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असम बीजेपी ने भंग किया अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ

                                                                                        फाइल फोटो 
पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, असम, केरल और पुडुचेरी में हुए विधानसभा चुनावों के नतीजे मई 2, 2021 को मतगणना के बाद घोषित किए गए। इन पाँचों राज्यों में मुस्लिम वोटों के लिए भाजपा विरोधी दलों में गजब की हाथापाई हुई। कांग्रेस ने तो पश्चिम बंगाल में फुरफुरा शरीफ दरगाह के मौलाना अब्बास सिद्दीकी की ISF और असम में बदरुद्दीन अजमल AIUDF के साथ गठबंधन किया। पाँचों राज्यों में बड़ी संख्या में मुस्लिम विधायक चुने गए।

बंगाल में TMC के लिए मुस्लिमों का जबरदस्त ध्रुवीकरण

सबसे पहले बात पश्चिम बंगाल की। यहाँ अकेले तृणमूल कांग्रेस ने 42 मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट दिया था, जिसमें से मात्र एक की ही हार हुई है। साथ ही ISF को भी 1 सीट मिली, जिससे राज्य में मुस्लिम विधायकों की संख्या 42 है। हालाँकि, 2016 और 2011 में क्रमशः 59 और 56 मुस्लिम विधायकों को जीत मिली थी। इस बार ये संख्या कम इसीलिए भी है क्योंकि भाजपा को हराने के लिए हुए ध्रुवीकरण में CPI-कांग्रेस पहली पसंद नहीं बनी।

पहले इन दोनों दलों के भी बड़ी संख्या में मुस्लिम विधायक हुआ करते थे। ममता बनर्जी के पक्ष में मुस्लिमों के बीच ऐसी लहर थी कि 5 सीटों पर चुनाव लड़ने वाली असदुद्दीन ओवैसी की AIMIM का खाता तक नहीं खुला और 40 सीटों पर कांग्रेस व CPI के समर्थन से लड़ने वाली सिद्दीकी की ISF को मात्र 1 पर सफलता मिली। नए मुस्लिम विधायकों में चंदननगर के पूर्व कमिश्नर हुमायूँ कबीर भी शामिल हैं।

असम में बीजेपी के आठों मुस्लिम उम्मीदवारों को देखना पड़ा हार का मुँह

असम की बात करें तो यहाँ भी पश्चिम बंगाल की तरह अधिकतर क्षेत्रों में मुस्लिमों और घुसपैठियों का दबदबा रहा है। जहाँ पिछली बार यहाँ 29 मुस्लिम विधायक जीते थे, नव-निर्वाचित विधानसभा में मुस्लिमों की संख्या 31 होगी। 2011 के चुनाव में यहाँ 28 मुस्लिम उम्मीदवारों को जीत मिली थी। नए मुस्लिम विधायकों में से 16 कॉन्ग्रेस के और 15 परफ्यूम कारोबारी मौलाना बदरुद्दीन अजमल की AIUDF के हैं।

असम बीजेपी ने भंग किया अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ 

खास बात ये है कि भाजपा ने भी इस बार असम में मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट दिया था। पार्टी ने 8 मुस्लिम उम्मीदवारों पर भरोसा जताया लेकिन उनमें से एक भी जीत कर विधानसभा नहीं पहुँच सका। वहाँ पार्टी को ऐसा झटका लगा है कि प्रदेश अध्यक्ष रंजीत कुमार दास ने अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ की जिला, प्रखंड और राज्य समितियों को ही भंग कर दिया है। यहाँ तक कि भाजपा के सहयोगियों के खाते में भी एक भी मुस्लिम विधायक नहीं आया।

असम भाजपा ने वहां से अल्पसंख्यक प्रकोष्ठों को बंद कर सराहनीय कार्य किया है। अक्सर अपने लेखों में इसी बात का उल्लेख करता भी रहा हूँ। अल्पसंख्यक के नाम पर इन्हे सिर पर बैठाकर महिमामंडन करते रहते हैं, लेकिन चुनाव में वोट नहीं मिलता। अपने निम्न लेख में यह भी लिखा था कि मंडल अध्यक्ष के ही पोलिंग बूथ पर बीजेपी को एक भी वोट न मिलना मतलब मंडल अध्यक्ष तक ने अपनी पार्टी को वोट नहीं दिया। पता नहीं किस कारण बीजेपी मुस्लिम के नाम पर इन्हे सिरमौर बनाए फिरती है। पिछले हुए नगर निगम चुनावों में भाजपा उम्मीदवार सब से जीतता आ रहा है, लेकिन मुस्लिम बहुल क्षेत्र में पहुँच अपनी जमानत भी नहीं बचा पाता। 

