नेहरू ने थोपा वक्फ बोर्ड, कांग्रेस सरकारों ने पाला-पोस कर स्वतंत्र भारत में ‘मजहबी जमींदार’ को बना दिया देश के लिए नासूर


वक्फ संशोधन कानून को लेकर देश में चर्चा जारी है। मुस्लिम आक्रांताओं द्वारा मस्जिदों संचालन के लिए दिए गए दो गाँवों से शुरू हुआ भारत में वक्फ संपत्ति का रिवाज आज 9.4 लाख एकड़ तक पहुँच गया है। आज भारत में वक्फ के पास 8.7 लाख से ज्यादा संपत्तियाँ हैं। दुनिया के किसी भी देश, यहाँ तक कि मुस्लिमों मुल्कों में भी वक्फ के पास इतनी संपत्तियाँ नहीं हैं।

भारत में वक्फ की औपचारिक शुरुआत का श्रेय इस्लामी आक्रांता मोहम्मद गोरी को दिया जाता है। गोरी अफगानिस्तान के घोर प्रांत से आया एक तुर्की शासक था, जिसने 12वीं सदी के अंत में भारत पर कई हमले किए। 1175 में उसने मुल्तान के इस्माइली शासक को हराया था। गोरी ने सन 1185 में मुल्तान की जामा मस्जिद के लिए दो गाँव दान में दिए। इन गाँवों का मैनेजमेंट शेख-अल-इस्लाम को सौंपा गया।

मुगल काल में भी मस्जिद-मकबरों-दरगाहों को इस्लामी शासक बड़ी-बड़ी संपत्तियाँ देते रहे। अंग्रेज जब आए तो उन्होंने इस पर नियंत्रण करने की कोशिश की, लेकिन मुस्लिमों के विरोध के बाद उन्होंने इसे कानूनी रूप से दे दिया। इस कानून का ड्राफ्ट पाकिस्तान के जन्मदाता मोहम्मद अली जिन्ना ने तैयार किया था। भारत जब आजाद हुआ तो भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेेहरू ने इसे जारी रखा।

मुस्लिम तुष्टिकरण हवा देते हुए पहली सन 1954 में देश के पंडित नेहरू ने वक्फ एक्ट बनाया। इससे वक्फ बोर्ड नाम की एक संस्था बनी। इस कानून के तहत कांग्रेस सरकार ने बँटवारे के बाद भारत से पाकिस्तान गए मुस्लिमों की जमीनें एवं संपत्तियाँ वक्फ बोर्डों को दे दीं। इस कानून के लागू होने के एक साल बाद यानी सन 1955 में इसमें संशोधन करके हर राज्य में वक्फ बोर्ड बनाए जाने की बात कही गई।

इसका परिणाम ये हुआ है कि आज देश के करीब 32 राज्यों में वक्फ बोर्ड हैं। उत्तर प्रदेश और बिहार समेत कई राज्यों में शिया और सुन्नी मुस्लिमों के लिए अलग-अलग वक्फ बोर्ड हैं। ये बनाए तो गए थे वक्फ की संपत्तियों का रजिस्ट्रेशन, देखरेख और उनका प्रबंधन करने के लिए, लेकिन ये बोर्ड आज सरकारी जमीनों-इमारतों के साथ-साथ हिंदुओं के पूरे-के-पूरे गाँवों तक पर दावा किए जाने लगे।

सन 1964 में एक संशोधन पारित किया गया था। इसके तहत केंद्रीय वक्फ परिषद (Central Waqf Council) की स्थापना की गई। इसका उद्देश्य वक्फ संपत्तियों के केंद्रीकरण को बढ़ावा देना शामिल था। यह भारत सरकार का एक वैधानिक निकाय है। यह केन्द्रीय अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय के प्रशासनिक नियंत्रण के अधीन आता है। इसका काम केंद्र सरकार को सलाह देना है।

दरअसल, CWC का उद्देश्य वक्फ संबंधित मामलों में केंद्र सरकार को सलाह देने का काम था। यह सलाह वक्फ संपत्तियों के रख-रखाव से संबंधित होता था। CWV का अध्यक्ष केंद्रीय अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री होता है। सन 1984 में वक्फ प्रशासन के पुनर्गठन के लिए वक्फ जाँच समिति गठित की गई। उसकी रिपोर्ट का मुस्लिमों ने भारी विरोध किया। इसके बाद इसे ठंडे बस्ते में डाल दिया गया।

शाहबानो और मंडल-कमंडल के बीच बाबरी ढाँचा गिरने के बाद तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने मुस्लिम तुष्टिकरण की नई परिभाषा लिखी। प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हाराव की सरकार ने दो बड़े विवादित कानून बनाए। इनमें से एक पूजा स्थल अधिनियम और दूसरा वक्फ बोर्ड 1995 शामिल है। वक्फ बोर्ड 1995 में तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने वक्फ बोर्ड को बेहद ताकतवर बना दिया।

इस एक्ट की धारा 3(R) में कहा गया कि अगर किसी संपत्ति को मुस्लिम कानून के मुताबिक पवित्र, मजहबी या परोपकारी मान लिया जाए तो वह वक्फ की संपत्ति हो जाएगी। इसमें ये कहा गया है कि यदि वक्फ बोर्ड को लगता है कि कोई भी जमीन किसी मुस्लिम की है तो वह उसे वक्फ संपत्ति घोषित कर सकता है। इसके लिए वक्फ बोर्ड को कोई कागजात पेश करने की जरूरत नहीं होगी।

उस जमीन पर जिस व्यक्ति को आपत्ति होगी, उसे कागजात दिखाकर साबित करना होगा कि यह उसकी संपत्ति है। इतना ही नहीं, इस अधिनियम की धारा 40 में कहा गया है कि जमीन किसकी है, यह वक्फ का सर्वेयर और वक्फ बोर्ड तय करेगा। बोर्ड का यह निर्णय ही अंतिम होगा, जब तक कि उस निर्णय पर वक्फ ट्रिब्यूनल रोक ना लगा दे या उसे बदल ना दे।

इसके अलावा, बोर्ड उस किसी भी संपत्ति की जाँच कर सकता है, जिसके वक्फ संपत्ति होने का दावा किया जाता है। इस धारा में आगे कहा गया है कि अगर वक्फ बोर्ड को विश्वास हो जाता है कि यह वक्फ की संपत्ति है तो उसे वक्फ संपत्ति के रूप में पंजीकृत करने का आदेश दे सकता है। केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने कहा कि वक्फ कानून की धारा 40 को ‘काला कानून’ बताया है।

बात यहीं रूक जाती तो समझ में आता। कांग्रेस के नेतृत्व वाली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन-2 (UPA-2) के शासनकाल में वक्फ अधिनियम को और मजबूत किया गया। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली सरकार ने साल 2013 में वक्फ कानून में संशोधन करके वक्फ बोर्डों को असीमित अधिकार दे दिए गए। इस संशोधन के जरिए वक्फ बोर्ड को स्वायत्ता दे दी गई।

इस संशोधन के जरिए इससे जुड़े विवाद में कलेक्टर को भी हस्तक्षेप करने से रोक दिया गया। इस कानून में कहा गया कि अगर वक्फ बोर्ड किसी व्यक्ति संपत्ति को वक्फ संपत्ति बता देता है तो उसके खिलाफ वह कोर्ट नहीं जा सकता। उसे वक्फ बोर्ड से ही गुहार लगाना होगा। अगर बोर्ड बात नहीं मानता है तो वह वक्फ ट्रिब्यूनल जा सकता है।

हालाँकि, कानून में यह भी प्रावधान कर दिया गया है कि विवादित मामले में वक्फ ट्रिब्यूनल का फैसला ही अंतिम अंतिम होगा। इस फैसले को कोर्ट में चुनौती नहीं दी जा सकती, यहाँ तक कि सुप्रीम कोर्ट में भी नहीं। इस तरह न्याय पाने के सारे दरवाजे को इस कानून के माध्यम से यूपीए सरकार ने हमेशा के लिए बंद कर दिया है।

अगर वर्तमान में हम वक्फ बोर्ड की संरचना की बात करें तो इसमें एक सर्वे कमिश्नर होता है। यह सर्वे कमिश्नर संपत्तियों का लेखा-जोखा रखता है। इसके अलावा, बोर्ड में मुस्लिम विधायक, मुस्लिम सांसद, मुस्लिम IAS अधिकारी, मुस्लिम टाउन प्लानर, मुस्लिम अधिवक्ता और मुस्लिम बुद्धिजीवी जैसे लोग शामिल होते हैं।

वक्फ ट्रिब्यूनल में प्रशासनिक अधिकारी होते हैं। ट्रिब्यूनल में कौन शामिल होगा, इसका फैसला संबंधित राज्य की सरकार करती है। मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति और वोटबैंक की राजनीति के कारण राज्य सरकारें आमतौर पर वक्त बोर्ड और ट्रिब्यूनल में मुस्लिमों को ही शामिल करती हैं, ताकि वो खुद को मुस्लिम हितैषी दिखा सके।

राणा सांगा डीप स्टेट का टूलकिट : Akhilesh Yadav के लंदन दौरे के बाद हिंदुओं को जातियों में बांटने के लिए लाया गया; क्या नेता विदेशों में भारत विरोधियों से भीख मांगने जाते हैं?

अप्रैल 2 को लोकसभा में वक़्फ़ बिल पर हो रही चर्चा में एक बात बिलकुल साफ हो गयी कि जितना संसद से बाहर मुसलमानों को भड़काने का काम हो रहा था लेकिन संसद में अगर उनकी बातों को सुन लगा कि अप्रत्यक्ष रूप से बिल का समर्थन कर रहे थे, क्योकि जो दूसरों के कहने पर चल जनहितैषी बन जनता को गुमराह करने का काम करते हैं। सनातन और भारतीय संस्कृति का विरोध कर मुस्लिमों को खुश कर उनके वोट लेकर मालपुए खा रहे हैं।  
यह तो शीशे की तरह साफ है कि सोनिया गांधी और राहुल गांधी अमेरिकी अरबपति जार्ज सोरोस और डीप स्टेट के साथ मिलकर भारत विरोधी षड्यंत्रों को अंजाम देने में लिप्त हैं! समाजवादी पार्टी के सुप्रीमो अखिलेश यादव के लंदन दौरे के बाद अब इस कड़ी में उनका नाम भी जुड़ गया है। यूं तो राहुल-मुलायम इंडी गठगंधन के भी सहयोगी हैं। लेकिन उत्तर प्रदेश की राजनीति में अखिलेश यादव ने भाजपा और सीएम आदित्यनाथ योगी से पार पाने के लिए हिंदुओं को जातियों में बांटने वाली टूलकिट का खेल खेला है। राहुल गांधी इस काम को पहले ही जातिगत जनगणना का ढोल पीटकर अंजाम दे ही रहे हैं। दरअसल, इन दोनों युवराजों को पता है कि उनके पास पीएम मोदी और भाजपा के हिंदुत्व की कोई काट नहीं है। इसीलिए वे हिंदुओं को जातियों में बांटने का कुचक्र चल रहे हैं। इसीलिए जानबूझकर पहले औरंगजेब का और अब राणा सांगा का मुद्दा उछाला है। रामजी लाल सुमन के बहाने सुनियोजित तरीके के इसे राजपूत वर्सेज दलित मुद्दा बनाया हैं। लेकिन हिंदुओं को जातियों में बांटने की टूलकिट की साजिश खुलकर सामने आ गई है।

