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G20 शिखर सम्मलेन से पहले पूर्व PM मनमोहन सिंह भी हुए मोदी सरकार के मुरीद, कहा- भारत के लिए आशा अधिक, चिंता कम: आर्थिक महाशक्ति बनने का भी भरोसा


UPA सरकार में प्रधानमंत्री रहे कॉन्ग्रेस के नेता डॉक्टर मनमोहन सिंह ने पीएम नरेंद्र मोदी की विदेश नीति की जमकर सराहना की है। उन्होंने कहा कि पहले की तुलना में आज घरेलू राजनीति के लिए विदेश नीति और अधिक प्रासंगिक और महत्वपूर्ण हो गई है। इसके अलावा, उन्होंने कई मुद्दों पर वर्तमान भाजपा सरकार की तारीफ की।

इंडियन एक्सप्रेस को दिए इंटरव्यू में डॉक्टर मनमोहन सिंह ने कहा कि रूस-यूक्रेन युद्ध के मद्देनजर नई विश्व व्यवस्था बदल-सी गई है। इस व्यवस्था को संचालित करने में भारत की महत्वपूर्ण भूमिका है। उन्होंने कहा कि दोनों देशों से शांति की अपील करते हुए भारत ने अपने संप्रभु और आर्थिक हितों को पहले स्थान पर रखकर सही काम किया है।

पूर्व प्रधानमंत्री ने कहा कि वह भारत के भविष्य के बारे में चिंतित होने की तुलना में आशावादी अधिक हैं। उन्होंने कहा कि आजादी के बाद से निर्मित संवैधानिक मूल्यों के साथ एक शांतिपूर्ण बड़े लोकतंत्र और एक बड़ी बढ़ती अर्थव्यवस्था के रूप में भारत को अब विश्व स्तर पर बहुत अधिक सम्मान मिल रहा है।

ग्लोबल सप्लाई चेन में भारत की भूमिका पर बोलते हुए देश के पहले अल्पसंख्यक प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा कि वर्तमान में डी-ग्लोबलाइजेशन और नए प्रकार के व्यापार प्रतिबंधों की बात हो रही है। ये मौजूदा ऑर्डर को बाधित कर सकते हैं, लेकिन वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में भारत के लिए नए अवसर भी खोल सकते हैं।

प्रसिद्ध अर्थशास्त्री मनमोहन सिंह ने कहा कि भारत बदलती विश्व व्यवस्था में एक अद्वितीय आर्थिक अवसर के मुहाने पर खड़ा है। एक बड़े बाजार और प्रचुर मानव और प्राकृतिक संसाधनों के साथ एक शांतिपूर्ण लोकतंत्र के रूप में भारत आने वाले दशकों में सेवाओं, विनिर्माण और उत्पादन पर जोर देकर दुनिया की एक आर्थिक महाशक्ति बन सकता है।

भारत को विनिर्माण क्षेत्र में अग्रणी बनाने के लिए प्रधानमंत्री मोदी सरकार पहले से ही प्रयासरत है। इसके कारण चीन की नींद उड़ी हुई है। विश्व की कई दिग्गज क्षेत्र की कंपनियाँ भारत में उत्पादन शुरू कर चुकी हैं। वहीं, विश्व स्तर पर भारत जलवायु परिवर्तन, कार्बन उत्सर्जन आदि में कटौती को लेकर भारत का स्टैंड साफ कर चुका है।

भारत को विनिर्माण क्षेत्र में अग्रणी बनाने के लिए प्रधानमंत्री मोदी सरकार पहले से ही प्रयासरत है। इसके कारण चीन की नींद उड़ी हुई है। विश्व की कई दिग्गज क्षेत्र की कंपनियाँ भारत में उत्पादन शुरू कर चुकी हैं। वहीं, विश्व स्तर पर भारत जलवायु परिवर्तन, कार्बन उत्सर्जन आदि में कटौती को लेकर भारत का स्टैंड साफ कर चुका है।

इस तरह एक दशक तक (2004-2014) तक देश के प्रधानमंत्री रहे एक विख्यात अर्थशास्त्री का यह बयान उस वक्त में बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है, जब विश्व के 20 शक्तिशाली देशों के नेता जी-20 में शामिल होने के लिए दिल्ली में पहुँचना शुरू हो चुके हैं। इसे वर्तमान सरकार की नीतियों की सफलता के तौर पर देखा जा रहा है।