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केरल में कांग्रेस के कट्टरवादी गठबंधन साथी के 15 मुस्लिम MLAs

केरल की बात करें तो यहाँ मुस्लिम और ईसाई समुदाय के बीच संघर्ष चलता रहता है और यहाँ भी कांग्रेस ने एक और इस्लामी पार्टी IUML (मुस्लिम लीग) के साथ गठबंधन किया था। 140 सदस्यीय विधानसभा में यहाँ 32 मुस्लिम उम्मीदवारों को जीत मिली है। इनमें से 15 तो अकेले IUML के ही हैं। बाकी के 3 कांग्रेस और 9 CPI(M) के हैं। दो अन्य दलों के खाते में एक-एक मुस्लिम विधायक आए। निर्दलीय विजेताओं में भी 3 मुस्लिम उम्मीदवार हैं।

तमिलनाडु और पुडुचेरी में मुस्लिम विधायकों की संख्या कम

अंत में दक्षिण के दोनों प्रदेशों की बात करते हैं, जहाँ राष्ट्रवाद की कोई लहर नहीं थी और इससे जुड़े मुद्दे चुनावी फिजाँ में नहीं थे। तमिलनाडु विधानसभा की 234 सीटों में से मात्र 5 ही मुस्लिमों के खाते में गए। इसी तरह पुडुचेरी में मात्र एक मुस्लिम विधायक चुने गए। असदुद्दीन ओवैसी ने कई सीटों पर चुनाव लड़ा लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली। इस तरह इन 5 राज्यों में 111 नए मुस्लिम विधायक होंगे।

शिवलिंग पर कंडोम, बीफ फेस्टिवल और हिन्दू देवी-देवताओं का अपमान करने वालों को जनता ने चटाई धूल

CPI(M) के एम स्वराज, TMC की सायोनी घोष और
कांग्रेस की बिंदु कृष्णा (बाएँ से दाएँ)
पाँच राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों के परिणाम आ गए हैं। भाजपा ने असम और पुडुचेरी में जीत दर्ज की है। पश्चिम बंगाल में TMC तो केरल में लेफ्ट सत्ता बचाने में सफल रहा है। तमिलनाडु में सत्ता परिवर्तन हुआ और DMK को जीत मिली। इन चुनावों में कुछ ऐसे नेताओं को हार मिली है, जो राजनीति से ज्यादा अपनी बदजुबानी के लिए चर्चा में आए थे। यहाँ हम ऐसे हिन्दू विरोधी नेताओं के चुनाव परिणाम पर चर्चा करेंगे।

सबसे पहले बात बंगाली अभिनेत्री सायोनी घोष की, जिन्हें TMC ने आसनसोल दक्षिण से उम्मीदवार बनाया था। वहाँ उन्हें 4487 वोटों से हार मिली। जहाँ भाजपा उम्मीदवार अग्निमित्र पॉल 87,881 (45.13%) वोट पाने में कामयाब रहे, सायोनी को 83,394 (42.82%) वोट मिले। उन्होंने शिवलिंग को कंडोम पहनाते हुए एक तस्वीर शेयर कर भगवान शिव का मजाक बनाया था। हिन्दू भावनाओं को आहत करने के आरोप में उन पर FIR भी हुई थी।

इसी तरह केरल में कांग्रेस की बिंदु कृष्णा ने ‘बीफ फेस्टिवल’ का आयोजन किया था। उन्हें कोल्लम से उम्मीदवार बनाया गया था। मई 2017 में जब केंद्र सरकार ने हत्या के लिए जानवरों के बाजार से खरीद-बिक्री पर पाबंदी लगाई थी, तब केरल के विभिन्न इलाकों में इस तरह के ‘बीफ फेस्ट’ हुए। बिंदु कृष्णा ने कहा था कि प्रधानमंत्री मोदी को डिलीवर करने के लिए ‘स्वादिष्ट बीफ’ को पैक कर हेड पोस्ट ऑफिस में भेजा जाएगा।

