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जाते-जाते जेटली गिना गए नेहरू और अब्दुल्ला की करतूतें, लिखा- ‘यह नया भारत है, बदला हुआ भारत है’

Image result for arun jaitleyविचारों के प्रति प्रतिबद्ध, कानून के जानकार, हाजिरजवाब, दोस्तों के दोस्त… अरुण जेटली को आप जैसे चाहें याद कर सकते हैं। जेटली हर मसले का बारीक और विस्तृत विश्लेषण करने वाले नेताओं में से थे। किस विषय पर कब और कैसे अपनी बात रखनी है यह उनसे सीखा जा सकता है। यही कारण है कि उनका ब्लॉग भी काफी चर्चित रहा।
अपना आखिरी ब्लॉग में उन्होंने 6 अगस्त को लिखा था। इसमें संसद के सफल और ऐतिहासिक सत्र के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह को विशेष तौर पर धन्यवाद देते हुए उन्होंने अपनी बात शुरू की है। तीन तलाक और जम्मू-कश्मीर पर सरकार के फैसले की तारीफ करते हुए विस्तार से बताया है कि कैसे आर्टिकल 370 की वजह से चीजें बिगड़ी। कैसे नेहरू और शेख अब्दुल्ला के प्रयोगों की प्रयोगशाला बन गया जम्मू-कश्मीर।
ब्लॉग की शुरुआत करते हुए उन्होंने लिखा है, “संसद का वर्तमान सत्र सबसे अधिक सफल रहा है। इस सत्र में ऐतिहासिक बिल पारित किए गए हैं। ट्रिपल तलाक कानून, भारत के आतंकवाद विरोधी कानूनों को मजबूत करना और अनुच्छेद 370 पर निर्णय सभी अभूतपूर्व हैं। सरकार की नई कश्मीर नीति के समर्थन में जनता का मूड इतना मजबूत है कि कई विपक्षी दलों ने जनता की राय के आगे घुटने टेक दिए। राज्यसभा के लिए दो-तिहाई बहुमत से इस फैसले को मंजूरी देना किसी की भी कल्पना से परे है।”
फिर उन्होंने जम्मू-कश्मीर पर विफल प्रयासों का सिलसिलेवार तरीके से विवरण दिया है। उन्होंने लिखा है कि विभाजन के बाद पश्चिम पाकिस्तान से लाखों शरणार्थी भारत आए। पंडित नेहरू की सरकार ने उन्हें जम्मू-कश्मीर में बसने नहीं ​दिया। पंडित नेहरू ने शेख अब्दुल्ला पर भरोसा किया जिसने राज्य को अपने ‘पर्सनल किंगडम’ में बदल दिया।
उन्होंने लिखा है, “कश्मीर पर पंडित नेहरू ने हालात का आकलन करने में भारी भूल की थी। उन्होंने शेख मोहम्मद अब्दुल्ला पर भरोसा करके उन्हें राज्य की बागडोर सौंपने का फैसला किया। 1953 में उनका विश्वास शेख से उठ गया और उन्हें जेल में बंद कर दिया।”
जेटली ने फिर बताया है कि कैसे इंदिरा गाँधी और राजीव गाँधी ने कश्मीर में प्रयोग किए। उन्होंने बताया है कि बाद में शेख अब्दुल्ला को रिहा करने और बाहर से कॉन्ग्रेस का समर्थन सुनिश्चित कर इंदिरा गाँधी ने उनकी सरकार बनवाई। कुछ महीने के भीतर ही शेख अब्दुल्ला के सुर बदल गए और इंदिरा गाँधी को छले जाने का अहसास हो गया। 1987 में राजीव गाँधी ने एक बार फिर से नीतियों को बदला। शेख अब्दुल्ला के बेटे फारूख अब्दुल्ला की नेशनल कॉन्फ्रेंस के साथ मिलकर चुनाव लड़ा। चुनाव में धांधली हुई। कुछ उम्मीदवार जिन्हें जोड़-तोड़ कर हराया गया, वे बाद में अलगाववादी और आतंकवादी तक बन गए।
जेटली ने लिखा है, “जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देने की ऐतिहासिक भूल से देश को राजनीतिक कीमत चुकानी पड़ी। आज, जबकि इतिहास को नए सिरे से लिखा जा रहा है, उसने ये फैसला सुनाया है कि कश्मीर के बारे में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की दृष्टि सही थी और पंडित नेहरू जी के सपनों का समाधान विफल साबित हुआ है।”
उन्होंने लिखा है, “1989-90 तक हालात काबू से बाहर हो गए। अलगाववाद के साथ आतंकवाद की भावना जोर पकड़ने लगी। कश्मीरी पंडितों को वैसे अत्याचार बर्दाश्त करने पड़े, जैसे अत्याचार केवल नाजियों ने ही किए थे। पंडितों को घाटी से खदेड़ दिया गया।”
ब्लॉग में जेटली ने आगे बताया है कि अलगाववाद के जोर पकड़ने पर विभिन्न राजनीतिक दलों की अगुवाई वाली केन्द्र सरकार ने तीन नए प्रयास किए। अलगाववादियों के साथ बातचीत की कोशिश की, जो व्यर्थ साबित हुई। द्विपक्षीय मामले के रूप में पाक के साथ बातचीत की कोशिश की गई। जम्मू-कश्मीर की क्षेत्रीय पार्टियों पर भरोसा कर उन्हें सत्ता में बिठाया। लेकिन यह भी असफल रहा।
कॉन्ग्रेस के लिए जेटली ने लिखा है, “कॉन्ग्रेस पार्टी की विरासत ने इस समस्या का सृजन किया और उसे बढ़ाया। अब कॉन्ग्रेस के लोग व्यापक तौर पर सरकार के फैसले का समर्थन कर रहे हैं। नया भारत बदला हुआ भारत है। केवल कॉन्ग्रेस इसे महसूस नहीं करती है। कॉन्ग्रेस नेतृत्व पतन की ओर अग्रसर है।”

