ब्रिटेन : पाकिस्तान आतंकिस्तान ही नहीं बलत्कारिस्तान भी; पहली बार ब्रिटैन संसद में बताया गया पाकिस्तान का इस्लाम: 2.5 लाख रेप पीड़िता, 87% आरोपित मुस्लिम और 149+ शहरों में फैला नेटवर्क: 219 पन्नों की ‘रेप गैंग इन्क्वायरी रिपोर्ट’ में सामने आई UK में दशकों से चल रही बर्बरता

                                                                                                                        साभार : सोशल मीडिया 
ब्रिटिश जिस साम्प्रदायिकता/फिरकापरस्ती/हिन्दू-मुस्लिम झगड़ों में भारत को झोंक कर गए थे उसी आग में जलने का अहसास खुद को होने लगा है। किस तरह पाकिस्तान ग्रूमिंग गैंग महिलाओं का बलात्कार कर महिलाओं के जीवन को नर्क बनाने में लगा है। जिसने भरी संसद में पाकिस्तान को इसका इस्लाम बताने को मजबूर कर दिया। आखिर कब तक सरकार अपने देश की महिलाओं का शोषण बर्दाश्त करती रहेगी? सुनने में आ रहा है कि सरकार पाकिस्तानियों को देश से बाहर करने की योजना बना रही है।     
ब्रिटेन (UK) में बरसों से ग्रूमिंग गैंग की समस्या पर रिपोर्ट जारी की गई है। यह 219 पन्नों की ‘रेप गैंग इन्क्वायरी रिपोर्ट’ एक ऐसी कहानी बताती है जिसे पढ़ना भी आसान नहीं है। रिपोर्ट का दावा है कि दशकों तक देश के अलग-अलग शहरों में संगठित गिरोह कमजोर और नाबालिग लड़कियों को निशाना बनाते रहे। रिपोर्ट के अनुसार, इन गिरोहों में 87 प्रतिशत मुस्लिम आदमी शामिल थे और उनका शिकार ज्यादातर ‘श्वेत’ ब्रिटिश लड़कियाँ थीं। जाँच में कहा गया कि यह कोई इक्का-दुक्का अपराध नहीं था, बल्कि पूरे देश में फैला हुआ एक संगठित नेटवर्क था जो वर्षों तक चलता रहा।

रिपोर्ट के मुताबिक लड़कियों को पहले दोस्ती, प्यार, उपहार, शराब, सिगरेट और नशे के जरिए फँसाया जाता था। कई गवाहियों में बताया गया कि 11 से 13 साल तक की बच्चियों को स्कूल के बाहर, देखभाल गृहों और सड़कों से टैक्सियों में ले जाया जाता था। इसके बाद उन्हें घरों, फ्लैटों, होटलों और रेस्टोरेंट तक पहुँचाया जाता था, जहाँ कई आदमी मिलकर बार-बार उनका बलात्कार करते थे। रिपोर्ट में कहा गया है कि कई पीड़िताओं को अलग अलग शहरों में ले जाकर बेचा गया, उनकी वीडियो बनाई गईं, ब्लैकमेल किया गया और उन्हें लगातार डर के माहौल में रखा गया।

सबसे चौंकाने वाला दावा पीड़िताओं की संख्या को लेकर है। रिपोर्ट के अनुसार कम से कम 2.5 लाख श्वेत लड़कियाँ इस तरह के अपराधों का शिकार हुईं। रिपोर्ट में कहा गया है कि इन मामलों में बार बार बलात्कार, सामूहिक बलात्कार, तस्करी, यातना, गर्भावस्था, जबरन गर्भपात, जबरन इस्लामी धर्मांतरण और जीवनरभर का मानसिक आघात शामिल था।

रिपोर्ट में कई पीड़िताओं ने बताया कि उन्हें ‘व्हाइट ट्रैश’ और ‘काफिर’ कहकर अपमानित किया जाता था। जाँच के अनुसार अपराधियों ने गैर मुस्लिम और खासकर गरीब श्वेत लड़कियों को शिकार बनाया। कुछ गवाहियों में यह भी आरोप लगाया गया कि लड़कियों पर इस्लाम कबूलने का दबाव बनाया गया, उन्हें मजहबी तौर-तरीकों का पालन करने के लिए मजबूर किया गया और कुछ मामलों में विदेश में ले जाकर बेच दिया गया।

लेकिन रिपोर्ट सिर्फ अपराधियों पर सवाल नहीं उठाती। उसका सबसे बड़ा आरोप उन संस्थाओं पर है जिनका काम बच्चों की सुरक्षा करना था। रिपोर्ट के अनुसार पुलिस, सामाजिक सेवाएँ, स्कूल, अस्पताल और स्थानीय प्रशासन के पास बार-बार चेतावनी के संकेत पहुँचे। कई मामलों में बच्चियों के साथ हुए अत्याचार के सबूत मौजूद थे, फिर भी कार्रवाई नहीं हुई। जाँच का निष्कर्ष है कि नस्लवाद के आरोप लगने के डर, राजनीतिक दबाव और संस्थागत विफलताओं ने अपराधियों को वर्षों तक खुला छोड़ दिया, जबकि हजारों बच्चियाँ लगातार शोषण का शिकार होती रहीं।

रिपोर्ट क्या है और इसे किसने तैयार किया

यह ‘रेप गैंग इन्क्वायरी रिपोर्ट‘ ब्रिटेन के ग्रेट यारमाउथ से सांसद रुपर्ट लोव के नेतृत्व में गठित स्वतंत्र जाँच समिति द्वारा तैयार की गई है। जाँच का मकसद ब्रिटेन में दशकों से सामने आ रहे ग्रूमिंग गैग्स और बाल यौन शोषण के मामलों की वास्तविक तस्वीर सामने लाना था।

रिपोर्ट तैयार करने के दौरान अदालतों के रिकॉर्ड, आधिकारिक और गैर-आधिकारिक जाँच रिपोर्टों, पीड़ितों की गवाही, विशेषज्ञों के बयान और विभिन्न शहरों से मिले साक्ष्यों का अध्ययन किया गया। जाँच समिति का दावा है कि उसने देशभर से बड़ी संख्या में पीड़ितों, गवाहों और संबंधित लोगों की गवाही दर्ज की।

219 पन्नों की इस रिपोर्ट में ग्रूमिंग गैंग्स के काम करने के तरीके, अपराधियों की पृष्ठभूमि, पीड़ितों के अनुभव, संस्थागत विफलताओं और राजनीतिक प्रतिक्रिया जैसे मुद्दों को विस्तार से शामिल किया गया है। रिपोर्ट का निष्कर्ष है कि यह केवल कुछ स्थानीय मामलों की कहानी नहीं, बल्कि पूरे ब्रिटेन में फैला एक संगठित और लंबे समय तक चलने वाला संकट था।

कैसे लड़कियों को जाल में फँसाया जाता था?

रिपोर्ट के अनुसार ज्यादात मामलों में अपराध की शुरुआत किसी सुनसान जगह या हिंसा से नहीं, बल्कि दोस्ती से होती थी। गिरोह पहले ऐसी लड़कियों की तलाश करते थे जो भावनात्मक रूप से कमजोर हो, परिवार से दूर हों या किसी तरह की परेशानी से गुजर रही हों। उन्हें उपहार, पैसे, मोबाइल फोन, सिगरेट, शराब और नशीले पदार्थ देकर अपने करीब लाया जाता था।

जाँच में कहा गया है कि कई पीड़िताओं को यह विश्वास दिलाया गया कि अपराधी उनसे प्यार करते हैं और उनकी परवाह करते हैं। लेकिन एक बार भरोसा बन जाने के बाद हालात तेजी से बदल जाते थे। रिपोर्ट में दर्ज गवाहियों के मुताबिक लड़कियों को घरों, फ्लैटों, होटों, रेस्टोरेंट और टैक्सियों के जरिए अलग-अलग जगहों पर ले जाया जाता था, जहाँ उनका रेप किया जाता था।

                                    (फोटो साभार: Rape Gang Inquiry Report)

रिपोर्ट में एक जगह कहा गया है कि लड़कियों को अकसर ‘passed between multiple adult men’ यानी कई वयस्क पुरुषों के बीच घुमाया जाता था। कई पीड़िताओं ने बताया कि एक बार गिरोह के कब्जे में आने के बाद उनके साथ बार-बार और कई लोगों द्वारा बलात्कार किया गया। जाँच के अनुसार विरोध करने पर मारपीट, धमकी, ब्लैकमेल और परिवार को नुकसान पहुँचाने की चेतावनी दी जाती थी।

ढाई लाख से ज्यादा लड़कियाँ बनीं शिकार, जुर्म करने वालों में अधिकतर पाकिस्तानी मुस्लिम

रिपोर्ट के अनुसार ब्रिटेन में कम से कम 2.5 लाख श्वेत ब्रिटिश लड़कियाँ ग्रूमिंग गैंग का शिकार बनीं। जाँच में कहा गया है कि इन पीड़िताओं के साथ बार-बार बलात्कार, सामूहिक बलात्कार, तस्करी, यातना, जबरन गर्भधारण, जबरन इस्लामी धर्मांतरण और गंभीर मानिक शोषण हुआ। रिपोर्ट का दावा है कि वास्तविक संख्या इससे भी कहीं अधिक हो सकती है।

अदालत के रिकॉर्ड और आधिकारिक जाँचों का हवाला देते हुए रिपोर्ट में बताया गया है कि ग्रूमिंग गैंग के मामलों में दोषी ठहराए गए लोगों में करीब 87 प्रतिशत के नाम मुस्लिम हैं। हालाँकि जाँच यह भी कहती है कि गिरोहों में शामिल अधिकांष लोग कभी दोषी ठहराए ही नहीं गए।

                                  (फोटो साभार: Rape Gang Inquiry Report)

रिपोर्ट के मुताबिक इन नेटवर्कों में सबसे बड़ी संख्या पाकिस्तानी मूल के मुस्लिम आदमियों की थी। इसके अलावा कुछ मामलों में सोमाली, सीरियाई, ईरानी और तुर्की मूल के मुस्लिम आदमियों के नाम भी सामने आए। ऑक्सफोर्ड इस्लामी कांग्रेगेशन के इमाम डॉ. ताज हार्गे का हवाला देते हुए रिपोर्ट में कहा गया कि ग्रूमिंग गैंग में शामिल मुस्लिम आदमियों की वास्तविक संख्या 95 प्रतिशत हो सकती है।

पूरे ब्रिटेन में फैला था ग्रूमिंग गैंग नेटवर्क

रिपोर्ट के अनुसार ग्रूमिंग गैंग्स का एक जैसा मॉडल ब्रिटेन के दर्जनों शहरों और कस्बों में देखने को मिला। सांसद रूपर्ट लोव के नेतृत्व में हुई इस जाँच में ऐसे सबूत मिलने का दावा किया गया है, जिनसे पता चलता है कि यह नेटवर्क देश के लगभग हर हिस्से तक फैला हुआ था।