कोल्लम की बात करें तो यहाँ काँटे की टक्कर में जहाँ बिंदु कृष्णा को 56,452 (43.27%) वोट मिले, CPI(M) के एम मुकेश 58,524 (44.86%) मत पाकर विजयी हुए। इस तरह से ‘बीफ फेस्टिवल’ का आयोजन वाली बिंदु कृष्णा 2072 वोटों से हार गईं।

इस सूची में एक और उम्मीदवार हैं पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस की सुजाता खान, जिन्होंने दलितों पर आपत्तिजनक टिप्पणी की थी। उन्होंने कहा था कि अनुसूचित जाति (SC) के लोग भिखारी होते हैं। उन्हें आरामबाग से उम्मीदवार बनाया गया था, जहाँ उनकी हार के बाद भाजपा के दफ्तर को जला डाला गया। भाजपा के मधुसूदन बाग़ ने 1,03,108 (46.88%) वोट पाकर 95,936 (43.62%) वोट पाने वाली सुजाता को 7172 मतों से हराया।
इसी तरह केरल के विधायक एम स्वराज ने भगवान अयप्पा पर आपत्तिजनक टिप्पणी की थी। वो अपनी सीट भी नहीं बचा पाए। वे ‘डेमोक्रेटिक यूथ फेडरेशन ऑफ इंडिया (DYFI)’ के राज्य सचिव भी हैं। उन्होंने कहा था कि भगवान अयप्पा की 2018 में मल्लिकापुरम से शादी हुई है, इसलिए सबरीमाला मंदिर में कोई भी जा सकता है। वो त्रिपुनिथुरा में कांग्रेस उम्मीदवार के बाबू से 992 वोटों से हार गए।
इस सूची में एक नाम भाजपा के एक नेता का भी है, जिन्होंने कहा था कि बीफ भारत का ‘राष्ट्रीय भोजन’ है। असम के गौरीपुर से उम्मीदवार बनेन्द्र कुमार मुशहरी तब भी हार गए हैं, जब राज्य में उनकी ही पार्टी ने सत्ता में वापसी की है। उनकी बुरी हार हुई है। बनेन्द्र को जहाँ 63,349 (34.48%) वोट मिले, AIDUF के निज़ानुर रहमान को 1,12,194 (61.07%) वोट प्राप्त हुए। इस तरह 48,845 वोटों के अंतर से बनेन्द्र की हार हुई।

आखिर भाजपा के पास बंगाल में खोने को था ही क्या?

एक बार फिर लोकतंत्र में लोगों की आस्था बनी रह गई है! शायद ईवीएम की खराबी अब बीते दिनों की बात है। हाँ, अगर बंगाल के नतीजे उलट होते, निश्चितरूप से भाजपा विरोधी ईवीएम में गड़बड़ी करने का आरोप लगा रहे होते। मोदी-शाह के अश्वमेध के बगटूट घोड़े को बंगाल की दीदी ने थाम लिया है। ऐसी कुछ हेडलाइंस, ऐसे कुछ स्लग्स, ऐसे कुछ विश्लेषण अगले एकाध दिनों तक देखने को मिलने की संभावना है।

मज़े की बात है कि पाँच राज्यों के चुनाव में से दो में भाजपा या भाजपा नीत गठबंधन पूरे बहुमत से मज़े से सरकार बनाने जा रही है। एक राज्य में उसने तगड़ी एंट्री मारी है। लेकिन चर्चा केवल बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के सीटों की ही हो रही। वह भी तब, जब पिछले विधानसभा चुनाव में महज 10 फीसदी वोट और तीन सीटें पानेवाली भाजपा इस बार लगभग 38 फीसदी वोट और 80 सीटों के साथ दमदार विपक्ष बनकर उभरा है। इतना ही नहीं, इतने वर्ष बंगाल में राज करने वाली कांग्रेस और वामपंथ का सुपरा साफ हुआ है। 

असम में तमाम दम झोंकने के बावजूद कांग्रेस की दाल नहीं गली और भाजपा ने धमाकेदार वापसी की है। वहाँ मुस्लिम जिहादियों के साथ गठबंधन का भी कांग्रेस को फायदा नहीं मिला और भाजपा पूर्ण बहुमत से सरकार बनाने जा रही है। पुडुचेरी में भाजपा नीत गठबंधन की सरकार बनेगी और तमिलनाडु में भाजपा ने अपनी शुरुआत कर दी है। केरल में भी मेट्रो मैन श्रीधरन भले हार गए हों, पर भाजपा की धमक तो दिखने लगी है।

