर न के बराबर बचे है और दिल्ली में 18 मई से ही कई मार्किट और काम खोल दिए गए है, अब इन मार्केट्स और कामो में लेबर की जरुरत पड़ेगी और मज़बूरी में ही लोगो को रोहिंग्यों बांग्लादेशियों को काम देना पड़ेगा।
केजरीवाल सरकार की ये ही योजना थी, भारतीयों का सफाया और दिल्ली के पुरे लेबर मार्किट पर रोहिंग्यों बांग्लादेशियों का कब्ज़ा और केजरीवाल की सरकार इस काम में कामयाब रही।
बुरे व्यवहार को देखकर भारतीय मजदुर दिल्ली अब वापस आएंगे ही नहीं, और आएंगे भी तो काफी समय बाद, और तबतक दिल्ली के तमाम मार्केट्स में रोहिंग्यों बांग्लादेशियों ने अपना कब्ज़ा ज़मा लिया होगा, अब दिल्ली के लोग न चाहते हुए भी रोहिंग्यों बांग्लादेशियों पर ही डिपेंड रहेंगे और दिल्ली में रोहिंग्यों बांग्लादेशियों की संख्या दिन दुनी रात चौगनी की रफ़्तार से बढती रहेगी और कुछ ही सालों में दिल्ली का पूरा नजारा ही बदल जायेगा, दिल्ली लाहौर कराची हो जाएगी ।
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रोहिंग्यों को संरक्षण देते अमानतुल्ला खान आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार देश में एनआरसी का विरोध किया जाता है। लेकि...
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लॉकडाउन के दौरान दिल्ली में फँसे विभिन्न राज्यों के मजदूरों ने केजरीवाल सरकार द्वारा की गई तथाकथित व्यवस्थाओं की...
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क्यों मरने वालों का आंकड़ा छुपाया जा रहा है? आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार आखिर क्या कारण है कि दिल्ली, महाराष्ट्र और ....

राजस्थान सरकार के साथ मिलकर प्रियंका गांधी वाड्रा ने किया 5,14,28,500 रुपये का घोटाला

आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
लगता है घोटाला और हिन्दुत्व का विरोध करना कांग्रेस के DNA में ही है। भारत में सबसे पहला जीप घोटाला भी कांग्रेस के राज में हुआ था, तब से लेकर आज तक कांग्रेस घोटाले का कोई अवसर  नहीं छोड़ती। कहते हैं ना, कम्बल आदमी को छोड़ना तो चाहता है, लेकिन अलसी आदमी कम्बल को नहीं, ठीक वही स्थिति कांग्रेस और घोटाले की है। 
उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ को प्रवासी मजदूरों पर घेरने वाली प्रियंका वाड्रा ने बस के नाम पर इतना मोटा घोटाला कर दिया, सुनकर हैरानी होती है कि जो सेवा के नाम पर जब इतना बड़ा घोटाला कर सकती है, सत्ता में आने पर क्या करेगी, रूह कांपने लगती है। जबकि जनता इस मदद पर ऊँगली उठाने वालों को प्रियंका को बदनाम कर झिझोली राजनीती करने का आरोप लगा रहे हैं, लेकिन उन्हें शायद इस आड़ में किए गए घोटाले का आभास नहीं।  
बस के नाम पर ऑटो, मोटरसाइकिल, कार, ट्रैक्टर और एंबुलेंस भेजने वाली कांग्रेस की महासचिव प्रियंका गांधी की बस पॉलिटिक्स की सच्चाई परत दर परत खुलने लगी है। कांग्रेस शासित राज्यों में प्रवासी मजदूरों की भारी परेशानियों के बावजूद प्रियंका गांधी ने सिर्फ और सिर्फ राजनीति के लिए उत्तर प्रदेश में 1000 बसें भेजने का दावा किया। अब इस पूरे प्रकरण में घोटाले की बात सामने आने लगी है। 
राजस्थान सरकार ने कोटा से विद्यार्थियों को यूपी भेजने के एवज में 36 लाख रुपये की मांग की है। दरअसल, स्टूडेंट्स की संख्या ज्यादा होने पर राजस्थान सरकार ने स्टू़डेंट्स को यूपी ले जाने के लिए 70 बसें उपलब्ध करवाई थीं। राजस्थान सरकार द्वारा 70 बसों के लिए 36 लाख रुपए देने की मांग की गई है। इसी आधार पर प्रियंका गांधी द्वारा बस प्रकरण मामले में घोटाला करने के आरोप लगने लगे हैं। प्रियंका गांधी से मांग की जा रही है कि अगर 70 बसों के लिए 36 लाख रुपये के आधार पर 1,000 बसों का किराया 5 करोड़ 14 लाख 28 हजार रुपये बनता है। प्रियंका गांधी और कांग्रेस को बताना चाहिए कि आखिर ये बिल कहां है? किसे और कब भुगतान किया गया?