                                          (फोटो साभार: Rape Gang Inquiry Report)

जाँच के मुताबिक कम से कम 149 स्थानीय प्रशासनिक क्षेत्रों में ऐसे मामलों के सबूत मिले हैं। रिपोर्ट का कहना है कि यह आँकड़ा दिखाता है कि समस्या किसी एक शहर या कुछ इलाकों तक सीमित नहीं थी, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर फैली हुई थी।

रिपोर्ट में कहा गया कि अदालतों के रिकॉर्ड, विभिन्न जाँच रिपोर्टों और गवाहों की गवाही से एक समान पैटर्न सामने आया। जाँच का निष्कर्ष है कि यह अलग-अलग स्थानीय विफलताओं की कहानी नहीं, बल्कि संगठित बाल यौन शोषण का ऐसा नेटवर्क था जो उत्तर से लेकर दक्षिणी तट तक बार-बार एक जैसे तरीके से संचालित होता रहा।

पीड़िताओं की प्रमुख गवाहियाँ

  • हर दिन यौन शोषण: कई महिलाओं ने बताया कि उनके साथ महीनों और वर्षों तक लगातार बलात्कार हुआ। एक पीड़िता ने कहा, “मेरे साथ हर दिन रेप हुआ, कभी-कभी तो दिन में कई बार भी।”
  • एक से दूसरे व्यक्ति तक पहुँचाया जाता था: गवाहियों के अनुसार लड़कियों को अलग-अलग घरों, होटलों, फ्लैटों और कारों में ले जाया जाता था। रिपोर्ट में कहा गया कि कई पीड़िताओं को वयस्क पुरुषों के बीच इधर से उधर किया जाता था।
  • नस्लीय और मजहबी गालियाँ: कई महिलाओं ने बताया कि उन्हें ‘व्हाइट ट्रैश’ और ‘काफिर’ कहकर तक अपमानित किया जाता था। गवाहियों में बताया गया कि गैर-मुस्लिम होने के कारण उन्हें नीचा दिखाया जाता था। कुछ गवाहियों में कहा गया कि गैर-मुस्लिम होने के कारण उन्हें नीचा दिखाया जाता था।
  • धर्म बदलने का दबाव: कई महिलाओं ने बताया कि उनकी तस्वीरें और वीडियो बनाकर उन्हें चुप रहने के लिए मजबूर किया गया। कुछ को परिवार को नुकसान पहुँचाने और जान से मारने तक की धमकियाँ दी गईं।
  • धमकी और ब्लैकमेल: कई महिलाओं ने बताया कि उनकी तस्वीरें और वीडियो बनाकर उन्हें चुप रहने के लिए मजबूर किया गया। कुछ को परिवार को नुकसान पहुँचाने और जान से मारने तक की धमकियाँ दी गईं।
  • शराब और नशे के जरिए नियंत्रण: पीड़िताओं के अनुसार उन्हें शराब, ड्रग्स और अन्य नशीले पदार्थ दिए जाते थे ताकि वे विरोध न कर सकें और अपराधियों के नियंत्रण में रहें।
  • मदद माँगने पर भी नहीं सुनी गई बात: कई महिलाओं ने कहा कि उन्होंने पुलिस, स्कूलों और सामाजिक सेवाओं से मदद माँगने की कोशिश की, लेकिन उनकी शिकायतों को गंभीरता से नहीं लिया गया। कुछ मामलों में उन्हें ही दोषी मान लिया गया।
  • जिंदगी भर का मानसिक आघात: गवाहियों में अवसाद, डर, आत्महत्या के विचार, रिश्तों में समस्याएँ और जीवनभर बने रहने वाले मानसिक घावों का बार-बार जिक्र मिलता है। रिपोर्ट में बताया गया कि इन अपराधों का असर पीड़िताओं पर आज भी बना हुआ है।

पुलिस, स्कूल और सामाजिक सेवाओं की विफलता

रिपोर्ट का कहना है कि यह सिर्फ अपराधियों की कहानी नहीं है, बल्कि उन संस्थाओं की विफलता की भी कहानी है जिनका काम बच्चों की सुरक्षा करना था। जाँच रिपोर्ट के अनुसार, पुलिस और अन्य सरकारी संस्थाएँ वर्षों तक यह जानती थीं कि बच्चियों के साथ क्या हो रहा है, लेकिन फिर भी समय रहते कार्रवाई नहीं की गई।
पुलिस को बार-बार शिकायतें मिलती रहीं, लेकिन कई मामलों में पीड़िताओं की बातों को नजरअंदाज कर दिया गया। रिपोर्ट में आरोप लगाया गया है कि कुछ मामलों में अपराधियों के खिलाफ कार्रवाई करने के बजाय पीड़ित लड़कियों को ही अपराधी की तरह देखा गया, सबूत नष्ट हुए और कई ज्ञात बलात्कार आरोपित जमानत पर बाहर घूमते रहे।
                                      (फोटो साभार: Rape Gang Inquiry Report)
सामाजिक सेवाओं को लेकर रिपोर्ट और भी गंभीर आरोप लगाती है। जाँच के मुताबिक कई बच्चियों को ऐसे बाल संरक्षण गृहों में रखा गया, जो बाद में शोषण और तस्करी के केंद्र बन गए। रिपोर्ट कहती है कि साफ संकेत मिलने के बावजूद कई मामलों को बंद कर दिया गया और उन लोगों के खिलाफ भी कार्रवाई की गई जिन्होंने इस समस्या को उजागर करने की कोशिश की।
स्वास्थ्य सेवाओं की भूमिका पर भी सवाल उठाए गए हैं। रिपोर्ट के अनुसार अस्पतालों और डॉक्टरों के पास 13 साल तक की बच्चियों में यौन हिंसा के संकेत, यौन संक्रमण, बलात्कार के कारण हुई गर्भावस्था और आत्महत्या के प्रयासों के रिकॉर्ड मौजूद थे। इसके बावजूद कई पीड़िताओं को बिना उचित सुरक्षा व्यवस्था, परामर्श या विशेष देखभाल के वापस उसी माहौल में भेज दिया गया, जहाँ उनका शोषण हो रहा था।
स्कूलों को भी चेतावनी के संकेत दिखाई दे रहे थे। रिपोर्ट में कहा गया है कि कई शिक्षकों ने स्कूल के बाहर बड़ी उम्र के पुरुषों को लड़कियों का इंतजार करते देखा, कुछ मामलों में स्कूल परिसर के अंदर ही बलात्कार की शिकायतें सामने आईं। लेकिन जाँच के अनुसार कई बार पीड़िताओं को सुरक्षा देने के बजाय उन्हें ही स्कूल से निकाल दिया गया या अनुशासनहीन छात्रा मान लिया गया।
                                      (फोटो साभार: Rape Gang Inquiry Report)
रिपोर्ट में बताया गया कि राजनीतिक शुद्धता, नस्लवाद का आरोप लगने का डर और कुछ समुदायों का समर्थन खोने की आशंका ने बच्चों की सुरक्षा को पीछे धकेल दिया। रिपोर्ट में कहा गया है कि कई संस्थाओं ने समस्या का सामना करने के बजाय उससे बचने का रास्ता चुना, जिसका खामियाजा हजारों बच्चियों को भुगतना पड़ा।

रिपोर्ट की सिफारिशें और आगे क्या होगा?

रिपोर्ट का कहना है कि अब केवल पुरानी घटनाओं की जाँच करना पर्याप्त नहीं है। जाँच समिति ने पूरे देश में एक नई राष्ट्रीय सार्वजनिक जाँच शुरू करने की माँग की है, ताकि दशकों से चले आ रहे इस घोटाले की पूरी सच्चाई सामने आ सके और जिम्मेदार लोगों की पहचान की जा सके।
रिपोर्ट में सिफारिश की गई है कि ग्रूमिंग गैंग्स से जुड़े सभी मामलों की दोबारा समीक्षा की जाए और उन अपराधियों की फिर से जाँच हो जो कभी अदालत तक नहीं पहुँचे। इसके अलावा पुलिस, सामाजिक सेवाओं, स्कूलों और स्वास्थ्य विभाग की भूमिका की भी स्वतंत्र जाँच कराने की माँग की गई है, ताकि यह पता चल सके कि चेतावनियों के बावजूद कार्रवाई क्यों नहीं हुई।
                                      (फोटो साभार: Rape Gang Inquiry Report)
जाँच समिति ने पीड़िताओं के लिए विशेष सहायता कार्यक्रम शुरू करने की भी सिफारिश की है। रिपोर्ट के अनुसार हजारों महिलाएँ आज भी मानसिक आघात, अवसाद और अन्य समस्याओं से जूझ रही हैं। इसलिए उन्हें लंबे समय तक मनोवैज्ञानिक, कानूनी और आर्थिक सहायता उपलब्ध कराई जानी चाहिए।
रिपोर्ट यह भी कहती है कि अधिकारियों और राजनीतिक नेताओं को अपराधियों की जातीय या धार्मिक पृष्ठभूमि से जुड़े तथ्यों को छिपाने के बजाय खुलकर सामने रखना चाहिए। जाँच के अनुसार समस्या की सही पहचान किए बिना उसे रोकना संभव नहीं होगा।
आगे क्या होगा, यह काफी हद तक ब्रिटिश सरकार और कानून प्रवर्तन एजेंसियों की प्रतिक्रिया पर निर्भर करेगा। रिपोर्ट का निष्कर्ष है कि यदि इसकी सिफारिशों को लागू नहीं किया गया, तो हजारों पीड़िताओं को न्याय मिलने की संभावना और कमजोर हो सकती है। समिति का कहना है कि अब सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि क्या हुआ था, बल्कि यह है कि इतने वर्षों तक ऐसा होने क्यों दिया गया और भविष्य में इसे कैसे रोका जाएगा।