बंगाल की बात करें, तो ‘दीदी’ के खाते में एक पूर्ण बहुमत की सरकार आई है, लेकिन नंदीग्राम के नतीजे बताते हैं कि जनता उनसे किस तरह ऊब चुकी है। यह टीवी मीडिया और छद्म बुद्धिजीवियों की बनाई दुनिया थी, जिसने भाजपा का सब कुछ बंगाल में दाँव पर लगा हुआ बता दिया। भाजपा के पास बंगाल में खोने को था ही क्या? उसकी तीन से 80 सीटों की यात्रा बताती है कि भाजपा ने बंगाल में उम्मीदों से कहीं बेहतर प्रदर्शन किया है।

बंगाल के नतीजों से अगर हम त्वरित आकलन निकालने की चेष्टा करें तो यही कह सकते हैं कि ममता बनर्जी के गुंडों की धांधली और बेशर्म तुष्टिकरण ही आखिरकार उनके काम आया है। जिन सीटों पर भी मुस्लिम जनसंख्या प्रभाव डालने वाली थी, वहाँ टीएमसी की जोरदार जीत हुई है। कांग्रेस और लेफ्ट का जिस तरह सफाया हुआ है, उस पर कोई बात ही करने को तैयार नहीं है। वामपंथी जहाँ 5 फीसदी वोटों और शून्य सीटों पर सिमट गए, तो कांग्रेस तीन फीसदी के बाद भी खाता खोलते नहीं दिख रही।

वोटों का यह बटखरा सीधे तौर पर तृणमूल के पक्ष में गया और उसने पलड़े को झुका दिया। ममता के शासन में उत्पीड़न झेल रहे हिन्दू अपनी नींद से नहीं जागा। हिंदू वोट हमेशा की तरह ध्रुवीकृत नहीं हुए और उसका भाजपा को नुकसान हुआ, जबकि मुसलमानों ने हमेशा की तरह निगेटिव वोटिंग की, भाजपा को हराने के लिए एकजुट हुए।

ममता बनर्जी ने खुलेआम जब मुस्लिम वोटर्स का आह्वान किया कि केवल उनको ही वोट दें, तो उसका फायदा भी उनको ही मिलना था। यह इस देश का विचित्र हाल है कि अगर आप मुस्लिम वोटों का सीधे तौर पर बाँट-बखरा करें तो आप सेकुलर हैं, लेकिन हिंदुओं के अधिकार के लिए भी अगर किसी ने आवाज़ उठा दी तो वह सांप्रदायिक है।

लोकतंत्र में हार-जीत लगी रहती है, पर असल चुनौती तो अभी बंगाल की है। शायद बंगाल की जनता अभी नर्क के उस अनुभव से नहीं गुजरी है, जहाँ से असम के लोग दो-चार हो चुके हैं। टीएमसी के गुंडों ने नतीजों के आते ही आरामबाग में भाजपा कार्यालय को जलाकर आनेवाले भविष्य के संकेत दे ही दिए हैं। कमीशनखोरी, तोलेबाजी, हरेक केंद्रीय योजना में अड़ंगा अब बंगाल का नसीब होने वाला है, रोहिंग्या और अवैध बांग्लादेशी वहॉं हरेक दिन अब एक नया कश्मीर बनाएँगे।

कूचबिहार में जब जिहादी भीड़ ने सीआरपीएफ पर हमला किया औऱ उसमें चार जिहादियों के साथ एक हिंदू भी गोलीबारी में मारा गया, तो ममता बनर्जी ने उन जिहादियों के परिवारों से मंच से बात कर अपने मुस्लिम वोटर्स को बिल्कुल साफ संदेश दे दिया था। सोचना वहाँ के हिंदुओं को है, जो ममता के साथ गए हैं। हालाँकि, भाजपा एक मजबूत विपक्ष के रूप में उभरी है, पर हिंदुओं को वह कितना बचा पाएगी, यह सोचने की बात है।

