पश्चिम बंगाल : लश्कर के लिए भर्ती करने वाले आतंकी सैयद इरदीस को 10 साल की सजा, NIA कोर्ट ने माना दोषी: साथी तानिया परवीन को सजा सुनाना बाकी


राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) की एक विशेष अदालत ने 21 जनवरी को सैयद एम इदरीस को 10 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई। चीफ जस्टिस सुकुमार राय ने यह फैसला सुनाया। इदरीस ने प्रतिबंधित आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा के लिए पश्चिम बंगाल में मुस्लिम युवाओं की भर्ती और उन्हें कट्टरपंथी बनाने की पाकिस्तान समर्थित साजिश में अपनी भूमिका स्वीकार कर ली थी। जेल की सजा के साथ-साथ अदालत ने उस पर कुल 70,000 रुपए का जुर्माना भी लगाया है। इस सजा से संबंधित अदालती दस्तावेज ऑपइंडिया (OpIndia) के पास उपलब्ध हैं।

20 जनवरी को अदालत ने इदरीस द्वारा स्वेच्छा से जुर्म कबूल करने की याचिका को औपचारिक रूप से स्वीकार कर लिया। यह मामला एनआईए (NIA) द्वारा साल 2020 में दर्ज की गई एक पुरानी आतंकी साजिश से जुड़ा है। अदालत ने इदरीस को 10 साल जेल की सजा सुनाई है। वहीं, इसी मामले में आरोपित तानिया परवीन और पाकिस्तान में मौजूद दो अन्य आरोपितों के खिलाफ सुनवाई अभी भी जारी है।

दोषी ठहराए जाने के बाद कोर्ट ने सजा सुनाई

मामले की सुनवाई पहले ही शुरू हो चुकी थी, लेकिन 20 जनवरी को इदरीस ने अदालत के सामने अपना जुर्म कबूल करने की इच्छा जताई। अदालत ने उसे जुर्म कबूल करने के कानूनी नतीजों के बारे में जानकारी दी। इसके बाद कोर्ट ने पाया कि इदरीस ने यह फैसला बिना किसी दबाव के, साफ तौर पर और कानूनी पहलुओं को अच्छी तरह समझकर लिया है।

अदालत ने सरकारी और बचाव पक्ष, दोनों की दलीलें सुनीं। कोर्ट ने कहा कि आरोपित पर लगे जुर्म बहुत गंभीर हैं, जिनमें आतंकवादी गतिविधियाँ और भारत सरकार के खिलाफ युद्ध छेड़ने की साजिश शामिल है। इन आरोपों को देखते हुए सख्त सजा देना जरूरी था। हालाँकि, अदालत ने गौर किया कि आरोपित ने अपने किए पर पछतावा जताया है, लेकिन कोर्ट ने साफ किया कि ऐसे मामलों में कड़ी सजा का उद्देश्य दूसरों को डराना और सुधार लाना ही होता है।

मामले की पृष्ठभूमि और FIR का विवरण

इदरीस के खिलाफ यह मामला 18 मार्च 2020 को पश्चिम बंगाल के उत्तर 24 परगना जिले के बादुरिया थाने में दर्ज एक एफआईआर (FIR) से शुरू हुआ था। वहाँ की पुलिस को खुफिया जानकारी मिली थी कि लश्कर-ए-तैयबा के कुछ लोग इंटरनेट के जरिए युवाओं को कट्टरपंथी बनाने और उन्हें गुमराह करने का काम कर रहे हैं।

पुलिस ने इस मामले में भारतीय दंड संहिता (IPC) की कई गंभीर धाराओं के साथ-साथ आतंकवाद विरोधी कानून (UAPA) और आईटी एक्ट के तहत केस दर्ज किया था। इन धाराओं में भारत के खिलाफ साजिश रचने और धोखाधड़ी जैसे आरोप शामिल थे।

चूँकि यह मामला सीमा पार की आतंकी गतिविधियों और देश की सुरक्षा से जुड़ा था, इसलिए 3 अप्रैल 2020 को गृह मंत्रालय ने इसकी जाँच एनआईए (NIA) को सौंपने का आदेश दिया। इसके बाद एनआईए ने 5 अप्रैल 2020 को नए सिरे से केस दर्ज कर इस पूरे मामले की जाँच अपने हाथों में ले ली।

जाँचकर्ताओं द्वारा उजागर की गई LeT साजिश की प्रकृति

जांच में पता चला कि पश्चिम बंगाल में लश्कर-ए-तैयबा का एक गुप्त ग्रुप काम कर रहा था। इस ग्रुप में करीब 20 से 25 लोग शामिल थे। यह लोग पाकिस्तान में बैठे आकाओं के इशारे पर काम कर रहे थे। उनका मुख्य मकसद भारत की एकता, अखंडता और सुरक्षा को नुकसान पहुँचाना था।

इस साजिश के तहत सोशल मीडिया और मैसेजिंग ऐप्स का इस्तेमाल कट्टरपंथी विचारधारा फैलाने और जिहाद का महिमामंडन करने के लिए किया गया। अभियोजन पक्ष के अनुसार, इस मॉड्यूल का काम भोले-भाले युवाओं को पहचान कर उन्हें अपने साथ जोड़ना था। वे समाज में नफरत फैलाने और देश को तोड़ने वाले प्रोपेगेंडा का इस्तेमाल कर रहे थे, ताकि भारत में बड़ी आतंकी घटनाओं को अंजाम दिया जा सके।

दोषी ठहराए गए आरोपित को सौंपी गई भूमिका

जाँच एजेंसी के अनुसार, कर्नाटक के उत्तर कन्नड़ का रहने वाला इदरीस इस साजिश में कोई मामूली सदस्य नहीं था। वह प्रतिबंधित आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा (LeT) का एक सक्रिय कार्यकर्ता था, जो कम से कम 2014 या उससे भी पहले से इस बड़ी साजिश का हिस्सा रहा था।

                                                     सोर्स: कलकत्ता जिला अदालत

अदालत ने गौर किया कि इदरीस ने इंटरनेट और सोशल मीडिया के जरिए भारत और विदेशों में लोगों को लश्कर की गैरकानूनी गतिविधियों के लिए उकसाया, उन्हें सलाह दी और भड़काया। वह ऑनलाइन प्रोपेगेंडा फैलाने, आपसी तालमेल बिठाने और भारत सरकार के खिलाफ युद्ध छेड़ने के इरादे से युवाओं की भर्ती करने जैसे कामों में पूरी तरह शामिल पाया गया।

अभियोजन पक्ष ने यह साबित किया कि इदरीस ने आपराधिक बल के दम पर केंद्र और राज्य सरकारों को डराने की साजिश रची थी। उसने डिजिटल माध्यमों का सहारा लेकर आतंकी उद्देश्यों के लिए समर्थन जुटाने की कोशिश की। इन्हीं गंभीर हरकतों की वजह से उस पर आईपीसी की धाराओं और सख्त आतंकवाद विरोधी कानून (UAPA) के तहत मुकदमा चलाया गया।

अन्य आरोपितों और पाकिस्तान स्थित हैंडलर्स से संबंध

जाँचकर्ताओं ने पाया कि इदरीस, तानिया परवीन के साथ मिलकर काम कर रहा था, जिसे पश्चिम बंगाल मॉड्यूल की मुख्य साजिशकर्ता माना गया है। वह जम्मू-कश्मीर के अल्ताफ अहमद राथर के संपर्क में भी था। मार्च 2020 में पश्चिम बंगाल पुलिस की एसटीएफ (STF) ने बादुरिया में छापेमारी के दौरान तानिया परवीन को गिरफ्तार किया था। उस समय उसके पास से जिहादी किताबें और कई अन्य आपत्तिजनक चीजें बरामद हुई थीं।

जाँच में यह भी पता चला कि तानिया परवीन एक कॉलेज छात्रा थी, जिसे पाकिस्तान में बैठे लश्कर-ए-तैयबा के आतंकियों ने इंटरनेट के जरिए कट्टरपंथी बनाया था। वह सोशल मीडिया पर ऐसे कई कट्टरपंथी समूहों से जुड़ी थी जो आतंकी विचारधारा फैलाते थे। स्थानीय युवाओं को आतंकी ग्रुप में भर्ती करने और सीमा पार बैठे आकाओं से संपर्क बनाए रखने में उसकी मुख्य भूमिका थी।

एनआईए (NIA) ने इस पूरी साजिश में पाकिस्तान में छिपे दो अन्य भगोड़ों की भी पहचान की है। इनके नाम आयशा (उर्फ आयशा बुरहान/आयशा सिद्दीकी/सैयद आयशा) और बिलाल (उर्फ बिलाल दुर्रानी) हैं।

दोष स्वीकार करना और अदालत का फैसला

मुकदमे की सुनवाई के दौरान, 20 जनवरी को इदरीस ने अदालत को बताया कि वह अपना जुर्म कबूल करना चाहता है। इस पर अदालत ने आरोपित से विस्तार से बात की और उसे जुर्म कबूल करने के कानूनी नतीजों के बारे में साफ-साफ समझाया।

जब अदालत को यह यकीन हो गया कि आरोपित बिना किसी दबाव के और पूरी समझ के साथ अपना गुनाह मान रहा है, तब कोर्ट ने उसकी याचिका स्वीकार कर ली। अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि अगर पूरी सावधानी बरती जाए, तो आरोप तय होने के बाद भी जुर्म कबूल करने की याचिका को मंजूर किया जा सकता है।

सजा सुनाने की सुनवाई और प्रस्तुतियाँ

21 जनवरी को सजा सुनाए जाने के दौरान, इदरीस ने अदालत को अपने परिवार के बारे में बताया, जिसमें उसकी पत्नी, बच्चा और बीमार माता-पिता शामिल हैं। उसने अपने किए पर पछतावा जताया और कम सजा देने की अपील की। इदरीस ने यह भी दावा किया कि वह अब समाज की मुख्यधारा में वापस लौटना चाहता है। बता दें कि जब इदरीस को कर्नाटक के उत्तर कन्नड़ से गिरफ्तार किया गया था, तब वह 28 साल का था और अपने भाई के साथ रहता था।

