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अय्याशजीवियों और देह व्यापार का अड्डा बना टिकरी बॉर्डर

मोदी विरोधियों के संरक्षण में चल रहे किसान आंदोलन की सच्चाई वैसे तो कई बार सामने आने पर किसानों को बदनाम करने के आरोप लगाए जाते थे, लेकिन ज़ी हिंदुस्तान के स्टिंग ऑपरेशन ने किसान आंदोलन स्थल पर हो रही अय्याशी को उजागर कर आंदोलन के छलावे को उजागर कर दिया है। 
असली किसान तो 26 जनवरी को हुए उपद्रव के बाद अलग हो गया था, लेकिन अब आंदोलन में चल रही अय्याशी पर जितने भी मोदी विरोधी हैं, सब खामोश हैं, क्यों? क्या अय्याशी के लालच में लोगों को जमा कर बिलों का विरोध करने का कौन-सा तरीका है?
तीन कृषि कानूनों के खिलाफ दिल्ली की सीमा पर धरना दे रहे फर्जी किसानों के चेहरे बेनकाब होते जा रहे हैं। दरअसल ये किसान ना होकर अय्याशजीवी है, जो पैसे, शराब और शबाब का प्रलोभन देकर बुलाए गए हैं। ये अय्याशजीवी अब फर्जी किसान नेताओं की मजबूरी बन चुके हैं, क्योकि तथाकथित किसान आंदोलन से असली किसानों का कोई लेनादेना नहीं है। ऐसे में इस आंदोलन को जिंदा रखने के लिए बेतहाशा पैसा खर्च किया जा रहा है। इसके लिए विदेशों से फंडिंग के साथ ही राजनीतिक हित साधने वाली पार्टियों से भी इनको आर्थिक मदद मिल रही है। इससे फर्जी किसान अय्याशी पर खुलकर पैसे लूटा रहे हैं। इसका खुलासा जी हिंदुस्तान के अंडर कवर रिपोर्टर ने एक स्टिंग ऑपरेशन के जरिए किया है।

जी हिंदुस्तान की रिपोर्ट के मुताबिक, राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली से सटे टिकरी बॉर्डर पर जब से फर्जी किसानों ने डेरा डाला है, तब से इस इलाके में देह व्यापार की एक अलग तरह की मंडी शुरू हो गई है। यहीं पास में एक गंदा नाला बहता है और उसी के आसपास की झाड़ियां इन फर्जी किसानों की अय्याशी का अड्डा बन गई हैं। इन झाड़ियों के पीछे पैसे देकर लाए गए सेक्स वर्करों के साथ फर्जी किसान अय्याशी करते देखे जा सकते हैं। स्टिंग के दौरान रिपोर्टर ने सेक्स वर्कर समेत कई लोगों से बात की। जब रिपोर्टर ने एक सेक्स वर्कर से बात की तो उसने चौकाने वाला खुलासा किया। उसने बताया कि फर्जी किसान उनके पास आते हैं और 100 से लेकर 500 रुपये प्रति व्यक्ति देकर जाते हैं।

एक फर्जी किसान रिपोर्टर को टिकरी बॉर्डर पर गंदे नाले के पास स्थित फैक्ट्रियों में ले गया। उसने बताया कि जब से ये कथित किसान यहां आंदोलन के लिए आए हैं तब से सेक्स वर्कर की तादाद भी बढ़ गई है। फर्जी किसान के मुताबिक, आंदोलन साइट पर रुकने के लिए उसे प्रतिदिन 300 रुपये मिलते हैं। अगर दो लोग आंदोलन में शामिल होते हैं तो उन्हें संयुक्त रूप से 500 रुपये दिए जाते हैं। उन्हें ये पैसे आंदोलन में शामिल होने के लिए टेंट का मालिक देता है। रिपोर्टर ने जब फर्जी किसान से पूछा कि अगर वो भी आंदोलन में शामिल होता है तो उसका क्या फायदा होगा? इस पर फर्जी किसान ने कहा कि यहां शराब और शबाब दोनों उपलब्ध है। आंदोलन के नाम पर इसका आनंद लिया जा सकता है।  

धरना स्थल पर मौजूद एक चश्मदीद ने रिपोर्टर को बताया कि किसान आंदोलन के बहाने लोग अपनी शारीरिक भूख मिटाने के लिए आते हैं। यहां तक कि आंदोलन के नाम पर लोगों को बहकाकर आसपास के राज्यों से यहां लाया जाता है। धरना स्थल पर लगाए गए टेंटों के भीतर पूरा खुलापन है। लोग नहाने के बाद टेंट में ऐसे ही नंगे ही रहते हैं। शरीर पर कपड़े के नाम पर कुछ भी नहीं होता। टिकरी बॉर्डर पर खुलेआम शराब पीकर लोग झूमते देखे जा सकते हैं। एक फर्जी किसान सड़क पर पड़ा दिखा। चश्मदीद के मुताबिक उसने अफीम या डोडापोस्त खाया हुआ था।

इससे पहले आंदोलन के नाम पर महिलाओं को धरने में शामिल कर उनका शारीरिक शोषण करने की खबरें सामने आ चुकी हैं। पश्चिम बंगाल से किसान आंदोलन में भाग लेने आई एक युवती से गैंगरेप किया गया था। दुष्कर्म के बाद कोरोना के चलते युवती की मौत हो गई थी। युवती के पिता ने दो महिलाओं समेत 6 लोगों पर केस दर्ज कराया था। इस मामले में पुलिस का कहना था कि आरोपी अनिल मलिक ने दुष्कर्म की वीडियो बनाकर पीड़िता को ब्लैकमेल किया था, उसके साथ ट्रेन और फिर किसान आंदोलन की झोपड़ी में भी दुष्कर्म हुआ था। अनूप चनौत ने भी दुष्कर्म किया था और अंकुर सांगवान ने छेड़खानी की थी। दुष्कर्म के आरोपी अनिल मलिक और अनूप चनौत आम आदमी पार्टी से जुड़े हुए थे।

