Showing posts with label tension. Show all posts
Showing posts with label tension. Show all posts

असम में 5 मुस्लिम छात्रों ने की हिंदू छात्रों को बीफ खिलाने की कोशिश, स्कूल ने नहीं लिया एक्शन तो पीड़ितों ने कराई FIR: 1 की माँ को पुलिस ने किया गिरफ्तार

                                                                                                                साभार - ऑपइंडिया इंग्लिश
असम के गोलपारा जिले के एक स्कूल में बीफ खाने से जुड़ी घटना के बाद इलाके में तनाव की स्थिति बन गई है। हब्रागघाट हायर सेकेंडरी स्कूल क्रिश्नई में कक्षा 9 के कुछ छात्रों से जुड़ी इस घटना को लेकर पुलिस में मामला दर्ज किया गया है। आरोप है कि पाँच मुस्लिम छात्रों ने स्कूल परिसर में बीफ लाकर खाया और दो साथ पढ़ने वाले हिंदू छात्रों को खिलाने की कोशिश भी की।

स्कूल परिसर में हुई घटना

मामला गोलपाड़ा जिले के अंतर्गत कृष्णाई स्थित हाबराघाट हायर सेकेंडरी स्कूल का बताया जा रहा है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, शुक्रवार (5 जून 2026) को कक्षा 9 के पाँच छात्रों ने लंच ब्रेक के दौरान बीफ खाया।

इसी दौरान उन्होंने अपने साथ पड़ने वाले दो हिंदू छात्रों को वही माँस खाने के लिए मजबूर करने की कोशिश की। घटना के बाद पीड़ित छात्रों ने स्कूल के एक शिक्षक को इसकी जानकारी दी।

शिकायत, प्रशासनिक कार्रवाई और पुलिस जाँच

बताया गया है कि शुरुआत में स्कूल प्रशासन ने मामले को शांत करने की कोशिश की और छात्रों को चुप रहने की सलाह दी। बाद में परिजनों को जानकारी मिलने पर वे स्कूल पहुँचे और कार्रवाई की माँग की।

इसके बाद मामले में कृष्णई पुलिस स्टेशन में FIR दर्ज की गई। पुलिस ने छात्रों और उनके अभिभावकों से पूछताछ की, जबकि एक छात्र की माँ को गिरफ्तार कर न्यायिक हिरासत में भेजा गया है।

मामले की गंभीरता को देखते हुए प्रदीप तिमुंग और नवनीत महंता ने स्कूल का दौरा कर स्थिति का जायजा लिया। प्रशासन ने शांति बनाए रखने और जाँच जारी रखने की बात कही है।

बंगाल : ममता बनर्जी के एक और MLA ने चुनाव से पहले बढ़ा दी TMC की टेंशन, पक रही है सियासी खिचड़ी


पश्चिम बंगाल में ज्यों-ज्यों विधानसभा चुनाव नजदीक आ रहा है, मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की मुश्किलें बढ़ती ही नजर आ रही हैं। विपक्ष के निशाने छोड़िए तृणमूल कांग्रेस की सुप्रीमो अपनी ही पार्टी के नेताओं के वाणों से बच नहीं पार रही है। एक के बाद एक टीएमसी के विधायक ममता सरकार को मुश्किलों में डालने में लगे हैं। पहले दो विधायक कबीर और इस्लाम में ममता की धड़कनें बढ़ाईं तो अब तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के ही विधायक मनोरंजन बापरी ने पश्चिम बंगाल की सियासत में हलचल मचा दी है। उनके एक सोशल मीडिया पोस्ट पोस्‍ट ने चुनावी माहौल में टीएमसी की धड़कनें बढ़ा दी हैं। इसमें उन्होंने भाजपा और सीपीआई(एम) दोनों पार्टियों के कार्यकर्ताओं की विनम्रता और दरियादिली तहेदिल से तारीफ की है। हुगली जिले के बालागढ़ से टीएमसी विधायक बापरी ने अपनी पोस्ट में उन्होंने दो निजी अनुभवों का जिक्र किया है। एक में भाजपा कार्यकर्ता शामिल थे और दूसरे में सीपीआई(एम) के युवा कार्यकर्ता। यह बताने के लिए कि बीजेपी में शिष्टाचार और उदारता जैसे मूल्य राजनीतिक विचारधाराओं से ऊपर होते हैं। ऐसा माना जा रहा है कि उनके निशाने पर टीएमसी है, जिसमें ऐसी विचारधारा दूर-दूर तक नजर नहीं आती।

भाजपा को बंगाल में ‘बाहरी’ और ‘असंवेदनशील’ बताने का नैरेटिव तोड़ा

ममता बनर्जी की सियासी मुश्किलें अब विपक्ष के हमलों से नहीं, अपनी ही पार्टी की ज़ुबान से बढ़ रही हैं। तृणमूल के विधायक मनोरंजन बापरी का भाजपा कार्यकर्ताओं की “विनम्रता और दरियादिली” की खुलेआम तारीफ करना कोई सामान्य शिष्टाचार नहीं, बल्कि सत्ता के गलियारों में गूंजने वाली चेतावनी है। इससे पहले हुमायूं कबीर और मोनिरुल इस्लाम जैसे विधायक अपने बयानों और कृत्यों से मुख्यमंत्री की किरकिरी करा चुके हैं। अब बापरी का यह सार्वजनिक बयान उस नैरेटिव को तोड़ता है, जिसमें भाजपा को बंगाल में ‘बाहरी’ और ‘असंवेदनशील’ बताया जाता रहा। जब सत्तारूढ़ दल के भीतर से ही विरोधी की छवि चमकने लगे, तो समझ लेना चाहिए कि नेतृत्व की पकड़ ढीली पड़ रही है।