जब 2008 में अतीक अहमद ने UPA सरकार को गिरने से बचाने में की थी मदद


माफिया अतीक अहमद के पकडे जाने से लेकर मारे जाने तक विपक्ष का बिलबिलाना स्वाभाविक है। उसका कारण है, जो माफिया इनका संकटमोचन बनता रहा हो, कर्जा तो चुकाना है।
 दूसरे, अतीक की मौत पर 'लोकतंत्र खतरे में' चिल्लाकर जनता को गुमराह करने वाले बताएं कि तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी की उन्हीं के निवास पर हत्या होने और भूतपूर्व प्रधानमंत्री राजीव गाँधी की इतनी सख्त सुरक्षा होने के बावजूद हत्या होने पर तब लोकतंत्र खतरे में क्यों नहीं था?अतीक अशरफ की पुलिस कस्टडी में यूं हत्या ना केवल योगी सरकार को बदनाम करने की साजिश है बल्कि "हिंदू आतंकवाद" की पटकथा लिखने का षडयंत्र भी हो सकती है! चर्चा है कि लगता है जिन्होंने अतीक को बनाया उन्होंने ही उसे खत्म करा दिया?
अपने लड़के के मरने के बाद अतीक टूटने लगा था, उसे अपने परिवार की चिंता सताने लगी थी; अब वो कई राज खोलने लगा था; हो सकता है कि उसने सरकार से सरकारी गवाह बनकर अपनी जान के बदले कुछ बड़े राज खोलने की डील की हो!
वर्ना अचानक पाकिस्तान से ड्रोन के सहारे भारतीय बॉर्डर में हथियार गिराने का राज क्यों खोलता वो? 
इस विषय के इर्द गिर्द तो उससे कोई पूछताछ भी नहीं कर रहा था?
विचारणीय है कि अगर पंजाब बॉर्डर पर पाकिस्तान हथियार फेंकता था तो आज तक पंजाब पुलिस को ये बात क्यों नहीं पता चली?
ISI, अंडरवर्ल्ड, पाकिस्तान के इस नेटवर्क में भारत बैठे कौन- कौन लोग जुड़े थे? 
पंजाब, कश्मीर, दिल्ली, उत्तर प्रदेश तक कई अपराधी और सफेद पोश लोग इस नेटवर्क में जुड़े हो सकते हैं?
अतीक अब इस नेटवर्क को एक्सपोज करने लगा था। वो ये भी बताने वाला था कि हथियार कहां छुपाकर रखें हैं। कहीं इसलिए ही तो पेशेवर शूटर्स की मदद लेकर अतीक, अशरफ को मरवा दिया गया?
अतीक अहमद ने माना था कि उसके संबंध आईएसआई और आतंकी संगठन लश्कर से हैं। वह पाकिस्तान से हथियार मंगवाता था। पंजाब में ड्रोन के जरिए जो हथियार गिराए जाते हैं, मैं उनको खरीदता था!
अतीक ने भी माना था कि उसके पास हथियारों की कोई कमी नहीं। उसने यह भी बताया कि जम्मू-कश्मीर में आतंकियों को भी हथियार ऐसे ही मिलते हैं!
चार्जशीट में के मुताबिक अतीक ने यह भी माना कि अगर उसे उन ठिकानों पर ले जाया जाए तो वह पैसा, हथियार और कारतूसों को बरामद करा सकता है!
प्रयागराज का ये गुंडा अब बड़े माफिया नेटवर्क और अपने संरक्षक राजनेताओं के लिए बेकार भी हो गया था। उसके जिंदा रहने से अधिक उसकी मौत कुछ लोगों के लिए जरुर फायदेमंद साबित हो सकती है। ये जांच का विषय है!
अतीक तो छोटा सा गुंडा था, लेकिन वो जिस नेटवर्क का हिस्सा था वो बहुत बड़ा था। अंधेरा कायम रहे वाली दुनिया में लादेन, बगदादी, अतीक, दाऊद किसी की कोई कीमत नहीं, बस नेटवर्क पर कोई आंच नहीं आनी चाहिए!
अतीक की मौत के कई लोगों को फायदे हो सकते हैं। उसकी 10 हजार करोड़ की संपत्ति पता नहीं कहां कहां बंटी होगी?
अतीक ISI, पाकिस्तानी आतंकी संगठन, भारतीय नेटवर्क.. बहुत बड़े नेटवर्क के राज खोलने वाला था!
इस घटना से हिंदुओं को भी बदनाम करने की साजिश रची गई हो सकती है।। उत्तर प्रदेश में हिंदू मुस्लिम दंगों को हवा देने की साजिश भी हो सकती है!
अंतराष्ट्रीय स्तर पर योगी जी और हिंदू दोनो को टारगेट किया जायेगा!
देखते हैं कुछ और परतें खुलने दीजिए, धीरे-धीरे ये पूरी साजिश समझ आएगी। 
क्या उत्तर प्रदेश में हो रही कार्यवाही से एक धर्म विशेष के ख़िलाफ़ है?
2023
14 मारे गए- 5 मुसलमान
2022
14 मारे गए, 1 मुसलमान
2021
26 मारे गए, 7 मुसलमान
2020
26 मारे गए, 5 मुसलमान
2019
34 मारे गए, 12 मुसलमान
2018
41 मारे गए, 14 मुसलमान
कुल 183 ढेर हुए अभियुक्तों में 59 मुसलमान।
20 मार्च 2017 से 12 अप्रैल 2023 तक।
10,933 कार्रवाई में 23,348 बदमाश गिरफ्तार।
183 अभियुक्त मारे गए, 13 पुलिसकर्मी मारे गए।
5046 जख्मी हुए, 1443 पुलिसकर्मी ज़ख्मी।
कुल 183 ढेर हुए अभियुक्तों में 59 मुसलमान।
मारे गए कुल अभियुक्तों में 32.24% मुसलमान।
माफिया अतीक अहमद लगातार 5 बार इलाहाबाद पश्चिम से विधायक रहा है। 1989, 1991, 1993, 1996 और 2002 – वो 5 बार जीत कर लगातार 15 वर्षों तक विधायक बना रहा। पहले 3 बार उसने बतौर निर्दलीय और फिर समाजवादी पार्टी और उसके बाद ‘अपना दल’ के टिकट पर चुनाव लड़ा। 2004 के लोकसभा चुनाव में उसने फूलपुर से बतौर सपा प्रत्याशी जीत दर्ज की। इसी साल केंद्र में UPA की सरकार भी बनी।

ये तो आपको पता ही होगा कि कांग्रेस UPA गठबंधन की सबसे बड़ी पार्टी थी और डॉक्टर मनमोहन सिंह को भले ही प्रधानमंत्री बनाया गया था, सत्ता की असली बागडोर सोनिया गाँधी के हाथ में थी। अब अतीक अहमद और उसका भाई अशरफ मारा जा चुका है। उसके बेटे असद का एनकाउंटर हो चुका है। लेकिन, कभी प्रयागराज में खौफ का दूसरा नाम रहा अतीक अहमद जब सांसद बन बैठा था तब उसने UPA सरकार की मदद की थी।

2004 वो साल था, जब वामपंथी दलों ने 43 सीटें जीत कर लोकसभा में अपनी अच्छी-खासी धमक बनाई थी। लेकिन, 2008 में अमेरिका के साथ परमाणु समझौते से खफा होकर उन्होंने यूपीए से समर्थन वापस ले लिया था। ऐसे समय में मुलायम सिंह यादव की सपा ने 36 सांसदों के साथ UPA की सरकार बचाई थी। राजेश सिंह द्वारा लिखित पुस्तक ‘BAAHUBALIS OF INDIAN POLITICS: From Bullet to Ballot’ में इस संबंध में एक खुलासा है।

इसमें बताया गया है कि अतीक अहमद समेत 6 अपराधी सांसदों को तब 48 घंटे के भीतर रिहा कर दिया गया था, ताकि वो वोट देकर संप्रग की सरकार बना सकें। इनमें अतीक अहमद का नाम भी शामिल था अतीक अहमद ने जेल से निकल कर UPA सरकार के पक्ष में संसद में वोट डाला था। उस समय UPA के 228 सदस्य थे और उसे 44 सांसदों की ज़रूरत थी। सपा के अलावा रालोद और जेडीएस ने भी तब कांग्रेस का समर्थन किया था। 

रहस्योघाटन : क्या UPA काल में पाकिस्तान के इशारों पर चलती थी भारत सरकार?

आज जिस तरह कांग्रेस के आतंकवाद, पाकिस्तान और चीन के साथ संबंधों का खुलासा हो रहा है, उसे देख हर देशप्रेमी कांग्रेसी को चाहे वह किसी भी जाति, धर्म, मजहब अथवा समुदाय से हो, देशहित में कांग्रेस और यूपीए समर्थक हर पार्टी को त्याग देना चाहिए। विशेषकर हर हिन्दू को। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता एवं भूतपूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुख़र्जी ने भी अपनी पुस्तक तक में सोनिया के हिन्दू विरोधी होने का जिक्र किया है। 
स्मरण हो, 1962 भारत-चीन युद्ध के दौरान कम्युनिस्ट पार्टी ने जवानों के लिए खून देने से साफ इंकार कर दिया था। फिर किस आधार पर कम्युनिस्ट भारत की जनता से वोट मांगते हैं? और जनता भी इतनी मुर्ख है, चुनावों में इनको वोट दे आती है। 

