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मीलॉर्ड, क्या एक बार फिर अराजकता फैलाने की सुपारी ले ली आपने? क्या चाहते हैं हाई कोर्ट के जज? कथित किसानों को दिल्ली जाकर आग लगाने दी जाए और प्रधानमंत्री मोदी के आवास को घेरने दिया जाए; गुंडों को अधिकार दे रहे हो और सरकार को फर्ज समझा रहे हो?

मीलॉर्ड ये किसान प्रदर्शन है या दंगाइयों को छुड़वाने का प्रदर्शन?
सुभाष चन्द्र

लेखक 
पंजाब & हरियाणा हाई कोर्ट ने लगता है एक बार फिर देश को अराजकता की आग में झोकने की सुपारी ले ली है जो आदेश में यह कहा है कि ‘किसानों” को प्रदर्शन का अधिकार है लेकिन नागरिकों की सुरक्षा करना सरकार का भी कर्तव्य है।  

जिन आंदोलनों में बंदूक, लाठी और तलवारें हो, उपद्रविओं को रिहा करने की मांग हो, प्रधानमंत्री के मरने की बात हो रही हो, क्या उसे प्रदर्शन कहा जा सकता है? किसानों की आड़ में देश को अराजकता की आग में झोंका जा रहा है, जिसे मोदी-योगी विरोधी पार्टियों के पूर्ण समर्थन से देश में आग लगाने का प्रयास किया जा रहा है, क्या अदालतों को नहीं मालूम? क्या मीलॉर्ड पिछले प्रदर्शन में लाल किले पर हुए हंगामे को भूल गए हैं? इतना ही नहीं, जिस प्रकार ट्रैक्टरों को लेकर आया गया है, क्या मीलॉर्ड ने ऐसे ट्रेक्टर देखे हैं? अराजक तत्वों के हाथ की कठपुतली मत बनो मीलॉर्ड?

यही हाई कोर्ट पिछले वर्ष NH - 44 पर प्रदर्शन कर रहे किसानों से हाईवे को मुक्त कराने के आदेश दे रहा था यानी उस आदेश में किसानों को बलपूर्वक उठाने की बात कर रहा था और आज कह रहा है उन्हें प्रदर्शन का अधिकार है। साथ में सरकार को प्रवचन दे रहे हैं हाई कोर्ट के जज कि नागरिकों की सुरक्षा की जिम्मेदारी का काम आपका(सरकार) का है।

किसान आंदोलन में शरजील इमाम, उमर खालिद का पोस्टर

किसान आंदोलन में शरजील इमाम और उमर खालिद का पोस्टर क्या कर रहा है।

हरियाणा सरकार ने अदालत में बताया कि किस तरह का उग्र प्रदर्शन करने की तैयारी की हुई है कथित किसानों ने और वे शम्भू बॉर्डर पर खालिस्तान से जुडी बातें भी कर रहे हैं, किसान मोडिफाई किए गए ट्रैक्टरों के साथ हैं और हथियारों की आशंका से भी इंकार नहीं किया जा सकता।  

इतने पर भी यदि हाई कोर्ट के जजों को लगता है कि कथित किसान शांतिपूर्ण प्रदर्शन करेंगे तो ऐसे जजों की सोच पर प्रश्नचिन्ह लगना स्वाभाविक है। यह नहीं माना जा सकता कि सोशल मीडिया, टीवी और समाचार-पत्रों की रिपोर्ट हाई कोर्ट के जजों तक नहीं पहुँच रही होंगी  फिर भी आप उन्हें प्रदर्शन का अधिकार दे रहे हो।  

“रेलवे ट्रैक रोकना किस तरह जायज है, सड़के जाम करना कैसे जायज है, मोदी अबकी पंजाब आएगा तो जिंदा वापस नहीं जाने देंगे, हमें खालिस्तान दे दो, हमें पाकिस्तान से जुड़ जाने दो,  मोदी का ग्राफ बढ़ गया है, उसे नीचे लाना है किसी भी तरह से और हम विपक्ष के लिए प्रदर्शन कर रहे हैं”। 

अफ़सोस की बात है कि इतना सब होने के बाद भी हाई कोर्ट के जज कह रहे थे कि किसान प्रदर्शन के लिए दिल्ली जा रहे हैं तो इसमें हरियाणा सरकार को क्या आपत्ति है; आखिर क्यों हरियाणा सरकार हाइवे पर बेरिकेडिंग कर रही है।  

ऐसी बातों के चलते भी अगर हाई कोर्ट के जज अंधे हो कर कहते रहेंगे कि किसानों को प्रदर्शन का अधिकार है तो इसका मतलब साफ़ है कि ऐसे जजों ने देश को अराजकता की आग में झोकने की सुपारी ली हुई है। उधर CJI चंद्रचूड़ ने कहा कि अगर वकीलों को अदालत में आने में समस्या होती है तो हम “सामजस्य बैठाएंगे”। मतलब केवल वकीलों की समस्या पर ध्यान है जनता जाए भाड़ में। 

सपा नेता दे रहा गृहयुद्ध की धमकी
तजिंदर विर्क खुद को किसान बताने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन ये समाजवादी पार्टी के नेता हैं। ये शख्स भारत में गृहयुद्ध की धमकी दे रहा है।

खालिस्तान बनाने दो…हम पाकिस्तान के साथ जुड़ जाएंगे
फर्जी किसान आंदोलन में शामिल एक किसान की बात सुनिए, हमको छोड़ दो, खालिस्तान बनाने दो…हम पाकिस्तान के साथ जुड़ जायेंगे।

पंजाब पुलिस के जवान को ट्रैक्टर से कुचला
ये कौन से किसान हैं जो खून के प्यासे हैं? पंजाब पुलिस के जवान को ये उग्रवादी ट्रैक्टर से कुचलता हुआ, 50 मीटर तक घसीटता रहा। ये आतंकवाद है, उग्रवाद है। पंजाब आम आदमी पार्टी की सरकार है और उन्होंने फर्जी किसानों और खालिस्तानी आतंकवादियों को खुली छूट दे रखी है। पुलिस के जवानों को रौंदा जा रहा है और प्रशासन सोया हुआ है।

किसानों ने फ्लाईओवर पर सुरक्षा बोर्ड को तोड़ दिया
फर्जी किसान प्रदर्शनकारियोंने हरियाणा-पंजाब शंभू सीमा पर फ्लाईओवर पर सुरक्षा के लिए लगाए गए बोर्ड को तोड़ दिया। यह कैसा शांतिपूर्ण आंदोलन है।

बंदूक के साथ प्रदर्शन करने आए किसान
क्या किसान कभी बंदूक लेकर चलता है। ये किसान बंदूक के साथ प्रदर्शन करने आए हैं। बंदूक के साथ आए ये लोग किसान नहीं हैं। ये युद्ध पर आमादा हैं।

