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छत्तीसगढ़ में बाज़ी किसके हाथ : भाजपा या कांग्रेस?

Image result for बीजेपी कांग्रेस15 साल से भाजपा शासित राज्यों मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में कई बातें समान हैं. जैसे, दोनों ही राज्यों ने भ्रष्टाचार के क्षेत्र में झंडे गाड़े हैं, दोनों ही राज्यों के मुख्यमंत्री राज्य में अपनी पार्टी के एकमात्र चेहरे हैं, साथ ही जनता में लोकप्रिय भी हैं और अब दोनों ही राज्य सत्ता विरोधी लहर से जूझ रहे हैं. 
छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव कई मायनों में अनूठा और एतिहासिक होने जा रहा है. यहां सत्ता विरोधी लहर जितनी भाजपा के खिलाफ है, उतना ही विरोध कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष भूपेश वघेल के लिए भी है. भाजपा सत्ता में वापसी के लिए साम-दाम-दंड-भेद अपनाने यानि कि कोई पैंतरा आजमाने से बाज नहीं रही है, साथ ही धूल की तरह पैसा उड़ा रही है. वहीं कांग्रेस के पास चुनाव लड़ने के लिए न तो फंड है और न ही मुद्दे उठाने की कूवत है. अजित जोगी नाम के किरदार ने अलग से कई नेताओं की नींद हराम की हुई है. जबकि इस सबसे इतर, जनता और उसकी अपनी समस्याएं हैं और वो बदलाव चाहती है. लेकिन बदलाव का माहौल देने के लिए कांग्रेस में इतनी तैयारी आखिर तक नजर नहीं आती है. हालांकि कांग्रेस ने उम्मीदवारों को चुनने में थोड़ी बुद्धिमता का परिचय दिया है. अब जनता उनके इस रवैए को किस नजर से देखती है, वो चुनावी नतीजे ही बताएंगे. फिर भी, भाजपा और कांग्रेस के बीच की टसन और जोगी का नए रूप में मैदान में उतरना इस चुनाव को रोचक बनाता है.
आखिर क्यों भाजपा से नाराज़ है जनता
छत्तीसगढ़ में डेढ सौ सालों का भूख से मौतों का इतिहास रहा है. डॉ. रमन सिंह ने जब यहां की जनता को एक रुपए किलो में चावल दिए, तो जनता ने उन्हें सिर-आंखों पर बैठाया. लोग उन्हें चावल वाले बाबा के नाम से ही जानने लगे. डॉ. रमन सिंह ने छत्तीसगढ़ में विकास भी किया, लेकिन जितना विकास वास्तविक रूप में हुआ, इससे कहीं ज्यादा उन्होंने और उनकी सरकार ने अपने फायदे के लिए काम किया. अरबों रुपए खर्च करके नया रायपुर बसाना उनके अब तक के निर्णयों में सबसे गलत साबित हुआ. इस नए रायपुर में पसरा सन्नाटा इसकी असफलता की कहानी खुद बयां करता है. उन्होंने सड़कें भी बनाईं, लेकिन नक्सलवाद को काबू करने में इस कदर नाकाम रहे कि जिस सड़क की कवरेज करने गए दूरदर्शन के कैमरामैन अच्युतानंद साहू को नक्सलियों ने गोलियों से भून डाला, उस सड़क निर्माण के क्रम में अब तक 76 जवान शहीद हो चुके हैं. वो सड़क केवल कंक्रीट से नहीं, बल्कि जवानों के खून से भी बनी है. इसी तरह शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में काम करने में रमन सरकार बुरी तरह असफल रही है. बस्तर में भले ही स्कूलों की इमारतें खड़ी कर दी गईं, लेकिन उनमें शिक्षक ही नहीं हैं, क्योंकि उन नक्सली इलाकों में वे जाना नहीं चाहते. इसी तरह, शहरों में लोग डेंगू से मर रहे हैं और सरकार कुछ नहीं कर पा रही है. न बच्चों के खेलने के लिए मैदान बचे हैं, न गायों के चरने के लिए गौचर भूमि बची है. एक सोशल एक्टिविस्ट कहते हैं कि जब मप्र और छत्तीसगढ़ एक राज्य था, तब हर गांव में रेवेन्यू लैंड की सात फीसदी जमीन गौचर भूमि होती थी, आज यह अनुपात दो फीसदी पर चला गया है. इसमें भी कमाल की बात यह है कि कुछ समय पहले सरकार ने राजपत्र में एक नई बात छापी है कि अब राजस्व भूमि के अनुपात में दो फीसदी गौचर जमीन कहीं भी हो सकती है. यानि कि कई गांवों की गौचर भूमि किसी एक जगह पर हो सकेगी. ऐसी घोषणा करते हुए शायद सरकार ने यह सोच लिया कि गाएं घास चरने के लिए किसी दूसरे गांव में जाएंगी. छत्तीसगढ़ की गाएं ज्यादा दुधारू नहीं होतीं, पर गौचर भूमि होने के कारण वे किसानों पर बोझ नहीं थीं. सरकार के ऐसे मखौल उड़ाते नियम कब तक किसान के सब्र का इम्तहान लेंगे. इसी तरह, जंगलों से भटककर खेतों में आने वाले हाथियों द्वारा फसल बर्बाद करने की खबरें हर दिन अखबारों का हिस्सा बन रही हैं, लेकिन सरकार इस बात से निश्चिंत नजर आती है कि किसान की कड़ी मेहनत से उगाई फसल को बर्बाद होने से रोकने के लिए कोई ठोस कदम उठाना चाहिए. किसानों की ये ऐसी समस्याएं हैं, जो चुनावी समय में नेताओं के मुद्दों से सिरे से गायब हैं. सरकार भूल रही है कि किसानों के अंदर सुलग रहा गुस्सा यदि बाहर आया, तो इनके लिए सत्ता में वापसी का रास्ता बंद हो जाएगा. इसके अलावा, भ्रष्टाचार, बुरी तरह हावी ब्यूरोक्रेसी आदि ऐसे मुद्दे हैं, जिनपर आम आदमी का गुस्सा मानो फूटने को तैयार है.
