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किसान आंदोलन में चोरी हुआ सबा नकवी का आईफोन

                                                                सबा नकवी
दिल्ली की सीमाओं पर कृषि सुधार क़ानूनों का विरोध जारी है। ऐसा विरोध-प्रदर्शन जिसमें मुफ्त पिज्जा, मसाज, पार्लर, वाईफाई समेत विलासिता भरी तमाम सुविधाएँ उपलब्ध हैं। अब वहाँ चोरों ने भी घुसपैठ कर दी है। स्वघोषित ‘पत्रकार’ सबा नकवी ने जानकारी दी है कि सिंघु बॉर्डर पर उनका फोन चोरों ने चुरा लिया। उन्होंने अपने फोन का नाम “I phone 11 pro” बताया है। उन्होंने अपने ट्वीट में बताया कि चोरों ने उन्हें धक्का दिया, फोन छीना और गायब हो गए। 

Dear friends, my I phone 11 pro invaluable for my work got stolen today at Singhu border. Professional thieves. Pushed , grabbed and disappeared. So not available on phone tonight. will sort out.

— Saba Naqvi (@_sabanaqvi) December 31, 2020

हालाँकि नकवी ने ट्वीट यह बताने के लिए किया था कि इस घटना की वजह से वह फोन पर उपलब्ध नहीं रहेंगी। लेकिन ‘ट्रोल्स ’ ने इस बात को मौके की तरह देखा। इस घटना पर संवेदना जताने या फोन की अहम जानकारी रिकवर करने का तरीका बताने की बजाय ‘ट्रोल्स ’ ने पत्रकार और उनकी विचारधारा की ब्रांड का मज़ाक बनाना शुरू कर दिया। इस घटना से एक और बात साफ़ हुई कि सबा नकवी ‘ट्रोल्स ’ के बीच कितनी ‘मशहूर’ हैं।

मशहूर ट्विटर हैंडल BefittingFacts ने नकवी को याद दिलाते हुए कहा कि इस विचारधारा का ही तो वह समर्थन करती हैं, अमीरों से लिया और गरीबों को दिया। 

मौज लेते हुए ट्विटर की बाकी जनता ने भी कुछ ऐसी ही सूरत के विचार पेश किए।

 

कुछ ट्विटर यूज़र्स ने नकवी पर आरोप लगाया कि वह किसानों को चोर कह रही हैं, क्योंकि उनके हिसाब से तो वहाँ पर सिर्फ किसान प्रदर्शन कर रहे हैं।

 

कुछ ट्विटर यूज़र्स ने चोरी की इस घटना को हाल ही में हुई घटना से जोड़ दिया, जिसमें ‘प्रदर्शनकारियों’ ने जियो मोबाइल टावर से जेनरेटर उखाड़ कर पंजाब के स्थानीय गुरुद्वारे को दान कर दिया था। लोगों की कल्पना कि शायद इसी तरह आईफोन भी किसी गुरुद्वारे में दान कर दिया गया होगा।

 वहीं कुछ लोगों ने आरोप लगाया कि प्रदर्शनकारी ही असली चोर हैं।

 

कुछ ने तो सबा नकवी को कहा कि चोरी पर विलाप करने की ज़रूरत नहीं है और सुझाव दिया कि उन्हें इसको किसानों की पहल में योगदान समझना चाहिए।

 

कई लोग यहाँ तक कहने लगे कि ‘भाजपा की अगुवाई वाली अर्थव्यवस्था’ में पत्रकार लगभग लाख रुपए के महँगे फोन कैसे रख सकते हैं, जैसा कि लिबरल गैंग अक्सर आरोप लगाती रहती है।

 

आईफोन 11 प्रो सितंबर 2019 में भारत में लॉन्च हुआ था और इसकी शुरुआती कीमत 99,900 रुपए था। अब दाम में गिरावट आई है, जब एप्पल ने इस साल आईफोन 12 श्रृंखला के फोन लॉन्च किए। फिर भी बाज़ार में मौजूद तमाम फोन में सबसे महँगा आईफोन ही है। 

आतंकियों की लाश घर वालों को दफनाने के लिए भी नहीं, पर कैसी ‘ह्यूमन ट्रैजडी’?