दशकों से ब्रिटेन में खतरा है ग्रूमिंग गैंग स्कैंडल

ब्रिटेन में 2002 के आसपास पहली बार ग्रूमिंग गैंग से जुड़े मामले उजागर हुए थे, जहाँ पाकिस्तानी मूल के पुरुषों पर इन नाबालिगों के शोषण के आरोप लगे थे। 2010 में यह ग्रूमिंग गैंग स्कैंडर राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बना, जब ब्रिटिश अखबार ‘द टाइम्स’ ने जाँच के बाद अपनी रिपोर्ट में इन बाल यौन शोषण के मामलों का खुलासा किया। उस रिपोर्ट में भी यह सामने आया कि अधिकतर आरोपित मुस्लिम थे और वे कमजोर एवं असुरक्षित परिस्थितियों में रहने वाली लड़िकयों को अपना शिकार बना रहे थे।
अवलोकन करें :-
हाल ही में जून 2026 की शुरुआत में ब्रिटेन की संसद में भी दोबारा से यह मुद्दा उठा था। जब सांसद रुपर्ट लोव ने संसद में ग्रूमिं गैंग की कई पीड़ित महिलाओं और लड़कियों की गवाहियाँ पढ़कर सुनाईं। इन गवाहियों में भी 600-700 आदिमयों ने किया रेप, टूटी बोतलों के टुकड़ों से रेप, पुलिस ऑफिसर द्वारा रेप, नस्लीय आधार पर ब्रिटिश लड़कियों को निशाना बनाने जैसी बेहद दर्दनाक घटनाओं का जिक्र था।

अरफ़ा खानुम, नोमानी और मदनी जैसे लोगों को कहते हुए शर्म भी नहीं आती कि भारत में मुस्लिम डरे हुए हैं

सुभाष चन्द्र 

मुसलमान इतना डरा हुआ है कि जिसे लब्जों में बयां करना मुश्किल है। देखो ना बेचारा जब डरा हुआ है तो लव जिहाद, आतंकवाद और दंगों में मशगूल है, अगर डरा हुआ नहीं होता अल्लाह जाने कितनी दहशत फैली होती। यहाँ तक कि अब तो ब्रिटेन की संसद में पाकिस्तान के इस्लाम को बताने के लिए मजबूर होना पड़ा है। जो अरफ़ा, मदनी और दूसरे कट्टरपंथियों के लिए कहीं डूब मरने वाली बात है। जो मुसलमान ही नहीं इस्लाम को बदनाम कर रहे हैं और अंधभक्त मुसलमान चुपचाप बैठ बेइज्जती बर्दाश्त कर रहा है।    

लेखक 
चर्चित YouTuber 
कुछ दिन पहले महमूद मदनी ने कहा था कि मुसलमान लड़के सड़कों पर चलते हुए भी सुरक्षित महसूस नहीं करते। अब अरफ़ा खानुम शेरवानी ने मोदी को निशाना बनाते हुए कहा है कि “मोदी के भारत में मुसलमान होना, हर दिन अपमान, हर दिन धमकियाँ, हर दिन तकलीफें, एक ऐसी हकीकत है, जिसे लाखों लोग जीने के लिए मजबूर हैं।" यानी ये आपा भी कह रही हैं कि भारत का मुसलमान डरा हुआ है जैसे मदनी ने कहा

कुछ दिन पहले अरफ़ा खानुम ने कहा था कि “हलाला हम करवाते हैं लेकिन दर्द हिंदुओं को क्यों होता है, हलाला एक पवित्र क्रिया है जिसमें हल्ला, शोर शराबा नहीं होता और न पड़ोसियों को परेशानी होती है, इसलिए हलाला को सपोर्ट करें”
अरफ़ा इतना और बता दे कि हलाला क्यों होता है? एक गैर मर्द का बिस्तर गर्म कर वही औरत पाक कैसे हो जाती है?    

ये ऐसी बेशर्म और बेहया औरत है जिसे ऐसी बातें करते हुए शर्म भी नहीं आती। अगर मुसलमान डरे हुए हैं तो बांग्लादेश देश के घुसपैठिये और रोहिंग्या यहाँ ऐसे माहौल में रहने क्यों आये हुए हैं?

इसने तस्लीमा नसरीन के शब्द नहीं पढ़े जिसमें उन्होंने कहा है कि “भारत का मुसलमान देशद्रोही और गद्दार है, मौका मिलते ही भारत को ही खा जाएगा”

मुसलमान डरा हुआ है ये नरेटिव कोई नया नहीं है। हामिद अंसारी 10 साल Vice President  की कुर्सी पर बैठ कर कह गया कि मुसलमानों के लिए भारत में डर का माहौल है। नसीरुद्दीन शाह और आमिर खान कहते नहीं थकते कि भारत का मुसलमान डरा हुआ है। पता नहीं फिर भी बेशर्म भारत में रह रहे हैं।  

एक डरा हुआ मुसलमान, ये शब्द नहीं कह सकता जो AIMPLB के प्रवक्ता सज्जाद नोमानी ने कहे हैं। उसने कहा है कि -”हमने हिंदुओं को सेक्युलर और कम्युनल में विभाजित कर दिया है जिसके कारण हिंदू अब बहुमत में नहीं रह गए। जाट, SC/ST, तमिल, लिंगायत समुदाय के लोग भी हिंदू धर्म का हिस्सा नहीं है” 

मौलाने, फिर तो, मुस्लिम अल्पसंख्यकों को जो अधिकार मिल रहे हैं, वो अब हिंदुओं को मिल जाएं तो पिछवाड़े में आग तो नहीं लगेगी? अबे निकम्मे तू हिंदू कौमों की बात करता है मगर भूल जाता है कि फिर मुसलमानों के 72 फिरके भी मुसलमान नहीं है खासकर पसमांदा तो मुस्लिम हैं ही नहीं। अहमदिया तो तुम वैसे ही मुसलमान नहीं मानते। और ये भी मत भूलें मदनी, अरफ़ा और नोमानी कि आज दुनिया में इस्लाम के मानने वाले पूरी तरह बिखर चुके हैं। ईरान ने सभी सुन्नी देशो को पेल दिया

भारत का मुसलमान इतना डरा हुआ है कि वो 

-उदयपुर के कन्हैया लाल की गर्दन उड़ा देता है;

-अमरावती के उमेश कोल्हे का भी सर तन से जुदा कर देता है;

-बहराइच में मोहम्मद सरफराज दुर्गा पूजा में राम गोपाल मिश्रा का क़त्ल कर देता है;

-कासगंज में डरे हुए मुस्लिम चंदन गुप्ता की हत्या कर देते हैं;

-दिल्ली की खोड़ा कॉलोनी में असद, 17 साल के सूर्य चौहान की ईद पर बलि दे देता है;

-पहलगाम में हिंदुओं की पहचान कर गोलियों से भूनकर 22 निर्दोषों की हत्या कर देता है;

-अल फ़लाह यूनिवर्सिटी की डॉ शाहीन और अनेक डॉक्टर आतंकी बना देता है;

-पुणे का लाखों की सैलरी पाने वाला ज़ुबैर हंगार्गेरकार अलकायदा से मिल कर हमलों की साजिश करता है;

-पुणे का ही Dr. Adnan Ali Sarkar ( specialist in anaesthesiology) ISIS से मिलकर मस्जिदों में हिंसक जिहाद फ़ैलाने की तक़रीर करता है

अरफ़ा खानुम, तुम दिन रात मोदी को कोसते नहीं थकती लेकिन तुम्हारा डरा हुआ मुसलमान मोदी से बिना किसी भेदभाव फ्री राशन लेकर अपने बच्चो का पेट पालता है. पक्के मकान लेता और 5 लाख का फ्री में इलाज भी लेता है लेकिन तुम्हारे भड़काए में मोदी को वोट नहीं देता

उमर खालिद और शरजील इमाम भी डरे हुए थे, उन्होंने दिल्ली को आग में झुलसाने का काम किया था

वैसे सज्जाद नोमानी को बंगाल चुनाव के नतीजे देख लेने चाहिए और वो अब भारत में अन्य राज्यों में दोहराए जाएंगे

टेलीग्राम पर NEET का फर्जी पेपर बेचते 19 साल के छात्र को राजस्थान पुलिस ने किया गिरफ्तार: अभ्यर्थियों से वसूले हजारों रुपए

         एग्जाम से पहले बेच रहा था री-नीट का फर्जी पेपर, आरोपित आकाश गिरफ्तार (फोटो साभार: दैनिक भास्कर)
नेशनल एलिजिबिलिटी कम एंट्रेंस टेस्ट (NEET-UG) के री-एग्जाम ठीक तीन दिन पहले राजस्थान के भीलवाड़ा में पुलिस ने फर्जी प्रश्नपत्र बेचने वाले एक युवक को गिरफ्तार किया है। आरोप है कि 19 वर्षीय छात्र टेलीग्राम चैनल के जरिए अभ्यर्थियों को री-नीट का लीक पेपर देने का झाँसा देकर पैसे वसूल रहा था। आरोपित पहचान छिपाने के लिए विदेशी नेटवर्क और तकनीकी तरीकों का इस्तेमाल कर रहा था। मामले में बैंक लेन-देन, डिजिटल गतिविधियों और संभावित नेटवर्क की जाँच जारी है।

पुलिस के मुताबिक, भारत सरकार के एस-मेक (S-MEC) पोर्टल के माध्यम से विशेष शाखा को सोशल मीडिया पर पेपर लीक से जुड़ी संदिग्ध गतिविधियों की जानकारी मिली थी। इसी दौरान जिला विशेष टीम (DST) को भी सूचना मिली कि भीलवाड़ा के पटेल नगर क्षेत्र में रहने वाला एक युवक ऑनलाइन री-नीट का फर्जी पेपर बेच रहा है।

इनपुट मिलने के बाद पुलिस टीम गठित की गई और 18 जून 2026 की देर रात करीब एक बजे छापेमारी कर आरोपित आकाश चौधरी को उसके घर से हिरासत में लिया गया। जाँच में सामने आया कि आरोपित ने टेलीग्राम पर ‘पेपर माफिया’ नाम से चैनल बना रखा था। पुलिस का दावा है कि वह अमेरिका आधारित VPN नंबर और प्रॉक्सी नेटवर्क के जरिए चैनल संचालित कर रहा था ताकि उसकी पहचान और गतिविधियों को ट्रैक करना मुश्किल हो।

4 हजार में बेचे जा रहे थे पेपर, NEET की किताबों से तैयार करता था सामग्री

प्रारंभिक जाँच में पता चला कि आरोपित प्रत्येक री-नीट पेपर के बदले चार हजार रुपए तक ले रहा था। भुगतान के लिए वह इच्छुक छात्रों को क्यूआर कोड भेजता था और रकम सीधे अपने बैंक खाते में मंगवाता था। पुलिस को उसके टेलीग्राम चैनल पर करीब 52 लोगों के संपर्क में होने की जानकारी मिली है।

पूछताछ के दौरान यह भी सामने आया कि वह नीट की तैयारी से जुड़ी पुस्तकों के पन्ने स्कैन कर उनसे डमी प्रश्नपत्र तैयार करता था और उन्हें असली लीक पेपर बताकर अभ्यर्थियों तक पहुँचाता था। छापेमारी के दौरान पुलिस ने उसका मोबाइल फोन, नीट की तैयारी की किताब और कुछ अन्य दस्तावेज जब्त किए हैं।

