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लंदन : जिहाद का ऐलान करने वाला निकला सरकारी डॉक्टर, चलाता है हिज़्ब उत-तहरीर: यहूदियों के नरसंहार का मनाया था जश्न

                                          जिहादी डॉक्टर वाहिद आसिफ शाइदा (फोटो साभार : डेली मेल)
इजरायल और हमास के युद्ध के बीच विभिन्न देशों में फिलिस्तीन और गाजा के समर्थन में प्रदर्शन हो रहे हैं। पिछले दिनों ब्रिटेन की राजधानी लंदन में फिलिस्तीन के समर्थन में न सिर्फ प्रदर्शन हुए बल्कि प्रदर्शनकारियों ने ‘जिहाद’ के नारे भी लगाए। इस मामले में डेली मेल ने एक ऐसे कट्टरपंथी मुस्लिम डॉक्टर के नाम का खुलासा किया है जिसने इजरायल विरोधी प्रदर्शन में जिहाद का आह्वान किया था। 

दरअसल, ब्रिटेन में हिज़्ब उत-तहरीर के प्रमुख के रूप में डॉ अब्दुल वाहिद शाइदा (Dr Wahid Asif Shaida) का नाम सामने आया है जिसने इस महीने की शुरुआत में हमास के बर्बर आतंकवादी हमलों में 1400 से अधिक इजरायलियों की मौत का जश्न मनाया था। इस प्रोटेस्ट में जिहाद का आह्वान करने वाले की पहचान डॉ. वाहिद आसिफ़ शैदा के रूप में हुई है जो एक पारिवारिक डॉक्टर के रूप में दो दशक से ज़्यादा समय से वहाँ रह रहा है। 

हालाँकि, डॉ के इस आतंकी चेहरे के बारे में उनके मरीजों को कोई खबर नहीं थी वे सभी डॉ वाहिद के दोहरे चरित्र से अनजान थे। जिहाद समर्थक एक एनएचएस डॉक्टर, जो दोहरी जिंदगी जी रहा है। वो प्रदर्शन के दौरान जिहाद की माँग करता है और दूसरी तरफ लोगों का इलाज करता है। उसके बारे में खुलासा होने के बाद लोग चिंता जता रहे हैं कि वो कैसे यहूदियों, समलैंगिकों और महिलाओं का इलाज करता होगा।

दरअसल, इंग्लैंड के नेशनल हेल्थ सर्विस में कार्यरत डॉ वाहिद को लेकर लोग चिंतित है कि किस तरह से जिहादी एनएचएस में एंट्री करने में कामयाब हो रहे हैं। जिहादी मानसिकता वाले लोग कैसे आम महिलाओं, समलैंगिकों और यहूदियों का इलाज करेंगे, क्योंकि वो इन्हें ‘खराब’ मानते हैं।

हैरानी की बात है कि डॉ वाहिद ब्रिटेन में हिज़्ब उत-तहरीर संगठन का प्रमुख है, जो जर्मनी सहित कई देशों में प्रतिबंधित इस्लामिक संगठन है। उसकी अगुवाई में हिज्ब ने हमास के उस आतंकी हमलों का जश्न इंग्लैंड में मनाया, जिसमें हमास ने इजरायल के अंदर घुसकर 1400 से अधिक यहूदी पुरुष, महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों की हत्या कर दी थी।