नरेंद्र मोदी : कभी अमेरिका ने वीजा देने से किया था मना ; और अब चमक रहे विश्व नेता के रूप में

Narendra Modi
आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
5 साल बाद देश में एक बार फिर लोकसभा चुनाव की सरगर्मियाँ दिन-प्रतिदिन तेजी पर हैं। अगले 2 महीने में पता चल जाएगा कि भारतवर्ष को नया प्रधानमंत्री मिलेगा या एक बार फिर नरेंद्र मोदी के हाथ में ही देश का नेतृत्व होगा। लेकिन विरोधियों द्वारा जिस भाषा का इस्तेमाल मोदी के लिए किया जा रहा है, राष्ट्र रक्षा के लिए उठाए जा कदमों के सबूत मांगे जा रहे हैं, मोदी को थाली में सजाकर सत्ता दे रहे हैं। इनके विरुद्ध यह भी विरोधियों द्वारा प्रचार कर जनता को भ्रमित किया जा रहा है कि "मोदी दोबारा आ गया तो देश में कभी चुनाव नहीं होंगें।" या वह दूसरे अर्थों में यह कहने का प्रयास कर रहे हैं कि जिस तरह अब तक जनता को पागल और मूर्ख बनाकर अपनी तिजोरियाँ भरते रहे, वह अवसर हाथ से निकलने को बेक़रार है।  
इस सन्दर्भ में फ्रांस ज्योतिष की भविष्यवाणी भी चरितार्थ होती दिख रही कि "2014 में एक अधेड़ उम्र का सख्त प्रशासक भारत का नेतृत्व करेगा, उसके विरोधी भी बहुत होंगे और चाहने वाले भी और वह 2025 तक राज्य कर, भारत को नयी ऊंचाइयों पर लेकर जाएगा...." 
नरेंद्र मोदी 2014 में भारत के प्रधानमंत्री बने। इससे पहले वो 2001 से 2014 तक 13 साल गुजरात के मुख्यमंत्री रहे। मोदी को सामने रखकर बीजेपी ने 2014 लोकसभा चुनाव जीता और बहुमत हासिल किया। भारतीय जनता पार्टी को पहली बार इतनी सीटें मिली और 30 साल बाद केंद्र में पूर्ण बहुमत वाली सरकार बनी।
मोदी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक रहे और 1987 में भाजपा से जुड़ गए। एक साल बाद उन्हें गुजरात का महासचिव बनाया गया। उन्होंने पार्टी को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 1995 के विधानसभा चुनावों में भाजपा की सफलता में भी मोदी की बड़ी भूमिका रही। 1995 में मोदी को नई दिल्ली में भाजपा के राष्ट्रीय संगठन का सचिव बनाया गया और तीन साल बाद उन्हें इसका महासचिव नियुक्त किया गया। वह तीन साल तक उस कार्यालय में रहे। फिर 2001 में एकाएक उन्हें मुख्यमंत्री बनाकर गुजरात भेज दिया गया।
2002 गुजरात दंगों ने बनाया मील का पत्थर 
इसके बाद मोदी का राजनीतिक करियर गहरे विवाद और उपलब्धियों का मिश्रण बना रहा। 2002 में गुजरात में हुए सांप्रदायिक दंगों के दौरान मुख्यमंत्री के रूप में उनकी भूमिका पर विशेष रूप से सवाल उठाया गया। इन दंगों को इन्होने राज्य की सीमित पुलिस के सहयोग से नियन्त्रित किया, जबकि केन्द्र एवं किसी भी पड़ोसी राज्य ने अतिरिक्त पुलिस सहायता से मना कर दिया था। इनके विरोधी आज तक उन दंगों को लेकर इन्हे मुस्लिम-विरोधी के नाम से कलंकित करते रहते हैं, परन्तु शान्तिप्रिय जनता के नायक बनकर जो ख्याति अर्जित की उसी ने इन्हे मील का पत्थर बना दिया। इनकी निर्भीकता और साहसिक निर्णयों का इनके कट्टर विरोधी तक लोहा मानते हैं। मेरे अनुमान से गुजरात दंगों के इतिहास के शायद यही एकमात्र ऐसा दंगा था, जो बहुत ही अल्प-समय में समाप्त हो गया था। 
लेकिन विरोधी अपने वोट बैंक के खातिर इन्हें कलंकित करने का कोई अवसर गँवाना नहीं चाहते थे। वार पर वार करते रहे, विरोधियों को नहीं मालूम की उनका हर वार उन्हें एक कठोर और कुशल प्रशासक बना रहा है। इनके विरोधियों ने अमेरिका को इन्हे वीजा न देने के लिए निरन्तर लिखते रहे। 2005 में अमेरिका ने उन्हें इस आधार पर राजनयिक वीजा जारी करने से मना कर दिया, और यूनाइटेड किंगडम ने भी 2002 में उनकी भूमिका की आलोचना की। लेकिन इस बीच वो लोकप्रियता की ऊंचाई चढ़ते रहे और राज्य में एक के बाद एक विधानसभा चुनाव जीतते रहे।
आज विश्व भारत की सुनता है 
जून 2013 में मोदी को 2014 के लोकसभा चुनाव के लिए भाजपा के अभियान का नेता चुना गया। कुछ समय बाद पार्टी ने उन्हें पीएम पद का उम्मीदवार भी घोषित कर दिया। 282 सीटों के साथ केंद्र में बीजेपी की सरकार बनी और पार्टी के साथ-साथ भारतीय राजनीति में भी मोदी की धमक बढ़ती चली गई।
मोदी का नाम आगे रख बीजेपी ने 2014 के बाद कई राज्यों के चुनाव भी जीते। वर्तमान में उन्हें भारतीय राजनीति का सबसे लोकप्रिय नेता कहा जा सकता है। देश के साथ-साथ विश्व पटल पर भी उनकी छवि एक बड़े राजनेता के रूप में उभरी है। कल तक जो देश भारत की समस्याओं को गम्भीरता से नहीं लेते थे, आज विश्व भारत की बात सुनता ही नहीं अपितु उस समस्या के निवारण के लिए भारत के साथ खड़ा हो रहा है। क्योकि तत्कालीन सरकारें इस्लामिक आतंकवाद को छुपाने के लिए "हिन्दू आतंकवाद" और "भगवा आतंकवाद" नाम देकर हिन्दू समाज को कलंकित किया जाता रहा, ऐसे वातावरण में कौन भारत की समस्या को सुनेगा। समस्या चाहे आतंकवाद की हो या कोई अन्य, भारत को सहयोग देने में संकोच नहीं करते। 
वोटबैंक पर प्रहार 
यह मोदी का ही देशप्रेम था की विश्व पटल पर आतंकवाद को उछाल विश्व को आतंकवाद पर गंभीरता से लेने को मजबूर कर दिया। अपने वोटबैंक पर प्रहार होता देख, विपक्ष एकजुट होकर 2019 में उनके खिलाफ लोकसभा चुनाव में उतरने जा रहा है। मोदी के विरुद्ध गठबंधन करने वालों न देशहित की चिन्ता है और न जनहित की, विपरीत इसके अपने चरमराते अस्तित्व और बैंड होते काले धन्धों की। इन लोगों ने तुष्टिकरण के पुजारी बन भारतीय इतिहास, भारतीय संस्कृति और हिन्दुओं को कलंकित करते रहे। इन्हे और जयचन्दों को डर है अपनी जन और देश विरोधी हरकतों के उजागर होने का। वहीं भाजपा एक बार फिर उन्हीं के नाम पर चुनाव में उतर रही है और देश की जनता के सामने उनकी मजबूत छवि पेश कर रही है। मोदी की वजह से बीजेपी का विश्वास इतना ऊंचा है कि वो इस बार 2014 से भी बड़ी जीत का दावा कर रही है।

