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कावेरी नदी विवाद : आपस में लड़ती I.N.D.I. गठबंधन की कर्नाटक-तमिलनाडु सरकारें, मोदी सरकार से लगा रहे गुहार – ‘सुलह करा दो’

            आपस में लड़ रही सिद्धरमैया और MK स्टालिन की सरकार, मोदी सरकार से कह रहे - समझौता कराओ
मोदी सरकार के खिलाफ एकजुटता दिखाने के लिए विपक्ष ने I.N.D.I. गठबंधन तो बना लिया है, लेकिन गठबंधन की पार्टियों के बीच एकता नजर नहीं आ रही। ताजा मामला कर्नाटक और तमिलनाडु के बीच कावेरी जल विवाद का है। दोनों ही राज्यों में कांग्रेस सत्ता में है। लेकिन इसके बाद भी केंद्र से झगड़ा सुलझाने की अपील की जा रही है। जहाँ कर्नाटक में कांग्रेस अकेले बहुमत में है, वहीं तमिलनाडु में वो अपने I.N.D.I. गठबंधन की सहयोगी DMK के साथ सत्ता में साझीदार है।

कावेरी जल विवाद को विस्तार से समझने से पहले इतना जान लीजिए कि दोनों राज्यों के बीच कावेरी नदी के पानी के बँटवारे को लेकर विवाद मचा हुआ है। कर्नाटक में कांग्रेस सरकार है। वहीं तमिलनाडु में कांग्रेस-डीएमके गठबंधन सत्ता में है। कावेरी जल विवाद को लेकर तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने शनिवार (16 सितंबर, 2023) को केंद्रीय जल शक्ति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत को एक पत्र लिखा है।

इस पत्र में स्टालिन ने कर्नाटक की सिद्धारमैया सरकार पर गलत जानकारी देने का आरोप लगाया है। उन्होंने कहा है कि कर्नाटक सरकार ने अपनी रिपोर्ट में लिखा था कि कावेरी डेल्टा में पर्याप्त पानी है और तमिलनाडु में मानसून से पर्याप्त वर्षा होगी। इसलिए तमिलनाडु की माँग सही नहीं है, उसने अपना सिंचाई क्षेत्र बढ़ाया है। बकौल एमके स्टालिन, यह सब बातें पूरी आधारहीन हैं। कर्नाटक सरकार की रिपोर्ट ‘झूठी’ थी।

वहीं एक अन्य बयान में तमिलनाडु सीएम स्टालिन ने कहा कि जल विवाद को लेकर राज्य की सभी पार्टियों के सांसद केंद्रीय जल शक्ति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत को एक ज्ञापन सौंपेंगे। इसके लिए राज्य से एक प्रतिनिधिमंडल भेजा जाएगा। इस प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व तमिलनाडु के जल संसाधन मंत्री दुरईमुरुगन करेंगे।

उन्होंने आगे कहा कि इस ज्ञापन के जरिए केंद्र से आग्रह किया जाएगा कि वह कर्नाटक राज्य को तमिलनाडु के लिए कावेरी नदी का पानी छोड़ने की सलाह दें। स्टालिन ने यह भी कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने कावेरी के पानी आनुपातिक बँटवारे को लेकर फैसला दिया था, लेकिन कर्नाटक उस फैसले का पालन नहीं कर रहा है। तमिलनाडु को 14 सितंबर तक कर्नाटक से 103.5 TMCFT पानी मिलना चाहिए था। स्टालिन का दावा है कि तमिलनाडु को केवल 38.4 TMCFT पानी मिला। इससे 65.1 TMCFT पानी की कमी हो गई है।

इससे पहले कर्नाटक सरकार ने सर्वदलीय बैठक बुलाई थी। इस बैठक में तमिलनाडु को कावेरी नदी का पानी नहीं देने का निर्णय लिया गया था। उल्लेखनीय है कि तमिलनाडु ने कावेरी जल बँटवारे पर कर्नाटक के साथ बातचीत से इनकार कर दिया है। तमिलनाडु का कहना है कि कई बार बातचीत असफल होने के बाद ट्रिब्यूनल का गठन किया गया था।

