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दिल्ली में लगे पोस्टर में आतंकी यासीन मलिक के साथ पूर्व PM मनमोहन सिंह… अपील- कांग्रेस को करें वोट: पुलिस ने उतारे

                                                                                                          साभार: Cityairnews & ANI
नई दिल्ली में आतंकी यासीन मलिक की रिहाई के लिए कांग्रेस को वोट देने की अपील करने वाले पोस्टर सामने आए हैं। इन पोस्टर पर आतंकी यासीन मलिक की पूर्व पीएम मनमोहन सिंह के साथ वाली तस्वीर लगाई गई है। दिल्ली पुलिस ने इन पोस्टर को हटा दिया है। मोहब्बत की दुकान चलाने वाले पहले X-Ray करने की बात करते हैं, फिर 'टुकड़े-टुकड़े गैंग' को दिल्ली से उम्मीदवार और अब आतंकियों की रिहाई के नाम पर वोट मांगकर क्या दोबारा देश को बारूद के ढेर पर लाने की तैयारी कर रहे हैं? क्या कांग्रेस इतनी नीचे गिर सकती हैं? चुनाव आयोग को इसका स्वयं संज्ञान लेकर कार्यवाही करनी चाहिए। 

जानकारी के अनुसार, दिल्ली के मंडी हाउस चौक के पास यह पोस्टर मंगलवार (30 अप्रैल, 2024) को सामने आए हैं। इनमें 25 मई को कॉन्ग्रेस को वोट देने की अपील की गई है। इसके साथ ही इनमें आतंकी यासीन मलिक के साथ पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की एक फोटो है।

इसके अलावा इनमें नीचे लिखा हुआ है, “यासीन मलिक की रिहाई और बोलने की आजादी के लिए वोट करें।” इसके नीचे वॉईस फॉर डेमोक्रेसी नाम लिखा हुआ है। यह पोस्टर इस इलाके में खम्भों पर लगवाए गए थे। इनकी जानकारी मिलने पर दिल्ली पुलिस ने इन्हें यहाँ से उतरवा दिया।

यासीन मलिक के लिए कॉन्ग्रेस को वोट देने के पोस्टर किसने लगवाए, यह अभी सामने नहीं आया है। कॉन्ग्रेस के भी किसी पदाधिकारी ने इस सम्बन्ध में कोई पुष्टि नहीं की है। दिल्ली पुलिस ने भी पोस्टर लगाने वाली की जानकारी नहीं दी है। इसको लेकर सोशल मीडिया पर कॉन्ग्रेस पर हमला बोला जा रहा है।

यासीन मलिक जम्मू कश्मीर का एक आतंकी है जो कि वर्तमान में तिहाड़ जेल में बंद है। वह विंग कमांडर अधिकारी रवि खन्ना समेत कई अधिकारियों की हत्या के मामले में आरोपित है। उसके ऊपर टेरर फंडिंग का मामला भी चल रहा है।

यासीन मलिक जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट नामक संगठन चलाता था जिसे केंद्र सरकार ने प्रतिबंधित कर दिया था। यासीन मलिक 1990 के दशक में आतंक करने के बाद कार्रवाई से बचने के लिए गाँधीवादी होने का ढोंग करने लगा था और शांति की बातें बघारता था।

दिल्ली में सामने आए जिन पोस्टर में आतंकी यासीन मलिक पूर्व पीएम मनमोहन सिंह के साथ दिख रहा है, वह तस्वीर 2006 की हैं। 2006 में यासीन मलिक को कॉन्ग्रेस सरकार ने पीएम आवास बुलाया था। वह इस दौरान पीएम मनमोहन सिंह से मिलकर चर्चा कर रहा था। इस दौरान वह पीएम मनमोहन सिंह के साथ हाथ मिलाते भी दिखा था।

101 खास तोहफे अपने साथ ले गए थे मनमोहन सिंह : Bose साउंड सिस्टम से लेकर Piaget लेडीज वॉच तक

क्या आपको पता है कि 10 साल भारत के प्रधानमंत्री रहे डॉक्टर मनमोहन सिंह देश-विदेश से मिले कई तोहफे अपने साथ ले गए थे? आइए, आपको पूरा माजरा बताते हैं। मई 2014 में इस सम्बन्ध में एक RTI दायर की गई थी, जिसमें कहा गया था कि देश-विदेश से मिले जो तोहफे/पारितोषिक डॉक्टर मनमोहन सिंह अपने साथ ले गए, उसकी जानकारी दी जाए। साथ ही इस एक दशक में उनके द्वारा अर्जित की गई धनराशि (वेतन-भत्तों समेत) के सम्बन्ध में भी जानकारी माँगी गई थी।

प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) ने ‘सूचना के अधिकार’ के तहत दायर की गई RTI का जवाब देते हुए बताया था कि प्रधानमंत्री को केवल विदेशों से मिले तोहफों के बारे में ही जानकारी उपलब्ध है। साथ ही एक नियम का हवाला देते हुए बताया गया कि इन तोहफों के स्रोतों के नाम नहीं बताए जा सकते हैं, अर्थात ये किन देशों की सरकारों व हस्तियों से मिले। 30 जून, 2013 तक उन्हें विदेश से मिले गिफ्ट्स के सम्बन्ध में सूचनाएँ संकलित की गई थीं। इनमें जो प्रमुख हैं, उनके बारे में हम आपको बताते हैं।

फरवरी 2008 में उन्हें चाँदी से बनी नाव की एक प्रतिकृति मिली थी, जिसकी कीमत 8000 रुपए थी। 2008 के अगस्त और सितम्बर में मिली 5-5 हजार रुपए की कालीनें, जनवरी 2009 में मिली 9000 रुपए की एक कालीन, अगस्त 2009 5000 रुपए की एक क्लॉइजन चिलबो, सितम्बर 2009 में 4000 रुपए की एक पत्थर की आकृति, मई 2010 में 4000 रुपए की सुनहरे रंग की प्रतिमा, उसी महीने मिली 5000 रुपए के एक बगीचे और फूलों की तस्वीर और अप्रैल 2004 में चीनी-मिट्टी की वस्तुओं का 5000 रुपए का सेट शामिल है।

इन तोहफों में नवंबर 2012 में मिला एक कालीन भी शामिल है, जिसकी कीमत 30,000 रुपए थी। इसके अलावा जून 2011 में मिला 4000 रुपए का टी-सेट, मार्च 2012 में 5000 रुपए की माँ सरस्वती की तस्वीर, इसके अगले महीने मिला 5000 रुपए का सैमसंग का डिजिटल कैमरा, उसी साल जून में मिला 4500 रुपए का मोती का हार, इसके 3 महीने बाद मिला 4000 रुपए का फूलदान का जोड़ा और उसी महीने मिली इतने की ही एक कालीन, सितम्बर 2012 में मिला 4500 रुपए का एक डिनर सेट और जून 2013 में मिला 4800 रुपए का चीनी-मिट्टी का बना फूलदान का एक जोड़ा शामिल है।

जानकारी सामने आई थी कि बोस कंपनी के एक म्यूजिक सिस्टम से लेकर पागेट के एक लेडीज वॉच तक, डॉक्टर मनमोहन सिंह 101 खास विदेशी तोहफे अपने साथ ले गए। हालाँकि, इस सम्बन्ध में ज्यादा जानकारियाँ देने से PMO ने इनकार कर दिया था। बरेली के एक अधिवक्ता द्वारा दायर की गई RTI के जवाब में पता चला था कि ‘Foreign Contribution (Acceptance or Retention of Gifts or Presentations) Regulations 1978’ और ‘Foreign Contribution (Acceptance or Retention of Gifts or Presentations) Rules 2012’ के तहत उन्हें ये तोहफे अपने पास रखने की अनुमति है।

बोस का जो स्पीकर म्यूजिक साउंड सिस्टम प्रधानमंत्री रहते डॉक्टर मनमोहन सिंह को तोहफे में मिला था, उसकी कीमत 20,000 रुपए थी, जबकि पागेट लेडीज रिस्ट वॉच 35,000 रुपए का था। एक कालीन तो 30,000 रुपए का भी था। उन्हें मिले तोहफों की कीमत 300 रुपए से शुरू होक अधिकतम 35,000 रुपए थी। यूपीए के 10 वर्षों के दौरान जब कॉन्ग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी रिमोट कंट्रोल की सरकार चला रही थी, उस दौरान मनमोहन सिंह ही प्रधानमंत्री थे।

मालेगांव की हिंसा और कांग्रेस का काला चेहरा

अजय कुमार, उगता भारत 
इतना ही नहीं देश की राजनीति का रंग-ढंग भी बदल गया है। जो नेता पहले चुनाव नजदीक आते ही मौलानाओं और मुस्लिम धर्मगुरुओं की चौखट पर पहुंच जाया करते थे, इफ्तार पार्टियां देना जिनका अपना शगल था, वह अब सत्ता के लिए मंदिर-मंदिर चक्कर लगा रहे हैं।