16 लाख की कार के साथ प्रदर्शन
किसान इतने मजबूर हैं कि उन्हें अपनी 16 लाख की कार के साथ प्रदर्शन करने सड़क पर उतरना पड़ा है। जिस गाड़ी पर ये “तथाकथित किसान” बैठे हैं उसकी कीमत 16 लाख से अधिक है! क्या कोई बता सकता है कि एक सामान्य किसान इतनी कमाई कैसे कर सकता है कि उसके पास 16 लाख से अधिक की कार हो? क्या वाकई एक सामान्य किसान सिर्फ एक राज्य तक सीमित इस विरोध प्रदर्शन का समर्थन कर रहा है? और अगर वे किसान हैं और इतने अमीर हैं तो अब वे क्या चाहते हैं? संपूर्ण ऋण माफ़ किया जाए ताकि सामान्य भारतीय करदाता उसका भुगतान कर सके?

क्या चाहते हैं हाई कोर्ट के जज? कथित किसानों को दिल्ली जाकर आग लगाने दी जाए और प्रधानमंत्री मोदी के आवास को घेरने दिया जाए जैसा अमेरिका में बैठा गुरपतवंत सिंह पन्नू आदेश दे रहा है। दिल्ली को श्रीलंका बनाना चाहता है विपक्ष। 

यही किया था CJI बोबडे ने पिछले किसान आंदोलन के समय जब दिल्ली पुलिस से किसानों के 26 जनवरी के मार्च पर रोक लगाने की मांग की थी लेकिन बोबडे ने मना कर दिया और कहा था कि कानून व्यवस्था देखना आपका काम है और उसके बाद क्या हुआ लाल किले पर सबने देखा। आज वही सुप्रीम कोर्ट कह रहा है मुझे RTI के जवाब में कि मुझे उस विषय पर सवाल करने का कोई अधिकार नहीं है और यह भी कहा है कि जो Experts की Committee बनाई थी उसकी रिपोर्ट पर क्या कार्रवाई हुई यह भी उनके रिकॉर्ड में नहीं है। कितना बड़ा फ्रॉड किया कोर्ट ने। 

कथित किसानों को लेकर जितना कांग्रेस, आप या अन्य विपक्षी नेताओं को कटघरे में खड़ा करने की जरूरत है उससे ज्यादा जरूरत न्यायाधीशों की हरकतों को बेनकाब करने की है।  

मोदी की लोकप्रियता कम नहीं होगी पाखंडी राहुल “कालनेमि” समझ ले और तू भी समझ ले केजरीवाल और अखिलेश यादव : ये कथित किसान तुम्हारे दलों को खेतों में ही दफ़न कर देंगे अबकी बार। 

टूलकिट का नया शगूफा : 2024 से पहले समलैंगिक आंदोलन खड़ा करने की साजिश, 17 महंगे वकीलों का 1 करोड़ फीस रोजाना कौन दे रहा?

सेम सेक्स मैरेज यानी समलैंगिक विवाह मामले पर सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पांच जजों की संविधान पीठ रोजाना सुनवाई कर रही है। इससे अंदाजा लगा सकते हैं कि विद्वान जजों की नजर में यह कितना महत्वपूर्ण विषय है। जबकि वर्ष 2022 के आंकड़ों के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट में 11 हजार मामले पेंडिंग हैं। एक नजर में देखा जाए तो यह नया कानून बनाने का मामला है जो कि संसद के अधिकार क्षेत्र में आता है। इस लिहाज से इस विषय को संसद पर ही छोड़ देना चाहिए था। खैर, अब तो रोजाना आधार पर सुनवाई हो रही है और पांच-सदस्यीय संविधान पीठ गोद लेने, उत्तराधिकार, पेंशन से जुड़े कानून और ग्रेच्युटी आदि विषयों पर कई कानूनी सवालों से जूझ रही है। इस बीच एक दिलचस्प जानकारी निकलकर आई है कि सेम सेक्स मैरेज के याचिकाकर्ताओं की तरफ से जो नामी वकील दलीलें पेश कर रहे हैं उनका रोजाना फीस करीब 1 करोड़ रुपये है। ऐसे में सवाल उठता है कि यह एक करोड़ रुपये कहां से आ रहा है। इससे विदेशी साजिश और भारत पर पश्चिम की संस्कृति थोपने की साजिश की बू आती है।

कौन दे रहा वकीलों का रोजाना करीब 1 करोड़ फीस

टि्वटर यूजर @Starboy2079 ने वकीलों की फीस से संबंधित ट्वीट किया है। याचिकाकर्ताओं की ओर से इस केस को लड़ रहे वकीलों की फीस पर गौर करें तो पाएंगे तो इनकी फीस रोजाना 1 करोड़ के करीब बैठती है। इस केस को लड़ने वाले वकीलों की फीस देखें- कपिल सिब्बल 15 लाख रुपये प्रति सुनवाई, मुकुल रोहतगी 15 लाख रुपये प्रति सुनवाई, अभिषेक मनु सिंघवी 10 लाख, केवी विश्वनाथन 4 लाख, राजू रामचंद्रन 4 लाख, जयना कोठारी 4 लाख, वृंदा ग्रोवर 4 लाख, अरुंधती काटजू 3 लाख, सौरभ किरपाल 3 लाख, करुणा नंदी 3 लाख, गीता लूथरा 2 लाख, आनंद ग्रोवर 2 लाख, अनीता शेनाय 2 लाख, मेनका गुरुस्वामी 2 लाख, राघव अवस्थी 2 लाख, शिवम सिंह 1 लाख, नमिता सक्सेना 1 लाख रुपये प्रति सुनवाई। यानी इनकी फीस देखें तो करीब 77 लाख से 1 करोड़ रुपये प्रतिदिन बैठती है। यह आंकड़े एक औसत आकलन है जो विभिन्न समाचार माध्यमों से लिया गया है। असल आंकड़ा इससे कम या ज्यादा हो सकता है।

2024 लोकसभा चुनाव से पहले समलैंगिक आंदोलन खड़ा करने की साजिश

सेम सेक्स मैरेज केस की जिस तरह रोजाना सुनवाई हो रही है। इससे इस संदेह को भी बल मिलता है इसमें विदेशी ताकतें शामिल हैं। सेम सेक्स मैरेज केस का असली मकसद 2024 लोकसभा चुनाव से पहले समलैंगिक आंदोलन (ट्रांस मूवमेंट) खड़ा करना है। जिससे देश की कानून व्यवस्था को अस्थिर किया जा सके। यह भारतीय सभ्यता के खिलाफ एक बड़ी साजिश भी है जो परिवार के ताने-बाने छिन्न-भिन्न करना चाहते हैं।