आतंकियों, अंतिम संस्कार
आतंकी मूसा की 'अंतिम यात्रा' में हजारों लोग जुटे थे, 'नायक' बनाने की हुई थी कोशिश
मोदी सरकार ने आतंकियों की ‘अंतिम यात्रा’ के नाम पर उन्हें हीरो बनाने के चलन पर रोक तो पहले ही लगा दी थी, अब इसके अमल में आने के बाद से इसका प्रभाव भी दिखना शुरू हो गया है। आतंकियों के परिवार और जम्मू कश्मीर के कई लोगों का कहना है कि मारे गए आतंकियों का इस्लामी और स्थानीय रीति-रिवाजों के हिसाब से ‘अंतिम संस्कार’ किया जाना चाहिए। आतंकियों को ‘ठीक तरीके से दफन करने’ की माँग जोर पकड़ रही है।
‘डेक्कन क्रोनिकल’ की ख़बर के अनुसार, जम्मू कश्मीर मे आइएस विंग के आतंकी शकूर फारूकी के मारे जाने के बाद उसके पिता फारूक अहमद लंगू ने इसे ‘जुर्म और ज्यादती’ बताया है। आतंकी फारूकी को कश्मीर के जोनिमार मे सशस्त्र बलों के साथ हुए मुठभेड़ में मार गिराया गया था। अहमद नगर में एक मोटरसाइकल बम से हमला किया गया था, जिसमें फारूकी का हाथ था। इसमें बीएसएफ के दो जवान वीरगति को प्राप्त हो गए थे।
जून 21 को हुई मुठभेड़ मे बीएसएफ जवानों से लूटे गए राइफल को भी बरामद किया गया। अहमद फारूक का कहना है कि पुलिस ने शाम 5 बजे उसके बेटे की बॉडी देने कि बात कही थी लेकिन ऐसा नहीं हुआ। उसका चाचा मुहम्मद मकबूल भी पुलिसकर्मियों के ‘व्यवहार’ से नाराज है। उसने कहा कि परिवार को उसकी ‘जिम्मेदारी’ निभाने देना चाहिए क्योंकि उनके ‘बच्चे’ को कैसे दफनाया जा रहा है, ये देखना उनका हक है।
सबसे मजाकिया बात ये है कि आतंकी का चाचा इसे ‘ह्यूमन ट्रैजडी’ भी करार देता है। आतंकी को उसका परिवार उसके घर के पास वाले कब्रगाह मे दफनाना चाह रहा था। डीजीपी दिलबाग सिंह कहते हैं कि शकूर को तो आत्मसमर्पण करने का मौका भी दिया गया था। लेकिन वो नहीं माना। इस साल अब तक 135 आतंकियों का सफाया किया जा चुका है। डीजीपी ने कहा कि अब ग्राउन्ड पर शांति बनाए रखने की कोशिशें करते हुए आतंकियों का सफाया हो रहा है।
साथ ही आतंकियों के शवों को उनके परिवार को सौंपने के बजाए चुपचाप दफनाया जा रहा है ताकि उन्हें ‘नायक’ बना कर पेश करने और ‘अंतिम यात्रा’ मे हजारों के जुटान को रोका जा सके। जम्मू कश्मीर में आतंकियों के हावी होने के बाद पिछले 31 सालों में यह पहला मौका है, जब इस तरह कि रणनीति अपनाई जा रही है। अप्रैल में बारामुला में एक आतंकी को दफन किए जाने समय हजारों लोग जमा हो गए थे।
कम से कम कोरोना वायरस आपदा के समय तक तो परिवारों को शव नहीं ही सौंपे जाएँगे क्यों भीड़ जुटने से लोगों की जान को खतरा हो सकता है। जम्मू कश्मीर में कथित मानवाधिकार कार्यकर्ता भी इसका रोना रो रहे हैं। वो जेनेवा कन्वेन्शन की दुहाई देकर सरकार का विरोध कर रहे हैं। यहाँ तक कि जम्मू कश्मीर यूनिवर्सिटी के एक पूर्व प्रोफेसर ने कहा कि आपदा का पुलिस गलत फायदा उठा रही है।