इंडी गठबंधन ने मुस्लिम तुष्टिकरण और जातिगत वैमनस्य फैलाने की सारी हदें पार कीं

दरअसल, इंडी गठबंधन में सहयोगी समाजवादी पार्टी ने मुस्लिम तुष्टिकरण और जातिगत वैमनस्य फैलाने की सारी हदें पार कर दी हैं। पहले तो सपाई सिर्फ मुस्लिम हितैषी बनते थे। औरंगजेब जैसे क्रूर शासकों के हिमायती बनते थे। अब इंडी गठबंधन और सपा हिंदुओं का गौरवशाली इतिहास बिगाड़ने में जुटी हुई है। अब राज्यसभा में समाजवादी पार्टी के सांसद रामजीलाल सुमन ने मुगलों से लोहा लेने वाले मेवाड़ के वीर योद्धा महाराणा संग्राम सिंह सांगा के खिलाफ बेहद अपमानजनक टिप्पणी कर दी है। उन्होंने राणा सांगा के वंशजों और उन्हें मानने वाले हिंदुओं को गद्दार तक कह डाला है। सपा सांसद की इस अभद्र, अशोभनीय, असभ्य और अनर्गल टिप्पणी को लेकर राजस्थान समेत देशभर की सियासत में उबाल आ गया है। राजस्थान के सीएम भजनलाल ने कहा कि मेवाड़ के महान योद्धा राणा सांगा के बारे में समाजवादी पार्टी के सांसद का निम्नस्तरीय बयान, न केवल राजस्थान की 8 करोड़ जनता को, बल्कि सम्पूर्ण देशवासियों को आहत करने वाला है। समाजवादी पार्टी के सांसद रामजीलाल सुमन के राणा सांगा को गद्दार कहने का मुद्दा राजस्थान विधानसभा में गूंजा। कांग्रेस ने आपत्ति की तो भाजपा ने कहा कि इससे साफ तय हो गया कि आप लोग भी रामजीलाल सुमन के साथ हो।
सपा सांसद सुमन ने महाराणा सांगा पर यह विवादित बयान दिया
समाजवादी पार्टी के सांसद रामजी लाल सुमन ने राज्यसभा में जो बयान दिया उससे पूरे देश में बवाल मचा हुआ है। सपा सांसद सुमन ने मुस्लिम तुष्टिकरण के चलते राणा सांगा को लेकर बयान में कहा था कि ‘बीजेपी के लोगों का ये तकियाकलाम बन गया है कि इनमें बाबर का DNA है। मैं जानना चाहूंगा कि बाबर को आखिर लाया कौन? सुमन ने अनर्गल दावा किया कि इब्राहिम लोदी को हराने के लिए बाबर को राणा सांगा लाया था। मुसलमान अगर बाबर की औलाद हैं तो तुम लोग उस गद्दार राणा सांगा की औलाद हो, ये हिन्दुस्तान में तय हो जाना चाहिए कि बाबर की आलोचना करते हो, लेकिन राणा सांगा की आलोचना नहीं करते। बता दें कि देश में पहले से औरंगजेब की कब्र को लेकर विवाद छिड़ा हुआ है। इसके बाद राणा सांगा पर विवादित बयान के बाद यह बहस और तेज हो गई है।
हिंदुओं को बांटने की टूलकिट के पीछे है डीप स्टेट की ‘चौकड़ी’
सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव के लंदन दौर के बाद अब यह समझ में आने लगा है कि औरंगजेब की हिमायत और राणा सांगा की खिलाफत के बयान सपा नेताओं ने यूं ही नहीं दिए हैं। इसके पीछे डीट स्टेट की सुनियोजित साजिश है और वे मुस्लिमों को एकजुट करने और हिंदुओं को बांटने की अपनी टूलकिट को अंजाम देने में लगे हैं। कड़ी से कड़ी जोड़ने पर स्पष्ट होता है कि कैसे अखिलेश यादव और राहुल गांधी के परिवार के बीच मित्रता है। राजनीतिक गठबंधन है। अब राहुल गांधी से जुड़ा एनजीओ, कांग्रेस के युवराज के खास सलाहकार विदेशों से और जार्ज सोरेस से भारत विरोध के नाम पर करोड़ों की फंडिंग ले रहे हैं। डीप स्टेट के इस गोरखधंधे में राहुल गांधी ने अपने मित्र अखिलेश यादव को मिला लिया है। इसलिए भी समाजवादी पार्टी हिंदुओं को जातियों में बांटने की राजनीति में उतर आई है। इस ‘चौकड़ी’ को लगता है कि वे सिर्फ और सिर्फ हिंदूओं को बांटकर ही भाजपा को सत्ता से दूर कर पाएंगे। यही वजह है कि राहुल गांधी भी आए दिन हिंदुस्तान को जातियों में बांटने के लिए जातिगत जनगणना का राग अलापते रहते हैं।
राहुल एंड कंपनी को हजम नहीं हो रही पीएम मोदी की लगातार सफलता
डीप स्टेट, राहुल गांधी और अखिलेश यादव की करतूतों की कलई तो भाजपा नेताओं ने अपने एक्स अकाउंट पर खोलकर रख दी है। जहां तक सोरोस और राहुल गांधी के संबंधों का सवाल है तो सोशल मीडिया पर इनकी घनिष्ठता के कई प्रमाण बिखरे हैं। इनसे साफ पता चलता है कि लोकसभा से लेकर विधानसभाओं में हार-दर-हार झेल रहे कांग्रेस के ‘कर्ताधर्ता’ राहुल गांधी अपने राजनीतिक स्वार्थ के लिए कितने निचले स्तर तक गिर गए हैं! राहुल अभी तक तो विदेशों में जाकर भारत और मोदी सरकार की बुराई करके देश को नीचा दिखाने के कोशिश किया करते थे। लेकिन अब उनपर साफ-साफ देश के साथ ‘गद्दारी’ करने के आरोप लगे हैं। उधर उनके मित्र अखिलेश यादव के इशारे पर सपा नेता हिंदू राष्ट्र के गौरव राणा सांगा को ‘गद्दार’ बता रहे हैं। दरअसल प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का लगातार तीसरी बार सत्ता में आना राहुल एंड कंपनी को हजम नहीं हो रहा है। उनके यह भी गले नहीं उतर रहा है कि पिछले एक दशक में भारत लगातार दुनिया में तेजी से एक शक्ति के तौर पर स्थापित हो रहा है। देश ने हर क्षेत्र में अपने प्रदर्शन में गुणात्मक सुधार किया है।
सांसद के घर पर हमले को दलित विमर्श से जोड़ रही सपा
राजपूत राजा राणा सांगा पर समाजवादी पार्टी के सांसद रामजी लाल सुमन की टिप्पणी से शुरू हुआ विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा है। राजपूत समाज की नाराजगी, बयान देने वाले नेता का विरोध, सांसद के घर पर हमले के बाद अब इस मामले में सियासी तड़का लगने लगा है। चोरी और सीनाजोरी की तर्ज पर सपा सांसद रामजी लाल सुमन ने राज्यसभा के सभापति जगदीप धनखड़ से मिलकर सुरक्षा की मांग की। सपा सांसद रामजी लाल सुमन ने कहा- मैंने कुछ गलत नहीं बोला है, मैं माफी नहीं मांगूंगा और अपने बयान पर कायम हूं। इधर रामजी लाल सुमन के घर पर हुए हमले के बाद सपा नेता राम गोपाल यादव उनके घर आगरा पहुंचे। उन्होंने मुख्यमंत्री पर निशाना साधते हुए इस मुद्दे को दलित राजनीति से जोड़ने की कोशिश की।  
दलित पर नहीं, राणा सांगा को विद्रोही बताने वाले पर हमलाः भाजपा
दूसरी ओर इस मामले में बीजेपी के नेताओं ने समाजवादी पार्टी को करारा जवाब दिया है। गोरखपुर सांसद भाजपा नेता रवि किशन ने कहा कि उकसाने वाले बयान से बचना चाहिए। आप कहेंगे तो जनता उग्र हो जाती है। भाजपा सांसद लक्ष्मीकांत बाजपेई ने कहा- दलित होने के कारण उनके घर पर हमला नहीं हुआ बल्कि राणा सांगा जैसे योद्दा के खिलाफ बोलने वालों के खिलाफ हमला हुआ। उत्तर प्रदेश भाजपा के पूर्व अध्यक्ष और राज्यसभा सांसद लक्ष्मीकांत वाजपेई ने कहा, “अखिलेश यादव को यह बात ध्यान रखनी चाहिए। उनका या उनके किसी कार्यकर्ता का कोई भी वाक्य भारत माता के विरुद्ध है तो उनको बोलने में संकोच करना चाहिए। राणा सांगा को गद्दार बताएंगे, देश का इतिहास झुठलायेंगे तो वह स्वाभाविक प्रक्रिया होगी। अगर उनके साथ कोई घटना घटती है तो दलित के साथ नहीं, बल्कि राणा सांगा को विद्रोही बताने वाले के साथ घटना घटी है।
अखिलेश यादव ने राजपूत वोटों की चिंता इसलिए छोड़ी 
राजपूत राजा राणा सांगा पर सपा सांसद रामजी लाल सुमन की विवादित टिप्पणी के बाद शुरू हुए सियासी घमासान को अखिलेश यादव 2027 के चुनावों की नजर से देख रहे हैं। इसीलिए समाजवादी पार्टी सपा सांसद रामजी लाल सुमन के घर पर करणी सेना के लोगों द्वारा किए गए घेराव को राजूपत बनाम दलित बनाने की कोशिश हो रही है। करणी सेना के पहुंचने के बाद उन्हें आपदा में अवसर दिखने लगा है। हालांकि हिंदुओं को बांटने की इस रणनीति में अखिलेश यादव कभी कामयाब नहीं हो पाएंगे और उन्हें मुंह की खानी पड़ेगी। इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती कि आज समाजवादी पार्टी वोट बैंक के लिए राजपूत आधार नहीं हैं। केवल 2012 के विधानसभा चुनाव तक भी क्षत्रिय वोटों पर सपा की पकड़ थी। अखिलेश मंत्रिमंडल में 11 ठाकुर इस बात के सबूत थे। अखिलेश सरकार में रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैया, विनोद कुमार सिंह उर्फ पंडित सिंह, अरविंद सिंह गोप, राधे श्याम सिंह, राजा आनंद सिंह, योगेश प्रताप सिंह, राजा महेंद्र अरिदमन सिंह समेत कुल 11 ठाकुर मंत्री थे। मगर आज स्थितियां पूरी तरह से बदल चुकी हैं। अखिलेश यादव को भी मालूम है कि अब राजपूत समाजवादी पार्टी को वोट नहीं देने वाले हैं। इसकी सबसे बड़ी वजह हैं उत्तर प्रदेश के सीएम योगी आदित्यनाथ। राजपूत कुल से आने वाले योगी पर उत्तर प्रदेश की राजनीति में असली ‘ठाकुर’  साबित हो रहे हैं। यूपी का अगला चुनाव योगी बनाम अखिलेश होता है तो उत्तर प्रदेश के राजपूत तन मन धन से योगी आदित्यनाथ के साथ होंगे। शायद यही कारण है कि अखिलेश यादव ने राजपूत वोटों की चिंता छोड़कर दलित वोटों पर फोकस करने में लगे हैं। 
दलित सपा के हथकंडे समझ चुके, बहकावे में नहीं आएंगे
उन्होंने दूसरी पोस्ट में कहा कि आगरा घटना की आड़ में अब सपा अपनी राजनीतिक रोटी सेंकना बंद करे और आगरा की हुई घटना की तरह यहां दलितों का उत्पीड़न और ज्यादा न कराए। उन्होंने लिखा कि समाजवादी पार्टी अपने राजनीतिक लाभ के लिए अपने दलित नेताओं को आगे करके जो घिनौनी राजनीति कर रही है अर्थात उनको नुकसान पहुंचाने में लगी है, यह कतई उचित नहीं है। दलित ना सिर्फ समाजवादी के हथकंडे भलीभांति समझ चुके हैं, बल्कि इनके बहकावे में आने वाले नहीं है। समाजवादी पार्टी हमेशा से दलितों की विरोधी थी और आज भी दलित विरोधी ही है।
राजस्थान के राजपूत राजा राणा सांगा के बारे में सपा सांसद की अपमानजनक टिप्पणी पर राजस्थान के नेताओं ने क्या कहा…
राजस्थान विधानसभा में गूंजा राणा को गद्दार कहने का मुद्दा
समाजवादी पार्टी के सांसद रामजीलाल सुमन के राणा सांगा को गद्दार कहने का मुद्दा राजस्थान विधानसभा में उठा। बीजेपी विधायक श्रीचंद कृपलानी ने पॉइंट ऑफ इंफॉर्मेशन के जरिए राणा सांगा को गद्दार कहने का मामला उठाते हुए पूरे मामले में कार्रवाई की मांग की। इस पर कांग्रेस विधायक हरिमोहन शर्मा ने कहा- सदन में इस पर चर्चा नहीं हो सकती। हरिमोहन शर्मा के इतना कहते ही बीजेपी विधायकों ने कड़ी आपत्ति की। इस पर बीजेपी विधायकों ने कहा- राणा सांगा के अपमान पर चर्चा क्यों नहीं हो सकती? कई बीजेपी विधायक जोर-जोर से बोलने लगे, इससे सदन में हंगामे की स्थिति बन गई। बीजेपी विधायकों ने कहा कि आप राणा सांगा पर टिप्पणी का समर्थन कर रहे हो क्या? श्रीचंद कृपलानी ने कहा- आपके खड़ा होने से यह तय हो गया कि आप रामजीलाल सुमन के साथ हो? कांग्रेस ने खुद अपनी पोल खोल ली। आप मुगलों का साथ दे रहे हो। सरकारी मुख्य सचेतक जोगेश्वर गर्ग ने कहा- कांग्रेस विधायक दल रामजीलाल सुमन के साथ खड़ा है, राणा सांगा का अपमान करने वाले के साथ खड़ा है, शर्म आनी चाहिए।
अपने सांसद के बयान के लिए अखिलेश देश से माफी मांगें-भजनलाल
सपा सांसद के बयान पर राजस्थान के सीएम भजनलाल ने सोशल मीडिया पर अपनी कड़ी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने एक्स पर लिखा कि ‘शूरवीरों की धरती राजस्थान के लाडले सपूतों ने मातृभूमि की रक्षा के लिए सदा अपना सर्वोच्च बलिदान दिया है। मेवाड़ के महान योद्धा राणा सांगा के बारे में समाजवादी पार्टी के सांसद का निम्नस्तरीय बयान, न केवल राजस्थान की 8 करोड़ जनता को, बल्कि सम्पूर्ण देशवासियों को आहत करता है।’ उन्होंने आगे लिखा कि ‘जिस महान योद्धा ने मुगलों से युद्ध में अपने शरीर पर 80 घाव झेले, उनको गद्दार कहना विपक्षी नेताओं की घटिया मानसिकता को दर्शाता है। वोटो के तुष्टिकरण के लिए ये लोग इतिहास पुरुषों का अपमान करने से भी नहीं चूकते हैं। इसके लिए सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव को को तुरंत देश से माफी मांगनी चाहिए और अपने सांसद पर अविलम्ब कार्रवाई करनी चाहिए।’

