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उत्तर प्रदेश : समाजवादी पार्टी को सुप्रीम कोर्ट की फटकार : ‘सत्ता में रहते हुए किया ताकत का दुरुपयोग, अब कानून याद आ रहा’: सरकारी इमारत पर कब्जे को लेकर पूछा- 115 रूपए में कहीं बिल्डिंग किराए पर मिलती है?

सुप्रीम कोर्ट ने 21 जुलाई 2025 को पीलीभीत में समाजवादी पार्टी के कार्यालय की जगह को सिर्फ 115 रुपए में हथियाने को लेकर धोखाधड़ी की बात कही है। सुप्रीम कोर्ट ने इसे राजनीतिक शक्ति का दुरुपयोग बताते हुए समाजवादी पार्टी को कड़ी फटकार लगाई।   

जब तक उत्तर प्रदेश में समाजवादी को राज रहा सभी जानते हैं कि मुलायम सिंह से लेकर अखिलेश यादव तक सभी ने सत्ता का जी-भरकर दुरूपयोग किया। हिन्दू अपने त्यौहार उस उत्साह से मना सकते थे जितनी उत्साह से आज मनाता। शुक्रवार को होली पड़ने पर मुस्लिम क्षेत्रों में रहने वाले हिन्दुओं को सुबह 11 बजे के बाद रंग खेलने की इजाजत नहीं होती थी। 84 कोसी यात्रा पर अंकुश था। मुज़फ्फरनगर में मुस्लिम उपद्रवी हिन्दुओं पर अत्याचार हो रहे थे लेकिन पार्टी सैफई में मौज-मस्ती में मस्त थी। पुलिस आज़म खान की भैंस को ढूंढने में लग जाती थी।   

पीलीभीत नगरपालिका परिषद ने अपने परिसर से सपा कार्यालय के बेदखली आदेश पर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी।

बार एंड बेंच की रिपोर्ट के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट पीलीभीत नगर पालिका परिषद के बेदखली के आदेश पर सुनवाई कर रही थी। जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जयमाल्य बागची की पीठ इस मामले पर सुनवाई कर रही थी। समाजवादी पार्टी की ओर से इस मामले पर सीनियर एडवोकेट सिद्धार्थ दवे ने अपना पक्ष रखा था।

दवे ने अपनी दलील में कहा था कि कार्यालय का किराया चुकाने के बाद भी नगरपालिका उसे बेदखल करना चाहती है। बेदखली के आदेश को रोकने के लिए याचिका भी डाली गई थी।

पीठ ने वकील से पूछा, “आपने परिसर कैसे लिया था?” इस पर वकील दवे की ओर से नगरपालिका की ओर से ‘आवंटित’ किए जाने की बात कही गई। इस पर पीठ ने कहा, “क्या आपने कभी नगरपालिका क्षेत्र में 115 रुपए पर कार्यालय की जगह के बारे में सुना है? यह सत्ता के दुरुपयोग को साफ तौर पर दिखलाता है।”

इसके बाद दवे ने दलील दी कि नगरपालिका अधिकारी इस तरह से हमारे परिसर पर ताला नहीं लगा सकते। उनकी दलीलों पर सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहा, “आप एक राजनीतिक पार्टी हैं। एक जगह पर कब्जा करने के लिए अपने पद और राजनीतिक शक्ति का दुरुपयोग किया। उस दौरान आपको प्रक्रिया नहीं याद रही। जब कार्रवाई होती है तो आपको सब कुछ याद आने लगता है।”

इसके बाद पार्टी के वकील ने 6 हफ्ते के लिए बेदखली रोकने की माँग कर डाली। इस पर पीठ ने कहा,” ये फर्जी आवंटन नहीं बल्कि फर्जी कब्जा है। आप एक धोखाधड़ी वाले कब्जे हैं।” इसके साथ ही कोर्ट ने सपा को सिविल कोर्ट जाने की हिदायत दी।

क्या है मामला

समाजवादी पार्टी में पीलीभीत नगर पालिका के अधिशासी अधिकारी कार्यालय की परिसर में 2005 में अपना कार्यालय बनाया था। उत्तर प्रदेश में सपा सरकार के दौरान उसे समय के अधिकारियों ने पार्टी को इस जगह को अस्थाई रूप से आमंत्रित भी कर दिया था। इसके बाद सपा नेताओं ने वहाँ पर जिला कार्यालय खोलकर निर्माण कर लिया।

