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पश्चिम बंगाल : ममता कोरोना आंकड़ा क्यों छुपा रही है? क्यों पत्रकारों को धमकाया जा रहा है?

आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
एक समय था, जब पश्चिम बंगाल में कम्युनिस्ट का बोलबाला था। सरकार के विरुद्ध किसी में बोलने का साहस नहीं होता था, लेकिन जिस कम्युनिस्ट राज के विरुद्ध ममता बनर्जी ने राज संभाला, आज वह स्वयं वही कर रही हैं, जो कम्युनिस्ट राज में होता था।  
पश्चिम बंगाल में कानून का राज नहीं बल्कि ममता बनर्जी की मनमर्जी चलती है। जी हां, पश्चिम बंगाल में वही होता है जो ममता बनर्जी और उनकी सरकार चाहती है, वहां ममता की मर्जी के बिना पत्ता भी नहीं हिलता है। कोरोना संकट के दौरान ममता सरकार लगातार सवालों के घेरे में है। ममता सरकार पर लगातार आरोप लगते रहे हैं कि एक विशेष समुदाय के लोगों को बचाने के लिए ममता बनर्जी के निर्देश पर कोरोना पीड़ितों के वास्तविक आंकड़े जारी नहीं किए जा रहे हैं। वहां डॉक्टरों, विपक्षी दलों समेत समाज के कई वर्गों ने इसका अनुरोध किया है, लेकिन ममता है कि मानती ही नहीं।
अब कोरोना संक्रमण की सच्चाई बताने वाली खबरों को दिखाने और छापने वाले मीडिया संस्थानों और पत्रकारों से भी ममता बनर्जी नाराज हो गई हैं। गौरतलब है, 30 अप्रैल, 2020 को ममता बनर्जी ने पत्रकारों को ढंग से बर्ताव करने की सलाह देते हुए उन्हें चेतावनती दी थी। ममता बनर्जी ने कहा था कि अगर वे सही से बर्ताव नहीं करते, तो उन पर वे आपदा प्रबंधन अधिनियम के तहत केस कर सकती हैं। इसके अलावा उन्होंने यह भी आरोप लगाया था कि वे कोरोना वायरस के प्रकोप के दौरान पत्रकार भाजपा के लिए प्रचार कर रहे हैं।