बंगाल की युवती से गैंगरेप का मामला अभी शांत भी नहीं हुआ था कि टिकरी बॉर्डर पर एक और युवती ने शारीरिक उत्‍पीड़न का आरोप लगा दिया। सुप्रीम कोर्ट में वकालत करने वाले एक जाने माने वकील ने टिकरी बॉर्डर पर एक और युवती के साथ दुष्कर्म किए जाने की जानकारी ट्वीट की तो हरियाणा पुलिस के अधिकारियों और आंदोलनकारी किसान नेताओं में खलबली मच गई। वैसे यह सूचना ट्विटर पर सबसे पहले एक न्यूज एजेंसी के पत्रकार ने ट्वीट की, जिसे वकील ने रीट्वीट किया। दुष्कर्म का मामला सामने आने के बाद किसान नेताओं ने युवती को टिकरी बॉर्डर से सिंघू बॉर्डर भेज दिया। 

जनवरी 2021 में आई दैनिक भास्कर की एक रिपोर्ट में बताया गया था कि जैसे-जैसे शाम ढलती जाती है, टिकरी बॉर्डर पर शराब के ठेकों पर भीड़ बढ़ती जाती है। शराब खरीदने वालों में युवा, अधेड़ और बुजुर्ग सभी होते हैं। शराब खरीदने के बाद डिब्बा वहीं फेंक देते हैं और बोतल को कपड़ों में रखकर अपनी ट्रॉलियों की तरफ बढ़ जाते हैं। कुछ युवा तो कोल्डड्रिंक की बोतल में शराब भरकर पीने लगते हैं। पास में ही एक नॉन-वेज बेचने वाले ढाबे की किस्मत खुल गई। ढाबे पर खूब भीड़ लग रही है। किसानों को तंदूरी चिकन के साथ शराब के पैग लगाते देखा जा सकता है।

‘मरो हिन्दुओं! मोदी, संघ और उनके समर्थकों के लिए दर्दनाक मौत की दुआ’

                                                   दर्दनाक मौत की दुआ माँगती मोना अम्बेगाँवकर
भारत में कोरोना वायरस के संक्रमण की दूसरी लहर सारे रिकॉर्ड तोड़ रही है। पिछले कई दिनों से लगातार रोजाना 3 लाख से अधिक संक्रमित मरीज मिल रहे हैं। राज्यों की स्वास्थ्य सुविधाओं पर भारी दबाव आ रहा है। ऐसे में देश के सभी नागरिक अपने स्तर पर लोगों की सहायता कर रहे हैं। कोई सोशल मीडिया के माध्यम से तो कोई जमीनी स्तर पर, अपनी जान जोखिम में डाल कर। लेकिन इस संकट की घड़ी में भी कुछ ऐसे लोग हैं जो पीएम मोदी और आरएसएस के लोगों की मौत की प्रार्थना कर रहे हैं।

Organiser साप्ताहिक में ए आर शेरवानी अपने लेखों(80 के दशक) में मोना अम्बेगाँवकर जैसी दुर्भावना वालों के लिए मलेछ शब्द का प्रयोग करते थे। मोना इतनी अल्पज्ञानी है कि इसे नहीं मालूम की जब-जब संघ पर प्रतिबन्ध लगा अथवा आलोचना हुई संघ उतना ही शक्तिशाली होकर उभरा है, ठीक उसी भांति गुजरात दंगों पर नरेंद्र मोदी को कितना अधिक आरोपित किया जा रहा है, वह भी उतने ही शक्तिशाली हो रहे हैं। "मौत का सौदागर", "खून का दलाल" आदि आदि क्या नहीं कहा गया। 

पिछले वर्ष भी मोना जैसों ने ऐसी ही ओछी दुआएं मांगी थीं, किसान आंदोलन में भी मोदी के मरने की दुआएं मांगी गयीं थीं, लेकिन सब बेकार। जितना अंधभक्त होना गलत है उतना ही जरुरत से ज्यादा विरोधी होना भी। अब देखिए सोशल मीडिया पर निम्न वीडियो वायरल है, जो विरोध नहीं भक्ति दर्शा रहा है, जो प्रधानमंत्री मोदी को उनके वायदों को याद करवाया जा रहा है।

जबकि इन्हीं मुद्दों को लेकर मोदी विरोधियों को सड़क से लेकर संसद तक विरोध करना था, लेकिन उन मुद्दों पर विरोध कर रहे हैं जिनका विपक्ष ने अपने घोषणा पत्रों में उल्लेख कर रखा है।

अपने को भारतीय टेलीविजन की अभिनेत्री कहने वाली और एक्टिविस्ट मोना अम्बेगाँवकर ने आरएसएस के सदस्यों, संघ के समर्थकों और चौकीदार (पीएम मोदी ने 2019 के लोकसभा चुनावों के दौरान खुद को जनता चौकीदार बताया था) के लिए एक दर्दनाक मौत की इच्छा जाहिर की है। मोना ने लिखा, “मैं अब इस ‘नीच आदमी’ को और श्राप नहीं दे सकती। मैं खुद को इन संघी गुंडों के समर्थकों, उनके अम्ब्रेला संगठन (आरएसएस) और चौकीदार-तड़ीपार जोड़ी के लिए एक दर्दनाक मौत की दुआ माँगने से नहीं रोक पा रही हूँ। जिन ‘a—holes’ हिंदुओं ने इन्हें वोट दिया है, अब मरो।“   

एक और ट्विटर यूजर ने अपनी बेहद आपत्तिजनक भाषा का प्रयोग करते हुए लिखा, “मोदी और उसके संघी प्रेमियों की मौत की दुआ करना पूरी तरह से जायज है।“

F#@kBJP नाम के इस ट्विटर हैन्डल से लगातार प्रधानमंत्री मोदी के लिए आपत्तिजनक बातें कही गईं और लगातार कानूनी व्यवस्था और शासन के विरुद्ध लोगों को उकसाने का कार्य किया गया। इस ट्विटर हैन्डल से कहा गया कि मोदी किसी अगले जन्म में सजा नहीं भुगतेगा। यह सत्ता में रहने वालों की बनाई हुई एक कल्पना है जिससे आम आदमी शासकों के महलों को न जलाएँ। इसने कहा, “हमें गुस्सा दिखाना चाहिए और और हमारा गुस्सा ऐसा हो कि ये डर से काँप जाएँ। हम किसी कर्म के न्याय की प्रतीक्षा में बैठे नहीं रह सकते हैं।”  

@rtrRavirao नाम के ट्विटर हैन्डल से कहा गया कि मौत इनके लिए कम है। इनके लिए एक भयानक दर्द और कष्ट की दुआ की जानी चाहिए।

हालाँकि, यह सब जिस आरएसएस या भाजपा के सदस्यों की मौत की दुआ कर रहे हैं वही जमीनी स्तर पर लोगों की सहायता कर रहे हैं। ये वहीं विचार हैं जिनके कारण पश्चिम बंगाल और केरल में कितने ही आरएसएस के सदस्यों और भाजपा कार्यकर्ताओं की हत्याएँ हुईं।