20 साल से ज्यादा समय से एनएचएस में कार्यरत

डेलीमेल की रिपोर्ट के मुताबिक, डॉ वाहिद आसिफ शाइदा जरनल फिजीशियन के तौर पर 20 साल से नेशनल हेल्थ सर्विस में काम कर रहा है। अभी तक उसके जिहादी मानसिकता का खुलासा नहीं हो पाया था, क्योंकि वो अधिकतक समय वाहिद आसिफ के नाम से ही प्रदर्शनों में शामिल होता था। उसके बारे में खुलासा होने के बाद लंदन के उपनगरीय इलाके हैरों में रहने वाले लोगों को विश्वास ही नहीं हुआ, क्योंकि उन्हें लगता था कि NHS जीपी एक मृदुभाषी व्यक्ति और काम से काम से काम रखने वाला इंसान है।
हिज़्ब उत-तहरीर ने पिछले वीकेंड पर उस समय लोगों में गुस्सा भर दिया, जब इस संगठन के लोगों ने लंदन में मिस्र और तुर्की दूतावासों के बाहर एक रैली के दौरान ‘जिहाद’ के नारे लगाए और इजरायल पर हमला करने के लिए ‘मुस्लिम सेनाओं’ की एकजुटता का आह्वान किया। इस रैली में फिलिस्तीन के लिए जिहाद के नारे लगाए गए और फिलिस्तीनियों को बचाने के लिए सबसे जिहाद में जुटने का आह्वान किया गया।
स्थानीय लोगों ने गृह सचिव सुएला ब्रैवनमैन का विरोध किया है, क्योंकि जिहादी मानसिकता का खुलासा होने के बावजूद न तो डॉ वाहिद को गिरफ्तार किया गया है और न ही उसके खिलाफ कोई कार्रवाई की गई है। सुरक्षा विभाग के प्रमुख सर मार्क रोवले ने कहा कि जिहाद का मतलब पवित्र युद्ध होता है, लेकिन उसके खिलाफ हिंसा का कोई ठोस सबूत नहीं मिला है।
हमास ने 7 अक्टूबर, 2023 की सुबह इजरायल में जल, थल और हवा के रास्ते हमला किया। हमास ने इजरायल पर हजारों रॉकेट छोड़े। इन हमलों में 1400 से अधिक लोगों की मौत हो गई, तो 3 हजार से अधिक लोग घायल हो गए।
इस हमले के दौरान हमास ने 225 से अधिक इजरायलियों को बंधक बना लिया और गाजा पट्टी लेकर गए। हालाँकि, इस हमले के बाद इजरायल ने हमास पर पलटवार किया है और इजरायल के हमलों में अब तक 7000 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है। इजरायल ने उत्तरी गाजा को खाली करने का अल्टीमेटम दिया है, और गाजा पर अभी भी हमला जारी है।

रूस-यूक्रेन के बाद अब ईरान-तालिबान में जंग? ‘जिहाद का आदेश मिलते ही ईरान पर कर लेंगे कब्ज़ा’

                                    नदी के पानी को लेकर तालिबान और ईरान में जंग (फाइल फोटो)
जहाँ एक तरफ दुनिया रूस और यूक्रेन के युद्ध से परेशान है, वहीं अब ईरान और तालिबान में भी संघर्ष शुरू हो गया है। दोनों अब इस बात को लेकर भी बहस कर रहे हैं कि सच्चा मुस्लिम कौन है। अब रविवार (28 मई, 2023) को तालिबान ने धमकी दी है कि वो 24 घंटे में ईरान पर कब्ज़ा कर लेगा। साथ ही तालिबान के कमांडर अब्दुल्ला हामिद खुरासानी ने एक वीडियो सन्देश जारी करते हुए दावा किया कि उसके लड़ाके ईरान के साथ उसी जोश से लड़ेंगे, जैसे अमेरिका से लड़े थे।

यदि तालिबान ईरान पर कब्ज़ा कर लेता है, उस स्थिति में पाकिस्तान की भी बहुत मुश्किलें बढ़ सकती है। पाकिस्तान पर भी संकट के बादल मंडराने लगेंगे। ईरान से पाकिस्तान पर आसानी से कब्ज़ा किया जा सकता है। सम्भावना यह भी व्यक्त की जा रही है, महंगाई और विदेशी कर्ज से परेशान पाकिस्तानी तालिबान से हाथ मिलाकर अपनी ही सरकार के विरुद्ध लड़ सकते हैं। 

साथ ही उसने कहा कि जैसे ही जिहाद के लिए हरी झंडी तालिबान के शीर्ष नेतृत्व की तरफ से मिलती है, वैसे ही ईरान पर कब्ज़ा करने की शुरुआत कर दी जाएगी। तालिबानियों ने ईरान के राष्ट्रपति इब्राहिम रईसी पर तंज कसते हुए भी वीडियो डाला है। इसमें एक तालिबानी कंटेनर में पानी डालता है और कहता है, “इब्राहिम रईसी, आकर ये वॉटर बैरल ले लो, लेकिन हमला मत करो। हम डर गए हैं।” ईरान की मीडिया ने संघर्ष का कारण नहीं बताया है, बस इतना कहा है कि ये ड्रग तस्करी को लेकर है।