बीजेपी के कट्टर कार्यकर्ताओं से सम्मान मिलना गर्व और सम्मान की बात

टीएमसी विधायक बापरी ने अपने सोशल मीडिया पोस्ट में जिस पहली घटना का जिक्र किया है, वह कुछ साल पहले की है। वह सेंट्रल कोलकाता के नेताजी इंडोर स्टेडियम में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की एक पार्टी मीटिंग से लौट रहे थे। वापस आते समय डंकुनी टोल प्लाजा पर भाजपा कार्यकर्ताओं के विरोध-प्रदर्शन के कारण उनकी गाड़ी रोक दी गई। बापारी ने अपनी पोस्ट में कहा, ‘मेरे असिस्टेंट पार्थ ने मुझसे गाड़ी से बाहर ना निकलने को कहा। मैंने उनकी बात नहीं मानी और मैं गाड़ी से बाहर निकला और भाजपा समर्थकों से उनके विरोध का कारण पूछा। उन्होंने मुझे पहचान लिया. बहुत ही नरमी से उन्होंने मुझसे माफी मांगी और मुझे आगे बढ़ने को कहा। मैं उनका कट्टर विरोधी हूं, इसके बावजूद विपक्षी बीजेपी के कट्टर कार्यकर्ताओं से सम्मान मिलना मेरे लिए बहुत ही गर्व और सम्मान की बात थी।’

‘मैंने तो बस अपनी पूरी जिंदगी लोगों का प्यार कमाया’

विधायक बापरी यह भी कहा कि ऐसे समय में जब अलग-अलग राजनीतिक पार्टियों के बीच झड़पें आम बात हो गई हैं। वे बिना किसी सुरक्षा के पूरे राज्य में घूमते हैं और कभी-कभी तो पब्लिक गाड़ियों में भी सफर करते हैं। मुझ पर कभी किसी ने हमला नहीं किया। मुझे नहीं लगता कि कोई कभी ऐसा करेगा। मैंने पूरी जिंदगी लोगों का प्यार कमाया है। दूसरी घटना जो उन्होंने बताई, वह रविवार की है, जब वह कोलकाता इंटरनेशनल बुक फेयर से पब्लिक गाड़ी से लौट रहे थे। यह समझते हुए कि हाल ही में घुटने की सर्जरी की वजह से मुझे खड़े होने में दिक्कत हो रही है। गाड़ी में बैठे तीन युवाओं में से एक ने मेरे लिए अपनी सीट खाली कर दी। शर्मिंदा होकर मैंने मना कर दिया। फिर उनमें से एक ने मुझसे कहा कि उसने मुझे पहचान लिया है। उसने यह भी कहा कि एक पक्के सीपीआई(एम) युवा कार्यकर्ता होने के नाते, वह और उसके दो दोस्त अक्सर मेरे अलग-अलग सोशल मीडिया पोस्ट पर मेरे साथ राजनीतिक चर्चा करते हैं। इसके बाद उनके साथ काफी देर तक बातचीत हुई। मैं उनकी कुछ बातों से सहमत हुआ और वे भी मेरी कुछ बातों से सहमत हुए। जिस बात ने मुझे सबसे ज्यादा हैरान किया, वह यह थी कि यह जानते हुए भी कि मैं तृणमूल कांग्रेस का विधायक हूं, उन्होंने मुझे बहुत इज्जत दी और मेरी तारीफ भी की।

सत्ता-संतुलन में खिसकने और सियासी खिचड़ी पकने के संकेत

यह घटनाक्रम केवल बयानबाज़ी नहीं, बल्कि सत्ता-संतुलन में खिसकन का संकेत है। राजनीतिक प्रेक्षकों की “सियासी खिचड़ी” वाली आशंका यूं ही नहीं उठी—टीएमसी के भीतर असंतोष, गुटबाज़ी और अवसरवाद अब खुले मंच पर दिखने लगे हैं। भाजपा के लिए यह अप्रत्याशित संजीवनी है, जो उसके कद को ऊंचा करती है और ममता बनर्जी को रक्षात्मक मुद्रा में धकेल देती है। चुनावी मौसम से पहले पार्टी-अनुशासन का यह क्षरण बताता है कि ममता की ताकत अब विरोधियों से नहीं, अपने ही विधायकों की बयानबाज़ी से चुनौती पा रही है। सत्ता जब अपने ही शब्दों से कटने लगे, तो सियासत में उसका हिसाब जनता तय करती है। ममता की पार्टी के विधायक ने आगे दावा किया कि हालांकि उन्हें नहीं पता कि एक विधायक के तौर पर वह कितने सफल रहे, लेकिन उनकी ज़िंदगी की सबसे बड़ी उपलब्धि वह सम्मान है जो उन्हें आम लोगों से मिला है। चाहे उनकी राजनीतिक विचारधारा कुछ भी रही हो।