राजनैतिक और सामाजिक द्वेष लोगों को इतना अंधा कर देता है कि वो एक लोकतान्त्रिक तरीके से चुने गए प्रधानमंत्री के लिए भी सार्वजनिक मंचों पर मौत की दुआ माँग रहे हैं। हालाँकि, ये वामपंथी-कांग्रेसी गिरोह पहली बार नहीं कर रहा है इससे पहले भी चाहे किसान आंदोलन हो या कोई और मंच कई बार ये लोग अपनी ऐसी मंसा जाहिर कर चुके हैं।

गुरनाम सिंह चढूनी ने राकेश टिकैत पर लगाया किसान आंदोलन को बेचने का आरोप

किसान आंदोलन में एक बार फिर फूट पड़ती नजर आ रही है। अब भारतीय किसान यूनियन के नेता गुरनाम सिंह चढूनी ने भारतीय किसान यूनियन के प्रवक्‍ता राकेश टिकैत पर गंभीर आरोप लगाए हैं। गुरनाम सिंह चढूनी ने राकेश टिकैत पर किसान आंदोलन बेचने का आरोप लगाया है। उन्होंने कहा कि राकेश टिकैत बीजेपी की गोदी में बैठे हैं। 

जबकि सच्चाई यह है कि इस आंदोलन की मशाल जलाई पंजाब मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह और हवा दी राहुल गाँधी, आम आदमी पार्टी और अकाली दल ने। और अब जितने भी मोदी विरोधी है, सभी मालपुए खाने एकजुट हो चुके हैं। इसमें कोई दो राय भी नहीं कि किसान आंदोलन तो प्रारम्भ से अपनी राह भटक अराजक तत्वों के अधीन जा चूका था, जो 26 जनवरी को सबके सामने आ गया। 

जहाँ तक कृषि कानूनों से किसानों को कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग करनी पड़ेगी का प्रश्न है, इन कानूनों के बनने से पूर्व ही कई राज्यों में कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग चल रही है, जिससे किसान ऋण लेने की बजाए ऐश से रोटी खा रहा है। दूसरे, यह भी दुष्प्रचार किया जा रहा है कि इन कानूनों के लागु होने पर किसानों को अपनी जमीन पूंजीपतियों के हाथ बेचने की नौबत आ जाएगी, लेकिन इस तरह का दुष्प्रचार करने वाले राष्ट्र को बताएं कि दिल्ली में गुलाबी बाग़ से लेकर कीर्ति नगर, सुभाष नगर, विकासपुरी, पालम, द्वारका, और गाँधी नगर से लेकर लोनी तक खेत किसके राज में बिके? दिल्ली के सारे खेत कहाँ गए? किसके राज में बिके थे और क्यों?

एक वीडियो जारी कर चढ़ूनी ने राकेश टिकैत पर आरोप लगाते हुए कहा है कि कुछ किसान संगठन इस आंदोलन को सरकार के पास बेचना चाह रहे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि टिकैत इस आंदोलन को अपना आंदोलन बता रहे हैं। उन्होंने कहा कि जो संगठन सरकार से बात करने के लिए जा रहे हैं, मैं उनसे भी प्रार्थना करना चाहूंगा हूं कि वे इन किसानों पर रहम खाएं और किसानों का ना बेचें।

वीडियो में उन्होंने आरोप लगाया है कि बहुत से किसान संगठन अपनी निजी फायदे के लिए अपने संगठन को बेच रहे हैं। अब टिकैत भी किसान आंदोलन को अपना आंदोलन बता रहे हैं। जबकि टिकैत साहब बीजेपी की गोदी में बैठे हैं। उनका हरियाणा का प्रधान भी बीजेपी की गोदी में बैठा है। चढूनी ने यह भी कहा कि राकेश टिकैत ने मेरे खिलाफ दो केस दर्ज कराए हैं। उन्होंने मुझ पर झूठे आरोप लगाए।

इसके पहले गणतंत्र दिवस पर दिल्ली में किसानों द्वारा की गई हिंसा के बाद दो किसान संगठनों ने खुद को इस आंदोलन से अलग कर लिया था। अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति और राष्ट्रीय किसान मजदूर संगठन के राष्ट्रीय अध्यक्ष वीएम सिंह इस आंदोलन से अलग हो गए। इसके साथ ही भारतीय किसान यूनियन (भानू गुट) ने भी बॉर्डर से अपना आंदोलन खत्म कर दिया था।

किसान आंदोलन में खुलकर लगे खालिस्तानी नारे, हुआ तिरंगे का अपमान

दिल्ली की सीमाओं पर किसान आंदोलन के नाम भीड़ बढ़ाने वाले लगातार ये पूछ रहे हैं कि आखिर इतने पावन प्रदर्शन को कैसे खालिस्तानियों से जोड़ा जा सकता है। अब इसी सवाल के जवाब में कुछ वीडियोज सामने आई हैं, जिससे साफ हो रहा है कि पूरे प्रदर्शन में खालिस्तानियों की घुसपैठ है।

ये वीडियो ट्विटर पर अंशुल सक्सेना ने शेयर की है। इसमें सुन सकते हैं कि प्रदर्शनकारी कैसे हाथों में झंडा लिए आतंकी भिंडरावाले और आंतकी जगतार सिंह के समर्थन में नारे लगा रहे हैं। कहा जा रहा है, “भिंडरावाले तेरी सोच पर राज करेगा… भाई जगतार जिंदाबाद-जिंदाबाद।” वीडियो बनाने वाला बार बार जगतार सिंह का नाम लेता है और भिंडरावाले की सोच को राज करवाने की बात कहता है।

कुछ सेकेंड की वीडियो में भारी भीड़ को देख कर कहा जाता है कि पंजाब के नौजवानों को देख सकते हैं जिन्हें नशेड़ी कहा गया, वो आज मोदी तक पहुँच गए हैं।

इसके बाद दूसरी वीडियो में साफ-साफ तिरंगे का अपमान होते देखा जा सकता है। वीडियो बनाने वाला पहले तो तिरंगे को देख कर गंदी गाली देता है। फिर उन प्रदर्शनकारियों की ओर बढ़ता है जिनके हाथ में खालसा का झंडा होता है। आगे के विजुअल्स में तिरंगे को जमीन पर पड़ा, गाड़ी के नीचे दबा देखा जा सकता है जबकि हाथों में खालसा का झंडा चारों ओर नजर आ रहा है।

