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यूँ ही नहीं खुद को ‘मुस्लिमों की पार्टी’ कहती है कांग्रेस : असम में जीते 19 विधायकों में केवल 1 हिंदू, बंगाल में दोनों मुस्लिम


2018 में उर्दू अखबार ‘इंकलाब’ ने एक खबर छापी जिसमें राहुल गाँधी का एक बयान था जिसमें कहा गया था कि ‘कांग्रेस मुस्लिमों की पार्टी है’। तब कांग्रेस पार्टी ने इस बयान को झुठलाने की कोशिश की लेकिन पार्टी के ही तब के अल्पसंख्यक मोर्चा के चेयरमैन ने इस बयान की पुष्टि की थी। इस बात को 8 साल बीत गए हैं।
कांग्रेस पार्टी वास्तव में मुस्लिमों की पार्टी है इस सच्चाई को जानने के लिए राहुल गाँधी से लेकर मोतीलाल नेहरू तक की असलियत जानना जरुरी है। हो सकता है सच्चाई सामने आने पर परिवार भक्त/गुलाम उपद्रव मचाएं। मचेगा उसे कोई रोक नहीं पाएगा। आखिर परिवारभक्ति की कीमत जो चुकानी है। शायद यही वजह है कि सामाजिक कुरीतियों को दूर करने का हथोड़ा हिन्दू समाज पर चला लेकिन उस समाज के खिलाफ बोलने की हिम्मत नहीं हुई जिसमे हिन्दू समाज से कहीं अधिक कुरीतियां हैं।  

दूसरे, इस्लामिक आतंकवादियों को बचाने हिन्दू धर्म को बदनाम करने "हिन्दू आतंकवाद" और "भगवा आतंकवाद" का जहर फैलाया गया। और बेशर्म हिन्दू भी इस जहर को पीकर आनंदित होता रहा। सच्चाई को जानने की कोशिश नहीं की। मुस्लिम समाज को एकजुट रखने के लिए हिन्दुओं को जातिगत सियासत में बाँटने का घिनौना खेल आज तक खेला जा रहा है। है किसी में हिम्मत जो ईसाई और मुसलमानों की जातियों में खतरनाक भेदभाव को दूर करने के लिए मुंह सके। सेकुलरिज्म के नाम पर हिन्दुओं को गुमराह किया जाता रहा है एक बात याद रखनी चाहिए कि एक हाथ से ताली नहीं बजती। लेकिन यहाँ एक हाथ से ही ताली बजाई जा रही है।    

अब सोमवार(4 मई 2026) को राज्यों के विधानसभा चुनावों के नतीजे आए। कांग्रेस के उस दावे में कितना सच था या नहीं थे इस थोड़ी देर के लिए भूल जाते हैं और नतीजों से कांग्रेस के मौजूदा स्वरूप को समझने की कोशिश करते हैं। बात करते हैं, असम और पश्चिम बंगाल की, इन दोनों राज्यों में बीजेपी सत्ता में आई है।

बंगाल में टक्कर TMC-BJP के बीच थी तो कांग्रेस की गर्त में जाना लगभग तय था, हुआ भी वही। असम में मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा के नेतृत्व में पार्टी के आक्रामक प्रचार ने राज्य में पार्टी की जीत की हैट-ट्रिक लगा दी।

कांग्रेस को असम और पश्चिम बंगाल में कुल जमा 21 विधानसभा सीटें मिलीं। असम में पार्टी ने 19 सीटें जीतीं जबकि पश्चिम बंगाल में कांग्रेस के खाते में 2 सीटें आईं। इसमें एक दिलचस्प बात जो सामने आई वो उस 2018 के अखबार की उस रिपोर्ट की ही याद दिला रही थी जो राहुल गाँधी ने तब कथित तौर पर कहा था।

असम में जीते कांग्रेस के 19 विधायकों में केवल 1 विधायक हिंदू है। असम की नोबोइचा सीट से जीते जोय प्रकाश दास राज्य में कांग्रेस के इकलौते हिंदू विधायक हैं बाकी विधायकों के नाम आप इस लिस्ट में देख सकते हैं।