ममता बनर्जी ने कहा था, “मेरा मीडिया से एक अनुरोध है। जब कोई घटना होती है, तो आप सरकार की प्रतिक्रिया लेने की जहमत नहीं उठाते। बल्कि भाजपा की सुनकर एक तरफा, नकारात्मक और विनाशकारी वायरस वाहक बन जाते हैं।” इसके बाद उन्होंने मीडिया को कहा, “वर्तमान में हम आपदा प्रबंधन अधिनियम के तहत, कार्रवाई शुरू कर सकते हैं। लेकिन हम नहीं कर रहे, क्योंकि बंगाल की संस्कृति है; हम मानवता में विश्वास करते हैं। सहिष्णुता हमारा धर्म है।”
ममता बनर्जी की मीडिया को इस धमकी के बाद पश्चिम बंगाल की सियासत गर्मा गई है। पश्चिम बंगाल के राज्यपाल ने कहा है कि मुख्यमंत्री विभिन्न माध्यमों से मीडिया को नियंत्रित करने और डराने धमकाने की कोशिश कर रही हैं। मीडिया को डर में क्यों रखा जाएगा? आखिर एक सरकार के पास छिपाने के लिए कुछ नहीं होना चाहिए। मीडिया लोकतंत्र का रीढ़ है। स्वतंत्र मीडिया आवश्यक तत्व है और इस तरह मीडिया कर्मियों को दबाव में रखना ठीक नहीं। उन्होंने अगले ट्वीट में लिखा, “चिंतित ममता बनर्जी ने मीडिया को ‘सही से बर्ताव’ करने की चेतावनी दी है। मीडिया को भय में क्यों रखना? छिपाने के लिए कुछ भी नहीं होना चाहिए।” गौरतलब है कि ममता बनर्जी सरकार पर कोरोना संक्रमण की हकीकत को छिपाने के आरोप लग रहे हैं। 
मोदी सरकार पर मीडिया को डराने का आरोप लगाने वाले ममता के इस रवैये पर क्यों खामोश हैं? क्या ममता इस विषय में चीन से प्रशिक्षण लेकर आयीं हैं? वुहान में फ़ैल रहे कोरोना को जिन पत्रकारों और डॉक्टरों ने उजागर किया, वहां की सरकार का उनके साथ हुआ व्यवहार किसी से छिपा नहीं। जिस कारण चीन कोरोना की वास्तविक स्थिति दुनिया के सामने नहीं आ पा रही, ठीक चीन की ही तर्ज पर ममता चल रही हैं। क्या बंगाल में कोरोना से पीड़ित होने वालों में जमात, बांग्लादेशी और रोहिंग्या की संख्या अधिक है? 
कुछ दिन पहले ही प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान ममता बनर्जी ने कुछ ऐसी बात कह दी थी, जिससे यह साबित हो गया था बंगाल में बड़ी तादात में कोरोना पीड़ित मरीज है, लेकिन ममता उनकी संख्या छिपा रही है। देखिए-
क्या बंगाल में हैं लाखों-लाख कोरोना मरीज? बंगाल की मुख्यमंत्री ममता ने माना!
कोरोना को परास्त करने के लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी हरसंभव प्रयास कर रहे हैं, वहीं कुछ राज्य सरकारें इस महामारी पर भी राजनीति करने से बाज नहीं आ रही हैं। आशंका जाहिर की जा रही है कि पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी कोरोना संक्रमित लोगों की संख्या को छिपा रही हैं। एजेंसी के एक ट्वीट से यह आशंका ज्यादा गहरी हो गई है कि पश्चिम बंगाल में कोरोना मरीजों की संख्या लाखों में हो सकती है।

समाचार एजेंसी एएनआई के अनुसार पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का कहना है कि हमने एक निर्णय लिया है, अगर किसी व्यक्ति को कोरोना पॉजिटिव पाया जाता है और उसके पास अपने निवास पर खुद को आइसोलेट करने की जगह है तो वह शख्स खुद को क्वारंटाइन कर सकता है। लाखों लाख लोगों को क्वारंटीन नहीं किया जा सकता है, सरकारी की अपनी सीमाएं हैं। 
हाल ही में कोरोना के हालात का जायजा लेने बंगाल पहुंची केंद्र की एक टीम ने पश्चिम बंगाल सरकार को पत्र लिख कर उत्तर बंगाल में लॉकडाउन का और सख्ती से अनुपालन सुनिश्चित करने को कहा था। मालूम हो कि पश्चिम बंगाल में मरीजों की कुल संख्या 649 पहुंच गई है, जबकि 105 लोग डिस्चार्ज किए जा चुके हैं। राज्य से कुल 20 कोरोना लोगों की कोरोना से अब तक मौत हुई है।


खुद को संविधान से ऊपर मानती हैं ममता बनर्जी!… कोरोना पर केंद्रीय टीम को इजाजत देने से किया इनकार
कोरोना से देश में1000 से अधिक लोगों की जान जा चुकी है और इस कोरोना संकट काल में भी पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी राजनीति से बाज नहीं आ रही है। ममता सरकार पर कोरोना से मरने वालों का आंकड़ा छिपाने और लॉकडाउन का सख्ती से पालन नहीं करने का आरोप लगने के बाद केंद्र सरकार ने राज्य में आईएमसीटी (इंटर मिनिस्ट्रीयल सेंट्रल टीम) भेजने का फैसला किया, लेकिन ममता बनर्जी ने केंद्रीय टीम को इजाजत देने से इनकार कर दिया। ममता ने साफ कहा है कि वह केंद्रीय टीम की इजाजत नहीं देंगी। हालांकि बाद में उन्होंने केंद्रीय टीम को इजाजत दे दी।