टीएमसी विधायक के बिगड़े बोल- ‘चुनाव आयोग को कब्र से बाहर खींच लाने’ की धमकी

 दरअसल, आज पश्चिम बंगाल की सीएम बनर्जी की राजनीति एक ऐसे मोड़ पर है, जहां सत्ता का संतुलन नहीं, बल्कि सत्ता की असहायता सबसे अधिक दिखाई दे रही है। उनकी अपनी पार्टी तृणमूल कांग्रेस के भीतर से उठती वह बेलगाम आवाज़ें हैं, जो सरकार की साख, संवैधानिक मर्यादा और कानून-व्यवस्था तीनों को एक साथ चुनौती दे रही हैं। एक के बाद एक टीएमसी नेताओं के विवादित कदम यह सवाल खड़ा कर रहे हैं कि क्या ममता बनर्जी अपनी पार्टी पर नियंत्रण खो चुकी हैं? क्या इस बार के विधानसभा चुनाव ममता बनर्जी के लिए भारी मुश्किलों को सबब बनने जा रहे हैं? पश्चिम बंगाल में छात्राओं और महिलाओं के यौन शोषण के मामले में पहले ही टीएमसी नेताओं के नाम आ चुके हैं। पिछले महीने टीएमसी के विधायक रहे हुमायूं कबीर ने ममता बनर्जी की राजनीति में बड़ा बवाल कर दिया। अब फरक्का से टीएमसी विधायक मोनिरुल इस्लाम द्वारा मुख्य चुनाव आयुक्त को खुलेआम दी गई धमकी केवल एक बयान नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की आत्मा पर सीधा हमला है। चुनाव आयोग जैसे संवैधानिक निकाय के खिलाफ ‘कब्र से बाहर खींच लाने’ जैसी भाषा का प्रयोग यह दर्शाता है कि सत्ताधारी दल के कुछ नेता खुद को कानून से ऊपर समझने लगे हैं।

बाबरी मस्जिद विवाद: तुष्टिकरण की राजनीति का बोझ
पश्चिम बंगाल में कुछ महीने बाद ही विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। लेकिन राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की राजनीति के लिए पिछला कुछ समय अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारने वाला साबित हो रहा है। पहले देशभर में चर्चित हुए संदेशखाली यौन प्रकरण में टीएमसी नेता का ही नाम आने से ममता बनर्जी को बगलें झांकने को मजबूर होना पड़ा था। एक बार फिर ममता के लिए मुश्किल की शुरुआत टीएमसी के पूर्व विधायक हुमायूं कबीर के उस दावे से हुई, जिसमें उन्होंने पिछले माह छह दिसंबर को पश्चिम बंगाल में बाबरी मस्जिद के निर्माण का शिलान्यास करा दिया। यह कोई साधारण कदम नहीं था, बल्कि एक ऐसा राजनीतिक विस्फोट था, जिसने ममता बनर्जी को असहज कर दिया। वर्षों से तुष्टिकरण की राजनीति के सहारे सत्ता संभालने वाली मुख्यमंत्री इस मुद्दे पर न तो खुलकर विरोध कर सकीं और न ही समर्थन करने का साहस दिखा पाईं। विरोध करतीं तो अपने वोट बैंक से नाराजगी का डर, समर्थन करतीं तो संवैधानिक और राजनीतिक संकट के साथ-साथ बहुसंख्यक वोट बैंक की नाराजगी। परिणामस्वरूप, चुप्पी को रणनीति बना लिया गया।

फरक्का विधायक का जहर और संवैधानिक संस्थाओं पर हमला
ममता बनर्जी की यही चुप्पी ही उनके गले की हड्डी बन गई है। उनकी पार्टी के नेता ही ऐसी हरकतें कर रहे हैं, जो उनके लिए चुनाव में काफी मुश्किलों का कारण बन सकती हैं। दरअसल, अब यह संकट एक और टीएमसी विधायक के बिगड़े बोल से एक बड़े स्तर पर पहुंच चुका गया है। फरक्का से टीएमसी विधायक मोनिरुल इस्लाम ने सीधे-सीधे मुख्य चुनाव आयुक्त को कब्र से खींच लाने की धमकी दे डाली है। दरअसल, मोनिरुल इस्लाम की खुलेआम दी गई धमकी केवल एक बयान नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की आत्मा पर हमला है। चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था के खिलाफ ‘कब्र से बाहर खींच लाने’ जैसी भाषा का प्रयोग यह दर्शाता है कि सत्ताधारी दल के कुछ नेता खुद को कानून से ऊपर समझने लगे हैं। यह वही चुनाव आयोग है, जिसे लोकतंत्र का प्रहरी कहा जाता है, लेकिन बंगाल में उसे खलनायक बनाने की कोशिश की जा रही है।

