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जहाँ आजादी पर लहराया था पाकिस्तानी झंडा हर जगह TMC जीती

TMC ने बंगाल में मुस्लिम निर्णायक वाली सभी 113 सीटें जीती, तो असम में कांग्रेस ने 43 मुस्लिम निर्णायक सीटें जीतीं। लेकिन 'गंगा-जमुनी तहजीब' जैसे भ्रामिक हिन्दू अपने हितों की रक्षा करने वाली पार्टी को साम्प्रदायिक बोलने में संकोच नहीं कर रहे। इन्हें मुसलमानो से सीखना चाहिए कि अपने अधिकार और मजहब का साथ देने वाले को वोट देने में संकोच नहीं करते। यह बंगाल ही नहीं, दिल्ली में भी देखा गया है कि भाजपा उम्मीदवार हिन्दू क्षेत्र से जीतता आ रहा है, लेकिन मुस्लिम बहुल क्षेत्र आते ही जमानत भी नहीं बचा पाता। प्रमाण के लिए दिल्ली के मतदान आंकड़े को देखा जा सकता है। 

अब आगे बढ़ने से पहले इन वीडियो को भी ध्यान से सुनिए 


पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में लगातार तीसरी बार तृणमूल कांग्रेस ने जीत हासिल की है। बीजेपी ने भी 2016 के तीन सीटों के मुकाबले इस बार 77 सीटें जीती है। इन चुनावों का विश्लेषण करने पर बांग्लादेश के सीमावर्ती इलाकों में जहाँ मुस्लिम आबादी बहुसंख्यक है, वोटिंग का एक खास पैटर्न नजर आता है। इसका सीधा फायदा टीएमसी को मिला है। मसलन, मुर्शिदाबाद जिले की भागाबंगोला सीट। कभी हिंदू बहुल इस इलाके में अब मुस्लिम बहुसंख्यक हैं। इसका सबसे बड़ा कारण बांग्लादेश से घुसपैठ कर आए लोगों का यहाँ बसना माना जाता है।

1971 से नहीं कोई हिन्दू नहीं जीता 

भागाबंगोला सीट से तृणमूल कॉन्ग्रेस के इदरिस अली को डेढ़ लाख से ज्यादा वोट मिले। यह कुल वोटों का 68 फीसदी से भी ज्यादा है। उनके प्रतिद्वंद्वी बीजेपी के मुस्लिम उम्मीदवार महबूब आलम को 7.39 फीसदी यानी महज 16707 वोट ही मिले। बीजेपी से ज्यादा मत तो बंगाल चुनावों में खाता भी न खेल पाने वाली कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया को मिले। उसके उम्मीदवार मोहम्मद कमल हुसैन को 21 फीसदी से ज्यादा मत यानी 47 हजार से अधिक वोट मिले।

भागाबंगोला सीट पर 1971 के बाद से कोई भी हिंदू उम्मीदवार कभी नहीं जीता है। संयोग से यह वही साल है जब बड़ी संख्या में मुस्लिम आबादी का बांग्लादेश से पश्चिम बंगाल में आना शुरू हुआ था।

इस इलाके में हुई थी संघ कार्यकर्ता की नृशंस हत्या 

भागाबंगोला से जीते टीएमसी के इदरिस अली 2007 में तस्लीमा नसरीन के कोलकाता आगमन पर पार्क सर्कस इलाके में हुए दंगे के मामले में गिरफ्तार हुए थे। उन दंगों में हिंदुओं की आबादी को निशाना बनाया गया था। इस इलाके में मुस्लिमों के दबदबे के अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि बीजेपी ने भी यहाँ से सीपीएम के एक पूर्व मुस्लिम उम्मीदवार को ही उतारा था।

संयोग से भागाबंगोला वही सीट है जहाँ दो साल पहले राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ से जुड़े और पेशे से शिक्षक प्रकाश पाल और उनकी गर्भवती पत्नी और छह साल के मासूम बेटे की घर में घुसकर धारदार हथियारों से नृशंस हत्या कर दी गई थी। सत्ताधारी टीएमसी द्वारा इस मामले को संपत्ति विवाद घोषित करते हुए राजनीतिक हत्या पर पर्दा डाल दिया गया था। ये ममता बनर्जी की टीएमसी ही थी, जिसने इदरिस अली के ऊपर लगे दंगे के आरोपों को हटाते हुए उन्हें अपनी पार्टी का टिकट दिया था।

रानी नगर : यहाँ से आज तक कोई हिन्दू नहीं जीता 

मुर्शिदाबाद जिले की एक और सीट रानीनगर से आज तक कोई भी हिंदू उम्मीदवार कभी नहीं जीता। 2021 विधानसभा चुनावों में इस सीट से किसी भी हिंदू उम्मीदवार ने चुनाव नहीं लड़ा। बीजेपी ने भी इस सीट से मुस्लिम उम्मीदवार (मसुआरा खातून) को उतारा था, लेकिन उन्हें मुश्किल से 10% वोट (21 हजार वोट) ही मिल सके। इस सीट पर 60 फीसदी से ज्यादा वोट हासिल करके तृणमूल के अब्दुल सौमिक हुसैन जीते।

हरिहरपारा का भी यही हाल 

मुर्शिदाबाद जिले की एक और सीट है हरिहरपारा। यहाँ 1947 में देश के आजाद होने पर पाकिस्तानी झंडा लहराकर जश्न मनाया गया था। इस सीट से भी कभी कोई हिंदू चुनाव नहीं जीता है। 2021 विधानसभा चुनावों में हरिहरपारा से टीएमसी के नईमत शेख ने 47 फीसदी से ज्यादा वोट हासिल करते हुए आसान जीत दर्ज की।

जलांगी से 1972 से नहीं जीता कोई हिन्दू 

मुर्शिदाबाद के जलाँगी में आजादी के बाद से ही बड़ी संख्या में अवैध प्रवासियों का आना शुरू हो गया था। इस सीट पर 1972 के बाद से ही कोई हिंदू चुनाव नहीं जीता है। 2021 के विधानसभा चुनावों में इस सीट से टीएमसी के टिकट पर लड़े अब्दुर रज्जाक ने 55 फीसदी मत (कुल 1.23 लाख वोट) हासिल करते हुए जीत हासिल की।

दोमकल से नहीं जीता कोई हिन्दू 

कुछ ऐसा ही हाल मुर्शिदाबाद जिले की दोमकल सीट का भी है। इस सीट से भी अब तक कोई हिंदू कभी चुनाव नहीं जीत सका है। 2021 विधानसभा चुनावों में बीजेपी ने भी मुस्लिम उम्मीदवार उतारा था, लेकिन वह 5 फीसदी मत (कुल 12 हजार वोट) ही हासिल कर सका। इस चुनाव में इस सीट से कोई भी हिंदू मैदान में नहीं उतरा था। यहाँ से टीएमसी के जफिकुल इस्लाम ने 56 फीसदी (1.27 लाख वोट) से अधिक मत हासिल करते हुए जीत हासिल की।

अवैध बांग्लादेशियों के आने से बढ़ा आतंक 

2011 की जनगणना के मुताबिक, मुर्शिदाबाद में मुस्लिमों की जनसंख्या 55 से बढ़कर 66 फीसदी हो गई, जबकि हिंदुओं की आबादी 44 से घटकर महज 33 फीसदी रह गई। लेकिन जनसंख्या के आँकड़ों से एक सबसे जरूरी बात पता नहीं चलती और वह है कि जनसंख्या में कमी के साथ, हिंदू पूरी तरह से राजनीतिक हाशिए पर चले गए हैं।