जयपुर में कर रहा था तैयारी, अब नेटवर्क और ठगी की रकम की जाँच

आकाश ने स्थानीय स्तर पर पढ़ाई पूरी करने के बाद 12वीं पास की और फिलहाल जयपुर में प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहा था। वह कार्रवाई से दो दिन पहले ही जयपुर से वापस भीलवाड़ा आया था। प्रताप नगर थाना पुलिस ने आरोपित के खिलाफ आईटी एक्ट, धोखाधड़ी और सार्वजनिक परीक्षा अधिनियम सहित संबंधित धाराओं में मामला दर्ज किया है। अब पुलिस मोबाइल से डिजिटल साक्ष्य, बैंक खातों के लेन-देन, संभावित साथियों और इस ठगी से प्रभावित छात्रों की संख्या की जाँच कर रही है।

जय श्रीराम के नारों से गूंज उठा बांग्लादेश; प्रभु श्रीराम की फोटो पर जूते मारने वालो को गिरफ्तार करो; सभी 64 ज़िलों में बनेगा राम मन्दिर

                   राम चित्र अपमान पर ढाका में हिंदुओं का विरोध प्रदर्शन। (फोटो साभार - दिनाजपुर टीवी)
आज भारत के अधिकांश राज्यों में भगवा लहराने का देश पर इतना असर नहीं पड़ा जितना बंगाल में लहराने से पड़ना शुरू हुआ है। बंगाल चुनाव सिर्फ चुनाव नहीं था सनातन का शंखनाद था। बंगाल मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी यदि मुस्तैदी से सनातन विरोधियों पर कार्यवाही करते रहेंगे, बंगाल को घुसपैठ मुक्त करने से इसकी गूंज भारत ही नहीं विश्व में होगी। भारत में आज़ादी की चिंगारी बंगाल से निकली थी। ब्रिटिश सरकार महात्मा गाँधी या कांग्रेस से डरकर नहीं बल्कि बंगाली नेताजी सुभाष चंद्र बोस से डरकर गयी थी। हाथ कंगन को आरसी क्या पढ़े लिखे को फ़ारसी क्या। बंगाल चुनाव के बाद से सनातन विरोधियों की पार्टियां धराशाही हो रही है। दफ्तर में छंटनी का कानून है last come first go शायद यही कानून सनातन विरोधी पार्टियों पर भी अपने आप लागु हो चूका है। 

टीवी पर होनी वाली परिचर्चाओं में मुस्लिम कट्टरपंथी और इनकी समर्थक पार्टियां जब घिर रही होती है तो मुद्दे से भटकाते संविधान की दुहाई देते नज़र आते हैं। अयोध्या राममन्दिर में 200 करोड़ रूपए के घोटाले को जिस तरह उछाला जा रहा है इसके पीछे हिन्दुओं को राममन्दिर से दूर करने का बहुत गहरा षड़यंत्र है। प्रभु श्रीराम द्वारा सच्चाई सामने आने पर हिन्दुओं को बाँटने वाले चाहे वह मीडिया हो या राम विरोधी पार्टियां सब चारों खाने चित होंगे। अगर बंगाल में शुभेंदु अधिकारी शंखनाद कर रहे है तो उत्तर प्रदेश मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी पीछे नहीं रहने वाले।  

बांग्लादेश की राजधानी ढाका शुक्रवार (19 जून) को जय श्री राम के नारों से गूँज उठी। भगवान राम के अपमान के विरुद्ध सैकड़ों की संख्या में सड़क पर उतरकर हिंदुओं ने प्रदर्शन किया। मसाल जुलूस निकालते हुए इस्लामी कट्टरपंथियों पर कार्रवाई के लिए बांग्लादेश की सरकार को 72 घंटे का अल्टीमेटम दिया है। साथ ही कहा है कि देश के सभी 64 जिलों में एक-एक राम मंदिर का निर्माण किया जाएगा।

प्रदर्शनकारी ढाका के शाहबाग चौराहे पर इकट्ठा हुए थे। वहाँ उन्होंने बांग्लादेश सरकार के खिलाफ जमकर नारेबाजी की और न्याय की माँग की। हिंदुओं ने सरकार को दोषियों को पकड़ने के लिए 72 घंटे का अल्टीमेटम दिया है। उन्होंने साफ कहा कि अगर तय समय में कार्रवाई नहीं हुई, तो वे रविवार (21 जून) को धार्मिक मामलों के मंत्रालय को ज्ञापन सौंपेंगे।

64 जिलों में आंदोलन की चेतावनी

मशाल जुलूस में शामिल हिंदुओं ने चेतावनी दी है कि यदि आरोपित गिरफ्तार नहीं हुए, तो आंदोलन पूरे देश में फैलेगा। बांग्लादेश के सभी 64 जिलों में उग्र प्रदर्शन किए जाएँगे। शनिवार (20 जून) को ‘बांग्लादेश पूजा उद्जापन परिषद’ ने भी देशव्यापी विरोध का ऐलान किया है। हिंदुओं का कहना है कि वे हर जिले में भगवान राम का मंदिर बनाकर रहेंगे।

जगह-जगह हुआ विरोध प्रदर्शन

शुक्रवार (19 जून) सुबह भी ढाका में अलग-अलग जगहों पर विरोध प्रदर्शन हुए। हिंदू महाजोत के दो गुटों ने नेशनल प्रेस क्लब और ढाका रिपोर्टर्स यूनिटी में कार्यक्रम किए। प्रेस क्लब के सामने एक बड़ा मानव बंधन बनाया गया। प्रदर्शनकारियों ने प्रधानमंत्री से मिलने और रैलियाँ निकालने की भी योजना बनाई है। उनकी माँग है कि दोषियों को कड़ी सजा दी जाए।
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बांग्लादेश : भगवान राम के पोस्टर पर मारे जूते-चप्पल, जुमे की नमाज के बाद इस्लामी कट्टरपंथियों ने
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भारत में घुसपैठियों को अपना दामाद बनाकर पालने वाले नेताओं और उनकी पार्टियों में लेशमात्र भी शर्म है सभी को एकजुट ह... 

पूरा मामला

रिपोर्ट्स के मुताबिक, रंगपुर डिवीजन के गाइबांधा जिले में भगवान राम का मंदिर और 81 फीट ऊँची प्रतिमा बनाई जा रही थी। कुछ कट्टरपंथी मुस्लिम संगठनों ने इस निर्माण को रुकवा दिया। आरोप है कि प्रदर्शन के दौरान भगवान राम की तस्वीर वाले बैनर पर चप्पलें मारी गईं। इसका Video वायरल हुआ। इस घटना से हिंदू समुदाय की धार्मिक भावनाओं को गहरी ठेस पहुँची है।

‘मेरे साथ फोटो के लिए गिड़गिड़ाईं मेलोनी’: अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के बयान पर तमतमाईं इटली की प्रधानमंत्री ने दिया करारा जवाब

                                       डोनाल्ड ट्रंप और जॉर्जिया मेलोनी (फोटो साभार: ChatGPT)
इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच जुबानी जंग छिड़ गई है। ट्रंप ने हाल ही में दावा किया था कि फ्रांस में हुए जी-7 शिखर सम्मेलन के दौरान मेलोनी ने उनके साथ तस्वीर खिंचवाने के लिए ‘मिन्नतें’ की थीं। ट्रंप ने यह भी कहा था कि उन्होंने मेलोनी के साथ फोटो सिर्फ इसलिए खिंचवाई क्योंकि उन्हें उन पर तरस आ गया था।

 ट्रंप के इस बयान पर मेलोनी ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कहा कि ट्रंप के दावे पूरी तरह मनगढ़ंत हैं और उन्हें यह सुनकर हैरानी हुई। मेलोनी ने कहा, “डोनाल्ड ट्रंप की बातें पूरी तरह झूठी हैं। मैं सचमुच हैरान हूँ। मुझे समझ नहीं आता कि अमेरिका के राष्ट्रपति अपने सहयोगी देशों के साथ ऐसा व्यवहार क्यों करते हैं।”

दरअसल, ट्रंप ने इटली के टीवी चैनल La7 को दिए एक इंटरव्यू में दावा किया था कि मेलोनी उनके साथ फोटो खिंचवाने के लिए बेहद लालायित थीं। उन्होंने कहा था कि मेलोनी उनसे बात करके भी खुश होंगी क्योंकि उन्हें उनसे बात करने की कोई जरूरत नहीं थी। ट्रंप ने यहाँ तक कह दिया कि मेलोनी फोटो के लिए उनसे बार-बार आग्रह कर रही थीं।

हालाँकि जी-7 सम्मेलन के दौरान दोनों नेताओं की बातचीत के वीडियो सामने आए हैं, जिनमें वे काफी देर तक चर्चा करते दिखाई दे रहे हैं। इसी बीच मेलोनी ने ट्रंप पर निशाना साधते हुए कहा कि वह अपने सहयोगियों के प्रति तो सख्त रवैया दिखाते हैं लेकिन पश्चिमी देशों और अमेरिका के विरोधियों के प्रति उतनी कठोरता नहीं दिखाते।

मेलोनी ने अपने जवाब में कहा, “एक बात उन्हें याद रखनी चाहिए, न मैं और न ही इटली कभी किसी के सामने गिड़गिड़ाता है।” विवाद बढ़ने के बाद इटली के विदेश मंत्री एंटोनियो तजानी ने 21 और 22 जून को प्रस्तावित अपनी अमेरिका यात्रा रद्द कर दी। उन्होंने कहा कि ट्रंप की टिप्पणियां गंभीर और अपमानजनक हैं तथा उन्होंने पूरे इटली का अपमान किया है।

तेलंगाना : कांग्रेस शासित राज्य में आधी रात हटाई गई हिन्दू सम्राट छत्रपति शिवाजी की प्रतिमा, विरोध करने पर कई को हिरासत में लिया: प्रशासन बोला- नहीं ली थी लगाने की अनुमति

                            तेलंगाना में छत्रपति शिवाजी महाराज की प्रतिमा हटाई (साभार: magicpin)
कांग्रेस शासित तेलंगाना के हैदराबाद के नेरेडमेट इलाके में गुरुवार (18 जून 2026) की देर रात ग्रेटर हैदराबाद म्युनिसिपल कॉरपोरेशन (GHMC) ने पुलिस बल की मौजूदगी में छत्रपति शिवाजी महाराज की प्रतिमा को हटाने की कार्रवाई की। प्रशासन का कहना है कि प्रतिमा आवश्यक अनुमति के बिना स्थापित की गई थी।