सामान्य व्यक्ति को डेट नहीं मिलती, समलैंगिक याचिका पर तत्काल सुनवाई

कुछ बेतरतीब समलैंगिक जोड़े याचिका दायर करते हैं। और उन सबकी सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में रोजाना होने लगती है। एक सामान्य व्यक्ति को सालों तक सुनवाई के लिए डेट नहीं मिलती है लेकिन इस मामले में सुप्रीम कोर्ट उन्हें तत्काल सुनवाई की डेट ही नहीं देती बल्कि संविधान पीठ रोजाना आधार पर सुनवाई करने लगती है। केस लड़ने के लिए याचिकाकर्ताओं की ओर से देश महंगे हायर किए गए हैं। केंद्र सरकार कह चुकी है कि कानून बनाना संसद का काम है इसके बावजूद सुप्रीम कोर्ट एकतरफा तौर पर सुनवाई कर रही है। जैसे-जैसे सुनवाई आगे बढ़ रही है, कई जटिलताएं भी सामने आ रही है।

संविधान पीठ के जज बैचमेट, क्या यह हितों का टकराव नहीं है?

टि्वटर यूजर @KailashGWagh ने एक महत्वपूर्ण मुद्दा उठाया है कि क्या यह सही नहीं है कि संविधान पीठ के 5 जजों में से 3/4 जज SameSexMarriage मामले की सुनवाई कर रहे CLC के बैचमेट हैं? क्या यह हितों का टकराव नहीं है? आप संसद को बायपास क्यों करना चाहते हैं और विशेष विवाह अधिनियम में संशोधन क्यों करना चाहते हैं? संविधान सुप्रीम कोर्ट को संसद द्वारा पारित कानूनों को बदलने की अनुमति नहीं देता है, जिसके पास केवल नए कानूनों में संशोधन/बनाने का अधिकार है!

यह संसद में चर्चा का विषय है, ज्यूडिशियरी में नहींः महेश जेठमलानी

राज्यसभा सांसद और सीनियर एडवोकेट महेश जेठमलानी ने सेम सेक्स मैरिज को लेकर कहा कि ज्यूडिशियरी का नहीं, ये संसद का मामला है। जेठमलानी ने कहा कि समलैंगिक विवाह का मामला विशेष रूप से संसद के लिए है। मैरिज अधिकारों का एक पूरा सेट है और यह आपको कानून के दायरे में लाता है। शादी सिर्फ कोई एक समारोह नहीं है। महेश जेठमलानी ने आगे कहा कि LGBTQ के बीच क्रॉस मैरिज भी समस्याओं का कारण बनेंगे। स्पेशल मैरिज एक्ट के तहत भी चुनौतियां होंगी। यह संसद में चर्चा का विषय है। इस पर ज्यूडिशियरी को कानून नहीं बनाना चाहिए।

सरकार ने कहाः सेम-सेक्स मैरिज पर कानून बनाने के लिए संसद

समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता देने वाली याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई चल रही है। इस मामले में सरकार ने अपना पक्ष रखते हुए कहा कि ऐसे मामलों पर कानून बनाना सरकार का काम है, कोर्ट इससे खुद को अलग रखे। केंद्र सरकार की तरफ से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता पक्ष रखा। उन्होंने अपनी दलील में कहा कि विवाह का मामला सामाजिक-कानून का मामला है, ऐसे में यह विषय विधायिका के अधिकार क्षेत्र का है।

कई कानूनी सवालों से जूझ रही संविधान पीठ

चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पांच-सदस्यीय संविधान पीठ गोद लेने, उत्तराधिकार, पेंशन से जुड़े कानून और ग्रेच्युटी आदि विषयों पर कई कानूनी सवालों से जूझ रही है। अदालत ने कहा कि अगर समलैंगिक विवाह की अनुमति दी जाती है, तो इसके नतीजे के पहलुओं को ध्यान में रखते हुए इसकी न्यायिक व्याख्या, विशेष विवाह अधिनियम, 1954 तक ही सीमित नहीं रहेगी। इसके दायरे में पर्सनल लॉ भी आ जाएंगे। पीठ ने कहा कि शुरू में हमारा विचार था कि इस मुद्दे पर हम पर्सनल लॉ को नहीं छुएंगे, लेकिन बिना पर्सनल लॉ में बदलाव किए समलैंगिक शादी को मान्यता देना आसान काम नहीं है।

समलैंगिक विवाह को वैध बनाना इतना आसान भी नहीं

सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय पीठ ने समलैंगिक विवाह को लेकर अहम टिप्पणी की। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि समलैंगिक विवाह को वैध बनाना इतना आसान भी नहीं है, जितना कि यह दिखता है। इस मुद्दे पर कानून बनाने के लिए संसद के पास निर्विवाद रूप से विधायी शक्ति है। ऐसे में हमें इस पर विचार करना है कि हम इस दिशा में कितनी दूर तक जा सकते हैं। हालांकि मामले की सुनवाई के दौरान जस्टिस रविंद्र भट्ट ने कहा कि उन्हें उम्मीद बहुत कम है कि संसद इस मामले में कानून बनाएगी।

ट्रांसजेंडर की आबादी 5 लाख, कोर्ट में बताया 48 लाख

याचिकाकर्ताओं की वकील करुणानंदी ने ट्रांसजेंडर के बारे में जिरह करते हुए कहा, “2011 की जनसंख्या के मुताबिक देश में 48 लाख ट्रांसजेंडर हैं और यह संख्या भी वास्तविक आंकड़ों से कम है और इस संख्या में से कई इस कोर्टरूम में मौजूद हैं।” ये आंकड़े पूरी तरह गलत हैं और हैरानी की बात यह थी कि संविधान पीठ द्वारा इसे सत्यापित भी नहीं किया गया। यह सब लाइव कोर्ट रूम में हो रहा था। दरअसल, वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार ट्रांसजेंडर की संख्या सिर्फ 4,87,000 ही थी। जिन्हें ‘अन्य’ के रूप में वर्गीकृत किया गया था।

सनातन संस्कृति के किसी ग्रंथ में शादी का उल्लेख नहीं

समलैंगिक व्यक्ति प्राचीन समय से समाज में रहते आए हैं लेकिन वेद, उपनिषद, पुराण से लेकर भारत के किसी धर्मग्रंथ में समलैंगिक विवाह की चर्चा नहीं है। भारतीय सनातन संस्कृति में विवाह को 16 पवित्र संस्कारों में से एक माना गया है। यह दो परिवारों का ही नहीं बल्कि दो आत्माओं का भी मिलन होता है, जिससे संसार आगे बढ़ता है। इसे संतान उत्पत्ति के द्वारा पितृ ऋण से मुक्ति दिलाने वाला संस्कार भी माना गया है। ऐसे में सनातन संस्कृति के मूल को जाने बिना भारतीय विवाह पद्धति को समझना भी मुश्किल है।