लेकिन डाटा वैज्ञानिक डॉ गौरव प्रधान द्वारा सोनिया कांग्रेस का आतंकवाद के साथ चोली-दामन का साथ होने के कई प्रमाण दिए हैं। वैसे इन मुद्दों पर यदाकदा चर्चा होती रहती भी थी। लेकिन कांग्रेस को एक बेगुनाह दोषी के रूप में हमारा मीडिया प्रस्तुत करता रहा। हैरानी की बात यह है कि कुर्सी की खातिर यूपीए को समर्थन दे रही पार्टियां भी खामोश रही। चुनावों में ये ही सभी पार्टियां अपने-आपको बहुत बड़ा देश-हितैषी और जनहित की बात करते नज़र आते हैं, जबकि हकीकत में कर इसके विपरीत हैं। 

मेरी अपनी व्यक्तिगत राय यह है कि इन देश विरोधी पार्टियों को बेनकाब करने के लिए व्यापक स्तर पर अजित डोवाल, कर्नल पुरोहित, साध्वी प्रज्ञा और स्वामी असीमानंद आदि के कटु अनुभवों को उजागर करना चाहिए। 2019 चुनाव में साध्वी प्रज्ञा द्वारा अपने दर्द भरे अनुभव सार्वजनिक करने पर विपक्ष चुनाव आयोग तक पहुँच जाता है, लेकिन चुनाव आयोग भी सच्चाई को छिपाने के लिए प्रज्ञा पर ही अंकुश लगा देती है। 

जिस कश्मीरी कांग्रेस नेता गुलाम नबी आज़ाद के राज्य सभा से विदाई समारोह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उनकी प्रशंसा में कसीदे तो खूब पढ़े, लेकिन आज़ाद की देश विरोधी हरकतों को क्यों भूल गए? क्या मोदी को आज़ाद की वास्तविकता नहीं मालूम थी?      
कर्नल पुरोहित का पाक में जासूसी नेटवर्क इतना मजबूत था कि आतंकी हाफिज सईद और लख्वी तक उनसे डरते थे। 

कर्नल पुरोहित 9 साल बाद नवी मुंबई की तालोजा जेल से रिहा हो गए है। उनकी रिहाई के बाद कई खुलासे सामने आ रहे है। एक बेहद चौंकाने वाला खुलासा डाटा वैज्ञानिक गौरव प्रधान ने किया है। 

डॉक्टर गौरव प्रधान ने कई बड़े नेताओं पर बेहद संगीन आरोप लगाए हैं, जिनकी सत्यता की जांच की जानी बेहद जरूरी हो गयी है। 

2010 में होनी थी सोनिया गाँधी और हाफिज सईद की मुलाकात ?

डॉक्टर प्रधान ने खुलासा किया है कि 2010 में सोनिया गाँधी और हाफिज सईद की मुलाकात होनी थी। पाकिस्तानी आतंकी हाफिज सईद इटालियन माता से 2010 में मिलना चाहता था, मगर इटालियन माता ने इंकार कर दिया क्योंकि इसमें काफी रिस्क था। 

वैसे सोनिया गांधी की आतंकियों से हमदर्दी कोई नयी बात नहीं है, इससे पहले पूर्व कानून मंत्री सलमान खुर्शीद भी आजमगढ़ की चुनावी रैली में कबूल कर चुके हैं कि बाटला हाउस एनकाउंटर में आतंकियों के मारे जाने की तस्वीरें देखकर सोनिया गांधी रो पड़ी थी। 

वैसे चर्चा भी है कि डॉ सुब्रमण्यम स्वामी ने भी कई बार सोनिया गाँधी और आतंकवादियों के बीच कुछ साठगाँठ होने की बात करते रहते हैं। 

दाऊद को बचाने के लिए अजित डोवाल को करवाया गिरफ्तार?

डॉक्टर प्रधान ने ये भी खुलासा किया कि 2005 में सोनिया-मनमोहन की सरकार के दौरान आज के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोवाल को मुंबई में गिरफ्तार कर लिया गया था, क्योंकि उन्होंने पाकिस्तान मे बैठे दाऊद को मारने की पूरी योजना बना ली थी। 

पाकिस्तान के कहने पर कर्नल पुरोहित को किया गिरफ्तार!

डॉक्टर गौरव प्रधान ने ये भी खुलासा किया कि 26/11 के मुंबई आतंकी हमले से ठीक पहले ही कर्नल पुरोहित को गिरफ्तार किया गया, क्योंकि कर्नल पुरोहित सेना के जासूस थे और 26/11 आतंकी हमले के प्लान के बारे में जानते थे। 

डॉ गौरव ने ये भी बताया कि कर्नल पुरोहित की पत्नी अपर्णा पुरोहित ने कहा था कि पाकिस्तान चाहता था कि कर्नल पुरोहित को गिरफ्तार कर लिया जाए और सोनिया-मनमोहन सरकार भी इसके बारे में विचार भी कर रही थी।

अपने खुफिया मिशन के दौरान  कर्नल पुरोहित पाकिस्तान के कई संवेदनशील और नापाक राज जान गए थे, कर्नल पुरोहित का बड़ा जासूसी नेटवर्क भी पाकिस्तान में खुफिया जानकारियां जुटा रहा था। इसीलिए पाकिस्तान कर्नल पुरोहित की कस्टडी की मांग कर रहा था..

गौरव प्रधान ने आगे खुलासा किया कि पाकिस्तानी जनरल पाशा के कहने पर ही कर्नल पुरोहित को ठीक 26/11 आतंकी हमले से पहले गिरफ्तार कर लिया गया, क्योंकि पाकिस्तानियों को शक था कि कर्नल पुरोहित को इस आतंकी हमले की भनक लग चुकी थी और वो हमले को विफल कर सकते थे..

कश्मीरी और कोंग्रेसी नेता आतंकियों की मदद करते थे?

इसके बाद डॉक्टर प्रधान ने और भी ज्यादा सनसनीखेज खुलासे करते हुए बताया कि कर्नल पुरोहित को पता चल गया था कि एक कश्मीरी नेता जो जम्मू कश्मीर का मुख्यमंत्री भी था, वो और कांग्रेसी नेता “मिया आज़ाद” (गुलाम नबी आज़ाद) एक ही गाड़ी में घुमते थे और उनके साथ उसी गाडी में आतंकी भी घूमते थे। गाड़ी पर लाल बत्ती लगी होने के चलते किसी को कानो-कान खबर तक नहीं होती थी। इसी नेता की गाड़ी का इस्तेमाल करके 2005 से लेकर 2010 तक कश्मीर में पैसों की फंडिंग में भी की गयी। 

हिन्दू आतंकवाद जुमले को साबित करने की साजिश?

डॉक्टर गौरव प्रधान ने खुलासा किया कि 26/11 मुंबई हमले का पूरा षड्यंत्र हिन्दुओ को आतंकी घोषित करने के लिए पाकिस्तान ने रचा था, ताकि इस्लामिक कट्टरपंथी आतंकियों पर से ध्यान हटाया जा सके। प्लान था कि आतंकी हमला करने के बाद सभी आतंकियों को मार दिया जाएगा और इस हमले को भी हिन्दू आतंकवाद से जोड़ दिया जाएगा..