इदरीस के पछतावे को सुनने के बाद भी सरकारी वकील ने उसे कड़ी से कड़ी सजा देने की माँग की। उन्होंने तर्क दिया कि यह मामला आतंकी गतिविधियों से जुड़ा है, जिसका देश की सुरक्षा पर गहरा और बुरा असर पड़ता है। अदालत ने इदरीस और अभियोजन पक्ष, दोनों की बातों पर गौर किया। अंत में कोर्ट इस नतीजे पर पहुँचा कि भारत के खिलाफ युद्ध छेड़ने और एक प्रतिबंधित आतंकी संगठन का साथ देने जैसे गंभीर मामले में किसी भी तरह की ढिलाई या रियायत देना ठीक नहीं होगा।

अदालत द्वारा सुनाया गया विस्तृत फैसला

अदालत ने सैयद एम इदरीस को आईपीसी की विभिन्न धाराओं के तहत 10 साल के सश्रम कारावास (कड़ी कैद) की सजा सुनाई और 10,000 रुपए का जुर्माना भी लगाया। इसके साथ ही, उसे सख्त आतंकवाद विरोधी कानून (UAPA) की धाराओं के तहत 5 साल की जेल और 10,000 रुपए के अतिरिक्त जुर्माने की सजा दी गई है।

                                                             सोर्स: कलकत्ता जिला अदालत

ये सभी सजाएँ एक साथ चलेंगी, यानी उसे अधिकतम 10 साल जेल में बिताने होंगे। कानून के मुताबिक, जाँच और मुकदमे के दौरान इदरीस पहले ही जितना समय हिरासत में बिता चुका है, उसे उसकी कुल सजा की अवधि में से घटा दिया जाएगा।

बाकी आरोपितों के खिलाफ मुकदमे की स्थिति

भले ही इदरीस को उसके जुर्म कबूल करने के आधार पर दोषी ठहराकर सजा सुना दी गई है, लेकिन इस मामले में तानिया परवीन और अल्ताफ अहमद राथर के खिलाफ सुनवाई जारी रहेगी। ये दोनों आरोपित फिलहाल न्यायिक हिरासत में जेल में बंद हैं। इसके अलावा, एनआईए (NIA) ने इस साजिश में शामिल पाकिस्तान में छिपे भगोड़े आरोपितों, आयशा और बिलाल के खिलाफ रेड और ब्लू कॉर्नर नोटिस भी जारी करवा लिए हैं।

सनातन धर्म को ख़त्म करने की बात करना धर्म संहार करने जैसा; मद्रास हाई कोर्ट की जस्टिस श्रीमथी को साधुवाद

सुभाष चन्द्र

उदयनिधि स्टालिन को सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस संजीव खन्ना और जस्टिस दीपांकर दत्ता ने फटकार जरूर लगाई लेकिन साथ ही उनके खिलाफ और कोई केस दर्ज होने पर रोक लगा दी, लेकिन जस्टिस बेला त्रिवेदी और प्रसन्ना बी वराले की पीठ ने उसके खिलाफ FIR दर्ज कराने की अनुमति मांगने वाली याचिका को खारिज कर दिया केवल इसलिए कि वह हाई कोर्ट में दायर होनी चाहिए पीठ ने कहा सुप्रीम कोर्ट पुलिस स्टेशन नहीं बनाना चाहिए मैडम त्रिवेदी भूल गई कि उदयनिधि ने 2023 में केवल तमिलनाडु में सनातन धर्म को ख़त्म करने की बात नहीं की थी जो याचिका केवल हाई कोर्ट में दायर होती, उसके सनातन धर्म को ख़त्म करने का मतलब वैश्विक स्तर पर था और इसलिए सुप्रीम कोर्ट को वह याचिका सुननी चाहिए थी लेकिन जनवरी 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने उसके खिलाफ आपराधिक कार्रवाई करने के लिए दायर 3 याचिकाएं खारिज कर दी - ये सुप्रीम कोर्ट का प्रेम था सनातन धर्म को ख़त्म करने की सनक से। 

लेखक 
चर्चित YouTuber 
तमिलनाडु सरकार ने भाजपा नेता अमित मालवीय के खिलाफ उनके X पर पोस्ट किए गए ट्वीट पर आपराधिक केस दर्ज किया जिसमें उन्होंने उदयनिधि स्टालिन के बयान पर प्रतिक्रिया दी थी मद्रास हाई कोर्ट की जस्टिस श्रीमथी ने कठोर शब्दों में कहा - “पिछले 100 वर्षों से DMK लगातार हिंदू धर्म पर हमला कर रही है और उदयनिधि भी उसी विचारधारा से आते है”

जस्टिस श्रीमथी ने कहा कि - “याचिकाकर्ता, अमित मालवीय ने उदयनिधि के बयानों में छुपे हुए अर्थों की तरफ ध्यान आकृष्ट कराया था” “ माननीय जस्टिस श्रीमती ने कहा -

“यह न्यायालय पीड़ा के साथ वर्तमान स्थिति को दर्ज करता है कि जो व्यक्ति (उदय निधि की ओर संकेत करते हुए) HATE SPEECH  की शुरुआत करते हैं, उन्हें खुला छोड़ दिया जाता है, जबकि ऐसे घृणास्पद भाषण पर प्रतिक्रिया देने वालों को कानून की सख्ती का सामना करना पड़ता है न्यायालय उन लोगों से प्रश्न कर रहे हैं जो प्रतिक्रिया देते हैं, लेकिन उन व्यक्तियों के विरुद्ध क़ानून को सक्रिय नहीं कर रहे हैं जिन्होंने HATE SPEECH की शुरुआत की

उच्च न्यायालय ने यह भी इंगित किया कि तमिलनाडु में मंत्री द्वारा दिए गए घृणास्पद भाषण के लिए उनके विरुद्ध कोई मामला दर्ज नहीं किया गया है, जबकि अन्य राज्यों में कुछ मामले दर्ज किए गए हैं

उच्च न्यायालय ने कहा कि उदयनिधि स्टालिन द्वारा प्रयुक्त शब्दावली वास्तव में नरसंहार (Genocide) का संकेत देती है और HATE SPEECH की श्रेणी में आती है

“यदि सनातन धर्म का पालन करने वाले लोगों का कोई समूह अस्तित्व में नहीं होना चाहिए, तो इसके लिए उपयुक्त शब्द ‘नरसंहार (Genocide)’ है यदि सनातन धर्म को एक धर्म माना जाए, तो यह ‘धर्मसंहार (Religicide)’ होगा इसका अर्थ किसी भी तरीके से या विभिन्न तरीकों से लोगों का उन्मूलन करना भी है, जिनमें पर्यावरण-संहार (Ecocide), तथ्य-संहार (Factocide) और संस्कृति-संहार (Culturicide / सांस्कृतिक नरसंहार) शामिल हैं अतः तमिल वाक्यांश ‘सनातन ओझिप्पु’ का स्पष्ट अर्थ नरसंहार या संस्कृति-संहार होगा ऐसी परिस्थितियों में, याचिकाकर्ता अमित मालवीय द्वारा मंत्री के भाषण पर प्रश्न उठाते हुए किया गया पोस्ट घृणास्पद भाषण नहीं माना जाएगा”

माननीय जज साहिबान के शब्दों को अगर गौर से देखा जाए तो पता चलेगा कि नूपुर शर्मा कैसे हिंदू धर्म और भगवान भोले शंकर के खिलाफ  टीवी चैनल पर “Hate Speech” देने वाले तस्लीम रहमानी के बयान पर प्रतिक्रिया देने के लिए शिकार बनी और सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस जेबी परदीवाला और जस्टिस सूर्यकांत (आज के CJI) ने उसका भयंकर और असहनीय मानसिक शोषण किया

ये हरा-हरा देखने की तलब है या गजवा-ए-हिंद की चाह… सहर के ‘जहर’ के मायने समझते हैं क्या आप?

बिना हिजाब वाली सहर शेख का मुंब्रा को 'ग्रीन' कलर में रंगने वाले बयान में क्या मायने? (साभार: Instagram- saharyunusshaikh)
महाराष्ट्र में ठाणे जिले के मुंब्रा वार्ड में ‘हिजाब वाली’ सहर यूनुस शेख ने नगर निगम चुनाव जीता है। AIMIM के टिकट से नई पार्षद बनीं। 22 साल की सहर शेख ने जीत के बाद विक्टरी स्पीच दी, जो कोई आम भाषण तो बिल्कुल भी नहीं था। मंच से सहर शेख ने कहा कि पूरे मुंब्रा को ‘ग्रीन’ (हरा) रंग से रंगना है। सहर की इस स्पीच का वीडियो वायरल हो रहा है।
सहर की हरा-हरा देखने की तलब से मुस्लिम तुष्टिकरण और सनातन को अपमानित करने वाले विपक्ष की नींद हराम हो गयी है। जिस AIMIM को विपक्ष बीजेपी की B टीम कहता था आज गठबंधन के लिए गुहार लगा रहे हैं। लेकिन मुसलमानों द्वारा हर चुनाव की तरह एकजुट होकर वोट देने से हिन्दुओं में भी एकजुटता की लहर तेज हो गयी है।  

इतना ही नहीं, असुदुद्दीन ओवैसी द्वारा बुर्के वाली को प्रधानमंत्री बनते देखने की लालसा पर टीवी पर परिचर्चाओं में बहुत बड़ा खुलासा हो गया कि परिचचाओं में शामिल किसी भी मौलाना के घरों की महिलाएं बुर्का/हिजाब या नकाब तक नहीं पहनती और अपनी दुकान चलाए रखने के लिए मुसलमान औरतों को बुर्का, हिजाब और नकाब के लिए उकसाते हैं।     