‘वक्फ बिल वापस लो, नहीं तो सड़क पर उतरकर मुस्लिम कर देंगे 1947 वाला हाल’: अलीगढ़ में जमीयत नेता ने ‘हिंदुओं के नरसंहार’ की दी धमकी, Video वायरल


अलीगढ़ के एक मौलाना ने वक्फ संशोधन कानून के पास होने पर देश के विभाजन की धमकी दी है। उसका यह वीडियो अब सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। मौलाना ने कहा है कि वक्फ कानून के चलते 1947 वाला हाल होगा। बताया जा रहा है कि वह जमीयत उलेमा का महानगर अध्यक्ष है। उसका नाम मुफ़्ती अकबर कासमी है। 

वक्फ कानून पर बोलते हुए मौलाना कासमी ने कहा, “अगर दोबारा इस मुल्क को खूबसूरत बनाना है तो इस कानून को वापस लेना होगा। वरना कहीं ऐसा ना हो कि मुस्लिम सड़कों पर आ जाए और फिर दोबारा 1947 वाला वाकया दोहराया जाए।” मौलाना का यह बयान आप नीचे लगे वीडियो में 0:38 सेकंड से 2:36 सेकंड के बीच सुन सकते हैं।

मौलाना ने कहा कि वह इस कानून के विरोध में सिर कटा लेंगे लेकिन झुकाएंगे नहीं। मौलाना ने कहा कि वह इस कानून के लिए पीढ़ियों तक लड़ाई रखेंगे। गौरलतब है कि मुस्लिमों ने 1947 हिन्दुओं का नरसंहार कर अपने लिए अलग मुल्क पाकिस्तान लिया था।

इस बयान का विश्व हिन्दू परिषद ने विरोध किया है। VHP के बृज प्रांत के मीडिया प्रभारी प्रतीक रघुवंशी ने मौलाना पर कार्रवाई की माँग की है। उन्होंने कहा है कि मौलाना ने देश तोड़ने वाली बात की है।  

वक़्फ़ से मुस्लिम भी वाकिफ नहीं हैं, कहने को मुस्लिम गरीब और मजलूम हैं; फिर आज तक उनके लिए वक़्फ़ बोर्ड ने क्या किया?

सुभाष चन्द्र

अप्रैल 2 को लोकसभा में वक़्फ़ संशोधन बिल पेश हो गया और पास भी हो गया। जो मुसलमानों को गुमराह करने वालों की बहुत बड़ी हार है। देखना यह है कि कुर्सी के भूखे नेताओं और उनकी पार्टियों द्वारा मुसलमानों को गुमराह कर मालपुए खा रहे थे उस ग़लतफ़हमी से कब बाहर आएगा? लेकिन कुछ वक्ताओं की बातें सुनकर यह अहसास हुआ कि वक़्फ़ बिल के विरोधी और मुस्लिम समुदाय के लोग भी वक़्फ़ से वाकिफ नहीं हैं

राहुल गाँधी संसद में विपक्षी नेता जरूर बन गए लेकिन नेता बनने की एक भी खूबी नहीं। राहुल का काम सरकारी सुविधाओं का लाभ उठाने विपक्ष नेता बन गया। जबकि विपक्षी नेता देश का अघोषित दूसरा प्रधानमंत्री होता है। मुस्लिम वोट के ठेकेदारों को राहुल से पूछना चाहिए कि आखिर किस दबाव में वक़्फ़ बिल के खिलाफ क्यों नहीं बोले? क्या मुसलमान को पागल समझते हो?   

संसद में बहस सुनने पर एक बात शीशे की साफ हो गयी कि किसी भी विपक्षी के पास विरोध करने का कोई ठोस सबूत नहीं था। ऑल इंडिया पर्सनल लॉ बोर्ड से लेकर मुस्लिम वोटों के ठेकेदार बने फिर रहे कुर्सी के भूखे नेताओं और उनकी पार्टियां मुसलमानों को डरा-धमका कर अपनी तिजोरियां भरते रहे हैं मुसलमानों के लिए कुछ नहीं करते। मुसलमानों को वोटिंग का बहिष्कार करने वालों से पूछना चाहिए कि बहिष्कार क्यों किया? इधर-उधर की बातें करने की बजाए वक़्फ़ के हक़ में क्यों नहीं बोले? हकीकत यह है कि वक़्फ़ का इस्लाम से दूर तक कोई वास्ता नहीं, इस कड़वी सच्चाई को हर मुसलमान को समझना होगा।     

आखिर एक बात का रोना हर वक्त क्यों रोया जाता है कि मुस्लिम गरीब हैं और मजलूम हैं जबकि उनका संगठन वक्फ बोर्ड वर्षों से काम कर रहा है? अकूत संपत्ति का मालिक है यह बोर्ड लेकिन उस संपत्ति से होने वाली आय उसने क्या कभी गरीब मुस्लिमों पर खर्च की है? मदरसे भी बनाए और चलाए जाते हैं तो वह भी सरकार के पैसे से 

लेखक 
चर्चित YouTuber 
मुस्लिमों को सोचना चाहिए कि आखिर आम मुसलमान को वक़्फ़ बोर्ड से क्या मिला? मुस्लिम समुदाय के लोग जब आपराधिक मामलों में फंसते हैं तो उन्हें बचाने के लिए बोर्ड नहीं आता बल्कि जमीयत उलेमा-ए-हिन्द वकील देता है ट्रिपल तलाक झेलने वाली मुस्लिम महिलाओं को क्या कभी बोर्ड ने कोई मदद दी बल्कि ट्रिपल तलाक का विरोध ही किया और तलाकशुदा महिलाओं को अल्लाह के भरोसे दर दर भटकने के लिए छोड़ देता था यह वक़्फ़ बोर्ड

क्या कभी मुस्लिमों के लिए स्कूल बनाए जहां उच्च शिक्षा दी जाए, क्या कभी हॉस्पिटल बनाए जिनमें मुस्लिमों समेत सभी लोगों का इलाज किया जाता हो? 

वक़्फ़ की संपत्ति किसी मुस्लिम द्वारा दान की हुई होनी चाहिए वह भी जरूरतमंदों के परोपकार के लिए और ऐसे जरूरतमंद जरूरी नहीं मुस्लिम हो गैर मुस्लिमों को छोड़िए वक़्फ़ ने कभी मुस्लिमों की भी मदद नहीं की यह कैसे हो सकता है कि एक तरफ तो मुस्लिम गरीब हैं और दूसरी तरफ वह अपनी इतनी संपत्ति दान कर देते हैं जिस पर वक़्फ़ बोर्ड बड़े बड़े होटल, रिसोर्ट और भवन खड़े कर लेता है

मुस्लिम आपको कभी अंगदान करते नहीं मिलेंगे लेकिन अंगदान लेते जरूर मिलेंगे इस्लाम में दान (जकात) गैर मुस्लिमों को तब ही दिया जाता है जब वह इस्लाम का विरोध न करते हो और इस्लाम की तरफ उनका रुझान हो

आज के विधेयक से साफ़ है कि वक़्फ़ बोर्ड की मनमानी पर लगाम लगेगी किसी की संपत्ति पर उंगली रखने से वह वक़्फ़ की नहीं होगी कोई भी सरकारी संपत्ति वक़्फ़ की नहीं मानी जाएगी और कोई भी मुस्लिम अपनी ही संपत्ति वक़्फ़ को दे सकेगा जिसके लिए उसका 5 साल तक इस्लाम महजब को मानना जरूरी होगा संपत्ति का पंजीकरण भी होगा और कलेक्टर उसकी देखभाल करेगा वक्फ बोर्ड के निर्णय को कोर्ट में चुनौती दी जा सकेगी

इमरान मसूद आज लोकसभा में कह रहा था कि उत्तर प्रदेश में वक़्फ़ की 74% संपत्ति सरकारी घोषित कर दी गई हैं। लूट कर संपत्ति वक़्फ़ में जोड़ी हैं तो उनका कब्ज़ा तो सरकार लेगी ही वैसे इमरान मसूद को पता होना चाहिए कि ओवैसी खुद कहता रहता है कि उत्तर प्रदेश में वक़्फ़ की 129 लाख में से 112 लाख संपत्तियों के कागज ही नहीं हैं वक़्फ़ बोर्ड के पास। यानि वक़्फ़ बिल के विरोधी खुद ही सच्चाई कबूल रहे हैं। ये वही ओवैसी है जिसने वक़्फ़ संपत्ति पर मॉल और हॉस्पिटल बना करोडो की कमाई कर रहा है।   

ऐसा कोई नहीं है जिसे वक़्फ़ बोर्ड ने ठगा नहीं इसलिए 1000 चर्च भी इस बिल के समर्थन में खड़ी हैं मजे की बात है 239 विपक्षी सांसदों में केवल 24 मुस्लिम है और 215 “हिंदू काफिर” है जो गला फाड़ फाड़ कर बिल का विरोध कर रहे हैं

मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और विपक्ष को वक़्फ़ बोर्ड/कौंसिल में 2 मुस्लिम महिलाओं और 2 गैर मुस्लिमों को रखने से सबसे ज्यादा दर्द हो रहा है महिलाओं को तो ये लोग कुछ समझते ही नहीं और जब गैर मुस्लिमों की संपत्ति हथियाने का काम करते हो तो उनका भी तो कोई प्रतिनिधि भी तो होना चाहिए  

मुस्लिम समुदाय के लोग भावनाओं में न बह कर एक बार ठंडे दिमाग से सोचें कि उन्हें क्या सच में वक़्फ़ बोर्ड से कुछ मिला है? इस बिल से मुस्लिमों का ही कल्याण होने वाला है

वक़्फ़ कोई इस्लामिक नहीं बल्कि जमीन लूट बोर्ड ; सरकारी प्रॉपर्टी पर नहीं कर सकेंगे दावा, बोर्ड में होंने गैर मुस्लिम भी, खैरात देने के लिए इस्लाम का 5 साल पालन जरूरी

