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क्या पांच राज्यों में होने वाले चुनावों में कांग्रेस लुप्त हो जाएगी? राजीव गाँधी के खास रहे नटवर ने ‘गाँधी परिवार’ को बताया सत्यानाश का जिम्मेदार

                                                                                                                          साभार : जनसत्ता 
पंजाब सहित कई राज्यों में कांग्रेस आंतरिक लड़ाई से जूझ रही है। पंजाब के मुख्यमंत्री पद से अमरिंदर सिंह की छुट्टी करने के फैसले को लेकर कई वरिष्ठ नेता अपनी नाराजगी जता चुके है। कपिल सिब्बल जैसे पार्टी नेता तो यहॉं तक कह चुके हैं कि पार्टी में फैसले कौन ले रहा इसकी किसी को खबर नहीं। इन्हीं मुद्दों पर केंद्रित एक इंटरव्यू में पूर्व विदेश मंत्री नटवर सिंह ने कहा है कि कांग्रेस का जो हाल है उसमें वह लुप्त हो जाएगी। उनका यह भी दावा है कि अगले साल जिन 5 राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं उनमें कहीं भी पार्टी को सफलता नहीं मिलेगी। इस हालात के लिए उन्होंने पार्टी के शीर्ष परिवार को जिम्मेदार बताया है।

कांग्रेस और पार्टी में परिवारभक्तों को कोई प्रभावी अध्यक्ष ही दिखाई नहीं दे रहा, जबकि इस परिवार के कहीं अधिक नेता पार्टी में पहले भी थे और आज भी हैं, लेकिन परिवारभक्त हैं, किसी की सुनने को ही तैयार नहीं, पार्टी डूबती हो डूब जाए, इनको परिवार भक्ति से फुर्सत नहीं। जब पार्टी में राहुल को अध्यक्ष बनाने की चर्चा चल ही रही थी, योगी आदित्यनाथ ने ऐसे ही नहीं कहा था कि जितनी जल्दी हो अध्यक्ष बनाइए। अंजाम सबके सामने है। और रही प्रियंका की बात उसका भी हाल देख रहे हैं, यानि परिवार ही कांग्रेस को ख़त्म करने में लगी है।  

उन्होंने कहा कि इन तीनों लोगों को कैप्टन के सामने अपनी गलती मान लेनी चाहिए थी लेकिन वह ऐसा करेंगे नहीं, क्योंकि वह तीनों खुद को तीस मार खां समझते हैं। पूर्व विदेश मंत्री ने कहा कि कांग्रेस में फिलहाल कुछ भी सही नहीं है। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी के पास कोई पद नहीं है, लेकिन पार्टी से जुड़े सभी मामलों में वह फैसले लेते हैं। कांग्रेस के पूर्व नेता ने कहा कि अब न तो CWC की मीटिंग होती है और न ही राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक बुलाई जाती है।

पूर्व केंद्रीय मंत्री ने कहा कि नटवर सिंह ने कहा कि राहुल गांधी ने कैप्टन अमरिंदर सिंह को हटाने का फैसला लिया, जबकि सिद्धू को प्रदेश अध्यक्ष बनाने का फैसला प्रियंका गांधी का था। यह पहला मौका है, जब किसी सीनियर नेता द्वारा गांधी परिवार का नाम लेकर निशाना साधा गया हो। इससे पहले कपिल सिब्बल ने भी ऐसे ही तेवर दिखाते हुए पार्टी में बड़े बदलावों वकालत थी और एक एक नियमित अध्यक्ष चुने जाने की मांग की थी।

पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गाँधी के करीबी रहे नटवर सिंह ने दैनिक भास्कर को दिए इंटरव्यू में पंजाब में हुए बदलाव को लेकर सवाल किया गया था। इस पर उन्होंने कहा कि पंजाब में जो हुआ वो नहीं होना चाहिए था। उन्होंने कहा कि देश को इस समय एक मजबूत विपक्ष की जरूरत है, लेकिन कांग्रेस कुछ नहीं कर रही है। राहुल गाँधी पर हमला बोलते हुए कहा कि जिनके पास पार्टी में कोई पद नहीं है, वो फैसला लेते हैं। इससे पार्टी में असंतोष फैलता है और जनता में गलत संदेश जा रहा है।