सोशल मीडिया में चर्चा पर बने हुए इस वायरल वीडियो में सहर शेख कहती है, “आने वाले 5 साल बाद भी जब चुनाव होंगे, तो उस चुनाव में भी विरोधियों को मुँहतोड़ जवाब देना है। पूरे मुंब्रा को ग्रीन कलर से ऐसे रंगना है कि इन लोगों को यहाँ से बुरी तरह से पछाड़कर भेजना है। हर एक उम्मीदवार सिर्फ AIMIM का आएगा।”

AIMIM पार्षद सहर शेख के इस बयान को लेकर जहाँ एक तरफ बहस छिड़ी हुई है। वहीं इस बयान के कई मायने भी निकाले जा रहे हैं। खासकर यहाँ ‘ग्रीन’ शब्द को किस संदर्भ में इस्तेमाल किया गया है, यह अब भी सवालों के घेरे में ही है। इस ग्रीन का मतलब क्या लोगों को इस्लाम से जोड़ना है, क्या यहाँ धर्म परिवर्तन की बात हो रही है? क्या मुंब्रा की नई पार्षद सिर्फ हरा-हरा देखना चाहती हैं? जवाब जानने के लिए लोग इसके क्या मायने निकाल रहे हैं, यह जानना जरूरी है।

सोशल मीडिया पर सहर शेख के ‘ग्रीन’ बयान पर प्रतिक्रिया

सहर शेख के इस बयान को सोशल मीडिया पर कुछ लोग हिंदुओं का नामोनिशान हटाने की चेतावनी बता रहे हैं, कोई मुंब्रा को मुस्लिम बहुल इलाका बनने पर चिंता व्यक्त कर रहा है, तो कोई यहाँ ‘ग्रीन’ का मतलब इस्लाम के ‘हरे’ रंग से जोड़कर देख रहा है।

इस बयान पर शिवसेना नेता शाइना एनसी ने कहा है, “सहर शेख युवा नेत्री हैं, वे मुंब्रा में कहती हैं कि वह मुंब्रा को हरा कर देंगी। आपको यह साफ करना चाहिए कि आप पर्यावरण की बात कर रही हैं, जहाँ आप हरा-भरा, साफ-सुथरा माहौल चाहती हैं। अगर ऐसा है, तो आपका बयान स्वीकार्य है। लेकिन अगर आप धर्म, जाति और संस्कृति के आधार पर लोगों को बांट रही हैं, तो यह बहुत दुख की बात है।”

एक्स यूजर हार्दिक कहते हैं, “डेमोग्राफी तेजी से बदल रही है। इनका एजेंडा बिल्कुल साफ है।” वे हिंदुओं को एकजुट होने के लिए कहते हैं, “असली खतरा हमे किससे है वे कोई नहीं देख पा रहा। हिंदुओं अपने धर्म, संस्कृति, धरोहर और विचारधारा का संरक्षण करना है तो समय रहते एक हो जाइए।”

एक और यूजर अभय प्रताप लिखते हैं, “मैडम साहिबा का एजेंडा एकदम से क्लियर है। नगरसेवक का चुनाव जीता है और पूरे क्षेत्र को हरा बना देना है। और ओवैसी के अनुसार एक हिजाबी PM बनेगी तो क्या करेगी?”

बाला नाम के एक्स यूजर ने कहा, “मिलिए 22 साल की AIMIM पार्षद सहर शेख से। ये वो ‘भटके हुए युवा’ नहीं है, इन्हें इस्लाम की अच्छी समझ है। दुख की बात है कि हिंदू अभी तक इस्लाम को नहीं जानते।”

एक और एक्स यूजर दीपा मुखर्जी कहती हैं, “अगर आपको हर चीज को हरा ही करना है, तो जाकर अपने बुजुर्गों की छोड़ी हुई विरासत- पाकिस्तान और बांग्लादेश को ही हरा कर दीजिए। वहाँ पहले से ही हर तरफ हरियाली फैली है, उसे और डुबो दीजिए। भारत को केसरिया ही रहने दीजिए। हमें आप लोगों की यहाँ जरा भी दखलअंदाजी नहीं चाहिए।”

All About Indian नाम से एक्स यूजर कहते हैं, “मिस्टर ओवैसी एक हिजाब पहनने वाली प्रधानमंत्री चाहते थे। लेकिन हम पहले ही देख चुके हैं कि हिजाब पहनने वाली नेता स्थानीय पार्षद बनने पर कैसा व्यवहार करती हैं।”

लोगों की प्रतिक्रियाओं से साफ होता है कि सहर शेख के ‘ग्रीन’ के मायने कुछ भी हों, लेकिन लोग इसे कुछ सकारात्मक तरीके से तो देख नहीं ही रहे हैं। बल्कि यहाँ सहर शेख का मुंब्रा को ‘ग्रीन’ करने का मकसद जरूर जाहिर हो रहा है। सहर शेख ने यह बयान देकर AIMIM में तो अपनी जगह पक्की कर ली है, लेकिन इससे गैर-हिंदू लोग जरूर चिंता में पढ़ गए हैं। ऐसे में पार्टी के ‘नवाब’ असदुद्दीन ओवैसी देश में ‘हिजाब पहनने वाली’ प्रधानमंत्री बनने का ख्वाब देख रहे हैं।

सोशल मीडिया पर ‘ग्रीन’ कलर के मायने

सोशल मीडिया पर सहर शेख के ‘ग्रीन’ शब्द के जो मायने निकाले जा रहे हैं, वे अचानक से नहीं हैं। तमाम खबरें ऐसी आती रही हैं जब इस तरह के बयान देकर नफरत फैलाने के काम सरेआम हुए हैं और जब सवाल उठे तो कह दिया गया- कहने का मतलब कुछ और था।

आपको याद होगा असदुद्दीन ओवैसी के भाई अकबरुद्दीन ओवैसी ने खुलेआम 15 मिनट पुलिस हटाने की बात कही थी और तब उसने साफ कहा था, “हिंदुस्तान में हम 25 करोड़ हैं, तुम 100 करोड़ है ना, ठीक है तुम तो हमसे इतने ज्यादा हो, 15 मिनट पुलिस को हटा लो हम बता देंगे कि किसमें कितना दम है।”

आज ओवैसी ये बोल दें कि उनके भाई के इस बयान में 25 करोड़ का मतलब मुस्लिमों से नहीं था, तो क्या ये बातें बदल जाएँगी? क्या नहीं माना जाएगा कि ये सीधे तौर पर देश में रहने वाले 100 करोड़ हिंदुओं को धमकाने के लिए कहा गया था?

सहर शेख ने आज ओवैसी वाला जहर ही उगला है। बस बात ये है कि वो शब्द नहीं बदल पा रहीं, तो उसके मायने को तोड़-मरोड़ रही हैं। खुद को सेकुलर भी इसीलिए बताया जा रहै है क्योंकि लोग उस बयान का असल मतलब समझकर उनसे सवाल कर रहे हैं। वरना ‘ग्रीन’ रंग से उनकी मंशा क्या थी ये साफ उनके हाव-भाव में पता चल रहा है। अब वो इस हाव-भाव को छिपाने के लिए कुछ भी गढ़ें इससे जनता को क्या… उन्हें जरूरत है उस बयान को याद रखने की जो उन्होंने जीत के नशे में चूर होकर मंच से दिया है।

देखा जाए तो सहर मात्र 22 साल की युवती हैं, लेकिन उनके मुँह से निकला ये जहर हैरान करने वाला नहीं है। इसी सोशल मीडिया पर ऐसे तमाम वीडियो आपको वायरल होते हुए दिखेंगे, जहाँ छोटे-छोटे मुस्लिम बच्चों के मन में गजवा-ए-हिंद का मकसद भर दिया जाता है, वे सरेआम हिंदुस्तान को गाली देते हैं, पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगाते हैं और इसी देश के बहुसंख्यकों को काफिर कहकर जहर उगलते हैं।

सहर शेख के ‘ग्रीन’ कलर के असल मायने

अब सहर शेख के विक्टरी स्पीच पर सवाल उठ रहे हैं तो उन्होंने सफाई दी है कि उन्होंने तो सिर्फ ‘ग्रीन’ शब्द का इस्तेमाल रंग के तौर पर किया था, लेकिन यहीं अगर कोई इस्लामी पैरोकार बैठा होगा तो ये निश्चित है कि उनके सामने ये मायने बदल जाएँगे। उसकी मजहबी सोच के अनुसार, इसके मायने मजहबी सोच का खुला ऐलान है।

भले ही सहर शेख समझा रही हैं कि वो सेकुलर है लेकिन ये इस्लामी पैरोकार लोग ग्रीन को इस्लामी पहचान से जोड़कर देख रहे हैं, और देख रहे हैं उस मुस्लिम पार्टी AIMIM की सोच से, जो आए दिन भड़काऊ बयान देकर कट्टरवादी पैदा करने में लगी रहती है। यहाँ ये लोग सहर शेख को सिर्फ अपना पार्षद मान रहे है, न कि पूरे मुंब्रा क्षेत्र का।

उधर, सहर शेख के इस बयान पर चिंता जाहिर करने वाले वह मुंब्रा के वह लोग हैं, जिन्होंने विकास के मुद्दे पर पार्षद चुना था। वे इस उम्मीद से वोट देने पहुँचे थे कि उनका पार्षद खराब सड़कें ठीक करवाएगा, पानी की समस्या सुलझाएगा, नगर में विकास होगा, लेकिन जीत के बाद स्पीच में उन्हें जरूर अपने नए पार्षद की स्पीच सुनकर मायूसी हाथ लगी होगी। जो मुंब्रा को विकास से नहीं, बल्कि ‘ग्रीन’ कलर की मजहबी सोच से रंगना चाहती हैं।