चुनाव आयोग के खिलाफ ममता सरकार का पुराना नैरेटिव
टीएमसी विधायक मोनिरुल इस्लाम का यह अनर्गल आरोप है कि चुनाव आयोग बंगाल के लोगों को परेशान कर रहा है। जबकि चुनाव आयोग सिर्फ एसआईआर का अपना काम कर रहा है, जिसे अदालत बने भी सही ठहराया है। लेकिन इसको लेकर तृणमूल सरकार के नेता और विधायक ऊल-जलूल बयानबाजी पर उतर आए हैं। दरअसल, यह वही पुराना नैरेटिव है, जिसे ममता बनर्जी बार-बार दोहराती रही हैं। हर संवैधानिक संस्था को ‘बाहरी हस्तक्षेप’ बताना, हर जांच को ‘राजनीतिक साजिश’ कहना। लेकिन जब यही भाषा धमकी और डंडे के जोर पर काम कराने तक पहुंच जाए, तो सवाल उठता है कि क्या यह सरकार लोकतंत्र में विश्वास रखती है या भीड़तंत्र में। ममता बनर्जी खुद भी कुछ दिन पहले आई-पैक पर प्रवर्तन निदेशालय के छापे के दौरान भीड़तंत्र का हिस्सा बनकर मौके पर जा पहुंची थी, और वहां के ग्रीन फाइल समेत कई अहम कागजात उठाकर ले आईँ थीं। इस पर कोर्ट ने भी नाराजगी जताई थी।

महिला सुरक्षा पर शर्मनाक चुप्पी, भ्रष्टाचार का गहराता दलदल

विडंबना यह है कि एक महिला मुख्यमंत्री के नेतृत्व वाले राज्य में महिलाओं के खिलाफ अपराधों के आंकड़े लगातार डराने वाले होते जा रहे हैं। यौन शोषण, बलात्कार, तस्करी और हिंसा के मामलों में पश्चिम बंगाल बार-बार सुर्खियों में रहा है। लेकिन ममता सरकार की प्रतिक्रिया या तो इनकार में होती है या फिर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित रहती है। सत्ता के संरक्षण में पनपता अपराध और उस पर सरकारी चुप्पी इस बात का प्रमाण है कि शासन का संवेदनशील चेहरा अब खोखला हो चुका है। शिक्षक भर्ती घोटाला, कोयला तस्करी, पशु तस्करी, राशन घोटाला—ये कोई आरोप नहीं, बल्कि वे मामले हैं जिनमें ममता सरकार के मंत्री, विधायक और शीर्ष नेता जांच एजेंसियों के घेरे में आ चुके हैं। भ्रष्टाचार अब अपवाद नहीं, बल्कि शासन का स्थायी चरित्र बनता जा रहा है। ऐसे में पार्टी नेताओं की बेलगाम बयानबाज़ी सरकार की कमजोरियों को और उजागर करती है।

जो शांति भंग करे, उसे देखते ही गोली मारो… असम मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने पुलिस को दिया सख्त आदेश: धुबरी में हनुमान मंदिर के बाहर ‘गाय का सिर’ मिलने से भड़का था तनाव


असम के धुबरी ज़िले में बढ़ते सांप्रदायिक तनाव को देखते हुए मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने शुक्रवार (13 जून 2025) को शाम 6 बजे के बाद शूट-एट-साइट यानी देखते ही गोली मारने का आदेश जारी कर दिया।

केंद्रीय गृह मंत्रालय से लेकर मुख्य न्यायाधीश को हर दंगाग्रस्त क्षेत्र के लिए स्थायी रूप से ऐसे आदेश देने चाहिए, क्योकि जब तक जेहादियों को उन्ही की भाषा में जवाब नहीं मिलेगा ये और इनके आका सुरमा भोपाली बने रहेंगे। फिर कोई यह कहने की हिम्मत करेगा कि दंगा बाहरी लोगों ने किया क्योकि गोली का शिकार होने पर स्थानीय ही निकलकर आएंगे कोई बाहरी नहीं। इनके बचाव आने वाले किसी भी मानवाधिकारी और वकीलों के साथ कोर्ट को सख्ती से पेश आकर उन्हें ब्लैकलिस्ट कर देना चाहिए।   

बांग्लादेश सीमा से सटे मुस्लिम-बहुल इस कस्बे में हाल ही में एक समूह ने भड़काऊ पोस्टर लगाने और धार्मिक स्थलों के पास गोमांस के टुकड़े फेंके थे, जिसके बाद माहौल गरमा गया। हालात को काबू में करने के लिए रैपिड एक्शन फोर्स (RAF) और CRPF की तैनाती की जा रही है।

सीएम हिमंता बिस्वा सरमा ने जानकारी दी है कि धुबरी में हनुमान मंदिर के पास फेंके गए गोमांस के टुकड़े पर कार्रवाई करते हुए रात भर में 38 लोग गिरफ्तार किए गए है।

धार्मिक स्थल के पास मिला गोमांस

सीएम हिमंता बिस्वा सरमा के अनुसार, नबीन बांग्ला नामक एक समूह ने धुबरी को बांग्लादेश में मिलाने की माँग करते हुए भड़काऊ पोस्टर लगाए। यह कार्य ‘सांप्रदायिक उकसावे’ के रूप में देखा गया है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार ईद के अगले दिन, हनुमान मंदिर के सामने एक गाय का कटा हुआ सर मिला था, जिसके बाद शहर में तनाव बढ़ गया। रात में पथराव की घटनाएँ भी हुईं। मुख्यमंत्री ने इसे ‘गंदे हथकंडों से माहौल बिगाड़ने’ की साजिश बताया।