वंदे मातरम पर प्रतिबंध 
बंकिंम चंद्र चटर्जी ने वन्दे मातरम गीत लिखा तो उन्हें कभी यह अंदेशा नहीं रहा होगा कि उनके ही प्रदेश में इसपर पाबंदी लग जाएगी। लेकिन यह हमारा दावा है कि आप बंगाल के बहुतेरे इलाकों में वंदे मातरम गुनगुना भी देंगे तो आपका सिर धड़ से अलग कर दिया जाएगा। ये ममता का सेक्युरिज्म का मॉडल है जहां आप अपना राष्ट्र गीत तक नहीं गा सकते हैं।

शाही इमाम को क्यों दी मनमानी की छूट ?
कोलकाता की टीपू सुल्तान मस्जिद के शाही इमाम को कानून को ताक पर रखकर लाल बत्ती वाली गाड़ी में घूमने की इजाजत ममता बनर्जी ने दी थी। जब पत्रकारों ने इमाम से पूछा कि आप ऐसा क्यों कर रहे हैं, ये तो अब गैर-कानूनी है, तो उन्होंने जवाब दिया, ”ममता बनर्जी बोली आप जला के रखें, खूब जलाएं, आप घूमते रहें, हम हैं।” गौरतलब है कि मोदी सरकार ने एक मई, 2017 से लाल बत्ती की गाड़ियों पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगा दिया है। सिर्फ इमरजेंसी वाहनों को आवश्यकतानुसार लाल-नीली बत्ती के इस्तेमाल का अधिकार दिया गया है।

खुद को सर्वशक्तिमान मानती हैं ममता बनर्जी!
पश्चिम बंगाल की जनता ने वामपंथ के कुशासन से मुक्ति के लिए ममता बनर्जी को चुना था। मां, माटी और मानुष के नारे के बीच ममता बनर्जी को मुख्यमंत्री बनाने वाली राज्य की आज खुद को ठगा महसूस कर रही है। ममता बनर्जी की तानाशाही में तृणमूल कांग्रेस के कार्यकर्ता निरंकुश होते जा रहे हैं। मुख्यमंत्री जैसे संवैधानिक पद पर बैठी ममता बनर्जी वोट की खातिर अपने ही राज्य की जनता की दुश्मन बन गई हैं। ममता बनर्जी का सिर्फ एक ही मकसद है हर कदम पर केंद्र की मोदी सरकार का विरोध करना। ममता सरकार के लिए केंद्र सरकार के कानूनों और केंद्रीय योजनाओं का विरोध करना कोई नई बात नहीं है, इससे पहले भी वे कई बार ऐसा कर चुकी हैं। इसका खामियाजा राज्य की जनता को भुगतना पड़ रहा है। मोदी सरकार के विरोध के चक्कर में ममता खुद को संविधान से ऊपर मानने लगी है।

नागरिकता संशोधन कानून पश्चिम बंगाल में लागू करने से इनकार
हाल ही में मोदी सरकार ने संसद में नागरिकता संशोधन कानून बनाया है, जिसके तहत पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान के धार्मिक अल्पसंख्यकों को भारतीय नागरिकता देने का प्रावधान किया गया है। लेकिन सीएम ममता बनर्जी ने इसे मानन से इनकार कर दिया। ममता बनर्जी ने साफ कहा कि नागरिकता संशोधन कानून को वो पश्चिम बंगाल में कभी भी लागू नहीं करेंगी। उन्होंने कहा कि वो इस देश के किसी वैध नागरिक को बाहर नहीं फेंक सकती हैं और न ही उसे शरणार्थी बना सकते हैं। हाल मे ही उन्होंने एनआरसी के मुद्दे पर कहा था, ”बांग्लादेशी घुसपैठियों को देश से निकालने की कोई कोशिश होगी तो ‘गृह युद्ध’ हो जाएगा।”