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आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार संकट की इस घडी में भी कांग्रेस अपनी ओछी राजनीति से बाज नहीं आ रही। जिन वाहनों की सूची प....
कांग्रेस की महासचिव प्रियंका गांधी ने दावा किया था कि प्रवासी मजदूरों की सहायता के लिए नोएडा, गाजियाबाद और राजस्थान की सीमा पर 1000 बसें खड़ी हैं लेकिन यूपी सरकार उन्हें चलाने की इजाजत नहीं दे रही है। जब इन बसों के कागज मांगे गए तो ज्यादातर बसों के कागज और फिटनेस में गड़बड़ी पाई गई थी। इसके उलट यूपी प्रदेश राज्य परिवहन की करीब 12 हजार बसें प्रवासी मजदूरों की सहायता कर रही है। एक तरफ कांग्रेस उत्तर प्रदेश में प्रवासी मजदूरों की सहायता के लिए बसें चलाने के लिए राजनीति कर रही है, वहीं कांग्रेस और गैरबीजेपी शासित द्वारा शासित राज्यों में प्रवासी मजदूरों की हालत खराब है।

प्रियंका गाँधी के बसों में सामने आया फर्जीवाड़ा : 31 ऑटो, 69 एंबुलेंस/ट्रक या अन्य वाहन, 70 का डेटा नहीं

प्रियंका गाँधी
आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
संकट की इस घडी में भी कांग्रेस अपनी ओछी राजनीति से बाज नहीं आ रही। जिन वाहनों की सूची प्रियंका गाँधी ने दी है, यदि उसकी जाँच नहीं की जाती, और दुर्भाग्य से कोई अनहोनी हो गयी, सारा दोष उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर डाल, अपनी राजनीति चमकाने का अवसर मिलने पर योगी सरकार ने पानी फेर दिया। आखिर किस आधार पर बेगुनाहों की लाशों पर कांग्रेस कब तक सियासत करती रहेगी? कांग्रेस को शायद यह नहीं मालूम कि कांग्रेस की हर चाल को योगी और केन्द्र में मोदी अच्छी तरह परख, कांग्रेस के मंसूबों पर पानी फेर बेनकाब कर रहे हैं।  
कांग्रेस की महासचिव प्रियंका गाँधी वाड्रा द्वारा उत्तर प्रदेश सरकार को भेजी गई 1000 बसों की सूची में बड़ा फर्जीवाड़ा निकल कर सामने आया है। प्रियंका द्वारा भेजी गई बसों की सूची में स्कूटर, आटो रिक्शा और तिपहिया वाहनों के साथ एंबुलेंस का नंबर भी शामिल है। इसकी पुष्टि एनआईसी द्वारा की गई।
उत्तर प्रदेश सरकार ने इन वाहनों का सत्यापन आरटीओ लखनऊ से करवाया। जिसके बाद ये बात साफ हो गया कि प्रियंका गाँधी द्वारा भेजे गए बसों की सूची में से 31 ऑटो थे, 69 एंबुलेंस, ट्रक या फिर अन्य वाहन थे। इसके साथ ही 70 ऐसे वाहनों की लिस्ट दी गई थी, जिसका कोई डेटा ही उपलब्ध नहीं था।
उत्तर प्रदेश के अपर परिवहन आयुक्त (आईटी) विनय कुमार सिंह और लखनऊ के सम्भागीय परिवहन अधिकारी रामफेर द्वारा लिखे गए पत्र में इस बाबत जाननकारी दी गई है। उन्होंने इस संबंध में पत्र लिखते हुए बताया कि गृह विभाग उत्तर प्रदेश द्वारा आज दिनांक 19.05.2020 को पूर्वाह्न में ई-मेल के माध्यम से उपलब्ध कराई गई बसों की सूची सम्भागीय परिवहन अधिकारी, लखनऊ कार्यालय में जाँच कराई गई।
उपलब्ध कराई गई सूची की प्रारंभिक जाँच में कुल 492 वाहनों के विवरण का परीक्षण किया गया। परीक्षण के अनुसार 59 वाहनों की फिटनेस की वैधता की अवधि समाप्त पाई गई एवं 29 वाहनों के इंश्योरेंस समाप्त अथवा अनुपलब्ध पाए गए।
इसके अलावा 3 वाहनों के प्रकरण ऐसे पाए गएस जिनमें वाहन की पंजीकरण संख्या बसों की न होकर अन्य श्रेणी के वाहनों की है।
इससे पहले उत्तर प्रदेश सरकार के लघु उद्योग मंत्री व प्रदेश सरकार के प्रवक्ता सिद्धार्थनाथ सिंह ने प्रियंका की भेजी लिस्ट सही नहीं होने की बात कही थी। उन्होंने कहा था कि इसमें कई वाहनों के नंबर और डिटेल गलत है और बसों के बजाय दूसरे वाहनों के नंबर हैं।
सिद्धार्थनाथ सिंह ने लखनऊ में इस बारे में जानकारी देते हुए प्राथमिक आधार पर उपलब्ध वाहनों की सूची के बारे में बताते हुए कहा था कि कांग्रेस इस मौके पर भी अपनी नीयत से बाज नहीं आई और दी गई लिस्ट में कार, ट्रैक्टर, एंबुलेंस और स्कूटर जैसे वाहनों के नंबर हैं। सूची में जिन वाहनों के नंबर दिए गए हैं, उसमें अधिकतर ब्लैकलिस्टेड हैं।
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मई 18, 2020 को उत्तर प्रदेश के अतिरिक्त मुख्य सचिव (गृह) अवनीश अवस्थी ने प्रियंका गाँधी को पत्र लिखकर बताया था कि सरकार ने प्रवासी मजदूरों के संबंध में उनके प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया है। साथ ही उन्होंने बिना किसी देरी के एक हजार बसों और ड्राइवरों का विवरण माँगा था।