सनातन धर्मग्रंथों में ब्रह्मांड के निरंतर निर्माण का उल्लेख

हमारे वेद, पुराण, उपनिषद आदि प्राचीन महाग्रंथों में जीव, प्राणी की संरचना, आत्मा और ब्रह्मांड के निरंतर निर्माण के संदर्भ में उल्लेख हैं और व्याख्याएं भी की गई हैं। कोई संविधान, कानून और व्यक्तिपरक बौद्धिकता ऐसी नैसर्गिक और प्राकृतिक संरचनाओं की समीक्षा नहीं कर सकते। यह व्यक्ति की क्षमताओं से बहुत परे है। उनके खिलाफ कानूनी प्रावधान स्थापित नहीं कर सकते। भारतीय सभ्यता और संस्कृति में ‘विवाह’ को एक पवित्र संस्कार माना गया है। यह एक सामाजिक संस्थान भी है। विवाह के जरिए वंश-वृद्धि को सामाजिक मान्यता और स्वीकृति मिली है।

राजनीति से नहीं ट्विटर के रार का सरोकार, यह ‘विदेशी मसीहा’ को लेकर लिबरल बेचैनी का है इजहार

                                               ट्विटर के सीईओ जैक डोर्सी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी
भारत में जब साल 2009-2011 में मोबाइल डेटा और स्मार्टफोन के साथ-साथ ट्विटर का तेजी से प्रसार हुआ, उस दौरान लिबरल इससे बेहद खुश थे। वास्तव में वे इसका इस्तेमाल करने वाले पहले लोगों में से थे। उन दिनों शशि थरूर के फॉलोअर्स की चर्चा जोरों पर थी। दरअसल, उस समय शशि थरूर ट्विटर पर सबसे ज्यादा फॉलो किए जाने वाले भारतीय नेता थे।

उस दौरान मेनस्ट्रीम मीडिया में ट्विटर को काफी प्रमोट किया गया। इसके चलते थरूर अपने ही ट्वीट्स को लेकर एक-दो बार विवादों में घिर गए, जिसके बाद आम लोगों का सच से सामना हुआ। उन विवादों के कारण केंद्रीय मंत्री की कुर्सी उनसे लगभग छीन ली गई थी। पहला विवाद 2009 में ‘Cattle Class‘ को लेकर किए गए उनके ट्वीट को लेकर खड़ा हुआ था। वहीं दूसरा विवाद 2010 में आईपीएल के पूर्व कमिश्नर ललित मोदी और शशि थरूर के ट्वीट के कारण गरमाया था, जो उनके सुनंदा पुष्कर से व्यक्तिगत और वित्तीय संबंधों की ओर संकेत करते थे, जिनसे थरूर ने बाद में शादी कर ली थी।

हालाँकि, थरूर को शुरुआती दौर में कुछ परेशानियाँ हुईं, लेकिन ट्विटर लिबरल लोगों के लिए तब तक एक बेहतर खेल का मैदान बना रहा, जब तक कि ‘दूसरे पक्ष’ ने वास्तव में इसका प्रभावी ढंग से इस्तेमाल करना शुरू नहीं किया था। लेकिन दूसरे पक्ष की बारी आने में वास्तव में ज्यादा समय नहीं लगा। 2011 तक, अन्ना हजारे के समर्थन में काफी लोग थे। अन्ना को सबसे अधिक युवाओं ने सपोर्ट किया। ट्विटर पर ‘हिंदुत्व टाइप’ घनी आबादी थी।

इस मंच (ट्विटर) ने लोकतंत्र को एक नई दिशा दी। जिन लोगों को मेनस्ट्रीम मीडिया आउटलेट में लेख प्रकाशित होने का कोई मौका नहीं मिलता था, उन्हें अब एक ऐसा मंच मिल जो न केवल मेनस्ट्रीम मीडिया की पहुँच से काफी तेज और प्रभाव डालने वाला है। इसने मेनस्ट्रीम मीडिया प्रकाशन में मौजूद सभी बाधाओं को तोड़ दिया।

खासकर, भाषा (मुख्य रूप से शैली), पहुँच (आपको एक संपादक को जानने या लोगों तक पहुँच बनाने के लिए किसी पीआर एजेंसी को किराए पर लेने की आवश्यकता नहीं थी) और सबसे महत्वपूर्ण विचारधारा (प्रकाशित होने के लिए आपको उसी पुरानी लिबरल लाइन को ढर्रा बनाने की आवश्यकता नहीं थी)।

जो लोग ‘संपादक के नाम पत्र’ भी कभी प्रकाशित भी नहीं करवा पाए, वे संपादकों को अब मजाकिया जवाब भेज रहे थे और खुद के पाठकों को बढ़ा रहे थे। जिससे एक नए दौर की शुरुआत होना तय माना जा रहा था। स्वाभाविक है कि इस उलटफेर से लिबरल असहज होने लगे।

अगस्त 2012 में भारत की तत्कालीन सरकार ने कई हैंडल को ब्लॉक कर दिया था। इनमें से कई ‘हिंदुत्व टाइप’ थे, जो सरकार द्वारा ट्विटर को सेंसर करने के शुरुआती प्रयासों में से एक हैं। यूपीए सरकार ने बस ट्विटर को दरकिनार कर दिया और आईएसपी (इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर) को उन ट्विटर अकाउंट को ब्लॉक करने के लिए कहा। इसको लेकर बड़े पैमाने पर हंगामा किया गया, लेकिन कुछ लिबरल का इसे मौन समर्थन मिला।

उनमें से कई ने मनमोहन सरकार के इस कदम को यह कहते हुए उचित ठहराया कि ट्विटर अकाउंट में सांप्रदायिक आधार पर ‘अभद्र भाषा’ का इस्तेमाल किया गया था। आम लोगों के ट्विटर अकाउंट को ब्लॉक करने के मनमोहन सिंह सरकार के फैसले का समर्थन करने वाले एक ऐसे लिबरल आउटलेट ‘हार्डन्यूज’ के संस्थापक और संपादक अब एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया के पदाधिकारी हैं।

