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‘राहुल गाँधी पागल, इटली को अपनी मातृभूमि मानते हैं’ – विश्वेन्द्र सिंह, कांग्रेस मंत्री के बेटे ने किया टारगेट

सचिन पायलट के करीबी हैं अनिरुद्ध (फोटो साभार: अनिरुद्ध की फेसबुक वॉल)
राजस्थान सरकार में मंत्री विश्वेन्द्र सिंह के बेटे अनिरुद्ध सिंह राहुल गाँधी पर हमलावर हैं। विदेशी धरती से भारत का अपमान करने का आरोप लगाते हुए अनिरुद्ध सिंह ने एक के बाद एक ट्वीट कर पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष को निशाने पर लिया। उन्होंने कहा कि राहुल गाँधी शायद इटली को ही अपनी मातृभूमि मानते हैं। पिछले दिनों राहुल गाँधी ने ब्रिटिश पार्लियामेंट में बोलते हुए यह आरोप लगाया था कि भारत की संसद में कांग्रेसी नेताओं की ओर से बोलने पर माइक बंद कर दिया जाता है।

7 मार्च, 2023 को टाइम्स नाउ की एक खबर को कोट करते हुए अनिरुद्ध ने लिखा, “राहुल गाँधी पागल हो गए हैं। वो दूसरे देश की संसद में भारत का अपमान कर रहे हैं। या फिर वो (राहुल गाँधी) इटली को अपनी मातृभूमि मानते हैं।” इसी पोस्ट पर अन्य ट्विटर यूजर्स के कमेंट का जवाब देते हुए अनिरुद्ध का राहुल गाँधी पर हमला जारी रहता है। एक यूजर के कमेंट पर अनिरुद्ध लिखते हैं कि इटली के माफिया भारत की जमीनें हड़प रहे हैं।

कांग्रेस पार्टी के ऑफिशियल हैंडल से राहुल गाँधी की एक तस्वीर शेयर की गई थी। इस तस्वीर पर कटाक्ष करते हुए अनिरुद्ध ने लिखा – “हाँ, राहुल मानते हैं कि वे एक इटालियन हैं।”

लंदन में आयोजित एक अन्य कार्यक्रम में राहुल गाँधी ने कहा था कि बीजेपी हमेशा सत्ता में नहीं रहने वाली। इस पर प्रतिक्रिया देते हुए अनिरुद्ध ने लिखा कि क्या यह सब बकवास भारत में नहीं किया जा सकता था या राहुल गाँधी अनुवांशिक रूप से यूरोपीय मिट्टी को पसंद करते हैं?

अनिरुद्ध सिंह, कांग्रेस और विवाद

यह पहली बार नहीं है जब कांग्रेस नेता और मंत्री विश्वेन्द्र सिंह के बेटे अनिरुद्ध सिंह के ट्वीट से विवाद खड़ा हो गया हो और कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने इसकी आलोचना की हो। इसके पहले भी अनिरुद्ध के ट्वीट ने भरतपुर इलाके में बड़ा विवाद खड़ा किया था। अनिरुद्ध ने दिसंबर 2022 में ब्रिटिश शासन की 1935 में प्रकाशित किताब ‘द इंडियन स्टेट्स’ का उल्लेख करते हुए लिखा था कि भरतपुर रियासत के सिनसिनवार जाट जादौन राजपूतों के वंशज हैं।
अनिरुद्ध सिंह की इस बात को लेकर बहुत हंगामा हुआ। जाट महासभा की बैठक में इस बात को खारिज कर दिया गया था। जाट महासभा ने सिनसिनवार जाटों को श्री कृष्ण का वंशज बताते हुए यदुवंशी जाट क्षत्रिय करार दिया था।
अनिरुद्ध और उनके पिता विश्वेन्द्र सिंह के संबंध भी अच्छे नहीं हैं। मई 2021 में अनिरुद्ध ने अपने पिता पर शराब का सेवन करने और माता के प्रति हिंसक होने का आरोप लगाया था। इस दौरान उन्होंने दावा किया था कि 6 हफ्तों से वे अपने पिता के संपर्क में नहीं हैं। अनिरुद्ध ने खुद को मदद करने वाले अपने दोस्तों के कारोबार को नष्ट करने का आरोप भी अपने पिता पर लगाया था। अनिरुद्ध खुद को सचिन पायलट का समर्थक मानते हैं।

राजस्थान : पायलट द्वारा आर-पार की लड़ाई के लिए कांग्रेस शीर्ष नेतृत्व जिम्मेदार

जैसे-जैसे चुनाव निकट आ रहे हैं, सचिन पायलट और अशोक गहलोत के बीच लड़ाई उतनी ही तेज हो रही है और इस लड़ाई की जिम्मेदार सिर्फ और सिर्फ कांग्रेस ही है, क्योकि पिछले चुनाव में भाजपा को सत्ता को हटाने में जितनी मेहनत सचिन ने की थी, कांग्रेस ने नहीं। लेकिन मुख्यमंत्री सचिन की बजाए बना दिया अशोक गहलोत को,  क्यों? अगर सचिन को मुख्यमंत्री बना दिया होता, इस आने वाले चुनाव में भाजपा को कड़ी मेहनत करनी पड़ती, लेकिन सचिन की बजाए अशोक गहलोत को मुख्यमंत्री बनाते ही 5 साल पहले ही कांग्रेस ने भाजपा की ओर सत्ता खिसका दी थी। 
राजस्थान में सचिन पायलट बनाम अशोक गहलोत का मामला ठंडा पड़ता नजर नहीं आ रहा है। इसी साल के आखिरी में होने वाले राजस्थान विधानसभा चुनाव को लेकर सियासत अभी से तेज हो गई है। पूर्व डिप्टी सीएम सचिन पायलट ने गहलोत खेमे की बगावत पर अब तक कार्रवाई न होने को लेकर नाराजगी जताई है। पायलट ने विधायक दल की बैठक में शामिल नहीं होने वाले सीएम अशोक गहलोत समर्थक विधायकों के खिलाफ कार्रवाई की मांग उठा दी है। उन्होंने सीधे-सीधे आरोप जड़ा है कि हाईकमान दोषी नेताओं के खिलाफ कार्रवाई करने में अत्यधिक देरी कर रहा है। पार्टी को जल्द फैसला करना ही होगा। दूसरी ओर बीजेपी ने भी विधानसभा में सीएम गहलोत को घेरते हुए उन्हें घोषणाजीवी की संज्ञा दी है। बीजेपी ने कहा है कि गहलोत ने बजट में कभी पूरी न होने वाली घोषणाएं की हैं।