कांग्रेस में है ज़बरदस्त नाराज़गी
चुनावों का वक्त हो और कांग्रेस के नाराज नेताओं का जिक्र न किया जाए, तो समझो रिपोर्टिंग अधूरी है. फिर छत्तीसगढ़ में तो कांग्रेस दोतरफा नाराजगी झेल रही है. एक ओर टिकट कटे नेताओं की नाराजगी है, तो दूसरी ओर मतदाता नाराज हैं. कुछ महीने पहले ही सीडी कांड में फंसे भूपेश बघेल अब भी पब्लिक की आंखों में किरकिरी की तरह चुभ रहे हैं. वहीं उनकी ब्राम्हण विरोधी और प्रदेश कांग्रेस में आधिपत्य जमाने की छवि के कारण पार्टी में उनके विरोधियों की गिनती कम होने का नाम ही नहीं ले रही है. लोग ये बात भी भूल नहीं पाते कि आज जो अजीत जोगी कांग्रेस के लिए बड़ी चुनौती बन चुके हैं, उन्हें भूपेश बघेल ने ही पार्टी से निकलवाया था. भूपेश बघेल को लेकर तो यह स्थिति है कि यदि 10 कांग्रेसी नेताओं के सामने आपने उनका जिक्र कर दिया, तो समझिए आधे से ज्यादा नेताओं की दुखती रग पर आपने हाथ रख दिया. फिर टिकट न मिलने से गुस्साए नेता तो पानी पी-पीकर उन्हें कोस रहे हैं. खैर, कई सालों तक राहुल गांधी की गुडबुक में शामिल रहे बघेल के खिलाफ जब शिकायतें हाईकमान तक पहुंचीं तो वहां भी हलचल हुई. इसका असर भी हुआ. अब तक माना जा रहा था कि यदि कांग्रेस जीतती है, तो भूपेश बघेल, टीएस सिंहदेव और चरणदास महंत ही सीएम पद के लिए चेहरा हो सकते हैं. लेकिन सीडी कांड के कारण भूपेश बघेल और राजघराने से ताल्लुक के कारण टीएस सिंहदेव के सीएम बनने के चांस नहीं थे. लेकिन ऐन मौके पर कांग्रेस ने छत्तीसगढ़ के अपने एकमात्र सांसद ताम्रध्वज साहू को दुर्ग से टिकट दे दिया. इससे सीएम पद को लेकर एक नया ही समीकरण बन गया है. साफ-सुथरी छवि वाले ताम्रध्वज साहू राष्ट्रीय कांग्रेस के पिछड़ा वर्ग प्रकोष्ठ के अध्यक्ष भी हैं. छत्तीसगढ़ में साहू समाज की आबादी करीब 25 लाख है और यह समाज भाजपा का वोटर माना जाता है. इस बार भी भाजपा ने जहां 14 साहू उम्मीदवारों को टिकट दिया है, वहीं कांग्रेस में यह संख्या छह है. ऐसे में कांग्रेस ताम्रध्वज साहू के जरिए साहू वोटरों को अपनी तरफ खींचने की कोशिश कर रही है. हो सकता है कि जीतने पर कांग्रेस सीएम का ताज ताम्रध्वज साहू के माथे पर ही सजाए.
1000 करोड़ का होगा भाजपा के लिए ये चुनाव
बतौर मुख्यमंत्री तीन कार्यकाल बिता चुके डॉ. रमन सिंह की छवि भले ही साफ-सुथरी और लोकप्रिय नेता की है, लेकिन उनके बेटे का नाम पनामा पेपर्स मामले में आने के बाद यह तो साफ हो गया कि भ्रष्टाचार की आग की लपटें इनके परिवार को भी छू रही हैं. (गौरतलब है कि राहुल गांधी ने हाल ही में गलती से पनामा पेपर्स मामले से मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री के बेटे का नाम जोड़ दिया था, जिसके कारण उनपर मानहानी का दावा भी हुआ). मध्य प्रदेश के सीएम की पत्नी की तरह डॉ. रमन सिंह की पत्नी सामाजिक तौर पर ज्यादा सक्रिय तो नहीं हैं, लेकिन अपने-अपने बंगले से फाइलों की स्पीड पर पूरा नियंत्रण रखने में दोनों एक-दूसरे की टक्कर की हैं. छत्तीसगढ़ में चाहे तबादले हों या फिर पैसों के लेन-देन से हैंडल होने वाले अन्य मामले, सभी सीएम की पत्नी की देख-रेख में ही संपन्न होते हैं. इसे लेकर भाजपा से लेकर कांग्रेस तक के नेता और सरकारी कर्मचारी भी कई तरह के किस्से सुनाते मिल जाएंगे. कुल मिलाकर बात यह है कि 15 सालों में जो पैसा जमकर कमाया गया, वो इस चुनाव में धूल की तरह उड़ाया जा रहा है. एक वरिष्ठ पत्रकार ने कहा कि इस बार छत्तीसगढ़ में चुनावों में जिस तरह पैसा बंट रहा है, इसे देखकर यह भी नहीं कहा जा सकता कि पैसा पानी की तरह बहाया जा रहा है, क्योंकि पानी तो कीमती है. इसलिए यही कहना सही होगा कि पैसा धूल की तरह उड़ाया जा रहा है. भाजपा के ही वरिष्ठ नेताओं की मानें, तो भाजपा के लिए यह चुनाव कम से कम 1000 करोड़ रुपए का है, वहीं मध्य प्रदेश में तीन हजार करोड़ रुपए का है. जाहिर है, अजीत जोगी को अपनी पार्टी बनाने और उससे भाजपा को फायदा दिलवाने के लिए भी मोटी रकम खर्च की गई है. चूंकि जोगी की डिमांड बड़ी थी, इसलिए यह मामला दिल्ली से निपटाया गया. कहने वाले तो यहां तक कहते हैं कि जोगी को भाजपा ने करीब 100 करोड़ रुपए दिए हैं. इधर जोगी इतने कलाकार निकले कि उन्होंने अपने उम्मीदवारों को भी पैसे देने से साफ मना कर दिया. उनके परिवार के चारों सदस्य चुनावी मैदान में हैं, तो उन्हें भी पैसे की दरकार तो होगी ही.