यह वही मानसिकता है, जो AIMIM की राजनीति की पहचान है। जहाँ असदुद्दीन ओवैसी मंच से भड़काऊ भाषण देने से नहीं चूकते, वहीं अब उनकी पार्टी में नए एडमिशन लेने वाले युवा भी उसी राह पर चल पड़े हैं। इससे साफ जाहिर है कि असदुद्दीन के लोकतंत्र और संविधान की बड़ी-बड़ी बातें करने का मतलब सिर्फ मजहब और एक ही सोच को आगे बढ़ाना है। और यही नतीजा है कि उनकी ‘हिजाब पहनने वाली’ सहर शेख पूरे शहर को ‘ग्रीन’ कलर में रंगना चाहती हैं।

‘अब उपद्रव नहीं, यहाँ उत्सव होते हैं’: UP दिवस से पहले CM योगी ने जनता के नाम लिखी ‘पाती’, कहा- 6 करोड़ लोगों को निकाला गरीबी से बाहर

                                                                                                                                                                                                                    साभार: Mint
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने गुरुवार (22 जनवरी 2025) को प्रदेश की जनता के नाम ‘योगी की पाती’ शीर्षक के साथ भावनात्मक पत्र लिखा। इस पत्र के माध्यम से मुख्यमंत्री ने बीते वर्षों में उत्तर प्रदेश में आए व्यापक बदलावों, सरकार की नीतियों, विकास की उपलब्धियों और भविष्य के संकल्पों को विस्तार से साझा किया।

उन्होंने प्रदेश की उस यात्रा का वर्णन किया, जिसमें उत्तर प्रदेश ने एक समय की बीमारू राज्य की छवि को पीछे छोड़ते हुए आज देश के विकास के प्रमुख ग्रोथ इंजन के रूप में अपनी पहचान बनाई है। पत्र में सुशासन, कानून व्यवस्था, आर्थिक प्रगति, सामाजिक सशक्तिकरण और सांस्कृतिक पुनर्जागरण जैसे विषय प्रमुख रूप से उभरकर सामने आते हैं।

सुशासन और कानून व्यवस्था से बदली प्रदेश की तस्वीर

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अपने पत्र में सबसे पहले प्रदेश में स्थापित कानून और सुशासन की चर्चा की। उन्होंने लिखा कि दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति और स्पष्ट नीतियों के चलते उत्तर प्रदेश में कानून का राज स्थापित हुआ है। पहले जहाँ माफिया और अपराधियों को सत्ता का संरक्षण मिलता था, वहीं अब उनके अवैध साम्राज्यों पर कठोर कार्रवाई की गई है।

उन्होंने लिखा कि बेहतर कानून व्यवस्था के कारण प्रदेश में निवेश का माहौल बदला है। जो निवेशक पहले उत्तर प्रदेश से दूरी बनाते थे, वे अब यहाँ निवेश के लिए उत्सुक हैं। सरकार की पारदर्शी नीतियों और सुरक्षा के भरोसे ने प्रदेश को उद्योग और व्यापार के लिए आकर्षक गंतव्य बना दिया है।

आर्थिक विकास, कृषि और रोजगार की नई दिशा

‘योगी की पाती’ में सीएम ने आर्थिक प्रगति और रोजगार सृजन को विशेष स्थान दिया है। मुख्यमंत्री ने बताया कि कृषि क्षेत्र में उत्तर प्रदेश देश की खाद्य और आय सुरक्षा का मजबूत आधार बना है। ‘बीज से बाजार तक’ की व्यवस्था और सीधे बैंक खातों में भुगतान (DBT) से किसानों की आमदनी में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है।
औद्योगिक विकास के चलते प्रदेश में बड़े पैमाने पर रोजगार के अवसर पैदा हुए हैं। लेबर रिफॉर्म, डी-रेगुलेशन, एमएसएमई को बढ़ावा, कौशल विकास, स्टार्टअप संस्कृति और ODOP (वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट) जैसी योजनाओं ने स्थानीय उत्पादों को वैश्विक पहचान दिलाई है। बेरोजगारी की समस्या के समाधान की दिशा में प्रदेश तेजी से आगे बढ़ रहा है।

सामाजिक सशक्तिकरण और सांस्कृतिक पुनर्जागरण

मुख्यमंत्री ने पत्र में समाज के हर वर्ग के सशक्तिकरण पर भी जोर दिया। महिलाओं की श्रमबल में भागीदारी बढ़ने, बेटियों के जन्म से विवाह तक आर्थिक सहायता, निराश्रित महिलाओं, वृद्धों और दिव्यांगजनों के लिए पेंशन योजनाओं का उल्लेख किया गया।
स्वास्थ्य सेवाओं के क्षेत्र में मेडिकल इंफ्रास्ट्रक्चर के विस्तार और हेल्थ-टेक के जरिए सुविधाएँ आमजन तक पहुँची हैं। जल, थल और नभ कनेक्टिविटी के विकास से व्यापार, पर्यटन और निवेश को नई गति मिली है। साथ ही अयोध्या, काशी, मथुरा से लेकर संभल तक सांस्कृतिक चेतना और परंपराओं का पुनर्जागरण हो रहा है।
मुख्यमंत्री ने यह भी बताया कि जीरो पॉवर्टी के लक्ष्य के साथ करोड़ों लोगों को गरीबी से बाहर निकाला गया है। उन्होंने लिखा, “हमने जीरो पॉवटी लक्ष्य के साथ 6 करोड़ से अधिक लोगों को गरीबी से बाहर निकाला है। डबल इंजन सरकार ने प्रदेश को ‘बॉटलनेक से ब्रेक’, ‘रेवेन्यू डेफिसिट से रेवेन्यू सरप्लस’ एवं ‘उपद्रव से उत्सव की ओर अग्रसर किया है।”
अंत में उन्होंने 24 जनवरी को मनाए जाने वाले उत्तर प्रदेश दिवस के अवसर पर विकसित उत्तर प्रदेश के संकल्प को दोहराते हुए प्रदेशवासियों को शुभकामनाएँ दीं।
बता दें कि साल 2026 में उत्तर प्रदेश 77 साल पूरे होने का जश्न मनाएगा। 24 जनवरी 1950 को संयुक्त प्रांत का नाम अधिकारिक तौर पर बदलकर ‘उत्तर प्रदेश’ कर दिया गया था। इस दिन को प्रदेशवासी ‘उत्तर प्रदेश दिवस’ के रूप में मनाते हैं। पहली बार इसे आधिकारिक रूप से प्रदेश में BJP सरकार आने के बाद जनवरी 2018 में मनाया गया था।

वीणा की नाद, माँ सरस्वती का आशीर्वाद और प्रकृति में उल्लास: क्यों बसंत पंचमी केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि भारतीय चेतना का उत्सव है

                   बसंत पंचमी: पीले रंग की आभा में ज्ञान, कला और संस्कृति का उत्सव (फोटो साभार: AI)
पश्चिमी सभ्यता के आगे नतमस्तक होकर भारतीय अपने सनातन धर्म के महत्व को भूल गए। हमारे त्यौहार केवल एक त्यौहार नहीं बल्कि आने वाली ऋतु का संकेत देते हैं, जो विश्व के किसी भी धर्म/मजहब में नहीं। हिन्दू नववर्ष भी चैत्र मास में नवरात्रों से प्रारम्भ होता है यानि देवी आराधना से।    

भारतीय परंपरा में त्योहार केवल कैलेंडर की तारीख नहीं होते, बल्कि वे प्रकृति, जीवन और चेतना के साथ गहरे संवाद का माध्यम होते हैं। बसंत पंचमी ऐसा ही एक पर्व है, जो मौसम के बदलाव से कहीं आगे जाकर मनुष्य के भीतर नई ऊर्जा, नई संवेदनशीलता और नई दृष्टि का संचार करता है।

यह पर्व माघ मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मनाया जाता है और इसे माघ पंचमी या श्री पंचमी भी कहा जाता है। हिंदू चूँकि इस पर्व के बाद के समय को शुभ कार्यों, नई शिक्षा, गृह प्रवेश, व्यवसाय आरंभ और विद्यारंभ के लिए अत्यंत मंगलकारी मानते हैं इसलिए इसे ‘बसंत पंचमी’ के तौर पर भी जाना जाता है। यहाँ ‘बसंत’ का अर्थ सिर्फ ऋतु से नहीं, बल्कि इसका तात्पर्य जीवन में गति के आगमन से है।

बसंत पंचमी: ऋतु परिवर्तन नहीं, जीवन में गति का आगमन

बसंत पंचमी केवल ठंड के अंत और गर्मी की शुरुआत का संकेत नहीं है, बल्कि यह ठहराव से गति की ओर बढ़ने का पर्व है। शीत ऋतु को भारतीय दर्शन में निष्क्रियता और जड़ता का समय माना गया है, जबकि बसंत सक्रियता, सृजन और विस्तार का प्रतीक है।

प्रकृति के साथ-साथ मानव जीवन भी इस परिवर्तन से प्रभावित होता है। मन अधिक उत्साही होता है, भावनाएँ प्रबल होती हैं और जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण विकसित होता है। यही कारण है कि बसंत पंचमी को शुभ कार्यों, नई शिक्षा, गृह प्रवेश, व्यवसाय आरंभ और विद्यारंभ के लिए अत्यंत मंगलकारी माना गया है।

सृष्टि में वाणी और ज्ञान का अवतरण

पौराणिक मान्यता के अनुसार, जब ब्रह्मा ने सृष्टि की रचना की, तब संसार दृश्य रूप में तो मौजूद था, लेकिन उसमें ध्वनि, संवाद और अभिव्यक्ति का अभाव था। चारों ओर मौन और निस्तब्धता छाई हुई थी। इस अपूर्णता को देखकर ब्रह्मा संतुष्ट नहीं थे।

भगवान विष्णु की अनुमति से ब्रह्मा ने अपने कमंडल से जल छिड़का। जैसे ही जल धरती पर गिरा, उसमें कंपन उत्पन्न हुआ और एक दिव्य शक्ति प्रकट हुई। यह शक्ति थीं माँ सरस्वती, जिनके हाथों में वीणा, पुस्तक, माला और वर मुद्रा थी।