बांग्लादेश से अवैध प्रवासियों के आने से आंतकवाद बढ़ने, हिंदुओं के खिलाफ हिंसा में बढ़ोतरी भी देखने को मिली है। मुर्शिदाबाद से पिछले साल एनआईए ने अलकायदा आतंकी को गिरफ्तार किया था।

मालदा में भी मुर्शिदाबाद जैसा वोटिंग ट्रेंड 

मालदा पश्चिम बंगाल का एक और जिला है जहाँ बांग्लादेश से बड़ी संख्या में मुस्लिमों के आने से हिंदू अल्पसंख्यक रह गए हैं। यहाँ मुस्लिमों की आबादी 1961 के 36% से बढ़कर 2011 में 51% हो गई। यहाँ पर हिंदू आबादी 63 फीसदी से घटकर 48 फीसदी रह गई है। अब मालदा एक मुस्लिम बहुल जिला है।

मालदा में भी वोटिंग का पैटर्न मुर्शिदाबाद जैसा ही है। सुजापुर मालदा की सीट है, जहाँ अवैध प्रवासियों के आने से यहाँ की जनसांख्यिकीय बदल गई है। यहाँ 1962 से ही कोई हिंदू चुनाव नहीं जीता है और इस बार कोई हिंदू यहाँ चुनाव लड़ा ही नहीं। बीजेपी ने यहाँ से मुस्लिम उम्मीदवारा उतारा, लेकिन उन्हें महज 6 फीसदी मत ही मिले।

हरिश्चंद्रपुर मालदा की एक सीट है, जहाँ से हिंदुओं का बड़ी संख्या में पलायन हुआ है। यहाँ हिंदू आबादी घटकर 31 फीसदी रह गई है। 2021 के चुनावों में यहाँ से टीएमसी के तजमुल हुसैन ने जीत हासिल की, जबकि बीजेपी मुस्लिम उम्मीदवार उतारकर भी हारी।

मलातीपुर भी मालदा की एक सीट है जहाँ बड़ी संख्या में अवैध प्रवासी आएँ हैं। इस विधानसभा क्षेत्र में मुस्लिम आबादी बढ़कर 72% हो गई है। इस सीट से टीएमसी के अब्दुर रहीम बोक्सी ने जीत हासिल की, जिन्होंने खुले तौर पर ऐलान किया था कि उनकी पार्टी पश्चिम बंगाल को रोहिंग्याओं से भर देगी।

ओवैसी की पार्टी AIMIM ने भी यहाँ से अपना उम्मीदवार उतारा था, जिसे कुछ लोगों ने मुस्लिम मतदाताओं को बाँटने की कोशिश के तौर पर बीजेपी का छिपा हुआ मास्टरस्ट्रोक करार दिया था। लेकिन ओवैसी की पार्टी मुस्लिम बहुल इलाके में एक फीसदी वोट भी हासिल नहीं कर पाई।

शिवलिंग पर कंडोम, बीफ फेस्टिवल और हिन्दू देवी-देवताओं का अपमान करने वालों को जनता ने चटाई धूल

CPI(M) के एम स्वराज, TMC की सायोनी घोष और
कांग्रेस की बिंदु कृष्णा (बाएँ से दाएँ)
पाँच राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों के परिणाम आ गए हैं। भाजपा ने असम और पुडुचेरी में जीत दर्ज की है। पश्चिम बंगाल में TMC तो केरल में लेफ्ट सत्ता बचाने में सफल रहा है। तमिलनाडु में सत्ता परिवर्तन हुआ और DMK को जीत मिली। इन चुनावों में कुछ ऐसे नेताओं को हार मिली है, जो राजनीति से ज्यादा अपनी बदजुबानी के लिए चर्चा में आए थे। यहाँ हम ऐसे हिन्दू विरोधी नेताओं के चुनाव परिणाम पर चर्चा करेंगे।

सबसे पहले बात बंगाली अभिनेत्री सायोनी घोष की, जिन्हें TMC ने आसनसोल दक्षिण से उम्मीदवार बनाया था। वहाँ उन्हें 4487 वोटों से हार मिली। जहाँ भाजपा उम्मीदवार अग्निमित्र पॉल 87,881 (45.13%) वोट पाने में कामयाब रहे, सायोनी को 83,394 (42.82%) वोट मिले। उन्होंने शिवलिंग को कंडोम पहनाते हुए एक तस्वीर शेयर कर भगवान शिव का मजाक बनाया था। हिन्दू भावनाओं को आहत करने के आरोप में उन पर FIR भी हुई थी।

इसी तरह केरल में कांग्रेस की बिंदु कृष्णा ने ‘बीफ फेस्टिवल’ का आयोजन किया था। उन्हें कोल्लम से उम्मीदवार बनाया गया था। मई 2017 में जब केंद्र सरकार ने हत्या के लिए जानवरों के बाजार से खरीद-बिक्री पर पाबंदी लगाई थी, तब केरल के विभिन्न इलाकों में इस तरह के ‘बीफ फेस्ट’ हुए। बिंदु कृष्णा ने कहा था कि प्रधानमंत्री मोदी को डिलीवर करने के लिए ‘स्वादिष्ट बीफ’ को पैक कर हेड पोस्ट ऑफिस में भेजा जाएगा।

कोल्लम की बात करें तो यहाँ काँटे की टक्कर में जहाँ बिंदु कृष्णा को 56,452 (43.27%) वोट मिले, CPI(M) के एम मुकेश 58,524 (44.86%) मत पाकर विजयी हुए। इस तरह से ‘बीफ फेस्टिवल’ का आयोजन वाली बिंदु कृष्णा 2072 वोटों से हार गईं।

इस सूची में एक और उम्मीदवार हैं पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस की सुजाता खान, जिन्होंने दलितों पर आपत्तिजनक टिप्पणी की थी। उन्होंने कहा था कि अनुसूचित जाति (SC) के लोग भिखारी होते हैं। उन्हें आरामबाग से उम्मीदवार बनाया गया था, जहाँ उनकी हार के बाद भाजपा के दफ्तर को जला डाला गया। भाजपा के मधुसूदन बाग़ ने 1,03,108 (46.88%) वोट पाकर 95,936 (43.62%) वोट पाने वाली सुजाता को 7172 मतों से हराया।
इसी तरह केरल के विधायक एम स्वराज ने भगवान अयप्पा पर आपत्तिजनक टिप्पणी की थी। वो अपनी सीट भी नहीं बचा पाए। वे ‘डेमोक्रेटिक यूथ फेडरेशन ऑफ इंडिया (DYFI)’ के राज्य सचिव भी हैं। उन्होंने कहा था कि भगवान अयप्पा की 2018 में मल्लिकापुरम से शादी हुई है, इसलिए सबरीमाला मंदिर में कोई भी जा सकता है। वो त्रिपुनिथुरा में कांग्रेस उम्मीदवार के बाबू से 992 वोटों से हार गए।
इस सूची में एक नाम भाजपा के एक नेता का भी है, जिन्होंने कहा था कि बीफ भारत का ‘राष्ट्रीय भोजन’ है। असम के गौरीपुर से उम्मीदवार बनेन्द्र कुमार मुशहरी तब भी हार गए हैं, जब राज्य में उनकी ही पार्टी ने सत्ता में वापसी की है। उनकी बुरी हार हुई है। बनेन्द्र को जहाँ 63,349 (34.48%) वोट मिले, AIDUF के निज़ानुर रहमान को 1,12,194 (61.07%) वोट प्राप्त हुए। इस तरह 48,845 वोटों के अंतर से बनेन्द्र की हार हुई।

आखिर भाजपा के पास बंगाल में खोने को था ही क्या?