वहीं प्रियंका गाँधी को निशाने पर लेते हुए उन्होंने कहा कि उनका पंजाब की राजनीति में हस्तक्षेप करना सही नहीं था। वो यूपी की प्रभारी हैं तो पंजाब में दखलअंदाजी करना सही नहीं था। उन्होंने नवजोत सिंह सिद्धू के इतिहास को जाने बिना उन्हें पंजाब का अध्यक्ष बना दिया। हालाँकि अमरिंदर सिंह ने इसके लिए हाइकमान को मना किया था, लेकिन उनकी बात नहीं सुनी गई। उन्होंने कांग्रेस हाइकमान को ही पार्टी के सत्यानाश का कारण बताया।

भाजपा के कांग्रेस मुक्त नारे को लेकर पूछे जाने उन्होंने कहा कि अगर ऐसी ही स्थिति आगे भी बनी रही तो कांग्रेस का लुप्त होना लाजिमी है। उन्होंने हैरानी जताते हुए कहा कि अभी भी चुनाव में कांग्रेस को 20 फीसदी वोट ही मिलता है। वहीं 5 राज्यों में होने वाले चुनावों को लेकर उन्होंने कहा कि अगर पार्टी जीत जाती है तो अच्छी बात है, लेकिन इसकी उम्मीद नहीं है। उनका मानना है कि पार्टी को पाँचों राज्यों में हार का मुँह देखना पड़ेगा।

पत्थर का जवाब AK-47 से देता हूं, मोदी जी, वसुंधरा जी.. सबको पेटीपैक कर दूंगा- जगत सिंह, पूर्व विदेश मन्त्री नटवरसिंह का बेटा


 
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पूर्व विदेश मंत्री नटवर सिंह के बेटे जगत सिंह ने एक ऐसा बयान दिया है जिससे विवाद पैदा हो सकता है। राजस्थान के अलवर जिले की रामगढ़ विधानसभा सीट से बसपा उम्मीदवार जगत सिंह ने अपनी चुनावी जनसभा के दौरान जो बयान दिया था वो सोशल मीडिया में वायरल हो रहा है। इस वीडियो में जगत सिंह पत्थर का जवाब एके-47 से देने की बात कर रहे हैं। वीडियो को लेकर अभी तक जगत सिंह की तरफ से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है। 
आपको बता दें कि जगत सिंह पिछली भाजपा सरकार में बीजेपी से विधायक थे लेकिन इस बार पार्टी ने उन्हें टिकट नहीं दिया। 10 साल से यहां विधायक रह चुके जगत सिंह इस बार मायवाती की पार्टी बसपा के टिकट पर चुनावी मैदान में हैं।दरअसल रामगढ़ विधानसभा सीट पर पूर्व में बसपा उम्मीदवार के निधन के कारण चुनाव रद्द कर दिया गया था।  अब इस सीट पर 28 जनवरी को वोट डाले जाने हैं। जिस वीडियो में जगत सिंह जनसभा को संबोधित कर रहे हैं यह नामांकन भरने वाले दिन का बताया जा रहा है।  मैं पीछे नहीं हटूंगा। गोली चलेगी तो पहली गोली मेरे सीने पर चलेगी।
जनसभा को संबोधित करते हुए जगत सिंह कहते हैं, 'अभी जुगरावर में इतना बड़ा झगड़ा हो गया, कहां थी भारतीय जनता पार्टी उस दिन, हमारे 200 लड़के बंद होने वाले थे। कौन था उनको बचाने के लिए? कौन था उनकी पीड़ा को सुनने के लिए? कोई नहीं था.. मैं था. मैं पहुंचा। मैं पीछे नहीं हटूंगा भाइयों। गोली चलेगी तो पहली गोली मेरे सीने में लगेगी और पत्थर का जवाब एके 47 से करता हूं मैं.. तो आ जाओ अशोक जी, आ जाओ मोदी जी और आ जाओ वसुंधरा जी सब को पेटी पैक करके भेजूंगा।' 

कई बार विभाजित हुई कांग्रेस किस आधार पर सबसे पुरानी पार्टी?