                              असम में जीते कांग्रेस के विधायक (साभार: ECI Result)

यही हाल पश्चिम बंगाल में भी कांग्रेस का हुआ। पश्चिम बंगाल के फरक्का में कांग्रेस के मोताब शेख और रानीनगर में जुल्फीकार अली ने जीत दर्ज की है।

                                             पश्चिम बंगाल में जीते कांग्रेस के विधायक (साभार: ECI Result)

वहीं, केरल में कांग्रेस उस इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (IUML) के साथ गठबंधन में सरकार बनाने जा रही है जिसकी कट्टरपंथी विचार किसी ने छिपे नहीं है। इस कट्टरपंथी और हिंदू विरोधी पार्टी को राहुल गाँधी सेकुलर तक बता चुके हैं।

भले ही IUML यह दावा करती है कि उसका गठन 1948 के बाद हुआ लेकिन असल में यह ऑल इंडिया मुस्लिम लीग (AIML) की ही एक शाखा है। AIML वही पार्टी थी जिसे पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना ने बनाया था। देश के बँटवारे के बाद AIML की जगह पाकिस्तान में मुस्लिम लीग और भारत में इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (IUML) ने ले ली।

IUML का गठन AIML की सोच और विचारधारा को जिंदा रखने के लिए किया गया था। इसका एक बड़ा उदाहरण यह है कि IUML के पहले अध्यक्ष मोहम्मद इस्माइल खुद देश के बँटवारे के आंदोलन में शामिल थे और पाकिस्तान बनने के समर्थक थे।

कांग्रेस का मुस्लिम घुसपैठियों से भी प्रेम बताता है कि उसकी आज की दशा क्या हो गई है। असम और बंगाल दोनों ऐसे राज्य हैं जो घुसपैठ और डेमोग्राफी परिवर्तन से जूझ रहे हैं लेकिन कांग्रेस को ना ये अवैध घुसपैठिए नजर आते हैं, ना ही डेमोग्राफी में बदलाव नजर आता है। वो जमीनी हकीकत को भी जानते समझते हुए भी केवल वोट के लिए या कहें तो मुस्लिम वोट के लिए इस मुद्दे पर चुप्पी साधे रखती है।

अब भले ही 2018 में राहुल गाँधी ने कांग्रेस को मुस्लिमों की पार्टी बताया हो या ना बताया हो लेकिन पार्टी के कृत्य तो इस बात को स्थापित करते ही हैं। बाकी अभी इन दोनों राज्यों में कांग्रेस के करीब 95% चुने गए विधायक मुस्लिम हैं, आगे ये आँकड़ा और कांग्रेस की राजनीति कहाँ जाएगी ये तो वक्त ही बताएगा।

नरेंद्र मोदी का तख्तापलट करना चाहता था अमेरिका: बायडेन प्रशासन की ‘साजिश’ से डोनाल्ड ट्रम्प ने उठाया पर्दा, कहा- भारत के पास बहुत पैसा, फिर ‘वोटर टर्न आउट’ बढ़ाने को क्यों दें 180 करोड़ रूपए

                                      राष्ट्रपति ट्रम्प ने चुनावों में दखल पर प्रश्न उठाए हैं (फोटो साभार: CNN)
अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति जो बायडेन की सरकार भारत में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अलावा किसी और को लाना चाहती थी। यह आरोप अमेरिका वर्तमान राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने सार्वजनिक सभा में लगाया है। उन्होंने USAID के $21 मिलियन (लगभग ₹182 करोड़) भारत में चुनाव के नाम पर भेजने को लेकर यह बात कही है। ट्रम्प ने कहा है कि हमें भारत को जवाब को देना पड़ेगा।

मियामी में एक समिट में डोनाल्ड ट्रम्प ने पूर्ववर्ती सरकार USAID के नाम पर अनर्गल पैसा बहाने का आरोप लगाया। ट्रम्प ने कहा, “$21 मिलियन वोटर प्रतिशत बढ़ाने को भारत में दिए गए। हमें भारत में $21 मिलियन डॉलर वोटर टर्नआउट के लिए खर्च करने की क्या जरूरत है? मुझे लगता है कि वो किसी और को चुनाव जिताने की कोशिश कर रहे थे।”