2008 में महाराष्ट्र के मालेगांव में हुए बम विस्फोट का मामला एक बार फिर से सुर्खियां बटोर रहा है। वजह वही पुरानी है और निशाने पर एक बार फिर से कांग्रेस और उसके नेता हैं, जो करीब दो दशकों से देश में ‘हिन्दू आतंकवाद’ का नैरेटिव सेट करने में लगे हैं। कांग्रेस का दोहरा चरित्र ही है कि जब कोई इस्लाम से ताल्लुक रखने वाला आतंकवादी पकड़ा जाता है तो वह चीखने चिल्लाने लगती है कि आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता है, लेकिन इसके उलट देश पर कथित तौर पर हिन्दू आतंकवाद का ‘लेबल’ लगाने के लिए 2008 में हुए महाराष्ट्र के मालेगांव विस्फोट के असली गुनाहागारों को छोड़कर हिन्दू नेताओं और साधु-संतों को फंसाने के लिए उसकी तरफ से साजिश रची जाने लगती है।

इतना ही नहीं इस कृत्य को अमलीजामा पहनाने के लिए कई कांग्रेसी नेता नहीं तत्कालीन महाराष्ट्र और दिल्ली की मनमोहन सरकार ने भी अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी। इसी के बाद साध्वी प्रज्ञा ठाकुर, लेफ्टिनेंट कर्नल प्रसाद पुरोहित, सुधाकर द्विवेदी, मेजर रमेश उपाध्याय (सेवानिवृत्त), अजय रहीरकर, सुधाकर द्विवेदी, सुधाकर चतुर्वेदी और समीर कुलकर्णी आदि सभी को जेल भेज दिया गया था। आज की तारीख में यह सभी जमानत पर बाहर हैं। उस समय हालत यह थी कि इन्हें अपराध कबूलने के लिए बुरी तरह से टार्चर भी किया गया था। अब यह खुलासा हुआ है कि उस समय की कांग्रेस सरकारों ने तत्कालीन सांसद और मौजूदा मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के नेता इंद्रेश कुमार को भी विस्फोट कांड में आरोपी बनाने का षड्यंत्र रचा था। रिपोर्टों के मुताबिक मालेगांव विस्फोट कांड के समय कांग्रेस के नेता और मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह और उस समय के केन्द्रीय मंत्री पी. चिदंबरम कई पुलिस अधिकारियों और एटीएस के साथ मिलकर इस साजिश को अंजाम देने में लगे थे, इसमें काफी हद तक वह सफल भी हो गए थे, लेकिन समय बदला, सरकारें बदलीं और कांग्रेस की साजिश से पर्दा भी धीरे-धीरे हटने लगा है।
इतना ही नहीं देश की राजनीति का रंग-ढंग भी बदल गया है। जो नेता पहले चुनाव नजदीक आते ही मौलानाओं और मुस्लिम धर्मगुरुओं की चौखट पर पहुंच जाया करते थे, इफ्तार पार्टियां देना जिनका अपना शगल था, वह अब सत्ता के लिए मंदिर-मंदिर चक्कर लगा रहे हैं। माथे पर तिलक लगाए घूम रहे हैं। ऐसे समय में जब हिन्दुत्व की राजनीति चरम पर है तब मालेगांव विस्फोट कांड में हिन्दू नेताओं और धर्मगुरुओं के फंसाने की खबर का खुलासा होने के बाद कांग्रेस के लिए मुश्किलें बढ़ती दिख रही हैं लेकिन सबसे ज्यादा चिंता की बात यह है कि इस तरह के षड्यंत्र का पर्दाफाश होने के बाद वह बुद्धिजीवी चुप्पी साधे हुए हैं जो मुसलमानों के खिलाफ कथित उत्पीड़न के नाम पर हो-हल्ला मचाते रहते हैं। अब कोई पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी, राहुल गांधी, चिदंबरम, सलमान खुर्शीद, मणिशंकर अय्यर, शशि थरूर, ओवैसी, फिल्म अभिनेता नसीरूद्दीन शाह, आमिर खान, शाहरूख खान, सपा प्रमुख अखिलेश यादव, राजद के तेजस्वी यादव जैसे लोगों और नेताओं से यह कल्पना कैसे कर सकता है कि यदि यह प्रोपोगंडा करते मिल जाते हैं कि देश में मुसलमान डर हुआ है तो इस बात पर भी अपनी प्रतिक्रिया देंगे कि मालेगांव विस्फोट कांड में हिन्दू नेताओं को फंसाने की जो साजिश की गई थी, वह शर्मनाक थी।
दरअसल, मालेगांव विस्फोट कांड के एक गवाह के यह खुलासा करने के बाद राजनीतिक गलियारों में आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हुआ कि उसके ऊपर हिन्दू नेताओं का नाम लेने के लिए दबाव बनाया जा रहा था। आश्चर्य नहीं कि मुंबई के तत्कालीन आतंकवाद निरोधक दस्ते यानी एटीएस ने उसे योगी आदित्यनाथ और आरएसएस के चार नेताओं का नाम लेने के लिए मजबूर भी किया था और प्रताड़ित भी। तब इस एटीएस के अतिरिक्त आयुक्त थे परमबीर सिंह, जो इस समय कई गंभीर आरोपों से घिरे हुए हैं और फिलहाल निलंबित हैं। मालेगांव मामले के गवाह ने एटीएस पर जो सनसनीखेज आरोप लगाया, वह एनआईए की विशेष अदालत के समक्ष लगाया। यह पहली बार नहीं, जब इस तरह की बातें सामने आई हैं। इससे पहले भी मालेगांव मामले के अन्य गवाह इसी तरह के आरोप लगा चुके हैं। यह भी ध्यान रहे कि महाराष्ट्र में गुजरात पुलिस के हाथों एक मुठभेड़ में मारी गई लश्कर-ए-तैयबा की आतंकी इशरत जहां को किस प्रकार कांग्रेस और अन्य दलों के नेताओं द्वारा निर्दोष साबित करने की सियासी मुहिम चलाई गई थी। इसकी भी अनदेखी नहीं की जा सकती कि 2008 के मालेगांव कांड में हुई गिरफ्तारियों के बाद तुष्टिकरण की सियासत करने वालों द्वारा ही कथित तौर पर हिंदू आतंकवाद का जुमला उछाला गया था।
यह पहली घटना नहीं थी। 2008 में ही मुंबई में भीषण आतंकी हमले के बाद एक पुस्तक लिखकर देश-दुनिया को दहलाने वाले इस हमले को आरएसएस की साजिश बताने की बड़ी बेशर्मी से कोशिश की गई थी। जिन्होंने भी ऐसी कोशिश की, उन्हें शर्मिंदगी का सामना करना पड़ा, लेकिन इससे यह तो पता चल ही गया कि किस तरह से समय-समय पर कुछ नेताओं और सरकारों द्वारा हिंदू आतंकवाद का हौवा खड़ा करने की चेष्टा की जाती रही थी। इस कृत्य में तत्कालीन संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार के कई केंद्रीय मंत्री भी शामिल थे। उनकी ओर से भी यह कहा जा रहा था कि हिंदू आतंकवाद उभर आया है। यह वह दौर था, जब तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने अमेरिकी राजदूत से कहा था कि भारत को लश्कर और जैश सरीखे आतंकी संगठनों से ज्यादा खतरा हिंदू संगठनों के अतिवाद से है। इस सबको देखते हुए यह आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य है कि इस सवाल का जवाब तलाशने की कोई कोशिश की जाए कि मालेगांव मामले की जांच के नाम पर देश-दुनिया को गुमराह करने की कोशिश तो नहीं की गई? इस सवाल का जवाब इसलिए खोजा जाना चाहिए, क्योंकि आरोप-प्रत्यारोप से कुछ हासिल होने वाला नहीं है। यह सामने आना ही चाहिए कि कहीं किसी साजिश या फिर संकीर्ण राजनीतिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए तो हिंदू आतंकवाद का जुमला नहीं गढ़ा गया? यदि यह साबित होता है कि किसी राजनीतिक मकसद से हिंदू आतंकवाद का जुमला गढ़ा गया तो फिर यह भी साफ होगा कि आतंकवाद से लड़ने के नाम पर देश की सुरक्षा व्यवस्था और साथ ही जांच एजेंसियों से खिलवाड़ भी किया गया।