पीएम मोदी ने कहा- कश्मीर बने अलग देश, ये कहने की हिम्मत कैसे हुई

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नेशनल कान्फ्रेंस के नेता उमर अब्दुल्ला पर कश्मीर के लिए अलग प्रधानमंत्री की कथित रूप से वकालत करने वाली उनकी टिप्पणी को लेकर सोमवार को निशाना साधा और कांग्रेस और महागठबंधन की पार्टियों के नेताओं से कहा कि वे इस पर अपना रुख स्पष्ट करें. मोदी ने यहां एक चुनावी रैली को संबोधित करते हुए कहा कि मीडिया में ऐसी खबरें हैं कि अब्दुल्ला ने कहा है कि कश्मीर के लिए एक अलग प्रधानमंत्री होना चाहिए. उन्होंने सवाल किया, ‘‘हिंदुस्तान के लिए दो प्रधानमंत्री? क्या आप इससे सहमत हैं? कांग्रेस को जवाब देना होगा और महागठबंधन के सभी सहयोगियों को जवाब देना होगा. 
क्या कारण हैं और उन्हें ऐसा कहने की हिम्मत कैसे हुई. ’’ मोदी ने कहा कि वह तृणमूल कांग्रेस प्रमुख एवं पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, पूर्व प्रधानमंत्री एच डी देवेगौड़ा, आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन चंद्रबाबू नायडू और राकांपा प्रमुख शरद पवार से भी पूछना चाहते हैं कि क्या वे उमर अब्दुल्ला के बयान से सहमत हैं. उन्होंने कहा, ‘‘मैं बंगाल दीदी पूछना चाहता हूं जो काफी शोर मचाती हैं, क्या आप इससे सहमत हैं?
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PM Modi in Telangana says "Congress ke ek bade sahyogi dal, National Conference ne bayan diya hai ki Kashmir mein alag PM hona chahiye. Congress ko jawab dena hoga. Kya karan hai ki unka saathi dal is prakar ki baat bolne ki himmat kar raha hai."
जनता को जवाब दीजिये.  यूटर्न (चंद्रबाबू) बाबू से जिनके साथ हाल में फारुक अब्दुल्ला ने आंध्र प्रदेश में प्रचार किया था.  क्या आप मानते हैं कि नायडू को वोट मिलने चाहिए?’’ मोदी ने कहा, ‘‘राकांपा के शरद पवार और पूर्व प्रधानमंत्री एच डी देवेगौड़ा जिनके पुत्र कर्नाटक के मुख्यमंत्री हैं, उन्हें भी जवाब देना चाहिए.
क्या आप उनके (महागठबंधन) साथ जाना चाहेंगे क्या उनसे अलग होंगे?’’ भाजपा नेताओं के अनुच्छेद 370 खत्म करने का पक्ष लेने की पृष्ठभूमि में अब्दुल्ला ने जम्मू कश्मीर में बरसों पहले अलग प्रधानमंत्री होने की बात का उल्लेख किया था. 
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राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने घाटी में एक जनसभा को संबोधित करते हुए कहा है कि कश्मीर भारत के साथ अपन.....

उमर अबदुल्ला ने का विवादित बयान, कहा- इंशाअल्लाह जम्मू-कश्मीर में हमारा अलग PM होगा
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री और नेशनल कॉन्फ्रेंस (NC) के उपाध्यक्ष उमर अब्दुल्ला ने चुनाव से पहले विवादित बयान दिया है.कश्मीर के बांदीपोरा में एक जनसभा को संबोधित करते हुए अब्दुल्ला ने कहा कि, 'आज हमारे ऊपर तरह-तरह के हमले हो रहे हैं और तरह-तरह की साजिशें रची जा रही हैं. जम्मू-कश्मीर की पहचान को मिटाने के लिए बड़ी- बड़ी ताकतें लगी हुई हैं.

'बाकी रियासत बिना शर्त के देश में मिले, पर हमने कहा कि हमारी अपनी पहचान होगी, अपना संविधान होगा. हमने उस वक्त अपने "सदर-ए-रियासत" और "वजीर-ए-आजम" भी रखा था, इंशाअल्लाह उसको भी हम वापस ले आएंगे.' 

प्रधानमंत्री मोदी 'अनपढ़ और जाहिल' : माजिद मेमन,राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) नेता