CAG ऑडिट से इनकार
ममता बनर्जी सरकार ने पिछले साल राज्य की कानून-व्यवस्था संबंधित खर्च और अन्य चीजों का ऑडिट करने से कैग (CAG) को मना कर दिया था। हालांकि कैग ने इस पर कड़ा ऐतराज जताते हुए राज्य सचिवालय कहा था कि पश्चिम बंगाल सरकार संविधान के दायरे से बाहर नहीं हैं। कैग ने साफ किया कि पश्चिम बंगाल की ढाई हजार किलोमीटर अंतरराष्ट्रीय सीमा है। ऐसे में यहां कानून-व्यवस्था का पालन किस हिसाब से किया जा रहा है, इसकी जांच बेहद जरूरी है। जनसत्ता और दैनिक जागरण में छपी खबर के अनुसार पश्चिम बंगाल गृह विभाग की ओर से कहा गया कि राज्य की कानून-व्यवस्था में कैग को किसी हाल में नहीं घुसने दिया जाएगा। हालांकि कैग ने कहा कि देश के परमाणु कार्यक्रमों एवं सेना के जहाजों की खरीद-बिक्री संबंधी बड़े मामलों का भी ऑडिट करता है तो क्या पश्चिम बंगाल सरकार की कानून- व्यवस्था उससे भी ऊंची चीज है?

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आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल अपने झूठे वादों के लिए विख्यात है। कोरोना संक....
संविधान के तहत हर तरह की सरकारी संस्थाओं के खर्च का ऑडिट कैग कर सकता है। किसी भी तरह की ऐसी संस्था जिसे सरकारी तौर पर सहायता राशि दी जाती है, कैग के दायरे में आती है। कानून- व्यवस्था भले ही राज्य सरकार की जिम्मेदारी है, लेकिन यह पूरी तरह से राज्य सरकार की ही नहीं है। पुलिस के आधुनिकीकरण के लिए केंद्र सरकार धनराशि देती है। राज्य में आइपीएस अधिकारियों की तैनाती राष्ट्रपति के द्वारा होती है।

ताहिर हुसैन के निशाने पर पहले से थे IB के अंकित शर्मा, हत्या के वक्त बांग्लादेशी आतंकी भी थे मौजूद!