यह गलत नहीं है कि मालेगांव विस्फोट कांड में भाजपा और आरएसएस नेताओं को फंसाने और उनका चरित्र हनन की साजिश का खुलासा होने के बाद बीजेपी और आरएसएस नेता कांग्रेस के खिलाफ हमलावर हैं। इस हकीकत से भी मुंह नहीं मोड़ा जा सकता है कि कांग्रेस नेताओं पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, पार्टी प्रमुख सोनिया गांधी, पूर्व गृह मंत्री पी. चिदंबरम, राहुल गांधी, प्रियंका गांधी, दिग्विजय सिंह और सलमान खुर्शीद देश में हिन्दू आतंकवाद का हौवा खड़ा कर रहे हैं। सलमान खुर्शीद ने तो अपनी किताब में हिन्दुओं की तुलना आतंकवादी संगठन बोको हरम और आईएसआई तक से कर दी है। आरएसएस नेता इंद्रेश कुमार ने तब सत्तारुढ़ और अब विपक्ष में बैठी कांग्रेस एवं अन्य राजनीतिक दलों और उनके नेताओं की आलोचना करते हुए कहा कि सबने मिलकर एक बड़ा पाप और अपराध किया था, हिन्दुओं को आतंकवादी ठहराने की साजिश रची गई थी। इंद्रेश कुमार ने कांग्रेस और उसकी गठबंधन सरकार के साथ खड़े नेताओं और दलों को भी गंदी राजनीति और झूठी साजिश के साथ खड़ा होने का गुनाहागार बताया ताकि तथाकथित भगवा आतंकी मामलों में भाजपा और आरएसएस के नेताओं को फंसाया जा सके। इंद्रेश कुमार ने अपने बयान में दावा किया कि एटीएस ने उसे प्रताड़ित किया और अपने कार्यालय में अवैध रूप से बैठाया। इस मामले में अब तक 220 गवाहों से पूछताछ हो चुकी है और उनमें से 15 मुकर गए हैं। इंद्रेश कुमार ने दावा किया कि तत्कालीन यूपीए सरकार ने तथाकथित भगवा आतंकी मामलों में भाजपा और आरएसएस के नेताओं को घसीटने के लिए पूरी ताकत झोंक दी थी, लेकिन किसी भी प्राथमिकी में हमारे नाम नहीं जोड़ सकी, क्योंकि उनके पास कोई सबूत नहीं था।

प्रणब मुखर्जी खोलकर गए हैं सारे राज; क्या उनका अंतिम संस्मरण कांग्रेस के लिए अभिशाप सिद्ध होगा?

पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के निधन के बाद अब उनके संस्मरण का अंतिम हिस्सा प्रकाशित होने वाला है, जिससे कांग्रेस आलाकमान को झटका लग सकता है। जिसका असर प्रकाशन पूर्व ही परिवार में लगभग विवाद-सा खड़ा हो गया है। 2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की बुरी हार हुई और नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में राजग की सरकार सत्ता में आई थी। प्रणब मुखर्जी ने पार्टी की इस हार के लिए सोनिया गाँधी और मनमोहन सिंह को जिम्मेदार ठहराया है। उन्होंने इस ओर भी इंगित किया है कि पार्टी में ये चर्चा थी कि वो मनमोहन से बेहतर प्रधानमंत्री साबित होते।

वैसे कांग्रेस ने अपने पतन की पटकथा की रुपरेखा प्रणव मुख़र्जी को प्रधानमंत्री न बनाकर, दूसरे राष्ट्रपति बनाकर उसे अंतिम रूप दे दिया था। अब उनके अंतिम संस्मरण में यह भी सम्भावना व्यक्त की जा रही कि कहीं पुस्तक में उनकी की जा रही जासूसी का तो जिक्र नहीं है। गौर करने की बात यह कि उनकी जासूसी किये जाने पर हुए विवाद पर यह कहा गया था कि "किसी ने चिनगाम खा कर दीवारों पर फेंक दी थी।" 

लेकिन पुस्तक को लेकर प्रणव परिवार में घमासान शुरू हो गया है।संस्मरण को प्रकाशित करने को लेकर भाई-बहन में विरोधाभास की स्थिति हो गई है। दिवंगत पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के बेटे अभिजीत मुखर्जी ने उनके संस्मरण ‘The Presidential Memoirs’ के प्रकाशन को लेकर आपत्ति जताई है और इस पर कुछ वक्त के लिए रोक लगाने की माँग की है। दिसंबर 15, 2020 को उन्होंने पब्लिकेशन हाउस को टैग कर एक साथ कई ट्वीट करके इस किताब को पहले पढ़ने का आग्रह किया और फिर ही इसे प्रकाशित किए जाने की माँग की।

अभिजीत ने कहा कि जारी किए गए अंश ‘मोटिवेटिड’ थे और पूर्व राष्ट्रपति ने इनके लिए मंजूरी नहीं दी होगी। उन्होंने पब्लिकेशन ग्रुप रूपा बुक्स से इस किताब के प्रकाशन को रोकने के लिए कहा है। उन्होंने अपने ट्वीट में माँग की है कि चूँकि वो संस्मरण के लेखक (प्रणब मुखर्जी) के पुत्र हैं, ऐसे में इसे प्रकाशित किए जाने से पहले वो एक बार किताब की सामग्री को देखना चाहते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि वो चाहते हैं कि किताब को प्रकाशित करने के लिए उनकी लिखित अनुमति ली जाए।

उन्होंने अपने ट्वीट में लिखा, “मैं, ‘The Presidential Memoirs’ के लेखक का पुत्र, आपसे आग्रह करता हूँ कि संस्मरण का प्रकाशन रोक दिया जाए, और उन हिस्सों का भी, जो पहले ही चुनिंदा मीडिया प्लेटफॉर्मों पर मेरी लिखित अनुमति के बिना घूम रहे हैं। चूँकि मेरे पिता अब नहीं रहे हैं, तो मैं उनका पुत्र होने के नाते पुस्तक के प्रकाशन से पहले उसकी फाइनल प्रति की सामग्री को पढ़ना चाहता हूँ, क्योंकि मेरा मानना है कि यदि मेरे पिता जीवित होते, तो उन्होंने भी यही किया होता।”

वहीं शर्मिष्ठा ने अपने भाई की बात पर आपत्ति जताते हुए कहा, “मैं, ‘The Presidential Memoirs’ के लेखक की पुत्री अपने भाई अभिजीत मुखर्जी से आग्रह करती हूँ कि वो हमारे पिता द्वारा लिखी गई आखिरी किताब के प्रकाशन में बेवजह की बाधा उत्पन्न न करें। उन्होंने बीमार पड़ने से पहले पांडुलिपि को पूरा कर लिया था।”

शर्मिष्ठा ने आगे लिखा, “अंतिम ड्राफ्ट में मेरे पिता के हाथ से लिखे नोट्स और टिप्पणियाँ हैं, जिनका सख्ती से पालन किया गया है। उनके द्वारा व्यक्त किए गए विचार उनके खुद के हैं और किसी को भी किसी सस्ते प्रचार के लिए प्रकाशित होने से रोकने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। यह हमारे दिवंगत पिता के लिए सबसे बड़ा नुकसान होगा।”

प्रणब मुखर्जी के संस्मरणों की यह किताब जनवरी, 2021 में प्रकाशित हो रही है। उनकी किताब के कुछ अंश पिछले हफ्ते जारी किए गए थे, जिसमें सोनिया गाँधी और मनमोहन सिंह की क्षमता पर सवाल उठाए जाने का जिक्र था। इसे लेकर एक बार फिर सोनिया की क्षमता और मनमोहन सिंह के कार्यकाल पर हमले शुरू हो गए थे। हालाँकि, कांग्रेस ने इन अंशों पर बिना किताब पढ़े कोई टिप्पणी करने से मना कर दिया था, लेकिन अब उनके बेटे अभिजीत मुखर्जी ने किताब को प्रकाशित किए जाने से पहले पढ़ने की माँग की है।

प्रणब मुखर्जी ने अपने संस्मरण में लिखा है, “कांग्रेस के कुछ सदस्यों की सोच थी कि अगर 2004 में मैं प्रधानमंत्री बना होता तो 2014 में पार्टी को जो पराजय देखनी पड़ी, उसे टाला जा सकता था। यद्यपि मैं इस सोच से इत्तेफाक नहीं रखता। लेकिन, मैं ये ज़रूर मानता हूँ कि 2012 में मेरे राष्ट्रपति बनने के बाद कांग्रेस पार्टी के आलाकमान ने राजनीतिक फोकस खो दिया।” दिवंगत पूर्व राष्ट्रपति ने अपनी पुस्तक ‘The Presidential Years’ में ये बातें लिखी हैं।

प्रणब मुखर्जी ने खुलासा किया है कि जहाँ एक तरफ सोनिया गाँधी पार्टी के मामलों को सँभालने में अक्षम रही थीं, वहीं सदन से डॉक्टर मनमोहन सिंह की लगातार अनुपस्थिति ने सांसदों के साथ उनके व्यक्तिगत संपर्कों को ख़त्म कर दिया। ‘भारत रत्न’ प्रणब मुखर्जी ने अपनी पुस्तक में बतौर राष्ट्रपति अपने कार्यकाल के क्रियाकलापों के बारे में जानकारी दी है। उन्होंने राष्ट्रपति के रूप में 3 साल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार के साथ भी काम किया था।

उन्होंने लिखा है कि शासन करने का नैतिक अधिकार प्रधानमंत्री में ही निहित है। बकौल प्रणब मुखर्जी, देश की सम्पूर्ण स्थिति एक तरह से प्रधानमंत्री और उनके प्रशासन के क्रियाकलापों का ही प्रतिबिम्ब है। उन्होंने पाया कि डॉक्टर मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री के रूप में गठबंधन को बचाने में ही तल्लीन रहे, जिसका दुष्प्रभाव उनकी सरकार पर भी पड़ा। कांग्रेस के कई अन्य नेता भी मनमोहन सिंह को यूपीए काल में कांग्रेस के प्रति लोगों की नाराजगी के लिए जिम्मेदार ठहरा चुके हैं।

वहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के काम करने के तरीकों पर प्रकाश डालते हुए प्रणब मुखर्जी ने लिखा है, “ऐसा लगता है कि नरेंद्र मोदी ने अपने पहले कार्यकाल में एकतंत्रीय शासन व्यवस्था को अपना लिया। सरकार, न्यायपालिका और विधायिका के बीच कटु संबंधों को देखते हुए ऐसा ही प्रतीत होता है। अब समय ही बताएगा कि उनके दूसरे कार्यकाल में ऐसे मामलों पर सरकार बेहतर समझ और सहमति के साथ काम करती है या नहीं।”

उन्होंने बताया है कि सोनिया गाँधी ने जून 2, 2012 को उन्हें बताया था कि वो राष्ट्रपति के पद के लिए सबसे योग्य उम्मीदवार हैं। लेकिन, उन्होंने ये भी याद दिलाया था कि यूपीए सरकार में उनका जो किरदार रहा है, उसे भी नहीं भूला जाना चाहिए। यूपीए के राष्ट्रपति उम्मीदवार के रूप में मुखर्जी से एक वैकल्पिक नाम भी माँगा गया था। प्रणब मुखर्जी ने लिखा है कि इस बैठक के बाद अस्पष्ट तौर पर उन्हें ये ही लगा था कि शायद सोनिया गाँधी इस पद के लिए मनमोहन सिंह के नाम पर विचार करें।

उन्होंने सोचा कि अगर ऐसा होता है तो शायद उन्हें प्रधानमंत्री के रूप में प्रोन्नत किया जा सकता है। प्रणब मुखर्जी ने लिखा है कि उन्हें ऐसी चर्चा सुनने को मिली थी कि कौशाम्बी की पहाड़ियों पर छुट्टियाँ मनाते समय सोनिया गाँधी ने इस पर विचार-विमर्श भी किया था। मनमोहन सिंह भी मान चुके हैं कि मुखर्जी उनसे बेहतर प्रधानमंत्री होते, लेकिन उन्होंने ये भी कहा कि वो जानते थे कि उनके पास कोई च्वाइस नहीं है।

पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी का अगस्त 31, 2020 को देहांत हो गया था। भारत रत्न प्रणब मुखर्जी ने 2018 में संघ के एक कार्यक्रम में बतौर मुख्य अतिथि शिरकत की थी। ‘संघ शिक्षा वर्ग-तृतीय’ नामक यह कार्यक्रम 7 जून 2018 को नागपुर के संघ मुख्यालय में हुआ था। प्रणब मुखर्जी के इस फैसले ने कॉन्ग्रेस को भी असहज कर दिया था। उन्होंने RSS के संस्थापक केशव बलिराम हेडगेवार को भारत माँ का महान बेटा भी बताया था।

PM मोदी कहाँ-कैसे-कब हवाई जहाज से गए…: वायु सेना ने कहा – ‘नहीं दे सकते, देश के लिए खतरा है’

2014 में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने से इनकी विरोधियों रोटी-पानी के साथ-साथ रातों की नींद भी हराम हो चुकी है। मोदी शायद ऐसे व्यक्ति हैं, जिनके खानपान से लेकर उनके आने-जाने पर विरोधी गिद्ध की नज़र रखने को आतुर हैं। पहले इनके खाने-पीने की जानकारी और फिर इनकी माताश्री के दिल्ली अपने पुत्र के पास और रुकने आदि तक की RTI डाली जा चुकी हैं, लेकिन PMO से हर बार एक ही जवाब मिला कि "पता नहीं, प्रधानमंत्री जी अपने निजी करते हैं, किसी को नहीं पता।" लेकिन अब जो सूचना मांगी गयी है, उसमे जहाज से आने-जाने की सूचना। आखिर विरोधी क्यों और किस कारण जानकारी लेना चाह रहे हैं। ऐसे में प्रश्न होता है कि क्या जानकारी लेने वाला कोमोडोर (रिटायर्ड) लोकेश के बत्रा क्यों लेना चाहता है? यह गंभीर जाँच का विषय है।     

PM मोदी कहाँ गए थे, कब गए थे, कैसे गए थे और किस-किस रूट से गए थे – RTI करके एक शख्स ने यह जानकारी माँगी थी। आश्चर्य की बात यह है कि यह RTI एक ऐसे शख्स ने डाली थी, जो खुद भारतीय वायुसेना के कोमोडोर रह चुके हैं, नाम है – लोकेश के बत्रा।

कोमोडोर (रिटायर्ड) लोकेश के बत्रा ने PM मोदी के अलावा पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के बारे में भी यह सब जानकारी माँगी थी – 2013 से लेकर अब तक जब RTI डाली गई थी, उस तिथि तक)। आश्चर्य यह कि केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) ने 8 जुलाई 2020 को भारतीय वायु सेना को यह जानकारी देने के लिए निर्देश भी जारी कर दिया।

अब भारतीय वायु सेना ने CIC के इस निर्देश के खिलाफ दिल्ली हाई कोर्ट में याचिका दायर की है। भारतीय वायु सेना का कहना है कि प्रधानमंत्री से लेकर पूर्व प्रधानमंत्री की हवाई यात्रा से संबंधित जानकारी साझा नहीं की जा सकती है। वायु सेना ने इसे ‘सेंसिटिव डिटेल’ की कैटेगिरी में बताया है।

भारतीय वायु सेना ने कोर्ट को बताया कि प्रधानमंत्री के साथ चलने वाले SPG ग्रुप के जवान और पूरी यात्रा डिटेल को सार्वजनिक करने से न सिर्फ प्रधानमंत्री की सुरक्षा खतरे में पड़ेगी बल्कि देश की अखंडता और संप्रभुता पर भी खतरा बन सकता है।

कोमोडोर (रिटायर्ड) लोकेश के बत्रा ने PM मोदी और पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के बारे इस तरह की जानकारी के लिए जून 2018 में RTI डाली थी। भारतीय वायु सेना ने कोर्ट को यह बताया कि RTI एक्ट के तहत इस तरह की जानकारी को निषेध बताया गया है। अपने तर्क में वायु सेना ने कहा कि CIC ने निर्देश देने में भयंकर चूक की है क्योंकि SPG को RTI एक्ट के तहत छूट दी गई है।

RTI एक्टिविस्ट और सुप्रीम कोर्ट 

दिसंबर 2019 में मुख्य न्यायाधीश एसए बोबडे ने प्रशांत भूषण को उनकी एक याचिका के लिए फटकार लगाई। यह याचिका प्रशांत भूषण की ही एक पुरानी याचिका के बारे में थी। उस पुरानी याचिका को दायर कर प्रशांत भूषण ने आरटीआई एक्ट के संबंध में राज्यों के सूचना आयुक्तों की नियुक्ति के बारे में सवाल उठाए थे।

इसके जवाब में सीजेआई ने माना था कि आरटीआई को लेकर कुछ गंभीर चिंताएँ अवश्य जायज़ हैं, लेकिन उन्होंने यह भी कहा कि ऐसे लोग सूचनाएँ माँग रहे हैं, जिनका मामले से कोई लेना-देना ही नहीं है। उन्होंने भूषण को लेकर नाराज़गी जताते हुए कहा, “कुछ लोग खुद को ‘आरटीआई एक्टिविस्ट’ कहते हैं। मुझे बताइए, ये कोई व्यवसाय है क्या?” 

तिरस्कृत हुए, मौत के 16 साल बाद, नरसिम्हा राव कांग्रेस को क्यों आए याद?