उन्होंने बताया कि “26/11 आरएसएस की साजिश” नाम की किताब तो पहले से छाप कर रख ली गयी थी, जिसका विमोचन कांग्रेसी नेता दिग्विजय सिंह ने खुद किया था। गौरव प्रधान ने खुलासा किया कि जब आतंकी मुंबई में घुसे, उससे पहले ही देश के कई नेता इसके बारे में जानते थे और उन्होंने हेमंत करकरे को ख़ास निर्देश दिए थे कि एक भी आतंकी ज़िंदा ना बचने पाए..

मगर सिपाही तुकाराम ओम्बले ने कांग्रेस और पाकिस्तान की सारी योजना पर पानी फेर दिया और आतंकी कसाब को जिन्दा पकड़ लिए गया। आतंकियों ने हेमंत करकरे को पहचाना नहीं और धोखे से उन्हें गोली मार दी..

पी चिदंबरम, सुशील कुमार शिंदे, अहमद पटेल और सोनिया गांधी का साजिश में हाथ?

इस पूरी साजिश के पीछे डॉक्टर प्रधान ने पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम, पूर्व गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे और अहमद पटेल का नाम लिया। उन्होंने साजिश के पीछे इटालियन आंटी कहते हुए सोनिया गाँधी की और भी इशारा किया। 

लाल कृष्ण आडवाणी, नरेंद्र मोदी और बाल ठाकरे को मारने की साजिश?

डॉक्टर प्रधान ने खुलासा किया कि मुद्रिक में पाकिस्तानियों और भारत के गद्दारों की एक मीटिंग हुई थी, पाकिस्तान भारत की सैन्य ख़ुफ़िया एजेंसियों के बारे में जानना चाहता था। इसी मीटिंग में योजना रखी गयी कि बीजेपी नेता लाल कृष्ण आडवाणी, गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी और शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे को मार दिया जाये। मगर इटालियन माता ने इंकार कर दिया क्योंकि 2009 के चुनाव आने वाले थे और हिंदूवादी नेताओं के मारे जाने से कांग्रेस को चुनाव में नुक्सान होने का डर था। 

मोदी को फंसाने के लिए असीमानंद पर दबाव?

उन्होंने आगे खुलासा किया कि 26/11 हमले का पूरा का पूरा प्लान राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) को आतंकी संगठन बताकर हिन्दू आतंकवाद को सिद्ध करने के मकसद से बनाया गया था। इसी तरह समझौता एक्सप्रेस ट्रेन में ब्लास्ट के बाद गिरफ्तार किये गए पाकिस्तानी आतंकी को छोड़ दिया गया और स्वामी असीमानंद को इस केस में फंसा दिया गया। 

स्वामी असीमानंद को गिरफ्तार करके थर्ड डिग्री की यातनाएं दी गयीं और उनसे कहा गया कि यदि इन यातनाओं से बचना है तो गुजरात के एक बड़े बीजेपी नेता (नरेंद्र मोदी) का नाम ले लो।  इंकार करने पर असीमानंद को और यातनाएं दी गयी, ऐसा ही साध्वी प्रज्ञा के साथ भी किया गया। 

योजना थी कि 26/11 के आतंकी हमले में सभी आतंकियों को मार कर सारा इल्जाम आरएसएस पर लगा कर संघ को आतंकी संगठन घोषित किया जायेगा। इसके बाद नरेंद्र मोदी और अमित शाह को भी इसी तरह के केस में फंसा दिया जाएगा क्योंकि इटालियन माता 2004 से ही जानती थी की ये दोनों उसके लिए बड़ा खतरा है। 

10 सालों तक जनरल पाशा का था भारत पर राज?

गौरव प्रधान ने दावा किया कि दरअसल 2004 से 2014 तक देश में मनमोहन-सोनिया नहीं बल्कि पाक आईएसआई का जनरल पाशा राज कर रहा था, जो वो चाहता था वही यहाँ होता था।  डॉक्टर गौरव प्रधान ने बताया कि कर्नल पुरोहित का पाकिस्तान में काफी अच्छा जासूसी नेटवर्क था, जिसके कायल खुद अजित डोभाल भी थे। अजित डोभाल भी ये देखकर हैरान थे कि कर्नल पुरोहित ने अपने इसी जासूसी नेटवर्क के दम पर सात बार पाकिस्तान की साजिशों और हमलों को विफल कर दिया था..

डॉक्टर प्रधान ने ये खुलासा भी किया कि कर्नल पुरोहित का पाकिस्तान में जासूसी नेटवर्क इतना मजबूत था कि आतंकी हाफिज सईद और लख्वी तक उनसे डरते थे। इसी डर से दोनों आतंकी आकाओं की सुरक्षा भी पाकिस्तान ने बढ़ा दी थी। 

कर्नल पुरोहित पाक खुफिया एजेंसी और पाक आतंकियों दोनों के निशाने पर थे। जनरल पाशा के इशारे पर कांग्रेस सरकार ने कर्नल पुरोहित को गिरफ्तार कर जेल में डलवा दिया और बेपनाह यातनाएं दी। पूरी कोशिश की गयी कि इस देशभक्त सेना के अफसर को आतंकी घोषित कर दिया जाये! 

UPA एक NGO, कांग्रेस और विपक्ष ‘उजड़े हुए गाँव की जमींदारी…’ : शिव सेना का प्रहार

शिव सेना के रुख को देख ऐसा आभास होता है कि शिव सेना का सत्ता से मोह भंग हो गया है। अपने प्रमुख पत्र के माध्यम से जिस तरह कांग्रेस ही नहीं बल्कि यूपीए को एनजीओ बताने के बाद भी यदि एनसीपी और कांग्रेस का शिव सेना को समर्थन जारी रखने का कोई मतलब नहीं रहता। 
महाराष्ट्र की सत्ताधारी पार्टी शिवसेना के मुखपत्र ‘सामना’ में अपनी ही सहयोगी पार्टी कांग्रेस और राहुल गाँधी पर निशाना साधा गया है। इस संपादकीय में देश के विपक्षी दलों को कमजोर और बिखरा हुआ बताया गया है। ‘सामना’ के संपादकीय में लिखा है कि ‘लोकतंत्र के अधोपतन’ के लिए विपक्षी दल ही जिम्मेदार हैं और उन्हें आत्मचिंतन की आवश्यकता है। साथ ही लिखा है कि विपक्षी दलों को अभी एक सर्वमान्य नेता चाहिए, लेकिन इस मामले में वे दिवालिया हो गए हैं।

इस संपादकीय में खासकर के कांग्रेस के गाँधी परिवार को निशाना बनाया गया है। लिखा है कि बीते 5 वर्षों में सरकार ने किसी भी आंदोलन को लेकर गंभीरता ही नहीं दिखाई, क्योंकि सरकार के मन में विपक्षी दलों का कोई अस्तित्व ही नहीं है। यही उनकी दुर्दशा है। शिवसेना ने कांग्रेस वर्किंग कमिटी के नेताओं को इस विषय पर चर्चा करने की सलाह दी है कि उनके ‘सर्वोच्च नेता को घोषित तौर पर अपमानित करने की हिम्मत सत्ताधीश क्यों दिखाते हैं?’