डोनाल्ड ट्रम्प ने आगे कहा. “हमें भारत सरकार को इस विषय में जवाब देना पड़ेगा क्योंकि जब रूस ने हमारे चुनाव में $2 हजार (₹1 लाख 70 हजार) कथित तौर पर खर्च कर दिए थे तो यह बड़ा मुद्दा था। उन्होंने इन्टरनेट पर कुछ विज्ञापन लगाए थे। ये बहुत बड़ा खुलासा है।”

राष्ट्रपति ट्रम्प के इस बयान में सीधे तौर बायडेन प्रशासन को कठघरे में खड़ा किया गया है। ट्रम्प का आरोप है कि बायडेन प्रशासन भारत में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के अलावा किसी और को चुनाव जितवाना चाहता था। राष्ट्रपति ट्रम्प के इस बयान से भारत के लोकसभा चुनावों में विदेशी दखलअंदाजी की पुष्टि भी हो गई है।

डोनाल्ड ट्रम्प ने इससे पहले भी USAID द्वारा दिए गए इस पैसे को लेकर प्रश्न उठाए थे। उन्होंने कहा, “हम भारत को 21 मिलियन डॉलर क्यों दे रहे हैं? उनके पास बहुत पैसा है। हमारे हिसाब से वे दुनिया में सबसे ज़्यादा टैक्स लगाने वाले देशों में से एक हैं, हम वहाँ मुश्किल से व्यापार कर पाते हैं क्योंकि उनके यहाँ टैरिफ अत्यधिक हैं।”

इससे पहले अमेरिकी विदेश विभाग के पूर्व अधिकारी रहे माइक बेंज ने कहा था कि उनके पास USAID के भारत और बांग्लादेश में चुनावी दखल देने के सबूत हैं। उन्होंने कहा था कि अमेरिकी एजेंसियाँ लोकतंत्र के बढ़ावे के नाम पर दूसरे देशों के चुनाव प्रभावित करती हैं।

अमेरिकी राष्ट्रपति का यह बयान एलन मस्क की अगुवाई वाले विभाग DOGE के खुलासे के बाद आया है। DOGE ने ही यह बताया था कि USAID ने वोटर भागीदारी बढाने के नाम पर $21 मिलियन भारत भेजे। गौरतलब है कि सत्तारूढ़ भाजपा बायडेन प्रशासन के अंतिम दिनों में ऐसे ही आरोप लगा चुकी है।

 भाजपा ने कहा था कि अमेरिकी विदेश विभाग और डीप स्टेट प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ एजेंडा चलाने में जुटे हैं और उनकी छवि को धूमिल करना चाहते हैं। भाजपा ने कहा था कि अमेरिकी सरकार के अलग-अलग विभाग मीडिया के सहारे प्रधानमंत्री मोदी पर बिना सबूत के आरोप लगा रहे हैं।

भाजपा ने आरोप लगाया था कि डीप स्टेट भारत को अस्थिर करना चाहता है। इसको लेकर अमेरिका ने आपत्ति जताई थी।

ईरान : कट्टरपंथी जलीली को तो हरा दिया, लेकिन क्या हिजाब की सर्जरी कर पाएँगे मसूद पेज़ेश्कियान? सुप्रीम मौलाना अब भी शक्तिशाली, फिर भी नए राष्ट्रपति में महिलाओं को दिख रही उम्मीद

               ईरान में अब इस्लामी कट्टरपंथी शासन होगा खत्म, मसूद पेज़ेश्कियान चुने गए नए राष्ट्रपति

मसूद पेज़ेश्कियान ईरान के नए राष्ट्रपति चुने गए हैं। उन्होंने कट्टरपंथी सईद जलीली को हराया है। बता दें कि हिजाब न पहनने के कारण महासा अमिनी नामक युवती को ईरान पुलिस ने मार डाला था, जिसके बाद वहाँ कट्टरपंथी इस्लाम के खिलाफ लाखों महिलाएँ एकजुट होकर सड़क पर उतरी थीं। मसूद पेज़ेश्कियान नरमवादी हैं और आशा जताई जा रही है कि उनके सत्ता में आने के बाद ईरान में कट्टरपंथ कम होगा। महिलाएं उम्मीद लगा रही है कि बिना हिजाब के घर से बाहर निकल पाएंगी। अब ईरान को उम्मीद है कि सामाजिक स्वतंत्रता के क्षेत्र में काम होंगे, साथ ही ईरान की विदेशी नीति भी व्यावहारिक होगी।