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जीत से ‘बेकाबू’ हुए TMC के गुंडे : ‘संघियों के सिर से खून निकलना चाहिए… बाहरी, हिंदी बोलने वाले कमी
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जीत से ‘बेकाबू’ हुए TMC के गुंडे : ‘संघियों के सिर से खून निकलना चाहिए… बाहरी, हिंदी बोलने वाले कमी

स्पष्ट है कि इन चुनावों में भाजपा का कोई सीधे तौर पर कोई नुकसान नहीं हुआ है। असम उसके पाले में है। पुडुचेरी में वह सरकार बना रही है। बंगाल में शानदार डेंट लगाया है और केरल-तमिलनाडु में अच्छी शुरुआत की है। यही इबारत दीवार पर भी लिखी नज़र आ रही है।

5 राज्यों के नतीजों से निकला एक सवाल : कांग्रेस का क्या होगा, राहुल गाँधी देंगे और कितने घाव ?

चार राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश के विधानसभा चुनावों के नतीजों की तस्वीर लगभग साफ हो गयी है। असम में भाजपा, पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस (TMC) और केरल में एलडीएफ की सत्ता में वापसी। बंगाल में फिलहाल बीजेपी अपनी आशा के अनुरूप प्रदर्शन नहीं दिखा। फिर भी 3 सीटों से कहीं अधिक सीटें लेकर एक विपक्ष में रूप में उभर कर कांग्रेस और वामपंथ को धूल चटा दी। वैसे भी बंगाल में भाजपा को सत्ता से दूर रखने के लिए अपना ही अस्तित्व ख़त्म करना राजनीती नहीं। पुदुच्चेरी में भाजपा गठबंधन जीत हासिल कर रहा है।

जब अंतिम नतीजे आ जाएँगे तो हर दल इन चुनावों में अपने प्रदर्शन पर चिंतन करेगा। पश्चिम बंगाल के बहुचर्चित मुक़ाबले में भाजपा की संभावित जीत क्यों नहीं हो सकी, आने वाले समय में यह बहस का एक बड़ा विषय होगा। तमिलनाडु में डीएमके को आशा के अनुरूप एक बड़ी जीत क्यों नहीं मिल सकी, यह भी चर्चा का विषय रहेगा।

पर इन सब के बीच जिस एक आवश्यक विषय पर चर्चा शायद न दिखे, वह होगी इन चुनावों में कांग्रेस पार्टी का प्रदर्शन। केरल, असम और तमिलनाडु में राहुल गाँधी और प्रियंका वाड्रा ने बड़ी मेहनत की थी। असम के चाय बाग़ानों में प्रियंका मजदूरों के साथ चाय पत्ती तोड़ते हुए भी दिखी थीं। इसके अलावा राहुल गाँधी ने चाय बागान बहुत इलाकों में गुजरात के व्यापारियों से अलग से पैसे लेने का वादा भी किया था। दक्षिण भारत के राज्यों में राहुल ने चुनाव प्रचार के दौरान कसरत करने से लेकर समुद्र में गोता लगाने जैसे मेहनत वाले और चुनाव प्रचार के लिए महत्वपूर्ण काम किए थे। पर उनका असर नहीं हुआ और उनके दल के प्रदर्शन में सुधार नहीं हुआ।

200 यूनिट फ्री बिजली, 2000 रूपए गृहिणी सम्मान, 5 लाख नौकरी… सब फेल

दिलचस्प बात यह है कि असम वह राज्य है जहाँ कांग्रेस की महासचिव प्रियंका गाँधी ने 2 दिवसीय दौरे पर 6 रैलियाँ बैक टू बैक कीं। प्रियंका गाँधी ने दौरे के पहले दिन जोरहाट, नजीरा और खुमतई में रैली की। फिर अगले दिन उन्होंने गोलाघाट जिले के सरूपथार और नागाँव के कलियाबोर में रैली की। उनकी अंतिम रैली श्रीमंत शंकरदेवा की जन्मस्थली बाताद्रव में हुई।

केवल यही 6 रैलियाँ प्रियंका गाँधी ने चुनाव के मद्देनजर नहीं की थी, बल्कि 1-2 मार्च को भी प्रियंका गाँधी असम में बैठकें कर चुकी थीं। 2 मार्च को तेजपुर पहुँच उन्होंने राज्य की जनता को 200 यूनिट मुफ्त बिजली देना का वादा किया था। 