नरसिम्हा राव, सोनिया गॉंधी
आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
किसी ने यदि गुलामों को न देखा हो तो कांग्रेस पार्टी को देखा जा सकता है। यह कोई आरोप नहीं, कटु सत्य है। जवाहर लाल नेहरू से लेकर आज सोनिया गाँधी तक पार्टी में एकछत्र शहंशाह बन कर अपनी बात आदेश मान लागू करते जरूर अनुभव किया जा सकता है। कांग्रेस में एक से बढ़कर एक धुरंधर नेता हुए हैं, लेकिन पार्टी में गुलामों के मिलते साथ ने उन सभी को दरकिनार किया जाता रहा। लाल बहादुर शास्त्री ने प्रधानमंत्री रहते अपने कामों से जवाहर लाल नेहरू के 18 वर्ष भुलवा दिए थे। शायद यही कारण था कि ताशकंत में उनकी हत्या करवा दी गयी। वरना क्या कारण था कि उनकी आकस्मित मृत्यु की जाँच क्यों नहीं हुई? क्यों नहीं उनका पोस्टमॉर्टेम करवा गया? क्यों उनके परिवार को शास्त्री से दूर रखा जा रहा था? यदि उनकी धर्मपत्नी ललिता जी द्वारा अपने पति के शव से दूर रखने पर हंगामा करने उपरांत परिवार को उनके शव के पास जाने दिया था। 
इतना ही नहीं, परिवार के गुलामों ने अपने आकाओं के अध्यक्ष पद पर आसीन किए जाने के लिए सोनिया गाँधी को अध्यक्ष बनाने के लिए अध्यक्ष सीताराम केसरी को पार्टी ऑफिस से बाहर फेंका था। किसी को गुलाम देखने हैं तो कांग्रेस पार्टी को देख लें।
जब कांग्रेस ने अपने ही मंत्रियों और सेना चीफ की जासूसी करवाई थी 
कांग्रेस पार्टी और उसके नेता इन दिनों वाट्सएप पर कुछ लोगों की कथित जासूसी को लेकर केंद्र सरकार पर बेबुनियाद आरोप लगा रहे हैं। कांग्रेस नेता राहुल गांधी भी बिना की किसी तथ्य के सरकार को घेरने में लगे हैं। लेकिन वो उस वक्त को भूल गए हैं जब उनके और उनकी मां सोनिया गांधी के इशारे पर यूपीए सरकार में वित्त मंत्री रहे प्रणब मुखर्जी की जासूसी कराई गई थी। 
सोनिया के इशारे पर हो रही थी प्रणब की ...
प्रणब मुखर्जी के घर जासूसी
आज बिना किसी सबूत के केंद्र सरकार पर कुछ लोगों की जासूसी कराना का आरोप लगाने वाली कांग्रेस पार्टी और उसके नेताओं ने अपनी ही सरकार के वित्त मंत्री और वरिष्ठ नेता प्रणब मुखर्जी की जासूसी कराई थी। बात 2011 की है, जब प्रणब मुखर्जी के दफ्तर पर जासूसी खबर मीडिया में छाई हुई थी। तब इसकी शिकायत खुद प्रणब मुखर्जी ने तत्कालीन पीएम मनमोहन सिंह से की थी और इसकी जांच कराने की मांग की थी।

जासूसी का मामला तब सामने आया था, जब तत्कालीन यूपीए सरकार के सबसे ताकतवर मंत्री प्रणब मुखर्जी के ऑफिस में 16 अहम जगहों पर गोंद लगी मिली है। इन जगहों में खुद मुखर्जी का ऑफिस, उनकी करीबी सलाहकार ओमिता पॉल का ऑफिस, उनके प्राइवेट सेक्रेटरी मनोज पंत का ऑफिस और वित्त मंत्री द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले दो कॉन्फ्रेंस हॉल शामिल थे। तब वित्त मंत्रालय की ओर से पहली बार प्राइवेट इनवेस्टिगेटर्स की मदद से मंत्रालय के अति महत्वपूर्ण कक्षों की ‘इलेक्ट्रॉनिक स्वीपिंग’ कराई गई थी। इसके बाद प्रणब मुखर्जी ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर इस मामले की शिकायत की थी। तब प्राइवेट इनवेस्टिगेटर्स का कहना था कि गोंद खास मकसद से चिपकाई गई थी। गोंद के बाहरी हिस्से में हल्की लकीर जैसे निशान मिले हैं जो इस बात का संकेत हैं कि वहां कोई छोटे उपकरण लगाए गए होंगे जो हटा लिए गए।
रिटायर्ड आर्मी चीफ वी के सिंह के घर जासूसी
यूपीए शासन के दौरान ही पूर्व आर्मी चीफ जनरल (रिटायर्ड) वी के सिंह की भी जासूसी कराने का मामला सामने आया था। जनवरी 2013 में वी के सिंह के परिवारवालों ने आरोप लगाया था कि उनके घर में जासूसी करने के लिए बगिंग की कोशिश की गई। 4 जनवरी 2013 को दिल्‍ली के कैंटोनमेंट एरिया स्थित पूर्व जनरल के घर में घुसे सेना के मेजर को पकड़ा गया था। पकड़ा गया मेजर आर. विक्रम सिंह सेना के सिग्‍नल कोर 1, सिग्‍नल यूनिट में तैनात था। मेजर की गतिविधि संदिग्‍ध लगी तो वहां मौजूद सुरक्षाकर्मियों ने उसे पकड़ा और पूछताछ की।

पी.वी. नरसिंह राव की जयन्ती पर ...नरसिम्हा राव की मौत के 16 साल बाद तिरस्कार पर कांग्रेस को पछतावा या मौकापरस्ती? 
उन्होंने बेहद मुश्किल वक्त में देश और कांग्रेस का नेतृत्व सॅंभाला था। वे नेहरू-गॉंधी परिवार के बाहर के पहले शख्स थे, जिसने बतौर प्रधानमंत्री पॉंच साल का कार्यकाल पूरा किया। उस शख्सियत का नाम था पीवी नरसिम्हा राव।
राव को जीते जी सोनिया गॉंधी के इशारे पर पहले कांग्रेस में अपमानित कर किनारे लगाया गया। मृत्यु हुई तो दिल्ली में उनका अंतिम संस्कार होने नहीं दिया गया। उनके शव को कांग्रेस कार्यालय में लाने तक की अनुमति नहीं दी गई। दिल्ली में उनका मेमोरियल 2015 में तब बन पाया, जब केंद्र में मोदी के नेतृत्व में बीजेपी की सरकार चल रही थी।
दिसंबर 2004 में मौत के बाद राव का जब तिरस्कार हुआ तो मनमोहन सिंह देश के प्रधानमंत्री हुआ करते थे। वित्त मंत्री बनाकर राजनीति में मनमोहन को लाने वाले भी राव थे। लेकिन मनमोहन सिंह ने उनकी अंतिम यात्रा में शामिल होना भी उचित नहीं समझा।
“यूपीए काल में किसी भी बड़े कांग्रेस नेता ने दिवंगत पूर्व पीएम नरसिम्हा राव के जन्मदिवस या पुण्यतिथि के कार्यक्रमों में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। अब उनकी मौत के 16 सालों बाद आप कार्यक्रम क्यों आयोजित कर रहे हो? कांग्रेस आलाकमान ने उनके योगदानों को हाइलाइट नहीं किया। दिल्ली में कोई कार्यक्रम नहीं हो रहा। कांग्रेस उन्हें तेलंगाना तक ही क्यों सीमित करना चाहती है? वो तो एक राष्ट्रीय नेता थे।”
इस घटना के 16 साल बाद जब कांग्रेस का सूर्य ढलता दिख रहा उसने राव को लेकर यू टर्न मारा है। सोनिया गॉंधी ने पहली बार सार्वजनिक तौर पर उनकी प्रशंसा की है। हैदराबाद में शुक्रवार को कांग्रेस की ओर से आयोजित एक कार्यक्रम में सोनिया गॉंधी का पत्र पढ़ा गया। इसमें उन्होंने राव को प्रधानमंत्री के रूप में साहसिक फैसलों से देश को नई दिशा देने का श्रेय दिया गया।
सोनिया ने पत्र में लिखा, “राज्य और राष्ट्रीय राजनीति में एक लंबे कैरियर के बाद वह गंभीर आर्थिक संकट के समय भारत के प्रधानमंत्री बने। उनके साहसिक नेतृत्व के माध्यम से हमारा देश कई चुनौतियों को सफलतापूर्वक पार करने में सक्षम हुआ। 24 जुलाई 1991 का केंद्रीय बजट और हमारे देश के आर्थिक परिवर्तन का मार्ग प्रशस्त किया।”
वहीं पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने राव को देश का ‘महान सपूत’ और भारत में आर्थिक सुधारों का जनक बताया है। उन्होंने कहा, “आर्थिक सुधार और उदारीकरण में वाकई उनके सबसे बड़े योगदान हैं। विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदानों को कम करके आँका नहीं जा सकता है।”
भारत में खुली अर्थव्यवस्था का श्रेय राव को देते हुए मनमोहन ने कहा, “यह एक कठिन विकल्प और साहसी फैसला था और यह संभव इसलिए हो सका क्योंकि प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव ने मुझे चीजों को शुरू करने की आजादी दी, क्योंकि वह उस समय भारत की अर्थव्यवस्था की समस्या को पूरी तरह से समझ रहे थे।”
राजीव गॉंधी की हत्या के बाद अचानक राव को जिम्मेदारी सॅंभालनी पड़ी थी। लेकिन कांग्रेस में सोनिया गाँधी के उदय के साथ ही उनका तिरस्कार शुरू हो गया था, जो उनकी मृत्यु के बाद तक चलता रहा।
23 दिसंबर 2004 को राव की मृत्यु हुई थी और 27 दिसंबर को स्तंभकार एमडी नलपत ने लिखा,”वास्तव में, 1998 में कांग्रेस की कमान नेहरू वंश के हाथों में दोबारा आने से बाद, AICC के पूर्व अध्यक्ष और प्रधानमंत्री होने के बावजूद, नरसिम्हा राव को कांग्रेस कार्यसमिति से न केवल बाहर किया गया था, बल्कि उन्हें विशेष आमंत्रित सदस्य की सूची से भी निकाल दिया गया था। उस सूची में केवल वे थे जो आलाकमान की जय-जयकार करते थे।”
नलपत ने दावा किया था कि राव के अंतिम संस्कार के विषय पर चर्चा के लिए दोपहर 3 बजे एक विशेष केंद्रीय मंत्रिमंडल की बैठक बुलाने के बावजूद, 9 मोतीलाल नेहरू मार्ग पर उनके शव को लाकर एक मंच पर रखने के लिए कोई व्यवस्था नहीं की गई थी। वहाँ न फूल थे और न शोक सभा में आए लोगों के बैठने के लिए कारपेट। यहाँ तक लॉन के शामियाने में कोई इंतजाम नहीं था।
यह सिलसिला राव के देहांत पर भी खत्म नहीं हुआ था। उनके निधन के बाद भी कांग्रेस पार्टी ने उनका तिरस्कार करना नहीं बंद किया। वे हमेशा पार्टी के निशाने पर हमेशा रहे। पिछले वर्ष राव के पोते एनवी सुभाष ने इसके लिए पार्टी को आड़े हाथों भी लिया था। लगातार राव पर लगते आरोपों को देखते हुए उन्होंने गाँधी परिवार से उस अन्याय के लिए माफी माँगने को कहा था, जो उन्होंने नरसिम्हा राव के साथ किया।