अब दूसरी बड़ी पार्टी कांग्रेस के चुनावी फंड की बात करते हैं. कुछ ही महीने पहले कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता मंच से अपना दुखड़ा रोते नजर आए कि जनता हमें वोट और नोट दोनों ही दे. अब पार्टी में जो नेता अपनी जेब से पैसा लगाकर चुनाव लड़ने को तैयार थे, उनमें से कई की भूपेश बघेल से पटी नहीं. लिहाजा या तो उन्हें टिकट ही नहीं मिली या फिर वे दूसरी पार्टी में चले गए. अब कांग्रेस के कम्युनिकेशन सेल के चेयरमैन शैलेश नितिन त्रिवेदी फंड की कमी पर पर्दा डालने के लिए कह रहे हैं कि हमारे पास फंड की कमी होना इस बात का सुबूत है कि कांग्रेस ईमानदार पार्टी है. अब यदि कांग्रेस के नेता इतने ही ईमानदार हैं, तो फिर भाजपा से पैसे क्यों ले रहे हैं, इस बात पर पार्टी को मंथन करना चाहिए. पैसों के जिक्र के बीच सबसे अहम नाम आता है, छत्तीसगढ़ के जल संसाधन मंत्री ब्रिजमोहन अग्रवाल का, जो भाजपा के वरिष्ठ नेता हैं और कई बार विधायक रह चुके हैं. इनका हर पार्टी के नेताओं, पत्रकारों, अधिकारियों जैसे हर तबके के लोगों से बहुत अच्छा सम्बन्ध है. वे पैसे बांटने और सबको साथ लेकर चलने के मामले में भी एक नंबर हैं. भाजपा के नेता ही बताते हैं कि अपोजिशन के कई नेताओं को ये मंत्रीजी लगातार पैसे भिजवाते रहते हैं. अग्रवाल एक बड़े संयुक्त परिवार से हैं और उनके बेटे, भाई-भतीजों के कई लंबे-चौड़े बिजनेस हैं.
वोटों का गणित
पिछले तीन चुनावों में भाजपा और कांग्रेस के बीच वोट शेयर के बीच अंतराल लगातार कम ही हुआ है. 2008 में तो यह अंतर केवल 0.75 फीसदी का ही रहा. वहीं बसपा का वोट शेयर चार से छह फीसदी के बीच रहा. कांग्रेस-भाजपा के बीच वोट शेयर का कम होता अंतराल भाजपा को डराने के लिए पहले ही काफी है, इसके बाद सत्ता विरोधी लहर है ही, जो कांग्रेस के लिए चुनावी जीत को आसान बनाती है. इसे लेकर भाजपाई नेता तर्क देते हैं कि राज्य छोटा होने के कारण इस अंतराल का कम होना लाजिमी है. अलबत्ता सीटों की संख्या पर नजर डालें, तो भाजपा को दो बार 50 और पिछले चुनाव में 49 सीटें मिली थीं. 2003 के चुनाव को छोड दें, तो बाकी दोनों चुनावों में डॉ. रमन सिंह के जीतने का प्रमुख कारण छत्तीसगढ़ के पहले मुख्यमंत्री अजीत जोगी का अपनी पार्टी कांग्रेस के खिलाफ काम करना था. इसके चलते सतनामी समाज के प्रभाव वाली 10 सीटों में से नौ सीटें भाजपा को मिली थीं, जबकि सतनामी समाज को कांग्रेस का वोटबैंक माना जाता रहा है. इसी तरह कुछ और सीटें हैं, जहां दलित समाज ज्यादा है और वो वोटें जोगी के प्रभुत्व के चलते कंाग्रेस का नुकसान कर भाजपा को मिली थीं. अब जबकि जोगी और मायावती ने हाथ मिला लिया है और जोगी कांग्रेस यानि कि जनता लोकतंत्र कांग्रेस पार्टी खुद मैदान में है, फिर तो जाहिर है कि सतनामी संप्रदाय से ताल्लुक रखने वाले अजीत जोगी ये वोट खुद के लिए ही मांगेंगे. ऐसे में भाजपा की सीटों की संख्या में कमी आना तय है. अब सवाल यह है कि क्या जोगी और मायावती का गठबंधन इन वोटों को अपने खाते में ट्रांसफर करा पाएगा, जो कि हमेशा से कांग्रेस का पारंपरिक वोटबैंक रहा है. यदि नहीं, तो फिर सवाल यह है कि चुनाव में किसकी स्थिति मजबूत होगी?
करीब 50 साल से पॉलिटिकल रिपोर्टिंग कर रहे वरिष्ठ पत्रकार रमेश नैयर कहते हैं कि अजित जोगी जैसी जिजीविषा वाला आदमी विरले ही देखने को मिलता है. 2004 के लोकसभा चुनाव के दौरान हुए खतरनाक एक्सीडेंट में बोनमैरो टूटने के बाद भी वे उठ खड़े हुए और आज भी डटे हुए हैं. इंटेलीजेंसी और संघर्शशीलता उनके खून में है. उनका अपना जनाधार है. यदि वे इस चुनाव में पांच से कम सीट लाते हैं, तो यह अलग बात है, लेकिन यदि यह आंकड़ा सात सीट तक भी पहुंच जाए, तो वे छत्तीसगढ़ में किंगमेकर की भूमिका में होंगे और उनका बेटा उप मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठेगा. कुल मिलाकर देखें, तो कई अहम मुद्दों को अच्छी तरह न उठा पाने के कारण कांग्रेस नुकसान में रहेगी और जाहिर है, इसका फायदा भाजपा को मिलेगा. कहा जा सकता है कि मध्य प्रदेश की तुलना में भाजपा छत्तीसगढ़ में बेहतर स्थिति में है. यदि किसी कारण से वो जीत का चमत्कारिक आंकड़ा पाने में कुछ सीटों से पीछे रह भी गई, तो उसके पास अमित शाह जैसा चाणक्य तो है ही.