सीएम का सख्त संदेश

सीएम सरमा खुद शुक्रवार (13 जून 2025) को धुबरी पहुँचे और कहा, “जो कोई भी धार्मिक स्थलों को नुकसान पहुँचाएगा या पथराव करेगा, उसे तुरंत गोली मारी जाएगी।”

सीएम सरमा ने घोषणा की कि वे अगले साल (2026) ईद पर खुद धुबरी में रहेंगे और ज़रूरत पड़ी तो मंदिर की पहरेदारी भी करेंगे।

‘बीफ माफिया’ पर कार्रवाई का आदेश

सरमा ने दावा किया कि पश्चिम बंगाल से बड़ी संख्या में मवेशी अवैध रूप से धुबरी लाए गए है। सीएम ने इसे भी तनाव की वजह बताते हुए जाँच और गिरफ्तारी के आदेश दिए हैं।

वहीं मामले को देखते हुए RAF, CRPF, और स्थानीय पुलिस की बड़ी तैनाती की जा रही है। व्यापारियों और धार्मिक स्थलों पर CCTV लगाने को कहा गया है। सरकार ज़रूरतमंद मंदिरों और मस्जिदों को कैमरे मुहैया कराएगी।

क्यों है धुबरी संवेदनशील?

धुबरी जिला असम का मुस्लिम-बहुल इलाका है, जहाँ लगभग 90% आबादी मुस्लिम है। बांग्लादेश की सीमा से सटा होने के कारण लंबे समय से यह इलाका अवैध घुसपैठ, पहचान और राजनीतिक विवादों का केंद्र रहा है।

सरमा ने सभी समुदायों से शांति बनाए रखने की अपील की और कहा कि जो भी सांप्रदायिकता फैलाएगा, उसे बख्शा नहीं जाएगा। कानून-व्यवस्था बनाए रखना हमारी प्राथमिकता है।

वाह ऑप इंडिया, पल्टूराम ट्रम्प को दिखा दिया आईना : बीत गए वे दिन जब दुनिया को नचाता था अमेरिका, ‘नया भारत’ किसी के दबाव में नहीं करता समझौते: अपने निर्णयों से पाकिस्तान को लाता है घुटनों पर

भारत की आतंकवाद के विरुद्ध लड़ाई ने कई देशों को हाशिए पर ला दिया है। 2014 लोकसभा चुनावों से पूर्व जिस भारत को विश्व ने कभी गंभीरता से नहीं लेता था, आज वही भारत विश्व को आईना दिखाने की हिम्मत कर रहा है। उसका मुख्य कारण है भारत की वर्तमान मोदी सरकार द्वारा दुनिया को बताया कि तरह आतंकवाद मानव जीवन के लिए नासूर बन रहा है। और पूरी दुनिया को आतंकवादी सप्लाई करने और उनको प्रशिक्षण देने वाला पाकिस्तान है। दुनिया जानती है फिर भी दोगलेपन से बाज नहीं आ रहे। 

IMF से पाकिस्तान को सहायता दिलवाने में आतंकी देश पाकिस्तान का साथ दे रहे हैं फिर कहते हैं 'हम आतंक के खिलाफ हैं', ऐसे देशो को कथनी और करनी में फर्क करना होगा। जो देश आतंकी देश पाकिस्तान को अप्रत्यक्ष रूप से समर्थन कर रहे हैं इस बात को साबित कर रहे है कि वह भारत ही नहीं अपनी उस जनता के भी रक्षक नहीं। 

जहाँ तक पाकिस्तान द्वारा परमाणु की धमकी का सवाल है, चर्चा है कि नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने से लगभग 15/16 महीने बाद ही CIA ने Pentagon को दी अपनी रपट में कहा था कि अब तक पाकिस्तान ही भारत पर आक्रमण करता आया है लेकिन मोदी के आने से परिस्थितियां बदल रही है। मोदी पाकिस्तान को नुक्लेअर इस्तेमाल करने का मौका नहीं देगा। जो वर्तमान परिस्थिति में सच होती दिख रही है। इस अति गंभीर मुद्दे पर प्रस्तुत है ऑप इंडिया की निम्न रपट:-     
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप दावा कर रहे हैं कि भारत के ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारत-पाकिस्तान के बीच गोलीबारी रुकवाने का श्रेय उन्हें मिलना चाहिए। लेकिन उनका यह दावा पूरी तरह गलत और आत्ममुग्धता से भरा है। भारत ने साफ कर दिया है कि ऑपरेशन सिंदूर और उससे जुड़े फैसले पूरी तरह उसके अपने थे, न कि अमेरिका की मध्यस्थता से। भारत ने यह भी बताया कि कोई औपचारिक युद्धविराम हुआ ही नहीं। ऑपरेशन को रोकना भारत का रणनीतिक फैसला था, जो उसकी शर्तों पर लिया गया। अगर पाकिस्तान कोई गलती करता है, तो यह समझौता तुरंत खत्म भी हो सकता है।