ये भी दावा किया जा रहा है कि पहले तालिबान ने ईरान की फ़ौज पर सीमा पर गोलीबारी की। वहीं तालिबान की तरफ से इंगित किया गया है कि पानी को लेकर ये लड़ाई चल रही है। दोनों मुल्कों के बीच हेलमंद नदी बहती है, जिसे लेकर ईरान पहले ही अफगानिस्तान को चेतावनी दे चुका है। जब से तालिबान अफगानिस्तान की सत्ता में लौटा है, तब से ये तनाव बढ़ गया है। 1973 की एक संधि में तय हुआ था कि अफगानिस्तान को इस नदी की पानी का एक हिस्सा ईरान को देना होगा।

वहीं ईरान के गृह मंत्री ने कहा है कि तालिबान को पुख्ता जवाब दे दिया गया है और सीमा पर स्थिति नियंत्रण में है। ईरान सरकार ने कहा कि तालिबान की गोलीबारी में उसके दो फौजी मारे गए हैं। उन्होंने कहा कि अब सीमा पर शांति है, तालिबान ने भड़काऊ कार्रवाई की थी। ईरान की फ़ौज ने चेताया है कि अंतरराष्ट्रीय संधि का उल्लंघन करने पर तालिबान के खिलाफ ईरान अपना रुख बदल लेगा। बता दें कि अगस्त 2021 में तालिबान सत्ता में आया था।

15-20 साल के भीतर भारत में मुस्लिम इंकलाब: कुरान को लेकर त्यागी बने रिजवी ने किया अलर्ट

वसीम रिजवी उर्फ जितेंद्र नारायण त्यागी 
इस्लाम मजहब त्यागकर सनातन धर्म स्वीकार करने वाले सैयद वसीम रिजवी उर्फ जितेंद्र नारायण त्यागी ने कहा कि मदरसे बंद करने के उनकी बात पर ध्यान नहीं दिया गया तो और 15-20 सालों में देश में मुस्लिम इंकलाब आएगा और उन्हें एक और जमीन का टुकड़ा देना पड़ेगा। उन्होंने आरोप लगाया कि आज मदरसों में ISIS की विचारधारा पढ़ाई जा रही है और बच्चों को जेहाद के लिए ट्रेंड किया जा रहा है।

हिंदुस्तान टाइम्स को दिए साक्षात्कार में त्यागी ने कहा, “मदरसों में पहली पढ़ाई कुरान की होती है। मदरसों में कुरान पढ़ाया नहीं, समझाया जाता है। इसका परिणाम ये हो रहा है कि छोटे-छोटे बच्चे जहनी (दिमागी) तौर पर कट्टर होते जा रहे हैं। वक्त पड़ी तो वे बंदूक भी उठाएँगे।”

उन्होंने आगे कहा, “मदरसों में जो चीजें बच्चों को पढ़ाई जा रही हैं और इस कारण जो खून-खराबा और जिहाद हो रहा है, ये सब कुरान की देन है। कुरान में अल्लाह का स्पष्ट आदेश है कि जो अल्लाह में यकीन नहीं करता, मोहम्मद को रसूल नहीं मानता, अल्लाह की किताब पर भरोसा नहीं करता, उससे जिहाद करो।”

रिजवी ने कहा, “जो आतंकी किताब है उसे फॉलो करके पूरी दुनिया में आतंक मचा हुआ है और इन लोगों का जेहाद इसी पर कायम है। अल्लाह की तरफ से ये हमारी ड्यूटी है कि जो इस पर विश्वास ना करे, उससे मुस्लिम जिहाद करें। कुरान को हम डिफेम नहीं, इसको लेकर लोगों को अलर्ट कर रहे हैं।”