किसकी सीटें बेहतर
भाजपा ने करीब डेढ़ दर्जन ऐसे लोगों को टिकट दिया है, जो पिछली बार हार गए थे. इनमें से कई ऐसे हैं, जो 10 हजार से ज्यादा वोटों के अंतर से हारे थे. कई विधायकों और मंत्रियों के खिलाफ जनता में बड़ी नाराजगी थी, फिर भी उन्हें रिपीट किया गया है. कहीं एकदम ताजे चेहरों को टिकट दिए गए हैं, जिनकी मतदाताओं में पहचान ही नहीं है. भाजपा के ही एक वरिष्ठ नेता कहते हैं कि यदि 15 साल तक सत्ता में रहने के बाद हारे हुए नेताओं को टिकट देना पड़ रहा है, तो यह एक तरह से मुख्यमंत्री की नाकामी ही है. वैसे भी विधायकों की छत्तीसगढ़ में सुनता ही कौन है, यहां तो ब्यूरोक्रेसी इस कदर हावी है कि वे ही प्रशासन चला रहे हैं और वे ही सरकार चला रहे हैं. कांग्रेस के टिकट वितरण की बात करें, तो पार्टी सुप्रीमो राहुल गांधी ने छत्तीसगढ़ की एक रैली में कहा था कि वो 15 अगस्त को ही टिकट बांट देंगे, जबकि कांग्रेस ने ही सबसे आखिरी में टिकट वितरण का काम किया. कांगे्रस ने उम्मीदवारों की आखिरी सूची 12 नवंबर को होने वाले पहले चरण के मतदान से केवल 12 दिन पहले जारी की. दो साल पहले कांग्रेस का दामन छोड़ जोगी से जा मिले पूर्व राज्यमंत्री विधान मिश्रा कहते हैं, ‘भूपेश बघेल की ब्राम्हण और सवर्ण विरोधी नीति के कारण वे यह चुनाव जरूर हारेंगे. भूपेश बघेल ने केवल ओबीसी को फोकस में रखा और सवर्णों को दरकिनार किया है. ऐसी राजनीति तो हार का ही रास्ता दिखाएगी. मान लिया कि छत्तीसगढ़ आदिवासी और पिछड़ा वर्ग बहुल्य राज्य है, लेकिन यहां की राजनीति में सवर्णों का दखल जबरदस्त है. इसमें अग्रवाल समाज सबसे आगे है. राज्य में 12 अग्रवाल विधायक हैं, जिनमें से सबसे ज्यादा भाजपा में हैं. वे चुनाव लड़ने के लिए पैसे भी देते हैं. भूपेश से करीबी के चलते कई ऐसे कुर्मी इम्मीदवारों को टिकट दिए गए हैं, जो हारने वाले हैं.
क्या जीत के बाद भी नहीं बंधेगा सेहरा
मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में भाजपा यदि सरकार बनाने में कामयाब हो भी जाए तो क्या ये दोनों मुख्यमंत्री लगातार चौथी बार राजयोग का आनंद लेंगे, यह बात भाजपा के नेताओं को ही सबसे ज्यादा खटक रही है. लिहाजा कई नेता तो खुद अपनी ही पार्टी को हराने में लगे हैं. अब वे खुलकर नाराजगी जताएं या न जताएं लेकिन यह बात सही भी है कि आखिर पार्टी के दूसरे नेता कब तक मुख्यमंत्री बनने के लिए इंतजार करेंगे? क्या पार्टी के लिए उनका योगदान कम है? दूसरी बात यह है कि लगातार इतने साल तक कुर्सी पर काबिज रहने के कारण इन नेताओं ने किसी अन्य नेता को उभरने ही नहीं दिया, क्या उनकी ये नीति पार्टी हित में सही है? इस बारे में संघ से भाजपा में आए दो वरिष्ठ नेता कहते हैं, ‘यह बात भाजपा को बहुत अखर रही है कि नेताओं का कद पार्टी से भी आगे बढ़ना सही नहीं है. लिहाजा, अब संघ और भाजपा के अंदर हाईलेवल पर यह बात चल रही है कि अब किसी भी नेता को दो बार से ज्यादा मुख्यमंत्री नहीं बनाया जाए. इसका अमल इन्हीं विधानसभा चुनावों के बाद होगा.’ यानि, यदि डॉ. रमन सिंह और शिवराज सिंह चौहान अपने-अपने राज्य में जीत भी जाएं, तो ज्यादा से ज्यादा छह महीने तक ही सत्ता की मलाई खा पाएंगे. इसके बाद उन्हें निश्चित रूप से केंद्र का रास्ता दिखा दिया जाएगा. अब सवाल यह है कि इनके जाने के बाद मुख्यमंत्री कौन होगा? अगर ऐसी स्थिति बनती है, तो चर्चा है कि मध्य प्रदेश में प्रदेश अध्यक्ष रह चुके नरेंद्र सिंह तोमर और छत्तीसगढ़ में मुख्यमंत्री के बाद दूसरे नंबर के प्रतिभाशाली नेता ब्रिजमोहन अग्रवाल दोनों राज्यों में नया चेहरा हो सकते हैं.
घर लौट गए तो दिवाली
छत्तीसगढ़ में चुनाव का नाम आते ही जेहन में सबसे पहली तस्वीर आती है, विभिन्न सुरक्षा बलों की, जो शांतिपूर्ण चुनाव कराने के लिए कई दिन पहले से आकर हालात संभालने के लिए दिन-रात एक कर देते हैं. चुनावी कवरेज के लिए छत्तीसगढ जाते समय राजधानी ट्रेन में बीएसएफ के कुछ जवानों से मुलाकात हुई. साथ सफर करते हुए उनसे कई किस्से सुनने को मिले, जिन्हें सुनकर कभी रोंगटे खड़े होते हैं, कभी आंखों में आंसू आते हैं, तो कभी दिल उनके परिजनों के लिए तड़प उठता है, जो दिल पर पत्थर रखकर अनहोनी की आशंका को मन में दबाए हुए जीते हैं. नक्सलियों से सामना होने, गोलियों की बौछार के बीच मौत से लड़ने की घटनाएं तो कमोबेश हर जवान ने झेली होती हैं, लेकिन सबसे खतरनाक और दर्दनाक स्थिति तब होती है, जब जवानों के सामने नक्सली होते हैं, लेकिन वे कुछ भी करने में असमर्थ होते हैं, क्योंकि उनके हाथ नियमों में बंधे होते हैं.