शिवसेना ने कांग्रेस को ‘सरकार पर टूट पड़ने’ में कमजोर करार देते हुए कहा कि कांग्रेस सहित सभी विपक्षी दल ‘किसान आंदोलन’ को धार नहीं दे पाए हैं। साथ ही पश्चिम बंगाल में क़ानून-व्यवस्था बिगाड़ने के लिए भाजपा को ही जिम्मेदार ठहराया गया है। पूछा गया है कि कांग्रेस का नेतृत्व अब कौन करेगा? साथ ही उसने कांग्रेस को ये भी याद दिलाया कि उसके पास अमित शाह जैसे कोई ‘व्यवस्थापक’ भी नहीं है। संपादकीय में आगे लिखा है:

“कांग्रेस के नेतृत्व में एक ‘यूपीए’ नामक राजनीतिक संगठन है। उस ‘यूपीए’ की हालत एकाध ‘एनजीओ’ की तरह होती दिख रही है। ‘यूपीए’ के सहयोगी दलों द्वारा भी देशांतर्गत किसानों के असंतोष को गंभीरता से लिया हुआ नहीं दिखता। ‘यूपीए’ में कुछ दल होने चाहिए लेकिन वे कौन और क्या करते हैं? इसको लेकर भ्रम की स्थिति है। शरद पवार के नेतृत्व वाली राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) को छोड़ दें तो ‘यूपीए’ की अन्य सहयोगी पार्टियों की कुछ हलचल नहीं दिखती। शरद पवार का एक स्वतंत्र व्यक्तित्व है, राष्ट्रीय स्तर पर है ही और उनके वजनदार व्यक्तित्व तथा अनुभव का लाभ प्रधानमंत्री मोदी से लेकर दूसरी पार्टियाँ भी लेती रहती हैं।”

बिहार में कांग्रेस की हार की चर्चा करते हुए ‘सामना’ के संपादकीय में कहा गया है कि राहुल गाँधी की मेहनत में कमी जरूर है। मायावती, अखिलेश यादव, जगन रेड्डी, नवीन पटनायक, केसीआर, ममता बनर्जी, उद्धव ठाकरे, प्रकाश सिंह बादल और कुमारस्वामी जैसे नेताओं की पार्टियों को शिवसेना में लाने की बात कही गई है। शिवसेना ने विपक्षी दलों की हालत की तुलना ‘उजड़े हुए गाँव की जमींदारी’ से की है। साथ ही विपक्ष को ‘मरा हुआ’ बताया गया है।

‘सामना’ में इससे पहले भी कई संपादकीय में भाजपा सहित अन्य दलों व लोगों पर आपत्तिजनक टिप्पणियाँ की जाती रही हैं। शिवसेना के मुखपत्र ‘सामना’ ने अक्टूबर 5, 2020 को अपने संपादकीय में सुशांत सिंह राजपूत को असफल और चरित्रहीन कलाकार बताया था। तब अपने संपादकीय में सामना ने कहा था कि बीते दिनों बिहार के पूर्व डीजीपी गुप्तेश्वर पांडे को महाराष्ट्र द्वेष का गुप्तरोग हो गया था और देश के कई अन्य ‘गुप्तेश्वरों’ को (जो महाराष्ट्र पुलिस या सरकार पर सवाल उठा रहे थे) भी यह रोग हो गया था। 

यूपीए सरकार में कृषि मंत्री शरद पवार ने मॉडल एपीएमसी एक्ट को लागू करने और स्टेट एपीएमसी एक्ट में संशोधन के लिए कई बार मुख्यमंत्रियों को लिखा था पत्र

नए कृषि सुधार कानूनों के तहत एपीएमसी एक्ट में संशोधन किया गया है। इस संशोधन के विरोध में आज कई किसान संगठन सड़कों पर उतर कर प्रदर्शन कर रहे हैं और कांग्रेस पार्टी उनका समर्थन कर रही है। लेकिन इस संशोधन की पहल यूपीए सरकार में ही हो गई थी। यूपीए सरकार में तत्कालीन केंद्रीय कृषि मंत्री शरद पवार ने कहा था कि एपीएमसी (एग्री प्रोड्यूस मार्केटिंग कमेटी) विधेयक में किसानों के हित में संशोधन किया जा सकता है। इसके लिए उन्होंने राज्यों को भी पत्र भी लिखा था।

तत्कालीन कृषि मंत्री शरद पवार ने अगस्त 2010 और नवंबर 2011 के बीच सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों को पत्र लिखकर बार-बार मॉडल एपीएमसी एक्ट को लागू करने और स्टेट एपीएमसी एक्ट्स में संशोधन के लिए कहा था। उन्होंने मार्केटिंग इंफ्रास्ट्रक्चर में निजी क्षेत्र को प्रोत्साहित करने पर जोर दिया था, ताकि किसानों को प्रतिस्पर्धा के लिए वैकल्पिक माध्यम मिल सके। उन्होंने कहा था कि इससे किसानों को बेहतर दाम मिल सकेगा।

मॉडल एपीएमसी एक्ट को जरूरी बताते हुए शरद पवार ने अगस्त 2010 में राज्यों को पत्र लिखा था, जिसमें उन्होंंने भारत के ग्रामीण इलाकों में कृषि क्षेत्रों के संपूर्ण विकास, रोजगार और आर्थिक प्रगति के लिए बेहतर मार्केट की जरूरत पर बल दिया था। उन्होंने कहा कि मॉडल एपीएमसी एक्ट से किसानों को अपनी उपज लाभकारी मूल्य पर बेचने के लिए बेहतर विकल्प और बाजार मिल सकते हैं। शरद पवार ने फिर नवंबर 2011 में राज्यों को पत्र लिखकर यही बात दोहराई। उन्होंने निजी तौर पर सभी मुख्यमंत्रियों से अपील की कि किसानों की बेहतरी के लिए बिना देरी करे राज्य सरकारें कदम उठाए।

मई 2012 में तत्कालीन कृषि मंत्री शरद पवार का राज्यसभा में एक औपचारिक जवाब दर्ज है। इसमें उन्होंने खुलकर ऐग्रिकल्चर मार्केटिंग रिफॉर्म का समर्थन किया था। उन्होंने एक सवाल के जवाब में कहा था कि “कुछ सिफारिशें पहले ही स्वीकार की जा चुकी हैं, जैसे कृषि उपज की खरीद के उदारीकरण का प्रस्ताव… हमने सभी राज्यों के सहकारिता मंत्रियों से एपीएमसी एक्ट में संशोधन करने का अनुरोध किया है।”