एन वी सुभाष ने AICC सचिव जी चिन्ना रेड्डी के एक बयान पर कहा था कि राव ने अपने कार्यकाल के दौरान नेहरू-गाँधी परिवार को ‘दरकिनार’ करने की कोशिश की थी, ‘यह सच नहीं है और निंदनीय’ है। उन्होंने दावा किया कि राव, गाँधी परिवार के सबसे भरोसेमंद और वफादार नेता थे और हमेशा कई मुद्दों पर गाँधी परिवार का मार्गदर्शन करते थे।
ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि मौत के 16 साल बाद राव को लेकर कांग्रेस के स्टैंड में यह​ बदलाव पाश्चाताप है या फिर मौकापरस्ती?
असल में यह राव का जन्म शताब्दी वर्ष है। उनकी जयंती पर पिछले महीने कई अखबारों में पूरे पन्ने का विज्ञापन छपा था। इसमें उन्हें ‘तेलंगाना का बेटा… भारत का गर्व’ बताया गया था। यह विज्ञापन तेलंगाना की सत्ताधारी पार्टी टीआरएस की तरफ से प्रकाशित किए गए थे। इसी विज्ञापन ने अचानक से राव को राजनीति में फिर से प्रासंगिक बनाते हुए कांग्रेस को अपने स्टैंड में बदलाव के लिए मजबूर किया।
इस विज्ञापन के बाद कांग्रेस के आधिकारिक ट्विटर हैंडल से पोस्ट कर उन्हें दूरदर्शी नेता बताया गया था। राहुल गॉंधी से लेकर मनमोहन सिंह तक सबने उन्हें याद किया। लेकिन सोनिया उस वक्त भी चुप रहीं। अचानक से राव को लेकर सोनिया का मुखर होना कभी मजबूत गढ़ रहे दक्षिण भारत में जमीन तलाशने की कांग्रेस रणनीति का हिस्सा है।
कांग्रेस कर्नाटक की सत्ता बीजेपी के हाथों गॅंवा चुकी है। तेलंगाना में टीआरएस ने उसकी जगह ले ली है। आंध्र प्रदेश से उसे उस जगन मोहन रेड्डी ने उखाड़ फेंका है, जिसे कभी उसने पार्टी से बाहर कर दिया था। तमिलनाडु में उसकी उम्मीदें डीएमके पर टिकी है। बीते साल आम चुनावों में भी इन राज्यों में उसका प्रदर्शन बेहद निराशाजनक रहा था। ऐसे में यह करनी पर पछतावे से ज्यादा राव की विरासत पर दावा कर कम से कम तेलंगाना में पैठ बनाने की कवायद दिखती है।
शायद कांग्रेस के लिए अब इस मोर्चे पर देर हो चुकी है। राव के लिए भारत रत्न की मॉंग और जन्म शताब्दी के मौके पर साल भर के कार्यक्रम का ऐलान कर इस विरासत पर टीआरएस पहले ही दावा ठोक चुकी है।

जॉर्ज सोरोस के साथ कांग्रेस का एक और कनेक्शन: पूर्व PM मनमोहन सिंह की बेटी अमृत सिंह करती हैं उसके लिए काम

जॉर्ज सोरोस और अमृत सिंह
जॉर्ज सोरोस और अमृत सिंह
कांग्रेस पार्टी और भारत को कमजोर करने वाली ताकतों के बीच के आपसी संबंध, देश के लिए अब चिंता का कारण बन गए हैं। हाल ही में खुलासा हुआ था कि यूपीए काल मे चीन ने राजीव गाँधी फाउंडेशन को 1 करोड़ से ज्यादा रुपया दान दिया। इसके अलावा यह भी पता चला कि RGF के संबंध भारत और विदेश में मौजूद संदिग्ध तत्वों से हैं।
पिछले दिनों ऑपइंडिया ने इस संबंध में एक रिपोर्ट भी की थी। रिपोर्ट में हमने कांग्रेस पार्टी और अमेरिकी अरबपति जॉर्ज सोरोस के बीच संबंधों पर विस्तारपूर्वक बताया था। इन संबंधों से खुलासा हुआ था कि जॉर्ज का अपने एनजीओ नेटवर्क के माध्यम से कांग्रेस पार्टी पर बहुत गहरा प्रभाव था।
लेकिन अब यह ज्ञात हुआ है कि पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की बेटी अमृत सिंह भी सोरोस की एक पहल में उसके साथ जुड़ी हुई हैं। ओपन सोसाइटी फ़ाउंडेशन की वेबसाइट के अनुसार, अमृत सिंह (पूर्व पीएम की बेटी) ओपन सोसाइटी जस्टिस इनिशिएटिव में राष्ट्रीय सुरक्षा और आतंकवाद विरोधी परियोजना को डायरेक्ट कर रही है।
ओएसएफ वेबसाइट के अनुसार, अमृत सिंह कट्टरपंथ विरोधी गतिविधियों, अभिव्यक्ति की आजादी पर अंकुश, हिरासत में हत्या, यातना जैसे मसलों पर पैरोकारी करती हैं। वेबसाइट के मुताबिक, वह इस परियोजना में आर्थिक न्याय, एंटीकरप्शन और सूचना-संघ-सभा की स्वतंत्रता की देखरेख भी करती हैं।

इतना ही नहीं, अमृत सिंह को मानवाधिकार कानून पर उनके काम के लिए पुरस्कार भी मिला है। साल 2012 में उन्हें उत्कृष्टता के लिए इंडिया एब्रोड पब्लिशर्स स्पेशल अवार्ड मिला था।
साल 2012 में ही अमृत सिंह की ओपन सोसायटी जस्टिस इनिशिएटिव द्वारा पब्लिश ‘Globalising Torture: CIA Secret Torture and Extraordinary Rendition’ शीर्षक की रिपोर्ट को अंतरराष्ट्रीय मीडिया में बहुत सराहना मिली थी।
अमृत ​​सिंह के अलावा, कांग्रेस पार्टी के जॉर्ज सोरोस के साथ कई अन्य लिंक भी हैं। उदाहरण के लिए, यूपीए शासन के दौरान भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार शिव शंकर मेनन जॉर्ज सोरोस के साथ एक एनजीओ के बोर्ड में बैठते हैं।
इसके अलावा, हर्ष मंदर, जो सोनिया गाँधी द्वारा गठित राष्ट्रीय सलाहकार परिषद में थे, वह भी जॉर्ज सोरोस की ओपन सोसाइटी फाउंडेशन के Human Rights Initiative Advisory Board के अध्यक्ष हैं।
यहाँ याद दिला दें कि राजीव गाँधी फाउंडेशन हाल ही में विदेशी संस्थाओं से डोनेशन लेने के कारण सुर्खियों में आया था। इस बीच यह भी पता चला था RGF ने हर्ष मंदर के एक गैर सरकारी संगठन ‘अमन बिरादरी ट्रस्ट’ के साथ साझेदारी भी की। इस तरह, राष्ट्रवाद व राष्ट्रवादियों के ख़िलाफ़ युद्ध की घोषणा करने वाले जार्ज सोरोस के साथ कांग्रेस के अति घनिष्ठ संबंध निकले। जो वास्तविकता में भारत के लिए चिंता का कारण हैं।(साभार)

उत्तर प्रदेश : मनमोहन सिंह के जमाने में घाटे का सौदा, अमेठी की मालविका में डूबे ₹366 करोड़,