भारत ने यह भी स्पष्ट किया कि दोनों देशों के सैन्य अधिकारियों (DGMO) के बीच पहले से बातचीत चल रही थी, और उसी के तहत यह कदम उठाया गया। ऐसे में ट्रंप का दावा कि उन्होंने गोलीबारी रुकवाई, सरासर गलत है। भारत ने अपने राष्ट्रीय हितों और स्वतंत्र नीति के आधार पर यह फैसला लिया, न कि अमेरिकी दबाव में।

ट्रंप ने परमाणु युद्ध रोकने का किया फर्जी दावा, भारत ने किया खारिज

ट्रंप बार-बार कह रहे हैं कि उन्होंने भारत और पाकिस्तान को युद्ध से रोका और एक संभावित परमाणु संघर्ष टाल दिया। अपने बयानों में वह खुद को शांति का ऐसा मसीहा बताते हैं, जिसने अपने शांतिपूर्ण नेतृत्व से एशियाई देशों को राह दिखाई और दुनिया को परमाणु युद्ध बचा लिया। लेकिन यह दावा न सिर्फ बढ़ा-चढ़ाकर किया गया, बल्कि हकीकत से कोसों दूर है।

सऊदी अरब में एक कार्यक्रम में ट्रंप ने फिर यही दावा दोहराया। उन्होंने कहा कि उनके व्यापारिक प्रभाव और शर्तों की वजह से दोनों देश समझौते के लिए तैयार हुए। उनके स्टाफ ने तालियाँ बजाकर और सिर हिलाकर उनका समर्थन किया। ट्रंप यहीं नहीं रुके, उन्होंने तो यह भी कह दिया कि भारत और पाकिस्तान अब इतने अच्छे दोस्त हो गए हैं कि उन्हें जल्द डिनर करना चाहिए। यह बयान भी उनकी उसी पुरानी रणनीति का हिस्सा था, जिसमें वे खुद को वैश्विक संकटों का समाधानकर्ता देखते रहते हैं।

लेकिन भारतीय विदेश मंत्रालय ने 13 मई 2025 को ट्रंप के दावों को खारिज कर दिया। प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि पाकिस्तान को शत्रुता छोड़ने और बातचीत की मेज पर आने के लिए भारत की सैन्य ताकत और सख्त रवैये ने मजबूर किया, न कि किसी विदेशी मध्यस्थता ने। उन्होंने साफ कहा कि भारत अपने फैसले खुद लेता है और अपने हितों के हिसाब से चलता है।

ट्रंप का यह दावा कि उन्होंने व्यापार का इस्तेमाल करके भारत-पाकिस्तान को राजी किया, भी पूरी तरह निराधार है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि भारत-अमेरिका के बीच हुई किसी भी बातचीत में व्यापार का जिक्र तक नहीं हुआ। उन्होंने दो टूक कहा कि यह दावा पूरी तरह निराधार है। उन्होंने कहा कि भारत ने अपने सभी फैसले राष्ट्रीय सुरक्षा और रणनीति के आधार पर लिए, न कि किसी व्यापारिक सौदेबाजी के तहत।

डोनाल्ड ट्रंप के परमाणु युद्ध रोकने के दावे को भी भारत ने खारिज कर दिया। जायसवाल ने उसी प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा, “देखिए, हमारी तरफ से सैन्य कार्रवाई पूरी तरह से पारंपरिक दायरे में थी। कल रक्षा ब्रीफिंग में भी यह साफ तौर पर कहा गया था, जहाँ संबंधित सवालों पर चर्चा की गई थी। हालाँकि, ऐसी खबरें थीं कि पाकिस्तान की नेशनल कमांड अथॉरिटी 10 मई को बैठक करेगी, जो हमने देखी। लेकिन बाद में उन्होंने इसका खंडन किया। पाकिस्तान के विदेश मंत्री ने खुद सार्वजनिक रूप से किसी भी परमाणु पहलू से इनकार किया है।”

तो सवाल यह है कि ट्रंप यह दावा क्यों कर रहे हैं? क्या वे अपने MAGA समर्थकों को खुश करने के लिए खुद को दुनिया का उद्धारक दिखाना चाहते हैं? या उनके सहयोगी उन्हें गलत जानकारी देकर खुश रखना चाहते हैं? ट्रंप के बयान न सिर्फ गलत हैं, बल्कि भारत-पाकिस्तान जैसे जटिल संघर्ष को बेहद सरल और गलत तरीके से पेश करते हैं।

भारत और पाकिस्तान के बीच दशकों पुराने इस संघर्ष की जमीनी हकीकत को नजरअंदाज करते हुए ट्रंप ने इसे ऐसे पेश किया मानो यह उनके हस्तक्षेप से अचानक सुलझ गया हो, जो कि न तो कूटनीतिक रूप से सही है, न ही वास्तविकता के करीब है।

भारत अपने दुश्मन को जानता है, उसे कब और क्या निशाना बनाना है

ट्रंप के बयान कई वजहों से चिंता पैदा करते हैं। उन्होंने भारत और पाकिस्तान को ऐसे दो बेवकूफ देशों की तरह दिखाने की कोशिश की, जो बिना वजह लड़ रहे हैं। यह न सिर्फ अपमानजनक है, बल्कि इस क्षेत्र के संघर्ष की वास्तविक ऐतिहासिक और राजनीतिक जटिलताओं को भी नजरअंदाज करता है।