                                                                                                                वक्फ की प्रतीकात्मक तस्वीर 
दुनियां में किसी भी मुस्लिम देश में कोई वक़्फ़ बोर्ड नहीं फिर भारत में क्यों? यह बात मुसलमान को समझना होगी। वक़्फ़ मुस्लिम हक़ में नहीं बल्कि मुस्लिम वोटबैंक है। इस बोर्ड से जितने मुस्लिम पीड़ित हैं कोई और नहीं। सेकुलरिज्म के नाम पर हिन्दू और मुसलमानों को पागल बनाया जा रहा है। सेकुलरिज्म का ढोल पीटने वालों को शायद सेकुलरिज्म का अर्थ भी नहीं मालूम। यह कटु सत्य है। वरना इन पाखंडियों से पूछो क्या सेकुलरिज्म का मतलब तुष्टिकरण करना है? वक़्फ़ बोर्ड की स्थापना और 1995 में संशोधन करने से कांग्रेस और यूपीए से मुसलमान दूरी बनाता रहा है, क्यों? वक़्फ़ ट्रिब्यूनल में 9000+ लंबित केस 90% मुस्लिमों के ही है क्यों? दरअसल इस्लाम की आड़ में मुसलमानों को उसी तरह भड़काया जा रहा जैसा CAA मुद्दे को लेकर भड़काया गया था। 

बात 1993 की है जब सिविल लाइन्स में एक कब्रिस्तान पर फ्लैट बनने पर दरिया गंज में बच्चा घर में स्थित दिल्ली वक़्फ़ बोर्ड जाने पर दिल्ली वक़्फ़ बोर्ड के अधिकारियों ने अपने कटु अनुभव साझा किए थे। जिसे सुन रोंगटे खड़े हो गए थे। 2 दिन तक सारा स्टाफ ऑफिस में कैद रहा। तत्कालीन थानाध्यक्ष ने अपनी जेब अथवा सरकारी खर्चे से सुबह नाश्ते से लेकर रात के भोजन तक का प्रबंध किया था। उन्होंने वक़्फ़ जमीनों के असली लुटेरों के नाम भी बताए जो इनकी जान के दुश्मन बन गए थे। जिन्हे मुसलमान अपना बहुत बड़ा मजहबी मानते हैं। धन्य हो दरिया गंज पुलिस स्टेशन का जिसने हस्तक्षेप कर उन्हें जिंदगी बक्शी। 

आज चर्चा यह भी है कि जब मुसलमान को गरीब कहा जाता है फिर मुसलमानों ने इतनी जमीन कहाँ से वक़्फ़ कर दी? जब मुस्लिम कट्टरपंथी फंसे होते है तब संविधान की बात करते है वरना शरीयत स्थापित करने की कवायत में लगे रहते हैं।       

वक्फ (संशोधन) विधेयक 2024 लगातार चर्चा में है। संसद में इसके पास होने से पहले यह जान लीजिए कि ये पुराने कानून से किस तरह अलग है और इसमें क्या क्या बड़े बदलाव किए गए हैं।

वक्फ अधिनियम, 1995 और वक्फ (संशोधन) विधेयक, 2024 के बीच कई महत्वपूर्ण अंतर हैं, जो वक्फ संपत्तियों के प्रबंधन, प्रशासन और संरचना में सुधार लाने के उद्देश्य से प्रस्तावित किए गए हैं।

वक्फ अधिनियम 1995 और वक्फ संशोधन विधेयक 2024 के बीच अंतर

वक्फ अधिनियम, 1995 का नाम मूल रूप से ‘वक्फ अधिनियम-1995’ था, जो उस समय के कानून की संरचना और सीमित दायरे को प्रतिबिंबित करता था। यह मुख्य रूप से वक्फ संपत्तियों के प्रबंधन और विनियमन पर केंद्रित था। दूसरी ओर वक्फ (संशोधन) विधेयक, 2024 में इस अधिनियम का नाम बदलकर ‘एकीकृत वक्फ प्रबंधन, सशक्तिकरण, दक्षता और विकास अधिनियम, 1995’ कर दिया गया है।

वक्फ की प्रक्रिया में बदलाव

साल 1995 के अधिनियम में वक्फ का गठन तीन तरीकों से संभव था: घोषणा, उपयोगकर्ता (लंबे समय तक उपयोग के आधार पर) और बंदोबस्ती (वसीयत या दस्तावेज के जरिए)। यह प्रावधान लचीलापन प्रदान करता था, लेकिन अस्पष्टता और दुरुपयोग की संभावना को भी बढ़ाता था, जैसे कि बिना औपचारिक दस्तावेज के संपत्तियों को वक्फ घोषित करना। इसके विपरीत, 2024 के संशोधन विधेयक में ‘उपयोगकर्ता द्वारा वक्फ’ के प्रावधान को पूरी तरह हटा दिया गया है।
अब वक्फ केवल औपचारिक घोषणा या बंदोबस्ती के जरिए ही बनाया जा सकता है और इसके लिए दानकर्ता को कम से कम पाँच साल से प्रैक्टिसिंग मुस्लिम होना अनिवार्य है। साथ ही यह सुनिश्चित किया गया कि पारिवारिक वक्फ में महिला उत्तराधिकारियों को उनके अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता। यह बदलाव दुरुपयोग को रोकने और प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने की दिशा में एक कदम है।

सरकारी संपत्ति पर नहीं हो सकेगा दावा

वक्फ अधिनियम-1995 में सरकारी संपत्तियों को वक्फ के रूप में घोषित करने या उन पर दावे को लेकर कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं था। इस अस्पष्टता के कारण कई सरकारी और निजी संपत्तियों को वक्फ बोर्डों ने अपने अधिकार क्षेत्र में लेने की कोशिश की, जिससे विवाद बढ़े। उदाहरण के लिए दिल्ली और कर्नाटक में सरकारी भूमि पर दावे देखे गए। वहीं साल 2024 के संशोधन विधेयक में यह स्पष्ट किया गया है कि कोई भी सरकारी संपत्ति वक्फ के रूप में मान्य नहीं होगी। यदि ऐसी संपत्ति पर वक्फ का दावा किया जाता है, तो जिला कलेक्टर इसकी जाँच करेगा और राज्य सरकार को रिपोर्ट देगा। यह प्रावधान सरकारी संपत्तियों पर अनुचित दावों को रोकने और विवादों को कम करने के लिए लाया गया है।

संपत्तियों के सर्वे की प्रक्रिया में बदलाव

साल 1995 के अधिनियम के तहत वक्फ संपत्तियों का सर्वेक्षण सर्वेक्षण आयुक्तों और अपर आयुक्तों की जिम्मेदारी थी। हालाँकि इस प्रक्रिया में देरी, विशेषज्ञता की कमी और समन्वय का अभाव आम समस्याएँ थीं, जिसके कारण कई राज्यों में सर्वे अधूरा रहा। इसके उलट साल 2024 के विधेयक में सर्वेक्षण का दायित्व जिला कलेक्टरों को सौंपा गया है, जो राज्य के राजस्व कानूनों के अनुसार काम करेंगे। यह बदलाव सर्वेक्षण को तेज और अधिक व्यवस्थित बनाने के लिए किया गया है, क्योंकि कलेक्टरों के पास पहले से ही भूमि रिकॉर्ड और प्रशासनिक संसाधनों तक पहुँच होती है। इससे सर्वेक्षण की गुणवत्ता और समयबद्धता में सुधार की उम्मीद है।

केंद्रीय वक्फ परिषद (CWC) की संरचना

1995 के अधिनियम में केंद्रीय वक्फ परिषद के सभी सदस्यों का मुस्लिम होना अनिवार्य था, जिसमें कम से कम दो महिलाओं को शामिल करने का प्रावधान था। यह संरचना समुदाय-केंद्रित थी, लेकिन इसमें विविधता और बाहरी दृष्टिकोण की कमी थी। 2024 के संशोधन विधेयक में CWC की संरचना में बदलाव करते हुए दो गैर-मुस्लिम सदस्यों को शामिल करने का प्रस्ताव है। अब सांसदों, पूर्व न्यायाधीशों और प्रतिष्ठित व्यक्तियों के लिए मुस्लिम होना जरूरी नहीं होगा, हालाँकि मुस्लिम संगठनों के प्रतिनिधि, इस्लामी कानून के विद्वान और वक्फ बोर्डों के अध्यक्ष जैसे सदस्यों के लिए यह शर्त बरकरार रहेगी। इसके अलावा मुस्लिम सदस्यों में से दो महिलाएँ होना अनिवार्य रहेगा। यह बदलाव समावेशिता और प्रशासनिक दक्षता को बढ़ाने के लिए किया गया है।

राज्य वक्फ बोर्ड (SWB) की संरचना

साल 1995 के अधिनियम में राज्य वक्फ बोर्ड में दो निर्वाचित मुस्लिम सांसद, विधायक या बार काउंसिल सदस्य शामिल होते थे और कम से कम दो महिलाओं की नियुक्ति अनिवार्य थी। यह संरचना सीमित थी और इसमें विभिन्न समुदायों का प्रतिनिधित्व नहीं था। 2024 के विधेयक में SWB को अधिक विविध बनाया गया है। अब राज्य सरकार दो गैर-मुस्लिम सदस्यों, शिया, सुन्नी, बोहरा, आगाखानी, और पिछड़े वर्ग के मुस्लिम समुदायों से एक-एक प्रतिनिधि को नामित करेगी। साथ ही कम से कम दो मुस्लिम महिलाओं की नियुक्ति की शर्त बरकरार रहेगी। यह बदलाव बोर्ड को अधिक समावेशी और संतुलित बनाने का प्रयास है, ताकि विभिन्न हितधारकों की आवाज सुनी जा सके।

वक्फ न्यायाधिकरण की संरचना और अपील

1995 के अधिनियम में वक्फ न्यायाधिकरण में एक जज, अपर जिला मजिस्ट्रेट और मुस्लिम कानून का विशेषज्ञ शामिल होता था। इसके फैसलों को उच्च न्यायालय में चुनौती देने की सीमित संभावना थी, जिससे पारदर्शिता और जवाबदेही प्रभावित होती थी। 2024 के संशोधन विधेयक में न्यायाधिकरण की संरचना में बदलाव किया गया है। अब इसमें मुस्लिम कानून के विशेषज्ञ को हटाकर जिला न्यायालय के जज (अध्यक्ष) और एक संयुक्त सचिव स्तर के राज्य सरकार के अधिकारी को शामिल किया जाएगा। इसके अलावा न्यायाधिकरण के फैसलों के खिलाफ 90 दिनों के भीतर उच्च न्यायालय में अपील की अनुमति दी गई है। यह बदलाव विवाद समाधान को अधिक निष्पक्ष और जवाबदेह बनाने के लिए है।

केंद्र सरकार की शक्तियाँ

साल 1995 के अधिनियम में केंद्र सरकार की शक्तियाँ अपेक्षाकृत सीमित थीं। राज्य सरकारें वक्फ खातों का ऑडिट कर सकती थीं, लेकिन केंद्र का कोई प्रत्यक्ष नियंत्रण नहीं था। इसके विपरीत, 2024 के संशोधन विधेयक में केंद्र सरकार को व्यापक अधिकार दिए गए हैं। अब केंद्र को वक्फ पंजीकरण, खातों, और लेखा परीक्षा (CAG या नामित अधिकारी के जरिए) से संबंधित नियम बनाने का अधिकार होगा। यह प्रावधान केंद्रीकृत निगरानी और वित्तीय अनुशासन को बढ़ावा देने के लिए लाया गया है, ताकि वक्फ संपत्तियों का प्रबंधन अधिक व्यवस्थित हो सके।

पुरानी मस्जिदों, दरगाहों, मजहबी स्थलों से छेड़छाड़ नहीं

सबसे बड़ी बात यह है कि सरकार ने साफ कर दिया है कि पुरानी मस्जिदों, दरगाहों या किसी भी मुस्लिम मजहबी स्थल से छेड़छाड़ नहीं होगी। यह सुझाव सहयोगी दल जेडीयू ने दिया था, जिसे बीजेपी ने मान लिया। इसका मतलब है कि यह कानून पुरानी तारीख से लागू नहीं होगा। लेकिन दूसरी तरफ वक्फ बोर्ड और केंद्रीय वक्फ परिषद में गैर-मुस्लिम सदस्यों की संख्या बढ़ाने का फैसला कई लोगों को नागवार गुजर रहा है। धारा 11 के तहत अब दो गैर-मुस्लिम सदस्य (हिंदू या अन्य धर्मों के लोग) बोर्ड में शामिल हो सकते हैं। साथ ही, राज्य सरकार का एक अधिकारी भी इसमें होगा।