हालाँकि, देर रात भारी सुरक्षा के बीच की गई इस कार्रवाई को लेकर स्थानीय लोगों और समर्थकों ने सवाल उठाए हैं। प्रतिमा हटाने के लिए स्थानीय पुलिस, स्पेशल ऑपरेशंस टीम (SOT) और सशस्त्र पुलिस को तैनात किया गया। मौके पर क्रेन की मदद से प्रतिमा को हटाकर दूसरी जगह ले जाया गया।

अधिकारियों के अनुसार, यह कदम इसलिए उठाया गया क्योंकि प्रतिमा स्थापना के लिए जरूरी मंजूरी नहीं ली गई थी, लेकिन स्थानीय लोगों और समर्थकों का कहना है कि इस तरह देर रात भारी सुरक्षा व्यवस्था के बीच कार्रवाई किए जाने से लोगों की भावनाओं को ठेस पहुँची और प्रशासन को पहले संवाद का रास्ता अपनाना चाहिए था।

गौरतलब बात यह है कि अगर मंजूरी नहीं ली गयी थी, तो रात के अंधेरे में प्रतिमा क्यों हटाई, दिन में क्यों नहीं? क्या यह कदम कांग्रेस द्वारा अपने मुस्लिम वोट बैंक को खुश करने के लिए उठाया है? शिवाजी के इतिहास और मुग़ल आक्रांताओं के विरुद्ध उनकी लड़ाई को मुस्लिम कट्टरपंथियों को नागवार गुजरने की वजह से पाठ्य पुस्तकों से निकाल दिया गया। फिर मुख्यमंत्री कह ही चुके हैं 'Congress is muslim, muslim is congress', यानि अपने वोटबैंक को खुश करने कांग्रेस किसी भी सीमा तक जा सकती है, चाहे हिन्दू सम्राटों के गौरवशाली इतिहास पर धूल ही क्यों ना डालनी पड़े। कांग्रेस को याद रखना चाहिए जो देश अपने इतिहास को भुला देता है उसका पतन निश्चित है।       

विरोध कर रहे लोगों को हिरासत में लिया गया, इलाके में बना तनाव

कार्रवाई के दौरान कुछ लोगों ने प्रतिमा हटाने का विरोध किया और मौके पर जमा होकर इसे रोकने की कोशिश की। इसके बाद पुलिस ने हस्तक्षेप करते हुए कुछ लोगों को हिरासत में लिया। कुछ समय तक इलाके में तनाव का माहौल बना रहा।

प्रशासन ने कहा कि प्रतिमा को सुरक्षित स्थान पर रखा गया है और आगे की कार्रवाई कानून के अनुसार होगी। फिलहाल नेरेडमेट में स्थिति शांतिपूर्ण बताई जा रही है लेकिन इस कार्रवाई को लेकर स्थानीय स्तर पर असंतोष है।

केरल : विधायक फातिमा तहिलिया द्वारा दीपक जलाने पर इस्लामी कट्टरपंथियों ने मचा दिया बवाल… निलाविलक्कु विवाद ; क्या सेक्युलर होने का ठेका सिर्फ हिंदुओं का?

                                                     साभार - इंडियन एक्सप्रेस, विकिपीडिया
केरल में इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (IUML) की महिला विधायक फातिमा तहिलिया के एक रेस्टोरेंट उद्घाटन कार्यक्रम में पारंपरिक तेल का दीपक निलाविलक्कु जलाने पर शुरु हुआ विवाद थमने का नाम ही नहीं ले रहा है।

3 जून 2026 को कोझिकोड में ‘सामस्था केरला जमीय्यतुल उलेमा’ की बैठक में कहा गया था कि मुसलमानों का ऐसे धार्मिक कार्यों में शामिल होना, जिनका इस्लाम में कोई आधार नहीं है, सही नहीं माना जाता।

संगठन ने फातिमा तहिलिया को इस्लाम से बाहर निकालने की धमकी तक दे दी लेकिन आए दिन कट्टरता का ज्ञान देने वाले इस पर शांत बैठे हैं। सेक्युलरिज्म की बातें करने वालों को साँप सूँघ गया है।

सेक्युलरिज़्म तब खत्म होता है जब इस्लाम शुरू होता है: केरल के मुसलमान और गहरे इस्लामीकरण की ओर बढ़ रहे हैं, जबकि हिंदू अपने धर्म को सेक्युलर बनाने में लगे हैं।

केरल में निलाविलक्कु विवाद के बीच यह पहली बार नहीं है जब किसी मुस्लिम संगठन ने मुसलमानों को गैर-मुस्लिम धार्मिक परंपराओं से दूर रहने की सलाह दी हो। ‘सामस्था केरला जमीय्यतुल उलेमा’ पहले भी मुसलमानों को निलाविलक्कु जलाने से बचने की सलाह दे चुका है।
दरअसल, संगठन पर लंबे समय से अधिक कट्टर इस्लामी सोच को बढ़ावा देने के आरोप लगते रहे हैं। फरवरी 2026 में संगठन ने एक प्रस्ताव पास कर मुस्लिम महिलाओं की बढ़ती सार्वजनिक भागीदारी पर चिंता जताई थी। संगठन का कहना था कि महिलाओं को ऐसी गतिविधियों से दूर रहना चाहिए जो उन्हें उनकी ‘मुख्य जिम्मेदारियों’ से भटका सकती हैं।
इससे पहले 2021 में सामस्था से जुड़े छात्र संगठन सामस्था केरल सुन्नी छात्र संगठन (SKSSF) ने केरल से अलग मुस्लिम बहुल ‘मालाबार राज्य’ बनाने की माँग की थी। संगठन की पत्रिका ‘सत्यधारा’ के संपादक अनवर सादिक फैजी ने कहा था कि नया मालाबार राज्य बनाया जाए और उसकी राजधानी कोझिकोड हो। इस माँग के पीछे मालाबार क्षेत्र में मुस्लिम आबादी अधिक होने का तर्क दिया गया था।
2019 में ‘सामस्था केरला जमीय्यतुल उलेमा’ ने महिलाओं के मस्जिद में प्रवेश का विरोध दोहराते हुए कहा था कि महिलाओं को घर पर ही नमाज पढ़नी चाहिए। उस समय संगठन के महासचिव के. अलीकुट्टी मुसलियार ने कहा था कि धार्मिक मामलों में अदालतों का हस्तक्षेप स्वीकार नहीं किया जा सकता और ऐसे मामलों में केवल धार्मिक नेताओं की बात मानी जानी चाहिए।
दिलचस्प बात यह है कि कड़े धार्मिक विचारों के बावजूद सामस्था खुद को केरल का अपेक्षाकृत ‘मध्यमार्गी’ मुस्लिम संगठन बताता है। फरवरी 2026 में संगठन ने जमात-ए-इस्लामी की कथित ‘थियोक्रेटिक’ विचारधारा का विरोध करते हुए उसे ‘चरमपंथी’ करार दिया था।
2022 में सामस्था से जुड़े एक सुन्नी नेता नसर फैजी कूडाथायी ने कुडुम्बश्री स्वयंसेवकों को दिलाई जाने वाली उस संवैधानिक शपथ का विरोध किया था जिसमें मुस्लिम महिलाओं को पिता की संपत्ति में समान कानूनी अधिकार देने की बात कही गई थी। उनका कहना था कि यह कुरान की शिक्षाओं के खिलाफ है क्योंकि इस्लामी उत्तराधिकार नियमों में पुरुषों को महिलाओं की तुलना में दोगुना हिस्सा मिलता है।
केरल में कई मुस्लिम संगठन पहले भी मुसलमानों को ‘ओणम’ में पूरी तरह शामिल न होने की सलाह दे चुके हैं। उनका तर्क रहा है कि ओणम का संबंध महाबली और भगवान विष्णु के वामन अवतार से जुड़ी पौराणिक कथाओं से है। कुछ संगठनों ने कहा कि बहुदेववादी (Polytheistic) या ‘काफिर’ माने जाने वाले समुदायों के त्योहार मनाना ‘शिर्क’ की श्रेणी में आ सकता है।
2016 में कुछ सलाफी प्रचारकों ने खुले तौर पर ओणम और क्रिसमस को मुसलमानों के लिए ‘हराम’ बताया था। उनका कहना था कि इन त्योहारों की जड़ें गैर-इस्लामी धार्मिक मान्यताओं से जुड़ी हैं।
अगस्त 2025 में एक मुस्लिम स्कूल शिक्षिका खादिजा का मामला भी सामने आया था। रिपोर्ट्स के मुताबिक, उन्होंने मुस्लिम छात्रों से ओणम समारोह में हिस्सा न लेने को कहा था। शिक्षिका ने कथित तौर पर कहा था कि मुसलमानों को इस्लाम के अनुसार जीवन जीना चाहिए और ओणम जैसे बहुदेववादी त्योहारों को बढ़ावा नहीं देना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा था कि दूसरे धर्मों की परंपराओं में शामिल होना ‘शिर्क’ की ओर ले जा सकता है।
कुल मिलाकर, केरल में मुस्लिम संगठनों, मौलानाओं और शिक्षकों के बीच मजहबी रीति-रिवाजों को लेकर कड़ा रुख देखने को मिलता रहा है। निलाविलक्कु विवाद के बाद यह बहस फिर तेज हो गई है कि धार्मिक पहचान और सार्वजनिक जीवन में भागीदारी के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।
हाल ही में केरल के पलक्कड़ में बन रही एक अधूरी जिम बिल्डिंग राष्ट्रीय चर्चा का विषय बन गई थी। वजह यह थी कि सोशल मीडिया पर इसे ‘इस्लाम-फ्रेंडली जिम‘ के रूप में प्रचारित किया जा रहा था। जिम के मुस्लिम मालिक नवास मुथु टी ने कहा था कि वह एक ऐसा नया मॉडल लाने जा रहे हैं, जिसमें ‘फिटनेस और आस्था’ को जोड़ा जाएगा और जो इस्लामी रीति-रिवाजों व परंपराओं के अनुसार होगा।
केरल के मुसलमान अपने धर्म का पालन करने को लेकर पूरी स्पष्टता रखते हैं। मुस्लिम संगठन भी यह सुनिश्चित करते हैं कि समुदाय, खासकर युवा, ‘सेक्युलरिज्म’ की तय सीमा से आगे न जाएँ और इस्लामी मान्यताओं से दूर न हों।
इसके उलट, केरल के हिंदुओं के व्यवहार को लेकर भी बहस होती रही है। मलयाली हिंदुओं का एक बड़ा वर्ग दूसरे धर्मों की मान्यताओं को समायोजित करने के लिए अतिरिक्त प्रयास करता है जबकि अन्य समुदाय अपनी मजहबी पहचान को खुलकर सामने रखते हैं। इसी संदर्भ में ओणम के ‘सेक्युलराइजेशन’ या ‘डी-हिंदुइजेशन’ (हिंदू पहचान कमजोर करने) की चर्चा भी होती है।
हालाँकि, ओणम नई फसल से जुड़ा त्योहार माना जाता है लेकिन इसका मुख्य आधार हिंदू धार्मिक कथा है। सदियों से ओणम को राजा महाबली की वापसी के उत्सव के रूप में मनाया जाता रहा है। हाल के वर्षों में इसे केवल एक ‘हार्वेस्ट फेस्टिवल’ यानी फसल उत्सव तक सीमित करके पेश किया जा रहा है। इस प्रक्रिया में ओणम की हिंदू धार्मिक जड़ों को कमजोर किया जा रहा है।
हिंदू त्योहारों के धार्मिक पक्ष को धीरे-धीरे हटाया जा रहा है और उन्हें केवल सांस्कृतिक कार्यक्रम या कार्निवाल की तरह प्रस्तुत किया जा रहा है। गैर-हिंदू समुदाय भी इन परंपराओं को नए तरीके से अपनाने या परिभाषित करने की कोशिश कर रहे हैं।
तमिलनाडु में हिंदू विरोधी द्रविड़ लोग पोंगल या मकर संक्रांति के साथ भी यही कर रहे हैं। वहाँ पोंगल को उसके हिंदू धार्मिक संदर्भ से अलग कर केवल ‘तमिल कृषि पर्व’ के रूप में प्रचारित किया जा रहा है, ठीक वैसे ही जैसे केरल में ओणम को ‘सांस्कृतिक त्योहार’ कहा जाता है।
केरल में एक वर्ग के बीच बीफ (गोमांस) खाने को लेकर भी बहस होती रही है। आलोचक कहते हैं कि कुछ लोग इसे “सेक्युलर पहचान” या “संस्कृति” के प्रतीक के रूप में पेश करते हैं, जबकि हिंदू धार्मिक ग्रंथों में गाय की हत्या और गोमांस खाने का विरोध बताया गया है। वहीं कुछ लोग इसे स्थानीय खानपान, इतिहास और सांस्कृतिक मिश्रण का हिस्सा मानते हैं।
इसी तरह, केरल के हिंदुओं के एक हिस्से के लिए बीफ (गाय का मांस) खाना कूल, दिखावे और सेक्युलरिज्म का सबसे बड़ा उदाहरण बन गया है जबकि वेदों जैसे हिंदू धर्मग्रंथों में गोहत्या और गाय का मांस खाने पर सख्त रोक है। गाय का मांस खाने को ‘हमारे इतिहास, मिली-जुली संस्कृति और खाने का हिस्सा’ बताने की साजिश की जाती है।