बीएसएफ में 18 साल से जुड़े बिहार निवासी एक जवान का कहना था कि वैसे भी हम लोग कैंप से यही सोचकर निकलते हैं कि क्या पता वापस आएं या न आएं, मगर चुनावों के समय यह अंदेशा 100 गुना बढ़ जाता है, क्योंकि चुनावी ड्‌यूटी में हम अपरिचित इलाकों में जाते हैं और जिनसे हमें मुकाबला करना होता है, वो उस इलाके के चप्पे-चप्पे से परिचित होते हैं. ऐसे में खतरा कई गुना बढ़ जाता है. जाहिर है, नक्सलियों के डर से सिविलियन तो हमारी मदद करने से रहे. दीपावली के मौके पर चुनावी डयूटी में जाने की बात पर ये जवान कहते हैं, ‘हमारी असली दिवाली तो सही-सलामत घर पहुंचने पर मनेगी. वैसे भी हर बार हम जब घर जाते हैं, परिजन हमारे अच्छी तरह लौटने पर पूजा-पाठ रखते ही हैं.’
नक्सलवाद के गढ़ दंतेवाड़ा समेत छत्तीसगढ के अन्य नक्सली इलाकों में पांच साल से ज्यादा गुजार चुके एक जवान का कहना था, ‘यदि सेना के हाथ में पूरा दारोमदार दे दिया जाए, तो नक्सलवाद को जड़ से खत्म करने में 6 महीने से ज्यादा नहीं लगेंगे, लेकिन राजनेता ऐसा चाहते ही नहीं हैं. जब मैं तीन साल की पोस्टिंग पर छत्तीसगढ़ आया था, तो इस जज्बे के साथ आया था कि नक्सलवाद खत्म करके ही जाऊंगा, लेकिन कुछ ही दिन में समझ आ गया कि नेता इसे कभी खत्म नहीं होने देंगे. अब हम सोचने पर मजबूर हो जाते हैं कि आखिर किस मकसद को लेकर हम देशसेवा के लिए फौज में आए थे और हम क्या कर रहे हैं?’
अब बात उन लोगों की करते हैं, जो मुख्यधारा से हटकर अभावों की जिंदगी जी रहे हैं और हालातों के चलते हथियार उठाने को मजबूर हुए हैं. छत्तीसगढ़ के बेहद पिछड़े इलाकों से ताल्लुक रखने वाले ये आदिवासी सरकार की गलत नीतियों और बुनियादी सुविधाओं के अभाव में नक्सली बन गए. बुद्विजीवियों की मानें तो वहां नक्सलवाद पर तभी लगाम लग सकती है, जब वहां सरकार विकास की झलक दिखाने में कामयाब हो सके. अभी तो हालत यह है कि कई इलाकों में न पीने को पानी है, न सड़कें हैं और न शिक्षा-स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाएं हैं. बेरोजगारी, गरीबी और अन्य अभावों ने ही नक्सलवाद को पनपाया है और ग्रामीणों के मन में भी उसके प्रति सहानुभूति पैदा की है. इन मासूस ग्रामीणों की स्थिति बहुत ही बदतर है. वे नक्सलियों, सरकार और सुरक्षा बलों के बीच पिस रहे हैं. पटवारी, फॉरेस्ट ऑफिसर्स जैसी सरकारी मशीनरी इनका शोषण कर रही है, वहीं कई बार तो सुरक्षा बलों को जानकारी देने के एवज में उन्हें अपनी जानें गंवानी पड़ती है. सरकार और नेता इन्हें केवल वोटबैंक की नजर से देखते हैं. नेता इनका किस कदर इस्तेमाल करते हैं और किस तरह इनकी अनदेखी करते हैं, इसका अंदाजा चुनावी बजट से भी लगाया जा सकता है. भाजपा के ही एक नेता बताते हैं कि शहरी इलाके में भाजपा चुनावों में 10 से 12 करोड़ रुपए प्रति सीट खर्च कर रही है, वहीं बस्तर के इलाके में यह बजट एक करोड़ रुपए प्रति सीट से भी कम है.’ यानि राजनीतिक पार्टियों के लिए भी ये सीटें सस्ती हैं.
किसकी सभा में कितना दम
छत्तीसगढ़ में भाजपा और कांग्रेस दोनों के राष्ट्रीय स्तर के नेता चुनावी सभा कर रहे हैं. खबर लिखे जाने तक राहुल गांधी छत्तीसगढ़ में आधा दर्जन से ज्यादा सभाएं कर चुके थे, वहीं पीएम मोदी ने केवल दो सभाएं की थीं. अपनी हर सभाओं की तरह भाजपा ने यहां भी तड़क-भड़क दिखाने और पैसे देकर कार्यकर्ताओं की भीड़ इकट्‌ठा करने में कोई कसर नहीं छोड़ी. लिहाजा, ये सभाएं आम आदमी की कम और कार्यकर्ताओं की सभाएं ज्यादा लग रही थीं. वहीं राहुल गांधी की सभाओं में भी भीड़ पहुंची जरूर, लेकिन संसाधनों और फंड की कमी साफ झलकी. मोदी की कम सभाओं के पीछे चुनावी पंडितों का मत है कि भाजपा को ज्यादा भरोसा डॉ. रमन सिंह के चेहरे पर है, वहीं कांग्रेस के पास अविवादित रूप से राज्य में कोई चेहरा ही नहीं है, इसलिए राहुल गांधी ज्यादा सभाएं कर रहे हैं.
आखिरी मौके पर कांगे्रस को एक फायदा जरूर मिला कि सतनामी गुरू बाबा बालदास ने भाजपा का साथ छोड़ कांग्रेस को अपना नया बसेरा बना लिया है. पहले अजित जोगी के कहने पर बाबाजी भाजपा के साथ आए थे और अब अकेले कांग्रेस में गए हैं, इससे वे कितने सतनामी वोटों को कांग्रेस में ट्रांसफर करा पाएंगे, यह कहना संभव नहीं है.