 ईरान में तेज़ी से आगे बढ़ रहे परमाणु कार्यक्रम के बीच उम्मीद है कि मसूद पेज़ेश्कियान के राष्ट्रपति चुने जाने का वैश्विक शक्तियाँ भी स्वागत करेंगी। ईरान का अमेरिका जैसे देशों के साथ चल रहे तनाव के अब शांतिपूर्ण समाधान की उम्मीद है। शहरी नागरिकों, महिलाओं और युवाओं का उन्हें समर्थन मिला है। वर्षों से ईरान में कट्टरवादी सत्ता है, जिसमें सुधारों के लिए बोलना भी गुनाह है। 69 वर्षीय मसूद पेज़ेश्कियान पढ़े-लिखे हैं, वो कार्डियक सर्जन हैं। उन्होंने ईरान में हिजाब को लेकर सख्त कानून में नरमी लाने का भी वादा किया है।

उम्मीद जताई जा रही है कि ईरान में समाज अब लिबरल होगा, एक विविधता वाली विचारधारा का जन्म होगा। साथ ही 2015 में परमाणु कार्यक्रमों को लेकर जो अंतरराष्ट्रीय समझौता हुआ था, वो फिर से अस्तित्व में आ सकेगा। हालाँकि, ईरान में एक दोहरी व्यवस्था चलती है जिसमें मौलाना ही सरकारी मामलों में अंतिम फैसला लेते हैं। अयातुल्ला अली खामेनेई अब भी वहाँ के सुप्रीम लीडर हैं। अरब के आतंकी संगठनों को समर्थन के विषय में भी वही निर्णय लेते हैं।

लेकिन, चूँकि अब अयातुल्ला अली खामेनेई की उम्र 85 वर्ष हो गई है, उनका उत्तराधिकारी चुनने में नए राष्ट्रपति की बड़ी भूमिका होगी और इस तरह आगे के बड़े फैसलों में राष्ट्रपति प्रभावी रूप से शामिल रहेंगे। मसूद पेज़ेश्कियान ये भी कह चुके हैं कि अयातुल्ला अली खामेनेई की नीतियों के खिलाफ नहीं जाएँगे। उन्होंने कहा कि अपने चुनावी वादे को पूरा न कर सकने की स्थिति में वो राजनीति को अलविदा कह देंगे। बता दें कि मई में एक हेलीकॉप्टर क्रैश में ईरान के तत्कालीन राष्ट्रपति इब्राहिम रईसी की मौत के बाद ये पद रिक्त हुआ था।

पूर्व राष्ट्रपति मोहम्मद ख़ातमी के नेतृत्व वाले सुधारवादी दल ने इस चुनाव में मसूद पेज़ेश्कियान का समर्थन किया था। इब्राहिम रईसी को खामेनेई गुट का माना जाता था और उन्होंने महिलाओं के ड्रेस से लेकर अंतरराष्ट्रीय संबंधों तक के मामले में इस्लामी कट्टरपंथी रुख अपनाया था। मसूद पेज़ेश्कियान ने कुप्रबंधन, अमेरिकी प्रतिबंधों और भ्रष्टाचार से जूझती ईरानी अर्थव्यवस्था को संकट से निकालने का भी वादा किया था। कइयों का मानना है कि वो कमजोर राष्ट्रपति साबित होंगे, क्योंकि सुप्रीम लीडर का गुट अभी भी शक्तिशाली है।