एनडीटीवी से खास बातचीत में शरद पवार ने कहा था कि राज्यों को एपीएमसी में संशोधन के लिए प्रोत्सहित किया जा रहा है, ताकि किसानों को अपनी उपज बेचने के लिए वैकल्पिक साधन सुलभ हो सके और निजी व सहकारी क्षेत्र की भूमिका बढ़ाई जा सके।

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पवार ने कहा था कि किसान देश के किसी भी हिस्से में अपनी उपज बेच सकते हैं। वे मंडी में बेचने के लिएबाध्य नहीं होंगे। मंडी कराधान प्रणाली को भी हटा दिया जाएगा। कृषि क्षेत्र में निजी क्षेत्र को भी प्रेवश दिया जाएगा, जिससे कृषि उत्पादों के विपणन में मदद मिलेगी।

शरद पवार ने कहा था कि अधिक कृषि विकास पर एक बड़ी बाधा राज्यों का एपीएमसी अधिनियम है, जो मंडी प्रणाली के बाहर लेनदेन पर प्रतिबंध लगाता है। एपीएमसी एक्ट में संशोधन से कृषि में निजी क्षेत्र के आने से कोल्ड स्टोरेज और प्रसंस्करण यूनिटों को बढ़ावा मिल सकता है।

2013 में तत्कालीन कृषि मंत्री शरद पवार ने इसी किसान एक्ट में किस आधार पर बदलाव की वकालत थी?


एक समय था, जब देश में किसी भी सदन के चुनाव होने पर घर-घर हर पार्टी अपना घोषणा-पत्र वितरित किए जाते थे, लोग मतदान से पूर्व गंभीरता से उसका अध्ययन करते थे, मौहल्ले, मित्रों और ऑफिस में चर्चा करते थे, परन्तु कुछ समय से घोषणा-पत्र के वितरण पर शायद प्रतिबन्ध लग गया है, केवल कुछ प्रमुख बातें टीवी और अख़बारों पर उन्हें पढ़ने एवं सुनने को मिल जाता है। नगर निगम से लेकर लोक/राज्य सभा तक सदनों में चर्चा कर जनता के धन को खर्च कर जनता को ही मूर्ख बनाया जाता रहा है। 

परन्तु 2014 में मोदी सरकार बनने के बाद कुछ बदलाव जरूर आए हैं। अगर हकीकत में देखा जाए, मोदी सरकार ने ऐसा कोई नया काम नहीं किया है, जिसके लिए पीठ थपथपाई जाए। फिर भी जनता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पीठ थपथपा रहे हैं, क्यों? क्योंकि मोदी सरकार उन्ही बिलों को पास करवाकर प्रशंसा प्राप्त कर रही है, जिन्हें मोदी सरकार से पूर्व सरकारों ने बिल बना तो दिए, लेकिन उन्हें लागू करने का साहस नहीं जुटा पायीं। 

कांग्रेस और इसके समर्थक बताएं जीएसटी हो या नोट बंदी कितने वर्षों से लंबित पड़े थे? क्यों नहीं लागू किया? क्योंकि इनमे बिल बनाने की योग्यता थी, लेकिन लागू करने की इच्छाशक्ति नहीं। ताजा उदाहरण किसान बिल का ही लें, 2013 में तत्कालीन कृषि मंत्री शरद पवार ने इसी बिल में संशोधन की वकालत की थी, और राहुल गांधी ने कहा था कि कांग्रेस पार्टी के शासन वाले 12 राज्य अपने यहां फल और सब्जियों को एपीएमसी एक्ट से बाहर करेंगे। परन्तु मोदी सरकार ने बिल में संशोधन कर उसे लागू कर दिया, फिर किस आधार पर विरोध किया अथवा करवाया जा रहा है?   

किसानों की जान से खिलवाड़ कर रहे हैं पंजाब के मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह : मनोहर लाल खट्टर, हरियाणा मुख्यमंत्री     
किसान आंदोलन को लेकर हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह को कड़ी फटकार लगाई है। हरियाणा के मुख्यमंत्री ने अमरिंदर सिंह से कहा है कि वे किसानों की जान से खिलवाड़ कर रहे हैं। मनोहर लाल खट्टर ने एक के बाद एक तीन ट्वीट करते हुए पंजाब के मुख्यमंत्री पर निशाना साधा और कहा कि आपके झूठ, धोखे और प्रॉपगेंडा का वक्त खत्म हो गया है। वक्त आ गया है कि लोग अब अपका असली चेहरा देखें। कृपया कोरोना महामारी के दौरान लोगों के जीवन को खतरे में डालना बंद करें। मैं आपसे लोगों के जीवन के साथ नहीं खेलने का आग्रह करता हूं। कम से कम महामारी के समय सस्ती राजनीति से बचें।

एक अन्य ट्वीट में खट्टर ने कहा कि मैं पिछले 3 दिनों से आपसे संपर्क करने की कोशिश कर रहा हूं, लेकिन दुख की बात है कि आप संपर्क में नहीं आ रहे हैं। क्या यह किसान के मुद्दों के लिए आपकी गंभीरता नहीं दिखाता? आप केवल ट्वीट कर रहे हैं और बातचीत से भाग रहे हैं, क्यों?

अपने आखिरी ट्वीट में सीएम खट्टर ने कहा कि कैप्टन अमरिंदर जी, मैंने इसे पहले कहा है और मैं इसे फिर से कह रहा हूं कि अगर एमएसपी पर किसानों को कोई परेशानी होगी तो मैं राजनीति छोड़ दूंगा। इसलिए, कृपया निर्दोष किसानों को उकसाना बंद करें।

शरद पवार ने की थी एपीएमसी एक्ट में संशोधन और कृषि में निजी क्षेत्र के प्रवेश की वकालत

2013 में कांग्रेस के सांसद राहुल गांधी ने कहा था कि कांग्रेस पार्टी के शासन वाले 12 राज्य अपने यहां फल और सब्जियों को एपीएमसी एक्ट से बाहर करेंगे। अब कांग्रेस पार्टी ही एपीएमसी एक्ट में बदलाव का विरोध कर रही है। वहीं यूपीए सरकार में तत्कालीन केंद्रीय कृषि मंत्री, उपभोक्ता मामले, खाद्य और सार्वजनिक वितरण शरद पवार ने कहा था कि एपीएमसी (एग्री प्रोड्यूस मार्केटिंग कमेटी) विधेयक में किसानों के हित में संशोधन किया जा सकता है। एनडीटीवी से खास बातचीत में शरद पवार ने कहा कि राज्यों को एपीएमसी में संशोधन के लिए प्रोत्सहित किया जा रहा है, ताकि किसानों को अपनी उपज बेचने के लिए वैकल्पिक साधन सुलभ हो सके और निजी व सहकारी क्षेत्र की भूमिका बढ़ाई जा सके

पवार ने कहा था कि किसान देश के किसी भी हिस्से में अपनी उपज बेच सकते हैं। वे मंडी में बेचने के लिए बाध्य नहीं होंगे। मंडी कराधान प्रणाली को भी हटा दिया जाएगा। कृषि क्षेत्र में निजी क्षेत्र को भी प्रेवश दिया जाएगा, जिससे कृषि उत्पादों के विपणन में मदद मिलेगी। 