रिजवी ने बताया कि यही सोचकर वे कुरान की 26 आयतों को हटाने को लेकर सुप्रीम कोर्ट में गए थे, लेकिन वहाँ मामला खारिज कर उन पर जुर्माना लगा दिया गया। उन्होंने कहा, “सुप्रीम कोर्ट को मेरे प्वॉइंट पर नोटिस लेना चाहिए था। उनके आदेश से मैं संतुष्ट नहीं था। पचास हजार पेनाल्टी लगाई, मैंने जमा की। लेकिन ये थोड़े ना है कि मेरा दिल मुतमईन (संतुष्ट) हो गया इस ऑर्डर से। मेरे दिल के ऊपर ऑर्डर थोड़े ना कर सकते हो।”

रिज़वी उर्फ़ त्यागी की बातों पर यकीन करने के लिए निम्न लिंक के अलावा अनवर शेख की पुस्तकों को भी पढ़ना होगा। 

रिजवी ने बताया कि उनके सनातन धर्म अपनाने से पहले ये सवाल उठा था कि वे किस जाति में जाएँगे, तब डासना मंदिर के महंथ यति नरसिंहानंद के पिता ने उन्हें एडॉप्ट करते हुए त्यागी समाज में स्वीकार करने की बात कही थी। रिजवी ने कहा, “सनातनी बनने के लिए तो मैं किसी भी जाति में जाने के लिए तैयार था। अगर लोअर कास्ट भी मुझे एडॉप्ट करता तो मैं उसे स्वीकार कर लेता।”

हर मदरसे में आईएसआईएस की ट्रेनिंग हो रही है

उन्होंने आतंकवाद खत्म करने को अपना राजनीतिक एजेंडा बताया। रिजवी ने कहा, “मेरा पोलिटिकल एजेंडा यही है कि मुस्लिमों की ताकत को हिंदुस्तान में कम करना है, क्योंकि हर मस्जिद में, हर मदरसे में आईएसआईएस की ट्रेनिंग हो रही है। एक बहुत बड़ी साजिश हो रही है, जिसे सेक्युलर नहीं समझ पाएँगे।”

46 साल बाद इस्लाम छोड़ने के सवाल पर रिजवी ने कहा कि अगर राम मंदिर का मामला न आता तो शायद ये भी ना होता। उन्होंने यह भी कहा कि उन्होंने अपनी किताब में उन्होंने किसी की तौहीन नहीं की है। रिजवी ने कहा, “मोहम्मद को प्रोफेट कहकर हमारी सोच की तौहीन की जा रही है।”

साक्षात्कार में रिजवी ने कहा कि अगर राममंदिर का मुद्दा सामने नहीं आता तो वे शायद सनातनी भी नहीं बनते। उन्होंने कहा कि विवाद के बीच उन्होंने कुरान का अध्ययन किया और उसे समझने के बाद इस्लाम त्याग करने का विचार किया।

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Court Ruling: Some Ayats in the Quran cause Communal Riots | IndiaFacts
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Court Ruling: Some Ayats in the Quran cause Communal Riots | IndiaFacts

उन्होंने बताया कि मुस्लिम भी इस बात को मानते थे कि अयोध्या में अगर उनके पक्ष में फैसला आ जाता है, फिर में वहाँ स्थापित रामलला की प्रतिमा को नहीं हटाया जा सकता, क्योंकि इससे खून-खराबा हो जाता। रिजवी ने बताया कि बाबरी ढाँचा के मुद्दे को मुस्लिम इसलिए भी नहीं छोड़ना चाहते थे, क्योंकि इससे हिंदू उन मस्जिदों पर भी दावा करने लगते, जो हिंदू मंदिरों को तोड़कर बनाए गए हैं।

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‘जिहाद के लिए मरो तो 72 हूरें मिलेंगी’ – कहकर उकसाने वाले मुल्ला ने करवा रखा था अपना बीमा