इसके बाद 2018 से ही नगरपालिका इस जगह पर कब्जा हटवाने का प्रयास कर रही है। इसके खिलाफ सपा नेता स्थानीय कोर्ट और हाई कोर्ट तक जा चुके हैं। हाई कोर्ट ने 18 जून 2025 को नगर पालिका के पक्ष में अपना आदेश दिया। इसके बावजूद समाजवादी पार्टी ने अपना कब्जा नहीं हटाया।

इस साल कोर्ट की ओर से 10 जून 2025 को पार्टी को 17 जून तक कब्जा हटाने की नोटिस जारी की गई। 18 जून को जिला मजिस्ट्रेट विजय वर्धन तोमर कब्जा हटाने की कार्रवाई के लिए पहुँचे तो सपा नेताओं ने इसका विरोध कर सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने इस पर सुनवाई करते हुए अपनी टिप्पणी दी है।

उत्तर प्रदेश : समाजवादी पार्टी के कब्जे से छूटा पीलीभीत में कार्यालय, सरकारी बिल्डिंग में 20 साल से हो रहा पार्टी का कामकाज: योगी सरकार ने लगाया ताला, हंगामा कर रहे सपाई भेजे गए जेल


उत्तर प्रदेश के पीलभीत में समाजवादी पार्टी (सपा) का कार्यालय बंद कर दिया गया। बुधवार (18 जून 2025) सुबह प्रशासन और भारी पुलिस बल ने ऑफिस में ताला जड़ दिया है। असल में पीलीभीत में नगर पालिका ने सपा के कार्यालय को अवैध रूप से चलाए जाने का आरोप लगाया है और उसे खाली करने का आदेश जारी कर दिया है। इसकी वजह से सपा तिलमिला गई है। अब मामला अखिलेश यादव तक पहुंच गया है। कार्यालय की दीवारों पर लिखे स्लोगन को गाढ़े रंग से पोत दिया है। इस दौरान इलाके में 7 थानों की पुलिस समेत 200 सिपाही तैनात किए गए हैं।

सुबह 10 बजे पुलिस और प्रशासन ने यह कार्रवाई की। इस दौरान सपा कार्यकर्ताओं ने खूब हंगामा किया। सपा जिलाध्यक्ष जगदेव सिंह जग्गा समेत अन्य कार्यकर्ताओं की पुलिस से बहस भी हुई। इसके बाद पुलिस ने जिलाध्यक्ष सहित 15 कार्यकर्ताओं को हिरासत में लेकर पुलिस लाइन भिजवा दिया।

नगर पालिका ने 10 जून 2025 तक सपा कार्यालय खाली कराने का नोटिस दिया था। लेकिन कार्यकर्ताओं के हंगामें और अधिक समय के माँग के चलते इसे आगे टाल दिया गया। गौरतलब है कि यह कार्यालय 20 साल से नगर पालिका के अधिकारी के आवास पर यह कार्यालय चल रहा था।

पीलीभीत में सपा का कार्यालय अवैध!

जानकारी के मुताबिक समाजवादी पार्टी का यह कार्यालय नगर पालिका के अधिशासी अधिकारी (ईओ) के आवास में चलाया जा रहा था, जिसे खाली कराने की प्रक्रिया अब शुरू हो गई है। इस अभियान में नगर पालिका की पूरी टीम भी जुटी हुई है।

वैसे एसपी कार्यालय का यह विवाद नया नहीं है। वर्ष 2005 में नगर पालिका ने नकटा दाना चौराहे के पास अपने अधिशासी अधिकारी के आवास को 150 रुपये मासिक किराए पर एसपी कार्यालय के लिए आवंटित किया था। यह आवंटन उस समय के नियमों और प्रक्रियाओं के तहत किया गया था, लेकिन बाद में अनियमितताओं का हवाला देते हुए इसे रद्द कर दिया गया था। 12 नवंबर 2020 को नगर पालिका ने यह कहते हुए इस आवंटन को रद्द कर दिया कि यह प्रक्रिया तय नियमों के अनुरूप नहीं है।

इसके बाद सपा ने इस फैसले के खिलाफ कानूनी लड़ाई शुरू की। तत्कालीन सपा जिला अध्यक्ष आनंद सिंह यादव ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की, लेकिन 1 दिसंबर 2020 को उन्होंने खुद ही इसे वापस ले लिया। इसके बाद साल 2021 में सपा ने इस मामले को लेकर सिविल जज (सीनियर डिवीजन) की अदालत में केस दायर किया, जो अभी भी लंबित है।