हैरानी की बात है कि अगर कोई देश बिना ठोस कारण के युद्ध, बमबारी, प्रतिबंध और धमकियों से दुनिया में तनाव बढ़ाता रहा है, तो वह अमेरिका खुद है, खासकर ट्रंप के पिछले कार्यकाल में।

भले ही ट्रंप ने शांति की बातें की हों और व्यापार को प्राथमिकता देने का दावा किया हो, इससे उन्हें भारत की सैन्य रणनीति या कूटनीति को दिशा देने का कोई नैतिक या राजनीतिक अधिकार नहीं मिल जाता। भारत ने ऑपरेशन सिंदूर और उससे जुड़े सभी निर्णय अपने राष्ट्रीय हितों और सुरक्षा प्राथमिकताओं के आधार पर लिए थे, न कि किसी बाहरी दबाव या मध्यस्थता के तहत।

भारत पिछले 75 वर्षों से पाकिस्तान के साथ जटिल और चुनौतीपूर्ण संबंधों को संभाल रहा है। इन दशकों में भारत ने पाकिस्तान के साथ युद्ध लड़े हैं, कई दौर की बातचीत की है, कूटनीतिक प्रयास किए हैं और सीमित व्यापार भी किया है, और यह सब अमेरिका की वजह से नहीं, बल्कि उसके बावजूद किया है।

आज भारत एक सैन्य और रणनीतिक महाशक्ति बन चुका है। उसे ट्रंप और रुबियो जैसे नेताओं से यह सीखने की जरूरत नहीं कि पाकिस्तान से कैसे निपटना है। भारत अच्छे से जानता है कि उसका दुश्मन कौन है, उसे कब और कैसे निशाना बनाना है, और कब रुकना है।

भारत ने लगभग आठ दशकों तक इस पड़ोसी देश के साथ काम किया है। टकराव, संवाद और सामरिक संतुलन के जरिये। सच तो यह है कि पाकिस्तान को भारत से बेहतर कोई नहीं समझता, न अमेरिका, न उसके नेता।

ऑपरेशन सिंदूर का मकसद अपने लक्ष्य को सटीकता से भेदना और रणनीतिक जीत हासिल करना था। मोदी सरकार ने साफ कर दिया है कि अब किसी भी आतंकी हमले को युद्ध की कार्रवाई माना जाएगा। भारत ने पाकिस्तान की पुरानी ‘परमाणु धमकी’ की रणनीति को भी बेअसर कर दिया है।

भारत ने दुनिया को बता दिया कि अब पाकिस्तान यह बहाना नहीं बना सकता कि आतंकी संगठनों पर उसका कोई नियंत्रण नहीं है। हर आतंकी हमले के लिए न सिर्फ आतंकी संगठन, बल्कि पाकिस्तान सरकार और उसकी व्यवस्था भी जिम्मेदार होगी। यह भारत की नई रणनीतिक सोच और सख्त सुरक्षा नीति का हिस्सा है, जो निर्णायक कार्रवाई और स्पष्ट जवाबदेही पर आधारित है।

अगर ट्रंप वाकई स्थिति को समझते, तो उन्हें पता होता कि भारत अपनी जरूरत और रणनीति के हिसाब से पाकिस्तान में लक्ष्यों को निशाना बना सकता है। इसके लिए उसे वाशिंगटन या किसी बाहरी दबाव की जरूरत नहीं।

भारत-पाकिस्तान संघर्ष की जटिलताओं को समझने का दिखावा करना, खासकर जब ट्रंप ‘व्यापार’ को एक लालच के तौर पर पेश करते हैं, यह पश्चिमी शक्तियों की उथली और अहंकारी मानसिकता को दर्शाता है। भारत की सुरक्षा और कूटनीतिक फैसले पूरी तरह से उसकी स्वायत्तता, रणनीतिक समझ और राष्ट्रीय हितों पर आधारित हैं, न कि किसी विदेशी दबाव या मध्यस्थता से।

भारत-पाकिस्तान संघर्ष की जटिल गतिशीलता को समझने का केवल दिखावा करना, और यह मान लेना कि दोनों देश किसी बाहरी नेता के इशारे पर नाच सकते हैं। वह भी ‘व्यापार’ जैसे लालच के माध्यम से पश्चिमी शक्तियों की हल्की-फुलकी और घमंडी सोच को उजागर करता है।

व्यापार एक द्विपक्षीय प्रक्रिया है, न कि कोई परोपकारी कदम। भारत, जिसकी आबादी 1.4 अरब है, आज एक उभरती हुई आर्थिक महाशक्ति है। अमेरिका भारत के साथ व्यापार इसलिए करता है क्योंकि इससे उसे आर्थिक रूप से लाभ होता है, न कि भारत पर किसी दबाव या एहसान के तहत।

ट्रंप का यह दावा कि उन्होंने व्यापार का लालच देकर भारत को सैन्य कार्रवाई रोकने के लिए मजबूर किया, पूरी तरह हास्यास्पद है। ऑपरेशन सिंदूर भारत की एक सफल और निर्णायक कार्रवाई थी। इसके बाद जो भी समझौता हुआ, वह पाकिस्तान के अनुरोध पर और भारत की शर्तों पर हुआ, न कि किसी बाहरी दबाव या व्यापार के लिए।