यह एक विडंबना है कि रेप करने वाले जिहादी जो प्यार का नाटक करके या नकली धार्मिक पहचान बताकर हिंदू महिलाओं को फँसाते हैं, वे हमेशा हिंदू महिलाओं को गाय का मांस खाने के लिए मजबूर करते हैं। यह काम काफिरों के धर्म का बड़ा मजाक उड़ाने और बेइज्जत करने की इस्लामी सोच का हिस्सा है। वे इन कामों को काफिरों पर इस्लामी जीत के काम के रूप में पसंद करते हैं।

यही ‘सेक्युलर-प्रोग्रेसिव’ लोग तब चुप्पी साध लेते हैं जब कुछ मुस्लिम व्यक्ति या संगठन रूढ़िवादी या विवादित बयान देते हैं और अपने समुदाय के लोगों को उन कामों से दूर रहने को कहते हैं, जिन्हें हिंदू धार्मिक परंपरा या अनुष्ठान मानते हैं। कुछ मौकों पर मुस्लिम संगठन अपनी सुविधानुसार संविधान और सेक्युलरिज्म का सहारा लेते नजर आते हैं, खासकर तब जब धार्मिक अधिकारों या पहचान से जुड़े मुद्दे सामने आते हैं।
एक ओर मुस्लिम समुदाय अपनी धार्मिक मान्यताओं और सिद्धांतों को लेकर बिना समझौते वाला रुख अपनाता है, भले ही उसके कुछ पहलुओं को दूसरे लोग रूढ़िवादी या पिछड़ा मानें। वहीं दूसरी ओर हिंदू समाज का एक हिस्सा दूसरे समुदायों को समायोजित करने को ही अपनी उदारता और बहुलतावाद का प्रतीक मानने लगा है। चाहे चाहें या न चाहें, भारत में सेक्युलरिज्म का बोझ हिंदू समाज ही उठाता है।

शकुनि का लक्ष्य था हस्तिनापुर परिवार का नाश, संजय राउत भी लगा है उद्धव सेना का जड़ से नाश करने के लिए; शरद और अखिलेश की पार्टी में भी कुछ तो गड़बड़ है

सुभाष चन्द्र

विधि का विधान है कि जिस घर में बुजुर्गों का अपमान होता हो, उस परिवार की दुर्दशा कोई नहीं रोक सकता। शिवसेना को अपने खून से सींचने वाले हिन्दुत्व सम्राट कहे जाने वाले बालासाहेब ठाकरे कहते थे कि मर जाऊंगा पार्टी को ख़त्म कर दूंगा लेकिन कांग्रेस से कोई समझौता नहीं करूँगा। लेकिन उनके दुर्योधन पुत्र ने कुर्सी के लालच में कांग्रेस के आगे घुटने टेक बालासाहेब की पार्टी की अर्थी निकाल दी। जो महाराष्ट्र में शिवसेना का दबदबा था इस दुर्योधन ने सब ख़त्म कर दिया। राज ठाकरे का भी सबकुछ ख़त्म। ये सब विनाशकारी संतान के होने के कारण। बुजुर्गों का अपमान करने वाली ऐसी संतान किसी को नहीं मिले।   

सही में कभी कभी लगता है संजय राउत उद्धव की पार्टी में शकुनि का ही काम कर रहा है धृतराष्ट्र पुत्र मोह में फंसे थे और पुत्र के पीछे लगा था शकुनि और इसलिए वो शकुनि से कुछ नहीं कह सकते थे उधर उद्धव ठाकरे भी बिल्कुल धृतराष्ट्र बनकर संजय के हाथों पार्टी का क्षय देख रहे हैं लेकिन वे संजय को क्यों नहीं रोक सकते, इसका कारण समझ से परे है

जून 17 को प्रेस कॉन्फ्रेंस में पत्रकारों के सामने संजय की दो भद्दी गालियां साफ़ सुनी जा सकती थी एक शब्द बोला था BSDK और दूसरा G&U गिरी कल भी यह गाली फिर दी है और अलग होने वाले सांसदों को G&U कहा कई कई बार कहा ऐसा व्यक्ति क्या पब्लिक लाइफ में रहने लायक है? 

लेखक 
चर्चित YouTuber 
गाली तो दी ही उन सांसदों को संजय राउत ने, साथ में यह भी कहा कि “ये लोग बेईमान हैं, बेईमानी उनके खून में है” इसका मतलब आपकी पार्टी ने जानते बुझते हुए पार्टी “बेईमानों” को टिकट दिया क्या टिकट देते वक्त उनके पास “ईमानदारी” का प्रमाणपत्र था?

वैसे गाली बकने का तो संजय राउत का पुराना रिकॉर्ड है जब शिंदे के 40 लोग अलग हुए थे तब उसने धमकी दी थी कि गुवाहाटी से 40 लाशें मुंबई आएंगी कंगना रनौत को “हरामखोर” कहा था और कल शिंदे सेना में शामिल होने वाले सांसदों को संजय राउत ने धमकी दी है कि उनका घर में रहना मुश्किल हो जायेगा इसका मतलब साफ़ है कि वह उनकी हत्या तक करा सकता है इसलिए सरकार ने उन सभी 6 सांसदों को Y प्लस सिक्योरिटी दे दी है

इतना ही नहीं एक और बयान में संजय राउत ने कहा है कितने ही मुग़ल आए लेकिन मोदी सबसे बड़ा “औरंगजेब” बनकर आया है कमोवेश कांग्रेस की “गाली ब्रिगेड” की ही भाषा बोल रहा है बल्कि उनसे भी दो कदम आगे

संजय राउत ने कहा है कि इंडी गठबंधन में शामिल छोटी छोटी पार्टियों को कांग्रेस में शामिल हो जाना चाहिए (Merge कर जाना चाहिए) यानी उद्धव की शिवसेना का अंतिम संस्कार करने का लक्ष्य पूरा हो जायेगा

उधर शरद पवार के 8 सांसदों में भी कुछ गड़बड़ नज़र आ रही है वो भी पार्टी छोड़ कर भाजपा में शामिल होने की फ़िराक़ में हैं शरद पवार ने भी अपने सांसदों की मीटिंग बुलाई है सुप्रिया सुले मोदी के खिलाफ कभी कुछ नहीं बोलती क्योंकि उसे भरोसा है मंत्री बनने का 

अब देखो उत्तर प्रदेश में जहां मंत्री ओपी राजभर ने दावा किया कि अखिलेश के चाचा रामगोपाल यादव ने अमित शाह को पत्र लिखा है कि कुछ समाजवादी पार्टी छोड़ भाजपा के साथ आना चाहते हैं उपमुख़्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने दावा किया है कि 25-26 समाजवादी सांसद पार्टी छोड़ना चाहते हैं और ये लोग 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले अपने आप ही पार्टी छोड़ देंगे

राजभर के दावे पर रामगोपाल यादव ने खंडन करते हुए कहा ये सब बकवास है, उन्होंने कोई पत्र नहीं लिखा लेकिन अमित शाह और उनके कार्यालय में से किसी ने भी अभी तक पत्र मिलने या न मिलने के बारे कुछ नहीं कहा बस यही इंगित करता है कि दाल में कुछ काला जरूर है

ममता बनर्जी की हार के बाद उसकी खुद की पार्टी और बाकी दलों के नेताओं को साफ़ दिखाई देने लगा है कि मोदी के साथ चलकर ही उनका कुछ कल्याण हो सकता है लेकिन मैं फिर कहता हूँ कि ऐसे लोगों को भाजपा में शामिल करना चाहिए क्योंकि अगर अलग रहे तो फिर अपनी अपनी ढपली बजाएंगे और किसी मुद्दे पर सरकार का साथ देंगे और किसी पर विरोध करेंगे अगर पार्टी में शामिल हो गए तो फिर बाहर निकलने का मार्ग बंद हो जाएगा और भाजपा सरकार के हर विधेयक का संसद में समर्थन करना पड़ेगा 

समाजवादी पार्टी के PDA मतलब Parivar Development Authority यानि अखिलेश यादव की प्राइवेट लिमिटेड कंपनी!