सपा ने कार्रवाई को अलोकतांत्रिक बताया

सपा के लोकसभा प्रभारी वीरपाल सिंह पीलीभीत पहुंचे और पार्टी कार्यकर्ताओं के साथ पीडीए की बैठक की। उन्होंने कार्यालय खाली कराने की कार्रवाई को अलोकतांत्रिक बताते हुए कहा कि सपा इस मुद्दे पर दो स्तर पर लड़ाई लड़ेगी। एक कोर्ट में और दूसरा जनता के साथ सड़क पर।

सपा नेता ने चेतावनी दी कि यदि प्रशासन बल प्रयोग करेगा तो कार्यकर्ता कार्यालय के बाहर लेट जाएंगे। उन्होंने कहा कि पार्टी पिछले 25 साल से इसी स्थान पर है। यह मामला सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव के संज्ञान में है। पूर्व जिला अध्यक्ष आनंद सिंह का एक मामला कोर्ट में विचाराधीन है। इस संबंध में पूछे गए सवालों पर वीरपाल सिंह ने टिप्पणी करने से इनकार कर दिया।

नगर पालिका का नोटिस

नगर पालिका ने एसपी को 10 जून 2025 तक कार्यालय खाली करने का नोटिस जारी किया था। इस नोटिस में साफ कहा गया था कि एसपी कार्यालय अवैध रूप से चलाया जा रहा है और इसे तुरंत खाली किया जाए। हालांकि एसपी ने इस आदेश का पालन नहीं किया। इसके बाद नगर पालिका ने कड़ा रुख अपनाते हुए कार्रवाई करने का फैसला किया। इलाके के इस कार्यालय के बाहर सात थानों का पुलिस बल और 200 कांस्टेबल तैनात किए गए हैं।

उत्तर प्रदेश में बढ़ रहे ‘पगड़ी वाले ईसाई’, नेपाल से आकर पादरी करवा रहे धर्मांतरण: गाँवों में घरों पर लगे क्रॉस

                       क्रॉस का निशान, ईसाई धर्मांतरण से सिख संगठनों की बढ़ी चिंता (फोटो साभार: AAJ TAK)
उत्तर प्रदेश के पीलीभीत जिले में भारत-नेपाल सीमा से सटे सिख बहुल गाँवों में कथित तौर पर बड़े पैमाने पर धर्मांतरण का मामला सामने आया है। यह मुद्दा न केवल धार्मिक पहचान से जुड़ा है, बल्कि राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संचालित एक सुनियोजित साजिश की आशंका को भी जन्म देता है। ऑल इंडिया सिख पंजाबी वेलफेयर काउंसिल के अनुसार, बीते कुछ साल में 3,000 से ज्यादा सिखों का धर्मांतरण कर उन्हें ईसाई बनाया गया है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, पीलीभीत के हजारा थाना क्षेत्र के गाँवों – बैल्हा, टाटरगंज, बम्मनपुरा भगीरथ और सिंघाड़ा में सिख समुदाय की बड़ी आबादी निवास करती है। इन गाँवों में लगभग 20,000 से 30,000 सिख रहते हैं, जो मुख्य रूप से खेती और छोटे-मोटे व्यवसायों पर निर्भर हैं। स्थानीय लोगों और सिख संगठनों के अनुसार, 2020 से नेपाल सीमा से सटे इन क्षेत्रों में धर्मांतरण की गतिविधियाँ तेज हुई हैं। इन गतिविधियों का केंद्र नेपाल से आए प्रोटेस्टेंट पादरी और कुछ स्थानीय लोगों को बनाए गए पास्टर हैं, जो कथित तौर पर आर्थिक प्रलोभन, अंधविश्वास और रोग निवारण सभाओं के जरिए सिखों को ईसाई मजहब अपनाने के लिए प्रेरित कर रहे हैं।