एक बार फिर लोकतंत्र में लोगों की आस्था बनी रह गई है! शायद ईवीएम की खराबी अब बीते दिनों की बात है। हाँ, अगर बंगाल के नतीजे उलट होते, निश्चितरूप से भाजपा विरोधी ईवीएम में गड़बड़ी करने का आरोप लगा रहे होते। मोदी-शाह के अश्वमेध के बगटूट घोड़े को बंगाल की दीदी ने थाम लिया है। ऐसी कुछ हेडलाइंस, ऐसे कुछ स्लग्स, ऐसे कुछ विश्लेषण अगले एकाध दिनों तक देखने को मिलने की संभावना है।

मज़े की बात है कि पाँच राज्यों के चुनाव में से दो में भाजपा या भाजपा नीत गठबंधन पूरे बहुमत से मज़े से सरकार बनाने जा रही है। एक राज्य में उसने तगड़ी एंट्री मारी है। लेकिन चर्चा केवल बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के सीटों की ही हो रही। वह भी तब, जब पिछले विधानसभा चुनाव में महज 10 फीसदी वोट और तीन सीटें पानेवाली भाजपा इस बार लगभग 38 फीसदी वोट और 80 सीटों के साथ दमदार विपक्ष बनकर उभरा है। इतना ही नहीं, इतने वर्ष बंगाल में राज करने वाली कांग्रेस और वामपंथ का सुपरा साफ हुआ है। 

असम में तमाम दम झोंकने के बावजूद कांग्रेस की दाल नहीं गली और भाजपा ने धमाकेदार वापसी की है। वहाँ मुस्लिम जिहादियों के साथ गठबंधन का भी कांग्रेस को फायदा नहीं मिला और भाजपा पूर्ण बहुमत से सरकार बनाने जा रही है। पुडुचेरी में भाजपा नीत गठबंधन की सरकार बनेगी और तमिलनाडु में भाजपा ने अपनी शुरुआत कर दी है। केरल में भी मेट्रो मैन श्रीधरन भले हार गए हों, पर भाजपा की धमक तो दिखने लगी है।

बंगाल की बात करें, तो ‘दीदी’ के खाते में एक पूर्ण बहुमत की सरकार आई है, लेकिन नंदीग्राम के नतीजे बताते हैं कि जनता उनसे किस तरह ऊब चुकी है। यह टीवी मीडिया और छद्म बुद्धिजीवियों की बनाई दुनिया थी, जिसने भाजपा का सब कुछ बंगाल में दाँव पर लगा हुआ बता दिया। भाजपा के पास बंगाल में खोने को था ही क्या? उसकी तीन से 80 सीटों की यात्रा बताती है कि भाजपा ने बंगाल में उम्मीदों से कहीं बेहतर प्रदर्शन किया है।

बंगाल के नतीजों से अगर हम त्वरित आकलन निकालने की चेष्टा करें तो यही कह सकते हैं कि ममता बनर्जी के गुंडों की धांधली और बेशर्म तुष्टिकरण ही आखिरकार उनके काम आया है। जिन सीटों पर भी मुस्लिम जनसंख्या प्रभाव डालने वाली थी, वहाँ टीएमसी की जोरदार जीत हुई है। कांग्रेस और लेफ्ट का जिस तरह सफाया हुआ है, उस पर कोई बात ही करने को तैयार नहीं है। वामपंथी जहाँ 5 फीसदी वोटों और शून्य सीटों पर सिमट गए, तो कांग्रेस तीन फीसदी के बाद भी खाता खोलते नहीं दिख रही।

वोटों का यह बटखरा सीधे तौर पर तृणमूल के पक्ष में गया और उसने पलड़े को झुका दिया। ममता के शासन में उत्पीड़न झेल रहे हिन्दू अपनी नींद से नहीं जागा। हिंदू वोट हमेशा की तरह ध्रुवीकृत नहीं हुए और उसका भाजपा को नुकसान हुआ, जबकि मुसलमानों ने हमेशा की तरह निगेटिव वोटिंग की, भाजपा को हराने के लिए एकजुट हुए।

ममता बनर्जी ने खुलेआम जब मुस्लिम वोटर्स का आह्वान किया कि केवल उनको ही वोट दें, तो उसका फायदा भी उनको ही मिलना था। यह इस देश का विचित्र हाल है कि अगर आप मुस्लिम वोटों का सीधे तौर पर बाँट-बखरा करें तो आप सेकुलर हैं, लेकिन हिंदुओं के अधिकार के लिए भी अगर किसी ने आवाज़ उठा दी तो वह सांप्रदायिक है।

लोकतंत्र में हार-जीत लगी रहती है, पर असल चुनौती तो अभी बंगाल की है। शायद बंगाल की जनता अभी नर्क के उस अनुभव से नहीं गुजरी है, जहाँ से असम के लोग दो-चार हो चुके हैं। टीएमसी के गुंडों ने नतीजों के आते ही आरामबाग में भाजपा कार्यालय को जलाकर आनेवाले भविष्य के संकेत दे ही दिए हैं। कमीशनखोरी, तोलेबाजी, हरेक केंद्रीय योजना में अड़ंगा अब बंगाल का नसीब होने वाला है, रोहिंग्या और अवैध बांग्लादेशी वहॉं हरेक दिन अब एक नया कश्मीर बनाएँगे।

कूचबिहार में जब जिहादी भीड़ ने सीआरपीएफ पर हमला किया औऱ उसमें चार जिहादियों के साथ एक हिंदू भी गोलीबारी में मारा गया, तो ममता बनर्जी ने उन जिहादियों के परिवारों से मंच से बात कर अपने मुस्लिम वोटर्स को बिल्कुल साफ संदेश दे दिया था। सोचना वहाँ के हिंदुओं को है, जो ममता के साथ गए हैं। हालाँकि, भाजपा एक मजबूत विपक्ष के रूप में उभरी है, पर हिंदुओं को वह कितना बचा पाएगी, यह सोचने की बात है।

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जीत से ‘बेकाबू’ हुए TMC के गुंडे : ‘संघियों के सिर से खून निकलना चाहिए… बाहरी, हिंदी बोलने वाले कमी
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जीत से ‘बेकाबू’ हुए TMC के गुंडे : ‘संघियों के सिर से खून निकलना चाहिए… बाहरी, हिंदी बोलने वाले कमी

स्पष्ट है कि इन चुनावों में भाजपा का कोई सीधे तौर पर कोई नुकसान नहीं हुआ है। असम उसके पाले में है। पुडुचेरी में वह सरकार बना रही है। बंगाल में शानदार डेंट लगाया है और केरल-तमिलनाडु में अच्छी शुरुआत की है। यही इबारत दीवार पर भी लिखी नज़र आ रही है।

जीत से ‘बेकाबू’ हुए TMC के गुंडे : ‘संघियों के सिर से खून निकलना चाहिए… बाहरी, हिंदी बोलने वाले कमीनों’