इससे पहले कई बार खालिस्तानियों ने किसान आंदोलन का समर्थन किया, लेकिन हर दफा ये कहकर इन बातों को खारिज कर दिया गया कि जबरदस्ती इस मुद्दे को खालिस्तान से जोड़ा जा रहा है। बेवजह मासूम किसानों को बदनाम किया जा रहा है। मगर, सामने आई दोनों वीडियो दिखाती हैं कि न तो ये प्रदर्शन का कोई वाजिब मकसद है और न ही ये विरोध कृषि कानून पर है।

मामले को तूल देकर हिंसक प्रदर्शन करना भीड़ का एकमात्र एजेंडा लग रहा है। पिछले दिनों भी यही कारनामा 26 जनवरी पर राष्ट्रीय राजधानी में देखने को मिला और अब भी यही हो रहा है। इससे पहले प्रतिबंधित खालिस्तानी संगठन ‘सिख्स फॉर जस्टिस (SFJ)’ ने ऐलान किया था कि जो भी दिल्ली के लाल किला पर खालिस्तानी झंडा फहराएगा, उसे 2.5 लाख डॉलर (1.83 करोड़ रुपए) इनाम के रूप में दिए जाएँगे। उसके बाद इसी संगठन द्वारा 1 फरवरी को संसद पर कब्ज़ा और घेराव की धमकी दी गई थी।

फिर कपिल मिश्रा पर उतरा नजला : Scroll ने लव जिहाद और मिशनरियों का किया बचाव

कपिल मिश्रा ने हिन्दुओं को एक करने के प्रयास क्या शुरू किए, लिबरल गिरोह को मिर्ची लग गई। वामपंथी मीडिया बेचैन हो उठा और उसने हिंदुत्व को खतरनाक बताने से लेकर ‘लव जिहाद’ को हिन्दुओं का मनगढंत मुद्दा तक बताने लगे। इसी क्रम में ‘Scroll’ ने भी एक लेख में कपिल मिश्रा द्वारा हिन्दू इकोसिस्टम बनाने की घोषणा को खतरनाक तक करार दिया। साथ ही इसके लिए उनका मजाक भी बनाने की कोशिश की।

‘Scroll’ ने मसखरी के अंदाज़ में इस लेख को शुरू किया है और पूछा है कि अगर आपके पास कुछ खाली समय है तो क्यों न आप अपनी खास रुचियों को धार देने के लिए किसी क्लब या सोसायटी में शामिल हो जाएँ? साथ ही बताया है कि इन दिनों काफी विकल्प हैं और समाजिक सेवाओं के लिए रोटरी क्लब या लायंस क्लब हैं। फिटनेस के साथ कुछ अलग करने के लिए लाफ्टर योग क्लब हैं। पाठकों के लिए कई किताबों वाले क्लब्स हैं।

इसके बाद ‘Scroll’ लिखता है कि आप हिन्दू इकोसिस्टम भी ज्वाइन कर सकते हैं, जिसके लिए आपको बस एक फॉर्म भरना है और इसके लिए कोई एप्लीकेशन फी नहीं है। साथ ही इस लेख में कपिल मिश्रा को ‘दिल्ली दंगों से पहले भड़काऊ बयान देने के लिए जाना जाने वाला’ बताया है। भले ही ये सामने आ चुका है ताहिर हुसैन और उमर खालिद सहित कई इस्लामी कट्टरपंथियों ने दंगे किए और कपिल मिश्रा के भाषण से पहले ही ये शुरू हो गया था, ये मीडिया संस्थान एक झूठ को हजार बार बोल कर इसे सच साबित करना चाहते हैं।

कपिल मिश्रा दिल्ली सरकार में मंत्री थे। करावल नगर से उन्हें 1 लाख से भी अधिक वोट्स मिले थे, यानी कुल वोट्स के 60% के करीब। क्या वो इन सबके लिए नहीं जाने जाते, जो ‘स्क्रॉल’ उन्हें 5 मिनट के किसी भाषण को ही उनकी प्रसिद्धि का एकमात्र कारण बता कर उसे नकारात्मक रूप में पेश कर रहा है? उन्होंने तब भी संस्कृत में शपथ ली थी। दिल्ली के बाद भी कई इलाकों में CAA विरोधी दंगे हुए। उन सब में तो कपिल मिश्रा कहीं नहीं थे।

‘Scroll’ को इस बात की चिंता खाए जा रही है कि आखिर ये हिन्दू इकोसिस्टम करेगा क्या? कपिल मिश्रा पहले ही साफ़ कर चुके हैं कि ये जमीन पर और सोशल मीडिया पर, कोर्ट में, धर्म के लिए और एक-दूसरे के लिए काम करेगा। इसका सीधा अर्थ है कि इसकी सारी प्रक्रियाएँ वैध होंगी और क़ानूनी दायरे में होंगी। ये आपस में सहयोग का इकोसिस्टम है तो इसकी सराहना करने की बजाए वामपंथी मीडिया इसके खिलाफ क्यों है?

इसके फॉर्म में विकल्प है कि आप ऑनलाइन, जमीन पर, या फिर दोनों के लिए इसका हिस्सा बन सकते हैं। वामपंथी मीडिया को ‘घर वापसी’ ‘हिन्दू एकता’, ‘गौरक्षा’ और ‘लव जिहाद का विरोध’ – इन सभी चीजों से दिक्कत है, जबकि भारत के क़ानून में इनमें से किसी को भी अवैध नहीं माना गया है। ये सब तो समाजसेवा, महिला अधिकार और पशु अधिकार के अंतर्गत आते हैं। इन्हीं चीजों के लिए लड़ने वाले वामपंथी इससे चिढ़ क्यों रहे हैं?