                                     मुल्ला अख्तर मंसूर ने मरने से पहले कराया था जीवन बीमा
72 हूरों का सब्जबाग दिखाकर बेगुनाहों की जान लेने पर आमादा आतंकी क्या अपने मरने से पहले जीवन बीमा कराता होगा? इसका जवाब आतंकी पैदा करने वाले देश पाकिस्तान से ही आया है। जानकारी के मुताबिक एक तालिबानी आतंकवादी ने ‘जीवन बीमा पॉलिसी’ ले रखी थी। इन कट्टरपंथियों के कहने पर धर्मान्थ बेगुनाहों के खून की होली खेलने के चक्कर में मुठ्ठी भर पैसों के लालच में अपनी जान गंवा कर अपने ही परिवार को दूसरों के रहमोकरम पर छोड़ जाते हैं। 

जबकि सच्चाई यह है कि 72 हूरें तो तब मिलेंगीं, जब मरने के बाद स्थायी रूप से ऊपर ही रहना हो, लेकिन कट्टरपंथियों ने इतना डरा-धमका रखा है कि किसी की इनसे प्रश्न करने की हिम्मत ही नहीं होती। हकीकत यह है कि ऊपर कुछ नहीं है, आत्मा जाती है और कर्मानुसार चोला बदल कर वापस धरती पर आ जाती है। लेकिन इन कट्टरपंथियों की बात को अगर सच भी मान लिया, तो इसका मतलब तो यह हुआ कि जिहाद अथवा किसी प्रकार के दंगे में मरने वाला क्या मर कर ऊपर जाने वाला अय्याशी करेगा? माना जिहाद में मरने वाले को 72 हूरें मिल गयी, परन्तु मरने वाली को क्या 72 हूर(मर्द) मिलेंगे?    

इस आतंकी का नाम मुल्ला अख्तर मंसूर था और वह 2016 में अमेरिकी ड्रोन हमले में मारा जा चुका है। उसने पाकिस्तान में एक निजी कंपनी से ‘जीवन बीमा’ पॉलिसी खरीदी हुई थी। अफगान तालिबान प्रमुख मुल्ला अख्तर मंसूर ने यह बीमा फर्जी आईडी पर लिया था।

जीवन बीमा कराने का मामला उस समय प्रकाश में आया, जब उसके खिलाफ आतंकी फंडिंग केस में कराची में सुनवाई हो रही थी। मामले में बीमा कंपनी ने कराची की आतंक निरोधक अदालत को पूरी जानकारी दी। मंसूर के खिलाफ फेडरल इन्वेस्टीगेशन एजेंसी (एफआईडी) एक साल से जाँच कर रही है।

जाँच में यह जानकारी सामने आई है कि मंसूर आतंकवादी गतिविधियों को अंजाम देने के लिए फर्जी कागजातों से प्रॉपर्टी की खरीद-फरोख्त कराता था। उसने फर्जी आईडी पर कराची में दो लाख डालर की जमीन और घर खरीदे थे।

इसी खोजबीन में जानकारी मिली कि मुल्ला अख्तर मंसूर ने एक जीवन बीमा पॉलिसी खरीदी थी। उसने 21 अप्रैल 2016 में ड्रोन हमले में मारे जाने से पहले तीन लाख पाकिस्तानी रुपयों का भुगतान जीवन बीमा के लिए किया था।

जाँच एजेंसी ने इंश्योरेंस कंपनी से मंसूर के मूल भुगतान को अदालत में जमा कराए जाने के लिए कहा था। बीमा कंपनी ने तीन लाख पचास हजार रुपए का चेक अब अदालत में जमा किया है। अदालत ने इस रकम को सरकारी कोषागार में जमा कराने का निर्देश दिया है।

आतंकवाद निरोधक अदालत के जज ने 2 निजी बैंकों, एलाइड बैंक लिमिटेड और बैंक अल-फलाह से उन खातों के बारे में भी रिपोर्ट माँगी है, जिनमें अफगान तालिबान नेता और उसके सहयोगियों ने पैसे जमा किए थे। कोर्ट ने पैसे के लेन-देन का भी पूरा ब्‍यौरा माँगा है।