दुनिया को नियंत्रित करने का भव्य भ्रम, एक खोखले दावे से दूसरे तक चलता हुआ।

यह वही डोनाल्ड ट्रंप हैं जिन्होंने कई बार बड़े दावे किए थे कि वह रूस-यूक्रेन युद्ध को एक ही दिन में खत्म कर देंगे। लेकिन अब उनके दोबारा पदभार संभाले करीब पाँच महीने हो चुके हैं, और युद्ध अभी भी पूरी ताकत से जारी है। उनके दावे एक बार फिर हकीकत से कोसों दूर साबित हुए हैं।

यह वही डोनाल्ड ट्रंप हैं जिन्होंने दावा किया था कि वे हमास को एक ही बार में सभी इज़रायली बंधकों को रिहा करने के लिए मजबूर कर देंगे, और यह भी कहा था कि हमास उनकी ताकत और श्रेष्ठता से काँप रहा है। लेकिन हकीकत यह है कि इज़रायल द्वारा ग़ाज़ा पर लगातार सैन्य हमलों, व्यापक तबाही और हर तरह के कूटनीतिक और सैन्य दबाव के बावजूद, कई बंधक अब भी हमास की हिरासत में हैं। ट्रंप के दावे एक बार फिर ज़मीनी सच्चाई से दूर और खोखले साबित हुए हैं।

यह वही डोनाल्ड ट्रंप हैं जिन्होंने बड़े-बड़े वादे किए थे। कि वे जेफरी एपस्टीन से जुड़ी फाइलें सार्वजनिक करेंगे, अमेरिकी अर्थव्यवस्था को तुरंत सुपर-तेज़ विकास के रास्ते पर ले जाएंगे, और एक जादुई छड़ी की तरह अवैध आव्रजन और देश में बढ़ते हिंसक अपराधों को रोक देंगे। लेकिन हकीकत यह है कि ऐसे मुद्दे बेहद जटिल होते हैं, और इनका समाधान किसी घमंडी राजनेता की सनक या दावे भर से नहीं होता। जमीनी समस्याएँ भाषणों या दिखावे से नहीं, ठोस नीति और गंभीर प्रयासों से हल होती हैं, जो अब तक देखने को नहीं मिले हैं।

जहाँ तक रूस-यूक्रेन युद्ध का सवाल है, यह तय करना पूरी तरह उन देशों के संबंधित नेताओं यूक्रेन के राष्ट्रपति और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन का अधिकार है कि युद्ध को कैसे आगे बढ़ाना है, बातचीत कब और कैसे करनी है, तनाव को कैसे कम करना है और युद्ध को कैसे समाप्त करना है। अमेरिका चाहें तो मध्यस्थता की पेशकश कर सकता है या वार्ता में सहयोग दे सकता है, लेकिन व्लादिमीर पुतिन उसके आदेश मानने के लिए बाध्य नहीं हैं। इस संघर्ष का समाधान केवल संबंधित पक्षों की राजनीतिक इच्छाशक्ति और कूटनीतिक प्रयासों से ही संभव है, न कि बाहरी दबाव या दावों से।

भारत की नीति या सैन्य रणनीति वाशिंगटन पर नहीं है निर्भर

अमेरिका और व्यापक रूप से पूरे पश्चिमी जगत को अक्सर दुनिया को उपदेश देने की आदत है। एक प्रकार का औपनिवेशिक हैंगओवर, जो उन्हें यह भ्रम देता है कि पूरी दुनिया, विशेष रूप से वैश्विक दक्षिण, अब भी उनकी आज्ञा का पालन करने के लिए बाध्य है, जैसे 1800 के दशक में हुआ करता था।

लेकिन भारत एक स्वतंत्र और संप्रभु राष्ट्र है, जिसने आज़ादी के बाद से लगातार जटिल भू-राजनीतिक और सैन्य चुनौतियों का सामना करते हुए अपनी नीति और रणनीति स्वयं तय की है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत और भी अधिक मुखर और आत्मविश्वासी हुआ है, विशेष रूप से अपनी सामरिक क्षमताओं को लेकर।

भारतीय नौसेना आज हिंद महासागर क्षेत्र में एक प्रमुख शक्ति बन चुकी है, चाहे वह सोमालिया के तटों पर समुद्री सुरक्षा सुनिश्चित करना हो या बांग्लादेश के जल क्षेत्रों में प्रभाव बनाए रखना।

भारत क्षेत्रीय और वैश्विक मंच पर अपने हितों की रक्षा करने को तैयार है, बिना किसी बाहरी दबाव के। भारत अमेरिका के साथ दोस्ती और व्यापार का स्वागत करता है, लेकिन यह रिश्ता बराबरी और आपसी सम्मान पर आधारित होना चाहिए, न कि एकतरफा निर्देशों पर।

भारत ने ऑपरेशन सिंदूर और उससे जुड़े फैसलों से साबित कर दिया कि वह अपनी सुरक्षा और रणनीति के मामले में पूरी तरह स्वतंत्र है। भारत-पाकिस्तान के रिश्तों को समझने में अमेरिका या उसके नेताओं की कोई जरूरत नहीं। भारत अपनी ताकत और समझ से हर चुनौती का सामना करने को तैयार है।