सभी लिबरल्स ने उस समय खुले तौर पर कुछ ट्विटर हैंडल को ब्लॉक करने के सरकार के फैसले का समर्थन नहीं किया। उनके से अधिकतर ने, खासकर मीडिया में बात करने वाले प्रमुखों ने ट्विटर पर ‘ट्रोल्स’ के बारे में एक ठोस चर्चा शुरू की कि यह कैसे एक बड़ी समस्या थी, जिसे हल करने की जरूरत थी। वे चाहते थे कि ट्विटर उन्हें ‘सेफ स्पेस’ दे और सरकार ऐसे ‘अपराधियों’ के खिलाफ कार्रवाई करे, जो उन्हें ट्रोल करते हैं और अपना पक्ष रखने की हिम्मत रखते थे।

जैसा वह चाहते थे वैसा तुरंत नहीं हो पाया। ट्विटर अपने नए यूजर्स के अकाउंट को लेकर काफी व्यस्त था, जबकि दूसरी ओर यूपीए सरकार नए घोटालों में बहुत व्यस्त थी। हालाँकि, यूपीए सरकार के प्रति निष्पक्ष होने के लिए, उन्होंने आईटी अधिनियम की धारा 66ए के साथ आने की कोशिश की, लेकिन यह बहुत ही शर्मनाक और घिनौना था। उनके शब्द थे, ‘प्रो लिबरल’ अर्थात लिबरल के पक्ष में लिखे गए विचार, पोस्ट की बजाय सरकार के पक्ष में लिखे गए विचार पर कंट्रोल होना चाहिए, जो अंततः लिबरल लोगों का लक्ष्य हैं।

लिबरल छल-कपट में विश्वास करते थे। उस समय मूल रूप से उनके पास स्वरा भास्कर जैसे लोग नहीं थे। इसलिए वे खुले तौर पर समर्थन में नहीं उतर सकते थे। हालाँकि, खासतौर पर कुछ पत्रकारों ने यह तर्क देने की कोशिश की कि ट्विटर पर ‘ट्रोलिंग’ को कंट्रोल करने के लिए ऐसे कानूनों की आवश्यकता है, लेकिन ट्विटर ने यह काम नहीं किया। उसने इस मंच को लोकतांत्रिक बनाना जारी रखा, जहाँ विचारों पर कंट्रोल करना आसान नहीं था।

जुलाई 2013 में नरेंद्र मोदी शशि थरूर को पछाड़कर सबसे अधिक फॉलो किए जाने वाले भारतीय नेता बन गए। अधिकांश लिबरल ने विकास को लेकर उनका मजाक उड़ाया और कहा कि ‘मोदी निश्चित रूप से ट्विटर के प्रधानमंत्री बन सकते हैं’। अगले साल मोदी ने भारत के प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली। इससे लिबरल लोगों को सबसे बड़ा झटका लगा, चारों ओर सन्नाटा पसर गया।

इस झटके से देसी लिबरल को झटका लगा और वह जाग खड़े हुए। उन सभी ने महसूस किया कि उन्हें उन टूल और प्लेटफॉर्म पर दोबारा कंट्रोल करने की जरूरत है, जो नैरेटिव बनाने में मदद करते हैं। वे भाग्यशाली थे कि 2016 में, डोनाल्ड ट्रम्प ने संयुक्त राज्य अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव जीता, इसलिए वैश्विक वामपंथियों को भी नए प्लेटफार्मों को कंट्रोल करने की जरूरत का अहसास हुआ।

अगले 4 सालों में ट्विटर पर लिबरल ने दोबारा कंट्रोल पा लिया। डोनाल्ड ट्रंप को सक्रियता से दबाया गया और उन्हें सेंसर किया। हाँ ये बात भी है कि डोनाल्ड ट्रंप के मुँहफट रवैये ने इसमें उनकी मदद हुई। लेकिन ये भी सच है कि इसके लिए उन्हें पहले से निशाने पर रखा गया था। इस बात का पता सक्रिय लिबरलों और ट्विटर के बीच की साँठगाँठ से भी मालूम होता है। आज डोनाल्ड ट्रंप ट्विटर और फेसबुक दोनों से गायब हो चुके हैं।

लेकिन ये सब चीज नरेंद्र मोदी का कुछ नहीं बिगाड़ पाई। उन्होंने 2019 में दोबारा चुनाव जीता। या यूँ कहें कि वैश्विक वामपंथ को अपनी सारी ऊर्जा नरेंद्र मोदी पर केंद्रित करनी बाकी थी। ऐसा लगता है कि ये सब बदल रहा है। अमेरिका से ट्रंप को हटाकर वामपंथी खुद को किसी मसीहा से कम नहीं समझ रहे। लेकिन ये भी ध्यान रहे कि ऐसे मसीहा अपनी जमीन बदलने के बाद एक जगह नहीं रुकते। ये और शागिर्द अगली भूमि को बदलने, उन्हें नई चीज सिखाने और उसे सभ्य बनाने के लिए निकल पड़ते हैं।

भारत इनके लिए इस परिवर्तन को लाने के लिए सबसे बढ़िया जगह है या कहें कि भारत भी इस परिवर्तन को लाने के लिए इनके लिए सबसे बढ़िया जगह है।

भारत के देसी लिबरल हूबहू पश्चिमी लिबरल जैसे हैं। इन्हें बस यहाँ श्वेत शब्द को ब्राह्मण शब्द से रिप्लेस करके अपना काम करना है। अब तो हैरानी भी नहीं होती कि लिबरल फिल्ममेकरों का बेस्ट काम आखिर हॉलीवुड फिल्मों के रीमेक के तौर पर क्यों पकड़ा जाता है।

देसी लिबरल जानते हैं कि इनके अपने हीरो तो कभी इंटलेक्चुअल दिखेंगे नहीं। मेरा मतलब है कि आप क्या उम्मीद करते हैं उनसे जिनके हीरो ही स्वरा भास्कर जैसे लोग हों। खैर, भूल जाइए,  प्रशांत भूषण जैसे लोग अब निम्न स्तर के ट्रोल में आ चुके हैं, जिसे अभी हाल में मास्क और वैक्सीन पर झूठ फैलाते पकड़ा गया और बाद में ट्विटर से ब्रेक लेकर बैठ गया।

मोदी ने 2019 में दोबारा जीत हासिल की और वो भी बड़े वोट शेयर व ज्यादा सीटों के साथ… ये एक सबूत है कि ये देसी लिबरल आम भारतीयों के दिमाग पर कब्जा नहीं कर पाए थे और इसलिए इन्हें अपने विदेशी मसीहाओं की आवश्यकता है। भारतीय अब भी विदेशी माल और गोरी चमड़ी पर यकीन करते हैं, ताकि इनका षड्यंत्र कामयाब हो। इसी से परे, मुझे लगता है कि लिबरल्स को फेयरनेस क्रीम पर ज्यादा गुस्सा नहीं करना चाहिए वो भी तब तक, जब तक कि ये भारतीय गोरी चमड़ी के इतने दीवाने हों और इनसे इनका प्रोपेगेंडा हवा पाता हो।