वैसे दिल बहलाने को ख्याल अच्छा है कि भाजपा 3 से 78 सीटें लेकर प्रमुख विपक्ष बन गयी, जबकि भाजपा की आज वाली स्थिति पिछले चुनाव में होती और आज बंगाल की सत्ता संभाले होती। बशर्ते ममता बनर्जी के सत्ता के पहले चरण से ही हिन्दू घरों और मंदिरों पर होते हमलों को गंभीरता से लिया होता। लेकिन उस समय कांग्रेस और वामपंथ को सत्ता से दूर करने के लिए ममता को गुप्त समर्थन जारी रखा, इस सच्चाई से भाजपा मुंह नहीं मोड़ सकती। आज इन्हीं पार्टियों ने भाजपा को सत्ता से दूर रखने के लिए तृणमूल को गुप्त समर्थन दिया। यही स्थिति दिल्ली, पंजाब और उत्तर प्रदेश में होने वाले आगामी चुनावों में भी देखने को मिल सकता है, बंगाल तो एक ट्रायल था, पूरा शो होना अभी बाकि है। भाजपा विरोधी अपनी तुष्टिकरण नीति पर चल रहे हैं, जबकि भाजपा खुलकर अपनी राष्ट्रीयता वाली भूमिका खुलकर खेलने में असमर्थ है। अब जिस तरह बंगाल में हिन्दुओं को धमकियां मिलनी शुरू हो चुकी हैं, उनका मुंह तोड़ जवाब देना होगा।   
पश्चिम बंगाल में 2 मई 2021 को शुरुआती रुझानों में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के जीतने की खबरें आते ही तृणमूल कार्यकर्ताओं और कट्टर मुस्लिमों ने बीजेपी समर्थकों के खिलाफ नफरत का जहर उगलना और खून की होली खेलने जैसी धमकियाँ देना शुरू कर दिया।

नफरत फैलाने वाले गैंग के शुरुआती ट्वीट्स में ही बीजेपी समर्थकों के खिलाफ जमकर जहर उगला गया और इन लोगों ने बीजेपी समर्थकों के खिलाफ लोगों को उकसाने में भी कोई कसर नहीं छोड़ी। जुल्फिकार अली ने जोर देकर कहा, “पश्चिम बंगाल ने खुद को संघी वायरस के खिलाफ टीका लगाया।”

कोरोना वायरस द्वारा मानवता के लिए पैदा किए गए खतरे के बीच इस असंवेदनशील ट्वीट ने वायरस और बीजेपी समर्थकों के बीच समानताएँ खींचने की कोशिश की।

एक और ट्विटर यूजर ने बीजेपी समर्थकों के खिलाफ अपशब्द का इस्तेमाल किया और गाली को अंग्रेजी में तोड़-मरोड़ कर पेश किया और कहा कि 6 बजने में कितना समय है, क्योंकि उन्हें पता है कि तब तक चुनाव नतीजे आ जाएँगे।

राजनीति में प्रतिद्वंद्वियों के खिलाफ अपमानजनक ट्वीट करना अब नई बात नहीं है, लेकिन इस्लामी कट्टरपंथी और टीएमसी समर्थक इस मामले और भी नीचे गिर गए। वे ‘संघियों’ को हिंसा, हत्या, और गंभीर शारीरिक नुकसान पहुँचाने की धमकी देने लगे।

इस्लामी कट्टरपंथी फहमी रियाज ने कहा, ”टीएमसी की जीत के बाद संघियों का इलाज होते देखना पसंद करूँगा। उनके सिर से खून निकलना चाहिए।”

एक और ट्विटर यूजर ने हाथ में चाकू लिए एक आदमी की तस्वीर शेयर की और लिखा, ”ममता की जीत के बाद बीजेपी कार्यकर्ता।” इस तस्वीर के जरिए वह ये कहने की कोशिश कर रहा था कि तृणमूल कॉन्ग्रेस की सत्ता में वापसी के बाद बीजेपी कार्यकर्ताओं को चाकुओं से निर्दयता से गोदा जाएगा।

Despacito नाम के एक इंस्टाग्राम अकाउंट ने भी ”हिंदी बोलने वालों को धमकाते हुए कहा, “तुम लोग बहुत बहादुर बन गए हो। ममता की जीत के बाद रुको और इंतजार करो तुम ‘बाहरी, हिंदी बोलने वाले कमीनों।”

वहीं एक यूजर ने लिखा कि देखो हम 30 करोड़ होकर भी कैसे अपनी सरकार बनाते हैं और तुम 100 करोड़ होकर भी कुछ नहीं कर पाते हो?

रुझानों में ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली टीएमसी की भारी-भरकम जीत के बाद कथित तौर पर पार्टी के कार्यकर्ताओं ने कोलकाता में हेस्टिंग्स में बीजेपी ऑफिस का घेराव किया। टीएमसी की जीत के बाद अब बीजेपी समर्थकों और जिन्होंने इस पार्टी के लिए वोट किया उनके मन में टीएमसी और उनके कार्यकर्ताओं का गुस्सा झेलने का डर है।

पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस की जीत अभी आधिकारिक तौर पर घोषित भी नहीं हुई कि अभी से वहाँ हिंसा की तस्वीरें सामने आने लगीं। सोशल मीडिया पर एक वीडियो सामने आई है, जिसमें भाजपा का कार्यालय जलता नजर आ रहा है।

टीएमसी कार्यकर्ताओं का जश्न आसनसोल में भी दिखा। जब चुनाव आयोग और अधिकारियों ने पुलिस को चुनाव नतीजों के बाद पार्टियों द्वारा जुलूस निकालने या जश्न न मनाने का निर्देश दिया था। बंगाल पुलिस को राज्य में बढ़ते कोविड मामलों के बीच टीएमसी कार्यकर्ताओं को जश्न न मनाने का निर्देश देते देखा गया। लेकिन बंगाल पुलिस के निर्देशों से बेपरवाह टीएमसी कार्यकर्ताओं को पुलिस के बगल में पटाखे फोड़ते देखा गया।

5 राज्यों के नतीजों से निकला एक सवाल : कांग्रेस का क्या होगा, राहुल गाँधी देंगे और कितने घाव ?

चार राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश के विधानसभा चुनावों के नतीजों की तस्वीर लगभग साफ हो गयी है। असम में भाजपा, पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस (TMC) और केरल में एलडीएफ की सत्ता में वापसी। बंगाल में फिलहाल बीजेपी अपनी आशा के अनुरूप प्रदर्शन नहीं दिखा। फिर भी 3 सीटों से कहीं अधिक सीटें लेकर एक विपक्ष में रूप में उभर कर कांग्रेस और वामपंथ को धूल चटा दी। वैसे भी बंगाल में भाजपा को सत्ता से दूर रखने के लिए अपना ही अस्तित्व ख़त्म करना राजनीती नहीं। पुदुच्चेरी में भाजपा गठबंधन जीत हासिल कर रहा है।

जब अंतिम नतीजे आ जाएँगे तो हर दल इन चुनावों में अपने प्रदर्शन पर चिंतन करेगा। पश्चिम बंगाल के बहुचर्चित मुक़ाबले में भाजपा की संभावित जीत क्यों नहीं हो सकी, आने वाले समय में यह बहस का एक बड़ा विषय होगा। तमिलनाडु में डीएमके को आशा के अनुरूप एक बड़ी जीत क्यों नहीं मिल सकी, यह भी चर्चा का विषय रहेगा।