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आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
लगभग तीन वर्ष पूर्व टीवी चैनलों और अखबारों ने बताया कि कांग्रेस पार्टी अपना 131वां जन्मदिवस मना रही है।जब एक राष्ट्रीय पार्टी अपनी उम्र और जन्मदिन गलत बताने लग जाए और मीडिया उसे दिखाने भी लग जाए तो हैरानी होना वाजिब है। कांग्रेस पार्टी  कुछ वर्ष पहले टीपू सुल्तान का भी जन्मदिन गलत तारीख को मनाया। ज्यादा हैरानी तब होती है कि जब बुद्धिजीवी वर्ग भी चुपचाप तमाशा देखता है और कांग्रेस के इस महाझूठ पर हां में हां मिला देता है। वर्तमान में जो कांग्रेस है वो गांधी, नेहरू, मौलाना आजाद और पटेल की कांग्रेस नहीं है। यह इंदिरा गांधी द्वारा कांग्रेस से कई बार अलग होकर बनाई गई कांग्रेस पार्टी है।
ज्ञात हो इमरजेंसी के बाद तत्कालीन भारतीय जनसंघ के जनता पार्टी में विलय होने के बाद से आज तक अपना स्थापना दिवस नहीं मनाया, बल्कि जनता पार्टी से अलग होने उपरान्त स्थापित भारतीय जनता पार्टी के गठन दिवस को ही स्थापना दिवस के रूप मनाती है। लेकिन भारतीय जनसंघ के संस्थापक डॉ श्यामा प्रसाद मुख़र्जी को स्मरण करती है। 
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पहली बार इसका जन्म 12 नवंबर 1969 में हुआ जब कांग्रेस पार्टी से इंदिरा गांधी को बर्खास्त कर दिया गया था और उन्होंने अपनी एक अलग पार्टी कांग्रेस-(रिक्वीजीशन) की स्थापना की थी। नेहरू-पटेल-आजाद की कांग्रेस का चुनाव चिन्ह जोड़ा बैल था। लेकिन जब इंदिरा गांधी ने अलग पार्टी बनाई तो उन्हें यह चिन्ह नहीं मिला। तकनीकी तौर पर उसी दिन से इस पार्टी का रिश्ता पुरानी कांग्रेस से अलग हो गया।यह चुनाव चिन्ह कांग्रेस (आर्गनाइजेशन) के पास रहा क्योंकि बड़े-बड़े स्वतंत्रता सेनानी इंदिरा के विरोध में थे। यही वजह है कि इंदिरा गांधी ने गाय-बछड़े को अपना सिम्बल बनाया था. कई लोग यह मानते हैं कि गाय-बछड़ा प्रतीकात्मक रूप से इंदिरा और संजय गांधी थे।
Related imageइमरजेंसी के बाद कांग्रेस (आर) का फिर से विभाजन हुआ। 1977 के चुनाव में इंदिरा गांधी की तानाशाही नीतियों और प्रवृति की वजह से कांग्रेस (आर) की हार हुई थी। पार्टी नेताओं ने खुल कर इंदिरा का विरोध किया। जिससे पार्टी दो फांक में बंट गई। विरोध झेलने में इंदिरा गांधी को परेशानी होती थी इसलिए उन्होंने अलग पार्टी बनाई जिसका नाम रखा कांग्रेस (आई) मतलब इंदिरा कांग्रेस। इमरजेंसी के काले कारनामों की वजह से पार्टी का सिम्बल बदनाम हो चुका था।इस वजह से इंदिरा कांग्रेस को फिर से नया चुनाव-चिन्ह लेना पड़ा।इस बार इंदिरा ने पंजे के निशान को चुना। इंदिरा गांधी एक ऑथोरिटेरियन नेता थीं। सरकारी मशीनरी पर उनका पूरी तरह से नियंत्रण था. इलेक्शन कमीशन आज की तरह आजाद नहीं था। इसलिए, इंदिरा गांधी ने इलेक्शन कमीशन पर दबाव डाला और कांग्रेस आई का नाम इंडियन नेशनल कांग्रेस बदलवा दिया। असहाय और लाचार इलेक्शन कमीशन ने स्वीकृति दे दी। 1981 से इंदिरा कांग्रेस का नाम इंडियन नेशनल कांग्रेस पड़ गया। यह एक ऩई पार्टी थी लेकिन नाम पुराना था।