लिबरलों द्वारा गणित का शिक्षक बताए जाने वाले रियाज नायकू के मारे जाने के बाद सेना ने केवल ये कहा था कि दो आतंकवादी मारे गए हैं। सेना के अधिकारियों ने बताया था कि उनकी नजर में कोई बड़ा आतंकवादी या टॉप कमांडर नहीं होता हैं, सारे आतंकवादी केवल एक आतंकी की श्रेणी में आते हैं। यहाँ तक कि सेना के किसी भी ट्वीट में रियाज नायकू के नाम का कोई जिक्र नहीं किया गया था। ये सेना की बदली हुई नई रणनीति थी, जिसकी शुरुआत लॉकडाउन के दौरान ही की गई थी। 
जून 30, 2020 को सेना ने बताया था कि 2 आतंकी मार गिराए गए हैं। ये वही थे, जिन्होंने अनंतनाग के बिजबेहड़ा में  जून 26, 2020 को सीआरपीएफ की पार्टी पर हमला किया था। उस अटैक में सीआरपीएफ का एक जवान वीरगति को प्राप्त हो गए और 5 साल के बच्चे की मौत हो गई थी। इससे पहले सोमवार (जून 29, 2020) को आर्मी और पुलिस ने जॉइंट ऑपरेशन में अनंतनाग जिले के खुलचोहर इलाके में 3 आतंकियों को ढेर कर डोडा जिले को आतंकवाद मुक्त घोषित कर दिया था।

जनता कर्फ्यू: थाली और ताली में उलझी लिबरल गैंग की औरतें

आरफा खानम, इरेना अकबर, स्वाति चतुर्वेदी और सबा नकवी
सिर्फ थाली और ताली ही तलाश पाईं स्वघोषित महिला पत्रकार
आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
कोरोना वायरस को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मार्च 19 को राष्ट्र को संबोधित किया। संक्रमण का प्रसार करने के लिए लोगों से संकल्प और संयम की अपील की। अफवाहों से बचने और सतर्कता बरतने सहित तमाम बातें की। इसके आर्थिक प्रभाव की चर्चा करते हुए बताया कि इससे निपटने के लिए टास्क फोर्स का गठन किया गया है।
उन्होंने जनता से 9 आग्रह किए। रविवार को जनता कर्फ्यू की अपील की। साथ ही कहा कि 22 मार्च के दिन सभी लोग अपने घर की बालकनी में आएँ और इस महामारी से निपटने में जुटे लोगों की सेवा के प्रति आभार जताने के लिए 5 मिनट तक करतल ध्वनि बजाएँ।
प्रधानमंत्री की इस पहल की ज्यादातर तबकों में सराहना हुई। लेकिन, लिबरल गैंग को यह नहीं सुहाया। शेहला रशीद जैसे कुछ नामों को छोड़ दे तो गैंग की ज्यादातर औरतें थाली और ताली के अलावा प्रधानमंत्री के संबोधन में कुछ तलाश नहीं पाईं। इस सूची में सबसे पहला नाम है प्रोपेगेंडा पोर्टल द वायर की आरफा खान्नम शेरवानी का। अपनी कुँठा व्यक्त करते हुए उसने ट्वीट किया है, “जनता curfew, ताली और थाली… सब कुछ जनता ही करेगी, तो आप क्या करेंगे सरकार? 30 मिनट के भाषण में 3 चीज़ें बताइये जो सरकार करेगी?”
पत्रकार रोहिणी सिंह भी भार प्रकट करने के तरीके को भी संशय के घेरे में रखकर पेश करती हैं और लिखती हैं- “भारत में वैश्विक महामारी से लड़ाई ताली और थाली बजा-बजाकर लड़ी जाएगी।”
सबा नकवी ने लिखा है, “ये दिलचस्प है कि निजी क्षेत्र के डॉक्टर प्रधानमंत्री का गुणगान करते हैं, जबकि सरकारी क्षेत्र के डॉक्टर अभी भी बुनियादी किट और मास्क माँग रहे हैं।”
पत्रकार सागरिका घोष भी नरेंद्र मोदी के इस आग्रह पर सवाल उठाती हैं। वे पहले तो तो नरेंद्र मोदी के ‘जनता कर्फ्यू’ विचार की तारीफ करती हैं। मगर, इसके बाद अपना रवैया बरकरार रखते हुए कहती हैं कि एक दूसरे से दूर रहने की बात ठीक है, लेकिन वे कुछ ठोस सुनने की इच्छुक थी। सागरिका सवाल करती हैं कि जो प्रधानमंत्री ने कहा वो सब तो ठीक है, लेकिन सरकार क्वारेंटाइन सुविधाएँ उपलब्ध कराने के लिए क्या कर रही है, इसके बारे में नरेंद्र मोदी ने कोई बात क्यों नहीं की।
इंडियन एक्सप्रेस की पूर्व पत्रकार और दलितों से घृणा करने वाली इरेना अकबर स्वास्थ्यकर्मियों को सराहने के लिए उठाए जाने वाले इस कदम का मजाक उड़ाने के लिए लिखती हैं कि रविवार को 5 बजे वो अपनी बॉलकनी में खड़े होकर भक्तों की शिनाख्त करेंगे। उनके हिसाब से जो कोई भी प्रधानमंत्री की बात मानकर अपनी बॉलकनी में खड़े होकर ताली या थाली बजाएगा वो सिर्फ उनका भक्त होगा।