जब देवी ने वीणा का नाद किया, तब सृष्टि को वाणी प्राप्त हुई। पशु-पक्षी, मनुष्य, जल और वायु, सबमें ध्वनि और चेतना का संचार हुआ। इसी दिन को बसंत पंचमी माना गया और इसे सरस्वती जयंती के रूप में प्रतिष्ठा मिली।

माँ सरस्वती: विद्या से आगे विवेक की अधिष्ठात्री

भारतीय संस्कृति में ज्ञान को केवल सूचना या डिग्री तक सीमित नहीं माना गया। माँ सरस्वती उस ज्ञान की प्रतीक हैं जो मनुष्य को अधिक शांत, अधिक विचारशील और अधिक संवेदनशील बनाता है। ऋग्वेद में सरस्वती को चेतना की प्रवाहमान धारा कहा गया है, जो मनुष्य की बुद्धि, प्रज्ञा और आचार का आधार बनती है।

इसी कारण इस दिन विद्यार्थी, शिक्षक, लेखक, कवि, कलाकार और संगीतकार विशेष रूप से माँ सरस्वती की आराधना करते हैं। परंपरागत रूप से बसंत पंचमी को बच्चों के विद्यारंभ के लिए सबसे शुभ माना गया है। आंध्र प्रदेश में तो इसे विद्यारंभ पर्व के नाम से जाना जाता है, जहाँ बच्चों को इसी दिन पहली बार अक्षर ज्ञान कराया जाता है।

होली का शुभारंभ और ब्रज की परंपराएँ

बसंत पंचमी के साथ ही ब्रज क्षेत्र में होली की औपचारिक शुरुआत हो जाती है। मंदिरों में ठाकुरजी को गुलाल अर्पित किया जाता है और रसिया, धमार और होरी का गायन शुरू हो जाता है। बरसाना की लट्ठमार होली, वृंदावन की रंगपंचमी, बनारस में बाबा विश्वनाथ से लेकर महाश्मशान तक खेली जाने वाली होली, ये सब परंपराएँ इस बात का प्रतीक हैं कि भारतीय संस्कृति में मृत्यु के बीच भी जीवन का उत्सव मनाया जाता है।

भारत के विविध रंगों में बसंत पंचमी

बसंत पंचमी पूरे भारत में अलग-अलग रूपों में मनाई जाती है। बंगाल में यह सरस्वती पूजा का प्रमुख पर्व है। बिहार और उड़ीसा में इसका गहरा संबंध कृषि अनुष्ठानों से है। राजस्थान, मथुरा और वृंदावन में सांस्कृतिक उत्सवों की धूम रहती है। पंजाब में यह पर्व पतंगबाजी, सरसों के खेतों और लोकगीतों के साथ मनाया जाता है।

विशेष रूप से पंजाब में बसंत पंचमी केवल धार्मिक नहीं, बल्कि लोकजीवन और खेती से जुड़ा बड़ा उत्सव है।

सुप्रीम कोर्ट स्वत संज्ञान ले, अविमुक्तेश्वरानंद कोर्ट के आदेश की अवमानना कैसे कर रहा है; हिंदू धर्म के लिए अभिशाप बना ये कालनेमि अखिलेश और कांग्रेस के लिए बाप बन गया

सुभाष चन्द्र

अविमुक्तेश्वरानंद कई दिनों से वाणी पर संयम खो रहा है और अपने आचरण से किसी भी तरह शंकराचार्य नहीं लगता - वैसे भी सुप्रीम कोर्ट ने इसकी शंकराचार्य पद की Coronation पर 14 अक्टूबर 2022 को रोक लगा दी थी (stayed) और वह रोक आज तक लागू है। माघ मेले समिति ने उसे स्नान करने से मना नहीं किया, बस एक सीमा तक उसकी पालकी को जाने की अनुमति दी सुरक्षा कारणों से और उससे शंकराचार्य होने का प्रमाण मांग लिया था

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अविमुक्तेश्वरानंद ने इसी को प्रतिष्ठा का प्रश्न बना कर कहा कि राष्ट्रपति और केंद्र सरकार भी तय नहीं कर सकते कि शंकराचार्य कौन होगा? इस ढीठ व्यक्ति को पता नहीं है क्या कि सुप्रीम कोर्ट ने उसे शंकराचार्य बनने पर रोक लगाई थी? राष्ट्रपति को चुनौती दे रहा है तो सुप्रीम कोर्ट से जाकर पूछे कि आप होते कौन हो मेरे शंकराचार्य पद की ताजपोशी को रोकने वाले?

आज वह अखिलेश की समाजवादी पार्टी उसे अपना बाप बनाएं बैठी है जबकि अखिलेश सरकार ने ही उसकी सड़कों पर पिटाई कराई थी और आज कांग्रेस को भी  वह  बाप लग रहा है क्योंकि योगी मोदी को वह गाली बक रहा है और उसके साधु संत होने की दुहाई दे रहे हैं जबकि सोनिया गांधी ने जयललिता के साथ मिलकर कांची कामकोटि पीठ के शंकराचार्य जयेंद्र सरस्वती को दिवाली की रात को हत्या के आरोप में गिरफ्तार कराया था जो कई वर्षों के बाद निर्दोष साबित हुए

इस व्यक्ति को हिंदू धर्म के हर काम में टांग अड़ाने से मतलब है जैसे इसका गुरु करता था आज ये कह रहा है कांग्रेसी शंकराचार्य होने में क्या आपत्ति है और योगी को कह रहा है कि “यह योगी जिसे आप संत कहते हैं, हम उसे हुमायूँ का बेटे और औरंगजेब कहते हैं, ये हिंदू कहलाने लायक नहीं है जब तक प्रशासन आकर माफ़ी नहीं मांगता, तब तक हम अपने आश्रम में प्रवेश नहीं करेंगे। फुटपाथ पर ही रहेंगे जब तक पुलिस प्रशासन सम्मान और प्रोटोकॉल के साथ नहीं  ले जाएगा तब तक गंगा स्नान नहीं करूंगा”

तुम्हारी जगह असल में फुटपाथ ही है ज्यादा तकलीफ है योगी के प्रशासन से तो अखिलेश और कांग्रेस से कहो कि स्नान की अनुमति न देने के लिए इलाहाबाद हाई कोर्ट जाएं तुम्हारे नाजायज बच्चे हैं, वकीलों पर पैसा तो खर्च करेंगे ही हाई कोर्ट नहीं सुनता तो सुप्रीम कोर्ट भेज दो कपिल सिब्बल को

एक वीडियो ये कह रहा है कि जो इस्लाम को मानेगा, कलमा पढ़ेगा और जब उसकी मौत होगी तो मोहम्मद साहब सिफारिश करके उसे जन्नत भिजवा देंगे जहां वो सुख भोगेगा लेकिन अगर कलमा नहीं पढ़ा तो कोई कितना भी सत्यवादी हो चाहे शंकराचार्य ही क्यों न हो मोहम्मद साहब उसकी सिफारिश नहीं करेंगे और वो हमेशा के लिए दोजख में भेज दिया जायेगा

जो भाषा कांग्रेस और अखिलेश की पार्टी बोलती है, वह ये भी बोलता है राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा में भी उसने कलेश किया था ये कहता है मोदी ने धर्मनिरपेक्षता की शपथ ली है इसलिए उन्हें किसी भी धर्म के कार्यक्रम में नहीं जाना चाहिए सभी प्रधानमंत्री ऐसी शपथ लेकर भी मुसलमानों की दरगाहों पर जाते रहे हैं इफ्तार उड़ाते रहे हैं मुस्लिम बनकर तब किसी के लिए कुछ नहीं बोला अभी कुछ दिन पहले इसका चेला अखिलेश यादव मस्जिद में पार्टी की मीटिंग कर रहा था और डिंपल को देखकर मुस्लिम मौलानाओं ने उसके लिए अपशब्द बोले थे

मजे की बात है गूगल को स्वामी विवेकानंद की कायस्थ जाति का पता है लेकिन इस लम्पट अविमुक्तेश्वरानंद की जाति का पता नहीं है लेकिन यह ब्राह्मण तो नहीं हो सकता

SBI रिसर्च: दो साल में जेट स्पीड से हम तीसरी सबसे बड़ी इकोनॉमी बनेंगे, 2030 तक अपर मिडल इनकम वाला बनेगा देश

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के विजनरी नेतृत्व में भारत ने बीते एक दशक में जिस तेज आर्थिक छलांग को अंजाम दिया है, वह अब आंकड़ों की भाषा में बोल रही है। भारत की अर्थव्यवस्था आज जिस गति से दौड़ रही है, वह किसी संयोग का परिणाम नहीं है और न ही केवल वैश्विक परिस्थितियों की देन है, बल्कि यह उस दूरदर्शी नेतृत्व का नतीजा है, जिसने नीति, नीयत और नजर, इन तीनों को एक ही दिशा में साध दिया है। आज भारत की जीडीपी ग्रोथ न केवल दुनिया में सबसे तेज है, बल्कि यह स्थायी, संतुलित और भविष्य-उन्मुख भी है। यही वजह है कि वैश्विक मंदी, युद्ध और अस्थिरताओं के बीच भी भारत की इकोनॉमी जेट स्पीड से आगे बढ़ रही है, जबकि कई विकसित देश रनवे पर ही हांफते दिख रहे हैं। एसबीआई रिसर्च की ताजा रिपोर्ट बताती है कि यह वही भारत है, जो 2014 में 2 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था की सीमाओं में घिरा हुआ था। आज वही भारत 4 ट्रिलियन डॉलर की दहलीज पार करने को तैयार है और 2028 तक 5 ट्रिलियन डॉलर की इकोनॉमी बनने जा रहा है। यह परिवर्तन केवल आकार का नहीं, बल्कि संरचना का है। प्रधानमंत्री मोदी की नीतियों ने भारत को “वेलफेयर स्टेट” से आगे बढ़ाकर “वर्कफेयर स्टेट” की दिशा में मोड़ा, जहां सब्सिडी भी सशक्तिकरण और आत्मनिर्भरता का माध्यम बनी और सबका साथ, सबका विकास के मंत्र के साथ समावेशी विकास हुआ।