कम से कम 5 साल इस्लाम का पालन

विवाद की एक और बड़ी वजह है बीजेपी सांसद तेजस्वी सूर्या का प्रस्ताव, जिसे बिल में शामिल कर लिया गया। इसके मुताबिक, कोई भी व्यक्ति अपनी संपत्ति वक्फ में तभी खैरात (दान) कर सकेगा, जब वह कम से कम 5 साल से इस्लाम का पालन कर रहा हो। साथ ही दी गई संपत्ति में धोखाधड़ी न हो, इसका सबूत भी देना होगा।

ट्रिब्यूनल में बदलाव

वक्फ ट्रिब्यूनल में भी बदलाव हुआ है। पहले इसमें दो सदस्य होते थे, लेकिन अब तीसरा सदस्य एक इस्लामिक स्कॉलर होगा। पहले कलेक्टर वक्फ संपत्तियों की जाँच करता था, लेकिन अब यह जिम्मा किसी वरिष्ठ अधिकारी को दिया जाएगा, जिसे राज्य सरकार चुनेगी। वक्फ संपत्तियों की सूची को गजट में छपने के 90 दिनों के अंदर ऑनलाइन पोर्टल पर अपडेट करना होगा, ताकि पारदर्शिता बनी रहे।

जेपीसी की सिफारिशों को किया गया शामिल

इस बिल को तैयार करने में संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) की सिफारिशों का बड़ा हाथ है। जेपीसी ने 36 बैठकें कीं, 10 शहरों में दौरे किए और 97 लाख से ज्यादा ज्ञापन हासिल किए। मुंबई, अहमदाबाद, हैदराबाद से लेकर पटना और लखनऊ तक, समिति ने हर कोने से लोगों की राय ली। ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड, जमीयत उलमा-ए-हिंद और दारुल उलूम देवबंद जैसे संगठनों से भी बात हुई। सरकार का कहना है कि यह बिल वक्फ संपत्तियों को डिजिटल बनाने, सर्वे को तेज करने और गरीबों के कल्याण के लिए है।
इन सबके बीच सवाल यह है कि क्या यह बिल वाकई वक्फ संपत्तियों का भला करेगा? देश में करीब 5,973 सरकारी संपत्तियों को वक्फ घोषित करने के मामले सामने आए हैं। आँकड़ों के मुताबिक, सितंबर 2024 तक, 25 राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों के वक्फ बोर्डों के आँकड़ों से पता चलता है कि 5,973 सरकारी संपत्तियों को वक्फ घोषित किया गया है। इनमें से कुछ के उदाहरण देख सकते हैं…
सितंबर 2024 में आवास और शहरी मामलों के मंत्रालय के अनुसार, 108 संपत्तियाँ भूमि और विकास कार्यालय के नियंत्रण में हैं, 130 संपत्तियाँ दिल्ली विकास प्राधिकरण के नियंत्रण में हैं और सार्वजनिक डोमेन में 123 संपत्तियों को वक्फ संपत्ति घोषित किया गया है और मुकदमेबाजी में लाया गया है।

वक्फ घोषित की गई अन्य गैर-मुस्लिम संपत्तियों के उदाहरण

तमिलनाडु: थिरुचेंथुरई गाँव का एक किसान वक्फ बोर्ड के पूरे गाँव पर दावे के कारण अपनी जमीन नहीं बेच पाया। इस अप्रत्याशित आवश्यकता ने उसे अपनी बेटी की शादी के लिए लोन चुकाने के लिए अपनी जमीन बेचने से रोक दिया।
गोविंदपुर गाँव, बिहार: अगस्त 2024 में, बिहार सुन्नी वक्फ बोर्ड के पूरे एक गाँव पर दावे ने सात परिवारों को प्रभावित किया, जिसके कारण पटना उच्च न्यायालय में मामला चला। मामला विचाराधीन है।
केरल: सितंबर 2024 में, एर्नाकुलम जिले के लगभग 600 ईसाई परिवार अपनी पुश्तैनी जमीन पर वक्फ बोर्ड के दावे का विरोध कर रहे हैं। उन्होंने संयुक्त संसदीय समिति में अपील की है।
कर्नाटक: वक्फ बोर्ड द्वारा विजयपुरा में 15,000 एकड़ जमीन को वक्फ भूमि के रूप में नामित किए जाने के बाद किसानों ने विरोध प्रदर्शन किया। बल्लारी, चित्रदुर्ग, यादगीर और धारवाड़ में भी विवाद हुए। हालाँकि सरकार ने आश्वासन दिया कि कोई बेदखली नहीं होगी। इसके साथ ही कर्नाटक में 40 वक्फ संपत्तियों को अधिसूचित किया गया, जिनमें कृषि भूमि, सार्वजनिक स्थान, सरकारी भूमि, कब्रिस्तान, झीलें और मंदिर शामिल हैं।
उत्तर प्रदेश और पंजाब: यूपी वक्फ बोर्ड द्वारा कथित भ्रष्टाचार और कुप्रबंधन के खिलाफ शिकायतें की गई हैं। तो पंजाब वक्फ बोर्ड ने पटियाला में शिक्षा विभाग की भूमि पर दावा किया है।
नए बिल में कलेक्टर से ऊपर के अधिकारी को संपत्तियों की जाँच का अधिकार दिया गया है, ताकि गलत दावों पर लगाम लगे। बहरहाल, गरीबों के लिए भी इस बिल से उम्मीदें हैं। डिजिटल पोर्टल से वक्फ संपत्तियों की निगरानी होगी, जिससे कुप्रबंधन और अतिक्रमण रुकेगा। इससे होने वाली आय को शिक्षा, स्वास्थ्य और आवास जैसे कल्याणकारी कामों में लगाया जाएगा। लेकिन गैर-मुस्लिम सदस्यों की मौजूदगी और इस्लाम पालन की शर्त जैसे मुद्दों पर बहस छिड़ी हुई है।

ईद की रात अब्दुल असलम ने हैदराबाद में किया जर्मन महिला का बलात्कार, 5 नाबालिगों ने दिया साथ


तेलंगाना के हैदराबाद में एक जर्मन महिला के साथ बलात्कार का मामला सामने आया है। घटना हैदराबाद के बाहरी इलाक़े ममिदिपल्ली की है। सोमवार (31 मार्च, 2025) की रात जर्मन महिला के साथ एक गाड़ी के भीतर रेप हुआ। बताया जा रहा है कि आरोपित ने जर्मन महिला और उसके पुरुष मित्र को हैदराबाद घुमाने का ऑफर दिया, इसके बाद पुरुष मित्र को कहीं उतार दिया और महिला को सुनसान इलाक़े में ले जाकर उसका यौन शोषण किया।

घटना के 12 घंटे के भीतर आरोपित को याकूतपुरा स्थित उसके आवास के बाहर से गिरफ़्तार कर लिया गया। उसे मंगलवार को न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया है। दोनों जर्मन पर्यटक मीरपेट स्थित अपने भारतीय मित्र के आमंत्रण पर भारत आए थे। इन्होंने भारत के कुछ अन्य शहरों का भी भ्रमण किया था और गुरुवार को वापस जाने वाले थे।

आरोपित की पहचान मोहम्मद अब्दुल असलम के रूप में हुई है, जो स्विफ्ट डिजायर कार को ड्राइव कर रहा था। उसके अलावा गाड़ी में 5 अन्य लोग भी थे। वे सभी नाबालिग थे और उनकी उम्र 9 से 16 वर्ष के बीच बताई जा रही है। पीड़िता ने गाड़ी से कूदकर अपनी जान बचाई। अब्दुल असलम दुबई में ड्राइविंग कर चुका है।

हरिद्वार का औरंगजेबपुर बना शिवाजी नगर, मियांवाला हुआ रामवाला… उत्तराखंड में 17 जगहों के बदले नाम: बोले CM धामी- भारतीय संस्कृति-विरासत के आधार पर किया बदलाव


उत्तराखंड में 4 जिलों के 17 जगहों के नाम में बदलाव किया गया है। मुख्यमंत्री पुष्कर धामी ने सोमवार (31 मार्च 2025) को बदले हुए नामों की घोषणा की। उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति और विरासत को ध्यान में रखते हुए नाम बदले गए हैं। वहीं, कांग्रेस ने फैसले को बीजेपी द्वारा जनता का असली मुद्दे से ध्यान भटकाने का नाटक करार दिया।

प्रदेश में बदले गए स्थानों की लिस्ट मुख्यमंत्री पुष्कर धामी ने अपने अधिकारिक ‘X’ अकाउंट पर पोस्ट की। सीएम ने लिखा, “हरिद्वार जनपद का औरंगज़ेबपुर अब शिवाजी नगर के नाम से जाना जाएगा…जनभावनाओं के अनुरूप हरिद्वार, देहरादून, नैनीताल और उद्धम सिंह नगर जनपदों में स्थित विभिन्न स्थानों के नाम परिवर्तित किए गए हैं।”

सूची के मुताबिक, हरिद्वार जिले में औरंगजेबपुर का नाम शिवाजी नगर गाजीवाली का नाम आर्यनगर, चांदपुर का नाम ज्योतिबा फुले नगर, मोहम्मदपुर जट का नाम मोहनपुर जट, खानपुर कुर्सली का नाम अंबेडकर नगर, इदरीशपुर का नाम नंदपुर, खानपुर का नाम श्री कृष्णपुर, अकबरपुर फाजलपुर का नाम विजयनगर, आसफनगर का नाम देवनारायण नगर और सलेमपुर राजपूताना का नाम शूरसेन नगर रखा गया है।

देहरादून जिले में वर्तमान स्थान मियांवाला का नाम रामजीवाला, पीरवाला का नाम केसरी नगर, चांदपुर खुर्द का नाम पृथ्वीराज नगर और अब्दुल्लापुर का नाम अब दक्षनगर किया गया है।

नैनीताल जिले में नवाबी रोड अब अटल मार्ग और पनचक्की से आईटीआई मार्ग को गुरु गोवलकर मार्ग नाम से जाना जाएगा। साथ ही उधम सिंह नगर जिले में नगर पंचायत सुल्तानपुर पट्टी का नाम बदलकर अब कौशल्या पूरी हो गया है।

बीजेपी ने इस फैसले को ऐतिहासिक बताया है। उत्तराखंड के मीडिया सचिव मनवीर चौहान ने कहा कि विभिन्न स्थानों के नाम बदलने का काम जनभावना और भारतीय संस्कृति एवं विरासत के अनुरूप किया जा रहा है। इससे लोग भारतीय संस्कृति और इसके संरक्षण में योगदान देने वाले महापुरुषों से प्रेरणा ले सकेंगे।

वहीं, कांग्रेस से पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने कहा, “नाम बदलना बीजेपी का एजेंडा बन गया है क्योंकि उनके पास असली काम दिखाने के लिए कुछ नहीं है। पिछले आठ साल विफल रहे हैं। अब जनता उनसे सवाल कर रही है। सवालों से ध्यान भटकाने के लिए वे नाम बदलने का नाटक कर रहे हैं।”

नागपुर को जलाने के लिए क्यों न सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस अभय ओका और जस्टिस अगस्टीन मसीह को दोषी माना जाए; क़त्ल के अपराधी को जमानत दे दी और 8 महीने बाद उसने नागपुर को आग लगा दी

सुभाष चन्द्र

हिंदू समाज नेता कमलेश तिवारी की 18 अक्टूबर, 2019 को की गई जघन्य हत्या तो आपको याद होगी। सईद असीम अली हत्या के साजिशकर्ता को महाराष्ट्र ATS ने नागपुर से 21 अक्टूबर, 2019 को गिरफ्तार कर लिया था 

अप्रैल, 2024 में उसकी जमानत अर्जी इलाहाबाद हाई कोर्ट ने ख़ारिज करते हुए हत्या के लिए कहा था “ It is case driven by intense communal animosity (घोर सांप्रदायिक बैर), ultimately resulting in the vicious daylight killing of Tiwari”.