गहलोत वर्सेज पायलट की लड़ाई में अब सचिन खेमे के पास आखिरी मौका

दरअसल, गहलोत वर्सेज पायलट की लड़ाई में अब सचिन खेमे के पास आखिरी मौका ही बचा है। राहुल गांधी की यात्रा निकलने के बाद हाईकमान ने गहलोत के बजट पेश करने तक पायलट गुट को सब्र करने के संकेत दिए थे। गहलोत ने न सिर्फ 10 फरवरी को बजट पेश कर दिया है, बल्कि 16 फरवरी को विधानसभा में बजट भाषण पर जवाब भी दे चुके हैं। हाथ से हाथ जोड़ो यात्रा 26 जनवरी से शुरू हो चुकी है। ऐसे में अब विधानसभा चुनाव तक ऐसा कोई बड़ा कारण या मुद्दा नहीं है, जो हाईकमान को राजस्थान पर फैसला करने से रोके। यही वजह है कि पायलट गुट ने हाईकमान पर अपने पक्ष में फैसला लेने के लिए दबाव की राजनीति को तेज करने की रणनीति पर अमल कर रहा है। पहले गहलोत समर्थित नेता और विधायक ही बयानबाजी कर रहे थे, अब खुद सचिन पायलट ही मैदान में उतर आए हैं।

 सोनिया के आदेश की खुली अवहेलना करने के दोषी नेताओं पर कार्रवाई क्यों नहीं

कांग्रेस हाईकमान को सीधा संदेश देने के लिए सचिन पायलट ने दिल्ली में ही मीडिया से राजस्थान के बारे में दो-टूक बातचीत की। पायलट ने साफ कहा कि गहलोत खेमे के उन नेताओं के खिलाफ कार्रवाई करने में पार्टी कोताही बरत रही है, जिन्होंने 25 सितंबर को हाईकमान के खिलाफ खुली बगावत की थी। हाईकमान के जिन दो आब्जर्वर के खिलाफ अनुशासनहीनता की गई, उनमें से एक मल्लिकार्जुन खरगे थे, जो कि अब कांग्रेस अध्यक्ष हैं। ऐसे में दोषी नेताओं के खिलाफ कार्रवाई में तेजी आने के बजाए देरी ही हो रही है। पायलट ने साफ कहा कि पार्टी को अब जल्द से जल्द फैसला करना होगा, वरना….!! पायलट ने कहा कि अनुशासन और पार्टी के रुख का अनुपालन सभी के लिए समान है, व्यक्ति बड़ा हो या छोटा। साथ ही उन्होंने कहा, अनुशासनात्मक समिति ही तत्कालीन पार्टी प्रमुख सोनिया गांधी के खिलाफ खुली अवहेलना के संबंध में निर्णय में विलंब का सबसे अच्छा जवाब दे सकती है। गौरतलब है कि इस मामले में सीएम गहलोत को दिल्ली जाकर सोनिया गांधी ने माफी मांगनी पड़ी थी।
विधायक दल की बैठक के समानांतर बैठक बुलाना गहलोत गुट की अनुशासनहीनता
सचिन पायलट ने कहा कि पिछले साल 25 सितंबर को जयपुर में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने विधायक दल की बैठक बुलाई थी, वह बैठक नहीं हुई। केंद्रीय पर्यवेक्षक अजय माकन और मल्लिकार्जुन खरगे थे। बैठक में जो कुछ भी होता, वह एक अलग मुद्दा है। सहमति या असहमति, लेकिन बैठक नहीं होने दी गई। बल्कि इसके समानांतर बैठक कर ली गई और ज्यादातर विधायक न सिर्फ उसमें पहुंचे, बल्कि दबाव बनाने के लिए इस्तीफे भी विधानसभा अध्यक्ष सीपी जोशी को दे दिए। पायलट ने कहा, मुझे मीडिया के जरिए जानकारी मिली कि गहलोत के समर्थकों ने नोटिस पर जवाब दे दिया, लेकिन उन पर कोई कार्रवाई नहीं हुई।
जांच कमेटी ने जिनको अनुशासन तोड़ने का दोषी पाया, उन्हें बचाया जा रहा
विधायक दल की बैठक नहीं होने के बाद केंद्रीय नेतृत्व ने जांच के लिए कमेटी का गठन किया था। इस कमेटी ने कई नेताओं को अनुशासन तोड़ने का दोषी पाया था। हालांकि, इसको लेकर कोई एक्शन नहीं हुआ। उन्होंने कहा कि एक्शन क्यों नहीं हुआ, इसका सही जवाब अनुशासनात्मक कमेटी और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ही दे सकेंगे। दरअसल, बीते साल कांग्रेस अध्यक्ष के चुनाव के समय राजस्थान कांग्रेस की कलह एक बार फिर खुलकर सामने आ गई थी। अशोक गहलोत के कांग्रेस अध्यक्ष का चुनाव लड़ने की चर्चा के बीच मुख्यमंत्री पद को लेकर सियासत गरमा गई थी। नेतृत्व परिवर्तन को लेकर जयपुर में विधायक दल की बैठक बुलाई गई थी, जिसके लिए कांग्रेस आलाकमान ने अजय माकन और मल्लिकार्जुन खरगे को जयपुर भेजा था।
गहलोत समर्थक विधायक सचिन को नहीं बनाना चाहते थे मुख्यमंत्री
इसी बीच गहलोत समर्थक विधायकों ने बगावत कर दी थी। गहलोत समर्थक विधायक मुख्यमंत्री के तौर पर सचिन पायलट के नाम पर राजी नहीं थे। इस बगावत के बाद ये बैठक नहीं हो पाई थी। कांग्रेस ने इस घटनाक्रम को लेकर प्रदेश के संसदीय कार्य मंत्री शांति धारीवाल, मुख्य सचेतक एवं पीएचईडी मंत्री महेश जोशी और आरटीडीसी अध्यक्ष धर्मेंद्र राठौर को उस समय नोटिस जारी किए थे। इस घटनाक्रम के बाद अशोक गहलोत और सचिन पायलट के बीच बयानबाजी भी हुई थी। अशोक गहलोत ने सचिन पायलट को गद्दार करार देते हुए कहा था, उन्होंने पार्टी के साथ गद्दारी की थी। इसलिए उन्हें कभी मुख्यमंत्री नहीं बनाया जा सकता। इस पर सचिन पायलट ने भी पलटवार करते हुए अशोक गहलोत को इस तरह के बचकाने बयान न देने की नसीहत दी थी।
घोषणावादी मुख्यमंत्री के वादे धरातल पर कहीं दिखाई नहीं देते- बीजेपी
दूसरी ओर भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष सतीश पूनियां समेत बीजेपी ने मुख्यमंत्री पर हमला बोला है। पूनियां ने कहा कि गैंगरेप और गैंगवार की लगातार घटनाएं प्रदेश पर कलंक हैं। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री पिछली घोषणाएं और वादे को पूरा करने के बजाय बजट में सिर्फ घोषणाएं करने में ही व्यस्त हैं और अपनी कुर्सी बचाने के जुगाड़ में लगे हैं। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ‘घोषणाजीवी’ हैं। वह पिछले चार वर्षों से केवल घोषणाएं कर रहे हैं, लेकिन धरातल पर कुछ भी नहीं है। राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक और नागौर के सांसद हनुमान बेनीवाल ने भी गहलोत सरकार पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि “सरकार की गलत नीतियों का खामियाजा जनता भुगत रही है। अपराध का ग्राफ लगातार बढ़ रहा है और अपराधियों में कोई खौफ नहीं है। उन्होंने दावा किया कि राजस्थान महिलाओं के खिलाफ अपराध में पहले स्थान पर पहुंच गया है।”