इरेना कहती है कि प्रधानमंत्री सिर्फ़ अपील नहीं करते बल्कि आश्वस्त करते हैं कि वो इस विपदा में उनका ध्यान रखेंगे। लेकिन मोदी ने सिर्फ़ अपील की, क्योंकि वे जानते हैं कि वे बेवकूफों के राष्ट्र को संबोधित कर रहे हैं।
एक पत्रकार और शीरीन नाम की महिला जिन्हें इरेना अकबर भी रीट्वीट करती हैं। वे थाली बजाकर आभार देने की बात का मजाक उड़ाते हुए कहती हैं कि इटली में हो रहा बॉलकनी टाइम पास भारत के लिए राष्ट्रीय आपदा से लड़ने की नीति है।
स्वघोषित पत्रकार स्वाति चतुर्वेदी भी इस पर अपनी राय देने नहीं चूकतीं। वे सागरिका घोष की तरह तालमेल बिठाते हुए कहती है कि वे नरेंद्र मोदी के इस भाषण को उनके सबसे अच्छे भाषणों में रेट करती हैं। केवल थाली बजाने वाली बात को छोड़कर। बता दें, स्वाति चतुर्वेदी इस पहल पर हैरानी जताती हैं और कहती है कि उन्हें ये फिजूल लग रहा है।
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जनता-कर्फ्यू का विरोध करते राजदीप सरदेसाई आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार NDTV लगता है घोर मोदी विरोधी है। जिसका प्रधान....

दिल्ली दंगे : भाजपा सांसद तेजस्वी सूर्या ने उड़ाई कांग्रेसियों और नकली लिबरलों की धज्जियां

आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
संसद में मार्च 11 को दिल्ली में हुए दंगों को लेकर काफी तीखी बहस हुई, जहां सांसद तेजस्वी सूर्या ने दिल्ली दंगों के लिए भाजपा को घेरने वाली कांग्रेस के साथ-साथ पूरे विपक्ष को जमकर धोया। इससे पहले भाजपा सांसद मीनाक्षी लेखी ने कांग्रेस को उसकी खोखली बातों के लिए लताड़ भी लगाई।
संसद में दिल्ली दंगों पर हुई बहस में कई छुपे हुए तथ्यों को उजागर किया गया, जिन्हें लिबरल ब्रिगेड छुपाने का प्रयास कर रहा था। सांसद तेजस्वी सूर्या ने अपनी बात कहते हुए कई तथ्य उजागर किए कि कैसे धर्म के नाम पर महिलाओं को इस्लामिक कट्टरपंथियों ने अपना सुरक्षा कवच बनाया।