उन्होंने कहा कि अधिक कृषि विकास पर एक बड़ी बाधा राज्यों का एपीएमसी अधिनियम है, जो मंडी प्रणाली के बाहर लेनदेन पर प्रतिबंध लगाता है। एपीएमसी एक्ट में संशोधन से कृषि में निजी क्षेत्र के आने से कोल्ड स्टोरेज और प्रसंस्करण यूनिटों को बढ़ावा मिल सकता है।

उत्तर प्रदेश : मनमोहन सिंह के जमाने में घाटे का सौदा, अमेठी की मालविका में डूबे ₹366 करोड़,

मनमोहन सिंह-राहुल गॉंधीकांग्रेस सरकार के जमानों में सरकारी धन का किस तरह दुरुपयोग किया जाता रहा है, इसका सटीक नमूना अमेठी के मालविका स्टील का अधिग्रहण है। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक इसके अधिग्रहण के बाद से सार्वजनिक क्षेत्र की जानी-मानी कंपनी स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया (सेल) को करीब 366 करोड़ का नुकसान हो चुका है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार के दौरान मालविका स्टील के अधिग्रहण के लिए सेल को मजबूर किया गया था।
अमेठी गॉंधी परिवार का गढ़ रहा। जिस जमाने में यह अधिग्रहण हुआ उस समय कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गॉंधी यहॉं से सांसद हुआ करते थे। हालॉंकि पिछले आम चुनाव में उन्हें अपने गढ़ में ही भाजपा की स्मृति ईरानी से मुॅंह की खानी पड़ी थी। मालविका स्टील में निवेश के लिए सेल को यूपीए सरकार ने अपने दूसरे कार्यकाल (2009-2014) में राजी किया था। उसके बाद से सेल को हुए नुकसान का खुलासा कैग की हालिया रिपोर्ट से हुआ है।
संसद में पेश भारत के नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक (कैग) की हालिया रिपोर्ट में बताया गया है कि सेल द्वारा उत्तर प्रदेश की कंपनी मालविका स्टील का अधिग्रहण बेकार निवेश साबित हुआ है। बीमार कंपनी में जान फूँकने के लिए पीएसयू द्वारा किया गया 366 करोड़ रुपए का निवेश बेकार रहा है।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक यूपीए के कार्यकाल के दौरान जब ये फैसला हुआ था, उस समय इस पर कई लोगों ने सवाल उठाया था। साथ ही मालविका स्टील में सुधार लाने के लिए सेल का इस्तेमाल करने को राजनीतिक फैसला भी कहा गया था। लेकिन उस समय इस अधिग्रहण को ऐसे पेश किया गया जैसे इससे बड़े पैमाने पर रोजगार पैदा होंगे। साथ ही इससे इलाके में औद्योगिक विकास का रास्ता भी तैयार होगा।
हालाँकि, सेल हमेशा से कहती रही कि मालविका स्टील का अधिग्रहण उसके लिए व्यावहारिक नहीं है। अधिग्रहण के वक्त ही बंद पड़ी मालविका स्टील कबाड़ का रूप ले चुकी थी। दैनिक जागरण की रिपोर्ट के अनुसार उस समय इस संपत्ति के इस्तेमाल का अध्ययन करने के लिए एक समिति भी गठित की गई थी। इस समिति ने 2015 में बताया था कि ज्यादातर उपकरणों का 17 साल से इस्तेमाल नहीं हुआ था और वे किसी काम के नहीं थे। बताया गया था कि इससे संयंत्र का रूप देना और उसे चालू करना संभव नहीं है।
कैग की रिपोर्ट में कहा गया कि सेल ने 2009 में 44.35 करोड़ रुपए में इस प्लांट का अधिग्रहण किया था। इसके बाद 94 करोड़ रुपए का निवेश इसमें और किया गया। अब तक सेल इस प्लांट पर करीब 366 करोड़ रुपए खर्च कर चुकी है, लेकिन नतीजा कुछ नहीं निकला है। दिलचस्प यह है कि 739.65 एकड़ में फैले मा​लविका स्टील का जमीन आज तक सेल के नाम पर ट्रांसफर नहीं हुआ है।

टाइम्स नाउ सर्वे: जानिए अगर आज लोकसभा चुनाव हुए तो किसकी बनेगी सरकार, राज्यवार सीटों का पूरा विश्लेषण

Times Now Survey 2019पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव के बाद अब 2019 के लोकसभा चुनाव की चर्चा शुरु हो गई है। इन चुनावों को 2019 के सेमीफाइनल के तौर पर देखा जा रहा था। एक सवाल शायद हर किसी के मन में उठ रहा होगा कि यदि आज लोकसभा चुनाव होते हैं तो किसकी सरकार बनेगी? उत्तर प्रदेश में क्या भाजपा 2014 का करिश्मा दोहरा पाएगी? या बंगाल में भाजपा को उम्मीद से ज्यादा सीटें मिल सकती हैं? ऐसे बहुत सवाल हैं जो आम जन के मन में उठ रहे होंगे। इन्ही सवालों का जवाब जानने के लिए टाइम्स नाउ-सीएनएक्स ने मिलकर पूरे देश में एक सर्वे किया है, जिनमें हर राज्य का विश्लेषण किया है। इस सर्वे के मुताबिक यदि आज चुनाव होते हैं तो 543 लोकसभा सीटों में एनडीए के खाते में 281 सीटें, यूपीए के खाते 124 सीटें और अन्य के खाते में 138 सीटें जा सकती हैं।
राज्यवार सीटों का ब्यौरा
उत्तर प्रदेश
एनडीए को उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा नुकसान मिलता दिख रहा है यहां की 80 सीटों में से पिछली बार उसे 72 सीटें मिली थी जो टाइम्स नाउ-सीएनएक्स के सर्वे में यदि आज चुनाव होते हैं तो भाजपा को 55 सीटें मिलती दिख रही हैं जबकि को बसपा को 9, सपा को 9, कांग्रेस को 05 तथा अन्य खाते में 02 जीती दिख रही हैं।