लोकसभा चुनाव की सरगर्मी बढ़ने के साथ-साथ नेताओं के बीच जुबानी जंग तेज होती जा रही है और वे अपनी आलोचना में प्रधानमंत्री पद की गरिमा का ख्याल भी नहीं रख रहे। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) नेता माजिद मेमन ने अप्रैल1 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल किया। उन्होंने प्रधानमंत्री को 'अनपढ़ और जाहिल' कहा। राजनीति में भाषा की मर्यादा कितने नीचे गिरती जा रही है मेनन का बयान उसे दर्शाने के लिए काफी है। मेमन ने कहा कि जनता सीधे प्रधानमंत्री का चुनाव नहीं करती।
इतने वरिष्ठ नेता होते हुए भी, माजिद यह भूल गए कि यूपीए के समय 2009 में डॉ मनमोहन सिंह, 2014 में भाजपा ने नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री मनोनीत कर चुनाव लड़ा था, और वर्तमान 2019 चुनाव भी मोदी को प्रधानमंत्री के ही नेतृत्व में मैदान में है। यानि जनता ही प्रधानमन्त्री चुन रही है।  
माजिद ने कहा, 'मुझे लगता है कि प्रधानमंत्री भी एक अनपढ़, जाहिल या रास्ते पर चलने वाले आदमी की तरह बात करते हैं। वो इतने बड़े पद पर बैठे हैं, उनका पद एक संवैधानिक पद है। उस संवैधानिक पद के लिए प्रधानमंत्री रास्ते में नहीं चुना जाता।' मेनन ने कहा कि यहां जनता प्रधानमंत्री का चुनाव नहीं करती बल्कि जनता द्वारा चुने गए सांसद प्रधानमंत्री का चुनाव करते हैं। इस बार भी सबसे बड़ा दल अपना प्रधानमंत्री चुनेगा। 
राजनीतिज्ञों से अच्छे आचरण की उम्मीद की जाती है। चाहे वह भाषा हो या उनका व्यवहार। जनता नेताओं को एक आदर्श व्यक्तित्व के रूप में देखती है और उनका अनुसरण करती है।लेकिन हाल के दिनों में विरोधी नेताओं पर हमला बोलते समय माननीय भाषा की गरिमा भूलते जा रहे हैं। उन्होंने आपत्तिजनक शब्दों का इस्तेमाल किया है। मेनन का बयान उन्हीं बयानों में से एक है। लोकसभा चुनावों की सरगर्मी तेज हो गई है, ऐसे में नेता एक-दूसरे पर तीखे हमले भी जारी रखेंगे लेकिन उन्हें भाषा की मर्यादा का ख्याल रखना चाहिए।
नेताओं के आपत्तिजनक बयान और आचरण का यह पहली घटना नहीं आई है। नेताओं के आचरण का एक भद्दा नमूना पिछले महीने उत्तर प्रदेश के संत कबीरनगर में देखने को मिला था जहां भाजपा सांसद और विधायक आपस में भिड़ गए। इस घटना का वीडियो सोशल मीडिया में वायरल हुआ। इस वीडियो में स्थानीय सांसद शरद त्रिपाठी विधायक राकेश सिंह बघेल को जूते से पीटते नजर आए थे। इसके बाद विधायक ने भी उन पर हमला किया। इस घटना को लेकर विपक्षी दलों ने भाजपा की आ

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Majeed Memon, NCP: Mujhe lagta hai ki Pradhan Mantri bhi ek anpadh, jahil ya raaste pe chalne wale aadmi ki tarah baat karte hain. Vo itne bade pad pe baithe hain, Unka pad ek sanvaidhanik pad hai, uss sanvaidhanik pad mein Pradhan Mantri raaste mein nahi chuna jata.
लगता है, नरेन्द्र मोदी ने गुजरात के मुख्यमंत्री रहते जिस तरह से गोधरा दंगों को काबू किया था, उसने इनके विरोधियों के सोंचने-समझने की बुद्धि ही भ्रष्ट कर दी। तब से लेकर अब तक जिसे देखो वही जो मन में आया मोदी को बक दिया। कभी "मौत का सौदागर", "खून का दलाल", "चौकीदार चोर", "चाय वाला", और पता नहीं क्या-क्या कहा, और अब "अनपढ़ जाहिल" बोल दिया। इन लोगों को नहीं मालूम कि इस तरह के कुतर्कों से मोदी को थाली में सजा कर सत्ता दे रहे हैं। 
कुछ नेता सुर्खियों में बने रहने के लिए विवादित बयान देते हैं। कुछ दिन पूर्व इटावा से भाजपा प्रत्याशी राम शंकर कठेरिया ने बसपा सुप्रीमो मायावती पर आपत्तिजनक बयान दिया। कठेरिया ने कहा कि बसपा जब शासन में थी तो उनके खिलाफ कई मुकदमें दर्ज कराए गए। लेकिन उनकी लड़ाई जारी रही और मायावती उन्हें जेल भेजने में नाकाम रहीं। केंद्र और प्रदेश में आज भाजपा की सरकार है। अगर किसी ने भाजपा पर उंगली उठाने की कोशिश की तो उसकी उंगली तोड़ दी जाएगी। 