हैरानी की बात है कि नौजवानों को आतंकी बनाने के लिए जन्नत और 72 हूरों के सपने दिखाए जाते हैं। उन्हें मजहब के नाम पर गुमराह कर हाथ में बंदूक थमा दिए जाते हैं, फिदायीन बनने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है और यह आतंकवादी खुद के लिए पैसे का इंतजाम करते हैं। मुल्ला अख्तर मंसूर खुद के लिए जीवन बीमा पॉलिसी खरीद कर आतंकी हमलों को अंजाम दे रहा था। 

कश्मीर में सक्रिय आतंकी बेशक सबके सामने इस्लाम और कश्मीर की आजादी की बात करते हैं, लेकिन नए आतंकियों को पढ़ाया व सिखाया जाता है कि मरने के बाद उन्हें जन्नत में 72 हूरें मिलेंगी। यह इस्लामिक कट्टरपंथियों का ब्रेनवॉश करने का बहुत पॉपुलर तरीका है।

चाहे अलकायदा हो, जैश-ए-मोहम्मद, बोको हरम या हमास, सारे ही अपने लड़ाकों को बताते हैं कि अगर वे मज़हब की राह में अपनी जान देंगे तो उन्हें जन्नत नसीब होगी। जन्नत में भी उन्हें हमेशा युवा रहने वाली और गहरी काली आँखों वाली 72 हूरों के साथ कभी न खत्म होने वाले कथित आनंद के बारे में बताया जाता है।