लेखक 
चर्चित YouTuber
 
सुप्रीम कोर्ट में उसकी जमानत याचिका लेकर वकील सिद्धार्थ दवे गए और 25 जुलाई, 2024 को सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस अभय एस ओका और जस्टिस अगस्टीन जॉर्ज मसीह की बेंच ने असीम अली को जमानत दे दी जजों ने जमानत देते हुए कहा कि “आरोपी पहले ही साढ़े चार से जेल में बंद है, जेल में रहने से पहले का उसके कोई Criminal Antecedants भी नहीं हैं और UP Gangsters and anti-social Activities (Prevention) Act, 1986 में केस दर्ज नहीं किया गया है

UP Gangsters Act की बात आप कैसे कर रहे हैं जबकि सुप्रीम कोर्ट स्वयं इस एक्ट की वैधानिकता पर सुनवाई कर रहा है और अपनी टिप्पणियां में इसके कुछ प्रावधानों को खतरनाक कह चुका है

कमलेश तिवारी ने कथित तौर पर पैगम्बर मोहम्मद पर टिप्पणी की थी और अखिलेश सरकार ने उस पर NSA लगा दिया था जिसकी वजह से वह एक साल से भी ज्यादा जेल में रहा हाई कोर्ट ने NSA को ख़ारिज कर दिया और तब ही वह जेल से निकला तब से ही मुस्लिमों से उसे धमकियां मिल रही थी और अंतत 18 अक्टूबर, 2019 को मारा गया

यानी असीम अली से ज्यादा तो जेल में कमलेश तिवारी रहा लेकिन मीलॉर्ड को तरस अली पर आया पहले criminal record बेशक न रहा हो लेकिन यह तो ख्याल करते कि कि वह हत्या के आरोप में जेल में था जिसे आपने केवल इसलिए जमानत पर छोड़ दिया कि वह साढ़े चार साल जेल में रह चुका है

परिणाम क्या हुआ मीलॉर्ड, सईद असीम अली ने आपके छोड़ने के केवल 8 महीने बाद 17 मार्च, 2025 को नागपुर को आग के हवाले कर दिया इलाहाबाद हाई कोर्ट द्वारा कही गई बात उसने साबित कर दी intense communal animosity जिसकी वजह से हिंदुओं के घरों को आग लगा दी गई, 30 लोग घायल हुए और सैकड़ों बाइक और कारें जला दी गई क्या कोई अधिकार था यह करने का उसे?

सही मायने में देखा जाए तो नागपुर को आग लगाने के लिए जस्टिस अभय एस ओका और जस्टिस अगस्टीन जॉर्ज मसीह जिम्मेदार हैं हर मामले में Bail Court बनने से पहले 50 बार सोचना चाहिए कि जिसे छोड़ रहे हो वह क्या करने की हिम्मत रखता है और अगर आप इतना भी नहीं भांप सकते तो आपको सुप्रीम कोर्ट का जज बने रहने का कोई अधिकार नहीं है? 

अपराधियों को छोड़ने की आदत देश में अनेक समस्याएं पैदा कर रही है और न्यायपालिका उसके पूरी तरह जिम्मेदार है एक दिन ऐसे ही किसी अपराधी का यह लोग भी शिकार बन सकते हैं और तब उन्हें गलती का अहसास होगा

अलीगढ़ : ‘ये हिंदू है, मारो सा@ को’: VHP कार्यकर्ता को अकेला देख ईद पर शराब पी रहे मुस्लिमों ने चाकुओं से गोदा

                                                      पीड़ित हिन्दू विकास (बाएँ) के आई चोटें
उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ में ईद पर शराब पी रहे मुस्लिमों ने एक विश्व हिन्दू परिषद (VHP) कार्यकर्ता पर जानलेवा हमला किया। हिन्दू व्यक्ति ने मुस्लिम युवकों को शराब पीने से रोका था। मुस्लिमों ने पूरे शरीर पर चाकू मारे और उसे गंभीर रूप से घायल कर दिया। पीड़ित हिन्दू का इलाज चल रहा है। मामले में FIR दर्ज करवाई गई है।

यह घटना अलीगढ़ के छर्रा थाना क्षेत्र के सलगवाँ गाँव में हुई है। इस मामले में पीड़ित विकास सिंह के मामा ने बताया है कि उनका भांजा ईद (31 मार्च, 2025) के दिन काम निपटा कर गाँव आ रहा था। गाँव के ही मोड़ पर उसे 3-4 लोग शराब पीते हुए दिखाई दिए।

विकास ने उन्हें सार्वजनिक स्थल पर शराब पीने से मना किया। इसके बाद मुस्लिम भड़क गए। उनमें से एक अमन ने विकास का नाम पूछा। विकास ने जब अपना नाम बताया तो अमन ने कहा कि यह व्यक्ति हिन्दू है और इसे मारो। इसके बाद अमन ने अपने साथी फरहत और अरबाज के साथ मिलाकर हमला कर दिया।

उन्होंने विकास को पकड़ कर चाकू मारे। इससे विकास गंभीर रूप से घायल हो गया। विकास इसके बाद किसी तरह यहाँ से बच कर निकला। उसके मामा ने बताया है कि मुस्लिम विकास को जान से मार देना चाहते थे। इसके बाद विकास को अस्पताल ले जाया गया। विकास को इस हमले में गंभीर चोटें आई हैं।

मामले में छर्रा थाने में FIR लिखवाई गई है। ऑपइंडिया के पास FIR की कॉपी मौजूद है। पीड़ित विकास को गंभीर चोटों के चलते अलीगढ़ के एक अस्पताल रेफर किया गया है। मामले में अब पुलिस कार्रवाई कर रही है। उसने 2 मुख्य आरोपितों को गिरफ्तार भी किया है।

मामले में छर्रा थाना CO धनंजय कुमार ने बताया है कि इस संबंध में FIR दर्ज कर ली गई है और 2 मुख्य आरोपितों को हिरासत में लिया गया है और उन्हें जेल भेजा जा रहा है। पुलिस ने बताया है कि वह अब आगे की कार्रवाई कर रही है।

ऑपइंडिया ने इस विषय में विश्व हिन्दू परिषद के बृज प्रांत के मीडिया प्रभारी प्रतीक रघुवंशी से भी बात की। उन्होंने बताया कि पीड़ित विश्व हिन्दू परिषद का कार्यकर्ता है और उस पर हमला करने वाले मुस्लिम उसे पहले से जानते रहे हैं। प्रतीक रघुवंशी ने बताया कि पीड़ित ड्राइवर का काम करता है और मुस्लिम उस पर शराब पीने से रोके जाने के चलते हमला किया।

प्रतीक रघुवंशी ने इस मामले में कड़ी कार्रवाई किए जाने की माँग की है। उन्होंने कहा है कि विश्व हिन्दू परिषद इस मामले में कार्रवाई ना होने पर सड़कों पर भी उतरेगा।

दावा 20000 कमरों का, मिले 7000 ही: दिल्ली के शिक्षा मंत्री ने बताया- किचन-टॉयलेट को भी क्लासरूम में गिनती थी केजरीवाल सरकार, 49 रूपए लाख की ‘देशभक्ति’ के प्रचार पर खर्च किए 11 करोड़ रूपए

       केजरीवाल सरकार के दौरान शिक्षा व्यवस्था का खूब हल्ला मचाया गया था (फोटो साभार: Indian Express)
दिल्ली आम आदमी पार्टी की सरकार के दौरान शिक्षा व्यवस्था में बदलाव के आँकड़े बढ़ा-चढ़ा कर पेश किए गए थे। जितने क्लासरूम बनाने का दावा केजरीवाल सरकार करती थी, उसका एक तिहाई ही असल में निर्माण हुआ था। वहीं एक 4 करोड़ रूपए की योजना के प्रचार के लिए 20 करोड़ रूपए का खर्च किया गया था। यह सारे खुलासे के शिक्षा मंत्री आशीष सूद ने किए हैं।

दिल्ली के शिक्षा मंत्री आशीष सूद ने दिल्ली विधानसभा में बजट सत्र की चर्चा के दौरान पूर्ववर्ती सरकार के विषय में कई आँकड़े रखे हैं। उन्होंने शुक्रवार (28 मार्च, 2025) को बताया कि केजरीवाल सरकार के दौरान शिक्षा मॉडल का प्रचार करते हुए दावा किया जाता था कि 20 हजार कमरे बनाए गए।

मंत्री सूद ने बताया कि यह झूठ था और जब इस विषय में जाँच करवाई गई तो कमरों की संख्या की 7 हजार ही निकली है। सूद ने बताया कि केजरीवाल सरकार जिन्हें क्लासरूम बताती थी, वह असल में स्टोररूम, किचन और बाकी कामों के लिए बनाए जाने वाले कमरे थे।

केजरीवाल सरकार ने शौचालयों तक को बच्चों की पढ़ाई का कमरा बता दिया था। मंत्री सूद ने बताया है कि भाजपा सरकार अब लोक निर्माण विभाग (PWD) को इस विषय में आदेश देगी कि वह मात्र क्लास रूम को ही गिने ना कि बाकी तरह के निर्माण को।

शिक्षा मंत्री सूद ने यह भी बताया है कि केजरीवाल सरकार के दौरान स्कूलों में हैप्पीनेस करिकुलम नाम का पाठ्क्रम जोड़ा गया था। इस पर 4 करोड़ रूपए खर्च किए गए थे। लेकिन केजरीवाल सरकार ने इसके प्रचार पर 20 करोड़ रूपए का खर्च कर डाला।

उन्होंने आरोप लगाया कि केजरीवाल की सरकार के दौरान देशभक्ति करिकुलम पर 49 लाख रूपए खर्च किए गए और इसके प्रचार पर 11 करोड़ रूपए से अधिक खर्च कर दिए गए। आशीष सूद ने आम आदमी पार्टी से कहा कि उनके कर्म वापस उनके पास आएँगे।

दिल्ली के स्कूलों में कमरों को निर्माण को लेकर यह पहला खुलासा नहीं है। इससे पहले केजरीवाल सरकार पर स्कूल कमरों के निर्माण में हजारों करोड़ के घोटाले का आरोप लगा था। मनीष सिसोदिया और सत्येन्द्र जैन पर आरोप है कि उन्होंने 1300 करोड़ रूपए का घोटाला स्कूल के कमरों के निर्माण में किया।

आरोप है कि उन्होंने उन एजेंसियों को भी पैसे दे दिए जिन्होंने कमरे बनाए ही नहीं। इसको लेकर दर्ज की गई शिकायत के बाद उन पर मुकदमा चलाने की मंजूरी भी राष्ट्रपति मुर्मू ने हाल ही में दे दी थी। अब इस मामले में आगे कार्रवाई होनी है।

शिक्षा मॉडल पर चिल्लाने वाली केजरीवाल सरकार ने दिल्ली में स्कूल पर कुछ ख़ास काम नहीं किया था। एक रिपोर्ट बताती है कि आम आदमी पार्टी के शासन के दौरान दिल्ली के भीतर मात्र 75 नए स्कूल बनाए गए थे। पुराने स्कूलों को नया नाम देकर या उनमें मरम्मत का काम करवा कर केजरीवाल लाइमलाईट लूटना चाहते थे।

कपिल सिब्बल फंसा हुआ है क्या यशवंत वर्मा के मामले में? बयान सिब्बल का अपना है या सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन का? भ्रष्टाचार कैसे चलता है कोर्ट में, यह समझने की जरूरत है

सुभाष चन्द्र 

कपिल सिब्बल आज खुल कर जस्टिस यशवंत वर्मा के पक्ष में खड़ा हो गया। उसने कहा है कि “सुप्रीम कोर्ट का वर्मा के मामले में जांच रिपोर्ट को सार्वजनिक करना एक खतरनाक ट्रेंड है और जब तक जांच पूरी नहीं हो जाती, तब तक किसी भी जिम्मेदार नागरिक को इस मामले में टिप्पणी नहीं करनी चाहिए जब तक कोई व्यक्ति दोषी नहीं पाया जाता तब तक उसे निर्दोष माना जाता है, इस मामले में अभी तक जांच पूरी नहीं हो पाई है और जांच पूरी होने तक किसी को टिप्पणी नहीं करनी चाहिए”