देश में विकास अब कोई नारा नहीं, बल्कि रोजमर्रा का अनुभव

दुनिया की प्रमुख रेटिंग एजेंसियां और वित्तीय संस्थान आज जिस भरोसे के साथ भारत की ओर देख रही हैं, वह भरोसा अचानक पैदा नहीं हुआ। जीएसटी, डिजिटल इंडिया, मेक इन इंडिया, पीएलआई स्कीम, रिकॉर्ड इन्फ्रास्ट्रक्चर निवेश और वित्तीय अनुशासन आदि उपायों ने मिलकर भारत की आर्थिक नींव को इतना अधिक मजबूत कर दिया है कि अब झटके उसे गिरा नहीं सकते। मूडीज द्वारा 7.3 प्रतिशत जीडीपी ग्रोथ का अनुमान और एसबीआई रिसर्च का यह आकलन कि भारत दो वर्षों में दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन सकता है, उसी भरोसे की आधिकारिक मुहर है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह विकास केवल कॉरपोरेट बैलेंस शीट तक सीमित नहीं है। बढ़ता मिडिल क्लास, उभरता अपर मिडिल इनकम समूह और 2030 तक भारत का अपर मिडिल इनकम वाला देश बनने का अनुमान इस बात का संकेत है कि आर्थिक विकास अब आम जीवन में उतर चुका है। प्रधानमंत्री मोदी की नीतियों ने भारत को उस मोड़ पर ला खड़ा किया है, जहां विकास कोई नारा नहीं, बल्कि रोजमर्रा का अनुभव बनता जा रहा है।

2014 से 2028: इकोनॉमी की लंबी छलांग, आंकड़ों की सीढ़ी चढ़ता भारत

भारत की आर्थिक कहानी अब अनुमानों, आकांक्षाओं या राजनीतिक बहसों तक सीमित नहीं रही। यह कहानी अब ठोस आंकड़ों की है। ऐसे आंकड़े, जो देश के भीतर ही नहीं, बल्कि वैश्विक मंच पर भारत की विश्वसनीयता को मजबूत कर रहे हैं। एसबीआई रिसर्च की ताजा रिपोर्ट, मूडीज़ का ग्रोथ अनुमान और ऑक्सफैम की रिपोर्ट, तीनों मिलकर यह स्पष्ट संकेत देती हैं कि भारत एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। 2014 में जब नरेन्द्र मोदी ने प्रधानमंत्री के रूप में कार्यभार संभाला, तब भारत की अर्थव्यवस्था लगभग 2 ट्रिलियन डॉलर की थी। उस समय भारत दुनिया की दसवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था था और “ब्रिक्स” जैसे मंचों पर भी उसे ना उभरती ताकत के रूप में देखा जाता था, ना ही निर्णायक शक्ति के रूप में। लेकिन पिछले एक दशक में पीएम मोदी की विजनरी नीतियों ने सारी तस्वीर बदलकर रख दी है। अब स्पेस से लेकर टेक्नोल़ॉजी तक हर सेक्टर में तेजी बढ़ते भारत की ओर दुनिया देख रही है।

जर्मनी-जापान को पीछे छोड़ तीसरी अर्थव्यवस्था बनने की तैयारी
एसबीआई रिसर्च के अनुसार, 2021 तक यह अर्थव्यवस्था करीब 3 ट्रिलियन डॉलर के स्तर को छू चुकी थी। महामारी के झटकों के बावजूद भारत ने जो रिकवरी दिखाई, उसने दुनिया को चौंकाया। पिछले साल में भारत 4 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था को पार करने की दहलीज पर था, जिसे अब बड़ी छलांग लगाकर पार करना है। एक अनुमान के मुताबिक भारत 2028 तक 5 ट्रिलियन डॉलर का लक्ष्य पूरा कर लेगा। एसबीआई रिसर्च का यह निष्कर्ष कि भारत अगले दो वर्षों में दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन सकता है, केवल आकार का सवाल नहीं है। यह इस बात का प्रमाण है कि भारत की विकास दर, निवेश प्रवाह और घरेलू मांग, तीनों एक साथ आगे बढ़ रहे हैं। जर्मनी और जापान जैसी विकसित अर्थव्यवस्थाएं जहां जनसंख्या, मांग और उत्पादकता की सीमाओं से जूझ रही हैं, वहीं भारत युवा जनसंख्या और बढ़ती खपत के बल पर आगे निकलने को तैयार है।

अमेरिकी रेटिंग एजेंसी मूडीज की मुहर: 7.3 प्रतिशत की ग्रोथ
अमेरिकी रेटिंग एजेंसी मूडीज़ द्वारा 2025 के लिए 7.3 प्रतिशत जीडीपी ग्रोथ का अनुमान वैश्विक संदर्भ में बेहद महत्वपूर्ण है। आज जब अमेरिका और यूरोप 1–2 प्रतिशत की वृद्धि को भी उपलब्धि मान रहे हैं, भारत का 7 प्रतिशत से ऊपर रहना उसकी आंतरिक मजबूती का संकेत है। यह ग्रोथ “बबल” नहीं, बल्कि निवेश, खपत और सुधारों के साझा असर का परिणाम है। पिछले एक दशक में भारत की सबसे बड़ी ताकत पीएम मोदी की विजनरी नीतियों की निरंतरता रही है। जीएसटी, डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर, डिजिटल इंडिया और इन्फ्रास्ट्रक्चर कैपेक्स, इन सभी ने मिलकर अर्थव्यवस्था को औपचारिक, पारदर्शी और प्रतिस्पर्धी बनाया है। एसबीआई रिसर्च स्पष्ट करता है कि भारत अब “रीफॉर्म थकान” के दौर से निकलकर “रीफॉर्म डिविडेंड” के चरण में प्रवेश कर चुका है।

भारत में 2030 तक अपर मिडिल क्लास का तेजी से विस्तार
भारत 2030 तक एक ऐसा देश बनने की ओर अग्रसर है, जहां अपर मिडिल क्लास की संख्या ऐतिहासिक रूप से बढ़ेगी। औसत आय में वृद्धि, औपचारिक रोजगार का विस्तार और वित्तीय समावेशन ने खपत को मजबूत किया है। यही कारण है कि वैश्विक मंदी के बावजूद भारत की घरेलू मांग अर्थव्यवस्था को सहारा दे रही है। इन्फ्रास्ट्रक्चर पर निवेश भारत के सुनहरे भविष्य की नींव रख रहा है। सड़कें, रेलवे, बंदरगाह, हवाई अड्डे और डिजिटल नेटवर्क, इन पर हुआ निवेश अब केवल खर्च नहीं, बल्कि उत्पादक पूंजी बन चुका है। एसबीआई रिसर्च के अनुसार, सरकार के कैपेक्स ने निजी निवेश को आकर्षित किया है और रोजगार सृजन को गति दी है। यह वही मॉडल है, जिसने पूर्वी एशिया की अर्थव्यवस्थाओं को उछाल दिया था।

ऑक्सफैम रिपोर्ट और मेक इन इंडिया एवं पीएलआई की सफलता
भारत अब केवल सेवाओं की अर्थव्यवस्था नहीं रहा। पीएलआई योजनाओं के चलते इलेक्ट्रॉनिक्स, मोबाइल निर्माण, ऑटोमोबाइल, फार्मा और रक्षा उत्पादन में भारत की हिस्सेदारी बढ़ी है। मूडीज़ का आकलन भी बताता है कि मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर आने वाले वर्षों में ग्रोथ का अहम स्तंभ बनेगा। ऑक्सफैम की हालिया रिपोर्ट का एक अहम पहलू यह है कि भारत में सामाजिक सुरक्षा योजनाओं और लक्षित सब्सिडी ने असमानता के प्रभाव को काफी हद तक संतुलित किया है। मुफ्त राशन, स्वास्थ्य बीमा और प्रत्यक्ष लाभ अंतरण जैसी योजनाओं ने निचले तबके की खपत क्षमता को बनाए रखा, जो आर्थिक स्थिरता के लिए जरूरी है।

टैक्स कलेक्शन में वृद्धि और सब्सिडी के लक्षित वितरण से इकोनॉमी मजबूत
डिजिटल भुगतान और जीएसटी नेटवर्क ने अनौपचारिक अर्थव्यवस्था को औपचारिक दायरे में लाया है। इससे टैक्स बेस बढ़ा, राजस्व में स्थिरता आई और नीति निर्माण अधिक डेटा-आधारित हुआ। एसबीआई रिसर्च इसे दीर्घकालिक उत्पादकता वृद्धि का आधार मानता है। तेज ग्रोथ के साथ घाटे को नियंत्रित रखना आसान नहीं होता, लेकिन भारत ने इस संतुलन को साधा है। टैक्स कलेक्शन में वृद्धि, सब्सिडी का लक्षित वितरण और खर्च की प्राथमिकताओं ने अर्थव्यवस्था को विश्वसनीय बनाया है। यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया संकट और वैश्विक सप्लाई चेन बाधाओं के बीच भारत का स्थिर रहना उसकी आंतरिक शक्ति का प्रमाण है। यही कारण है कि विदेशी निवेशकों का भरोसा लगातार बना हुआ है। 2 ट्रिलियन डॉलर से 5 ट्रिलियन डॉलर तक की यात्रा केवल आर्थिक मजबूती नहीं, बल्कि आत्मविश्वास की यात्रा है। एसबीआई रिसर्च, मूडीज और ऑक्सफैम, तीनों संकेत देते हैं कि भारत सही दिशा में, सही गति से आगे बढ़ रहा है। इसलिए अब तो तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनना भारत के लिए लक्ष्य नहीं, केवल एक पड़ाव होगा।

नमाज खामोश इबादत है- आरफा तुमने ठीक कहा, क्योंकि इसके बाद शोर तो पत्थरबाजी का होता है: यकीन न हो तो जुमे पर अपने भाईजानों की हिंसा याद कर लो