ताहिर हुसैन, अंकित शर्मा, दिल्ली दंगा
आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुए हिंदू विरोधी दंगे के दौरान आईबी के अंकित शर्मा की बेरहमी से हत्या कर दी गई थी। अंकित के शरीर के हर हिस्से पर चाकू मारे गए थे। पोस्टमार्टम रिपोर्ट बताती है कि उन्हें 400 से अधिक बार गोदा गया था। इस मामले में आप के निलंबित पार्षद ताहि​र हुसैन की भूमिका संदिग्ध है। चश्मदीदों के अनुसार ताहिर के गुंडे उन्हें घसीटकर उसके घर ले गए थे।
अब जो तथ्य उभरकर सामने आ रहे हैं उससे लगता है कि अंकित शर्मा पहले से ही ताहिर और उसके गुंडों के निशाने पर थे। उनकी हत्या के पीछे बांग्लादेशी आतंकियों के शामिल होने के संकेत मिल रहे हैं। सबसे पहले भाजपा सांसद सुब्रमण्यम स्वामी ने इस ओर इशारा किया था। अब एक मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक जब अंकित की हत्या की गई उस वक्त वहॉं बांग्लादेशी आतंकियों के लोकेशन मिले हैं।
प्राप्त जानकारी के अनुसार, ताहिर निरन्तर बांग्लादेश आतंकवादियों के संपर्क में था। दूसरे, यह कि अंकित भी ताहिर के बांग्लादेशियों के साथ संबंधों की जाँच कर रहे थे। 
अंकित शर्मा की हत्या की जाँच में जो अब तक जो तथ्य सामने निकल कर आ रहे हैं, वे गहरी साजिश की ओर इशारा कर रहे हैं। ऐसा लग रहा है कि यह महज दंगे में हुई मौत नहीं थी, बल्कि एक ‘टार्गेट कीलिंग’ थी। यानी अंकित को जानबूझकर निशाना बनाया गया था। फिलहाल पुलिस पूरे घटनाक्रम की कड़ी जोड़ रही है।
ToI की रिपोर्ट के मुताबिक अंकित 25 फरवरी को शाम 5 बजे के करीब ऑफिस से लौटे थे और अपने दोस्तों के साथ बाहर गए थे। उनके साथ उनका दोस्त कालू और कुछ और कुछ अन्य लोग भी थे, जो कि पुलिया के एक तरफ खड़े थे। तभी दूसरी तरफ से पथराव हुआ और अंकित सामने ही खड़े थे। प्रत्यक्षदर्शियों ने पुलिस को बताया कि अंकित को पत्थर लगी और वह फिसलकर गिर गए। इसके बाद दूसरी तरफ से तीन-चार लोग आए और उन्होंने अंकित को दबोच लिया। फिर उन्हें खींचते हुए दूसरी तरफ ले गए। वहाँ के लोगों का कहना था कि ‘हैरानी की बात है कि उन्होंने अंकित के अलावा किसी को टच नहीं किया।’
अंकित को किसी सुनसान जगह (शायद एक घर में) ले जाया गया, क्योंकि उसके बाद उन्हें किसी ने नहीं देखा। वहाँ उनके कपड़े उतार दिए गए और उनके साथ नृशंसता की गई। फिर उनका शव फिर नाले में फेंक दिया गया। उनका शव अगले दिन 26 फरवरी को नाले से मिला था। उनके शव पर सिर्फ अंडरगारमेंट थे।
घटनाक्रम, प्रथम दृष्टया मिली जानकारी, कुछ बयानों और डॉक्टरों की शुरुआत राय को देखते हुए लगता है कि अंकित की हत्या किसी मकसद से की गई थी। आईबी के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया, “घटनाक्रम संकेत देते हैं कि हत्यारे कुछ संदेश देना चाहते थे। हम जो देख रहे हैं यह उससे कहीं बड़ा है।” अंकित के शव पर चोटों की संख्या स्पष्ट नहीं है, वहीं पोस्टमॉर्टम करने वाले डॉक्टरों ने पुलिस को बताया कि उनके शरीर पर कम से कम चाकू से मारने के 54 गहरे घाव थे।
जाँचकर्ताओं ने कहा कि मामले की जाँच अब टार्गेट कीलिंग को ध्यान में रखकर भी की जा रही है। उन्होंने कहा, “सच्चाई यह है कि अंकित का अपहरण हुआ और दूर ले जाया गया। उन्हें घटनास्थल पर नहीं मारा गया जिसने संदेह पैदा किया है। जब घटनाक्रम सामने आया तभी इस बात को बल मिला है। शव जिस हालत में मिला है उससे प्रतिशोध स्पष्ट झलकता है। भीड़ द्वारा किसी व्यक्ति को इस तरह नहीं मारा जाता।”
यह पूछने पर कि क्या पुलिस को कोई सुराग मिला है, इस पर वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने बताया कि वे प्रत्यक्षदर्शियों की सहायता से अंकित को खींचकर ले जाने वाले शख्स की पहचान करने में जुटे हैं। उन्होंने कहा, “इलाके के टेक्निकल सर्विलांस के आधार पर सबूत का इंतजार किया जा रहा है। हम बांग्लादेशी आतंंकियों के ग्रुप को ट्रेस कर रहे हैं जिनका लोकेशन उस वक्त वहाँ पाया गया था।”
इससे पहले भाजपा सांसद सुब्रमण्यम स्वामी ने भी आशंका जताई थी कि ताहिर हुसैन के आतंकियों से रिश्ते हैं और इसकी जाँच के कारण ही अंकित शर्मा की हत्या की गई। उन्होंने 28 फरवरी को ट्वीट करते हुए कहा था, “सरकार को यह स्पष्ट करने की जरूरत है कि आईबी के अधिकारी अंकित शर्मा कहीं बांग्लादेशी आतंकियों के साथ ताहिर हुसैन के संबंधों के तार तो नहीं ढूँढ रहे थे और इसीलिए उनकी हत्या ताहिर के इशारे पर कर दी गई। अंकित की हत्या अगर बांग्लादेशी आतंकियों के साथ ताहिर के संबंधों पर नजर रखने के लिए हुई है तो यह बेहद गंभीर मामला है।”