यह दर्द सिब्बल का यशवंत वर्मा के लिए क्यों छलका है? क्या उनका यह निजी बयान है या इसे सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन का बयान माना जाना चाहिए? अगर यह बयान बार का है तो क्या उसे बार की जनरल बॉडी मीटिंग में तय किया गया सिब्बल इस मामले में खुद चौधरी नहीं बन सकता यह तो जज वर्मा हैं, सिब्बल तो हर अपराधी का वकील होता है

लेखक 
चर्चित YouTuber 

6 हाई कोर्ट की बार एसोसिएशन ने सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस से मिलकर वर्मा के ट्रांसफर का विरोध किया और सिब्बल उसके साथ खड़े हैं, कुछ तो गड़बड़ जरूर है

सिब्बल पहले दिन से वर्मा के पक्ष में बयानबाजी कर रहा है इसका मतलब यह भी निकलता है कि वह यशवंत वर्मा के गड़बड़झाले में लिप्त है जिसकी पूरी संभावना है आज एक संसदीय समिति ने कहा है कि एक ही पद पर लंबे समय तक बैठे अधिकारी भ्रष्टाचार बढ़ाते हैं यह बात सुप्रीम कोर्ट के जजों पर भी लागू होती है क्योंकि वहां भी 8-8 साल तक जज कुर्सी संभाले रहते हैं और इतना ही नहीं सिब्बल, सिंघवी, प्रशांत भूषण आदि जो वकील अदालतों में लंबे समय से प्रैक्टिस कर रहे हैं, उनके जजों के साथ ऐसे संबंध बने होते हैं जो अदालतों में भ्रष्टाचार का जरिया बनते हैं

जजों के साथ सौदेबाजी ऐसे वकील ही करते हैं और यशवंत वर्मा के घर मिले धन से साबित होता है कि यह सौदेबाजी होती है सिब्बल लोगों को टिप्पणी करने से भी रोकना चाहता है जिसका मतलब वह लोगों के मौलिक अधिकारों पर भी लगाम लगाना चाहता है अगर यशवंत वर्मा को सिब्बल निर्दोष मानता है तो सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर मांग करे कि उन्हें इलाहाबाद हाई कोर्ट में काम करने से न रोका जाए यशवंत वर्मा के मामले में प्रशांत भूषण का मुंह बंद है जो अभी तक कुछ नहीं बोला है

जब एक दो वकील हाई कोर्ट से सीधे जज बना दिए जाते हैं तो इसका मतलब साफ़ होता है कि चढ़ावा चढ़ा कर ही जज बने हैं यशवंत वर्मा भी सीधे हाई कोर्ट में प्रैक्टिस करते हुए जज बने थे और उनके पास मिला धन बता रहा है कि मोटा चढ़ावा चढ़ा कर ही ऊपर चढ़े होंगे जिसकी भरपाई उन्होंने तबियत से की

अभी 5 दिन पहले सुप्रीम कोर्ट के कॉलेजियम ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के दो वकीलों अमिताभ कुमार राय और राजीव लोचन शुक्ला को इलाहाबाद हाई कोर्ट का जज नियुक्त किया है जबकि उस कोर्ट में तो हज़ारों वकील प्रैक्टिस करते होंगे फिर केवल दो पर उंगली कैसे रख दी गई और इसका क्या पैमाना होता है किसी को कुछ पता नहीं, अलबत्ता एक चढ़ावे का पैमाना ही समझ आता है ऐसे होता है अदालत में भ्रष्टाचार जिसका किसी को कुछ पता नहीं चलता

सिब्बल वही वकील है जिसने जस्टिस रामास्वामी पर चले महाभियोग में उसका लोकसभा में बचाव किया था और मुझे पूरी उम्मीद है कि अगर यशवंत वर्मा पर महाभियोग चला तो उसे भी बचाने के लिए सिब्बल ही खड़ा होगा सिब्बल किस जांच की बात कर रहे हैं, जांच बिना CBI/ED के बिना कभी पूरी नहीं होगी 3 जजों की कमेटी को कुछ नहीं मिलेगा

मेरठ में ईद की नमाज के बाद आपस में भिड़ी मुस्लिम जमात, पहले लाठी-डंडे चले, फिर फायरिंग भी: 5 गिरफ्तार, Video


उत्तर प्रदेश के मेरठ में सिवालखास कस्बे में ईद की नमाज़ के बाद मुस्लिम समाज के दो पक्षों के बीच मारपीट हुई। इस दौरान दोनों ने एक दूसरे पर डंडे से हमला किया, फिर पथराव हुआ और बीच में फायरिंग की आवाज भी सुनाई पड़ी। पूरी घटना में कई लोग घायल हो गए, कुछ के तो खून तक निकल आया। हिंसा की वीडियो अब सोशल मीडिया पर वायरल है।

घटना की सूचना पर जानी थाना समेत कई थानों की पुलिस मौके पर पहुँची और मामला शांत कराया। घायलों को अस्पताल में भर्ती कराया गया। बताया जा रहा है कि घायलों को मारपीट में मामूली चोटें आई हैं। गंभीर स्थिति नहीं है। पुलिस ने दोनों पक्षों की तहरीर ले ली है। मामले में 5 आरोपितों को गिरफ्तार किया गया है।

SP देहात राकेश कुमार ने बताया कि रविवार (30 मार्च 2025) को सिवालखास निवासी जाहिद का बाज़ार में नाजिम से कहासुनी हुई थी। उस समय तो मामला संभल गया। सोमवार को ईद की नमाज के बाद रास्ते में दोनों का आमना-सामना हो गया। दोनों तरफ से भारी संख्या में लोगों ने एक दूसरे पर पथराव किया। फायरिंग भी हुई। हालाँकि अभी तक किसी को गोली लगने की सूचना नहीं है।

मोदी सरकार और सुप्रीम कोर्ट संविधान का क्यों नहीं पालन कर रहे? जज को हटाने के लिए संविधान में महाभियोग का प्रावधान : कौन थे जस्टिस रामास्वामी जिन पर सबसे पहले चला महाभियोग?

                          सुप्रीम कोर्ट और जस्टिस वी. रामास्वामी (साभार: सुप्रीम कोर्ट/ट्रिब्यून)
दिल्ली हाई कोर्ट के जस्टिस यशवंत वर्मा के घर मिली बड़ी मात्रा में अघोषित नकदी को लेकर कई तरह के सवाल उठ रहे हैं। मामला सामने आने के बाद सर्वोच्च न्यायालय ने तीन जजों का एक एक कमिटी बनाई है, जो इस मामले की जाँच कर रही है। वहीं, जस्टिस यशवंत वर्मा को हटाने की माँग लगातार तेज होने लगी है। हालाँकि, सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट के जजों को हटाने की एक लंबी प्रक्रिया है।

दरअसल, दिल्ली हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा के आवास पर होली के दिन आग लगने की घटना सामने आई थी। उस समय के सामने आए वीडियो में दिख रहा है कि दमकल कर्मी आग में जले नोटों की गड्डियों को हटा रहे हैं। मामला सामने आने के बाद भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) संजीव खन्ना ने जस्टिस वर्मा को उनके गृह हाई कोर्ट इलाबादा भेजने का फैसला सुना दिया।

हालाँकि, इलाहाबाद हाई कोर्ट बार एसोसिएशन ने इसका विरोध किया और कहा कि इलाहाबाद हाई कोर्ट कोई कूड़ेदान नहीं है। इसके बाद CJI की अध्यक्षता वाली कॉलेजियम ने कहा कि जस्टिस वर्मा को इलाहाबाद भेजने का फैसले का नकदी मामले से कोई संबंध नहीं है। जस्टिस वर्मा को इलाहाबाद हाई कोर्ट से ही दिल्ली हाई कोर्ट में लाया गया था।

CJI खन्ना ने जस्टिस मामले के दिल्ली स्थित आधारिक आवास में नकदी जलने की घटना का ‘आंतरिक जाँच’ कराने का निर्णय लिया। इस जाँच के लिए तीन सदस्यों की एक समिति बनाई गई है। इस समिति में पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस जस्टिस शील नागू, हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस जीएस संधावालिया और कर्नाटक हाईकोर्ट की जस्टिस अनु शिवरामन शामिल हैं।

वहीं, सीनियर एडवोकेट उज्ज्वल निकम ने माँग की है कि इस मामले स्थानांतरण या निलंबन पर्याप्त नहीं है। उन्होंने कहा कि जस्टिस वर्मा के खिलाफ संसद को आपराधिक आरोप तय करना चाहिए या फिर उनके खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया शुरू कर उन्हें हटाना चाहिए। इसी तरह कई पूर्व जज और वरिष्ठ वकील भी जस्टिस वर्मा के खिलाफ महाभियोग चलाने की माँग की है।

क्या होता है महाभियोग? कैसे हटाए जाते हैं जज?

भारत के संविधान में सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के जजों की शक्तियों एवं उन्हें हटाने के बारे में बताया गया है। इसके साथ ही संसद के अनुच्छेद 124(4) में सुप्रीम कोर्ट को हटाने के लिए महाभियोग चलाने की प्रक्रिया के बारे में विस्तार से बताया गया है। वहीं, संविधान के अनुच्छेद 218 में कहा गया है कि हाई कोर्ट के जजों को हटाने के लिए भी यही प्रक्रिया का पालन किया जाएगा।
संविधान का अनुच्छेद 124(4) कहता है कि किसी जज को ‘प्रमाणित कदाचार’ और ‘अक्षमता’ के आधार पर ही हटाया जा सकता है। इसके लिए संसद द्वारा कार्यवाही शुरू की जाती है और इसके दोनों सदनों द्वारा पारित होने के बाद राष्ट्रपति संबंधित जज को हटाने का आदेश देते हैं। दरअसल, न्यायपालिका की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए महाभियोग का आधार और प्रक्रिया को उच्च स्तर का रखा गया है।
न्यायाधीशों को हटाने की प्रक्रिया ‘न्यायाधीश जाँच अधिनियम 1968’ में विस्तृत रूप से बताई गई है। इस अधिनियम में जज को पद से हटाने के उद्देश्य से कार्यवाही आरंभ करने के लिए सबसे पहला चरण सदस्यों की संख्या बताई गई। इसके लिए लोकसभा के कम-से-कम 100 सदस्य स्पीकर को हस्ताक्षरित नोटिस देंगे या फिर राज्यसभा के कम-से-कम 50 सदस्य सभापति को हस्ताक्षरित नोटिस देंगे।
अध्यक्ष या सभापति सांसदों या संबंधित लोगों से परामर्श कर सकते हैं और नोटिस से संबंधित प्रासंगिक आरोपों की जाँच करते हैं। इसके आधार पर वे प्रस्ताव को स्वीकार करने या अस्वीकार करने का निर्णय लेते हैं। यदि प्रस्ताव स्वीकार कर लिया जाता है तो अध्यक्ष या सभापति (जो भी इसे प्राप्त करते हैं) संबंधित जज के खिलाफ शिकायत की जाँच के लिए तीन सदस्यीय समिति का गठन करेंगे।
इस समिति में सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश, हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस और एक प्रतिष्ठित न्यायविद शामिल होंगे। यह समिति आरोप तय करेगी और उसके आधार पर जाँच की जाएगी। आरोपों की एक प्रति न्यायाधीश को भेजी जाएगी। वह जज अपने बचाव में लिखित जवाब देता है। जाँच पूरी करने के बाद समिति अपनी रिपोर्ट अध्यक्ष या सभापति को देती है। उस रिपोर्ट को संसद के संबंधित सदन में रखा जाता है।
रिपोर्ट में दुर्व्यवहार या अक्षमता पाई जाती है तो जज को हटाने का प्रस्ताव शुरू किया जाता है और सदन में बहस होती है। प्रस्ताव दोनों सदनों में पारित होना चाहिए। इसके लिए उस सदन की कुल संख्या के का बहुमत या उस सदन में उपस्थित और वोट करने वाले सदस्यों का कम-से-कम दो-तिहाई बहुमत होना चाहिए। प्रस्ताव के पक्ष में मतों की संख्या प्रत्येक सदन की कुल सदस्यता के 50% से अधिक होनी चाहिए।
यदि प्रस्ताव स्वीकृत हो जाता है तो प्रस्ताव को स्वीकृति के लिए दूसरे सदन में भेजा जाता है। दोनों सदनों में प्रस्ताव स्वीकृत हो जाने के बाद इसे राष्ट्रपति के पास भेजा जाता है। इसके बाद राष्ट्रपति संबंधित न्यायाधीश को हटाने का आदेश जारी करते हैं। इस दौरान अगर संसद भंग हो जाती है या उसका कार्यकाल समाप्त हो जाता है तो महाभियोग प्रस्ताव विफल हो जाता है।

सुप्रीम कोर्ट की ‘आंतरिक जाँच प्रक्रिया’ क्या होती है?