चुनौतियों के चक्रव्यूह से जूझती कांग्रेस की आखिरी उम्मीद प्रियंका गांधी

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आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
प्रियंका वाड्रा जब छोटी थीं तो दादी इंदिरा की तरह राजनीति में आना चाहती थीं। लेकिन, समझ बढ़ी तो कहने लगीं कि राजनीति उनकी मूल जगह नहीं। पर, नियति देखिये कि यह उन्हें राजनीति में ही खींच लाई। 20 साल पहले से बेल्लारी रायबरेली से लेकर अमेठी तक मां और भाई का प्रचार-प्रबंधन संभालते-संभालते वह औपचारिक रूप से कांग्रेस की राष्ट्रीय महासचिव बना दी गईं और पूर्वी उत्तर प्रदेश की प्रभारी भी। उनके आने से लगा कि बेदम-बेजान और बिस्तर पर पड़ी कांग्रेस को थोड़ी प्राणवायु-सी मिल गई है।
लखनऊ में पांच घंटे के रोड शो से लेकर काशी तक जनसमूह का उमड़ना यह इशारा करता है कि चुनौतियों के चक्रव्यूह के बावजूद कांग्रेस की यह वीरांगना खाली हाथ नहीं लौटने वाली। उनके भाषणों में नयापन है और सियासी हथियारों में थोड़ी धार भी। कांग्रेसी उनमें इंदिरा की छवि देखते हैं। 
एक बार लालकृष्ण आडवाणी ने कहा था कि राजनीति में चेहरे इसलिए महत्वपूर्ण होते हैं क्योंकि उनसे विचार जुड़े होते हैं। प्रियंका के साथ भी खास परिवार और विचार जुड़ा हुआ है। पर, कड़वी राजनीतिक सच्चाई यह भी है कि प्रियंका के आगमन मात्र से कांग्रेस में कोई चमत्कार नहीं होने वाला। जिसे वह स्वयं भी कई बार कहा चुकी हैं कि "मै कोई चमत्कार नहीं कर सकती।" चुनावी महासमर की चुनौतियां बेहद कठिन हैं। जनता भी जीत के मुहाने पर खड़े दल के साथ ही नजर आती है।
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मोदी के सम्मोहन से निपटना कठिन काम 
यहां तो मुकाबिल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हैं, उनका विराट व्यक्तित्व है। शायद इसीलिए प्रियंका भाजपा को उतना नहीं कोसतीं, जितना कि प्रधानमंत्री और केंद्र सरकार की नीतियों को। उन्हें बखूबी मालूम है कि भाजपा के मजबूत संगठन से पार पाने से कहीं ज्यादा कठिन मोदी के सम्मोहन से निपटना है। उन्हें भविष्य की संभावनाओं को देखकर सपा-बसपा गठबंधन पर नरम होना था, सो हैं भी। शायद यही कारण है कि कांग्रेस के अस्तित्व को बनाए रखने के लिए उन क्षेत्रीय और अन्य छोटी पार्टियों से समझौते को मजबूर होना पड़ रहा है, जो यूपीए के कार्यकाल तक कांग्रेस के इशारे पर नाचा करती थीं। परन्तु बदलते परिवेश में आज वही पार्टियाँ कांग्रेस को आँख दिखा रही हैं, गठबंधन से बाहर कर रही हैं और जहाँ गठबंधन में शामिल भी किया गया है, पुरानी पार्टी होने के नाते उतनी सीटें देने को कोई तैयार नहीं। जिस तरह बुरे समय में साया भी साथ छोड़ देता है, उसी तरह कल तक सहयोगी रही पार्टियाँ भी कांग्रेस का साथ छोड़ रहे हैं।  