राजस्थान : ‘अंग्रेजी बोलने, हैंडसम होने से कुछ नहीं होता’ : अशोक गहलोत

पायलट गहलोत हैंडसम
सचिन पायलट के नर्म पड़ते रुख पर अशोक गहलोत ने खुल कर हमला किया है। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने कहा कि उनके यहाँ उपमुख्यमंत्री खुद ही डील कर रहे हैं। सरकार के खिलाफ षड्यंत्र में उपमुख्यमंत्री खुले रूप से शामिल हैं। गहलोत ने कहा कि ये बिना रगड़ाई हुए ही केंद्रीय मंत्री और पीसीसी चीफ बन गए और अगर ‘रगड़ाई’ हुई होती तो आज और अच्छा काम करते।
कांग्रेस ने बागी विधायक सचिन पायलट को उपमुख्यमंत्री और कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष पद से हटाने के बाद उन्हें अयोग्य घोषित करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। विधानसभा अध्यक्ष ने जुलाई 15, 2020 को कांग्रेस की शिकायत के आधार पर सचिन पायलट समेत 19 विधायकों को नोटिस भेजा है।
आज राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने सचिन पायलट पर आक्रामक हमला बोला है। अशोक गहलोत ने कहा कि पहले भी उन्हें अपने विधायकों को 10 दिन तक होटल में रखना पड़ा था। अगर उस वक्त वो नजर नहीं रखते तो आज जो मानेसर वाला खेल हुआ है, वो उस समय होने वाला था। गहलोत ने कहा कि रात के दो बजे लोगों को भेजा रहा था, जबकि खुद षड्यंत्र में शामिल नेता सफाई दे रहे थे।
सचिन पायलेट पर हमला बोलते हुए अशोक गहलोत ने कहा, “अच्छी अंग्रेजी बोलना, अच्छी बाइट देना और खूबसूरत (हैण्डसम) होना सब कुछ नहीं है। देश के लिए आपके दिल के अंदर क्या है, आपकी विचारधारा, नीतियाँ और प्रतिबद्धता, सब कुछ माना जाता है।”