आरफा खानुम ने जिस नमाज को दुनिया की 'खामोश इबादत' बताया है, इस नमाज का नतीजा है- हिंसा जानिए (साभार: Youtube- Arfa Khanum Sherwani)

“नमाज 5 से 15 मिनट में खत्म हो जाती है। कोई शोर शराबा नहीं होता। कोई ढोल नहीं बजता, कोई पड़ोसियों को परेशानी नहीं होती। दुनिया की सबसे खामोश इबादतों में इस नमाज का नाम हैं।”

क्या आप इस बयान से सहमत हैं? अगर आप इस्लामी कट्टरपंथी सोच या एकतरफा नैरेटिव में यकीन रखने वालों में से हैं, तो शायद बिना सवाल किए मान भी गए होंगे। लेकिन सच जानना बहुत जरूरी है। और यह सच आरफा ‘बेगम’ आपको कभी नहीं बताएँगी, क्योंकि उन्होंने आँखों पर पट्टी बाँधी हुई है। ऊपर लिखी गई पंक्तियाँ भी आरफा के बयान की ही हैं, जिन्हें हर जगह मुस्लिम ‘पीड़ित’ दिखता है और ‘पत्रकारिता’ के नाम पर उन्हीं की हक की लड़ाई का ढोंग रचते हुए वे ‘सत्ता का कॉलर’ पकड़ने की धमकी देती फिरती हैं।

‘पत्रकारिता’ के इसी सफर में आरफा को अपने मतलब की खबर मिल जाती है, जिसके जरिए वह हमेशा की तरह ही सरकार को निशाना बना सके और अपने यूट्यूब चैनल की ‘व्यूअरशिप’ भी बढ़ा सकें। खबर बरेली की है, जहाँ एक खाली घर में नमाज पढ़ते कुछ लोगों को पुलिस ने हिरासत में लिया। अब इसी खबर को आधार बनाकर आरफा पूरे देश में अल्पसंख्यकों की आवाज बनने निकल पड़ती हैं।

घटना पर आरफा ने अपने यूट्यूब चैनल पर 10 मिनट की वीडियो पोस्ट की। वीडियो के ट्रेलर में ही आरफा ने ‘सत्ता का कॉलर’ पकड़ने वाले अपने इरादों को पूरा करने की कोशिश की।वीडियो शुरू ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तस्वीरों से होती है। जहाँ होटल में बैठकर आरफा खानुम प्रधानमंत्री मोदी के मंदिर दर्शनों की तस्वीरों को गिनती हैं। फिर कहती हैं- “अगर गिनने पर आऊँ कि प्रधानमंत्री ने अपने कार्यकाल में कितने मंदिरों में दर्शन किए, तो शायद सुबह से शाम हो जाए।”

यहीं वीडियो के दर्शक भटक जाते हैं, क्योंकि वह वीडियो की हेडलाइन पढ़कर इस उम्मीद से क्लिक करते हैं कि आरफा बरेली की घटना पर बात करेंगी। लेकिन उन्हें सामने मिलती हैं पीएम मोदी की तस्वीरें। आरफा के यूट्यूब स्ब्सक्राइबर्स, जिनमें से अधिकतर उनकी जैसी ही इस्लामी कट्टरपंथी सोच रखते हैं, यहाँ वह मन में सोचते हैं- “हम तो आरफा के मुँह से इस्लाम की दीन सुनने आए थे और यहाँ आरफा मंदिरों के दर्शन करा रही हैं।” ये बड़ा ही शॉकिंग मोमेंट हो गया होगा, उनके लिए।

खैर, आगे बढ़ते हैं। तो अब आरफा अपने पत्रकारिता के मंसूबे बताने लगती हैं, जो शायद अब तक पूरे देश को समझ आ चुके हैं। वही मंसूबे, जिनसे वह मुस्लिमों को पीड़ित दिखाते हुए ‘सत्ता का कॉलर’ पकड़ना चाहती हैं, लेकिन जब वही मुस्लिम मजहब के नाम पर ‘आतंकवादी’ बनता है तो इससे जुड़े सवाल उनके लिए ‘फनी‘ हो जाते हैं।

इसके बाद अब आती है असल मुद्दे की बारी। बरेली में नमाज पढ़ने पर पुलिस हिरासत वाला मामला। इस मुद्दे पर यूँ तो आरफा का रुख उनके ‘पत्रकारिता के मंसूबों’ से मेल खाता है। लेकिन यहाँ गौर करने वाली बात कुछ और है।

घटना पर सवाल उठाते-उठाते आरफा ‘नमाज’ को दुनिया की सबसे ‘खामोश इबादत’ में से एक घोषित कर देती हैं। अब यह भी एक ‘फनी’ मोमेंट ही है। क्योंकि शायद आरफा यहाँ ‘नमाज’ नाम के किसी व्यक्ति का जिक्र कर रही हैं और उस नमाज को कोई नोबेल पुरस्कार मिला है। क्योंकि इस्लाम मजहब में जो ‘नमाज’ होती है, उसका तो शांति से कोई लेना-देना है नहीं। और यह साबित भी हो चुका है, जब ऐसे मामले सामने आते हैं जिनमें जुमे की नमाज के बाद सांप्रदायिक हिंसा भड़काई गई।

और जब बात दुनिया के सबसे खामोश इबादत ‘नमाज’ की हो रही हो, तो जमीन पर जो हकीकतें सामने आती हैं, वे कतई वैसी नहीं दिखतीं जैसा आरफा अपने वीडियो में पेश करती हैं। याद करें इंदौर को वो वायरल वीडियो जहाँ मुस्लिम भीड़ ने जुमे की नमाज के बाद खुलेआम पूरे शहर को जलाने की धमकी दी। आरफा से सवाल है कि क्या ये विचार ‘खामोश इबादत’ करने के बाद आते हैं?

पूर्व बीजेपी नेता नुपुर शर्मा के ‘पैगंबर’ पर बयान के विरोध में देशभर में जगह-जगह दंगे हुए, उनमें से अधिकतर जुमे की नमाज के बाद ही भड़के थे। इन्हीं में गंगा नगरी प्रयागराज में जुमे की नमाज के बाद दंगे भड़के, पुलिस की गाड़ियों पर पथराव और आगजनी का वो मंजर। उत्तर प्रदेश के इतिहास में ‘काले पन्नों’ में दर्ज संभल हिंसा में भी जुमे की नमाज के बाद भीड़ जुटाई गई थी। और पिछले साल 2025 बरेली में ‘आई लव मोहम्मद’ विवाद पर हिंसा भी जुमे की नमाज के बाद ही भड़की थी।

ये तो कुछ गिने-चुने मामले हैं, लेकिन आए दिन मामले सामने आते हैं कि जुमे की नमाज के बाद मुस्लिम ने हिंदू की दुकान तोड़ी, सरकार के विरोध में प्रदर्शन भी जुमे की नमाज के बाद ही शुरू होते हैं। यहाँ कटाक्ष है कि इसी नमाज को आरफा दुनिया की सबसे ‘खामोश इबादत’ का तबका दे रही हैं।

सच तो यह है कि आरफा ‘बेगम’ का यह तरीका नया नहीं है। यह वही पुरानी स्क्रिप्ट है, जो वह हर बार दोहराती हैं। जहाँ भी किसी मुस्लिम का नाम जुड़ जाए, वहाँ आरफा को तुरंत जुल्म, नाइंसाफी और संविधान खतरे में दिखने लगता है। तब आरफा इस्लाम की दीन देने लग जाती है, नमाज को ‘खामोश इबादत’ कहने लग जाती हैं।

लेकिन जब वही मुस्लिम भीड़ बनकर सड़क पर उतरता है, पत्थर चलाता है, धर्मांतरण और लव जिहाद करता है और ‘शहादत’ के नाम पर आत्मघाती हमले करता है तब आरफा की आवाज कहीं गायब हो जाती है। उसे यह सवाल ‘मजाकिया’ लगने लगते हैं।

बरेली वाली घटना में भी आरफा को मुस्लिम नमाज पढ़ते दिखाई दे रहे हैं और पुलिस मानो विलन। जबकि इस फैक्ट को नजरअंदाज कर दिया गया कि पुलिस ने स्पष्ट किया कि गिरफ्तारी की कार्रवाई सिर्फ घर में नमाज पढ़ने के कारण नहीं हुई, बल्कि एक खाली निजी घर के अंदर बिना प्रशासनिक अनुमति के सामूहिक रूप से ऐसा करने पर की गई।

यहाँ आरफा को नमाज से दिक्कत नहीं हुई, न ही उन्हें शांति से कोई लेना-देना है। आरफा को सिर्फ मौका चाहिए था- सरकार को घेरने का, प्रधानमंत्री पर तंज कसने का और अपने यूट्यूब चैनल की व्यूअरशिप बढ़ाने का। इसीलिए बरेली की घटना को उठाकर वह पूरे देश के मुस्लिमों को पीड़ित बताने निकल पड़ती हैं, लेकिन इंदौर, प्रयागराज, संभल और बरेली विवाद और हिंसा जैसे मामलों पर चुप रहती हैं या बात घुमा देती हैं। यही उनकी ‘पत्रकारिता’ है, जो सवाल पूछने की जगह ढाल बन जाती है।

और आखिर में, आरफा से एक सीधा सवाल- अगर नमाज इतनी ही ‘खामोश इबादत’ है, तो जुमे की नमाज के बाद हिंसा क्यों भड़कती हैं? क्या ये सब भी उसी ‘खामोश इबादत’ का हिस्सा है? साथ ही एक और हकीकत भी जान ही लो आरफा, आधा सच दिखाने से खुद को आवाज उठाने वाली ‘पत्रकार’ बताना बंद कर दो, क्योंकि तुम्हारे इस एजेंडो को देश पहचान चुका है।