यह और बात है कि भीम आर्मी के मुखिया चंद्रशेखर से जब अचानक मिलने मेरठ पहुंचती हैं तो गैर-सियासी भेंट को बताने के बावजूद गठबंधन के खेमे को खूब मिर्च लगती है। चिढ़ी बसपा एलान कर देती है कि उत्तर प्रदेश के बाहर किसी भी राज्य में कांग्रेस के साथ गठबंधन नहीं करेंगे। शायद बसपा को यह डर है कि दलित-प्रेम दिखाकर प्रियंका कहीं उसका वोट न छीन लें। गठबंधन का आधार भी अनुसूचित जाति-जनजाति, मुस्लिम व यादव पर ही टिका है। इसमें तनिक भी टूट-फूट किसे बर्दाश्त। इसलिए, सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव भी नसीहत देने से नहीं हिचके। अभी कुछ समय पूर्व जब उत्तर प्रदेश में कांग्रेस और समाजवादी में हुए समझौते पर राहुल और अखिलेश दोनों ने ही कहा था, "अब ये साथ लम्बा चलेगा। कोई साइकिल और हाथ को एक-दूसरे से जुदा नहीं कर पाएगा।" लेकिन चार दिन की चाँदनी फिर वही अँधेरी रात।" 
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जनता को भ्रमित करता तथाकथित गठबन्धन। 
ये वही कांग्रेस पार्टी है, जो सपा और बसपा के घोटालों पर पर्दा डाले हुई थी, और आज वो ही कांग्रेस को आँख दिखा रहे हैं। बीती बात है, पर कांग्रेस का मूल जनाधार ब्राह्मण, दलित और मुस्लिम ही हुआ करते थे। इसे वापस हासिल करना पहाड़-सी चुनौती बेशक है, लेकिन प्रियंका बढ़ चली हैं। सुर्खियां भी बटोर रही हैं। उनका बढ़ता आकर्षण और अल्पसंख्यकों में बढ़ती पैठ ने गठबंधन की चिंता बढ़ाई है। जनता भी कांग्रेस के दिखावटी हिन्दू प्रेम को भी समझ चुकी है। इस्लामिक आतंकवादियों को बचाने के लिए हिन्दू धर्म को कलंकित करने का कांग्रेस नेतृत्व वाली यूपीए सरकार ने कोई मौका नहीं छोड़ा। 
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आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार औरंगजेब, अन्य मुगलों तथा मुस्लिम हमलावरों ने भारत में हिन्दुओं का नरसंहार किया, हिन्दू महिलाओं के साथ बल...
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अक्टूबर 13 को प्रणब मुखर्जी की किताब का विमोचन हुआ। उस किताब में प्रणब मुखर्जी ने यूपीए सरकार और उसकी कई नीतियों और फैसलों के बारे में जिक...
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अभी उनमें खांपों-जातियों में बंटे उप्र के जातीय परिदृश्य को बदल देने का माद्दा नहीं दिख रहा। पांच बरस पहले मोदी ने जातीय गोलबंदी तोड़ी थी तो अपने बूते सत्ता तक पहुंच गए थे। पर, अभी प्रियंका से ऐसे प्रदर्शन की उम्मीद ज्यादती होगी। यह जरूर संभव है कि कांग्रेस उत्तर प्रदेश में पहले के मुकाबले कुछ ज्यादा सीटें हासिल कर ले, लेकिन उसका सुखद कारण प्रत्याशी का निजी दम-खम ही बनेगा। रिकॉर्ड बताता है कि 2014 में पार्टी को सूबे से सात फीसद वोट मिले थे और अमेठी-रायबरेली की दो परंपरागत सीटें हासिल हुई थीं। वह भी तब, जबकि सपा-बसपा ने उनके खिलाफ प्रत्याशी नहीं उतारे थे। 2009 के नतीजे जरूर स्वर्णिम रहे थे। तब, पार्टी की झोली में करीब 18 फीसद वोट और 21 सीटें आई थीं।
यही प्रदर्शन दोहराने की तगड़ी चुनौती है। इसके लिए बोट-यात्रा कर चुकीं प्रियंका अब ट्रेन यात्रा की तैयारी में हैं। राम की शरण में हैं और रहीम की भी। नरम हिंदुत्व की पोटली भी करीने से संभाले हुए हैं। कांग्रेसी खेमे को यह डर जरूर रहेगा कि प्रियंका सिर्फ सियासी बुलबुला बनकर न रह जाएं क्योंकि 30 साल से सूबे में सत्ता से बाहर चल रही कांग्रेस में न कार्यकर्ता बचे हैं, न ही कैडर। कुछ भी हो, मगर राजनीति में कैडर के बिना चमत्कार तो नहीं हुआ करते।