सीएए मुस्लिम विरोधी नहीं पर प्रदर्शन हिन्दू विरोधी थे
दिल्ली दंगों पर बहस के दौरान संसद में विपक्ष ने कपिल मिश्रा के बयान का मुद्दा उठाकर सरकार को दिल्ली दंगों का दोषी बताने का प्रयास किया। जिस पर तेजस्वी सूर्या ने पलटवार करते हुए कहा कि पिछले दो महीनों में कई कट्टरपंथी नारों ‘जिन्ना वाली आज़ादी’, ‘हिंदुओं से आज़ादी’, ‘काफ़िरों से आज़ादी’ जैसे नारों की गूंज सुनाई दी है। उन्होंने साफ-साफ कहा कि ‘सीएए मुस्लिम विरोधी तो नहीं है, पर ये प्रदर्शन निस्संदेह हिन्दू विरोधी थे।’ 
ज्ञात हो, कांग्रेस के वरिष्ठ नेता नेता ने भी विरोध प्रदर्शनों और धरनों में अलगावादी नारों के लगाए जाने पर आपत्ति जताई थी। लेकिन नगाड़े की आवाज़ के आगे तूती की किसी ने नहीं सुनी। क्योकि यह सब षड़यंत्र हिन्दू विरोधियों द्वारा रचा गया था। मुस्लिम क्षेत्रों में छोटे-छोटे बच्चे तक कहते फिरते हैं, "मोदी को मारो", "मैं मोदी को मारूंगा" आदि। फिर शांतिपूर्ण प्रदर्शन के नाम पर पत्थरबाज़ी, दर्शाता है कि आयोजकों की मंशा नागरिकता संशोधक कानून का विरोध नहीं बल्कि देश में अराजकता पैदा करना है।  
तेजस्वी ने अपनी बात को विस्तार में रखते हुए प्रदर्शन के दौरान ‘तेरा मेरा रिश्ता क्या? ला इलाह इल्लाल्लाह’ जैसे नारों का भी हवाला दिया। उन्होंने कहा कि इन सांप्रदायिक लोगों को मासूम बताने में विपक्ष और कई बुद्धिजीवी कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं।
राष्ट्रद्रोहियों को बताया गया ‘शीरोज़’
तेजस्वी ने अपनी बात रखते हुए बताया कि सीएए विरोध के नाम पर लोगों में तरह-तरह से अफवाहें फैलाई गईं। उन्होंने कहा कि ये वही लोग हैं, जिनके लिए भारत तेरे टुकड़े होंगे के नारे लगाने वाले पुलिस बर्बरता से पीड़ित हैं और कई बुद्धिजीवी तो इन राष्ट्रद्रोहियों को ‘शीरोज़’ तक बुलाने लगे।
तेजस्वी ने कांग्रेस का भांडा फोड़ते हुए नके पूर्ववर्ती सरकारों के अंतर्गत हुए दंगों और सांप्रदायिक हिंसा की कई घटनाओं पर भी रोशनी डाली। उन्होंने कहा कि पिछले कुछ वर्षों में मैंने देखा है और समझा है कि कैसे कांग्रेस riot engineering में विशेषज्ञ बन चुकी है। सीएए जब संवैधानिक रूप से पारित हुआ तो कांग्रेस पार्टी की अध्यक्ष सोनिया गांधी ने भीड़ को संबोधित कर कहा कि ये आर-पार की लड़ाई है और आप सभी लोग इसके खिलाफ लड़ें। इसके अगले ही दिन शाहीन बाग में प्रदर्शन शुरू हो जाते हैं। जेएनयू से लेकर जामिया तक हिंसक प्रदर्शन शुरू हो गए और इनमें जो नारे सुने गए वो तो बेहद शर्मनाक थे।
भारत की छवी खराब करने के लिए पत्रकार को मिला था ऑफर
तेजस्वी सूर्या ने ये भी बताया कि कैसे इन सीएए विरोधी प्रदर्शनों का एक ही उद्देश्य था – भारत की छवि को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बिगाड़ना। उन्होंने अपनी बात को साफ करने के लिए उमर खालिद के भाषण का उदाहरण भी दिया। इसके साथ ही तेजस्वी ने पत्रकार जे गोपीकृष्णन के आरोप का भी हवाला दिया, जिसमें उन्होंने बताया कि कैसे भारत की छवि खराब करने वाला लेख लिखने के लिए जे गोपीकृष्णन को 1500 डॉलर का ऑफर मिला था।
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गृह मंत्री अमित शाह ने बृहस्पतिवार(मार्च 12) को राज्यसभा में कहा कि उनकी ऐसी कोई मंशा नहीं थी कि दिल्ली दंगों में चर्....
सांसद तेजस्वी सूर्या ने संसद में उन सभी बातों को स्पष्टता से रखा, जिन्हें खास मीडिया वर्ग और दिल्ली के लुटियंस हमेशा से छुपाने में लगे हैं। इसके साथ ही तेजस्वी ने संसद में अवसरवादियों और विपक्ष को जमकर खरी-खरी सुनाई। कुल मिलाकर तेजस्वी ने अपने तथ्यों से विरोधियों को निरुत्तर कर दिया।

हिन्दूफोबिया एक सच्चाई है, मैंने भी इसे झेला है: अमेरिका की पहली हिन्दू सांसद तुलसी गबार्ड