सत्ता में नहीं आए तो भाजपा से मिल जाऊंगा -- अजित जोगी

20 को है चुनाव
आर.बी.एल.निगम,वरिष्ठ पत्रकार 
चुनाव होने से पहले ही पूत के पाओं पालने में नज़र आने लगे। इसे कहते हैं, सत्ता  भूख। मोदी के विरुद्ध हो रहे गठबन्धन की असलियत भी जगजाहिर होने लगी। छत्तीसगढ़ में अजित जोगी और मायावती ने कितनी बेताबी से हाथ मिलाया, लेकिन मतदान पास आते और जनता के रुख को देख अजित जोगी ने अभी से अपने रंग दिखाने शुरू कर दिए, जो सिद्ध करता है कि मोदी के विरुद्ध जनता को उकसा कर केवल सत्ता में बैठ मालपुए खाने की आदत इन्हे सता रही है। यानि मोदी का विरोध कर किसी भी तरह पुनः सत्ता प्राप्त करना है। 
क्या गठबंधन सत्ता पाने के लिए हो रहा है?
अगर किसी कारण छत्तीसगढ़ में त्रिशंकु बहुमत आता है, तो अजित सत्ता का सुख भोगने के लिए भाजपा से हाथ मिलाने में देर नहीं करेंगे। जब विधानसभा चुनावों में गठबंधन का यह हाल है, लोकसभा चुनाव में क्या होगा? यही स्थिति लोकसभा चुनाव में भी हुई, निश्चित रूप से महागठबंधन को ताश के पत्तों की तरह बिखरने में समय नहीं लगेगा। अब प्रश्न उत्पन्न होता है कि "क्या ऐसे अवसरवादी और सत्ता के भूखे नेताओं पर विश्वास किया जा सकता है?" वास्तव में इन बेपेंदी अवसरवादी नेताओं की "जहाँ दिखे तवा पलांत, वहीँ बिता सारी रात" वाली हालत है। ऐसे नेताओं को न देश से, न प्रदेश से और  न ही जनता से, इन्हे मतलब है केवल सत्ता में बैठकर मालपुए खाने की। मोदी विरोध बस जनता को गुमराह करना है, जो ये सत्ता के भूखे नेता अब तक करते आये हैं। 
छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव के मद्देनजर जिस तरह से पूर्व में अजीत जोगी ने बयान दिया था कि अगर प्रदेश में खंडित जनादेश आया तो क्या वह भाजपा के साथ गठबंधन कर सकते हैं। उस वक्त उन्होंने कहा था कि कुछ भी संभव है। लेकिन मायावती के साथ आने के बाद अजीत जोगी ने साफ कर दिया है कि भाजपा के साथ गठबंधन कदापि नहीं हो सकता है। जोगी ने कहा कि मेरे बयान को गलत समझा गया, मैंने उसके बिल्कुल उलट कहा था।
मायावती के सामने बदला बयान 
मायावती के सामने बदला बयानजोगी ने कहा कि मैं खुद के बारे में और बहन मायावती के बारे में जानता हूं, हम विपक्ष में बैठना पसंद करेंगे बजाए इसके कि भाजपा के साथ गठबंधन करें। अंग्रेजी में मेरे मुहावरे को गलत समझा गया, मैंने उसे दूसरे परिपेक्ष्य में कहा था, राजनीति में कुछ भी संभव है, ये सही है। अजीत जोगी ने जब यह बयान दिया तो बसपा सुप्रीमो मायावती उनके पास बैठी थीं। जोगी ने कहा कि जब मुझसे पूछा गया कि क्या मैं भाजपा या कांग्रेस के साथ गठबंधन करूंगा तो मैंने कहा किसी से नहीं करूंगा, हमारा गठबंधन मजबूत है, हम सरकार बनाएंगे।
क्या कहा था पहलेक्या कहा था पहले 
आपको बता दें जोगी और मायावती ने रायपुर में एक चुनावी जनसभा को संबोधित किया, इसी दौरान जोगी ने अपना रुख साफ करते हुए कहा कि चुनाव के बाद गठबंधन एक काल्पनिक सवाल है। वहीं मायावती ने भी भाजपा और कांग्रेस के साथ गठबंधन की संभावना को इनकार करते हुए कहा किक हम उनके साथ गठबंधन करने की बजाए विपक्ष में बैठना पसंद करेंगे। एक सांपनाथ है तो दूसरा नागनाथ, दोनों सांप हैं। आपको बता दें किक इससे पहले कांग्रेस और भाजपा के साथ गठबंधन की बात पर जोगी ने कहा था कि राजनीति में कुछ भी इनकार नहीं किया जा सकता है, कुछ भी हो सकता है।
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20 को है चुनाव 
वहीं मायावती के बारे में जोगी ने कहा कि मैंने कांग्रेस और भाजपा के बारे में मायावती से बात नहीं की है। आपको बता दें कि छत्तीसगढ़ में कुल 90 विधानसभा सीटें हैं। यहां दो चरणों में चुनाव होना है, पहले चरण का मतदान 12 नवंबर को हो चुका है, जबकि 20 नवंबर को दूसरे चरण का चुनाव होगा, यहां चुनाव के नतीजे 11 दिसंबर को घोषित किए जाएंगे।

आम आदमी पार्टी (आप) पूरी तरह से ‘गुंडों की पार्टी’ है-- मनोज तिवारी, दिल्ली प्रदेश भाजपा अध्यक्ष

Manoj Tiwari
आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) सांसद एवं दिल्ली प्रदेश भाजपा अध्यक्ष मनोज तिवारी ने नवम्बर 16 को दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल पर निशाना साधा और आरोप लगाया कि आप नेता ‘अर्बन नक्सलियों’ के बड़े उदाहरण हैं। तिवारी ने यहां संवाददाता सम्मेलन में आरोप लगाते हुए कहा कि आम आदमी पार्टी (आप) पूरी तरह से ‘गुंडों की पार्टी’ है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को मारने की साजिश कुछ ‘अर्बन नक्सली’ रच रहे हैं।
पढ़िए कांग्रेस और आप पार्टी
का सम्बन्ध 
तिवारी ने आरोप लगाया कि कांग्रेस और आम आदमी पार्टी एक ही थैली के चट्टे बट्टे हैं। दोनों मिलकर सरकार बना चुके हैं। आम आदमी पार्टी कांग्रेस की ‘बी टीम’ है। इसमें दो राय नहीं, कि आप पार्टी और कांग्रेस दोनों सिक्के के एक ही पहलु हैं। कुछ वर्ष पूर्व एक हिन्दी पाक्षिक को सम्पादित करते विस्तार से कांग्रेस से तार जुड़े होने का विस्तार से लिखा था। अरविन्द केजरीवाल को चुनावी मैदान में उतारने का मुख्य कारण नरेन्द्र मोदी लहर को रोकने का था, लेकिन इसी पार्टी ने कांग्रेस को सबसे अधिक नुकसान पहुँचाया यानि बोया पेड़ बबूल का, आम कहाँ से होए। 
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आम आदमी पार्टी संयोजक अरविंद केजरीवाल और दिल्ली में धर्मांतरण कराने वाली ईसाई मिशनरियों के रिश्तों पर कई बेहद चौ.....

उन्होंने आगे कहा कि रमन सिंह ने छत्तीसगढ़ में एक बड़ी समस्या का समाधान किया है। सिंह ने नक्सली समस्या का हल निकालते हुए भटके हुए भाइयों को मुख्यधारा में लाने का काम किया है।
जो कांग्रेस के शासनकाल में भटके थे उन्हें मुख्यधारा में लाने की कोशिश की जा रही है। वहीं कांग्रेस नेता राज बब्बर कहते हैं कि यह तो क्रांतिकारी हैं। तिवारी ने दावा किया कि रमन सिंह को चौथी बार मुख्यमंत्री बनाने का उत्साह यहां की जनता में नजर आ रहा है। छत्तीसगढ़ में धान का समर्थन मूल्य मिल रहा है तथा साथ में तीन सौ रूपए बोनस मिल रहा है।
गरीबों को एक रुपए प्रति किलोग्राम चावल दिया जा रहा है। राज्य में हो रहे विधानसभा चुनाव में दूसरे चरण के मतदान के लिए तिवारी प्रचार करने छत्तीसगढ़ पहुंचे हैं।

क्या दल बदलू विश्वास और वोट के हक़दार हैं?

मध्य प्रदेश चुनाव 2018: बागियों ने 30 से अधिक सीटों पर बढ़ाई बीजेपी-कांग्रेस की परेशानी

मध्यप्रदेश विधानसभा के लिए 28 नवंबर को होने वाले चुनाव में प्रदेश की कुल 230 सीटों में से 30 से अधिक सीटों पर सत्तारूढ़ बीजेपी एवं मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस के बागियों के उतरने से इन दोनों दलों की मुश्किलें बढ़ गई हैं. ये 30 से अधिक बागी अपनी पार्टी के आधिकारिक प्रत्याशी की जीत को हार में बदल सकते हैं. वहीं, दोनो दल अपने-अपने बागियों को मनाने में लग गए हैं. मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष राकेश सिंह, पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष प्रभात झा, प्रदेश संगठन सचिव सुहास भगत एवं अन्य नेता अपनी पार्टी के बागी नेताओं से संपर्क कर उनसे अपना नामांकन पत्र वापस लेने की गुजारिश कर रहे हैं.