मनमोहन सिंह-राहुल गॉंधीकांग्रेस सरकार के जमानों में सरकारी धन का किस तरह दुरुपयोग किया जाता रहा है, इसका सटीक नमूना अमेठी के मालविका स्टील का अधिग्रहण है। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक इसके अधिग्रहण के बाद से सार्वजनिक क्षेत्र की जानी-मानी कंपनी स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया (सेल) को करीब 366 करोड़ का नुकसान हो चुका है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार के दौरान मालविका स्टील के अधिग्रहण के लिए सेल को मजबूर किया गया था।
अमेठी गॉंधी परिवार का गढ़ रहा। जिस जमाने में यह अधिग्रहण हुआ उस समय कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गॉंधी यहॉं से सांसद हुआ करते थे। हालॉंकि पिछले आम चुनाव में उन्हें अपने गढ़ में ही भाजपा की स्मृति ईरानी से मुॅंह की खानी पड़ी थी। मालविका स्टील में निवेश के लिए सेल को यूपीए सरकार ने अपने दूसरे कार्यकाल (2009-2014) में राजी किया था। उसके बाद से सेल को हुए नुकसान का खुलासा कैग की हालिया रिपोर्ट से हुआ है।
संसद में पेश भारत के नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक (कैग) की हालिया रिपोर्ट में बताया गया है कि सेल द्वारा उत्तर प्रदेश की कंपनी मालविका स्टील का अधिग्रहण बेकार निवेश साबित हुआ है। बीमार कंपनी में जान फूँकने के लिए पीएसयू द्वारा किया गया 366 करोड़ रुपए का निवेश बेकार रहा है।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक यूपीए के कार्यकाल के दौरान जब ये फैसला हुआ था, उस समय इस पर कई लोगों ने सवाल उठाया था। साथ ही मालविका स्टील में सुधार लाने के लिए सेल का इस्तेमाल करने को राजनीतिक फैसला भी कहा गया था। लेकिन उस समय इस अधिग्रहण को ऐसे पेश किया गया जैसे इससे बड़े पैमाने पर रोजगार पैदा होंगे। साथ ही इससे इलाके में औद्योगिक विकास का रास्ता भी तैयार होगा।
हालाँकि, सेल हमेशा से कहती रही कि मालविका स्टील का अधिग्रहण उसके लिए व्यावहारिक नहीं है। अधिग्रहण के वक्त ही बंद पड़ी मालविका स्टील कबाड़ का रूप ले चुकी थी। दैनिक जागरण की रिपोर्ट के अनुसार उस समय इस संपत्ति के इस्तेमाल का अध्ययन करने के लिए एक समिति भी गठित की गई थी। इस समिति ने 2015 में बताया था कि ज्यादातर उपकरणों का 17 साल से इस्तेमाल नहीं हुआ था और वे किसी काम के नहीं थे। बताया गया था कि इससे संयंत्र का रूप देना और उसे चालू करना संभव नहीं है।
कैग की रिपोर्ट में कहा गया कि सेल ने 2009 में 44.35 करोड़ रुपए में इस प्लांट का अधिग्रहण किया था। इसके बाद 94 करोड़ रुपए का निवेश इसमें और किया गया। अब तक सेल इस प्लांट पर करीब 366 करोड़ रुपए खर्च कर चुकी है, लेकिन नतीजा कुछ नहीं निकला है। दिलचस्प यह है कि 739.65 एकड़ में फैले मा​लविका स्टील का जमीन आज तक सेल के नाम पर ट्रांसफर नहीं हुआ है।

आखिर किस साज़िश के तहत डॉ मनमोहन सिंह ने 84 दंगों का दोष नरसिम्हा राव के सिर मंढा?

पूर्व PM मनमोहन सिंह का खुलासा, अगर नरसिम्हा राव ने मान ली होती गुजराल की ये सलाह तो रुक सकते थे 84 के दंगे
पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने 1984 के सिख विरोधी दंगों को लेकर बड़ा बयान दिया है। एक कार्यक्रम में बोलते हुए डॉ. मनमोहन सिंह ने कहा कि अगर तत्कालीन गृह मंत्री नरसिम्हा राव ने इंद्र कुमार गुजराल की सलाह मानी होती और तत्परता दिखाई होती तो नरसंहार को रोका जा सकता था। डॉ. मनमोहन सिंह ने कहा, ''जब 84 के दंगे हुए तो इंद्र कुमार गुजराल उस वक्त के गृह मंत्री नरसिम्हा राव के पास गए और उनसे कहा कि स्थिति बहुत नाजुक है। ऐसे में सरकार जितनी जल्दी सेना को बुला ले उतना ठीक। अगर वह सलाह मान ली गई होती तो 84 में हुए नरसंहार को रोका जा सकता था''
अब प्रश्न यह होता है कि किस कारण डॉ मनमोहन सिंह ने इतने वर्षो तक इस बात को उजागर क्यों नहीं किया? क्या कांग्रेस द्वारा मिले आदेश के बाद कांग्रेस की छवि सुधारने के लिए इतने वर्षों बाद इस राज को खोला? वास्तव में किसी सोंची-समझी राजनीती के तहत इस राज से पर्दा हटाया गया है। 
जहाँ तक तत्कालीन गृहमंत्री नरसिम्हा राव द्वारा सेना को बुलाने के लिए निर्णय की बात है, इतने वर्ष देश के प्रधानमंत्री रहते डॉ सिंह को इसका भी अच्छा-खासा अनुभव हो गया होगा कि आला कमान के हुक्म के बिना प्रधानमंत्री तक कोई निर्णय लेने में असमर्थ होता है, गृहमंत्री की क्या ताकत। आलाकमान की अनुमति के बिना कुछ न कर सकने का दर्द तो वह स्वयं भी कई बार व्यक्त कर चुके हैं। यानि 1984 सिख दंगों का दोष नरसिम्हा राव पर थोपना किसी साज़िश के तहत किया गया है। अन्यथा नरसिम्हा राव अपने आपमें एक प्रभावी नेता थे। लेकिन जब आलाकमान का हुक्म न हो, कांग्रेस के गृहमंत्री तो क्या प्रधानमंत्री में आलाकमान के विरुद्ध जाने की ताकत नहीं। 

दिसम्बर 4 को पूर्व प्रधानमंत्री इंद्र कुमार गुजराल की जयंती थी। इस मौके पर देश के तमाम हिस्सों में कई कार्यक्रम आयोजित किये गए थे। इसी कड़ी में दिल्ली में भी कार्यक्रम का आयोजन किया गया था। जिसमें पूर्व पीएम डॉ. मनमोहन सिंह समेत तमाम लोगों ने शिरकत की। इससे पहले तमाम नेताओं ने इंद्र कुमार गुजराल को याद किया और सोशल मीडिया के जरिये श्रद्धांजलि दी 

करतारपुर कॉरिडोर: पूर्व PM मनमोहन सिंह के लिए Pak ने किया खुली गाड़ी का इंतजाम, भारत ने माँगी Z+ सुरक्षा

पंजाब सरकार के न्योते पर करतारपुर जाएंगे पूर्व पीएम मनमोहन सिंह, PM मोदी करेंगे उद्घाटन9 नवंबर को करतारपुर कॉरिडोर के उद्घाटन के बाद पाकिस्तान जाने वाले 550 लोगों के जत्थे में शामिल पूर्व पीएम मनमोहन सिंह की सुरक्षा से पाक प्रशासन ख़िलावड़ करता नजर आ रहा है।
खबर है कि भारत ने पाकिस्तान से पूर्व पीएम के लिए जेड प्लस सुरक्षा की माँग की थी, लेकिन पाकिस्तान ने उनके लिए बैटरी से चलने वाली खुली गाड़ी का इंतजाम कर दिया है। खूफिया एंजेंसियों द्वारा करतारपुर के आसपास इलाकों में आतंकी एक्टिविटी की सूचना मिलने के बावजूद भी सुरक्षा के इतने ढीले इंतजाम पूर्व पीएम की सुरक्षा पर बड़ा सवाल खड़ा करते हैं।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार पाकिस्तान ने पूर्व पीएम मनमोहन सिंह के लिए जिस बैटरी से चलने वाली गाड़ी का इंतजाम किया, वो चारों तरफ से खुली है और जेड प्लस सुरक्षा के बराबर भी नहीं हैं। ऐसे में भारत ने पाकिस्तान से वीआईपी जत्थे के लिए अतिरिक्त इतंजाम करने के लिए कहा है।
इतना ही नहीं, भारत ने सुरक्षा व्यवस्था का जायजा लेने के लिए अपनी एक टीम को पाकिस्तान में दाखिल होने देने की इजाजत भी माँगी है। हालाँकि, पाक ने अभी तक इसका कोई जवाब नहीं दिया है। साथ ही पाक ने पूरे कार्यक्रमों का ब्योरा भी नहीं दिया है।

पाकिस्तान की इन्हीं हरकतों के कारण भारतीय जत्थे के करतारपुर जाने को लेकर बड़ा सवाल खड़ा हो गया है। इस जत्थे में नवजोत सिंह सिद्धू, कैप्टेन अमरिंदर सिंह समेत केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी, हरसिमरत कौर बादल, शिरोमणि अकाली दल के नेता सुखबीर सिंह बादल और 150 सांसद भी शामिल हैं। जिन्हें गुरुद्वारे तक करीब चार किलोमीटर पाकिस्तान के अंदर जाना है।
ऐसे में पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टेन अमरिंदर सिंह को करतारपुर कॉरिडोर खोलने के पीछे पाकिस्तान का कोई मकसद नजर आना लाजमी है, वहीं गुरुद्वारे के आसपास इलाकों में चलाए जा रहे आतंकी कैंपों की खबर सुनने के बाद भारत सरकार अपने पहले जत्थे की सुरक्षा को लेकर काफी चिंतित हैं।