पर इन सब के बीच जिस एक आवश्यक विषय पर चर्चा शायद न दिखे, वह होगी इन चुनावों में कांग्रेस पार्टी का प्रदर्शन। केरल, असम और तमिलनाडु में राहुल गाँधी और प्रियंका वाड्रा ने बड़ी मेहनत की थी। असम के चाय बाग़ानों में प्रियंका मजदूरों के साथ चाय पत्ती तोड़ते हुए भी दिखी थीं। इसके अलावा राहुल गाँधी ने चाय बागान बहुत इलाकों में गुजरात के व्यापारियों से अलग से पैसे लेने का वादा भी किया था। दक्षिण भारत के राज्यों में राहुल ने चुनाव प्रचार के दौरान कसरत करने से लेकर समुद्र में गोता लगाने जैसे मेहनत वाले और चुनाव प्रचार के लिए महत्वपूर्ण काम किए थे। पर उनका असर नहीं हुआ और उनके दल के प्रदर्शन में सुधार नहीं हुआ।

200 यूनिट फ्री बिजली, 2000 रूपए गृहिणी सम्मान, 5 लाख नौकरी… सब फेल

दिलचस्प बात यह है कि असम वह राज्य है जहाँ कांग्रेस की महासचिव प्रियंका गाँधी ने 2 दिवसीय दौरे पर 6 रैलियाँ बैक टू बैक कीं। प्रियंका गाँधी ने दौरे के पहले दिन जोरहाट, नजीरा और खुमतई में रैली की। फिर अगले दिन उन्होंने गोलाघाट जिले के सरूपथार और नागाँव के कलियाबोर में रैली की। उनकी अंतिम रैली श्रीमंत शंकरदेवा की जन्मस्थली बाताद्रव में हुई।

केवल यही 6 रैलियाँ प्रियंका गाँधी ने चुनाव के मद्देनजर नहीं की थी, बल्कि 1-2 मार्च को भी प्रियंका गाँधी असम में बैठकें कर चुकी थीं। 2 मार्च को तेजपुर पहुँच उन्होंने राज्य की जनता को 200 यूनिट मुफ्त बिजली देना का वादा किया था। 

उन्होंने यह भी कहा था कि इस कदम से जनता के 1400 रुपए बचेंगे। प्रियंका ने कहा कि यदि उनकी सरकार आई तो राज्य में  सीएए लागू नहीं होने दिया जाएगा और कम से कम 5 लाख सरकारी नौकरियाँ निकाली जाएँगी। 

राज्य की महिलाओं को रिझाने के लिए प्रियंका गाँधी ने 2000 रुपए हर महीने गृहणियों को भी देने का ऐलान किया। वहीं चाय के बागान में काम करने वालों के लिए ऐलान किया कि उन्हें 365 रुपए वेतन दिया जाएगा।

केवल पश्चिम बंगाल में दल की रणनीति सफल होते हुए दिखी जहाँ उन्होंने चुनाव प्रचार लगभग न के बराबर किया। उसके अलावा दल ने कहीं न कहीं अधीर रंजन चौधरी को अपना काम करने से रोका। प्रचार के दौरान ही चौधरी को लोकसभा में विपक्ष के नेता पद से हटाकर दल ने किसे फायदा पहुँचाने की कोशिश की, उसकी विवेचना शायद आने वाले दिनों में हो। अधीर रंजन का खुद को चुनाव प्रचार से लगभग अलग रखना किस रणनीति का हिस्सा था, वह शायद आज आए नतीजों से स्पष्ट हो गया है।

चुनाव परिणामों के दिन कांग्रेस पार्टी द्वारा कोरोना का हवाला दे अपने प्रवक्ताओं को न्यूज़ स्टूडियो में न भेजने का फ़ैसला क्या संदेश देता है? शायद यही कि कांग्रेस फिलहाल प्रश्न सुनने के मूड में नहीं है। पर क्या चुनावी प्रक्रिया की गर्द जम जाने के बाद भी कांग्रेस प्रश्न सुनने का मन बनाएगा? क्योंकि आज के दिन तो प्रवक्ताओं से किए गए प्रश्न इन चार राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश में दल के प्रदर्शन के इर्द-गिर्द होते, पर भविष्य में तो और प्रश्न पूछे जाएँगे।

समय आने पर यह भी पूछा जाएगा कि कांग्रेस पार्टी भाजपा से खुद क्यों नहीं लड़ सकती? जब लड़ने का समय आता है तब अपनी भूमिका किसी और को देकर मैदान से हट जाती है? क्यों राहुल गाँधी केंद्र में तो विपक्ष की ओर से खुद को नेता के रूप में प्रस्तुत करते हैं पर चुनाव आते ही वे लघु मानव की भूमिका में आ जाते हैं? पूछा जाएगा कि इन चुनावों में कांग्रेस के प्रदर्शन के बाद विपक्ष की राजनीति में राहुल गाँधी का कद कितना बढ़ा है? या छोटा हुआ है तो कितना छोटा हुआ है? क्या भाजपा विरोधी पार्टियों को अब कांग्रेस की किसी नीति अथवा इशारे पर काम करना चाहिए?

ममता बनर्जी ने जिस तरह से पश्चिम बंगाल में वापसी की है, उसके बाद विपक्षी राजनीति में उनका कद कितना बढ़ेगा? भाजपा के मुक़ाबले जब एकजुट होकर खड़े होने का प्रश्न उठेगा तब विपक्ष का नेता कौन होगा? ममता बनर्जी अनौपचारिक रूप से पहले ही अभिषेक बनर्जी को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर चुकी हैं। ऐसे में क्या इस संभावना से इनकार किया जा सकेगा कि वे राज्य से निकल कर केंद्र की राजनीति में नहीं जाएँगी? यदि ऐसा होगा तब विपक्ष में राहुल गाँधी की भूमिका क्या होगी? क्या कान्ग्रेस पार्टी को यह स्वीकार होगा? अगले वर्ष उत्तर प्रदेश विधानसभा के लिए चुनाव होने हैं। वहाँ प्रियंका खुद को कांग्रेस की ओर से नेता के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिशें करती रही हैं। ऐसे में इन सब के बीच राहुल गाँधी खुद को कहाँ पाते हैं?

ये कुछ ऐसे प्रश्न हैं जिन पर कांग्रेस पार्टी को आज नहीं तो कल उत्तर देना ही होगा और जब ये प्रश्न उठेंगे तब शायद मंच और हों और पार्टी किसी बहाने की आड़ में खुद को छिपा न सके। क्या कारण है कि राज्यों में भी कांग्रेस अपना अस्तित्व भी नहीं बचा सकी? 

राहुल गाँधी : 4 राज्यों में जम कर की जनसभा अब बंगाल में हार देख, नहीं करेंगे चुनावी रैली

नेता जनता को कितना पागल समझते हैं, देश फैले कोरोना के दौरान चुनावी रैलियों से पता चल रहा है। ऊपर से बंगाल को छोड़ अन्य चार राज्यों में खूब प्रचार कर कोरोना का बहाना कर राहुल गाँधी ने बंगाल की रैलियां स्थागित कर दी। स्थागित करने का कारण भी है, क्योकि वहां असली लड़ाई तृणमूल और भाजपा के बीच है। बाकि किसी अन्य पार्टी का क्या और किस तरह प्रचार हो रहा है, कोई मीडिया नहीं दिखा रहा। यही हाल दिल्ली के मुख्यमंत्री का है, जो अपनी नाकामियों को छुपाकर केंद्र को दोषी ठहराने का कोई अवसर नहीं चूकते, उन्हें मालूम है कि मुफ्त की रेवड़ियों के सहारे सत्ता ले लूंगा और केंद्र से मिले भिन्न-भिन्न मदों के लिए मिले धन का अधिकांश भाग अपने विज्ञापन पर खर्च करता रहूँगा। कोई निर्भीक अथवा खोजी पत्रकार नहीं विश्लेषण नहीं करता, क्योकि उन्हें भी विज्ञापन के माध्यम से धन मिल रहा है। नेता जनता की समस्याओं के प्रति कितने सजग है, निम्न वीडियो देखिए। इसे कहते हैं निडर बेबाक पत्रकारिता। 