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इस हिसाब से वर्तमान कांग्रेस की आयु पहले विभाजन के बाद से 46 वर्ष या फिर दूसरे विभाजन के हिसाब से 37 वर्ष या फिर इंडियन नेशनल कांग्रेस के नामकरण के बाद से 34 साल होनी चाहिए। समझने वाली बात यह है कि महात्मा गांधी, बालगंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय, सुभाष चंद्र बोस, सरदार पटेल की जो कांग्रेस थी वो कई बार टूटी। यहां तक कि इंदिरा गांधी की कांग्रेस भी कई बार टूटी। कांग्रेस से टूट कर ना ना प्रकार की कांग्रेस की स्थापना हुई। अगर सोनिया-राहुल की कांग्रेस 131 साल पुरानी है तो उन सभी ना ना प्रकार की पार्टियों की आयु भी 131 साल होनी चाहिए। उन्हें भी गांधी-नेहरू-बोस-पटेल-आजाद की पार्टी कहलाने का उतना ही हक है जितना सोनिया-राहुल की कांग्रेस को है। हकीकत तो यह है कि 2015 में यह एक पहेली ही है कि कौन असली कांग्रेस है और कौन नकली कांग्रेस है। यह इसलिए क्योंकि राष्ट्रीय स्तर पर तो कांग्रेस में विभाजन हुआ ही, साथ ही साथ राज्य स्तर पर भी कांग्रेस टूटती और बिखरती रही।
आजादी के बाद पहली बार कांग्रेस पार्टी 1951 में टूटी जब जे. कृपलानी ने इससे अलग होकर किसान मजदूर प्रजा पार्टी बनाई और एन जी रंगा ने हैदराबाद स्टेट प्रजा पार्टी बनाई। इसी साल कांग्रेस से अलग होकर सौराष्ट्र खेदुत संघ बनी। 1956 में कांग्रेस फिर टूटी जब सी राजगोपालाचारी ने इंडियन नेशनल डेमोक्रेटिक पार्टी बनाई। इसके बाद 1959 में बिहार, राजस्थान, गुजरात और उड़ीसा में भी कांग्रेस पार्टी टूटी। यहां कांग्रेस से अलग होकर कांग्रेसी नेताओं ने स्वतंत्र पार्टी बनाई। 1964 में के एम जॉर्ज ने केरल-कांग्रेस बनाई। 1966 में उड़ीसा में हरकृष्णा महाताब ने उड़ीसा-जन-कांग्रेस बनाई।1967 में कांग्रेस पार्टी से चरण सिंह अलग हुए और भारतीय क्रांति दल बनाया। वहीं बंगाल में इसी साल अजय मुखर्जी ने बांग्ला-कांग्रेस का ऐलान कर दिया।अगले साल कांग्रेस मणिपुर में बीचोबीच टूटी। 1969 में कांग्रेस पार्टी से बीजू पटनायक और मारी चेन्ना रेड्डी अलग हुए और उत्कल-कांग्रेस और तेलंगाना प्रजा समिति पार्टियां कांग्रेस के विरोध में खड़ी हो गई।