‘Scroll’ का कहना है कि RSS रहस्यमयी तरीके से काम करता है, क्योंकि इसके सदस्य मीडिया में नहीं आते और एक बड़े सभ्यता के लक्ष्य पर काम कर रहे हैं। अर्थात, अगर कोई संगठन बाढ़, अकाल, महामारी और अन्य आपदा की स्थिति में निःस्वार्थ भाव से बिना सरकारी सहायता के लोगों की सेवा कर रहा है तो इन वामपंथियों को उससे भी परेशानी है। चूँकि वो RSS है, समाजसेवा कर सोशल मीडिया पर उसका प्रचार नहीं करता, इसलिए वामपंथियों को ये स्वीकार्य नहीं।

वहीं इसी वामपंथी मीडिया को कपिल मिश्रा के नए हिन्दू इकोसिस्टम से इसलिए दिक्कत है, क्योंकि उसका मानना है कि इससे सोशल मीडिया पब्लिसिटी होगी और टीम के सदस्यों की संख्या की बातें होंगी। यानी, अगर कोई शांति से काम कर रहा है तो भी परेशानी और किसी ने सोशल मीडिया को एकता का माध्यम बनाया तो भी परेशानी। ये सब इसीलिए, क्योंकि हिन्दुओं को एक होते हुए ये लोग नहीं देख सकते।

अब ‘स्क्रॉल’ वापस ‘लव जिहाद’ पर आता है और इसे एक कंस्पिरेसी थ्योरी करार देते हुए लिखता है कि इसका हिंदुत्व से तो कोई लेना-देना ही नहीं है। अर्थात, हिन्दू महिलाओं के लिए उसके मन में कोई इज्जत नहीं है, भले ही कोई उन्हें धोखा दे, पहचान छिपाकर कर उनसे साजिशन शादी कर ले, बाद में प्रताड़ित करे या फिर हत्या कर दे। महिलाओं की मदद के लिए अगर कोई संगठन आगे आ रहा है तो इससे ‘स्क्रॉल’ को दिक्कत क्या है?

‘लव जिहाद’ की रोज एक के बाद एक घटनाएँ सामने आ रही हैं। केरल में ईसाइयों के साथ जो हुआ था, उसके बाद उन्होंने इस शब्दावली का प्रयोग किया था। अगर यहाँ हिन्दुओं की बातें छोड़ भी दें तो क्या ईसाई इस वामपंथी मीडिया के लिए अल्पसंख्यक नहीं हैं और संख्या में उनसे कई गुना ज्यादा मुस्लिम भारत में उनके लिए अल्पसंख्यक हैं? हिन्दू व ईसाई महिलाओं की प्रताड़ना को रोकने का प्रयास करना तो सराहनीय है, इसकी प्रशंसा होनी चाहिए। केरल के चर्च तक ने कहा है कि ‘लव जिहाद’ वास्तविक है।

साथ ही इसने ‘इस्लामी आक्रमण’ और ‘ईसाई मिशनरी’ को तथाकथित लिखा है। इसका अर्थ है कि वो ये नहीं मानते कि इस्लामी कट्टरता नाम की कोई चीज है भी। ‘अल्लाहु अकबर’ बोल कर चिल्लाते हुए हत्या की वारदातों और बहला-फुसला कर धर्मांतरण की ईसाई मिशनरियों की करतूतों से जुड़ी कई ख़बरों के बावजूद मीडिया का ये वर्ग चाहता है कि हिन्दू, जो इस दोनों मामलों में पीड़ित है, आँख मूँद कर ये सब सहता रहे।

अगर कोई मुस्लिम अपना मजहब छिपा कर किसी लड़की से शादी कर ले और उसे धोखा दे तो इस पर कोई क्यों न विरोध करे? अगर इस्लाम के नाम पर जम्मू-कश्मीर में सौ आतंकी संगठन खड़े हो जाएँ और दुनिया भर में ‘अल्लाहु अकबर’ चिल्लाते हुए लोगों को मारा जाए, तो कोई क्यों आँख-कान बंद कर ले? आदिवासी और पिछड़े इलाकों में हिन्दू देवी-देवताओं का अपमान कर, लालच दे कर और झूठे चमत्कार दिखा कर ईसाई मिशनरी गरीबों को ठगे और धर्मान्तरण कराएँ तो क्यों न कोई इसके खिलाफ आवाज़ उठाए?

‘लव जिहाद’ को दक्षिणपंथी शब्दावली बताने वाला ‘स्क्रॉल’ क्या ये मानेगा कि ईसाई भी दक्षिणपंथी हो गए हैं और वो हिन्दुओं के साथ मिल गए हैं, क्योंकि उन्होंने केरल में इसका प्रयोग किया? अभी जिस संगठन ने कुछ किया ही नहीं, उसका कोई कामकाज सामने आया ही नहीं, उस पर मुस्लिम घृणा का आरोप कैसे कोई लगा सकता है? उसे कैसे कोई नकार सकता है। इस लेख का सीधा मकसद है – हिन्दू एकता का मजाक बनाना और उसे घृणावादी साबित करना।

हिन्दू इकोसिस्टम पर Scroll का प्रोपेगंडा: क्या कहते हैं कपिल मिश्रा?

हमने इन आरोपों के सम्बन्ध में कपिल मिश्रा से भी बातचीत की, जिन्होंने हमें बताया कि वामपंथी तीस्ता सीतलवाड़ भी इसके खिलाफ अभियान चला रही हैं। उन्होंने हस्ताक्षर अभियान से लेकर इसके खिलाफ पत्र लिखने तक, सब किया है। ठीक इसी तरह, अब ‘Scroll’ इसके विरोध कर रहा है और शेखर गुप्ता ने भी ‘द प्रिंट’ की पूरी टीम को इसके पीछे लगा दिया है। कपिल मिश्रा कहते हैं कि विरोध की एक ही वजह है और वो है ‘हिन्दू’ शब्द।

हिन्दू इकोसिस्टम में ‘हिन्दू’ शब्द होने से ही वो सभी चिढ़े हुए हैं और इसे नकारात्मक रूप में पेश कर रहे हैं। दिल्ली के पूर्व मंत्री ने बताया कि ये एक छोटी सी शुरुआत है, जो लोगों को एक प्लेटफॉर्म पर आने और एक-दूसरे की मदद और सेवा करने का लक्ष्य लेकर चल रहा है। उन्होंने कहा कि अगर किसी भी चीज में ‘हिन्दू’ आ जाए, तो ये चिढ़ जाते हैं। उन्होंने पूछा कि अभी इसकी कोई एक्टिविटी भी नहीं हुई है, सिर्फ सदस्य बने हैं, तभी इतना हंगामा किया जा रहा है।