कहते हैं "आसमान पर तारे बहुत हैं लेकिन तोड़ने के लिए अक्ल चाहिए" समाजवादी पार्टी वही कर रही है। PDA का नाम देकर खूब जनता को पागल बनाया जा रहा है और जनता बन रही है। PDA का मतलब बताया जाता है "पिछड़ा", "दलित" और "अल्पसंख्यक", जबकि इन लोगों का उद्धार यानि भला करने की बजाए अपने ही परिवार का भला किया। उनकी भावी पीढ़ियों तक के ऐश से रहने और खाने-पीने का इंतज़ाम कर दिया गया है। प्रत्यक्ष को प्रमाण की जरुरत नहीं, जनता देख ले खुली आंख से। फिर भी जनता अंधी बन समाजवादी पार्टी को वोट देती है तो उससे बड़ा अँधा कोई नहीं। 
हिन्दुओं को जातियों में बांट जातिगत आधारित कई पार्टियां बन गयी हैं, लेकिन समाजवादी पार्टी की तरह भला इन पार्टियों के मुखियाओं के परिवारों का हुआ है और हो भी रहा है। हिन्दू है कि इनके मकड़जाल में फंस वोट दे देता है जबकि मुसलमान बीजेपी को हराने एकजुट होकर बीजेपी को हराने वाली पार्टी को वोट देता है। समझदार कौन हिन्दू या मुसलमान?   

           

भारतीय राजनीति में परिवारवाद का मुद्दा हमेशा चर्चा का केंद्र रहा है, लेकिन समाजवादी पार्टी (सपा) को लेकर यह बहस सबसे अधिक इसलिए होती है क्योंकि इस पार्टी के शीर्ष नेतृत्व, संगठन और चुनावी राजनीति में लंबे समय से सैफई परिवार की निर्णायक भूमिका रही है। समाजवादी पार्टी की स्थापना 1992 में समाजवादी विचारधारा और आम कार्यकर्ताओं को राजनीति में आगे लाने के उद्देश्य से हुई थी, लेकिन समय के साथ पार्टी की कमान एक ही परिवार के इर्द-गिर्द सिमटती चली गई। आलोचकों का आरोप रहा है कि पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष से लेकर सांसदों और महत्वपूर्ण चुनावी सीटों तक पर सैफई परिवार का प्रभाव दिखाई देता है। समाजवादी पार्टी में किसी तरह का आंतरिक लोकतंत्र नहीं है, बल्कि यह यादव परिवार की प्राइवेट लिमिटेड कंपनी की तरह काम कर रही है।

परिवार के कई सदस्य लोकसभा, राज्यसभा और विधानसभा तक पहुंचे
मुलायम सिंह यादव के दौर से शुरू हुआ यह राजनीतिक वर्चस्व आज अखिलेश यादव के नेतृत्व में भी जारी है। यादव परिवार के कई सदस्य लोकसभा, राज्यसभा और विधानसभा तक पहुंचे, कई मंत्री बने और पार्टी के संगठन में भी महत्वपूर्ण पदों पर रहे। समाजवादी पार्टी में परिवारवाद इस कदर हावी रहा है कि मुलायम सिंह यादव से लेकर अखिलेश, डिंपल, धर्मेंद्र, अक्षय, आदित्य और तेज प्रताप यादव तक पार्टी की हर सुरक्षित और वीआईपी सीट परिवार के भीतर ही घूमती रहती है। समाजवादी सोच के आधार पर बनी पार्टी के आंतरिक लोकतंत्र का यह हाल है कि साढ़े तीन दशक के बाद भी पार्टी अध्यक्ष मुलायम परिवार के अलावा कोई नहीं बन पाया है।

पांच भाईयों में तीसरे नंबर के मुलायम सिंह थे सबसे तेज
सपा सुप्रीमो रहे मुलायम सिंह यादव के बाबा का नाम मेवाराम था। मेवाराम के दो बेटे थे। सुगहर सिंह और बच्चीलाल सिंह। सुघर सिंह के पांच बेटे थे। इनमें मुलायम सिंह यादव, रतन सिंह, राजपाल सिंह यादव, अभय राम सिंह और शिवपाल सिंह यादव। भाइयों में मुलायम सिंह तीसरे नंबर और शिवपाल सिंह सबसे छोटे हैं। मुलायम सिंह यादव ने दो शादी की है। मुलायम सिंह यादव की पहली पत्नी मालती देवी के बेटे अखिलेश यादव हैं। अखिलेश यादव ने डिंपल यादव से शादी की है। मुलायम की दूसरी पत्नी साधना गुप्ता है। प्रतीक यादव मुलायम की दूसरी पत्नी साधना सिंह के बेटे हैं। प्रतीक का पिछले महीने निधन हो गया। अपर्णा यादव की शादी प्रतीक यादव से हुई थी। इस तरह अपर्णा मुलायम सिंह यादव की दूसरी बहू हैं। मुलायम के भाई, बेटे, भतीजे के अलावा अब इस कुनबे की तीसरी पीढ़ी भी राजनीति के मैदान में है।

शिक्षक से सपा के संस्थापक और मुख्यमंत्री तक का सफर
मुलायम सिंह यादव ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत समाजवादी आंदोलन से की। वर्ष 1967 में पहली बार उत्तर प्रदेश विधानसभा के लिए जसवंतनगर सीट से विधायक चुने गए। आपातकाल के दौरान जेल गए और बाद में उत्तर प्रदेश की राजनीति के प्रमुख नेताओं में शामिल हो गए। 1992 में उन्होंने समाजवादी पार्टी की स्थापना की। वह तीन बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री (1989-91, 1993-95 और 2003-07) रहे। इसके अलावा वे भारत सरकार में रक्षा मंत्री भी बने। मुलायम सिंह यादव कई बार लोकसभा सांसद रहे और लंबे समय तक समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद पर रहे। सपा की राजनीतिक पहचान और संगठन का निर्माण मुख्य रूप से उनके नेतृत्व में हुआ। मुलायम यादव ने ही अयोध्या में कार सेवकों पर बर्बरता से गोलियां चलवाईं थीं। मुलायम सिंह के नक्शेकदम पर चलते हुए उनके पुत्र अखिलेश यादव भी पूरी तरह मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति पर चल रहे हैं।

मुलायम के पांच भाइयों में सबसे बड़े, बेटा बना सांसद
मुलायम के पांच भाइयों में अभयराम सबसे बड़े हैं। धर्मेंद्र यादव उनके बेटे हैं। धर्मेंद्र तीन बार सांसद रह चुके हैं। सबसे पहले 2004 में मैनपुरी से लोकसभा सदस्य चुने गए थे। इसके बाद 2009 और फिर 2014 में बदायूं से जीत हासिल की। 2019 लोकसभा चुनाव में वह हार गए।

मुलायम सिंह के भाई, पौत्र को मैनपुरी से बनाया सांसद
मुलायम सिंह के पांच भाइयों में रतन सिंह दूसरे नंबर पर हैं। मैनपुरी के पूर्व सांसद तेज प्रताप यादव रतन सिंह के पौत्र हैं। तेज प्रताप के पिता रणवीर सिंह हैं। तेज प्रताप ने इंग्लैंड की लीड्स यूनिवर्सिटी से मैनेजमेंट साइंस में एमएससी की है। तेज प्रताप की शादी बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव की बेटी से हुई है। मतलब तेज प्रताप लालू के दामाद भी हैं।

सपा के रणनीतिकार और संगठन के प्रमुख चेहरे
रामगोपाल यादव मुलायम सिंह यादव के चचेरे भाई हैं और समाजवादी पार्टी के प्रमुख रणनीतिकारों में गिने जाते हैं। वे लंबे समय से सपा की राष्ट्रीय राजनीति का अहम हिस्सा रहे हैं। वे कई बार राज्यसभा सांसद चुने गए और पार्टी में राष्ट्रीय महासचिव जैसे महत्वपूर्ण संगठनात्मक पद पर रहे। नीतिगत फैसलों और संसदीय रणनीति तय करने में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण रही है।

संगठन निर्माता और परिवार की राजनीतिक धुरी
शिवपाल सिंह यादव मुलायम सिंह यादव के छोटे भाई हैं और लंबे समय तक उत्तर प्रदेश में सपा संगठन की रीढ़ माने गए। वे कई बार जसवंतनगर विधानसभा सीट से विधायक चुने गए। वे उत्तर प्रदेश सरकार में लोक निर्माण विभाग, सिंचाई और अन्य महत्वपूर्ण मंत्रालयों के मंत्री रहे। 2016 में अखिलेश यादव के साथ राजनीतिक मतभेदों के कारण परिवार में बड़ा संघर्ष सामने आया। बाद में उन्होंने प्रगतिशील समाजवादी पार्टी (लोहिया) बनाई, हालांकि बाद में फिर सपा के साथ राजनीतिक रूप से जुड़े।

विरासत के उत्तराधिकारी और सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष
अखिलेश यादव मुलायम सिंह यादव के पुत्र हैं और सैफई परिवार की दूसरी पीढ़ी के सबसे प्रमुख नेता हैं। उन्होंने 2000 में कन्नौज लोकसभा उपचुनाव जीतकर सक्रिय राजनीति में प्रवेश किया। वर्ष 2004 और 2009 में भी वे कन्नौज से सांसद चुने गए। 2012 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी ने बहुमत प्राप्त किया और अखिलेश यादव 38 वर्ष की आयु में उत्तर प्रदेश के सबसे युवा मुख्यमंत्री बने। 2017 में परिवार के भीतर सत्ता संघर्ष के बाद उन्होंने मुलायम सिंह यादव की जगह समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष का पद संभाला। 2022 में वे करहल विधानसभा सीट से विधायक चुने गए और वर्तमान में विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष हैं।

मुलायम परिवार की बहू से संसद तक का सफर
डिंपल यादव अखिलेश यादव की पत्नी और मुलायम सिंह यादव की पुत्रवधू हैं। उन्होंने पहली बार 2009 में फिरोजाबाद लोकसभा उपचुनाव लड़ा, लेकिन कांग्रेस उम्मीदवार राज बब्बर से हार गईं। 2012 में कन्नौज लोकसभा सीट पर उपचुनाव हुआ, जहां वह सांसद चुनी गईं। 2014 और 2019 में भी कन्नौज से चुनाव लड़ा, लेकिन 2019 में भाजपा उम्मीदवार से हार का सामना करना पड़ा। 2022 में मुलायम सिंह यादव के निधन के बाद खाली हुई मैनपुरी लोकसभा सीट से उपचुनाव जीतकर संसद पहुंचीं और वर्तमान में सांसद हैं।