'40 लोग CRPF के शहीद हो गए... उसका भी मुझे शक है' : पुलवामा हमले पर फारूक अब्दुल्ला

Related imageजम्‍मू एवं कश्‍मीर के पूर्व मुख्‍यमंत्री व नेशनल कांफ्रेंस के अध्यक्ष फारूक अब्दुल्ला अक्‍सर अपने विवादास्‍पद बयानों को लेकर सुर्खियों में रहते हैं। एक बार‍ फिर उन्‍होंने ऐसा ही बयान दिया है। उन्‍होंने पुलवामा आतंकी हमले और अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में भारत की उपलब्धि 'मिशन शक्ति' का उल्‍लेख करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली केंद्र सरकार पर निशाना साधा। नेकां नेता ने एंटी-सैटलाइट मिसाइल के विकास का श्रेय पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अगुवाई वाली पूर्ववर्ती यूपीए सरकार को दिया।
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पीएम मोदी पर निशाना साधते हुए फारूक अब्‍दुल्‍ला ने सवालिया लहजे में कहा, 'कितने सिपाही हिन्दुस्तान के नहीं शहीद हुए छत्तीसगढ़ में? क्या मोदी जी कभी वहां गए उनपे फूल चढ़ाने के लिए, उनके परिवारों से हमदर्दी जताने के लिए? या जितने सिपाह‍ियों की जान यहां गई, उनके लिए कुछ कहा। मगर वे 40 लोग CRPF के शहीद हो गए, उसका भी मुझे शक है...।'
फारूक अब्दुल्ला यहीं नहीं रुके, उन्होंने अंतरिक्ष के क्षेत्र में बड़ी कामयाबी हासिल करते हुए भारत द्वारा एंटी-सैटलाइट मिसाइल के सफल परीक्षण के वक्‍त को लेकर भी सवाल उठाया। उन्‍होंने कहा, 'वह मिसाइल जो सैटलाइट को मारने के लिए छोड़ा गया, उसे मनमोहन सिंह ने तैयार कराया था, लेकिन उन्‍होंने इसका ऐलान नहीं किया था...आज जब चुनाव है, यह दिखाने के लिए कि 'हनुमान जी तशरीफ लाए हैं' बस बटन को दबा दिया गया।'
उन्‍होंने इस दौरान 27 फरवरी को बडगाम के पास भारतीय वायुसेना के एमआई 17 हेलीकॉप्टर क्रैश होने का मसला भी उठाया, जिसमें 6 जवान शहीद हो गए। उन्‍होंने व्‍यंग्‍यात्‍मक लहजे में कहा, 'एक बटन गलत भी दब गया और हेलिकॉप्‍टर गिर, जिसमें हमारे 6 जवान शहीद हो गए और एक बेचारा आदमी जो नीचे गाना सुन रहा था, वह भी उसमें दब गया।'