महासा अमिनी की मौत को लेकर भी मसूद पेज़ेश्कियान ने ईरान पुलिस से स्पष्टीकरण माँगा था। 1980 के दशक में ईरान-इराक युद्ध के समय उन्हें ईरानी सेना के लिए मेडिकल सुविधाएँ पहुँचाने का काम सौंपा गया था। खातमी के कार्यकाल में वो स्वास्थ्य मंत्री रहे हैं। 1994 में एक दुर्घटना में उनकी पत्नी और एक बच्चे की मौत हो चुकी है। उन्होंने अकेले ही 2 बेटों और एक बेटी का पालन-पोषण कर बड़ा किया। इजरायल को लेकर ईरान का क्या रुख रहता है, ये भी देखने वाली बात होगी।

ताइवान : ‘चीन से संघर्ष के लिए तैयार हों’: जिसे उपद्रवी बताता था वही बना ताइवान का राष्ट्रपति, लाई चिंग-ते की जीत से शी जिनपिंग को बड़ा झटका

                                   ताइवान में लाई चेंग-ते की जीत से चीन और शी जिनपिंग को झटका
ताइवान में चीन को बड़ा झटका लगा है। चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के कट्टर विरोधी लाई चिंग-ते ने राष्ट्रपति पद के लिए हुए चुनावों में जीत हासिल की है। शनिवार (13 जनवरी, 2024) को ताइवान में राष्ट्रपति चुनाव की मतगणना की गई, जिसमें उन्होंने जीत दर्ज की। अभी तक वोटिंग पूरी नहीं हुई है, लेकिन लाई को विजेता घोषित कर दिया गया है। वो मौजूदा समय में ताईवान के उप-राष्ट्रपति हैं और अब 20 जनवरी को राष्ट्रपति पद की शपथ लेंगे।

सत्तारूढ़ ‘डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव पार्टी’ (DPP) के लाई चिंग-ते, जिन्हें विलियम लाई नाम से भी जाना जाता है, उन्होंने 41.6% वोटों के साथ जीत हासिल की। उनके प्रतिद्वंद्वी, कुओमिन्तांग (KMT) के होऊ यू-इह ने 33.4% वोट हासिल किए। लाई चिंग-ते एक स्वतंत्रतावादी नेता हैं जिन्हें चीन द्वारा एक ‘उपद्रवी‘ के रूप में देखा जाता है। उनकी जीत से चीन-ताइवान संबंधों में तनाव बढ़ने की संभावना है।

लाई चिंग-ते ने अपने चुनावी अभियान के दौरान एक अधिक स्वतंत्रतावादी रुख अपनाया। उन्होंने कहा कि वह ताइवान की संप्रभुता की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध हैं और चीन के साथ एकीकरण के किसी भी प्रयास का विरोध करेंगे। उन्होंने यह भी कहा कि वह ताइवान को एक अधिक लोकतांत्रिक और समृद्ध समाज बनाने के लिए काम करेंगे।

लाई चिंग-ते की जीत से चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग को झटका लगा है। शी जिनपिंग ताइवान को चीन का एक प्रांत मानते हैं और उन्होंने ताइवान को अपने नियंत्रण में लाने के लिए सैन्य कार्रवाई करने की धमकी दी है। लाई चिंग-ते की जीत के बाद, ताइवान में चीन-विरोधी भावना बढ़ने की संभावना है। लाई चिंग-ते ने ताइवान के लोगों से चीन के साथ संघर्ष के लिए तैयार रहने का आह्वान किया है।

अमेरिका से नजदीकी की वजह से खार खाता है जिनपिंग

लाई चिंग-ते की जीत से अमेरिकी खेमे में भी खुशी की लहर है। ताइवान को भले ही अमेरिका आधिकारिक रूप से अलग देश नहीं मानता, लेकिन ताइवान की संप्रभुता की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध है। वहीं, चीन ताइवान को अपना एक प्रांत मानता है और वह ताइवान को अपने नियंत्रण में लाने के लिए सैन्य कार्रवाई करने की धमकी देता है। लाई चिंग-ते की जीत से चीन की चिंता बढ़ने की संभावना है क्योंकि वह ताइवान को अपने नियंत्रण में लाने के प्रयासों को और अधिक कठिन बना सकती है।