प्वाइंट ये है कि मोदी की 2019 मे जीत के बाद विदेशी पहलू होना लिबरल नैरेटिव में महत्वपूर्ण बन गया है। ये कोई संयोग नहीं है कि जो पत्रकार अपने लोगों में विश्वसनीयता खो रहे हैं, वो अब कैसे न्यूयॉर्क टाइम्स, वाशिंगटन पोस्ट, टाइम्स मैग्जीन में लगातार बाइलाइन लिख रहे हैं। एक बेचारी पत्रकार को तो इन सबके चलते धोखाधड़ी भी झेलनी पड़ी। उसे लगा कि वह हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में एसोसिएट प्रोफेसर लग गई है… इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि बायलाइन राणा अय्यूब की है या रवींद्र अटूत की, जिससे फर्क पड़ता है वो ये बात है कि प्रकाशन में ‘विदेशी’ हिस्सा क्या मायने रखता है।

कुछ हफ्ते पहले द डेली गार्जियन अखबार में एक लेख छपा जिसमें इस बात पर तर्क दिए गए थे कि कैसे पीएम मोदी कोरोना महामारी से निपटने के लिए जी-तोड़ मेहनत में लगे थे। इस लेख को लिबरल्स ने निशाने पर ले लिया। उन्होंने इसके कंटेंट के लिए इसे नहीं घेरा, बल्कि फैक्ट चेक के जरिए ये खुलासा करने लगे कि अखबर यूके का गार्जियन न्यूजपेपर नहीं है।

मूलत: ये लिबरल सिर्फ ये बताना चाह रहे थे कि कैसे फॉरेन मीडिया तो बस उनके साथ है और अगर ऐसा कुछ प्रकाशित हुआ तो मतलब ये तो उन्हें धोखा देने जैसे होगा। मैं जोड़ना चाहता हूँ कि ये सोच मुख्य रूप से उपनिवेशवादी मानसिकता का ही एक लक्षण है।

यही मानसिकता तब भी दिखी तब इन्होंने गल्फ न्यूज में प्रकाशित एक और लेख को आड़े हाथों लिया। इनसे आखिर ये कैसे बर्दाश्त होता कि एक विदेशी मीडिया में किसी विदेशी पत्रकार ने मोदी सरकार की प्रशंसा कर दी। दरअसल, ये देसी लिबरल कुछ भी ऐसा नहीं देख सकते हैं जिससे इनकी ये विदेशी भाग वाली रणनीति बेकार हो। ये जुटे हुए हैं अपने विदेश में बैठे अपने माई-बापों से मदद लेने के लिए, आखिर यही तो मोदी के ख़िलाफ़ इनकी आखिरी उम्मीद है।

विदेश से मसीहा आकर स्थानीय छद्म नायकों को नेस्तनाबूद कर देगा, यह उम्मीद कई मौकों पर सामने आई है न कि केवल उन दो अवसरों पर जिनका जिक्र मैंने ऊपर किया है। हमने लिबरलों के उत्साह को हिलोरे मारते कई मौके पर देखा है, चाहे वह कोई अमेरिकी राज्य या यूरोपीय देश की नगरपालिका ही सीएए के खिलाफ प्रस्ताव क्यों न पारित कर दे। यही ‘किसान आंदोलन’ में विदेश नेताओं से हस्तक्षेप की अपील के दौरान और अधिक बेशर्मी के साथ दिखा। ऐसे किसी भी हस्तक्षेप, यहाँ तक कि पूर्व पोर्न स्टार के समर्थन का भी देसी लिबरलों और वोक्स की जमात ने बढ़-चढ़कर स्वागत किया।

इस आशा का सबसे निर्मम रूप गलवान घाटी में भारत-चीन के टकराव के बीच तब देखने को मिला था, जब देसी लिबरलों और ‘वोक्स’ में से कई सार्वजनिक तौर पर कामना कर रहे थे की भारत को बीजिंग ‘परास्त’ कर दे। यह मसीहा को लेकर इनकी व्याकुलता का एक और प्रमाण था जो विदेशी जमीन से आकर एक नाकाम समाज का साक्षात्कार सच्ची व्यवस्था और धर्म से कराएगा।

एक विदेशी मसीहा को लेकर ये इतने बेचैन हैं कि जब ऑड्रे ट्रुशके नामक विदेशी गोरा औरंगजेब की क्रूरता पर पर्दा डालता है तो ये न केवल उस पर मोहित होते हैं, बल्कि कई कथित इतिहासकार तो उसकी ही धुन पर नाचने लगते हैं। बात अपने पुराने पापों पर पर्दा डालने की हो या नए प्रोपेगेंडा को हवा देनी हो, देशी लिबरलों को अब विदेशी मदद की दरकार है क्योंकि उनके पुराने घरेलू नायकों का चेहरा बेपर्दा हो चुका है।

मोदी सरकार और माइक्रोब्लॉगिंग वेबसाइट के ताजा गतिरोध में लिबरलों ने ट्विटर को जिस तरह का समर्थन और प्यार दिया है, वह उसी मानसिकता को दर्शाता है। एक अमेरिकी कंपनी को काफिरों को परास्त करने में मददगार के तौर पर देखा जा रहा। यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता या लोकतंत्र के बारे में बिल्कुल भी नहीं है।

इस तरह के सिद्धांतों का समर्थन लिबरलों ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के आने पर किया था, लेकिन जल्दी ही उन्हें एहसास हो गया कि यह इस तरह काम नहीं करता। आत्मचेतना के बाद वे इस निष्कर्ष पर पहुँचे  कि वे सिद्धांतविहीन हैं, लेकिन उनके पास विशेषाधिकार है जिसे उन्हें संरक्षित करना चाहिए। तब से वे ‘वोक’ में तब्दील हो गए जिनके लिए ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नस्ली है’ और ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता उनकी हत्या करती है’ (ये आधुनिक उदारवादियों के वास्तविक विचार हैं) तथा उनके लिए अपने पंसदीदा नेता के नहीं जीतने का मतलब लोकतंत्र में खोट होना है।

ट्विटर (अन्य बड़ी तकनीकी मीडिया कंपनियाँ भी) के साथ मौजूदा गतिरोध का चुनाव से सरोकार नहीं है। यह बीजेपी आईटी सेल या कॉन्ग्रेस टूलकिट के बारे में नहीं है। यह उस मानसिकता से जुड़ा है, जो विदेशी मसीहा को श्रेष्ठ और काफिरों को उजड्ड मानता है।