पश्चिम बंगाल में रह रहे सभी बांग्लादेशी यहाँ के नागरिक, कागज़ दिखाने की ज़रूरत नहीं : ममता बनर्जी

ममता बनर्जी, बांग्लादेशपश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल में रह रहे बांग्लादेशियों को आश्वासन दिया है कि वो सभी भारतीय नागरिक हैं। उन्होंने मंगलवार (फरवरी 3, 2020) को कहा कि जो भी बांग्लादेशी पश्चिम बंगाल में रह रहे हैं और जिन्होंने भी चुनावों में मतदान किया है, वो सभी भारतीय नागरिक हैं और नागरिकता पाने के लिए उन्हें कागज़ दिखाने की कोई ज़रूरत नहीं है। मुख्यमंत्री ने केंद्र की मोदी सरकार पर भी निशाना साधा और कहा कि वो दिल्ली में हुए हिंसक दंगों को नियंत्रित करने में पूरी तरह विफल रही है।
सीएम ममता ने दावा किया कि वो अपने राज्य को दूसरी दिल्ली नहीं बनने देंगी। उन्होंने कहा कि जो भी बांग्लादेश से पश्चिम बंगाल में आए हैं, उन्हें फिर से नागरिकता हेतु आवेदन करने की आवश्यकता नहीं है, वो आटोमेटिक रूप से भारतीय नागरिक हैं। उन्होंने बांग्लादेश से आए लोगों से कहा कि आपलोग मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री चुनने के लिए मतदान करते हो, कोई कैसे कह सकता है कि आप भारतीय नागरिक नहीं हो? ममता बनर्जी ने उन लोगों को भाजपा पर विश्वास न करने की सलाह दी।
ममता बनर्जी ने कहा कि वो एक भी व्यक्ति को पश्चिम बंगाल से बाहर निकालने की कोशिश को सफल नहीं होने देंगी। उन्होंने कहा कि उनके राज्य में रह रहा किसी भी शरणार्थी को नागरिकता से वंचित नहीं किया जाएगा। टीएमसी की मुखिया ने कहा कि जो दिल्ली में हुए, उसे बंगाल में नहीं होने दिया जाएगा और वो बंगाल को दूसरी दिल्ली या उत्तर प्रदेश नहीं बनने देंगी।
ममता बनर्जी पर अक्सर मुस्लिम तुष्टिकरण के आरोप लगते रहते हैं। मुस्लिमों को रिझाने के लिए बंगाल की टीएमसी सरकार तरह-तरह की घोषणाएँ करती रहती है। ऐसे में, ममता बनर्जी का ये बयान केंद्र सरकार के सीएए और एनपीआर के ख़िलाफ़ विपक्षी विरोध के अनुरूप ही है। ममता बनर्जी अब खुल कर अपने राज्य में रह रहे बांग्लादेशियों के समर्थन में आ गई हैं।

NRC पर U टर्न: थरूर ने बांग्लादेशियों को कहा था ‘दीमक’, ममता ने सोमनाथ चटर्जी के मुँह पर फेंके थे कागज़