1978 में कर्नाटक, केरल, महाराष्ट्र और गोवा में कांग्रेस पार्टी फिर से टूटी। इस बार इंडियन नेशनल कांग्रेस(उर्स) बनी। इन राज्यों में जो लोग कांग्रेस में बचे थे उनमें फिर से 1981 में बंटवारा हुआ। इस बार शरद पवार पार्टी से अलग हो गए और इंडियन नेशनल कांग्रेस सोशलिस्ट बनी। इसी साल बिहार में जगजीवन राम ने कांग्रेस से अलग होने का फैसला किया और उन्होंने जगजीवन-कांग्रेस पार्टी की स्थापना की. 1984 में असम में शरत चंद्र सिन्हा ने कांग्रेस से अलग होकर अपनी अलग पार्टी बना ली।1986 में प्रणब दा ने विभाजन का झंडा बुलंद किया और राष्ट्रीय समाजवादी कांग्रेस बनाई।1988 में शिवाजी गणेशन ने तमिलनाडु में कांग्रेस को तोड़कर टीएमएम पार्टी बनाई। इसी तरह 1994 में तिवारी कांग्रेस बनी जिसमें नारायण दत्त तिवारी, अर्जुन सिंह, नटवर सिंह शामिल हुए।1996 में तो कांग्रेस से टूटकर कई राज्यों में नई पार्टियों को जन्म हुआ। इस साल कांग्रेस को विभाजित करने वाले नेताओं में कर्नाटक में बंगरप्पा, अरुणाचल प्रदेश में गेगांग अपंग, तमिलनाडु में मुपनार, मध्यप्रदेश में माधवराव सिंधिया शामिल थे। अगले साल यानि 1997 में कांग्रेस बंगाल और तमिलनाडु में फिर से टूटी। बंगाल में ममता बनर्जी ने तृणमूल कांग्रेस बनाई वहीं तमिलनाडु में बी रामामूर्ति ने मक्काल कांग्रेस की स्थापना की।
congress1998 में पार्टी गोवा, अरुणाचल प्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र में टूट कर क्रमशः गोवा राजीव कांग्रेस, अरुणाचल कांग्रेस, ऑल इंडिया इंदिरा कांग्रेस (सेकुलर), महाराष्ट्र विकास अगाढ़ी बनी। इसी तरह 1999 में नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी बनी और जम्मू कश्मीर में मुफ्ती सईद ने कांग्रेस से अलग होकर पीडीपी बनाई. फिर, 2000 से अब तक पार्टी तमिलनाडु, पांडिचेरी, गोवा, अरुणाचल प्रदेश, महाराष्ट्र, केरल, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, मणिपुर, बंगाल और आंध्रप्रदेश में टूट चुकी है। कांग्रेस के इतिहास पर सोनिया-राहुल की मोनोपॉली नहीं हो सकती है क्योंकि आज जो कांग्रेस पार्टी है वो भी मूल कांग्रेस से अलग होकर ही बनी है। सोनिया-राहुल की कांग्रेस का आजादी दिलाने वाली कांग्रेस से ठीक वैसा ही रिश्ता है जैसे कि नवीन पटनायक का उस कांग्रेस से है। जैसा कि ममता बनर्जी और शरद पवार का आजादी दिलाने वाली कांग्रेस से है। इतिहास के पन्नों को पलटने वाले कांग्रेसी नेताओं को कांग्रेस पार्टी में हुए विभाजन का इतिहास पढ़ना चाहिए और वर्तमान कांग्रेस का चेहरा ढूंढना चाहिए। आजादी के बाद कांग्रेस पार्टी उस तरह से टूटी है जैसे कार का शीशा चकनाचूर हो जाता है। कांग्रेस के नेताओं को यह बताना चाहिए कि इतिहास के थपेड़े में चकनाचूर हुई कांग्रेस नामक शीशे के कांच के किस टुकड़े में सोनिया-राहुल की कांग्रेस का चेहरा दिखाई देता है। जिस कांग्रेस की दुहाई सोनिया-राहुल कांग्रेस के कार्यकर्ता देते हैं वो कांग्रेस कब की खत्म हो चुकी है।