(राहुल रौशन द्वारा मूल रूप से अंग्रेजी में लिखे इस लेख का अनुवाद जयंती मिश्रा और सुनीता मिश्रा ने किया है)(साभार)

राजस्थान : कांग्रेसी टूलकिट का हो रहा पालन, सत्तारूढ़ कांग्रेस के नेताओं की सिफारिश पर अस्पतालों में मिल रहे हैं वेड और वेंटिलेटर

कांग्रेस ने प्रधानमंत्री नरेद्र मोदी को बदनाम करने के लिए टूलकिट तैयार की थी, जिसका खुलासा होने के बाद सियासी घमासान मचा हुआ है। इस टूलकिट में कहा गया है कि सिर्फ उन लोगों की मदद कीजिए जो इंडियन यूथ कांग्रेस के ट्विटर पेज को टैग कर रहे हों। टूलकिट में अस्पतालों में बेड और अन्य सुविधाओं की जमाखोरी की बात भी कही गई है। यह भी कहा गया है कि कुछ

हॉस्पिटल में कुछ बेड ब्लॉक करके रखें और हमारे अनुरोध पर ही उसे रिलीज़ करें। टूलकिट में दिए गए इन निर्देशों का राजस्थान के कोटा के अस्पतालों मे पूरी तरह पालन हो रहा है। 

पूर्व केंद्रीय मंत्री और बीजेपी सांसद राजवर्धन सिंह राठौर ने कोटा के एमबीएस अस्पलात में एक महिला मरीज से साथ घटी घटना का जिक्र करते हुए ट्वीट किया है कि जैसा कांग्रेस टूलकिट में कहा गया,ठीक वैसा ही राजस्थान में हो रहा है। बेड ख़ाली है, लेकिन चाहे मरीज को कितनी भी जरूरत हो, वो सत्तारूढ़ कांग्रेस के नेताओंं की सिफारिश के बिना नहीं मिल सकता है।

 

एमबीएस अस्पताल की आईसीयू में बेड व वेंटिलेटर खाली होने के बावजूद महिला मरीज को नहीं दिया गया। परिजनों ने आईसीयू में जाकर खाली बेड व वेंटिलेटर की फोटो खींचकर डॉक्टर को दिखाया और परिजन दो घंटे तक डॉक्टर के सामने बेड के लिए गिड़गिड़ाते रहे, लेकिन फिर भी महिला मरीज को बेड नहीं दिया गया। आखिरकार महिला की सांस टूट गई।

मृतका के नाती चंदन ने बताया कि उसकी नानी बीना देवी महात्मा गांधी कॉलोनी की रहने वाली थी। उनकी 19 अप्रैल को रात 2 बजे तबीयत खराब हो गई। जांच में पॉजिटिव होने पर एमबीएस के आइसोलेशन वार्ड में भर्ती काराया गया था। नानी का ऑक्सीजन सेच्युरेशन डाउन था। उन्हें ऑक्सीजन दी जा रही थी। बुधवार रात 2 बजे नानी की तबीयत बिगड़ गई।

वार्ड में मौजूद डॉक्टर ने वेंटिलेटर पर शिफ्ट करने को कहा, लेकिन अस्पताल में आईसीयू व वेंटिलेटर खाली नहीं होने की बात कही। डॉक्टर ने साफ मान कर दिया और कहा कि हमारे पास वेंटिलेटर उपलब्ध नहीं है। आप इनको ले जा सकते हैं। अगर आपकी किसी नेता से जान पहचान है तो आप उनका फोन करावा दो, आपका काम हो जाएगा।

चंदन ने बताया कि जब उन्होंने आईसीयू में जाकर देखा तो वहां बेड व वेंटिलेटर खाली था। बाकायदा उसका फोटो खींचकर लेकर आए और डॉक्टर को दिखाया। लेकिन डॉक्टर का दिल नहीं पसीजा। मरीज को खाली पड़े वेंटिलेटर पर शिफ्ट करने के लिए 2 घंटे तक डॉक्टर से गिड़गिड़ाते रहे। लेकिन सुनवाई नहीं हुई। आखिर तड़के करीब 4 बजे महिला मरीज ने दम तोड़ दिया।

सुनियोजित ढंग से हुआ कुंभ को बदनाम करने का प्रयास: कांग्रेस Toolkit पर महामंडलेश्वर स्वामी अवधेशानंद

भारतीय जनता पार्टी ने कांग्रेस पर मई 18, 2021 एक टूलकिट का इस्तेमाल कर कुंभ को बदनाम करने का इल्जाम लगाया था। अब इसी क्रम में जूना अखाड़ा के आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी अवधेशानंद गिरी महाराज ने लोगों से अपील की है कि वह मुद्दे का राजनीतिकरण न करें। उन्होंने आरोप लगाया कि कुंभ को बदनाम करके भारत की संस्कृति सभ्यता और विश्वसास को सुनियोजित ढंग से धूमिल करने का प्रयास हुआ।

अपने ट्विटर हैंडल पर जारी की गई वीडियो संदेश में स्वामी अवधेशानंद ने कुंभ की महत्ता से बात शुरू करते हुए कहा, “भारतीय संस्कृति, संस्कार, सभ्यता उसकी संवेदनाएँ अगर कहीं एक साथ दिखाई देती हैं तो वो कुंभ का महापर्व है। कुंभ पर्व केवल हिंदुओं का नहीं है। संयुक्त राष्ट्र की संस्था UNESCO ने उसे सांस्कृत धरोहर के रूप में भी घोषित किया है।”

टूलकिट को लेकर वह बोले, “एक टूलकिट के द्वारा यह दुष्प्रचार किया जा रहा है कि कुंभ के मेले से कोरोना का संक्रमण गया। आँकड़ों की सत्यता को पहचानिए। जब कुंभ का मेला चल रहा था। तब अन्य प्रदेशों में कोविड की अधिक प्रचंडता थी। ऐसी उत्तराखंड में नहीं थी या कुंभ के अवसर पर नहीं थी। एक सुनियोजित ढंग से भारत की संस्कृति, भारत के संस्कार अथवा हमारी पर्व परंपरा, मूल्यों पर, विशेषत: हमारी सांस्कृतिक निष्ठा पर प्रहार किया जा रहा है।”

स्वामी अवधेशानंद ने ऐसे प्रयासों को निंदा करते करते हुए कहा, “इस तरह अन्य मतों को और धर्मावलंबियों को प्रश्रय देकर और हिंदू संस्कृति का दुष्प्रचार करके कुछ स्वार्थ पूरे नहीं होंगे। समाज इसकी निंदा करता है, भर्तसना करता है, कुंभ निस्संदेह ऐसा नहीं था जैसा बताया जा रहा है। कुंभ ऐसा नहीं था जैसा बताया जा रहा है।”