सर्वदलीय बैठक में हुई सहमति के बाद ही मसूद अज़हर को छोड़ा था --अमित शाह

आतंकी मसूद को छोड़ने के लिए सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह भी सहमत थे : अमित शाहबीजेपी अध्‍यक्ष अमित शाह ने एक बार फिर कांग्रेस पर निशाना साधा है.बीजेपी अध्‍यक्ष ने अपने ब्‍लाग के जरिये आतंकी मसूद अजहर की रिहाई को लेकर कांग्रेस को घेरा है. उन्‍होंने कहा है कि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी देश की जनता को गुमराह करके और उन लोगों की जिंदगी के प्रति असंवेदनशीलता दिखाते हुए मोदी सरकार से सवाल पूछ रहे हैं कि अटल बिहारी वाजपेयी जी की सरकार ने मसूद अजहर को क्यों छोड़ा था.
उन्‍होंने ब्‍लॉग में आगे लिखा है कि क्या वाकई यह ऐसा सवाल है, जो अब तक अनुत्तरित है. क्या कांग्रेस को नहीं पता कि जब विमान अपहरण की वह आतंकी वारदात हुई तब प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने इस विषय पर चर्चा के लिए एक ‘सर्वदलीय बैठक’ बुलाई थी? उस बैठक में कांग्रेस की तरफ स्वयं कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह मौजूद रहे थे. सभी दलों ने सर्वसम्मति से मसूद अजहर को सौंपने तथा अपने लोगों को वापस लाने का प्रस्ताव स्वीकार किया. यह देश के मानस की मांग थी, यह जोखिम में फंसे लोगों को निकलने की हमारी प्राथमिकता थी, हमने वही किया, जो तब एकमात्र संभव रास्ता था.
उन्‍होंंने लिखा है कि यह कदम कोई ‘गुडविल जेस्चर’ में नहीं उठाया गया था. यहां तक कि उस समय के विदेश मंत्री जसवंत सिंह, जिनके पुत्र अब कांग्रेस में हैं, ने 2009 में दिए गए एक साक्षात्कार में कहा था कि सर्वदलीय बैठक में सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह की सहमति थी. आज कांग्रेस और राहुल गांधी उस घटना पर सवाल उठाकर न सिर्फ असंवेदनशीलता का परिचय दे रहे हैं बल्कि अपनी पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के विवेक पर प्रश्नचिह्न लगा रहे हैं.
ऐसी स्थिति में जब भारत के अपराधी आतंकी मसूद अजहर और उसके संगठन को लेकर विश्व के तमाम महत्वपूर्ण देशों के बीच एका की स्थिति तैयार हुई है और पाकिस्तान दबाव की स्थिति में आया है, तब देश के अंदर कांग्रेस सहित कुछ राजनीतिक दलों द्वारा उठाए जा रहे सवालों और की जा रही टिप्पणियों से आतंकी सरपरस्तों को मदद मिल रही है. यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि कांग्रेस 1999 के उस कांधार विमान अपहरण की घटना को आज अपनी स्तरहीन राजनीति का हथियार बना रही है, जो अत्यंत संवेदनशील और 170 से अधिक लोगों की जोखिम में पड़ी जिंदगी से जुड़ी घटना थी. इन लोगों में कुछ लोग दूसरे देशों के भी थे, जिनकी सुरक्षा हमारी जिम्मेदारी थी.
कांग्रेस ने  गैर-जरूरी मुद्दे को उठाया
इस गैर-जरूरी मुद्दे को उठाकार कांग्रेस ने इतिहास में हुई ऐसी रिहाइयों पर बहस छेड़ दी है, जो खुद कांग्रेस के ऊपर सवाल खड़े करने वाले हैं. यह बहस मसूद अजहर की रिहाई से न तो शुरू होती है और न ही समाप्त होती है. यह सूची बड़ी है, जिसपर चर्चा हो तो कांग्रेस का दामन दागदार नजर आएगा. कांधार विमान अपहरण की घटना से दस साल पहले देश के तत्कालीन गृहमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद की बेटी रूबैया सईद का कश्मीर के घाटी क्षेत्र में आतंकियों ने अपहरण कर लिया. इसके बदले उन्होंने 10 आतंकियों को छोड़ने की मांग की थी. सरकार ने उस मांग को स्वीकार किया और आतंकियों की रिहाई की गई. यह भी गुडविल जेस्चर नहीं था.

कांग्रेस ने 25 आतंकियों को क्‍यों छोड़ा : शाह
अपने ब्‍लॉग में अमित शाह ने कांग्रेस से पूछा है कि कांग्रेस को यह बताना चाहिए कि 2010 में जब कांग्रेस की सरकार थी, तब 28 मई को 25 आतंकियों को क्यों छोड़ा गया? उस समय न तो कोई ऐसी परिस्थिति थी और न ही ऐसा कोई दबाव, लेकिन पाकिस्तान से रिश्ते सुधारने के नाम पर कांग्रेस की संप्रग-2 सरकार ने 25 आतंकियों को रिहा कर दिया. जानना जरूरी है कि इन 25 आतंकियों में एक आतंकी ऐसा भी था, जिसको 1999 में भी नहीं छोड़ा गया था. ये सभी 25 दुर्दांत आतंकी जैश-ए-मोहम्मद और लश्करे-तैयबा जैसे आतंकी संगठनों से जुड़े हैं. इन छोड़े गए आतंकवादियों में से एक शाहिद लतीफ आगे चल कर पठानकोट आतंकी हमले का मुख्य हैंडलर बना. 

फ्रांस का बड़ा कदम, पुलवामा हमले के गुनहगार मसूद अजहर की सभी संपत्तियां करेगा जब्'€à¤¤कांग्रेस की सरकार में अधिक हुए आतंकी हमले
कांग्रेस की नीति हमेशा आतंकवाद, अलगाववाद और नक्सलवाद को लेकर ढुलमुल रही है. इसमें कोई संदेह नहीं कि जब कांग्रेस की सरकार देश में दस साल तक थी, तब मुंबई, दिल्ली, जयपुर सहित देश के अलग-अलग हिस्सों में आतंकी वारदातें आम थीं। लेकिन 2014 में मोदी सरकार आने के बाद पिछले पांच साल में आतंकियों को हमने सीमा के इर्दगिर्द ही समेट कर रखने में सफलता हासिल की है. देश की आंतरिक सुरक्षा में आतंकियों द्वारा सेंध लगा पाना अब असंभव जैसा हो गया है. देश की सीमा पर भी मोदी सरकार की नीति आतंकवाद के खिलाफ ‘जीरो टोलरेंस’ की है.

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आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी एवं दूसरे भारतीय जनता पार्टी विरोधी भाजपा पर कंधार विम....

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आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार एक कहावत है "झूठ के पैर नहीं होते" जो बदलते समय के साथ-साथ सच्चाई पर डाली गयी कीजड़ साफ हो....

आतंकियों के मरने पर क्‍यों रोईं थीं सोनिया गांधी
क्‍या कांग्रेस पार्टी जवाद देगी कि 2008 में हुए बटला हाउस एनकाउंटर में आतंकवादियों के मारे जाने पर सोनिया गांधी फूट-फूट कर क्यों रोई थीं? मोदी सरकार में इन सब पर नकेल कसने की कवायदें हुईं तो इनका बौखलाना तो स्वाभाविक था, कांग्रेस की बौखलाहट भी खुलकर आने लगी. आज जब दुनिया मजबूत भारत की तरफ न सिर्फ देख रही है बल्कि मजबूती के साथ खड़ी है, तब कांग्रेस पार्टी अपने बयानों से उन देशों की मदद करने में लगी है जो भारत को मजबूत होते नहीं देखना चाहते हैं.

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जवाहरलाल नेहरू द्वारा मुख्यमंत्रियों को लिखे पत्र से पता चलता है कि संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता का विषय आया तब पंडित नेहरू ने ‘पहले चीन’ की नीति पर चलते हुए यह अवसर चीन के हाथों में दे दिया. इस घटना का जिक्र कांग्रेस के पूर्व विदेश मंत्री नटवर सिंह ने अपनी पुस्तक में भी किया है. आज वही चीन इसी अधिकार का उपयोग करके बार-बार आतंकी मसूद अजहर को बचाने का काम कर रहा है. साथ ही कश्मीर की समस्या को संयुक्त राष्ट्र संघ के मंच पर ले जाने की चूक भी नेहरू ने की थी. आतंकवाद पर असंवेदनशील टिप्पणी करने से पहले राहुल गांधी को अपनी पार्टी और नेहरू की इन दो गलतियों पर भी एकबार जरूर गौर करना चाहिए. ये दोनों ही गलतियां देश के लिए नासूर बनी हुई हैं.