थरूर-ममता का U टर्न
आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
राजनीति में कौन नेता कब गिरगिट की तरह रंग बदल लें, कहना कठिन है। भारत में बांग्लादेशी समस्या 1971 से बनी हुई है, जिस पर समय-समय पर आने वाली सरकारों ने निपटने का निर्णय जरूर लिए, लेकिन तुष्टिकरण की जंजीरें उनके हाथ-पैर जकड लेती थीं। और अपनी कुर्सी की खातिर उनके राशन कार्ड, मतदान अधिकार, आधार कार्ड और कई सरकारी सुख-सुविधाओं से नवाजते रहे, लेकिन जनता को मूर्ख बनाने के लिए देश से बांग्लादेशी घुसपैठियों को निकालने की तूती बजाते रहे।  
आज मुसलमान वोट बैंक के लालच में बांग्लादेशी घुसपैठियों के चाचा-ताऊ बने विपक्ष के नेताओं का NRC मामले पर स्टैंड कितना खोखला है, यह सोशल मीडिया के ज़माने में खुल कर सामने आ रहा है। स्वराज्य के स्तम्भकार-सम्पादक और JNU के माइक्रोबायोलॉजी प्रोफेसर आनंद रंगनाथन ने सबकी पोल आज NRC जारी होने पर खोली है।
थरूर ने लिखा था "दीमक की तरह" भारत-रूपी लकड़ी में घुस जाते हैं"
 शशि थरूर ने 2012 में एक किताब लिखी थी ‘Pax Indica’। उसमें से उनके लिखे शब्दों को आनंद रंगनाथन उनके आज के ट्वीट के स्क्रीनशॉट के बराबर में रख कर शशि थरूर का दोहरापन दिखाते हैं। 2012 में बांग्लादेशी घुसपैठियों के बारे में शशि थरूर ने लिखा था, “2 करोड़ के करीब बांग्लादेशी भारत में चोरी से घुस आए हैं और भारत के ‘woodwork’ (भारत की लकड़ी के किसी ढाँचे से तुलना) में छिप गए हैं (जैसे दीमक लकड़ी में छिप जाती है)”। उस समय शशि थरूर की पार्टी सत्ता में थी और बांग्लादेशी घुसपैठियों को पहचान कर बाहर करना उनकी सरकार का ही काम था।


अब जब वे विपक्ष में हैं (जिसकी परिभाषा उनके हिसाब से सरकार के हर काम की अंधी बुराई करना है), तो वे टैगोर को बिना किसी संदर्भ का परिप्रेक्ष्य के उद्धृत करते हुए ट्वीट करते हैं, “राष्ट्रवाद और xenophobia (दूसरे देश के नागरिकों से उनकी नागरिकता के चलते नफरत) में बहुत महीन अंतर है। इसके अलावा विदेशी से नफरत बाद में खुद से अलग भारतीय से नफरत में भी तब्दील हो सकती है।”
"डर है किसी दिन कोई बांग्लादेशी असम का मुख्यमंत्री न बन जाए' : UPA के गृह मंत्री 
आनंद आगे वह समय भी याद कराते हैं जब जब यूपीए की सरकार थी और कॉन्ग्रेस खुद NRC का काम जल्दी-से-जल्दी पूरा करने पर ज़ोर दिया करती थी। उस समय केंद्रीय गृह मंत्री ने चिंता जताते हुए कहा था कि डर है किसी दिन कोई बांग्लादेशी असम का मुख्यमंत्री न बन जाए।
लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी पर ममता ने फेंके थे पेपर 
आज बांग्लादेशी घुसपैठियों की सबसे बड़ी पैरोकार ममता बनर्जी ने एक समय (अगस्त 4, 2005 में) बांग्लादेशी घुसपैठियों पर चर्चा कराने की माँग को लेकर तत्कालीन लोकसभा स्पीकर सोमनाथ चटर्जी पर कागज़ फेंके थे।