सुप्रीम कोर्ट ने ट्रिब्यूनल के सुझाव में मामूली सुधार के साथ अपना फैसला सुनाया था। इस फैसले के हिसाब से जहाँ एक तमिलनाडु चाहता है कि कर्नाटक उसे हर महीने पानी दे। वहीं कर्नाटक का कहना है कि वह अपने लोगों और किसानों की जरूरतों को पूरा करने के बाद ही पानी छोड़ सकता है। 

क्या है कावेरी जल विवाद?

कावेरी जल विवाद 140 साल से भी अधिक पुराना है। इसकी शुरुआत साल 1881 में तब हुई जब मैसूर राज्य ने कावेरी नदी पर बाँध बनाने का फैसला किया। इस फैसले के बारे में सुनते ही मद्रास प्रेसिडेंसी ने आपत्ति जाहिर की। तब अंग्रेजों ने इसमें दोनों पक्षों में समझौता करा दिया। इसके बाद साल 1924 में मामला फिर उठा। इस बार मैसूर और मद्रास के साथ ही केरल और पुदुचेरी ने भी कावेरी के पानी में अपना हिस्सा बताया। मामला कोर्ट में पहुँचा और अंग्रेजों ने फिर से सुलह करा दी।
देश की आजादी के बाद भी कावेरी के पानी का मुद्दा समय-समय पर उठता रहा। स्थितियाँ बिगड़ती देख केंद्र सरकार ने 2 जून, 1990 को ट्रिब्यूनल का गठन किया। साल 1991 में ट्रिब्यूनल ने अपने फैसले में कहा कि कर्नाटक कावेरी के पानी का एक हिस्सा तमिलनाडु को देगा। साथ ही हर महीने पानी देने को लेकर भी फैसला हुआ। लेकिन बात अंतिम नतीजे तक नहीं पहुँच पाई। ट्रिब्यूनल के इस फैसले के खिलाफ कर्नाटक में हिंसक झड़प भी हुई थी।
इसके बाद साल 2007 में मामला फिर अदालत में पहुँच गया। कोर्ट की दखल के बाद ट्रिब्यूनल ने साल 2007 में कावेरी नदी  के पानी का बँटवारा कर दिया। इसके हिसाब से कावेरी का पानी सभी दावेदारों को देने का फैसला हुआ। ट्रिब्यूनल ने यह माना था कि कावेरी में 740 TMC पानी है। इसमें से तमिलनाडु को 419, कर्नाटक को 270, केरल को 30 और पुदुचेरी को 7 TMC पानी दिया जाना था। यही नहीं, विवाद सुलझाने के लिए कावेरी प्रबंधन बोर्ड और कावेरी जल नियमन समिति भी बनाई गई थी। लेकिन कर्नाटक और तमिलनाडु के अड़ियल रवैये के चलते मामला सुलझ नहीं पाया।
साल 2012 में सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में हस्तक्षेप करते हुए कर्नाटक से कहा कि वह तमिलनाडु को और पानी दे। लेकिन, इस फैसले के बाद कर्नाटक में हिंसक झड़प शुरू हो गईं। मामला किसी तरह शांत कराया गया। इसके बाद साल 2016 में कर्नाटक सरकार ने सर्वसम्मति से कावेरी का पानी तमिलनाडु को न देने को लेकर विधानसभा में प्रस्ताव पारित कर दिया। तमिलनाडु ने इसे सुप्रीम कोर्ट के फैसले की अवमानना बताते हुए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की।
इसके बाद कोर्ट ने कर्नाटक से फिर से तमिलनाडु को पानी देने के लिए। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद फिर से हिंसक घटनाएँ हुईं। बसों और सार्वजनिक संपत्तियों में आग लगा दी गई। साल 2018 में एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट ने कर्नाटक को तमिलनाडु के लिए पानी छोड़ने का आदेश दिया। इस फैसले के हिसाब से तमिलनाडु को 404.25 TMC फीट पानी मिलना तय हुआ था। वहीं कर्नाटक को 284.75 TMC पानी मिलना था। लेकिन तमिलनाडु का आरोप है कि कर्नाटक उसे पर्याप्त पानी नहीं दे रहा है।