गहलोत ने कहा कि उनके विधायकों को पैसे का लालच दिया गया ताकि वे टूटने वाली पार्टी में शामिल हो जाएँ और सरकार गिर जाए। उन्होंने आरोप लगाया कि विरोधियों के पास धन-बल की कमी नहीं होने के कारण यह साफ शब्दों में कह दिया गया कि जो सरकार के साथ नहीं है, वो पैसे ले चुका है।
अशोक गहलोत ने कहा, “हमारे डिप्टी सीएम हों या पीसीसी चीफ, उनसे जब खरीद-फरोख्त की जानकारी माँगी गई तो सफाई दे रहे हैं। जबकि वह खुद षड्यंत्र में शामिल थे। दिल्ली में बैठे लोगों ने सरकार गिराने की साजिश रची। लोकतंत्र को खत्म करने की साजिश हो रही है। कर्नाटक और मध्य प्रदेश की तरह साजिश हो रही है।”
उधर सचिन पायलट ने कहा कि वो अभी भी कांग्रेस में हैं और फिलहाल भाजपा में नहीं जा रहे हैं। सरकार गिराने की साजिश के सवाल पर सचिन पायलट ने कहा कि सरकार गिराने की बात करना गलत है। सचिन पायलेट ने कहा कि वो अपनी ही पार्टी के खिलाफ ऐसा क्यों करेंगे?
भाजपा के पास खुद के 72 विधायक हैं और उसे हनुमान बेनीवाल की अगुवाई वाली राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी के 3 विधायकों का समर्थन प्राप्त है, जो उनके गणित को 75 तक ले जाता है।
विधानसभा अध्यक्ष के नोटिस का जवाब देने के लिए 19 कांग्रेस विधायकों को शुक्रवार(17 जुलाई) तक का समय दिया गया है। लेकिन वे उस तारीख पर या उससे पहले अदालत में पेश किए गए नोटिस को चुनौती दे सकते हैं। यह सत्ता संघर्ष में एक नया आयाम जोड़ेगा।
ऐसे में, अगर विधायकों को अयोग्य ठहराए जाने की प्रक्रिया अदालत के आदेश से रुक जाती है, और विधानसभा में शक्ति परीक्षण होता है, तो गहलोत संख्याओं के फेर में मात खा सकते हैं।
ऐसा इसलिए है क्योंकि कांग्रेस के बागी विधायक भाजपा के साथ जा सकते हैं और तब भाजपा के पास विधानसभा में बेनीवाल के तीन विधायकों के साथ 94 वोट होंगे। और गहलोत (88) की किस्मत पूरी तरह से 13 निर्दलीय और छोटे दलों के विधायकों पर निर्भर करेगी।
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राजस्थान के उप-मुख्यमंत्री पद से हटाए जाने के बाद सचिन पायलट ने अपने राजनीतिक भविष्य के बारे में बहुत कुछ साफ़ करते ....
दिसंबर 2018 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस ने 100 सीटें जीती थीं। पार्टी ने उपचुनाव में एक सीट (रामगढ़) पर बाद में जीत हासिल की, जिसके बाद इसकी संख्या 101 हो गई। इसके बाद, बसपा के भी छह विधायक पार्टी में शामिल हो गए, और इनकी संख्या 107 हो गई।

क्या राजस्थान और महाराष्ट्र में मध्य प्रदेश दोहराया जाएगा ?

क्या मध्य प्रदेश के बाद राजस्थान और महाराष्ट्र में दोहराया जाएगा 'ऑपरेशन लोटस'?
आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
मध्य प्रदेश के ज्योतिरादित्य सिंधिया की ही तरह सचिन पायलट भी राहुल गांधी की युवा टीम के सदस्य हैं। राहुल उन्हें मुख्यमंत्री बनाना चाहते थे। लेकिन सोनिया गांधी के कांग्रेस की कमान थामने के बाद बुजुर्ग कांग्रेसियों ने एक बार फिर से अपना वर्चस्व कायम कर लिया है। इन्हीं बुजुर्ग नेताओं की सलाह पर अशोक गहलोत को राजस्थान का मुख्यमंत्री बनाया गया
सचिन पायलट की नाराजगी शांत करने के लिए उन्हें उप मुख्यमंत्री और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष भी बनाया गया। लेकिन दोनों का झगड़ा खत्म नहीं हुआ। हाल ही में पायलट खेमे के कई विधायकों ने राजस्थान विधानसभा सत्र के दौरान अपने ही मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की खुली आलोचना की थी
राजस्थान कांग्रेस में भी टूट की आशंका 
राजस्थान में गहलोत और पायलट की जंग पर भारतीय जनता पार्टी की निगाहें लगातार जमी हुई हैं। प्रदेश भाजपा के सूत्रों ने दावा किया है कि गहलोत सरकार के तीन दर्जन यानी लगभग 36 विधायक उनके संपर्क में हैं। राजस्‍थान में विधानसभा की कुल 200 सीटे हैं। वहां सरकार बनाने के लिए 101 विधायकों की जरूरत पड़ती है। 2018 में हुए विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को 99 सीटों पर जीत मिली। जबकि भाजपा 73 सीटों पर सिमट गई थी

अगर कांग्रेस के 36 विधायक भाजपा के संपर्क में हैं तो गहलोत सरकार के पास मात्र 63 विधायक बच जाएंगे। हालांकि गहलोत ने बसपा के 6 विधायकों को कांग्रेस में शामिल करा लिया है। लेकिन उन्हें जोड़ भी लिया जाए तो कांग्रेस के पास 69 विधायक ही बचेंगे। जो कि बहुमत से 32 विधायक कम हैं। ऐसे में गहलोत सरकार मुश्किल में पड़ सकती है
हालांकि गहलोत को 11 निर्दलीय विधायकों का भी समर्थन हासिल है। लेकिन उन्हें जोड़ने के बाद भी उनके पास  बहुमत से 21 विधायक कम होंगे। 
महाराष्ट्र में भी सुलग रही है बगावत की आग
उधर महाराष्ट्र में भी जल्द ही बड़ा उलटफेर हो सकता है। मुंबई कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष संजय निरूपम ने अपनी ही पार्टी पर करारा वार किया है। उन्होंने कहा है कि उद्धव सरकार तीन दलों की सरकार है और मैं इसके बारे में हमेशा कहता हूं कि ये उधार का सिंदूर लेकर सुहागन बनने वाली बात है। ऐसे सुहाग ज्यादा दिन टिकते नहीं है। कांग्रेस को ऐसी सरकार का हिस्सा नहीं बनना चाहिए