अखिलेश के चचेरे भाई ने मैनपुरी से जीता पहला चुनाव
धर्मेंद्र यादव मुलायम सिंह यादव के भतीजे और रामगोपाल यादव के पुत्र हैं। उन्होंने 2004 में पहली बार मैनपुरी से लोकसभा चुनाव जीता। वे 2009 और 2014 में बदायूं लोकसभा सीट से सांसद बने। 2019 में भाजपा उम्मीदवार से चुनाव हार गए। 2022 में आजमगढ़ लोकसभा उपचुनाव भी हार गए। इसके बावजूद वे पार्टी के प्रमुख प्रचारकों और रणनीतिक नेताओं में शामिल रहे हैं।

मुलायम के भतीजे का फिरोजाबाद से संसद तक का सफर
अक्षय यादव रामगोपाल यादव के पुत्र और मुलायम सिंह यादव के भतीजे के बेटे हैं। उन्होंने 2014 में फिरोजाबाद लोकसभा सीट से चुनाव जीतकर संसद में प्रवेश किया। 2019 के लोकसभा चुनाव में उन्हें भाजपा उम्मीदवार के खिलाफ हार का सामना करना पड़ा। वे पार्टी की नई पीढ़ी के नेताओं में गिने जाते हैं और समय-समय पर संगठनात्मक गतिविधियों में सक्रिय रहते हैं।

मुलायम के भाई के पौत्र और लालू यादव के दामाद
तेज प्रताप यादव मुलायम सिंह यादव के बड़े भाई रतन सिंह यादव के पौत्र हैं। वे मुलायम सिंह यादव के भतीजे के बेटे हैं। उन्होंने 2014 में मैनपुरी लोकसभा सीट से चुनाव जीता। 2019 में उन्होंने उत्तर प्रदेश की कन्नौज लोकसभा सीट से चुनाव लड़ा लेकिन हार गए। बाद में 2024 के लोकसभा चुनाव में यादव परिवार की पारंपरिक मानी जाने वाली सीटों में उनकी भूमिका फिर चर्चा में रही।

यादव परिवार की नई पीढ़ी की राजनीतिक एंट्री
आदित्य यादव, शिवपाल सिंह यादव के पुत्र हैं और सैफई परिवार की नई राजनीतिक पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करते हैं। वे समाजवादी पार्टी के संगठन में सक्रिय हैं और उन्हें पार्टी की युवा राजनीति का उभरता हुआ चेहरा माना जाता है। वे लंबे समय से पार्टी के कार्यक्रमों और संगठनात्मक गतिविधियों में भाग लेते रहे हैं। सपा में उनकी सक्रियता यह संकेत देती है कि सैफई परिवार की अगली पीढ़ी भी राजनीति में अपनी भूमिका मजबूत कर रही है।

अखिलेश के चचेरे भाई को सपा की युवा ईकाई से जोड़ा
समाजवादी युवजन सभा के पूर्व राष्ट्रीय सचिव अनुराग यादव सैफई परिवार के सदस्य हैं और वे अखिलेश यादव के चचेरे भाई लगते हैं। मुलायम सिंह यादव के छोटे भाई अभय राम यादव के दो पुत्र धर्मेंद्र यादव और अनुराग यादव हैं। अनुराग यादव उर्फ दीपू यादव समाजवादी पार्टी की युवा इकाई समाजवादी युवजन सभा में राष्ट्रीय सचिव रहे हैं। वर्ष 2013 में उन्हें यह संगठनात्मक जिम्मेदारी दी गई थी। वे चुनावी राजनीति में अपने भाई धर्मेंद्र यादव की तरह ज्यादा सक्रिय नहीं रहे, लेकिन पार्टी संगठन और सैफई परिवार की राजनीतिक गतिविधियों में उनकी भूमिका रही है।

राम गोपाल यादव के अपने भांजे को एमएलसी बनाया
एमएलसी अरविंद सिंह यादव भी सैफई परिवार की राजनीतिक शाखा से जुड़े हुए हैं और वे अखिलेश यादव के चचेरे भाई लगते हैं। उनका संबंध मुलायम सिंह यादव के चचेरे भाई और सपा के वरिष्ठ नेता रामगोपाल यादव के परिवार से है। रामगोपाल यादव की बहन गीता देवी हैं। अरविंद सिंह यादव गीता देवी के ही पुत्र हैं। इस प्रकार अरविंद यादव रामगोपाल यादव के भांजे हैं। अरविंद यादव का राजनीतिक सफर स्थानीय स्तर से शुरू हुआ। वे मैनपुरी जिले की करहल ब्लॉक के ब्लॉक प्रमुख रहे। बाद में वे उत्तर प्रदेश विधान परिषद (एमएलसी) के सदस्य बने। वर्ष 2016 में समाजवादी पार्टी के अंदरूनी विवाद के दौरान उनका नाम चर्चा में आया था।

मुलायम के भतीजे को इटावा जिला पंचायत अध्यक्ष बनाया
इटावा जिला पंचायत अध्यक्ष अंशुल यादव सैफई परिवार के सदस्य हैं और वे अखिलेश यादव के चचेरे भाई हैं। वे मुलायम सिंह यादव के सगे छोटे भाई राजपाल यादव के पुत्र हैं। अंशुल यादव लंबे समय से समाजवादी पार्टी की राजनीति में सक्रिय हैं। उन्होंने वर्ष 2015 में इटावा जिला पंचायत अध्यक्ष का चुनाव निर्विरोध जीता। वर्ष 2021 में वे फिर समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार के रूप में इटावा जिला पंचायत अध्यक्ष बने और निर्विरोध निर्वाचित हुए।

अखिलेश की भाभी को सैफई ब्लॉक प्रमुख बनाया
सैफई ब्लॉक प्रमुख मृदुला यादव का संबंध भी मुलायम सिंह यादव के परिवार से है। वह अखिलेश यादव की चचेरी भाभी लगती हैं। वह मुलायम सिंह यादव के बड़े भाई रतन सिंह यादव के पुत्र रणवीर सिंह यादव की पत्नी हैं। रणवीर सिंह यादव मुलायम सिंह यादव के भतीजे थे। मृदुला यादव लंबे समय तक सैफई की स्थानीय राजनीति में प्रभावशाली भूमिका में रहीं। वह सैफई ब्लॉक प्रमुख के पद पर कई बार निर्वाचित हो चुकी हैं। सैफई ब्लॉक पर पिछले लगभग ढाई दशकों से मुलायम सिंह यादव परिवार या उससे जुड़े सदस्यों का प्रभाव रहा है। पहले रणवीर सिंह यादव, फिर धर्मेंद्र यादव, उसके बाद तेज प्रताप यादव और बाद में मृदुला यादव इस पद तक पहुंचे।

अखिलेश की चचेरे भाई सहकारी बैंक के अध्यक्ष बने
इटावा जिला सहकारी बैंक के अध्यक्ष आदित्य यादव का संबंध मुलायम परिवार से है। वह अखिलेश यादव के चचेरे भाई लगते हैं। आदित्य यादव, शिवपाल सिंह यादव के पुत्र हैं और शिवपाल सिंह यादव, मुलायम सिंह यादव के छोटे भाई तथा अखिलेश यादव के चाचा हैं। आदित्य यादव सैफई परिवार की नई पीढ़ी के राजनीतिक चेहरों में शामिल हैं। उन्होंने वर्ष 2010 में जसवंतनगर जिला पंचायत सदस्य का चुनाव लड़कर राजनीतिक शुरुआत की, हालांकि उन्हें हार का सामना करना पड़ा। वर्ष 2016 में उन्हें इटावा जिला सहकारी बैंक की ओर से उत्तर प्रदेश कोऑपरेटिव बैंक और प्रदेशिक कोऑपरेटिव फेडरेशन में प्रतिनिधि चुना गया था। वर्ष 2021 में वे निर्विरोध रूप से इटावा जिला सहकारी बैंक के अध्यक्ष बने। इससे पहले इस पद पर उनके पिता शिवपाल सिंह यादव लगभग 33 वर्षों तक काबिज रहे थे।

अखिलेश की चचेरी बहन इटावा जिला सहकारी बैंक की निदेशक
इटावा जिला सहकारी बैंक की निदेशक डॉ. अनुभा यादव सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव की चचेरी बहन लगती हैं। वह शिवपाल सिंह यादव की पुत्री हैं। शिवपाल सिंह यादव, मुलायम सिंह यादव के छोटे भाई हैं। डॉ. अनुभा यादव की शादी आईएएस अधिकारी अजय यादव से हुई। डॉ. अनुभा यादव सैफई परिवार की उन महिला सदस्यों में शामिल हैं, जिन्हें सहकारी संस्थाओं में जिम्मेदारी मिली। वर्ष 2021 में इटावा जिला सहकारी बैंक के चुनाव में शिवपाल सिंह यादव के परिवार के कई सदस्य निर्विरोध चुने गए थे। इसी चुनाव में डॉ. अनुभा यादव भी बैंक की निदेशक चुनी गई थीं।

मुलायम सिंह यादव के निजी जीवन का महत्वपूर्ण अध्याय
मुलायम सिंह यादव की पहली पत्नी मालती देवी का निधन 2003 में हुआ। इसके बाद साधना गुप्ता के साथ उनके संबंध सार्वजनिक रूप से सामने आए और उन्होंने चुनावी हलफनामों में साधना गुप्ता को अपनी पत्नी के रूप में दर्ज किया। हालांकि साधना गुप्ता ने कभी सक्रिय राजनीति नहीं की, लेकिन सैफई परिवार की आंतरिक राजनीति और उत्तराधिकार की चर्चाओं में उनका नाम कई बार सामने आया। 2022 में उनका निधन हो गया।

राजनीति से दूरी लेकिन परिवार की चर्चित शाखा
प्रतीक यादव साधना गुप्ता के पुत्र हैं और मुलायम सिंह यादव के सौतेले पुत्र के रूप में जाने जाते हैं। उन्होंने सक्रिय राजनीति से दूरी बनाए रखी है और मुख्य रूप से व्यवसाय और फिटनेस के क्षेत्र से जुड़े रहे हैं। प्रतीक कभी चुनावी राजनीति में नहीं आए और न ही समाजवादी पार्टी में कोई संगठनात्मक पद संभाला।

सपा परिवार की बहू लखनऊ से चुनाव लड़कर हारीं
अपर्णा यादव, प्रतीक यादव की पत्नी हैं। उन्होंने 2017 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी के टिकट पर लखनऊ कैंट सीट से चुनाव लड़ा, लेकिन भाजपा की रीता बहुगुणा जोशी से हार गईं। बाद में 2022 में उन्होंने समाजवादी पार्टी छोड़कर भाजपा की सदस्यता ग्रहण कर ली। वर्तमान में वे भाजपा की राजनीति में सक्रिय हैं और विभिन्न सामाजिक व राजनीतिक कार्यक्रमों में भाग लेती हैं।