‘इस्लाम शांति का धर्म नहीं है’: लेखक रॉबर्ट स्पेंसर

नूपुर शर्मा- रॉबर्ट स्पेंसर
नूपुर शर्मा का रॉबर्ट स्पेंसर के साथ इंटरव्यू
हाल ही में ऑपइंडिया ने जिहाद वॉच के संस्थापक और निदेशक रॉबर्ट स्पेंसर के साथ बातचीत की। स्पेन्सर इस्लामिक जिहाद को लेकर अपने अनुभवों और विचारों को साझा करते हुए अब तक 19 किताबें लिख चुके हैं। उनकी दो पुस्तकों को एफबीआई ने ट्रेनिंग मेटेरियल के रूप में सूचीबद्ध किया है।
पाकिस्तान सहित कई इस्लामिक देशों ने उनकी किताबों पर प्रतिबंध लगा दिया है। इस्लाम पर उनके विचारों के परिणामस्वरूप यूनाइटेड किंगडम में उनके प्रवेश पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया गया है। वह Stop Islamization of America ग्रुप के सह-संस्थापक भी हैं, जिसे American Freedom Defense Initiative के रूप में भी जाना जाता है।
फिलहाल वह संयुक्त राज्य अमेरिका में रह रहे हैं। ऑपइंडिया के संपादक नूपुर जे शर्मा से बात करते हुए, स्पेंसर ने कहा कि उनका परिवार ओटोमन साम्राज्य से है। उन्हें 1916 में वहाँ से निर्वासित कर दिया गया था, क्योंकि उन्होंने इस्लाम में धर्मांतरण से इनकार कर दिया था।
जब उन्होंने यह जानने की कोशिश की कि उनके दादा-दादी को अपनी जन्मभूमि क्यों छोड़नी पड़ी, तो उनके परिवार ने कोई संतोषजनक जवाब नहीं दिया, जिसकी वजह से उन्होंने इतिहास का गहन अध्ययन किया।
स्पेंसर और नूपुर ने कई बिंदुओं पर विस्तार से बात की। इस दौरान जो पहली बात सामने आई, वो यह था कि क्या इस्लाम शांति का धर्म है। इस पर रॉबर्ट स्पेंसर ने हँसते हुए कहा कि हर गलत धारणा का कोई न कोई स्रोत होता है। उन्होंने कहा कि SLM सलाम शब्द का मूल है जिसका अर्थ होता है शांति। इसी वजह से अधिकांश लोग सोचते हैं कि यह धर्म शांति को बढ़ावा देता है।
हालाँकि, SLM इस्लाम शब्द का भी मूल है, जिसका अर्थ है अधीन होना। कुरान कहता है कि आप केवल तभी शांति प्राप्त कर सकते हैं जब आप खुद को अल्लाह को सौंप देते हैं। समाज में सच्ची शांति केवल गैर-मुसलमानों को मुसलमानों को सौंपने से आती है। उन्होंने कहा कि शांति की परिभाषा जो अन्य धर्म सोचते हैं, वह इस्लाम से पूरी तरह से अलग है। अन्य धर्म जहाँ शांति को सह-अस्तित्व से जोड़ते हैं, वहीं इस्लाम का मानना है कि शांति केवल तभी संभव है जब इस्लाम पर विश्वास न करने वाले खुद को मुसलमानों के अधीन कर दे। इस तरह के विश्वास का मूल कारण कुरान में गैर-मुस्लिमों की जहालत है।
भारत में धर्मांतरण की समस्या 
मुसलमानों और ईसाइयों द्वारा भारत में धर्मांतरण की समस्या पर चर्चा करते हुए, स्पेन्सर ने कहा कि ईसाई और मुसलमान जिस तरह से उपदेश देते हैं, उसमें बहुत बड़ा अंतर है। उन्होंने कहा कि ईसाई आएँगे और आपको चर्च में बुलाने की कोशिश करेंगे ताकि वे आपको यीशु के बारे में बता सकें। यदि आप उनसे कहते हैं कि आपको इसमें कोई दिलचस्पी नहीं है, तो वे आपको छोड़ देंगे। वहीं दूसरी तरफ, यदि आप मुसलमानों से कहते हैं कि आप अल्लाह के बारे में जानने के लिए मस्जिद में नहीं जाएँगे, तो वे आपके घर को जला देंगे।
वामपंथी इस्लामी साठगांठ 
चर्चा के दौरान, लेफ्ट-इस्लामी साँठगाँठ के बारे में विस्तार से बात की गई थी। स्पेंसर ने कहा कि हालाँकि वामपंथी इस बात से इनकार करते हैं कि वे सत्तावादी हैं, मगर दुनिया के हर हिस्से में जहाँ वो अभी तक सत्ता में हैं, वे लोगों को स्वतंत्र भाषण के अधिकार से वंचित करते हैं। उन्होंने कहा कि मार्क्सवादी, इस्लाम का समर्थन करते हैं, जबकि उनके बीच कोई अनुकूलता नहीं है, क्योंकि दोनों सत्तावादी हैं और वे अपने तरीके से एक नया आदेश स्थापित करने की कोशिश करते हैं।
इस्लाम को नियंत्रित करने की राज्य की ज़िम्मेदारी 
स्पेंसर ने जोर देकर कहा कि वह यह नहीं मानते हैं कि राज्य को देश के धर्म को परिभाषित करना चाहिए। उन्होंने कहा कि अगर संविधान सभी धर्मों को अनुमति देता है, तो समस्या तब पैदा होती है जब इस्लामवादियों जैसे सत्तावादी राज्य में वो अपने धर्म को स्थापित करने की कोशिश करते हैं। वे सभी अधिकारों का उपयोग करेंगे, लेकिन जैसे ही उन्हें मौका मिलेगा, वे देश में धार्मिक कानून स्थापित करेंगे। उनके मुताबिक भारत तभी इस्लामिक देश बनने से बच सकता है, जब हिंदू अपने धर्म में आस्था बनाए रखने के साथ ही इसे बचाने की इच्छा जागृत रखे।(साभार)
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आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार नॉर्थ-ईस्ट दिल्ली में इस साल फरवरी में भड़के हिन्दू विरोधी दंगों के मुख्य आरोपित ताह.....

आर्टिकल 370 : कोई विरोध नहीं, कुछ भी नहीं, बस जिहाद: ब्रिटिश मुस्लिम ‘सुंदरी’ सुमैरा फारुख