महाराष्ट्र का सियासी गणित
महाराष्ट्र में महाविकास अघाड़ी की सरकार चल रही है। जिसमें मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे को कांग्रेस और एनसीपी समर्थन दे रहे हैं। शिवसेना के पास 56 विधायक हैं। जबकि कांग्रेस के पास 44 और एनसीपी को 54 सीटें मिली थीं। ये तीनों के पास मिल कर 154 विधायक हैं। जो कि बहुमत से 9 ज्यादा हैं। महाराष्ट्र में विधानसभा की 288 सीटें हैं


लेकिन अगर कांग्रेस नेता संजय निरुपम महाराष्ट्र में बगावत कर देते हैं तो वहां कांग्रेस मुश्किल में पड़ जाएगी। क्योंकि वह पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष रह चुके हैं और विधायकों पर उनकी अच्छी पकड़ है। संजय निरुपम शिवसेना में रह चुके हैं और कई पार्टियां बदलते हुए फिलहाल कांग्रेस में हैं। अगर वह भाजपा में शामिल होकर महाराष्ट्र सरकार गिरा देते हैं तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए
क्या है सिंधिया, पायलट और निरुपम जैसे नेताओं की परेशानी
दरअसल कांग्रेस अध्यक्ष रहते हुए राहुल गांधी ने युवा नेताओं को आगे बढ़ाने का काम किया था। जिसमें सिंधिया, पायलट और निरुपम जैसे नेता शामिल थे। लेकिन राहुल के कांग्रेस अध्यक्ष का पद छोड़ने के बाद सोनिया ने कुर्सी संभाली। जिसके बाद कांग्रेस पार्टी में फिर से पुराने बुजुर्ग कांग्रेसियों का बोलबाला हो गया।जिसके बाद सिंधिया,पायलट और निरुपम जैसे युवा नेता हाशिए पर भेज दिए गए

हरियाणा में अशोक तंवर भी राहुल की युवा ब्रिगेड के ही सदस्य थे। जिनके जाने के बाद हरियाणा में कांग्रेस का सत्ता में आने का सपना चकनाचूर हो गया था
लेकिन अब सोनिया और उनकी बुजुर्ग ब्रिगेड भारत को कांग्रेस मुक्त बनाने की इबारत तेजी से लिख रही है, क्योंकि युवा नेता तेजी से कांग्रेस छोड़ चुके हैं या फिर छोड़ने की तैयारी में हैं

राजेश पायलट ने सोनिया को दी थी चुनौती, अब बेटे सचिन ने राहुल के सामने ठोका खम

पहले राजेश पायलट ने सोनिया को दी चुनौती, अब बेटे सचिन ने राहुल के सामने ठोका खम
कांग्रेस पार्टी को 11 दिसंबर को आए चुनाव नतीजों में आखिरकार वह जीत मिल गई जिसके लिए पार्टी लंबे समय से तरस रही थी. एक ऐसी जीत जिससे पार्टी की सूखती धान में पानी पड़ा. लेकिन जीत के साथ ही महत्वाकांक्षाएं भी मुंहजोर होने लगीं. कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने लंबी मंत्रणा के बाद मध्य प्रदेश में ज्योतिरादित्य सिंधिया को मुख्यमंत्री न बनने के लिए मना लिया, लेकिन वही बात राजस्थान में सचिन पायलट को समझानी कठिन हो रही है.
राजस्थान कांग्रेस के अध्यक्ष सचिन पायलट ने अंगद की तरह पांव जमा रखा है. राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत का जादू खुलकर सामने नहीं आ पा रहा है. अगर पूरे मामले को गौर से देखें तो अब तक इतना साफ है कि विधायक दल ने फैसला करने का अधिकार कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को दे दिया है. लेकिन राहुल गांधी अपना फैसला गहलोत और पायलट को मनवा नहीं पा रहे हैं. सचिन पायलट का कहना है कि पिछले चार साल से प्रदेश अध्यक्ष के नाते उन्होंने राज्य में मेहनत की है. इस जीत में उनकी मेहनत का बड़ा हाथ है. इसलिए मुख्यमंत्री उन्हें बनाया जाना चाहिए. इस तरह से वे राहुल गांधी के फैसले के खिलाफ खड़े नजर आ रहे हैं.
इस समय देश की सियासत में चल रहे घटनाक्रम को दो दशक पुराने घटनाक्रम से जोड़कर देखा जा सकता है. उस जमाने में जब राहुल की मां सोनिया गांधी कांग्रेस की बागडोर संभाल रही थीं, तब सचिन के पिता राजेश पायलट और ज्योतिरादित्य के पिता माधवराव सिंधिया कांग्रेस के बड़े नेता हुआ करते थे. ये दोनों नेता भी आलाकमान के सामने दंडवत नहीं थे. लेकिन सिंधिया सीनियर और पायलट सीनियर की राजनीति में एक फर्क था, मावधराव कभी आलाकमान के सामने मुखर नहीं हुए, वहीं राजेश पायलट खुलकर सामने आने वाले शख्स बने रहे.
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राजेश पायलट का 9 जून 2000 को एक कार दुर्घटना में निधन हो गया था 
उन्होंने अपने बागी तेवर सबसे पहले कांग्रेस अध्यक्ष सीताराम केसरी के सामने दिखाए और कांग्रेस अध्यक्ष का चुनाव लड़ा. उस समय शरद पवार ने भी कांग्रेस अध्यक्ष का चुनाव लड़ा था. ये दोनों नेता केसरी से चुनाव हार गए. जब बाद में कांग्रेस की बागडोर सोनिया गांधी के हाथ में आई तो शरद पवार ने बगावत की और पार्टी छोड़ने को मजबूर हुए. लेकिन राजेश पायलट पार्टी के भीतर रहकर ही सोनिया के मुकाबले में आए. सन 2000 में जब कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए सोनिया गांधी चुनाव लड़ रही थीं, तो उनके खिलाफ जो नेता बिगुल उठाए थे, उनमें कांग्रेस नेता जीतेंद्र प्रसाद और पायलट मुखर थे.
कांग्रेस नेता जतिन प्रसाद के पिता जीतेंद्र प्रसाद जब 2000 में सोनिया गांधी के सामने चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे थे तो पायलट ने उनके समर्थन में रैलियां की थीं. बीबीसी को दिए एक इंटरव्यू में राजेश पायलट ने सोनिया गांधी की आलोचना की थी. इस इंटरव्यू में एक सवाल के जवाब में पायलट ने कहा था कि हां, वह प्रधानमंत्री बनना चाहते हैं.
9 जून 2000 को एक कार दुर्घटना में मृत्यु से पहले राजेश पायलट ने सोनिया गांधी से लंबी मुलाकात की थी. हो सकता है इस मीटिंग में कुछ अच्छी बातें हुई हों. बहरहाल तब जीतेंद्र प्रसाद वह चुनाव हार गए थे.
आज दो दशक बाद इन सारे नेताओं की दूसरी पीढ़ी मैदान में है. सोनिया की जगह राहुल हैं, राजेश की जगह सचिन हैं और माधवराव की जगह ज्योतिरादित्य हैं. दोनों ही नेताओं को मनमोहन सिंह सरकार में राज्य मंत्री बनाया जा चुका है. समय के साथ दोनों नेता राहुल के करीब भी आ चुके हैं. इन सबने मिलकर उसी तरह कांग्रेस को संकट से उबारा है, जैसे दो दशक पहले इनके बुजुर्गों ने मिलकर उबारा था.
लेकिन इस उत्साह के साथ नेताओं की वर्तमान पीढ़ी में अपने बुजुर्गों के तेवर भी आ गए हैं. ज्योतिरादित्य वही कर रहे हैं, जो उनके पिता ने किया था. यानी शांति से समय के साथ चलना. दूसरी तरफ सचिन वही कर रहे हैं, जो उनके पिता राजेश पायलट ने किया था. यानी अपनी बात के लिए खुलकर मैदान में आना. जाहिर है सचिन को पता होगा कि किसी भी दूसरी पार्टी की तरह कांग्रेस में भी इस तरह के विरोध को अच्छा तो नहीं ही समझा जाएगा. इस पूरे घटनाक्रम से सचिन को गद्दी मिले या न मिले, 24 अकबर रोड में उनके नंबर जरूर कम हो जाएंगे.