  

सभी चुनावी राज्यों में रैलियों को संबोधित करने के बाद राहुल गाँधी ने सोशल मीडिया के माध्यम से यह घोषणा की कि अब वह पश्चिम बंगाल में किसी भी चुनाव रैली में शामिल नहीं होंगे। उन्होंने ट्विटर के माध्यम से इसकी जानकारी दी।

राहुल गाँधी ने कोविड-19 की खराब होती परिस्थितियों का हवाला देते हुए कहा कि वह अब पश्चिम बंगाल में बचे तीन चरण के चुनाव में होने वाली अपनी सभी रैलियों को रद्द करते हैं। उन्होंने बाकी नेताओं से भी चुनावी रैलियों पर पुनर्विचार करने के लिए कहा है।

यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि अपनी बहन प्रियंका गाँधी वाड्रा के साथ राहुल ने कई राज्यों में कई चुनाव रैली की हैं जबकि कोरोनावायरस का संक्रमण तब भी बढ़ ही रहा था।

4 अप्रैल को 2021 को राहुल गाँधी ने केरल में एक चुनाव रैली को संबोधित किया था। केरल सर्वाधिक संक्रमित मरीजों की संख्या में भारत में दूसरे स्थान पर है। 4 अप्रैल को केरल में 11 लाख से अधिक कुल संक्रमित मरीज और 28,000 सक्रिय मरीज थे। उसके बाद केरल में 18 अप्रैल को सक्रिय मरीजों की संख्या बढ़कर 80,000 हो गई।

तमिलनाडु में भी 28 मार्च 2021 को राहुल गाँधी की एक बड़ी जनसभा हुई। उस समय तमिलनाडु में कुल सक्रिय मरीजों की संख्या 13,070 थी। आज तमिलनाडु में सक्रिय मरीजों की संख्या लगभग 65,000 है।

इस वीडियो में प्रियंका गाँधी वाड्रा को असम से बिदाई देने के लिए कॉन्ग्रेस द्वारा जुटाई गई लोगों की भीड़ दिखाई दे रही है।

असम, तमिलनाडु, केरल और केंद्र शासित प्रदेश पुडुच्चेरी में चुनाव संपन्न हो चुके हैं।

पश्चिम बंगाल में कॉन्ग्रेस, लेफ्ट पार्टियों के साथ गठबंधन में है लेकिन उनके सरकार बनाने की संभावनाएँ न के बराबर हैं। आशंका तो यह भी व्यक्त की जा रही है कि कॉन्ग्रेस और उसके गठबंधन को 2016 के चुनावों से भी कम सीटें प्राप्त होंगी।

  

‘मुहर्रम के कारण दुर्गा विसर्जन को रोका’ – 50 करोड़ के मरने की दुआ मांगने वाले मौलाना अब्बास सिद्दीकी का ममता पर आरोप

                                             फुरफुरा शरीफ का पीर मौलाना अब्बास सिद्दीकी (साभार: दि हिंदू)
पश्चिम बंगाल के फुरफुरा शरीफ दरगाह के पीर मौलाना अब्बास सिद्दीकी राजनीतिक रूप से काफी महत्वाकांक्षी हैं। बंगाल में इनके बड़े फॉलोवर्स हैं। मौलाना अब्बास सिद्दीकी की पार्टी इंडियन सेक्युलर फ्रंट पश्चिम बंगाल की 294 विधानसभा सीटों के लिए कांग्रेस और वामपंथियों के साथ मिलकर 30 सीटों पर चुनाव लड़ रही है।

द हिंदू को दिए इंटरव्यू में मौलाना सिद्दीकी ने कहा, “मैं केवल मुसलमानों को नहीं, बल्कि सभी गरीबों और वर्तमान राजनीतिक ढाँचे से खुद को ठगा महसूस कर रहे लोगों को संबोधित कर रहा हूँ। मैं उन सभी के साथ गठबंधन के लिए तैयार था, जो मेरी शर्तों को मानने के साथ मुझे सीटें देता, लेकिन ममता बनर्जी तैयार नहीं हुईं, जबकि कांग्रेस और लेफ्ट फ्रंट ने मेरी शर्तों को माना।”

मौलाना सिद्दीकी का पश्चिम बंगाल में बड़ा जनाधार है। राज्य के कम से कम पाँच जिलों, उत्तर और दक्षिण परगना, हावड़ा, हुगली, नादिया और पूर्वी मिदनापुर के कुछ हिस्सों तक में उसके फॉलोवर्स की भारी तादात है।

सिद्दीकी ने भाजपा के लिए रास्ता आसान करने के सवाल पर जोर देकर कहा कि वह नबाना या राज्य सचिवालय में बीजेपी की पहुँच को आसान नहीं होने देंगे। बंगाल का चुनाव अब तक के सर्वाधिक ध्रुवीकरण के दौर में है। अब्बास सिद्दीकी कहते हैं, “अगर कोई मुझे जाहिल और असभ्य कहता है तो मैं उससे पूछता हूँ कि जब 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा जीती थी तो उस वक्त तो मैं था ही नहीं।” अब्बास सिद्दीकी ने ममता बनर्जी पर बड़ा आरोप लगाते हुए कहा:

“ममता बनर्जी के कार्यों के कारण भाईचारे का अंत हो रहा है। प्रशासन ने मुहर्रम के कारण दुर्गा विसर्जन को रोक दिया था। इसकी माँग किसने की? कहा गया था कि इमामों को 2,500 रुपए मिलेंगे, लेकिन इस बात का खुलासा नहीं किया गया कि वो पैसा वक्फ बोर्ड से आया था। जब ममता का जनाधार खिसकने लगा तो उन्होंने मंदिरों के पुजारियों को भी पैसे देने की बात कही। हम केवल वही चाहते हैं, जो संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकार हैं। इस तरह की राजनीति के कारण सबसे बड़ा नुकसान यह हुआ है कि समुदायों के बीच भाईचारा प्रभावित हुआ है। बंगाल में भाजपा के आगमन के लिए खुद ममता बनर्जी ही जिम्मेदार हैं। वह वाजपेयी सरकार में रेल मंत्री थीं और मुख्यमंत्री के रूप में उनके कार्यकाल के दौरान भाजपा केवल मजबूत हुई है।”

50 करोड़ के मरने की मांगी थी दुआ 

पश्चिम बंगाल चुनाव के दौरान भाईचारे का राग अलाप रहे मौलाना फुरफुरा शरीफ के वही पीरजादा हैं, जिन्होंने अप्रैल 2020 में वायरस से 50 करोड़ के मरने की दुआ माँगी थी। उन्होंने वायरल वीडियो में कहा था, “बहुत जल्द मेरे पास खबर आई है कि पिछले दो दिनों से मस्जिदों में आग लगाई जा रही है, माइक जलाए जा रहे हैं। मुझे लगता है कि एक महीने के अंदर ही कुछ होने वाला है। अल्लाह हमारी दुआ कबूल करे। अल्लाह हमारे भारतवर्ष में एक ऐसा भयानक वायरस दे कि भारत में दस-बीस या पचास करोड़ लोग मर जाएँ। क्या कुछ गलत बोल रहा मैं? बिलकुल आनंद आ गया इस बात में।” इसके बाद वहाँ मौजूद भीड़ ने भी मौलवी की कही बात पर खूब शोर के साथ अपनी सहमति दर्ज कराई थी।