बागी नेताओं से बातचीत जारी है- बीजेपी
बीजेपी के प्रदेश प्रवक्ता रजनीश अग्रवाल ने कहा, ''हमारे वरिष्ठ नेता पार्टी के सभी बागी प्रत्याशियों से बातचीत कर रहे हैं और उनसे बीजेपी के आधिकारिक प्रत्याशी के खिलाफ चुनावी मैदान से हटने का अनुरोध कर रहे हैं.'' उन्होंने उम्मीद जताई कि पहले के चुनावों की तरह इस बार के चुनाव में भी बागी नेता चुनावी मैदान से हट जाएंगे और अपनी उम्मीदवारी वापस ले लेंगे. बता दें कि उम्मीदवारी वापस लेने की अंतिम तिथि 14 नवंबर है.
MP GRF
कांग्रेस भी बागियों को मनाने में जुटी
वहीं, कांग्रेस की ओर से दिग्गज नेता एवं मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह अपनी पार्टी के बागी प्रत्याशियों से मिल रहे हैं और उनसे गुजारिश कर रहे हैं कि पार्टी के आधिकारिक प्रत्याशी के हित में अपना नामांकन पत्र वापस ले लें. सिंह के अलावा, मध्यप्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ, मध्यप्रदेश कांग्रेस चुनाव अभियान समिति के अध्यक्ष ज्योतिरादित्य सिंधिया, मध्यप्रदेश विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह भी अपनी पार्टी के बागी प्रत्याशियों को मनाने लगे हैं कि वे चुनावी मैदान से हट जाएं, ताकि बीजेपी को चौथी बार सत्ता में आने से रोका जा सके.
बागी नामांकन वापस लें, चाहें तो मेरे 10 पुतले फूंक दें- दिग्विजय सिंह
दिग्विजय सिंह बागियों से यह अपील करते हुए भी दिखाई दिए कि यदि वे पार्टी से नाराज हैं तो, वे अपने गुस्से को निकालने के लिए मुझे (दिग्विजय) गाली दे सकते हैं और विरोध जताने के लिए मेरे 10-10 से अधिक पुतले जला लें, लेकिन पार्टी के हित में चुनावी मैदान ने अपना नाम वापस ले लें. वह बागियों से अनुरोध कर रहे थे कि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने प्रत्याशी चुने हैं और उन्हें समर्थन देना चाहिए. पार्टी के आधिकारिक प्रत्याशियों को वोटों का नुकसान न पहुंचाएं.
मंत्री जयंत मलैया की विधानसभा सीट पर भी मंडरा रहा है खतरा
सिंह ने कहा कि कांग्रेस ने सोच विचार कर एवं विवेकपूर्ण तरीके से पार्टी हित में अपने प्रत्याशी बनाये हैं. बीजेपी से पांच बार सांसद, दो बार विधायक एवं शिवराज सिंह चौहान की सरकार में मंत्री रहे कर्मी वर्ग के नेता डॉ. रामकृष्ण कुसमरिया ने एक साथ निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में दो सीटों दमोह और पथरिया से नामांकन भरा है. इस नामांकन से कुसमरिया ने प्रदेश के वित्तमंत्री जयंत मलैया के लिए दमोह सीट पर मुश्किल खड़ी कर दी है.
आरएसएस विचारक राघवजी ने भरा सपाक्स पार्टी से पर्चा
ठीक इसी तरह से मध्यप्रदेश के पूर्व वित्त मंत्री एवं आरएसएस विचारक राघवजी भाई भी विदिशा जिले की शमशाबाद विधानसभा सीट से नई नवेली पार्टी सपाक्स से चुनावी मैदान में उतरे हैं. राघवजी बीजेपी द्वारा उनकी बेटी ज्योति शाह को टिकट न दिये जाने से नाराज हैं. भारतीय जनता युवा मोर्चा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष धीरज पटेरिया भी निर्दलीय उम्मीदवार के रूप से जबलपुर उत्तर सीट से चुनाव लड़ रहे हैं. वहीं, कांग्रेस के बागी नेताओं में पार्टी के वरिष्ठ नेता एवं पार्टी के पूर्व प्रवक्ता सत्यव्रत चतुर्वेदी के बेटे नितिन चतुर्वेदी हैं. कांग्रेस द्वारा टिकट न दिये जाने से नाराज नितिन बुंदेलखंड क्षेत्र की राजनगर सीट से समाजवादी पार्टी की टिकट पर लड़ रहे हैं.
कांग्रेस के पूर्व विधायक ने भी भरा निर्दलीय पर्चा
ठीक इसी तरह से साहब सिंह गुर्जर भी कांग्रेस द्वारा टिकट न दिये जाने से नाराज हो गए और ग्वालियर ग्रामीण सीट से चुनावी मैदान में खड़े हैं. जबकि, कांग्रेस के पूर्व विधायक जैवियर मेढ़ा भी झाबुआ में कांग्रेस के आधिकारिक प्रत्याशी विक्रांत भूरिया के सामने चुनावी मैदान में उतर गये हैं. विक्रांत कांग्रेस सांसद कांतिलाल भूरिया के बेटे हैं. 
एमपी में भाजपा विधायक नीलम मिश्रा ने पार्टी से दिया इस्तीफा, मंत्री और सांसद पर लगाए आरोप
मध्यप्रदेश में जनता किसके सिर पर ताज सजाएगी इसके लिए कुछ दिनों बाद ही चुनाव होने वाले हैं। जिसमें सभी प्रत्याशियों की किस्मत का फैसला हो जाएगा। वहीं राज्य में राजनीतिक सरगर्मी तेज हो गई है। इसी बीच रीवा जिले की सेमरिया सीट की विधायक नीलम मिश्रा ने भाजपा से इस्तीफा दे दिया है। वह टिकट कटने से नाराज थीं। उनके पति अभय मिश्रा पहले ही कांग्रेस में शामिल हो चुके हैं। ऐसे में पहले से ही कयास लगाए जा रहे थे कि वह भी भाजपा को छोड़कर कांग्रेस का दामन थाम सकती हैं।
भाजपा ने जब उन्हें सेमरिया सीट से टिकट नहीं दिया तो उन्होंने पार्टी छोड़ने का निर्णय ले लिया। रीवा में प्रेस कांफ्रेंस करके उन्होंने उद्योग मंत्री राजेंद्र शुक्ल और सासंद जनार्दन मिश्रा पर गंभीर आरोप लगाए हैं। नीलम मिश्रा ने भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष राकेश सिंह को पत्र लिखकर इस बात की जानकारी दी है। उनका कहना है कि वह किसी भी दल में शामिल न होकर अपने पति और कांग्रेस प्रत्याशी अभय मिश्रा के लिए प्रचार करेंगी।
नीलम मिश्रा ने राज्य के मंत्री और सांसद पर आरोप लगाते हुए कहा कि इन दोनों की वजह से उनके विधानसभा क्षेत्र में विकास कार्य नहीं हो पाए हैं। दोनों नेताओं ने विधायक निधि के कोई और कार्य विधानसभा क्षेत्र में होने नहीं दिए। उन्होंने आरोप लगाया कि मंत्री के गलत कार्यों का जब पति अभय मिश्रा ने विरोध किया तो उन्हें प्रताड़ित किया गया। इसके बाद भी हमारी पार्टी के प्रति नाराजगी नहीं रही।
विधायक ने कहा कि जहां पार्टी के लोग ही आपका विरोध कर रहे हैं तो वहां रहने का फायदा क्या है। इसी कारण मैंने भाजपा से इस्तीफा दे दिया है। भाजपा में पांच साल मैंने अपमानित होकर बिताए। मेरे पति को भी जब भाजपा में सम्मान नहीं मिला तो उन्होंने वह कांग्रेस में शामिल हो गए। हाल ही में कांग्रेस ने अभय मिश्रा को रीवा से टिकट दिया है। उनका मुकाबला राज्य के उद्योग मंत्री राजेंद्र शुक्ल से है। 