उन्होंने याद दिलाया कि Scroll या फिर तीस्ता सीतलवाड़ जैसे लोग इस तरह का रिएक्शन तो आतंकी संगठनों के खिलाफ भी नहीं देते, जैसा वो हिन्दू इकोसिस्टम का विरोध करते हुए दे रहे हैं। उन्होंने पूछा कि जब इन्हें पता ही नहीं है कि ये संगठन करेगा क्या, फिर ये विरोध क्यों कर रहे हैं? सिर्फ ‘हिन्दू’ शब्द की वजह से? उन्होंने बताया कि इसका मुख्य उद्देश्य होगा सेवा, ऑफलाइन या ऑनलाइन सनातनियों को जोड़ना।

कपिल मिश्रा ने ऑपइंडिया से कहा कि ये एक नेटवर्क बनाया जा रहा है, जिसमें लोग एक-दूसरे की मदद करेंगे। उन्होंने कहा कि हर क्षेत्र में देश में हजारों संगठन चल रहे हैं, जिला-प्रखंड-ग्राम स्तर तक पर अलग-अलग संगठन चल रहे हैं, ऐसे में इसकी RSS से तुलना करना गलत होगा। उन्होंने कहा कि RSS के काम करने का स्तर, उनका इतिहास और उनकी कार्यप्रणाली- सब अलग हैं।

कपिल मिश्रा ने समझाया कि हिन्दू इकोसिस्टम को एक टीम की तरह लिया जा सकता है, इसे एक शुरुआत की तरह ले सकते हैं। जिस तरह से हर जिले-राज्य में टीमें होती हैं, उसी तरह से ये भी है। उन्होंने कहा कि RSS से इसकी तुलना बेमानी है और ऐसा होना ही नहीं चाहिए। साथ ही कहा कि इस टीम की पूरी सक्रियता के बारे में धीरे-धीरे पता चल जाएगा, अभी तो बस सदस्यों के फॉर्म ही भरे गए हैं।

बिहार इतिहास में पहली बार सत्ता पक्ष में एक भी मुस्लिम विधायक नहीं

बिहार विधानसभा चुनाव में एनडीए ने एक बार फिर से जबरदस्त जीत हासिल की तो वहीं महागठबंधन को करारी हार मिली। चुनाव नतीजों से असंतुष्ट प्रोपेगेंडाबाज फर्जी नैरेटिव से जदयू, बीजेपी और एनडीए में शामिल अन्य दलों द्वारा कड़ी मेहनत से हासिल की गई जीत को मटियामेट करने की कोशिश में जुटे हैं।

कांग्रेस, राजद और अन्य पार्टी के महागठबंधन के जीतने की कामना करने वाले तथाकथित बुद्धिजीवियों में से कई ऐसे बुद्धिजीवी हैं जिनके लिए इस जीत को पचा पाना काफी मुश्किल हो रहा है। बिहार चुनावों में जदयू और बीजेपी के खिलाफ ध्रुवीकरण अभियान चलाने के बाद अब ये लोग नया प्रोपेगेंडा लेकर आए हैं। इस बार उनका इरादा  पीएम मोदी, बीजेपी और जेडीयू को मुस्लिम विरोधी के रूप में दिखाने का है। उन्होंने कहा कि एनडीए से एक भी मुस्लिम विधायक नहीं बना।

एनडीए से एक भी मुस्लिम विधायक के न जीत पाने के लिए हमें मुस्लिम मानसिकता को समझना होगा। इनका उद्देश्य भाजपा को हराने के लिए विपक्ष के किसी भी उम्मीदवार चाहे वह हिन्दू ही क्यों न हो, को वोट देकर भाजपा को हराओ। भाजपा को हराने में पार्टी का मुस्लिम वर्ग भी पीछे नहीं। संघ और भाजपा अपने अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ में सम्मिलित मुसलमानों को देख खुश जरूर होए, लेकिन चुनावों में वह ख़ुशी मात्र एक फूंक से उड़नछू हो जाती है। पूरे चुनाव में साथ खड़े होकर हर सूचना विपक्ष को दी जाती है। जब मंडल अध्यक्ष के अपने ही मतदान केंद्र से एक भी वोट न मिलना क्या प्रमाणित नहीं करता, कि वह मुस्लिम भाजपा से केवल लाभ लेने के लिए पार्टी में है, वोट देने के लिए नहीं। अब इसे दोगलापन ही कहा जाएगा। कई क्षेत्रों में तो हिन्दू वोटों के दम पर शीर्ष नेतृत्व को गुमराह कर अपनी वाह-वाही लुटते हैं। यह आरोप नहीं, बल्कि विस्तार से कई बार प्रमाणों के साथ लिख चूका हूँ।

अरफ़ा खानुम शेरवानी के ट्वीट पर लोगों की प्रक्रियाएं विचारणीय है:- 

वामपंथी ऑनलाइन वेबसाइट ‘द वायर’ की पत्रकार ने ‘द टेलीग्राफ’ की एक रिपोर्ट शेयर करते हुए बिहार विधानसभा में एक भी मुस्लिम विधायक नहीं बनने के लिए एनडीए गठबंधन को ‘मुस्लिम विरोधी’ बताने का प्रयास किया। आरफा ने ट्वीट किया, “आजादी के बाद बिहार में पहली बार ऐसा हुआ है जब अपने सबसे बड़े अल्पसंख्यक समुदाय के एक भी विधायक के बिना सत्ताधारी गठबंधन बना।”

कई अन्य वामपंथी ‘बुद्धिजीवी’ और मीडिया पोर्टलों ने भी बीजेपी और उसके सहयोगी दलों को मुस्लिम विरोधी साबित करने के लिए इसी लाइन को आगे बढ़ाया है। उनका यह प्रयास ये दिखाने के लिए था कि भाजपा देश के मुसलमानों को असंतुष्ट करने का काम कर रही है।

उनका यह प्रयास स्वाभाविक रूप से देश के मुसलमानों के बीच के फैले छद्म भय को ट्रिगर करने के लिए किया जाता है ताकि उन्हें भाजपा और उसके सहयोगियों के खिलाफ वोट करने के लिए जुटाया जा सके। इसी तरह का पैंतरा उस समय भी आजमाया गया था जब बीजेपी ने जम्मू-कश्मीर से आर्टिकल 370 को निरस्त कर दिया और नागरिकता संशोधन अधिनियम को पारित किया था। वामपंथियों द्वारा भाजपा को एक ऐसी पार्टी के रूप में चित्रित करने का प्रयास किया गया, जो मुस्लिमों की विरोधी है। ऐसा करके, वे अपने पसंदीदा दलों- कॉन्ग्रेस और अन्य वामपंथी दलों को उबारने की कोशिश कर रहे हैं, जो भारतीय राजनीतिक परिदृश्य के भितरघात के कारण पतन की ओर अग्रसर हैं।