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आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
अंतरराष्ट्रीय मीडिया, वामपंथी गिरोह और कट्टरपंथी मिलकर हिन्दुओं के ख़िलाफ़ घृणा फैलाने का काम धड़ल्ले से कर रहे हैं। नतीजा ये है कि आज विश्व के सबसे शक्तिशाली देश और सबसे बड़े लोकतंत्र में भी हिंदू खुद को असुरक्षित महसूस करते हैं। हिन्दुओं की लाचारी, उनकी बेबसी और उनके प्रति नफरत फ़ैलाने के बात को अमेरिकी राजनेता तुलसी गबार्ड भी मानती है। तुलसी अमेरिका की पहली हिन्दू सांसद हैं। वे उन तीन दावेदारों में भी शामिल हैं जिनमें से डेमोक्रेटिक पार्टी की तरफ से राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार चुना जाना है। बकौल तुलसी, हिन्दूफोबिया एक सच्चाई है। उन्होंने भी इसे कई बार झेला है। यहॉं तक कि कांग्रेस चुनाव और राष्ट्रपति उम्मीदवारी के अपने अभियान के दौरान भी।
तुलसी गबार्ड ने डॉ. शीनी अम्ब्राडर (वही डॉ. जिन्होंने हिन्दू महिला के साथ उबर ड्राइवर की बदसलूकी का वाकया साझा किया था) का पोस्ट शेयर करते हुए ट्ववीट किया है, "बदकिस्तमती से हिन्दफोबिआ एक सच है। मैंने कांग्रेस और राष्ट्रपति उम्मीदवारी के अपने अभियान के दौरान हर बार इसे प्रत्यक्ष तौर पर महसूस किया है। ये तो सिर्फ़ एक उदाहरण है कि हमारे देश में हिन्दुओं को क्या झेलना पड़ता है। दुखद तो ये है कि इसके बावजूद हमारे नेता और मीडिया इसे न केवल बर्दाश्त करते हैं, बल्कि इसे और भड़काते हैं।"