राजस्थान मुख्यमन्त्री पद के लिए कांग्रेस में होता घमासान

Related imageराजस्थान में कांग्रेस ने भाजपा को शिकस्त जरूर दे दी है, लेकिन अशोक गहलोत और सचिन पायलट के बीच हो रहे घमासान पर पार्टी कब तक निजात पाएगी। जिस बात का चुनाव प्रचार के दौरान से डर था, वह अब चरितार्थ हो रहा है। यदि इस अंदरूनी लड़ाई पर विराम नहीं लगा, भाजपा को कम सीटें होने के बावजूद पुनः सत्ता में आने से कोई नहीं रोक सकता। अशोक गहलोत और सचिन पायलट की लड़ाई बढ़ती जा रही हैकांग्रेस आलाकमान पर दबाव बनाने के लिए इस्तीफे की राजनीति भी शुरू हो गई है। इसी बीच, सचिन पायलट के समर्थक इंद्रमोहन सिंह ने कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को इस्तीफ़ा भेज दिया है। सचिन पायलट को सीएम बनाने में हो रही देरी के कारण इंद्रमोहन ने इस्तीफ़ा दिया है। इन्द्रमोहन सिंह राजस्थान प्रदेश कांग्रेस कमेटी के प्रवक्ता हैं
सीएम के नाम की घोषणा से पहले सुरक्षा चाक-चौबंद
कांग्रेस द्वारा राजस्थान में मुख्यमंत्री के नाम की घोषणा से पहले इस पद की होड़ में शामिल पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष सचिन पायलट के घरों के बाहर सुबह से ही समर्थकों की भीड जुटने के बाद सुरक्षा के कडे प्रबंध किए गए हैं। गहलोत के सिविल लाइंस और पायलट के जालूपुरा स्थित निवासों पर सुबह से ही बडी संख्या में समर्थकों का जुटना शुरू हो गया था
दोनों नेताओं के समर्थकों को उम्मीद है कि मुख्यमंत्री पद के लिये उनके ही नेता के नाम की घोषणा की जाएगी। जयपुर के अतिरिक्त पुलिस आयुक्त नितिन बल्लगन ने बताया कि दोनों के निवास स्थानों पर बडी संख्या में समर्थकों की भीड को देखते हुए सुरक्षा के कडे बंदोबस्त किए गए हैं। स्थिति को नियंत्रण में रखने के लिए अतिरिक्त पुलिस बल तैनात किए गए हैं। दोनों के समर्थकों के अलावा संसारचंद्र रोड स्थित पार्टी मुख्यालय में मौजूद पार्टी सदस्यों को मुख्यमंत्री पद के लिये नाम घोषित किए जाने का बेसब्री से इतंजार है 
गहलोत हो सकते हैं राजस्थान के मुख्यमंत्री
न्यूज एजेंसी IANS के मुताबिक, कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अशोक गहलोत राजस्थान में मुख्यमंत्री की रेस में सचिन पायलट को पछाड़कर आगे निकल गए हैं पार्टी सूत्रों के अनुसार, कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी पार्टी के वरिष्ठ नेताओं से चर्चा पूरी कर दो बार मुख्यमंत्री रहे 67 वर्षीय गहलोत के नाम की घोषणा दिसंबर 13 की शाम को दिल्ली में करेंगे
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अगर अशोक गहलोत अनुभव के आधार पर मुख्यमंत्री पद के दावेदार हो सकते हैं, तो पार्टी को सत्ता की चौखट पर लाने का श्रेय सचिन पायलट पर है। इस घमासान को देखते लगता है पायलट समर्थकों को शायद उपमुख्यमन्त्री पद भी स्वीकार नहीं होगा। 