बोफोर्स, 2 जी, कोयला, कॉमनवेल्थ, आदर्श आदि जैसे सैकड़ो घोटालों से सुशोभित सोनिया-राहुल पारिवार वाली कांग्रेस पार्टी के नेता जब कहते हैं कि उनकी कांग्रेस पार्टी ने देश को अंग्रेजों से आजादी दिलाई थी तो हैरानी होती है। आजादी दिलाने वाले महापुरूषों की पार्टी घोटालों वाली पार्टी नहीं हो सकती। नेहरू-पटेल-मौलाना आजाद की पार्टी वोट बैंक की राजनीति करने वाली पार्टी नहीं हो सकती। स्वतंत्रता-सेनानियों की पार्टी किसी की प्राइवेट प्रोपर्टी नहीं हो सकती है। देश को आजादी दिलाने वालों की पार्टी बिना चुनाव के अध्यक्ष चुनने वाली पार्टी नहीं हो सकती। गांधी की पार्टी झूठ बोलने वालों की पार्टी नहीं हो सकती। सोनिया-राहुल की पार्टी वो कांग्रेस है जिसे इंदिरा गांधी ने कांग्रेस से अलग होकर बनाया था लेकिन सोनिया-राहुल और उनके प्रवक्ता खुलेआम झूठ बोलकर लोगों को झांसा देने में लगे है।
कांग्रेस पार्टी की रणनीति साफ है। सोनिया-राहुल की कांग्रेस महापुरुषों का नाम लेकर, उनकी तस्वीरें लगाकर, झूठा इतिहास बता कर अपने घोटालों और निकम्मेपन को छिपाना चाहती है। सच्चाई ये है कि वर्तमान कांग्रेस पार्टी गांधी, पटेल, आजाद, तिलक, बोस आदि जैसे महापुरुषों वाली कांग्रेस नहीं है। यह कांग्रेस सोनिया-राहुल की कांग्रेस है जिसमें एक से बढ़कर एक घोटालेबाजों का वर्चस्व है। यह सामंती प्रवृति वालों की कांग्रेस है। यह पार्टी सोनिया-राहुल की निजी सम्पत्ति है। इस पार्टी की राजनीति सोनिया गांधी के चरणों से शुरू होकर राहुल गांधी की वंदना में खत्म होती है। सोनिया-राहुल की कांग्रेस को न तो आजादी की लड़ाई से कुछ लेना देना है और न ही वो देश के महान स्वतंत्रता सेनानियों के राजनीतिक वारिस हैं। जिस पार्टी ने स्वतंत्रता संग्राम की विचारधारा को ही दफना दिया उसे स्वतंत्रता संग्राम की विरासत पर बात करने की कोई नैतिक अधिकार नहीं है। सोनिया गांधी कांग्रेस का अध्यक्ष बनने से ठीक 62 दिन पहले पार्टी की सदस्य बनी थीं। महज 62 दिनों में ही वो पार्टी अध्यक्ष बन गई. यह कीर्तिमान तो स्वयं गांधी और नेहरू नहीं बना सके। यह कांग्रेस पार्टी में व्याप्त एक परिवार के प्रति दासता का परिचायक है। इस हरकत ने एक ही झटके में उन सभी शहीदों को शर्मसार कर दिया जिन्होंने देश में प्रजातंत्र की स्थापना के लिए अपनी जानें दीं। इसलिए, सोनिया-राहुल को स्वतंत्रता संग्राम के बारे बात करने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है।सोनिया-राहुल की कांग्रेस सिर्फ और सिर्फ इंदिरा गांधी की राजनीतिक वारिस है जिसके चेहरे पर इमरजेंसी का स्याह दाग है।