उन्होंने यह भी कहा था कि इस कदम से जनता के 1400 रुपए बचेंगे। प्रियंका ने कहा कि यदि उनकी सरकार आई तो राज्य में  सीएए लागू नहीं होने दिया जाएगा और कम से कम 5 लाख सरकारी नौकरियाँ निकाली जाएँगी। 

राज्य की महिलाओं को रिझाने के लिए प्रियंका गाँधी ने 2000 रुपए हर महीने गृहणियों को भी देने का ऐलान किया। वहीं चाय के बागान में काम करने वालों के लिए ऐलान किया कि उन्हें 365 रुपए वेतन दिया जाएगा।

केवल पश्चिम बंगाल में दल की रणनीति सफल होते हुए दिखी जहाँ उन्होंने चुनाव प्रचार लगभग न के बराबर किया। उसके अलावा दल ने कहीं न कहीं अधीर रंजन चौधरी को अपना काम करने से रोका। प्रचार के दौरान ही चौधरी को लोकसभा में विपक्ष के नेता पद से हटाकर दल ने किसे फायदा पहुँचाने की कोशिश की, उसकी विवेचना शायद आने वाले दिनों में हो। अधीर रंजन का खुद को चुनाव प्रचार से लगभग अलग रखना किस रणनीति का हिस्सा था, वह शायद आज आए नतीजों से स्पष्ट हो गया है।

चुनाव परिणामों के दिन कांग्रेस पार्टी द्वारा कोरोना का हवाला दे अपने प्रवक्ताओं को न्यूज़ स्टूडियो में न भेजने का फ़ैसला क्या संदेश देता है? शायद यही कि कांग्रेस फिलहाल प्रश्न सुनने के मूड में नहीं है। पर क्या चुनावी प्रक्रिया की गर्द जम जाने के बाद भी कांग्रेस प्रश्न सुनने का मन बनाएगा? क्योंकि आज के दिन तो प्रवक्ताओं से किए गए प्रश्न इन चार राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश में दल के प्रदर्शन के इर्द-गिर्द होते, पर भविष्य में तो और प्रश्न पूछे जाएँगे।

समय आने पर यह भी पूछा जाएगा कि कांग्रेस पार्टी भाजपा से खुद क्यों नहीं लड़ सकती? जब लड़ने का समय आता है तब अपनी भूमिका किसी और को देकर मैदान से हट जाती है? क्यों राहुल गाँधी केंद्र में तो विपक्ष की ओर से खुद को नेता के रूप में प्रस्तुत करते हैं पर चुनाव आते ही वे लघु मानव की भूमिका में आ जाते हैं? पूछा जाएगा कि इन चुनावों में कांग्रेस के प्रदर्शन के बाद विपक्ष की राजनीति में राहुल गाँधी का कद कितना बढ़ा है? या छोटा हुआ है तो कितना छोटा हुआ है? क्या भाजपा विरोधी पार्टियों को अब कांग्रेस की किसी नीति अथवा इशारे पर काम करना चाहिए?

ममता बनर्जी ने जिस तरह से पश्चिम बंगाल में वापसी की है, उसके बाद विपक्षी राजनीति में उनका कद कितना बढ़ेगा? भाजपा के मुक़ाबले जब एकजुट होकर खड़े होने का प्रश्न उठेगा तब विपक्ष का नेता कौन होगा? ममता बनर्जी अनौपचारिक रूप से पहले ही अभिषेक बनर्जी को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर चुकी हैं। ऐसे में क्या इस संभावना से इनकार किया जा सकेगा कि वे राज्य से निकल कर केंद्र की राजनीति में नहीं जाएँगी? यदि ऐसा होगा तब विपक्ष में राहुल गाँधी की भूमिका क्या होगी? क्या कान्ग्रेस पार्टी को यह स्वीकार होगा? अगले वर्ष उत्तर प्रदेश विधानसभा के लिए चुनाव होने हैं। वहाँ प्रियंका खुद को कांग्रेस की ओर से नेता के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिशें करती रही हैं। ऐसे में इन सब के बीच राहुल गाँधी खुद को कहाँ पाते हैं?

ये कुछ ऐसे प्रश्न हैं जिन पर कांग्रेस पार्टी को आज नहीं तो कल उत्तर देना ही होगा और जब ये प्रश्न उठेंगे तब शायद मंच और हों और पार्टी किसी बहाने की आड़ में खुद को छिपा न सके। क्या कारण है कि राज्यों में भी कांग्रेस अपना अस्तित्व भी नहीं बचा सकी? 