राजस्थान चुनाव 2018: मॉब लिंचिंग पर कांग्रेस ने साधी चुप्पी, ध्रुवीकरण का सता रहा डर

राजस्थान विधानसभा चुनाव के लिए वोटिंग होने में अब महज तीन दिन बचे हैं. 7 दिसंबर को होने जा रही वोटिंग से पहले जहां एक ओर राजनीतिक पार्टियों ने स्टार प्रचारकों को मैदान में उतार दिया है, वहीं सोशल मीडिया पर भी लड़ाई जोरों पर है. मगर अपने चुनावी अभियान में राज्य की बिगड़ती कानून व्यवस्था पर शोर मचाने वाली मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस मॉब लिंचिग पर चुप्पी साधे हुए है. अपने घोषणापत्र से रैलियों, सोशल मीडिया और पोस्टर्स तक में कांग्रेस ने सार्वजनिक सुरक्षा और बढ़ती अपराध दर को मुद्दा बनाया है, लेकिन हिंदू वोट छिटकने के डर से भीड़ की हिंसा पर मौन साध लिया है.
द इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक, पूर्वी राजस्थान खासकर अलवर में विरोधी दल का कोई भी नेता अपने भाषणों में मॉब लिंचिंग का जिक्र तक नहीं कर रहा है. अलवर जिले की बहरोड़ सीट से नौ उम्मीदवारों में से 8 यादव हैं. 2.2 लाख वोटरों वाली बहरोड़ सीट पर यादव समुदाय का 70 फीसदी वोट बैंक है. बता दें कि पूर्व राजस्थान के अलवर जिले में गौकशी के आरोप में हिंसक भीड़ ने पहलू खान की हत्या कर दी थी. 2017 जुलाई में रामगढ़ चुनाव क्षेत्र से 80 किमी दूर रकबर खान को भी मॉब लिंचिंग का शिकार बनाया गया. उसके बाद नवंबर 2017 में उमर खान की हत्या कथित “गौ रक्षकों” ने हत्या कर दी थी.
ऑडियो क्लिप बनी मुद्दा
निर्दलीय रूप से चुनाव लड़ रहे कांग्रेस के बागी नेता बलजीत सिंह यादव ने नवंबर 29 को एक रैली के दौरान इस मुद्दे को उठाया. सोशल मीडिया पर वायरल एक ऑडियो क्लिप का जिक्र करते हुए बलजीत ने दावा किया कि एक मुस्लिम नेता ने कांग्रेस उम्मीदवार आरसी यादव को मॉब लिंचिग की घटना को उठाने के लिए अपना समर्थन दिया. हालांकि, कांग्रेस ने आरोप को खारिज कर दिया. Rajasthan Election 2018: ट्विटर पर फिल्मी डायलॉग्स से लोग कर रहे राजनीतिक दलों पर वार!

कांग्रेस कर रही राजनीति
बलजीत के करीबी एक सूत्र ने कहा, “मासूम यादव समुदाय के लोगों को हिंसा के बाद गिरफ्तार कर लिया गया और कांग्रेस इस पर राजनीतिक करना चाहती है. हमारा इस बारे में कहना है कि निर्दोष लोगों को पहलू खान मामले में जेल में नहीं भेजा जाना था.” बहरोड़ नगर पालिका उपाध्यक्ष राकेश शर्मा की एक शादी में मर्डर के मामले को भी विपक्ष ने उठाया है.

ध्रुवीकरण करेगा मुद्दा
कांग्रेस के प्रभारी सुधांशु जोशी ने कहा, “हमारे लिए पहलू खान के मुद्दे को उठाना फायदेमंद नहीं है. वास्तव में, यह मुद्दा इस चुनाव को ध्रुवीकरण करेगा, जिसे हम बर्दाश्त नहीं कर सकते हैं. पूरी घटना को कुछ और के रूप में चित्रित किया गया था और बहरोड़ को बदनाम किया गया था. हम इस चुनावी इलाके के प्रचार में कानून व्यवस्था के मुद्दे पर जोर देते हैं.”

हजार से भी कम वोट
कांग्रेस के सूत्रों ने यह भी कहा कि मुसलमानों को बहरोड़ में 1,000 से भी कम वोट हैं. उनके पास वैसे भी कोई विकल्प नहीं है. वे हमारे लिए ही वोट देंगे. एक वरिष्ठ पार्टी कार्यकर्ता ने कहा, हमें यादव समुदाय को यहां नाराज करने की जरूरत नहीं है.

क्राइम रेट बढ़ा
आधिकारिक पुलिस रिकॉर्ड बताते हैं कि बहरोड़ में हिंसक अपराध तेजी से बढ़ रहा है. 2015 और 2018 के बीच, यहां क्रमश: 21, 19, 23 और 25 मर्डर केस दर्ज हुए. वहीं, अपहरण के मामले 2016 में 27 से दोगुना होकर 2018 में 53 हो गए.