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Farooq Abdullah, NC: Kitne sipahi Hindustan ke shaheed huye Chhattisgarh mein? Kya kabhi Modi ji vahan gaye unpe phool chadhane ke liye?........magar vo 40 log CRPF ke shaheed ho gaye, uska bhi mujhe shak hai.

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F Abdullah: Vo missile jo usne satellite ko maarne ke liye chhoda, vo Manmohan Singh ne taiyaar karaya tha...Aaj election tha,dikhane ke liye 'hanuman ji tashreef laye hain' usne button dabaya, 1 button galat dab gaya aur helicopter gir gaya, humare 6 jawan shaheed ho gaye
इस हादसे के सटीक कारणों का पता अब तक नहीं चल पाया है। भारतीय वायुसेना के हेल‍िकॉप्‍टर को अब तक इसका ब्लैक बॉक्स (फ्लाइट डाटा रिकॉर्डर) नहीं मिला है। एमआई 17 हेलिकॉप्‍टर अपने रूटीन मिशन पर था। इसने उसी वक्‍त उड़ान भरी थी, जब पाकिस्‍तानी एयरफोर्स ने भारतीय वायु क्षेत्र में घुसपैठ की कोशिश की थी। हालांकि भारतीय वायुसेना की मुस्‍तैदी से पाकिस्‍तान की यह कोशिश नाकाम हो गई।
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जम्मू कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री और पीडीपी प्रमुख महबूबा मुफ्ती ने एक बार फिर विवादित बयान दिया है। आर्टिकल 370 को ...

देश का कारोबारी GST से परेशान, ये टीशर्ट बेच रहे हैं, वाह क्या चौकीदार है : असदुद्दीन ओवैसी

ऑल इंडिया मजलिस ए इत्तेहादुल मुस्लिमीन के अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी पर जोरदार निशाना साधा है।
असदुद्दीन ओवैसी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर निशाना साधते हुए कहा कि हर कारोबारी जीएसटी पर परेशान है और ये टी शर्ट बेच रहे हैं। वाह क्या चौकीदार है। अपने इस बयान से ओवैसी ने बीजेपी के मैं भी चौकीदार कैंपेन पर भी निशाना साधा है।
ओवैसी ने कहा कि जेट एयरवेज डूब गई। ये चौकीदार स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के 1500 करोड़ रुपए उसको दे रहे हैं। मेक इन इंडिया के नाम पर हजारों फैक्ट्रियां आज देश में बंद हैं। क्या आप उनको लोन नहीं दे सकते।
ओवैसी ने एक जनसभा को संबोधित करते हुए कहा था कि जब पुलवामा हमला हुआ तब क्या प्रधानमंत्री मोदी और राजनाथ सिंह बीफ बिरयानी खाकर सो रहे थे। आप देख सकते हैं कि बालाकोट में 300 फोन थे। लेकिन पुलवामा में 50 किलो आरडीएक्स चला गया, आपने उसे क्यों नहीं देखा।

Asaduddin Owaisi: Har karobari GST pe pareshan hai aur yeh t-shirt baech rahe hain, Wah! kya Chowkidar hai. Jet Airways doob gayi,yeh chowkidar ₹1500 crore SBI ke de rahe hain usko. 'Make in India' ke naam par hazaron factories band hain,kya aap unko loan nahi de sakte? (25.03)
ओवैसी अबकी बार फिर हैदाराबाद लोकसभा सीट से चुनाव लड़ेंगी। वह लगातार तीन बार से हैदराबाद से सांसद है। ओवैसी के अलावा उनके भाई अकबरुद्दीन ओवैसी ने कहा था कि पीएम मोदी को अपने आधारकार्ड और पासपोर्ट में चौकीदार लिखना चाहिए। हमें पीएम चाहिए न कि चायवाला, पकौड़ेवाला।