मामले का खुलासा तब हुआ जब बैल्हा गाँव की एक सिख महिला मंजीत कौर ने 13 मई 2025 को पीलीभीत के हजारा थाने में शिकायत दर्ज कराई। मंजीत ने आरोप लगाया कि उसके पति को पहले ही बहला-फुसलाकर ईसाई बनाया जा चुका है, और अब उस पर और उसके बच्चों पर भी धर्म परिवर्तन का दबाव डाला जा रहा है। उसने बताया कि जब उसने धर्म परिवर्तन से इनकार किया, तो उसके खेतों को नुकसान पहुँचाया गया और बच्चों के साथ मारपीट की गई। मंजीत के अनुसार, आरोपितों ने सरकारी योजनाओं का लाभ और दो लाख रुपये का लालच दिया, लेकिन कोई वादा पूरा नहीं किया गया। इस शिकायत के आधार पर पुलिस ने आठ नामजद और दर्जनों अज्ञात लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया।

ऑल इंडिया सिख पंजाबी वेलफेयर काउंसिल के प्रदेश अध्यक्ष हरपाल सिंह जग्गी ने इस मामले को गंभीरता से उठाया। उन्होंने स्थानीय गुरुद्वारा श्री सिंह सभा में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर बताया कि पीलीभीत के सिख बहुल गाँवों में करीब 3,000 सिखों का धर्म परिवर्तन हो चुका है। उन्होंने जिला प्रशासन को 160 परिवारों की सूची सौंपी, जिनके धर्म परिवर्तन की पुष्टि हुई है। जग्गी ने आरोप लगाया कि नेपाल से आए पादरी और कुछ स्थानीय पास्टर गरीबी, अशिक्षा और अंधविश्वास का फायदा उठाकर सिखों को ईसाई बना रहे हैं।

उन्होंने यह भी दावा किया कि कुछ परिवारों के घरों पर क्रॉस के निशान बनाए गए हैं, जो धर्मांतरण का प्रतीक माने जा रहे हैं। हालाँकि, प्रशासनिक सख्ती के बाद कई परिवारों ने इन निशानों को हटा लिया है, लेकिन वे अब भी ईसाईयत का पालन कर रहे हैं। जग्गी ने कहा कि यह सिख समुदाय की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान पर हमला है और इसके पीछे विदेशी ताकतों का हाथ हो सकता है, जो नेपाल के रास्ते इस साजिश को अंजाम दे रही हैं। उन्होंने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, उपमुख्यमंत्री बृजेश पाठक और जिला प्रशासन से निष्पक्ष जाँच और सख्त कार्रवाई की माँग की।

आजतक की एक ग्राउंड रिपोर्ट ने इस मामले को और गहराई से उजागर किया। उनकी टीम ने बैल्हा गाँव का दौरा किया और स्थानीय लोगों, पीड़ितों और गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी से बातचीत की। इस रिपोर्ट में कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आए। स्थानीय लोगों ने बताया कि नेपाल से आने वाले पास्टर और पंजाब के कुछ मिशनरी लोग ‘चंगाई प्रार्थना सभाओं’ के जरिए सिखों को लुभा रहे हैं। ये सभाएँ बीमारी ठीक करने और आर्थिक मदद का वादा करती हैं, जिससे गरीब और अशिक्षित लोग आसानी से प्रभावित हो जाते हैं।

रिपोर्ट में एक पीड़ित परमिंदर सिंह ने बताया कि मिशनरी लोग बाहरी तौर पर यह नहीं दिखाते कि कोई धर्म परिवर्तन कर चुका है। वे सिखों को उनकी पारंपरिक वेशभूषा और नाम बरकरार रखने की सलाह देते हैं, ताकि धर्मांतरण का पता न चले। फिर भी कई लोग ‘उपचार सत्रों’ और आर्थिक लालच के कारण ईसाईयत की ओर झुक रहे हैं। हालाँकि लखविंदर सिंह और बलजीत सिंह जैसे लोग धर्म परिवर्तन के बाद ‘घर वापसी’ कर सिख धर्म में लौट आए हैं। लखविंदर ने बताया कि उनके बेटे की बीमारी ठीक न होने पर वे प्रार्थना सभाओं में गए, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ, जिसके बाद उन्होंने सिख धर्म में वापसी की।

गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी ने बताया कि अब तक 160 परिवारों की ‘घर वापसी’ कराई जा चुकी है। इसके लिए कमेटी ने ‘अमृतपान’ जैसे धार्मिक कार्यक्रम शुरू किए हैं। साथ ही नौ ऐसे लोगों की सूची सार्वजनिक की गई है, जो सिख से ईसाई बनकर अब दूसरों को धर्म परिवर्तन के लिए प्रेरित कर रहे हैं। इन लोगों का सामाजिक बहिष्कार करने के लिए गुरुद्वारे में उनकी सूची लगाई गई है।