प्रॉपर्टी के दाम हैं क्राइम की जड़
एक वरिष्ठ पुलिस अफसर के अनुसार, प्रॉपर्टी के रेट तेजी बढ़ने के साथ पिछले कुछ सालों में यहां हिंसक अपराध बढ़ गया है.” दिल्ली मुंबई औद्योगिक कॉरिडोर के लिए भूमि अधिग्रहण प्रक्रिया शुरू हो गई है और इससे अचानक प्रॉपर्टी की कीमतों में इजाफा भी हो गया है. अधिकारी ने कहा कि कई अपराध अब प्रॉपर्टी से जुड़े हुए हैं. राजस्थान पुलिस के रिकॉर्ड से पता चलता है कि 2013 में अलवर में साल हत्या, अपहरण और बलात्कार के ज्यादातर मामले दर्ज किए गए. अकेले 2016 में इस जिले में 111 हत्याएं, बलात्कार के 239 केस और 336 अपहरण के मामले दर्ज किए थे.

रैलियों में नहीं आती भीड़
रामगढ़ चुनावी क्षेत्र में एक कांग्रेस नेता ने अपने एक चुनावी भाषण को लेकर बताया, “एक रैली को संबोधित करते हुए मैंने मॉब लिंचिंग का जिक्र किया और कहा कि लोगों को कानून अपने हाथों में नहीं लेना चाहिए. अगले ही दिन कार्यकर्ताओं ने मुझे बताया कि लोगों ने रैलियों में आने से इनकार कर दिया है. उन्होंने कहा कि मुस्लिमों के बारे में भूल जाओ, हम हिंसा के बारे में बात तक नहीं कर सकते हैं. हमने फैसला किया कि हम केवल अपराध पर ध्यान केंद्रित करेंगे और लिंचिंग का जिक्र तक नहीं करेंगे.” मजे की बात यह है कि कल जो भाजपा विरोधी #mob lynching, #not in my name, #metoo और  #intolerence आदि से देश का सौहार्द ख़राब कर रहे थे, आज वही लोग इन मुद्दों पर बात करने से कतरा रहे हैं, जो प्रमाणित करता है कि इनका मकसद तुष्टिकरण की सियासत खेल कर जनता को सरकार के विरुद्ध कर अपनी तिजोरियाँ भरना था, जिन्हे जनता समझ चुकी है।    

बीजेपी का पलटवार
इस मामले को लेकर पूर्व अलवर बीजेपी अध्यक्ष धर्मवीर शर्मा ने कहा, ”कांग्रेस का प्रचार निराधार है. बीजेपी सरकार ने पूरे क्षेत्र में अपराध पर लगाम लगा रखी है. कांग्रेस केवल झूठ फैला रही है. उनके पास चुनाव में बात करने के लिए कोई मुद्दा नहीं है, इसलिए वे ऐसी बातें कर रहे हैं.”

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राजस्थान विधान सभा चुनाव में इस बार कांग्रेस और भाजपा के बीच कांटे की टक्कर है। सत्तारूढ़ भाजपा के लिए दोबरा सत्ता में वापसी करने आसान नहीं होने वाला है, जबकि अंदरूनी कलह से जूझ रही कांग्रेस लगातार प्रदेश में पार्टी की संभावनाओं को बेहतर करने में जुटी है। प्रदेश के मतदाताओं पर दोनों ही राष्ट्रीय पार्टियों की पैनी नजर है। प्रदेश में राजपूत, जाट, एसएसी, एसटी वोटबैंक को अपने पक्ष में करने के लिए पार्टी के रणनीतिकार अपनी पूरी ताकत झोंक रहे हैं। पिछले बार के विधानसभा चुनाव पर नजर डालें तो भाजपा 2013 में प्रदेश की 59 आरक्षित सीटों में से 50 सीटों पर जीत दर्ज करने में सफल रही थी, ऐसे में एसएसी और एसटी सीटों पर एक बार फिर से विजय पताका फहराना भाजपा के लिए शीर्ष प्राथमिकता में शामिल है। हालांकि जिस तरह से पिछले कुछ सालों में दलितों के खिलाफ शोषण और मॉब लिंचिंग के मामले सामने आए थे, उसके बीच भाजपा के लिए यह आसान चुनौती नहीं होने वाली है।
कांग्रेस ने जीती थी 34 सीटें 

वर्ष 2018 के विधानसभा चुनाव की बात करें तो कांग्रेस ने प्रदेश की कुल 200 विधानसभा सीटों में से उन 34 सीटों पर जीत दर्ज की थी, जोकि एससी और एसटी के लिए आरक्षित थीं। प्रदेश में अगर एससी और एसटी वोटबैंक पर नजर डालें तो 17.8 फीसदी एससी वोटर हैं, जबकि 13.5 फीसदी वोटर एसटी हैं। जोकि कुल मिलाकर तकरीबन 31.3 फीसदी हैं, लिहाजा पिछले दो विधानसभा चुनाव में एससी एसटी मतदाताओं ने सरकार गठन में अहम भूमिका निभाई है।
भाजपा की रणनीति 

एससी वोटर मुख्य रूप से राजस्थान के सात डिवीजन में बंटे हैं, जबकि एसटी वोटर मुख्य रूप से उदयपुर डिवीजन में हैं। मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे अपना चुनावी अभियान उदयपुर से ही शुरू किया था, अगस्त माह में उन्होंने यहां के चारभुजा मंदिर से अपने अभियान की शुरुआत की थी। जबकि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने राजस्थान में अपनी पहली जनसभा सागवारा में सितंबर माह में की थी। एक तरफ जहां भाजपा ने अपनी पार्टी ने आदिवासी नेता किरोड़ी लाल मीणा को शामिल किया है, तो दूसरी तरफ कांग्रेस ने आदिवासी नेता रघुवीर सिंह मीणा को पार्टी में अहम जिम्मेदारी सौंपी है, उन्हें कांग्रेस वर्किंग कमेटी में शामिल किया गया है, जिससे कि ये दोनों नेता आदिवासी मतदाताओं को अपनी ओर खींच सके।
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