आखिर किसके इशारे पर KGB भारत में दखल दे रही है?


आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
सेवानिर्वित होने उपरान्त एक हिन्दी पाक्षिक को सम्पादित करते जनवरी 2013 के अंक में कश्मीर समस्या पर अपनी रपट में कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गाँधी का कश्मीर विरोधी संगठन में पदाधिकारी होने को प्रकाशित किया था। आज जिसे देखो कश्मीर समस्या के लिए प्रथम प्रधानमन्त्री जवाहरलाल नेहरू को दोषी करार देते रहते हैं, लेकिन नेहरू की उस परिपाटी को आगे बढ़ाने वालों को क्यों नज़रअंदाज़ किया जाता रहा है, समझ से दूर है। किसी कांग्रेस विरोधी तो क्या किसी मीडिया ने भी इस मुद्दे पर चर्चा तक नहीं की। 
और जहाँ तक सोनिया के रूस की ख़ुफ़िया एजेंसी केजीबी के साथ सम्बन्धों की बात है, यह कोई ब्रेकिंग न्यूज़ नहीं। क्योंकि कांग्रेस और केजीबी का चोली दामन का साथ रहा है, जिसे कोई भी वरिष्ठ राजनेता झुठला नहीं सकता। भूतपूर्व प्रधानमन्त्री अटल बिहारी वाजपेयी, लाल कृष्ण आडवाणी, डॉ मुरली मनोहर जोशी, और इनके समकालीन किसी भी नेता से पूछिए कि "तत्कालीन भारतीय जनसंघ के वरिष्ठ निर्भीक एवं जुझारू नेता प्रो बलराज मधोक ने तत्कालीन प्रधानमन्त्री इन्दिरा गाँधी से संसद में ऐसा कौन-सा प्रश्न किया था, जिसका सत्तारूढ़ कांग्रेस खेमे से किसी प्रतिक्रिया होने पूर्व वाजपेयी ने हाज़िर जवाब की भाँति तुरन्त खड़े होकर, तत्कालीन लोकसभा अध्यक्ष से उस ज्वलन्त प्रश्न को सदन की कार्यवाही से निकालने का अनुरोध करते ही प्रो मधोक को पार्टी से निष्कासित करने की घोषणा करने के साथ ही प्रो मधोक के लिए जनसंघ से अलग स्थान देने को कहा था।" उन दिनों चर्चा थी परन्तु वाजपेयी ने सारा खेल बिगाड़ा ही नहीं, बल्कि रहस्य को हमेशा के लिए दफ़न कर दिया। वाजपेयी अपने लच्छेदार बातों और कविताओं से मनोरंजन कर सकते थे, लेकिन ऐसे दबंग प्रश्न करने का साहस नहीं था, वह साहस था केवल प्रो बलराज मधोक में। और मधोक के पीछे विपक्ष के दूसरे नेताओं के अतिरिक्त कुछ कांग्रेस सांसदों का भी गुप्त रूप से सहयोग था, जो उस प्रश्न की चर्चा होने पर ही सामने आते। क्योंकि उन दिनों केवल वही समाजसेवी राजनीती में आते थे, जिन्हे अपनी तिजोरी की चिन्ता नहीं होती थी। उनके लिए देशहित सर्वोपरि होता था। वह केवल आपत्तिजनक प्रश्न नहीं था, बल्कि रूस और केजीबी से सम्बन्धित अनेको रहस्यों को उजागर करने का स्वर्णमयी अवसर था।     
रूस की खुफिया एजेंसी केजीबी भारत में होने वाले चुनावों को प्रभावित करने की कोशिश कर सकते हैं। ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के एक सोशल मीडिया एक्सपर्ट ने ये बड़ा खुलासा किया है। इंटरनेट स्टडीज के प्रोफेसर फिलिप एन हॉवर्ड ने अमेरिकी सीनेट की खुफिया मामलों की कमेटी के आगे यह बयान दिया है। हालांकि उन्होंने चुनावों को प्रभावित करने के तौर-तरीकों पर ज्यादा विस्तार से नहीं बताया है। इससे पहले रूसी खुफिया एजेंसियों पर अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव को प्रभावित करने के आरोप भी लग चुके हैं। भारत के अलावा ब्राजील के चुनावों में भी रूसी एजेंसियों की दिलचस्पी की बात सामने आई है। कांग्रेस नेता सोनिया गांधी के रूसी खुफिया एजेंसी केजीबी के साथ रिश्ते होने के आरोप लगते रहे हैं। ऐसे में शक जताया जा रहा है कि केजीबी भारत में कांग्रेस को सत्ता में वापस लाने की कोशिश कर रही है। इससे पहले लाल बहादुर शास्त्री की मौत और उसके बाद इंदिरा गांधी की ताजपोशी के पीछे भी केजीबी का हाथ माना जाता है।