पीलीभीत की भौगोलिक स्थिति इस मामले को और जटिल बनाती है। नेपाल सीमा से सटा होने के कारण यह क्षेत्र लंबे समय से सीमापार गतिविधियों का केंद्र रहा है। जाँच एजेंसियों को शक है कि नेपाल से संचालित कुछ एनजीओ और मिशनरी संगठन धर्मांतरण की गतिविधियों में लिप्त हैं। हरपाल सिंह जग्गी ने दावा किया कि 2012 से नेपाल के पादरी इस क्षेत्र में सक्रिय हैं और विदेशी ताकतों के इशारे पर सिखों को निशाना बनाया जा रहा है। उनका कहना है कि यह केवल धार्मिक मामला नहीं, बल्कि देश की आंतरिक सुरक्षा से जुड़ा मुद्दा है।

स्थानीय सिख नेताओं ने शिक्षा की कमी और गरीबी को धर्मांतरण का प्रमुख कारण बताया। उनका कहना है कि आर्थिक रूप से कमजोर और सामाजिक रूप से हाशिए पर रहने वाले लोग आसानी से प्रलोभनों का शिकार हो जाते हैं। कई पीड़ितों ने शपथपत्र देकर बताया कि उन्हें दो लाख रुपये, आवास, शौचालय और अन्य सरकारी योजनाओं का लालच दिया गया, लेकिन बाद में कोई लाभ नहीं मिला।

पीलीभीत प्रशासन ने इस मामले को गंभीरता से लिया है। डीएम संजय कुमार सिंह ने बताया कि एक विशेष जाँच टीम (SIT) गठित की गई है, जो मामले की तह तक जाएगी। एसपी अभिषेक यादव ने कहा कि मंजीत कौर की शिकायत पर आठ नामजद और दर्जनों अज्ञात लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया है। साथ ही एक अवैध चर्च को भी हटाया गया है। प्रशासन ने उन गाँवों में काउंसलिंग कैंप शुरू किए हैं, जहाँ धर्मांतरण की शिकायतें मिली हैं।

हालाँकि, पूरनपुर तहसील के SDM अजीत प्रताप सिंह का कहना है कि बड़े पैमाने पर सुनियोजित धर्मांतरण का कोई ठोस सबूत नहीं मिला है। उनका कहना है कि कुछ लोग अपनी आस्था के कारण प्रार्थना सभाओं में जा रहे हैं, जिन्हें रोका नहीं जा सकता। हालाँकि लोगों के शपथपत्र और गुरुद्वारा कमेटी की सूची इस दावे को चुनौती देते हैं।

इस बीच, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इस मामले का संज्ञान लिया है और सभी सीमावर्ती जिलों में सतर्कता बढ़ाने के निर्देश दिए हैं। उन्होंने ‘उत्तर प्रदेश धर्म स्वतंत्रता कानून’ के तहत सख्त कार्रवाई का आदेश दिया है, जिसके तहत जबरन या प्रलोभन के जरिए धर्मांतरण पर रोक लगाई गई है।

सिख संगठनों का कहना है कि यह मामला उनकी धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान पर हमला है। वे माँग कर रहे हैं कि जिन लोगों ने खुद अपनी मर्जी से धर्मांतरण किया है, उन्हें अपने दस्तावेजों में धर्म बदलने की जानकारी दर्ज करानी चाहिए। साथ ही वे दोषियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई और उच्चस्तरीय जाँच की माँग कर रहे हैं। गुरुद्वारा कमेटियों ने ‘घर वापसी’ के लिए बड़े पैमाने पर धार्मिक जागरूकता अभियान शुरू किया है।

ऑपइंडिया ने अपनी रिपोर्ट्स में बताया था कि कैसे नेपाल से सटे सीमावर्ती जिलों में ईसाई मिशनरियाँ धर्मांतरण का जाल फैला रही हैं। नेपाल से सटे 7 सीमावर्ती जिलों में ईसाई धर्मांतरण के मामलों के मामलों पर कार्रवाई भी हो चुकी है। बीते साल यूपी से लोगों को नेपाल ले जाने का मामला सामने आया था, जिसमें हिंदू संगठनों ने आरोपित पादरियों को पकड़कर न सिर्फ पीटा था, बल्कि उनके चेहरों पर कालिख भी पोत दी थी। ईसाई मिशनरियों के अयोध्या तक फैले जाल पर भी हमने रिपोर्ट प्रकाशित की थी।