आयुर्वेद में चुकंदर सेहत का खजाना


सनातन में आयुर्वेद में चुकंदर के अनेक गुण बताए गए हैं। चुकंदर जिसका अधिकतर प्रयोग लोग सलाद या जूस में करते हैं, लेकिन इसकी सब्जी सलाद या जूस से कहीं अधिक स्वास्थ्यवर्धक होती है। यह सेहत की दृष्टि से बहुत हो लाभकारी है। सर्दियों में पत्तों वाला चुकंदर और भी लाभकारी है, पत्तों के साथ बनाई इसकी सब्जी भोजन बहुत ही स्वादिष्ट ही नहीं शरीर में एक नई ऊर्जा देता है।  वैसे प्रकृति हर ऋतु में आने वाली सब्जी का उस ऋतु के अनुसार देती है। लेकिन आज हर मौसम में हर सब्जी मिल रही है। मटर, चुंकदर, शलगम, गोभी,  गाजर, मूली आदि का जो स्वाद सर्दी मौसम में है गर्मी में नहीं, उसी तरह अरबी, पुदीना, टिंडा और तोरी आदि का स्वाद गर्मी में होता है सर्दी में नहीं।        
खैर देखें इसके जूस बनाने की विधि:-   

सामग्री
1 मध्यम आकार का चुकंदर
½ से 1 गिलास सादा पानी
½ चम्मच नींबू रस
एक चुटकी सोंठ पाउडर / काली मिर्च
(Optional) थोड़ा सा शहद – सिर्फ सुबह के लिए
बनाने की विधि
चुकंदर को अच्छे से धोकर छील लें।
छोटे टुकड़ों में काट लें ताकि आसानी से पिस जाए।
मिक्सर में चुकंदर के टुकड़े और पानी डालकर स्मूथ ब्लेंड करें।
चाहें तो हल्का सा छान लें, वरना रेशे सहित भी पी सकते हैं।
अब इसमें नींबू रस और सोंठ/काली मिर्च मिलाएँ।
तुरंत सेवन करें, रखा हुआ जूस आयुर्वेद में बेस्ट नहीं माना जाता।
सेवन का सही समय
सुबह खाली पेट – सबसे उत्तम
या नाश्ते से 30–40 मिनट पहले
हफ्ते में 3–4 बार ही पर्याप्त है
आयुर्वेदिक गुण (Rasa–Guna–Virya के अनुसार)
रस (Taste) – मधुर
गुण – गुरु (भारी), स्निग्ध
वीर्य – शीतल
दोष प्रभाव – पित्त को शांत करता है, वात को संतुलित रखता है
(कफ वाले लोग सीमित मात्रा में लें)
आयुर्वेद के अनुसार चुकंदर जूस के फायदे
1. रक्तवर्धक (खून बढ़ाने वाला)
चुकंदर रक्तधातु को पोषण देता है, इसलिए कमजोरी, थकान और हीमोग्लोबिन की कमी में उपयोगी माना जाता है।
2. हृदय स्वास्थ्य के लिए लाभकारी
यह रक्तसंचार को बेहतर करता है और हृदय को मजबूती देता है। नियमित सेवन से शरीर में ऊर्जा बनी रहती है।
3. त्वचा के लिए अमृत
रक्त शुद्ध होने से मुंहासे, पिंपल्स और डल स्किन में सुधार आता है। अंदर से क्लीन → बाहर से ग्लो
4. पित्त दोष को शांत करता है
शीतल प्रकृति होने के कारण यह शरीर की गर्मी, जलन और चिड़चिड़ापन कम करने में मदद करता है।
5. पाचन तंत्र को सपोर्ट
हल्के रूप में लेने पर यह आंतों को साफ रखने में सहायक होता है और कब्ज की समस्या को कम करता है।
6. कमजोरी और थकान में फायदेमंद
जो लोग जल्दी थक जाते हैं या शरीर में एनर्जी की कमी महसूस करते हैं, उनके लिए यह नेचुरल टॉनिक जैसा काम करता है।
किस आयुर्वेदिक ग्रंथ में उल्लेख मिलता है?
आयुर्वेद के प्राचीन ग्रंथों में चुकंदर को आधुनिक सब्ज़ी के रूप में माना गया है, लेकिन इसके गुणों का वर्णन निघंटु ग्रंथों में मिलता है:
भावप्रकाश निघंटु – मूल वर्ग में रक्तवर्धक एवं पित्तशामक द्रव्य के रूप में
कैदेव निघंटु – पोषक एवं बल्य गुणों का उल्लेख
साथ ही आधुनिक आयुर्वेदिक आहार-विहार ग्रंथों में चुकंदर को रक्तपोषक माना गया है
सावधानियाँ
1. कफ प्रकृति वाले लोग ज्यादा मात्रा में न लें।
2. डायबिटीज़ में बिना शहद के ही पिएँ।
3. बहुत ठंडे मौसम में रोज़ सेवन न करें।
4. ज्यादा पीने से भारीपन या गैस हो सकती है।

अल्लाह रखा रहमान का विलाप एक मक्कारी है; हिंदुओं को गाली है और मोदी पर सीधा हमला है; ये दूसरा हामिद अंसारी है

सुभाष चन्द्र

बहुत बातें कही जा चुकी हैं दिलीप कुमार से धर्म परिवर्तन कर बने अल्लाह रखा रहमान के विलाप के बारे में कि पिछले 8 साल से कम काम मिल रहा है क्योंकि सत्ता परिवर्तन के बाद फैसले करने का अधिकार उन लोगों के हाथ में आ गया जो Creativity को नहीं समझते ये सीधा हमला मोदी के सत्ता में आने पर है लेकिन वो तो सत्ता में साढ़े 11 साल पहले आए थे  तो क्या पहले 3 साल कुछ समस्या नहीं थी? इनका विलाप बिलकुल हामिद अंसारी जैसा है जो 10 साल उपराष्ट्रपति पद की मलाई खाते रहे और रिटायर होते हुए कह गए भारत में डर का माहौल है। 

मुसलमानों में एक प्रवृत्ति बन गई है कि कुएं की तरह पेट भरो और बाद में कह दो हम तो मर गए लुट गए बर्बाद हो गए अजहरुद्दीन मौज करता रहा क्रिकेट कप्तान बन कर लेकिन जब मैच फिक्सिंग में नप गया तो कह दिया कि मुझे मुसलमान होने की वजह से परेशान कर रहे हैं ऐसे बहुत मिलेंगे लेकिन जितना बॉलीवुड में मुसलमानों ने कमाया और हिंदुओं को अपमानित किया वह कोई कर नहीं कर सकता एक नहीं अनेक हिंदू कलाकारों के काम बंद कर दिए और या मार दिए गए गुलशन कुमार और कुछ समय पहले सुशांत सिंह राजपूत का मामला तो याद होगा

लेखक 
चर्चित YouTuber 
शंकर महादेवन ने एक बात कही है कि “there is long-standing divide between creative talent and those who control the final outcome of artistic work” उन्होंने कहा कि जो म्यूजिक बनाता है, वो एक व्यक्ति है और उस म्यूजिक का क्या होगा, उस पर निर्णय एक non musical टीम करती है और इस तरह म्यूजिक की सफलता (Destiny) non-musical लोगों के हाथ में होती है। जाहिर है वो श्रोताओं के लिए कह रहे हैं  

आपके म्यूजिक को श्रोता ही पसंद करते हैं उन्हें इस बात से मतलब नहीं है कि आपने कौन से राग उपयोग किए और कितने वाद्य बजाए, श्रोता को बस वह म्यूजिक चाहिए जो उसके कानों को मंत्रमुग्ध कर दे और दिल में उतर जाए। फिल्म उद्योग में सैंकड़ों गीतकारों, संगीत  निर्देशकों को लोगों ने सिर पर बिठाया है और 40-50 साल पुराना संगीत और गीत आज भी लोगों के दिलों में बसे हैं जबकि पिछले 25 साल में ऐसे गीत बने और म्यूजिक दिया गया ज अगले दिन भी किसी की जुबान पर नहीं होते उन्हें चलाया जाता है तो बस Reality Shows में 

ये व्यक्ति रो रहा है कि आठ साल से काम नहीं मिल रहा जबकि पिछले साल 2025 में ब्लॉकबस्टर ‘छावा’ सहित 5 फिल्मों में इसका संगीत था पिछले 8 साल में करीब 65 भारतीय फ़िल्मों में इसने संगीत दिया है हिंदुओं के पवित्र ग्रन्थ रामायण पर सबसे बड़ी फ़िल्म ‘रामायणम’ में भी ये संगीतकार है इस व्यक्ति ने आज “छावा” को विघटनकारी बता कर साबित कर दिया कि मलाई भी खानी है और गाली भी देनी है

ये आठ साल की बात कर रहा है लेकिन उसके परिवार ने 5 साल पहले नीच इस्लामिक कट्टरता दिखाई जब 2020 में तमिल कवि और गीतकार PIRAISOODAN इसके निमंत्रण पर इसके घर गए तो इसकी माँ ने उन्हें कहा कि विभूति और कुमकुम हटा कर घर में आ सकते हो उन्होंने ऐसा करने से मना कर दिया और वापस लौट आए वरना रहमान के परिवार का क्या पता उनका घर में क़त्ल ही कर देते

बात ये है ये मुस्लिम सभी फायदे उठाते हैं लेकिन भूल जाते हैं कि दर्शक और संगीत के श्रोता हिंदू बहुल देश भारत में हिंदू बहुत अधिक हैं जो इन लोगों को स्टार बनाते हैं लेकिन फिर एक दिन इन्हें  इस्लामिक कीड़ा काट लेता है और याद आता है कि हम तो मुसलमान हैं हमें तो हिंदुओं से नफरत होनी चाहिए और तब शुरू करते हैं “Victim Card” का खेल नसीरुद्दीन शाह, आमिर खान और बहुत हैं जिनको इस इस्लामिक कीड़े ने काटा हुआ है 

इसलिए अब समय आ गया है कि बॉलीवुड का चाहे जो भी मुस्लिम कलाकार हो, उसका हिंदुओं को तबियत से बहिष्कार करना चाहिए