लाई चिंग-ते की जीत से चीन-ताइवान संबंधों में तनाव बढ़ने की संभावना है। लाई चिंग-ते एक स्वतंत्रतावादी नेता हैं जिन्हें चीन द्वारा एक “उपद्रवी” के रूप में देखा जाता है। उनकी जीत से चीन की चिंता बढ़ने की संभावना है क्योंकि वह ताइवान को अपने नियंत्रण में लाने के प्रयासों को और अधिक कठिन बना सकती है।

BJP की कौसर जहाँ ने AAP से छीन ली दिल्ली हज कमेटी अध्यक्ष की कुर्सी

दिल्ली में आम आदमी पार्टी (AAP) को बड़ा झटका लगा है। दिल्ली हज कमेटी के अध्यक्ष पद पर भारतीय जनता पार्टी (BJP) का कब्जा हो गया है। दिल्ली सचिवालय में हुई वोटिंग में 5 में से 3 वोट प्राप्त कर कौसर जहाँ दिल्ली हज कमेटी की नई अध्यक्ष बन गई हैं। उनके निर्वाचन पर एक तरफ भाजपा में खुशी है तो दूसरी तरफ आम आदमी पार्टी ने सवाल उठाए हैं।

6 जनवरी, 2023 को ही दिल्ली के एलजी वीके सक्सेना ने हज कमेटी का गठन किया था। कमेटी में भाजपा के सांसद गौतम गंभीर, आम आदमी पार्टी के 2 विधायकों हाजी युनूस और अब्दुल रहमान के साथ कॉन्ग्रेस पार्षद नाजिया दानिश को शामिल किया गया था। उनके अलावा मुस्लिम धर्मगुरु मोहम्मद साद भी कमेटी के मेंबर हैं। वोटिंग में इन्हीं लोगों ने हिस्सा लिया था। रिपोर्टों के अनुसार कौसर को खुद के अलावा सासंद गौतम गंभीर और मोहम्मद साद ने वोट किया। इस तरह वोटिंग में शामिल 5 में से 3 सदस्यों का वोट पाकर वह विजयी रहीं। कॉन्ग्रेस पार्षद नाजिया दानिश वोटिंग से दूर रहीं।

स्टेट हज कमेटी का चेयरमैन बनने के बाद कौसर जहाँ ने खुशी जताते हुए कहा कि एलजी वीके सक्सेना की ओर से अध्यक्ष पद और समिति के गठन के लिए नियुक्ति की प्रक्रिया कराई गई। चुनाव के दौरान सभी नियमों का पूरा ख्याल रखा गया। कमेटी की नव निर्वाचित अध्यक्ष ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जमकर तारीफ की। कौसर ने कहा कि मोदी सरकार ने मुस्लिम समुदाय के अधिकारों की लड़ाई लड़ी है। तीन तलाक पर प्रतिबंध के बाद महिलाएँ सुरक्षित महसूस कर रही हैं। कौसर ने कहा है कि उनकी जिम्मेदारी हज के सफर पर जाने वालों की परेशानी कम करना है।

हज कमेटी अध्यक्ष पद खोने के बाद आम आदमी पार्टी ने एलजी पर निशाना साधा है। आप प्रवक्ता सौरभ भारद्वाज ने एलजी पर बेईमानी का आरोप लगाया है। उन्होंने कहा कि हज कमेटी के सदस्यों के नाम दिल्ली सरकार की ओर से भेजे जाते हैं, जो आम सहमति से अध्यक्ष का चुनाव करते हैं। लेकिन इस बार एलजी ने चालाकी से नाम बदलकर अपनी तरफ से छह सदस्य बना डाले।

बीजेपी दिल्ली के कार्यकारी प्रदेश अध्यक्ष वीरेंद्र सचदेवा ने ट्विटर पर कौसर जहाँ को हज कमेटी का अध्यक्ष चुने जाने पर बधाई दी। दिल्ली के इतिहास में ऐसा दूसरी बार हुआ है, जब इस पद के लिए कोई महिला अध्यक्ष चुनी गई हैं। कौसर से पहले कॉन्ग्रेस की ताजदार बाबर पहली महिला थीं, जिन्होंने दिल्ली हज कमेटी अध्यक्ष का पद सँभाला था।