पश्चिम बंगाल में आठ चरणों में होने वाले विधानसभा चुनाव का ऐलान होने से कुछ ही घंटों पहले ममता बनर्जी की नेतृत्व वाली तृणमूल कॉन्ग्रेस सरकार ने फुरफुरा शरीफ के विकास के लिए 1 मार्च 2021 को 2.60 करोड़ रुपए आवंटित किया था। गौरतलब है कि बंगाल में ममता मुस्लिम वोटों के सहारे ही सत्ता पर काबिज होती आई हैं।

सिद्दीकी के दोगले रवैये पर ट्विटर पर लोगों ने क्लास लगाने पर अब तक इसकी गिरफ़्तारी न होने पर भी प्रश्न लगा दिया है। लगता है बंगाल में बदलते परिवेश के डर से सिद्दीकी सियासत में कूदा है। जो आदमी विनाशक बीमारी से 50 करोड़ के मरने की दुआ मांगता हो, ऐसे आदमी को वोट देने वाले भी इंसानियत के सबसे बड़े दुश्मन हैं, और ऐसे विनाशक का अनुसरण करने वाले भी ऐसी ही श्रेणी में आता है। फिर ऐसे लोगों को इनके समर्थक "गरीब, मजलूम, नसमझ" आदि से बचाव करने उतर आते हैं। काश ! यही बात किसी भाजपाई ने बोल दी होती सारे छद्दम धर्म-निरपेक्ष और मीडिया ने चीख-चीखकर आसमान सिर पर उठा लिया होता। अब तक पता नहीं, राज्य सरकार से लेकर केंद्र सरकार ने भी कितनी दफाएं लगा कर मुकदमें दर्ज किये होते।  

खुद को ओवैसी का बड़ा फैन बताने वाले मौलाना सिद्दीकी चुनाव के समय गरीबों और दलितों की बात कर रहे हैं, लेकिन बीते साल 28 नवंबर 2020 में उन्होंने कहा था, “हम मुस्लिम यहाँ पर बहुसंख्यक हैं। आदिवासी, मथुआ और दलित हिन्दू नहीं हैं, इसीलिए यहाँ हम मेजॉरिटी में हैं।”

ममता की प्रत्याशी सुजाता मंडल खान ने अनुसूचित जाति को बताया भिखारी

पश्चिम बंगाल की आरामबाग विधानसभा सीट से टीएमसी उम्मीदवार सुजाता मंडल खान ने अनुसूचित जाति के लोगों के बारे में विवादित बयान देकर सियासी तूफान खड़ा कर दिया है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने एक चुनावी जनसभा में टीएमसी पर निशाना साधते हुए कहा कि आधे चुनावों ने ही टीएमसी का पूरा साफ होना तय कर दिया है। दीदी के नेता खुलेआम बंगाल के एसी, एसटी और ओबीसी वर्ग को गालियां देने लगे हैं। यह सिर्फ इसलिए क्योंकि वे बीजेपी का समर्थन करते हैं। दीदी आप उनको डराओगी, धमकाओगी लेकिन मोदी के लिए उनका स्नेह कम नहींं होगा। उधर केंद्रीय मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी  के नेतृत्व में बीजेपी के एक प्रतिनिधिमंडल ने चुनाव आयोग से मुलाकात कर तृणमूल कांग्रेस की शिकायत की।

जिस तरह तृणमूल कांग्रेस उम्मीदवार ने अनुसूचित जाति के लिए अपमानजनक बात बोली है, यदि यही बात भाजपा के किसी नेता ने कह दी होती, अब तक भीम आर्मी, कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, बहुजन समाजवादी और अन्य भाजपा विरोधी लामबंद होकर सड़क पर आ गए होते। बंगाल चुनाव के समीकरण बदलने शुरू हो गए होते। लेकिन अब सभी खामोश हैं, सबके मुंह में दही जम गया है।  

प्रधानमंत्री मोदी ने पश्चिम बंगाल के बर्धमान में एक चुनावी जनसभा को संबोधित करते हुए कहा कि दीदी, आपके साथी बंगाल के अनुसूचित जाति को भिखारी कहकर अपमान कर सकते हैं, लेकिन हमारे लिए, भाजपा के लिए अनुसूचित जाति का मान सम्मान सर्वोपरि है। प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि अपनी हार सामने देख दीदी ने अब नई रणनीति बनाई है। दीदी की साजिश है कि एससी, एसटी और ओबीसी किसी को भी वोट डालने नहीं दिया जाए। दीदी की साजिश है, इन वर्ग के लोगों को वोट डालने से रोकना और अपने गुंडों से छप्पा वोट डलवाना।

केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने टीएमसी पर हमला करते हुए कहा, “एक नेत्री ने कहा कि दलित समाज के लोग, स्वभाव से ही भिक्षा मांगने वाले लोग हैं। दीदी, आपकी पार्टी ने ऐसा कहकर मतुआ, नामशूद्र व राजवंशी समाज सहित पूरे दलित समाज का अपमान किया है। दीदी, थोड़ी भी शर्म बची है तो उसको आज ही पार्टी से निकाल दो, पर मैं जानता हूं आप ऐसा नहीं करोगी।”

बीजेपी प्रतिनिधिमंडल ने आरोप लगाया कि टीएमसी की सोच कमजोर तबको, दलितों, समाज के वंचित आवेदकों के प्रति उनका राजनीतिक शोषण करने की रही है। ममता दीदी के उम्मीदवार ने अनुसूचित जाति के लोगों को भिखारी कह कर के उनके स्वाभिमान को गाली दी है और यह एक बहुत बड़ा ही क्रिमिनल एक्ट है। प्रतिनिधि मंडल का आरोप है कि यह सिर्फ आदर्श चुनाव आचार संहिता का उल्लंघन नहीं है बल्कि रिप्रेजेंटेशन ऑफ पीपल्स एक्ट की धारा 125 का क्रिमिनल वायलेशन है। यह तृणमूल कांग्रेस की सोच को दर्शाता है इसलिए हमने चुनाव आयोग से मांग की है कि जिस व्यक्ति ने इस तरह का बयान दिया उनके खिलाफ और जिस पार्टी से संबंधित हैं उनके खिलाफ कड़ी से कड़ी कार्रवाई की जाए।

इस दौरान मुख्तार अब्बास नकवी ने कहा कि खून खराबी का जो खेला ममता कर रहीं थी उस खेले में कहीं न कहीं विघ्न पड़ गया है। निष्पक्ष और भयमुक्त चुनाव होना चाहिए उसके लिए चुनाव आयोग और सुरक्षा बल कदम उठा रहे हैं। चुनाव आयोग ने सिर्फ ममता बनर्जी की पार्टी पर रोक नहीं लगाई है बल्कि सारी पॉलिटिकल पार्टी पर रोक लगाई है। नकवी का कहना है कि ऐसे में सिर्फ उनको ही दर्द क्यों हो रहा है इसका मतलब यह है कि उनकी नियत में खोट है।