महागठबंधन बनने की स्थिति में
यदि समाजवादी पार्टी, बसपा, कांग्रेस और आरएलडी का महागठबंधन होता है तो एनडीए को और ज्यादा नुकसान हो सकता है तब एनडीए के खाते में 31 महगठबंधन के खाते में 49 सीटें जा सकती हैं।
राजस्थान
टाइम्स नाउ-सीएनएक्स के सर्वे में राजस्थान में भाजपा को 13 सीटों का नुकसान हो रहा है। यहां की सभी 25 सीटों पर 2014 में भाजपा का कब्जा था लेकिन इस बार यदि आज चुनाव होते हैं भाजपा को यहां 12 तथा कांग्रेस को 13 सीटें मिल सकती हैं, यानि भाजपा को 13 सीटों को नुकसान हो रहा है। इस सर्वे के मुताबिक मध्य प्रदेश में भी भाजपा को खासा नुकसान होता दिख रहा है राज्य की 29 सीटों में 2014 में भाजपा का 27 सीटों पर कब्जा था जबकि कांग्रेस के पास मात्र 2 सीटें थी। इस बार यहां भाजपा को 20 और कांग्रेस के खाते में 9 सीटें मिलती दिख रही हैं।
मध्य प्रदेश
मध्य प्रदेश की कुल 29 सीटों में से भाजपा के खाते में यदि आज चुनाव होते हैं 20 सीटें मिलती हुई दिख रही हैं जबकि 2014 में भाजपा के खाते में 27 सीटें आईं थी। वहीं कांग्रेस को यहां 7 सीटों का फायदा मिलता दिख रहा है। कांग्रेस को यहां इस बार 9 सीटें मिल सकती हैं।
दिल्ली और जम्मू-कश्मीर
वहीं दिल्ली की सातों सीटों पर अगर आज चुनाव हुए तो वह भाजपा के खाते में जा सकती हैं। 2014 में भी भाजपा ने सातों सीटों पर कब्जा किया था। वहीं जम्मू-कश्मीर की 6 सीटों में से भाजपा को 2 सीटें मिल सकती हैं, जबकि कांग्रेस को एक, पीडीपी को एक तथा नेशनल कांन्फ्रेंस को 2 सीटें मिल सकती हैं।
महाराष्ट्र
महाराष्ट्र की 48 लोकसभा सीटों में अगर आज चुनाव हुए तो भाजपा को 30 सीटें मिल सकती है। कांग्रेस को 05 सीटें, शिवसेना को 08 सीटें और एनसीपी को 05 सीटें मिल सकती हैं।
बिहार और झारखंड
बिहार की बात करें तो राज्य में कुल 40 सीटें हैं और टाइम्स नाउ-सीएनएक्स के सर्वे के मुताबिक, यदि आज चुनाव होते हैं तो भाजपा को 15 और उसकी सहयोगी जेडीयू को 9 तथा आरजेडी को 10 और कांग्रेस को 1 तथा अन्य के खाते में 5 सीटें जाती हुई दिख रही हैं। झारखंड की कुल 14 सीटें में एनडीए को 8 तथा यूपीए को 5 और अन्य के खाते में 1 सीट जाती हुई दिख रही है।
गुजरात और छत्तीसगढ़
गुजरात ऐसा राज्य है जहां इस सर्वे के मुताबिक भाजपा को कोई नुकसान नहीं होता दिख रहा है। यहां भाजपा ने 2014 में सभी 26 सीटों पर जीत हासिल की थी जो इस बार भी बरकरार रह सकती हैं। सर्वे के मुताबिक, यदि आज चुनाव होते हैं तो इस बार भी कांग्रेस का कोई खाता नहीं खुलेगा। छत्तीसगढ़ की कुल 11 सीटों में से एनडीए के खाते में 7 तथा यूपीए के खाते में 4 सीटें जा सकती हैं।
हरियाणा
हरियाणा की कुल 10 लोकसभा सीटों में से भाजपा को 2014 में 7 सीटें मिली थी जबकि कांग्रेस के खाते में एक तथा आईएनएलडी के खाते में 2 सीटें गईं थी। इस सर्वे के मुताबिक,यदि आज चुनाव होते हैं तो भाजपा को 8, कांग्रेस तथा आईएनएलडी को 1-1 सीट मिल सकती हैं।
उत्तराखंड
वहीं पहाड़ी राज्यों की बात करें तो उत्तराखंड और हिमाचल में भी भाजपा को एक-एक सीट का नुकसान होता दिख रहा है। उत्तराखंड में भाजपा को पिछली बार सभी 5 सीटों पर जीत मिली थी। इस सर्वे के मुताबिक यदि आज चुनाव होते हैं तो भाजपा को एक सीट का नुकसान हो सकता है। जबकि एक सीट कांग्रेस के खाते में एक सीट जा सकती है।
हिमाचल प्रदेश
2014 में हिमाचल प्रदेश की सभी 4 सीटों पर भाजपा का कब्जा था लेकिन इस सर्वे के मुताबिक इस बार भाजपा को 3 तथा कांग्रेस को 1 सीट मिल सकती है।
पश्चिम बंगाल
पश्चिम बंगाल में यदि आज चुनाव होते हैं तो भाजपा को अच्छी सफलता मिल सकती है टाइम्स नाउ-सीएनएक्स के मुताबिक राज्य की 42 सीटों में से भाजपा के खाते में 8 सीटें जा सकती है जो 2014 के मुकाबले 6 ज्यादा हैं। टीएमसी को यहां 7 सीटों का नुकसान हो सकता है और 27 सीटें मिल सकती हैं। जबकि सीपीएम को 05, कांग्रेस को 02 मिल सकती हैं।
ओडिशा
वहीं ओडिशा में एनडीए को 5 सीटें तथा यूपीए को 0 और अन्य के खाते में 16 सीटें जा सकती हैं।
दक्षिण भारत
वहीं दक्षिण भारत की 132 सीटों जिसमें आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु, तेलंगाना, अंडमान निकोबार, लक्ष्यद्वीप और पुदुचेरी शामिल हैं, वहां में से एनडीए के खाते में यदि आज चुनाव होते हैं तो 19 सीटें, यूपीए की 45, टीडीपी की 8, टीआरएस की 13 तथा अन्य के खाते में 47 जाती हुई दिख रही हैं। यहां एनडीए को 2014 के मुकाबले 4 सीटों का नुकसान हो रहा है जहां उसे तब 23 सीटें मिली थीं। वहीं तब यूपीए को 24 सीटें मिली थी जो इस बार बढ़कर 45 होती दिख रही हैं। कर्नाटक की  कर्नाटक 28 सीटों में भाजपा को 15, कांग्रेस को 9 तथा जेडीएस को 4सीटें मिलती दिखत रही हैं।
पूर्वी भारत
पूर्वी भारत जिसमें पश्चिम बंगाल, ओडिशा, मिजोरम, नागालैंड, मेघालय आसाम, त्रिपुरा, मणिपुर, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश की कुल कुल 87 सीटें हैं वहां एनडीए को अच्छी खासी सफलता मिलती दिख रही है। 2014 में एनडीए को महज 12 सीटें मिली थी इस सर्वे में यदि आज चुनाव होते हैं तो एनडीए को 34 सीटें मिलती दिख रही हैं। जबकि यूपीए को 2014 के 14 सीटों के मुकाबले महज 4 सीटें मिलती दिख रही हैं। वहीं टीएमसी को 27 सीटें मिलती दिख रही हैं जबकि 2014 में टीएमसी को 34 सीटें मिली थीं। 2014 में 20 सीटें लाने वाली बीजेडी को 4 सीटों का नुकसान होता दिख रहा है और 16 सीटें इस सर्वे में मिल रही हैं। जबकि अन्य को 6 सीटें मिल रही है।