किसी भी न्यायाधीश के खिलाफ संसद के अलावा भी शिकायत की जा सकती हैं। इसके तहत भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) या हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश (CJ) को चिट्ठी लिखकर या अन्य माध्यमों से संपर्क करके जाँच की माँग की जा सकती है। बॉम्बे हाई कोर्ट के सीजे एएम भट्टाचार्जी के खिलाफ वित्तीय अनियमितता के आरोपों के बाद 1995 में एक आंतरिक तंत्र की आवश्यकता महसूस की गई।
सी. रविचंद्रन अय्यर बनाम न्यायमूर्ति एएम भट्टाचार्जी (1995) में सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 124 के तहत ‘बुरे व्यवहार’ और ‘महाभियोग योग्य दुर्व्यवहार’ के बीच अंतर को स्पष्ट किया। साथ ही शीर्ष कोर्ट ने न्यायिक कदाचार की जाँच के लिए एक ‘आंतरिक प्रक्रिया’ के तहत पाँच सदस्यीय समिति का गठन किया। समिति ने अक्टूबर 1997 में अपनी रिपोर्ट दी और सुप्रीम कोर्ट ने दिसंबर 1999 में इसे अपनाया।
साल 2014 में इसमें सुप्रीम कोर्ट में इसमें संशोधन किया। साल 2014 में मध्य प्रदेश के एक न्यायाधीश द्वारा यौन उत्पीड़न की शिकायत के कारण सुप्रीम कोर्ट ने अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश एसके गंगेले बनाम रजिस्ट्रार जनरल हाई कोर्ट मध्य प्रदेश मामले में आंतरिक प्रक्रिया में संशोधन किया। सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति जेएस खेहर और अरुण मिश्रा ने सात चरण वाली प्रक्रिया की रूपरेखा तैयार की।
इसके तहत, किसी जज के खिलाफ शिकायत भारत के मुख्य न्यायाधीश, हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश या राष्ट्रपति को दी जा सकती है। अगर शिकायत हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश या राष्ट्रपति को दी जाती है तो वे उस शिकायत को भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) को भेजते हैं। CJI को लगता है कि शिकायत गंभीर नहीं है तो वे उसे खारिज कर सकते हैं।
अगर शिकायत गंभीर लगती तो वे आगे की प्रक्रिया अपनाई जाती है। अगर मामला हाई कोर्ट के किसी जज का होता है तो भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) उस हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश से इस मामले में रिपोर्ट की माँग करते हैं। तमाम जाँच और आरोपित जज के बयान लेने के बाद हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश यदि गहन जाँच की सिफारिश करते हैं तो CJI रिपोर्ट और बयान की समीक्षा करते हैं।
समीक्षा के बाद CJI एक जाँच समिति का गठन करते हैं। यह समिति तीन सदस्यीय होगी, जिसमें दो अलग-अलग हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश और एक हाई कोर्ट के न्यायाधीश शामिल होंगे। यह समिति न्यायाधीश से स्पष्टीकरण माँगती है। तमाम जाँच के बाद यह समिति CJI को अपनी रिपोर्ट देती है। इसमें बताया जाता है कि आरोपों में दम है या नहीं। साथ ही कदाचार के कारण निष्कासन कार्यवाही की आवश्यकता है या नहीं।
यदि कदाचार गंभीर नहीं हैतो CJI न्यायाधीश को सलाह दे सकते हैं और रिपोर्ट को रिकॉर्ड पर रख सकते हैं। यदि कदाचार गंभीर है तो CJI संबंधित न्यायाधीश को इस्तीफा देने या सेवानिवृत्त होने की सलाह देते हैं। यदि आरोपित न्यायाधीश इससे इनकार करता है तो CJI संबंधित हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को निर्देश देते हैं कि आरोपित जज को न्यायिक कार्य सौंपना बंद दें।
यदि आरोपित न्यायाधीश फिर भी इस्तीफा नहीं देता हैं तो CJI राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को सूचित करते हैं तथा उन्हें हटाने की कार्यवाही की सिफारिश करते हैं। इसके बाद संसद में उस न्यायाधीश को हटाने के लिए महाभियोग की प्रक्रिया शुरू की जाती है। हालाँकि, यह तमाम आंतरिक प्रक्रिया का जिक्र संविधान में नहीं है। इसे सुप्रीम कोर्ट द्वारा जजों के लिए खुद ही विकसित कर दिया गया है।

वो जज, जिस पर चला था पहली बार महाभियोग

भारत में आज तक 6 बार जजों को हटाने का प्रयास किया गया है। हालाँकि, इनमें से किसी को हटाया नहीं जा सका। सभी ने या तो खुद त्याग-पत्र दे दिया या फिर आरोप खारिज हो गए। इन 6 में से सिर्फ जस्टिस रामास्वामी और जस्टिस सेन के मामले में ही जाँच समिति ने आरोपों को सही पाया था। इनमें से 5 जजों पर वित्तीय अनियमितता के आरोप लगे थे, जबकि एक में यौन कदाचार के आरोप लगे थे।
जस्टिस वीरा रामास्वामी (जी. रामास्वामी) भारत के पहले न्यायाधीश थे, जिन्हें महाभियोग के जरिए हटाने का प्रयास किया गया था। रामास्वामी का निधन 8 मार्च 2025 को 96 साल की उम्र में तमिलनाडु की राजधानी चेन्नई में निधन हो गया। वी. रामास्वामी का के खिलाफ मई 1993 में महाभियोग प्रस्ताव लाया गया था। हालाँकि, विपक्ष ने इस प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया।
रामास्वामी अपने मुख्य न्यायाधीश ससुर की कृपा से जज बने थे। आपातकाल के दौरान उनके ससुर के घर से CBI ने अघोषित नकदी जब्त की थी। इसके कारण उन्हें इस्तीफा देना पड़ा था। रामास्वामी को सन 1971 में मद्रास हाई कोर्ट में जज बनाया गया था। इस असामान्य कदम के कारण काफी बवाल हुआ था। यह विवाद उनके कार्यकाल में आगे भी चलता रहा।
रामास्वामी पर आरोप था कि उन्होंने पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रहते हुए उचित प्रक्रियाओं का पालन किया। उन्होंने अपने फायदे के लिए सरकारी वाहनों एवं संसाधनों का जमकर दुरुपयोग किया। उन्होंने सरकारी पैसे से अपने आधिकारिक आवास में महंगे फर्नीचर, कालीन, एयरकंडिशन सिस्टम सहित अन्य विलासिता वाले सामान खरीदे।
इसको लेकर सन 1993 में जमकर राजनीतिक और न्यायिक विवाद हुआ था। उनके खिलाफ महाभियोग की माँग उठने लगी। इस प्रस्ताव को सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन ने भी अपनी मंजूरी दी थी। हालाँकि, रामास्वामी को बाद में सुप्रीम कोर्ट में पदोन्नत कर दिया गया। आरोपों की समीक्षा करने के बाद तत्कालीन CJI सब्यसाची मुखर्जी ने उन्हें मामले के सुलझने तक सेवा से दूर रहने की सलाह दी।
उन्हें 18 जुलाई 1990 को आधिकारिक पत्र मिला और उन्होंने तुरंत 23 जुलाई 1990 से छह सप्ताह की छुट्टी माँग ली। तथ्यों का सत्यापन करने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने तीन सदस्यों वाली एक कमिटी गठित की। इस कमिटी ने कहा कि उसे अनुचित व्यवहार का कोई सबूत नहीं मिला। इसके बाद लोकसभा के 108 सदस्यों ने 9वीं लोकसभा के अध्यक्ष से रामास्वामी के खिलाफ महाभियोग चलाने की माँग की।
तत्कालीन प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार के सहयोगी भाजपा और वामपंथी दलों के सदस्यों ने लोकसभा में इस महाभियोग प्रस्ताव का नोटिस दिया। इस नोटिस को स्वीकार कर लिया गया। इसके बाद तत्कालीन स्पीकर रबि राय ने 12 मार्च 1991 को समिति गठित की। समिति ने पाया कि रामास्वामी ने सार्वजनिक धन का उपयोग निजी फायदे के लिए किया और वैधानिक नियमों की अवहेलना की।
इस समिति ने रामास्वामी को 14 में से 11 आरोपों में दोषी ठहराया। वहीं, रामास्वामी ने स्पीकर द्वारा गठित समिति के समक्ष पेश होने से इनकार कर दिया। 10 मई 1993 को समिति द्वारा यह निर्धारित किए जाने के बाद कि आरोपों में दम है, प्रस्ताव को चर्चा के लिए लोकसभा में लाया गया। हालाँकि, उस समय की विपक्षी पार्टी कॉन्ग्रेस के कई नेता रामास्वामी के समर्थन में आ गए।
इस महाभियोग प्रस्ताव के समर्थन में 401 सांसदों में से सिर्फ 196 ने मतदान किया। कॉन्ग्रेस और कुछ अन्य दलों के 205 सांसदों ने प्रस्ताव के पक्ष में हुए मतदान में भाग ही नहीं लिया। इस तरह यह प्रस्ताव गिर गया और वे हटाए जाने से बच गए। इस तरह वे अपना कार्यकाल पूरा होने तक आगे भी काम जज के रूप में काम करते रहे। आखिरकार 8 मार्च 2025 को उनका निधन हो गया।
कलकत्ता हाई कोर्ट के जस्टिस सौमित्र सेन महाभियोग प्रस्ताव का विषय बनने वाले दूसरे न्यायाधीश थे। महाभियोग चलाने से पहले ही उन्होंने सितंबर 2011 में इस्तीफा दे दिया था। कलकत्ता की एक अदालत ने उन्हें तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर पेश करने और 1983 में अपनी कानूनी क्षमता में न्यायालय द्वारा नियुक्त रिसीवर के रूप में कार्य करते हुए 33.23 लाख रुपए का गबन करने का दोषी ठहराया था।
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वो जज, जिनके खिलाफ CBI कोर्ट में लंबित है मामला

इसी तरह का आरोप पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय की न्यायाधीश निर्मलजीत कौर पर भी लगा था। जस्टिस कौर के घर 13 अगस्त 2008 को 15 लाख रुपए का एक पैकेट पहुँचा था। प्रारंभिक जाँच में पता चला कि पैकेट गलती से जस्टिस कौर के चंडीगढ़ पते पर भेज दिया गया था, जबकि यह पैकेट उसी न्यायालय में सेवारत न्यायाधीश न्यायमूर्ति निर्मल यादव के लिए था।
उस समय भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) केजी बालाकृष्णन थे। CJI केजी बालाकृष्णन की अध्यक्षता वाले सर्वोच्च न्यायालय की कॉलेजियम ने शुरू में उनको क्लिनचिट दे दी। इसके बाद मामले की जाँच कर रही केंद्रीय जाँच ब्यूरो (CBI) ने साल 2009 में इस मामले में क्लोजर रिपोर्ट दाखिल कर दी। उस समय निर्मल यादव को उत्तराखंड हाई कोर्ट में स्थानांतरित कर दिया गया।
बालाकृष्णन के सेवानिवृत्त होने के बाद मुख्य न्यायाधीश बने न्यायमूर्ति एसएच कपाड़िया ने अपने बालाकृष्णन के फैसले को पलट दिया और जस्टिस यादव के खिलाफ मुकदमा चलाने की अनुमति दे दी। साल 2011 में जस्टिस यादव जिस दिन सेवानिवृत्त हो रहे थे, उसी दिन तत्कालीन राष्ट्रपति ने उनके खिलाफ मुकदमा चलाने की मंजूरी दी। आज 14 साल बाद भी यह मामला स्पेशल CBI कोर्ट में लंबित है।