न्यूज18 बांग्ला से बात करते हुए सुजाता मंडल खान ने कहा कि भले ही ममता बनर्जी ने अनुसूचित जातियों (SC) के लिए बहुत कुछ किया हो, लेकिन फिर भी उनको कमी बनी ही रहती है। सुजाता मंडल खान ने कहा था, “अनुसूचित जाति के लोग स्वभाव से भिखारी होते हैं। ममता बनर्जी ने उनके लिए इतना कुछ किया, लेकिन फिर भी चंद पैसे के लिए वो बीजेपी के पीछे-पीछे हो रहे हैं। वो बीजेपी को वोट बेच रहे हैं।”

 न्यूज18 से बातचीत का यह वीडियो बीजेपी अनुसूचित मोर्चा ने शेयर किया है।

बीजेपी ने इस बयान को लेकर टीएमसी की आलोचना की। पार्टी की प्रदेश ईकाई ने ट्वीट कर कहा, “ममता बनर्जी की करीबी तृणमूल नेता सुजाता मंडल ने अनुसूचित जाति के लोगों को ‘स्वभाव से भिखारी’ बताया है। क्या बंगाल के लोग टीएमसी को करारा जवाब देकर उन्हें सत्ता से बाहर करेंगे। दलित समाज (राजबंशी, मातुआ, नमशुद्र) बेहतर के हकदार हैं।”


जया बच्चन को रोड शो के बीच आया गुस्सा, सेल्फी लेने वाले TMC समर्थक को मारा धक्का

फिल्मों में एक पारिवारिक महिला के रूप में चर्चित होने वाली जया बच्चन फिल्मों से बाहर एकदम विपरीत। 
पश्चिम बंगाल के हावड़ा में तृणमूल कांग्रेस के लिए प्रचार करने गई जया बच्चन का एक वीडियो सोशल मीडिया में शेयर हो रहा है। वीडियो में जया बच्चन एक टीएमसी समर्थक को धक्का देते दिख रही हैं।

वायरल वीडियो में साफ नजर आ रहा है कि चुनाव रैली में जया बच्चन अपने समर्थकों का पहले अभिवादन करती हैं, लेकिन तभी एक टीएमसी समर्थक उनकी गाड़ी के सामने आ जाता है और सेल्फी लेने लगता है, जिससे वह गुस्सा हो जाती हैं और उसे जोरदार धक्का मार देती हैं।

जया बच्चन ने 8 अप्रैल को शिवपुर और दक्षिण हावड़ा में तृणमूल कांग्रेस के उम्मीदवारों के समर्थन में रोड शो किया। इसके बाद वह उत्तर हावड़ा पहुँचीं और टीएमसी उम्मीदवार गौतम चौधरी के समर्थन में रोड शो करके वोट माँगे। इसी बीच वहाँ लोगों का हुजूम उमड़ा और उक्त घटना घटी।

सोशल मीडिया पर जया बच्चन की यह वीडियो तेजी से शेयर हो रही है। अभी तक इस पर टीएमसी की ओर से न ही कोई बयान आया है और न ही जया बच्चन ने कुछ कहा है। मीडिया में इस वीडियो को देख कयास लग रहे हैं कि विपक्षी दल इस मामले को मुद्दा बनाकर न केवल जया बच्चन को बल्कि पूरी टीएमसी को घेर सकता है।

जया बच्चन का ऐसा पब्लिकली आपा खोना कोई नई बात नहीं है। जया बच्चन का सार्वजनिक जगहों पर गुस्सा फूटता रहता है। पिछले साल भोपाल में वह पारिवारिक सदस्यों के साथ बर्थडे सेलीब्रेशन के लिए गई हुईं थीं। वहाँ जब एक स्टाफ सदस्य ने उनके परिवार के साथ तस्वीर लेनी चाही तो उन्होंने इस पर आपत्ति उठा दी। उन्होंने कहा कि ये उनका प्राइवेट टाइम है। इसके अलावा कई बार उन्हें अन्य मौकों पर भी तस्वीर खींच रहे कैमरापर्सन पर नाराजगी जाहिर करते देखा गया है।

बंगाल: मतदान से पहले TMC नेता के घर से मिला EVM और VVPAT

                               तृणमूल नेता गौतम घोष के घर से EVM बरामद (फोटो साभार: Times Now)
पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस (TMC) के एक नेता के घर से EVM बरामद होने के बाद इलाके में सनसनी फ़ैल गई। राज्य में अप्रैल 6, 2021 को तीसरे चरण का चुनाव भी चल रहा है। ऐसे में इससे 1 रात पहले इस तरह की घटना से TMC घेरे में आ गई है। तुलसीबेरिया के तृणमूल नेता गौतम घोष को ग्रामीणों ने 1 इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) और 4 वोटर-वेरिफायेबल पेपर ऑडिड ट्रेल (VVPAT) के साथ पकड़ा।

ये घटना उलूबेरिया नॉर्थ विधानसभा क्षेत्र की है, जहाँ तीसरे चरण में ही वोट डाले जा रहे हैं। भाजपा उम्मीदवार चिरन बेरा ने आरोप लगाया कि ये चीजें TMC नेता के घर से मिली हैं, जिससे पता चलता है कि राज्य की सत्ताधारी पार्टी चुनाव में धाँधली कर रही है। उन्होंने बताया कि EVM और VVPAT को चुनावी ड्यूटी के लिए कार से लाया गया था। साथ ही तृणमूल नेता के घर के बाहर ‘सेक्टर 17’ की चुनावी ड्यूटी की कार भी पड़ी मिली।

वहाँ के सेक्टर अधिकारी को भी ग्रामीणों ने दबोच लिया। सेक्टर ऑफिसर ने अपने बचाव में कहा कि चुनावी ड्यूटी के लिए मशीनों को लाते समय काफी रात हो गई थी। केंद्रीय सशस्त्र बल सो गए थे और उन्होंने बूथ खोला ही नहीं। लिहाजा उन्होंने अपने एक रिश्तेदार के घर पर रात बिताना उचित समझा। सूचना मिलते ही पुलिस भी वहाँ पहुँची, लेकिन स्थिति बिगड़ने के कारण लाठीचार्ज कर भीड़ को तितर-बितर कर दिया।

उक्त सेक्टर अधिकारी को सस्पेंड कर दिया गया है और उसके पास से मिली EVM को भी जब्त कर लिया गया है। इन EVM का प्रयोग मतदान में नहीं किया जाएगा। पश्चिम बंगाल में आज 31 सीटों पर मतदान हो रहा है, जो सुबह 7 बजे ही शुरू हुआ। साउथ 24 परगना जिले की 16, हावड़ा की 7 और हुगली की 8 सीटों पर चुनाव हो रहे हैं। भाजपा ने स्थानीय अधिकारियों की निष्ठा पर सवाल उठाए हैं।

वहीं चुनाव आयोग ने भी इस मामले में बयान जारी किया है। इलेक्शन कमीशन ने कहा कि सेक्टर अधिकारी को निलंबित कर दिया गया है। साथ ही बताया कि मतदान की प्रक्रिया में उस EVM का इस्तेमाल नहीं किया जाएगा। ECI ने आश्वासन दिया कि इसमें शामिल सभी लोगों पर कार्रवाई की जाएगी। 

ज्ञात हो इससे पूर्व असम में भी भाजपा नेता की कार से EVM बरामद हो चुकी हैं, जो अब सोंचने पर मजबूर भी करता है कि चुनाव कहीं आंख मिचोली का खेल तो नहीं। 

 उलूबेरिया नार्थ विधानसभा क्षेत्र में हुई घटना पर लोगों की प्रक्रियाएं :-