कुंभ के विरुद्ध तैयार किए गए माहौल पर नाराजगी व्यक्त करते हुए स्वामी अवधेशानंद गिरि महाराज ने कहा, “संत समाज में भारी रोष है। हमने बड़ा संयम रखा। माननीय प्रधानमंत्री के आह्वान पर कुंभ कुछ ही घंटों में समेट दिया गया था। उसका विसर्जन कर दिया गया था। कुछ ही संख्या में लोग स्नान करने पहुँचे थे। तो उसकी जो विराटता और व्यापकता थी, उसका विसर्जन कर दिया गया था।”

स्वामी अवधेशानंद से पहले टूलकिट को लेकर भाजपा ने कांग्रेस पर वार किया था। भाजपा ने बताया था कि कैसे टूलकिट में निर्देश हैं कि कुंभ को सुपर स्प्रेडर कुंभ कहा जाए ताकि लोगों को एहसास हो कि सभी समस्याओं के लिए लिए हिंदू नीतियाँ जिम्मेदार हैं। अब इसी टूलकिट पर संज्ञान लेते हुए स्वामी अवधेशानंद ने अपना उक्त बयान जारी किया है।

उन्होंने कहा, “आँकड़ों को देखें। उसके यथार्थ को समझें। कुंभ से कोरोना का प्रकोप नहीं गया। इसपर राजनीति करना शोभा नहीं देता। भारत की परंपरा, मूल्यों में विश्वास रखें। यहीं आप जन्में है, पले हैं-बढ़ें हैं। इसलिए भारत माँ को अपना ईष्ट मानकर अपना सर्वस्व उसे सौंपकर देखों आपका हमेशा मंगल होगा। ”

17 अप्रैल को पीएम मोदी ने कुंभ मेले के मद्देनजर स्वामी अवधेशानंद से बात की थी। इसके बाद स्वामी अवधेशानंद ने कुंभ समापन की घोषणा करते हुए कहा था, “भारत की जनता व उसकी जीवन रक्षा हमारी पहली प्राथमिकता है। कोरोना महामारी के बढ़ते प्रकोप को देखते हुए हमने विधिवत कुम्भ के आवाहित समस्त देवताओं का विसर्जन कर दिया है। जूना अखाड़ा की ओर से यह कुम्भ का विधिवत विसर्जन-समापन है।”

Toolkit से क्या है कांग्रेस का लिंक? क्यों पार्टी ने किया अपना पुराना ट्वीट डिलीट

                                           रिहाना और राहुल गाँधी 
पर्यावरण एक्टिविस्ट ग्रेटा थनबर्ग और अंतरराष्ट्रीय गायिका रिहाना द्वारा किसान आंदोलन के समर्थन में किए गए ट्वीट्स के बाद अब इस पूरे मामले में कांग्रेस का लिंक सामने आने लगा है। दरअसल, ऑपइंडिया ने कुछ ही देर पहले आपको बताया कि कैसे टूलकिट डॉक्यूमेंट में ऐसा कंटेंट है जो साबित करता है कि प्रदर्शन को अंतरराष्ट्रीय समर्थन पहले से पूर्व निर्धारित था। अब इसी डॉक्यूमेंट की सामग्री और पार्टी के एक ट्वीट से पता चला है कि इसमें कांग्रेस का भी हाथ शामिल था।

                                        डिलीट किया जा चुका ट्वीट
जिस ट्वीट का हम जिक्र कर रहे हैं उसे अब डिलीट किया जा चुका है। हालाँकि, इसका स्क्रीनशॉट अब भी उपलब्ध है। ये ट्वीट 18 जनवरी 2021 को केरल प्रदेश महिला कांग्रेस ने अपने आधिकारिक ट्विटर हैंडल से किया था। इसमें लिखा था, “मोदी सरकार ने बड़े पैमाने पर आबादी के एक बड़े हिस्से के अस्तित्व पर हमला किया है। ये तीन कृषि कानून आने वाले समय में उन महिलाओं की जिंदगी और बदतर कर देंगे जो पहले से ही बुनियादी जरूरतों की आसमान छूती कीमतों के कारण परेशान हैं।”

पहली नजर में ये ट्वीट लग सकता है कि कांग्रेस का कोई नया रोना है। लेकिन वास्तविकता ये है कि केरल कांग्रेस का यह ट्वीट उस टूलकिट में मौजूद ट्वीट से शब्दश: मिलता है, जिसके ख़िलाफ़ अब दिल्ली पुलिस जाँच कर रही हैं।

इस ट्वीट में और नीचे डॉक्यूमेंट में उल्लेखित टेक्स्ट में कोई अंतर नहीं है। इसलिए ये एक बड़ा सवाल है कि क्या कांग्रेस इन सबमें पहले से शामिल थी। अगर हाँ, तो आने वाले समय में यह पार्टी के लिए गंभीर समस्य़ा का कारण बन सकती है क्योंकि पुलिस इसी बात की जाँच कर रही है कि टूलकिट को आखिर किसने बनाया।

                                      कॉन्ग्रेस के ट्वीट की शब्दश: कॉपी टूलकिट में शामिल
यहाँ यह भी गौर करने वाली बात है कि यदि 18 जनवरी को कांग्रेस का यह ट्वीट इसी डॉक्यूमेंट से पोस्ट किया गया था तो मतलब साफ है कि इस टूलकिट को 18 जनवरी से पहले बनाया गया था। जिसमें रिहाना का ट्वीट भी शामिल है। मुमकिन है कि रिहाना को पहले से हिंसक दंगाई और खालिस्तानियों को साथ शामिल किए जाने की बात पता चल गई थी और अगर ऐसा इसलिए है कि ट्वीट की तारीख और रिहाना के समर्थन वाले ट्वीट में 15 दिन का फासला है।

कांग्रेस का टूलकिट के साथ संबंध होना केवल कयासों का हिस्सा है। दिल्ली पुलिस इसकी जाँच कर रही है। उम्मीद है सच जल्द ही सामने आएगा। मगर, तब भी दो बातें कही जा सकती हैं:

  1. 1. टूलकिट तक कांग्रेस की पहुँच थी। यह इस तथ्य से साबित होता है कि उनका यह ट्वीट टूलकिट से शब्दशः लिया गया था।
  2. रिहाना को 18 जनवरी के पहले से ही किसान समर्थन में खड़ा होने के लिए तैयार कर लिया गया था।
ऐसी प्लानिंग जो भारत को बदनाम करने के लिए तैयार की गई, उसमें दिल्ली पुलिस की पड़ताल और भी आवश्यक हो जाती है ताकि पता चल सके कि इस तरह का प्लान किसने तैयार किया।