हालाँकि, जब मीडिया संगठनों और वामपंथी विचारकों ने बिहार विधानसभा चुनावों में जदयू-भाजपा गठबंधन पर शून्य मुस्लिम प्रतिनिधित्व का दोष लगाया, तो यहाँ पर ध्यान देने वाली बात है कि उन्होंने जो दोष लगाया है, उसके पीछे कोई तर्क भी है या फिर वो सिर्फ सच्चाई को छुपाने के लिए ऐसा कर रहे हैं।

सच्चाई यह है कि एनडीए गठबंधन के सबसे बड़े गठबंधन सहयोगियों में से एक, जदयू ने हाल ही में संपन्न बिहार विधानसभा चुनावों के लिए 11 मुस्लिम उम्मीदवारों को मैदान में उतारा था। हालाँकि, इनमें से एक भी मुस्लिम उम्मीदवारों को जीत हासिल नहीं हो सकी।

बिहार विधानसभा चुनाव में जदयू द्वारा मैदान में उतारे गए मुस्लिम उम्मीदवारों का प्रदर्शन

सबा जफर ने जदयू के लिए अमौर विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा और 22.72 प्रतिशत वोट हासिल किए। हालाँकि, वह एआईएमआईएम उम्मीदवार अख्तरुल ईमान से हार गईं, जिन्होंने 51 प्रतिशत वोट शेयर हासिल किया।

सभी ग्राफ चुनाव आयोग से साभार 
अररिया में, कॉन्ग्रेस पार्टी के उम्मीदवार अबिदुर रहमान ने जेडीयू उम्मीदवार शगुफ्ता अजीम पर व्यापक जीत दर्ज की।

ठाकुरगंज में जदयू के मोहम्मद नौशाद आलम ने 11.46 प्रतिशत वोट हासिल किए, जबकि राजद उम्मीदवार ने 41.48 प्रतिशत वोट हासिल कर विधानसभा चुनाव जीत लिया।

जदयू द्वारा मुस्लिम उम्मीदवार के लिए कोचाधामन की कहानी भी निराशाजनक थी। जदयू के मुजाहिद आलम एआईएमआईएम उम्मीदवार मुहम्मद इज़हार असफी से हार गए, जिन्होंने लगभग 50 प्रतिशत वोट शेयर हासिल किए।

बिहार के कांति में राजद के उम्मीदवार मुहम्मद इजरायल मंसूरी ने जदयू के उम्मीदवार मोहम्मद जमाल को पटखनी दी।

सिकटा विधान सभा क्षेत्र से जदयू के खुर्शीद फिरोज अहमद को सीपीआई (एमएलएल) के उम्मीदवार बीरेंद्र प्रसाद गुप्ता को लगभग 14,000 वोटों के अंतर से हराया।

जदयू के एक और मुस्लिम उम्मीदवार मोहम्मद शरफुद्दीन राजद उम्मीदवार चेतन आनंद से शेहर निर्वाचन क्षेत्र में हार गए।

दरभंगा ग्रामीण निर्वाचन क्षेत्र में राजद प्रत्याशी ललित कुमार यादव और जदयू के फारुकी फातमी के बीच घनिष्ठ चुनावी रस्साकशी देखने को मिली। हालाँकि, अंत में यादव विजयी होकर उभरे।

मरौरा जिले में, राजद के जितेंद्र कुमार रे ने जदयू के अल्ताफ आलम को काफी अंतर से हराया।

महुआ में चुनाव परिणाम मारहरा से अलग नहीं था। यहाँ भी मुकेश कुमार रौशन ने जदयू के मुस्लिम उम्मीदवार अश्मा परवीन को करारी हार दी।

बिहार के डुमरांव में, सीपीआई (एमएलएल) के उम्मीदवार अजीत कुमार सिंह ने चुनाव जीता, जदयू की अंजुम आरा को बढ़िया अंतर से हराया।

राजनीतिक दल उम्मीदवारों की जीत को प्राथमिकता देते हैं

इस तरह से उपरोक्त परिणामों से स्पष्ट है, एनडीए गठबंधन के सहयोगियों द्वारा मैदान में उतारे गए मुस्लिम उम्मीदवारों में से कोई भी विधानसभा चुनाव जीतने में कामयाब नहीं हुआ। जदयू ने 43 सदस्यों को विधानसभा भेजा। अगर जदयू के सभी 11 मुस्लिम उम्मीदवार चुनाव जीत जाते, तो उनके पास विधानसभा की 54 सीटें होतीं, और उनमें से 20 प्रतिशत मुस्लिम होते।

राजनीतिक दल उन उम्मीदवारों का चयन करते हैं जो चुनाव जीतने की सबसे अधिक संभावना रखते हैं। बड़ी संख्या में मुस्लिम उम्मीदवारों का चयन करना, लेकिन उनमें से एक को भी विधानसभा में नहीं लाना कहीं से भी समझदारी की रणनीति नहीं है। इसलिए, बिहार विधानसभा में एनडीए में मुस्लिम विधायकों के न होने को लेकर गुमराह किया जा रहा है। क्योंकि ऐसा उम्मीदवारों की कमी की वजह से नहीं बल्कि उनके न जीतने की वजह से हैं।

वैदिक शिक्षक डेविड फ्रॉली : ‘राम मंदिर निर्माण नेहरूवादियों, मार्क्सवादियों, मीडिया, शिक्षाविदों की हार है, जिसने इतिहास, पुरातत्व, भक्ति को नकारने की कोशिश की’