राहुल गाँधी : 4 राज्यों में जम कर की जनसभा अब बंगाल में हार देख, नहीं करेंगे चुनावी रैली

नेता जनता को कितना पागल समझते हैं, देश फैले कोरोना के दौरान चुनावी रैलियों से पता चल रहा है। ऊपर से बंगाल को छोड़ अन्य चार राज्यों में खूब प्रचार कर कोरोना का बहाना कर राहुल गाँधी ने बंगाल की रैलियां स्थागित कर दी। स्थागित करने का कारण भी है, क्योकि वहां असली लड़ाई तृणमूल और भाजपा के बीच है। बाकि किसी अन्य पार्टी का क्या और किस तरह प्रचार हो रहा है, कोई मीडिया नहीं दिखा रहा। यही हाल दिल्ली के मुख्यमंत्री का है, जो अपनी नाकामियों को छुपाकर केंद्र को दोषी ठहराने का कोई अवसर नहीं चूकते, उन्हें मालूम है कि मुफ्त की रेवड़ियों के सहारे सत्ता ले लूंगा और केंद्र से मिले भिन्न-भिन्न मदों के लिए मिले धन का अधिकांश भाग अपने विज्ञापन पर खर्च करता रहूँगा। कोई निर्भीक अथवा खोजी पत्रकार नहीं विश्लेषण नहीं करता, क्योकि उन्हें भी विज्ञापन के माध्यम से धन मिल रहा है। नेता जनता की समस्याओं के प्रति कितने सजग है, निम्न वीडियो देखिए। इसे कहते हैं निडर बेबाक पत्रकारिता। 

  

सभी चुनावी राज्यों में रैलियों को संबोधित करने के बाद राहुल गाँधी ने सोशल मीडिया के माध्यम से यह घोषणा की कि अब वह पश्चिम बंगाल में किसी भी चुनाव रैली में शामिल नहीं होंगे। उन्होंने ट्विटर के माध्यम से इसकी जानकारी दी।

राहुल गाँधी ने कोविड-19 की खराब होती परिस्थितियों का हवाला देते हुए कहा कि वह अब पश्चिम बंगाल में बचे तीन चरण के चुनाव में होने वाली अपनी सभी रैलियों को रद्द करते हैं। उन्होंने बाकी नेताओं से भी चुनावी रैलियों पर पुनर्विचार करने के लिए कहा है।

यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि अपनी बहन प्रियंका गाँधी वाड्रा के साथ राहुल ने कई राज्यों में कई चुनाव रैली की हैं जबकि कोरोनावायरस का संक्रमण तब भी बढ़ ही रहा था।

4 अप्रैल को 2021 को राहुल गाँधी ने केरल में एक चुनाव रैली को संबोधित किया था। केरल सर्वाधिक संक्रमित मरीजों की संख्या में भारत में दूसरे स्थान पर है। 4 अप्रैल को केरल में 11 लाख से अधिक कुल संक्रमित मरीज और 28,000 सक्रिय मरीज थे। उसके बाद केरल में 18 अप्रैल को सक्रिय मरीजों की संख्या बढ़कर 80,000 हो गई।

तमिलनाडु में भी 28 मार्च 2021 को राहुल गाँधी की एक बड़ी जनसभा हुई। उस समय तमिलनाडु में कुल सक्रिय मरीजों की संख्या 13,070 थी। आज तमिलनाडु में सक्रिय मरीजों की संख्या लगभग 65,000 है।

इस वीडियो में प्रियंका गाँधी वाड्रा को असम से बिदाई देने के लिए कॉन्ग्रेस द्वारा जुटाई गई लोगों की भीड़ दिखाई दे रही है।

असम, तमिलनाडु, केरल और केंद्र शासित प्रदेश पुडुच्चेरी में चुनाव संपन्न हो चुके हैं।

पश्चिम बंगाल में कॉन्ग्रेस, लेफ्ट पार्टियों के साथ गठबंधन में है लेकिन उनके सरकार बनाने की संभावनाएँ न के बराबर हैं। आशंका तो यह भी व्यक्त की जा रही है कि कॉन्ग्रेस और उसके गठबंधन को 2016 के चुनावों से भी कम सीटें प्राप्त होंगी।