I.N.D.I.A. का नारा ‘जुड़ेगा भारत, जीतेगा इंडिया’ – 13 लोगों की समन्वय समिति में मुस्लिम एरिया में झूठा बम फोड़ने वाले नेता भी

मुंबई में I.N.D.I.A गठबंधन की बैठक दूसरे दिन भी जारी है। इस बैठक में विपक्षी दल अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव की रणनीति से लेकर मंथन कर रहे हैं। वहीं आज इंडिया के नेताओं ने 13 सदस्यों की समन्वय समिति बनाने का फैसला लिया है। साथ ही गठबंधन ने अपना नारा ‘जुड़ेगा भारत, जीतेगा इंडिया’ भी जारी किया है। 

सूत्रों के अनुसार अब गठबंधन में ही प्रश्न यह हो रहा है कि भारत टूटा ही कब था जो जुड़ेगा? दूसरे यह कि भारत की दूसरी बड़ी जनसंख्या वाला समाज अल्पसंख्यक क्यों? यानि गठबंधन तो हो गया, लेकिन दिल नहीं मिल पा रहे, जो गठबंधन पर संदेह खड़ा कर रहा है। 

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, यह दावा किया जा रहा है कि विपक्षी गठबंधन इंडिया ने शुक्रवार (1 सितम्बर, 2023) को मुंबई की मीटिंग में कई बड़े फैसले लिए गए हैं। लोकसभा चुनाव को लेकर किस राज्य में किस पार्टी को कितनी सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारने हैं इसे लेकर भी इस बैठक में चर्चा हो रही है। मुंबई में हो रही इस बैठक में इस गठबंधन के संयोजक के नाम को लेकर भी चर्चा हुई है। इस बैठक के दौरान एक समन्वय समिति का भी गठन किया गया है। 

इस समन्वय समिति में कॉन्ग्रेस से केसी वेणुगोपाल, एनसीपी से शरद पवार, डीएमके से एमके स्टालिन, शिवसेना से संजय राउत, आरजेडी से तेजस्वी यादव, टीएमसी से अभिषेक बनर्जी, आप से राघव चड्ढा, समाजवादी पार्टी से जावेद अली खान, जेडीयू से ललन सिंह, जेएमएम से हेमंत सोरेन, सीपीआई से डी राजा, नेशनल कॉन्फ्रेंस से उमर अब्दुल्ला और पीडीपी से महबूबा मुफ्ती शामिल हैं। 

इस समन्वय समिति में हरामखोर को नॉटी समझाने वाले नेता भी शामिल हैं। राउत के अनुसार हरामखोर का मतलब उनके यहाँ नॉटी या बेईमान होता है। वहीं 1993 के बम ब्लास्ट के दौरान मुस्लिम एरिया में झूठा बम फोड़ने वाले नेता शरद पवार भी हैं। अब ऐसे में इस समिति का क्या होगा ये आने वाला समय ही बताएगा।