डेविड फ्रॉली ने
पद्म भूषण सम्मान से सम्मानित अमेरिकी वैदिक शिक्षक डेविड फ्रॉली ने बुधवार (अगस्त 5, 2020) को कहा कि राम मंदिर के निर्माण की शुरुआत एक अरब सपनों का साकार होना है। ज्ञात हो, डेविड फ्रॉली वेद, हिन्दुत्व, योग, आयुर्वेद और वैदिक एस्ट्रॉलजी पर कई किताबें लिख चुके हैं।
डेविड फ्रॉली ने टाइम्स नाउ के प्रधान संपादक राहुल शिवशंकर के साथ एक्सक्लुसिव इंटरव्यू में राम मंदिर पर अपने विचार रखते हुए कहा कि भगवान राम की महिमा को पुन: स्थापित किया गया है। उन्होंने आगे कहा कि अयोध्या विवाद संभवतः दुनिया के इतिहास में सबसे अधिक समय तक चलने वाला मुकदमा था।
अयोध्या में राम मंदिर भूमि पूजन का कार्यक्रम
भूमि पूजन करते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 
डेविड फ्रॉली ने राम मंदिर के निर्माण को देश की आजादी के बाद आधुनिक भारत की सबसे महत्वपूर्ण घटना बताते हुए कहा कि रामायण एशिया की सबसे लोकप्रिय कहानियों में से एक है और अब राम मंदिर भारत को उसके वास्तविक भाग्य के प्रति जागृत करेगा। उन्होंने आगे कहा, “हमें ‘अयोध्या के विजय’ को श्री राम की विजय के रूप में स्वीकार करना चाहिए।”
फ्रॉली ने कहा कि अयोध्या भारत के सात पवित्र शहरों में सबसे महत्वपूर्ण है। इसके साथ ही उन्होंने कहा, “हिन्दू धर्म एक परंपरा है जो कई प्रकार के आध्यात्मिक मार्ग स्वीकार करता है। यह संकीर्ण विचारधारा वाली परंपरा नहीं है।”

फ्रॉली ने आगे कहा, “हिन्दुओं ने अपने मंदिरों के पुन: प्राप्ति के लिए राजनीतिक रूप से कोई स्टैंड नहीं लिया। जब तक हिन्दू राजनीतिक रूप से स्टैंड नहीं लेगें, उन्हें अल्पसंख्यक ही माना जाएगा, उन जगहों पर भी, जहाँ पर वो बहुसंख्यक हैं।”
फ्रॉली ने ट्वीट करते हुए लिखा था, “राम मंदिर का निर्माण नेहरूवादियों, मार्क्सवादियों, माओवादियों, चीन समर्थकों, मीडिया और शिक्षाविदों के लिए हार है, जिसने इतिहास, पुरातत्व और भक्ति को नकारने की कोशिश की थी।”
डॉ फ्रॉली ने अपने ट्वीट के माध्यम से वास्तविकता को नकारने वालों को बेनकाब कर एक नयी बहस को जन्म दे दिया है। ट्विटर पर इनके पक्षकारों की भी कमी नहीं। इस सच्चाई से इंकार भी नहीं किया जा सकता कि केवल मुस्लिम तुष्टिकरण के चलते भारत के गौरवमयी इतिहास को अंधकारमय कर मुग़ल आतताइयों को महान बताया गया, जो भारत के लिए बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण समय रहा। यदि वास्तविक इतिहास पढ़ाया जाता न अयोध्या मुद्दा विवादित बनता और न ही रामजन्म स्थान मुकदमा इतना लम्बा चलता।
साम्प्रदायिक कौन?
जब संघ समर्पित विश्व हिन्दू परिषद और बजरंग दल एवं हिन्दू महासभा ने हिन्दुओं को अपने राम के प्रति जागृत करने आंदोलन कर रहे थे, छद्दम धर्म-निरपेक्षों के साथ हमारा मीडिया संघ, विश्व हिन्दू परिषद, बजरंग दल और हिन्दू महासभा के विरुद्ध देश में शांति भंग कर साम्प्रदायिकता का जहर फ़ैलाने जैसे समाचारों को खूब प्रसारित कर रहा था। बाबरी पक्षकार और इनके समर्थक दल झूठ पर झूठ बोल जनता को गुमराह कर राममंदिर पक्षकारों के विरुद्ध समाचारों को प्रमुखता दे रहे थे, उस समय किसी खोजी पत्रकार ने वास्तविकता को उजागर करने का साहस तक नहीं किया। 2014 चुनाव के बाद ऐसा समय चक्र घुमा, वही मीडिया गले फाड़-फाड़ कर राम धुन गाने लगा।
अगर राम मंदिर मुक़दमे का गहन अध्ययन किया जाए, तो तुष्टिकरण की चाटुकारिता में मुस्लिम कट्टरपंथियों का साथ छद्दम धर्म-निरपेक्ष, धूर्त नारा गंगा-जमुना तहजीब, संविधान पर आघात का शोर मचाने वाले हिन्दुओं की भी जमात थी। राम के अस्तित्व को नाकारा जा रहा है, लालची हिन्दू धर्म पर होते प्रहारों को बर्दाश्त करते रहे। मुस्लिम कट्टरपंथी तो साम्प्रदायिकता फ़ैलाने में बदनाम है, लेकिन इनका साथ देने में जयचन्दी हिन्दू भी पीछे नहीं रहे।
इतना ही नहीं, अभी जब नागरिकता संशोधक कानून के विरोध में हुए धरने और प्रदर्शनों में साम्प्रदायिकता का नंगा नाच इन्हीं जयचन्दी हिन्दुओं के सम्मिलित रहते "fuck hindutva ", "मोदी तेरी कब्र खुदेगी" और "योगी तेरी कब्र खुदेगी" आदि नारेबाजी के माध्यम से होता रहा। दूसरे, जब दिल्ली में हिन्दू-विरोधी दंगे हुए, तो आरोपियों को बचाने में यही छद्द्म धर्म-निरपेक्ष हिन्दू आगे आ रहा है, इनमें से कोई कोट पर जनेऊ पहन घूमते देखा गया तो किसी को हनुमान चालीसा पढ़ते आदि।     




प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अयोध्या में बुधवार(अगस्त 5) को राम मंदिर निर्माण के लिए भूमि पूजन किया और मंदिर की आधारशिला रखी। इसके बाद उन्होंने लोगों को संबोधित करते हुए कहा, “यह मेरा सौभाग्य था कि श्री राम जन्म भूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट ने मुझे मंदिर निर्माण के भूमि पूजन में आमंत्रित किया। आज पूरा देश राममय और हर मन दीपमय है। सदियों का इंतजार समाप्त हुआ।”
मोदी ने कहा, ”राम हमारे मन में गढ़े हुए हैं, हमारे भीतर घुल-मिल गए हैं। कोई काम करना हो, तो प्रेरणा के लिए हम भगवान राम की ओर ही देखते हैं। भगवान राम की अद्भुत शक्ति देखिए। इमारतें नष्ट कर दी गईं, अस्तित्व मिटाने का प्रयास भी बहुत हुआ, लेकिन राम आज भी हमारे मन में बसे हैं, हमारी संस्कृति का आधार हैं। श्रीराम भारत की मर्यादा हैं, श्रीराम मर्यादा पुरुषोत्तम हैं।”