तुलसी गबार्ड के इस ट्वीट से पहले बुधवार(मार्च 4, 2020) को यूएस की एक साइकेट्रिस्ट एवं साइकोथेरेपिस्ट शीनी अंब्राडर ने एक हिन्दू महिला का अनुभव ट्विटर पर शेयर किया था। डॉ. शीनी ने अपने पोस्ट में पीड़िता का नाम नहीं बताया था। पीड़िता का जो फेसबुक पोस्ट डॉ. शीनी ने शेयर किया था, उसमें वह एक उबर ड्राइवर की बदसलूकी के बारे में बताती नजर आईं, जिसे उन्हें हिन्दू होने और हिन्दुओं का बचाव करने के कारण झेलना पड़ा। पोस्ट में महिला ने बताया था कि आखिर किस तरह अंतरराष्ट्रीय मीडिया की गलत कवरेज के कारण दिल्ली में हुए दंगों को लोग मुस्लिमों के ख़िलाफ़ मान रहे हैं और न केवल हिन्दुओं को विलेन समझ रहे हैं, बल्कि उनके प्रति आक्रमक भी हो रहे हैं।
महिला के मुताबिक, जब उसने उबर बुक की तो ड्राइवर ने पहले सुनिश्चित किया कि वे भारतीय हैं। इसके बाद उसने दिल्ली में हिन्दू विरोधी दंगों के बारे में बात करनी शुरू की। वह इस बात पर जोर देकर बताने लगा कि भारत में मुस्लिमों को हिन्दू मार रहे हैं। हिन्दू मस्जिदों को तोड़ रहे हैं।
महिला ने अपनी साथ हुई इस घटना के लिए सीधे तौर पर एकतरफा पत्रकारिता को जिम्मेदार ठहराया था। उन्होंने इस घटना को बिंदु में रखते हुए पोस्ट लिखा था और आरोप लगाया था कि दिल्ली दंगों पर अंतरराष्ट्रीय मीडिया की एकतरफा पत्रकारिता से विदेशों में हिन्दूफोबिया बढ़ रहा है और लोग हिन्दुओं के ख़िलाफ़ गलत धारणा बना रहे हैं।
UBER ड्राइवर ने की महिला के साथ बदसलूकी
                                                                                                   प्रतीकात्मक 
दिल्ली में मुस्लिमों को मार रहे हैं, मस्जिदों को तोड़ रहे हैं: उबर ड्राइवर ने ​हिन्दू महिला को किया प्रताड़ित
अंतरराष्ट्रीय मीडिया में हिन्दुओं के ख़िलाफ़ परोसी जा रही नफरत अब बड़े स्तर पर अपना असर दिखाने लगी है। सोशल मीडिया पर लोग खुलकर अपने ऐसे अनुभव साझा कर रहे हैं जब उन्हें अपने हिन्दू होने के नाते या हिन्दुओं को डिफेंड करने के नाते कट्टरपंथी सोच का शिकार होना पड़ा। मार्च 4 को ऐसा ही कड़वा अनुभव यूएस की एक साइकेट्रिस्ट एवं साइकोथेरेपिस्ट शीनी अंब्राडर ने शेयर किया। हालाँकि डॉ. शीनी का ये निजी अनुभव नहीं है। उन्होंने एक हिन्दू महिला के साथ हुई घटना को शेयर किया है।
डॉ. शीनी ने अपने पोस्ट में पीड़िता का नाम नहीं बताया। लेकिन शीनी के पोस्ट से ये बात मालूम होती है कि पीड़िता हिन्दू है। पीड़िता का फेसबुक पोस्ट, जिसे डॉ. शीनी ने शेयर किया, उसमें वह एक उबर ड्राइवर की बदसलूकी के बारे में बताती नजर आईं, जिसे उन्हें हिन्दू होने और हिन्दुओं का बचाव करने के कारण झेलना पड़ा।
महिला बताती है कि जब उसने उबर बुक की तो ड्राइवर ने पहले सुनिश्चित किया कि वे भारतीय हैं। इसके बाद उसने दिल्ली में हिन्दू विरोधी दंगों के बारे में बात करनी शुरू की। वह इस बात पर जोर देकर बताने लगा कि भारत में मुस्लिमों को हिन्दू मार रहे हैं। हिन्दू मस्जिदों को तोड़ रहे हैं।
पीड़िता के मुताबिक, इतना सब सुनने के बाद उसने ड्राइवर को समझाने की पूरी कोशिश की दिल्ली दंगों के बारे में उनकी सोच सही नहीं है। क्योंकि इन दंगों में दो समुदाय के लोगों का नुकसान हुआ, दोनों तरफ के लोग घायल हुए और दोनों को मारा गया। मगर, ड्राइवर ये सब सुनने के बाद महिला से नाराज हो गया। वह महिला की बात सुनकर चुप होने की बजाय उसपर गुस्सा निकालने लगा और थोड़ी देर में उसने महिला को और महिला की बहन को अपनी कैब से उतरने को बोल दिया।
ड्राइवर का ऐसा रवैया देखकर महिला ने फौरन पुलिस को बुलाया जिसके बाद वह शांत हुआ। मगर पीड़िता ने इस घटना को महसूस करने के बाद इसके पीछे अतंरराष्ट्रीय मीडिया की एकतरफा पत्रकारिता को जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने इस घटना को बिंदु में रखते हुए पोस्ट लिखा और आरोप लगाया कि दिल्ली दंगों पर अंतरराष्ट्रीय मीडिया की एकतरफा पत्रकारिता से विदेशों में हिन्दूफोबिया बढ़ रहा है। लोग हिन्दुओं के ख़िलाफ़ गलत धारणा बना रहे हैं।
दिल्ली में बीते दिनों हमने सीएए के ख़िलाफ़ विरोध-प्रदर्शन के नाम पर हिन्दू विरोधी हिंसा देखी। मगर, वामपंथी मीडिया और अंतरराष्ट्रीय मीडिया ने इसमें भी हिन्दुओं को दोषी बता दिया। इस बीच मुस्लिम भीड़ सड़कों पर अल्लाह हू अकबर और नारा ए तकबीर कहती आगजनी, पत्थरबाजी को अंजाम देती रही। लेकिन इस मीडिया का ध्यान जय श्री राम के नारों पर आ टिका और देखते ही देखते यहाँ हर मुमकिन प्रयास और उदहारणों के जरिए हिंसक भीड़ की बर्बरता को हिन्दुओं का नाम लेकर समझाने की कोशिश हुई। नतीजतन उबर ड्राइवर जैसे लोग तैयार हुए, जिन्होंने हिन्दुओं को पीड़ित श्रेणी में सुनकर उन पर संवेदना जताने की बजाय अपना गुस्सा जाहिर किया और उनका पक्ष लेने वाली महिला को कैब से बाहर का रास्ता दिखा दिया।