पार्टी उपाध्यक्ष घनराम साहू ने छोड़ा कांग्रेस का साथ, BJP का थम सकते है दामन

छत्तीसगढ़ में पहले चरण के मतदान से पहले कांग्रेस को बड़ा झटका लगा है। राज्य में कांग्रेस उपाध्यक्ष घनराम साहू ने नवम्बर 11 को पार्टी की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया है।

उनका आरोप है कि प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष भूपेश बघेल और दुर्ग के सांसद ताम्रध्वज साहू मिलकर उनका नेतृत्व खत्म करने की कोशिश कर रहे थे। बता दें कि वह पांच साल से पार्टी के उपाध्यक्ष पद पर थे। उनका कहना है कि चुनाव के दौरान उनकी उपेक्षा की जा रही है इसलिए वह पार्टी से इस्तीफा दे रहे हैं।
उन्होंने अपना इस्तीफा पीसीसी अध्यक्ष को पोस्ट से भेज दिया है। उन्होंने कहा कि वह सोमवार को भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष की मौजूदगी में भाजपा में शामिल होंगे। 

बीजेपी विधायक सुरेंद्र गोयल ने भाजपा की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा दे दिया है।

राजस्थान में होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले भारतीय जनता पार्टी (BJP) को बड़ा झटका लगा है। वसुंधरा राजे सरकार मंत्री सुरेंद्र गोयल ने इस्तीफा दे दिया है और उन्हें पार्टी भी छोड़ दी है। 
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Rajasthan Minister and MLA Surendra Goyal resigns from primary membership of BJP
7:04 PM - Nov 12, 2018
जन स्वास्थ्य अभियांत्रिकी एवं भूजल विभाग में मंत्री सुरेंद्र गोयल ने प्रदेश अध्यक्ष को पत्र में लिखा, 'मैं सुरेंद्र गोयल विधायक विधानसभा क्षेत्र जैतारण (116) भारतीय जनता पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से त्याग पत्र देता हूं। अत: आप मेरा इस्तीफा स्वीकार करें।' 

छत्तीसगढ़ में भाजपा की कमाई कांग्रेस से चार गुना ज्यादा

छत्तीसगढ़ में सत्तारूढ़ भाजपा को हर साल करीब एक हजार करोड़ का चंदा मिलता है जबकि विपक्षी कांग्रेस की चंदे से आय भाजपा की तुलना में एक चौथाई से भी कम है। चंदा उगाही के मामले में राज्य मंे बहुजन समाज पार्टी तीसरे नंबर की पार्टी है।
छत्तीसगढ़ इलेक्शन वॉच और एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) की ताजा रिपोर्ट में बताया गया है कि वित्तीय वर्ष 2016-17 में छत्तीसगढ़ में भाजपा की कुल आय 1034.27 करोड़ रुपये थी। इसी दौरान कांग्रेस की आय 225.36 करोड़ रुपये बताई गई है। भाजपा ने कुल आय में से 710.057 करोड़ रुपये का व्यय दर्शाया है जबकि कांग्रेस ने इस दौरान आय से अधिक 321.36 करोड़ रुपये खर्च किए हैं। बसपा की आय इस अवधि में 173.58 करोड़ रुपये रही। बसपा ने 51.83 करोड़ खर्च किया है।
90 में से 66 विधायक करोड़पति, 14 पर आपराधिक मामले
एडीआर की रिपोर्ट के मुताबिक छत्तीसगढ़ की 90 सदस्यीय विधानसभा मेंं 66 विधायक करोड़पति हैं। भाजपा के 49 में से 34 विधायक करोड़पति हैं जबकि कांग्रेस के 39 में से 30 विधायक करोड़पति हैं। बसपा के एकमात्र विधायक और एकमात्र निर्दलीय विधायक भी करोड़पतियों की श्रेणी में शामिल हैं।
2013 में सदन में करोड़पति विधायकों की संख्या मात्र 30 थी जो अगले चुनाव के बाद गठित सदन में बढ़कर 66 पहुंच गई। सदन में 14 विधायक ऐसे भी रहे जिनपर आपराधिक मामले दर्ज हैं। भाजपा के छह और कांग्रेस के आठ विधायकों पर विभिन्न् मामले दर्ज हैं।
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राजस्थान विधानसभा चुनाव को लेकर सियासी उठापटक तेज होती जा रही है। इस बीच राज्य विधानसभा का अब तक का इतिहास देखें त.....

टीएस सिंहदेव सबसे अमीर
प्रदेश के विधायकों में कांग्रेस के टीएस सिंहदेव सबसे अमीर हैं। उनकी संपत्ति 565 करोड़ है। दूसरे नंबर पर कांग्रेस विधायक गुरुमुख सिंह होरा और भाजपा के गौरीशंकर अग्रवाल हैं। दोनों ने अपनी संपत्ति 11-11 करोड़ रुपये बताई है। कांग्रेस विधायक मोतीलाल देवांगन और भूपेश बघेल आठ-आठ करोड़ के मालिक हैं।