सुमैरा फारूख
सुमैरा फारूख (फोटो साभार: Daily Mail)
कभी ब्रिटिश मुस्लिम ऑफ द ईयर अवॉर्ड के लिए नामांकित होने वाली सुमैरा फारुख के खिलाफ पुलिस ने जाँच शुरू कर दिया है। दरअसल, सुमैरा ने जम्मू कश्मीर से आर्टिकल 370 के निरस्त होने के बाद पिछले महीने बर्मिंघम में विरोध रैली का आयोजन किया था। इसमें सैकड़ों की संख्या में लोग शामिल हुए थे, जो कश्मीर से 370 निरस्त होने का विरोध कर रहे थे। इस दौरान सुमैरा खान ने लोगों को संबोधित करते हुए बयान दिया था कि ‘जिहाद ही इसका एकमात्र उपाय है।’ बता दें कि वह 2017 में ब्रिटिश मुस्लिम ऑफ द ईयर अवार्ड्स में ‘बिज़नेसवुमन ऑफ़ द ईयर’ कैटेगरी में हारने वाली फाइनलिस्ट थीं।
सुमैरा फारुख, जो पहले प्रिंस चार्ल्स के साथ फोटो खिंचवा चुकी हैं, ने सैकड़ों लोगों की भीड़ से कहा कि कश्मीर से कर्फ्यू हटाने के लिए आज एक सिर्फ एक ही नारा है। उन्होंने कहा कि मुस्लिम समुदाय को एक बात सच-सच बताना है कि इसका केवल एक ही समाधान है, और वो है जिहाद। कोई विरोध नहीं, कुछ भी नहीं, बस जिहाद।
सुमैरा फारूख, एक बिजनेसवुमैन होने के साथ ही एक पत्रकार भी हैं। उन्होंने भारतीय संघ के साथ जम्मू और कश्मीर को पूरी तरह से एकीकृत करने के भारत के फैसले के खिलाफ कार्रवाई की माँग की थी। ठीक 24 घंटे पहले, वहाँ के उप नेता टॉम वाटसन, जैक ड्रोमी और लियाम बायरन समेत शीर्ष श्रम सांसदों के एक मेजबान ने उसी स्थान पर एकसमान विरोध में भाषण दिए थे।
अपने ऊपर लगे आरोपों पर बचाव करते हुए समैरा फारुख ने हिंसा भड़काने से इनकार किया और दावा किया कि उन्हें इसलिए निशाना बनाया जा रहा है क्योंकि वह एक मुखर महिला हैं। अपनी टिप्पणियों के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने कहा, “जिहाद का कोई विशेष अर्थ नहीं है। यदि आपको यूके की सरकार के साथ कोई समस्या है और आप अपनी आवाज उठाना चाहते हैं, तो इस्लाम के अर्थ में संघर्ष को जिहाद कहा जाता है। मुसलमान उस संदर्भ में शब्द का अर्थ जानते हैं। क्या आपको लगता है कि मैं ऐसी इंसान हूँ, जो उस शब्द का उपयोग लोगों को लड़ने के लिए प्रोत्साहित करने के लिए करूँगी? मैं समुदायों और ब्रिटिश सेना के साथ काम करती हूँ, जो एशियाई समुदाय को सेना में शामिल होने के लिए प्रोत्साहित करता है। मैं हिंसा को कैसे प्रोत्साहित कर सकती हूँ?”
वहीं, जब सुमैरा फारूख से पूछा गया कि उन्होंने जिस शब्द का इस्तेमाल किया है, क्या उन्हें करना चाहिए था, तो उन्होंने इसके जवाब में कहा, “जो लोग मेरी आलोचना कर रहे हैं, वे वही हैं जो नहीं चाहते हैं कि एक महिला बोले। वहाँ लोग कह रहे हैं कि हम बंदूकों के साथ आज़ादी पाने जा रहे हैं। लोग बुरे शब्दों का उच्चारण कर रहे हैं, कह रहे हैं बाहर आओ और लड़ो, लेकिन वे जाँच नहीं करते हैं। लोग हमेशा मुझ पर हमला करते हैं क्योंकि मैं एक मुखर महिला हूँ।”
पुलिस ने इस बात की पुष्टि की है कि वे इस मामले की जाँच कर रहे हैं। वेस्ट मिडलैंड्स पुलिस के एक प्रवक्ता ने कहा, “हम यह देखने के लिए उपलब्ध कॉन्टेंट का आकलन कर रहे हैं कि क्या कोई अपराध किया गया है।”