निकाह, तीन तलाक, हलाला, फिर निकाह, फिर से तीन तलाक… दहेज़ में कार नहीं मिलने पर ससुराल वालों ने नंगा कर के पीटा, नवजात बच्चा भी मर गया

                                                                                                       प्रतीकात्मक चित्र साभार: Bing AI
उत्तर प्रदेश के पीलीभीत जिले से तीन तलाक और हलाला का मामला सामने आया है। यहाँ लड़की के अब्बा ने आरोप लगाया है कि उनकी बेटी को ससुराल में नंगा कर के पीटा गया है। पीड़िता को दहेज़ के लिए भी शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना दी गई है। देखरेख के अभाव में पीड़िता के बच्चे की भी मौत हो गई। शनिवार (1 जून, 2024) को पुलिस ने महिला के शौहर सहित कुल 6 आरोपितों के खिलाफ FIR दर्ज कर ली है। मामले की जाँच की जा रही है।

यह मामला पीलीभीत जिले के थाना क्षेत्र पूरनपुर का है। शनिवार को यहाँ पीड़िता के अब्बा ने थाने में तहरीर दी है। तहरीर में उन्होंने बताया कि उनकी बेटी का निकाह 21 सितंबर, 2017 को खुर्शीद खाँ से हुआ था। निकाह में खुर्शीद को दहेज़ में बाइक और अन्य घरेलू सामान दिए गए थे। निकाह के कुछ दिनों बाद ही दुल्हन पर घर से 4 पहिया वाहन लाने का दबाव बनाया जाने लगा। कार के लिए पीड़िता को परेशान करने वालों में शौहर खुर्शीद के अलावा जेठ खुशनूद, ससुर फरमूद, ननद तरन्नुम और तबस्सुम के साथ नन्दोई मन्ना भी शामिल थे।

प्रताड़ना के इसी दौर में पीड़िता ने एक बच्चे को जन्म दिया। ससुराल में देखभाल न होने की वजह से बच्चा कुछ दिनों में बीमार हुआ और बाद में उसकी मौत हो गई। बीमार बच्चे के इलाज का भी खर्च लड़की के अब्बा ने उठाया। कुछ दिनों के बाद खुर्शीद ने पीड़िता को 3 तलाक दे कर घर से बेदखल कर दिया। पीड़िता की प्रताड़ना यहीं खत्म नहीं हुई। 3 तलाक देने के बाद उसके ससुराल वालों ने पीड़िता का किसी अज्ञात व्यक्ति से हलाला करवाया। हलाला के बाद पीड़िता से खुर्शीद ने फिर निकाह किया और दहेज़ के लिए प्रताड़ना देने लगा।

शिकायतकर्ता ने आगे बताया कि 27 मई 2024 को खुर्शीद, खुशनूद, फरमूद, तरन्नुम, तबस्सुम और मन्ना ने पीड़िता को नंगा कर के बेरहमी से पीटा। पीड़िता का गला दबा कर मार डालने की भी कोशिश की गई। जैसे-तैसे महिला ने अपने आप को बचाया। बाद में खुर्शीद ने एक बार फिर से पीड़िता को तीन तलाक दिया और पुराने कपड़े पहना कर घर से भगा दिया। इन दौरान सभी आरोपितों द्वारा पीड़िता को कहीं भी मुँह खोलने या शिकायत करने पर जान से मार डालने की भी धमकी दी।

अपनी शिकायत में पीड़िता के अब्बा ने सभी आरोपितों पर कड़ी कार्रवाई की माँग की है। इन तहरीर पर खुर्शीद, खुशनूद, फरमूद, तरन्नुम, तबस्सुम और मन्ना को नामजद करते हुए FIR दर्ज कर ली गई है। इन सभी पर IPC की धारा 498- A, 323 और 506 के साथ दहेज़ प्रतिषेध अधिनियम के सेक्शन 3/4 और ट्रिपल तलाक एक्ट के तहत कार्रवाई की गई है। ऑपइंडिया के पास FIR कॉपी मौजूद है। पुलिस मामले की जाँच कर रही है।