सोशल मीडिया के जरिए साजिश

हॉवर्ड ने अमेरिकी मीडिया को सलाह देते हुए कहा है कि भारतीय चुनावों से जुड़ी खबरों में वो अतिरिक्त सावधानी बरतें। न कि ट्विटर पर फैलाए जाने वाले प्रोपोगेंडा पर भरोसा कर लें। उनकी राय में भारत और ब्राजील जैसे लोकतांत्रिक देश अमेरिका के सबसे बड़े सहयोगी हैं। रूस उन्हें अपने असर में लेना चाहता है और चाहता है कि वहां पर उसकी पसंद की सरकारें सत्ता में रहें। पहले भी यह खबर आती रही है कि रूसी प्रशासन नरेंद्र मोदी के भारत का प्रधानमंत्री बनने को लेकर सहज नहीं था। उसकी राय में कांग्रेस जब सत्ता में होती है तो भारत अमेरिका के बजाय रूस से रिश्तों को ज्यादा महत्व देता है। यही कारण है कि केजीबी मोदी को सत्ता से हटाकर सोनिया को लाने की कोशिश कर रहा है।

सोनिया और केजीबी के गुप्त रिश्ते

बीजेपी नेता सुब्रह्मण्यम स्वामी हमेशा से दावा करते रहे हैं कि सोनिया गांधी के रूसी एजेंसी केजीबी से रिश्ते हैं। वो बिना नाम लिए यहां तक दावा करते हैं कि सोनिया दरअसल रूसी जासूस हैं जिन्हें केजीबी ने देश के सबसे ताकतवर राजनीतिक परिवार में बहू के तौर पर प्लांट कराया है। स्वामी के मुताबिक इंदिरा और राजीव गांधी की हत्याओं के पीछे भी केजीबी का ही हाथ था। यहां यह जानकारी देना अहम है कि सोनिया गांधी के पिता एंटोनियो माइनो रूसी एजेंसी केजीबी के जासूस रहे हैं। कुछ समय पहले सोनिया गांधी रूस की सीक्रेट यात्रा पर भी गई थीं। कहा गया था कि वो वहां इंदिरा गांधी पर एक फोटो प्रदर्शनी का उद्घाटन करेंगी, लेकिन स्वामी के सूत्रों के मुताबिक मॉस्को में सोनिया ने कई संदिग्ध लोगों के साथ बैठकें की थीं। तभी यह सवाल उठा था कि आखिर रूस यात्रा में ऐसा क्या था कि सोनिया ने उसकी जानकारी छिपाने की कोशिश की।

रूस के हाथों की कठपुतली सोनिया!

आईबी के ज्वाइंट डायरेक्टर रहे मलय कृष्ण धर और कांग्रेस के सीनियर नेता नटवर सिंह ने भी सोनिया गांधी के रूस से करीबी रिश्तों का जिक्र अपनी किताबों में किया है। मोदी सरकार बनने के बाद दिसंबर 2014 में रूसी राष्ट्रपति पुतिन जब भारत आए थे, उस वक्त भी उनकी सोनिया गांधी के साथ विशेष मुलाकात हुई थी। इसी तरह राहुल गांधी और चीन के दूतावास के अधिकारियों की गुपचुप मुलाकातें भी अक्सर सुर्खियों में आती रही हैं। 20 जुलाई 2018 को अविश्वास प्रस्ताव के दिन संसद के अंदर जिस तरह से राहुल गांधी ने भारत-फ्रांस के बीच राफेल समझौते को लेकर फ्रांसीसी राष्ट्रपति के नाम पर झूठ बोला उससे अंदाजा यही लगाया जा रहा है कि कांग्रेस के जरिए चीन और रूस की खुफिया एजेंसियां भारत के रक्षा सहयोगी देशों को टारगेट कर रही हैं।
आप सुब्रह्मण्यम स्वामी का ट्वीट देख सकते हैं। माना जाता है कि स्वामी सोनिया के लिए कोड नेम TDK इस्तेमाल करते हैं।
Desperate Congi leaders are planning to use TDK’s KGB connection to urge Putin’s Russia to influence our 2019 elections. We must be therefore on high alert