एक साथ लोकसभा चुनाव लड़ने का साझा संकल्प

इंडिया गठबंधन ने लोकसभा चुनाव-2024 एक साथ मिलकर लड़ने का भी संकल्प लिया। इस बात की जानकारी कॉन्ग्रेस नेता जयराम रमेश ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर दी। उन्होंने लिखा, “इंडिया गठबंधन में शामिल दलों ने एक साथ लोकसभा चुनाव लड़ने का संकल्प लिया। जहाँ तक संभव होगा वहाँ तक हम एकसाथ लोकसभा चुनाव लड़ेंगे।”  
वहीं ANI की रिपोर्ट के अनुसार, INDIA गठबंधन ने इस पर एक प्रस्ताव भी पास किया।
जयराम रमेश ने कॉन्ग्रेस की तरफ से जानकारी देते हुए आगे कहा, “सीट बँटवारे पर अलग-अलग राज्यों में चर्चा तत्काल शुरू की जाएगी और जल्द से जल्द से इसे पूरा किया जाएगा। देश के अलग-अलग हिस्से में जनसभा आयोजित की जाएगी। अलग-अलग भाषाओं में “जुड़ेगा भारत, जीतेगा इंडिया” की थीम के साथ विपक्षी गठबंधन चुनाव में उतरेगा। मीडिया की साझा रणनीति भी बनाई जाएगी।

विपक्ष जारी कर सकता है लोगो 

INDIA गठबंधन द्वारा आज लोगो जारी करने की बात सामने आई है वहीं कई मीडिया रिपोर्ट्स में कहा जा रहा है कि लोगो अभी तैयार नहीं है तो गठबंधन विचार-विमर्श के बाद इसे जारी करेगा। 

क्या बौखलाया विपक्ष मोदी सरकार के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव लाकर आत्महत्या करने जा रहा है?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंगलवार (25 जुलाई, 2023) को भाजपा के संसदीय दल को संबोधित करने के दौरान विपक्ष के नए गठबंधन पर भी जम कर हमला बोला। बता दें कि विपक्ष ने यूपीए को अलविदा कहते हुए अपने गठबंधन का नाम ‘I.N.D.I.A’ रखा है, जिसे ‘इंडिया’ कह कर प्रचारित किया गया। अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने याद दिलाया है कि आतंकी संगठन ‘इंडियन मुजाहिदीन’ और आक्रांता अंग्रेजों की ‘ईस्ट इंडिया कंपनी’ के नाम में भी तो इंडिया है।

उन्होंने कहा कि सिर्फ नाम में ‘इंडिया’ लगा लेने से कुछ नहीं होता है। बता दें कि विपक्ष मणिपुर हिंसा पर हंगामा करते हुए संसद नहीं चलने दे रहा है, जबकि मोदी सरकार चर्चा के लिए तैयार है। इस पर पीएम मोदी ने कहा कि उन्होंने इस तरह का दिशाहीन विपक्ष नहीं देखा। उन्होंने कहा कि ये लोग भ्रमित हैं और इनके बर्ताव से ऐसा लगता है कि ये दशकों तक सत्ता में नहीं आना चाहते। उन्होंने विपक्ष को बिखरा हुआ हताश करार दिया।

प्रधानमंत्री ने एक तरह से साफ़ कर दिया है कि वो संसद में विपक्ष के उपद्रव के सामने झुकने वाले नहीं हैं। उन्होंने गिनाया कि कैसे आतंकी संगठन PFI के नाम में भी इंडिया था। उधर ये भी खबर आ रही है कि विपक्ष अब अविश्वास प्रस्ताव की तैयारी कर रहा है। अगर मोदी सरकार विरोधी ऐसा करते हैं तो यह उनका आत्मघाती कदम होगा। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह मणिपुर पर संसद में चर्चा का उत्तर देने के लिए तैयार हैं। प्रधानमंत्री के संसद में पहुँचने पर भाजपा के सांसदों में खासा उत्साह दिखा और उन्होंने गर्मजोशी से उनका स्वागत किया।

उधर पूर्व केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कहा कि हमें अपने प्रधानमंत्री पर गर्व है, उन्होंने एक नई आशा जगाई है। पटना साहिब लोकसभा क्षेत्र से सांसद ने कहा कि 2024 में भी NDA ही सत्ता में आएगी। उन्होंने कहा कि देश-दुनिया जानती है और विपक्ष भी ये समझता है, फिर भी वो बार-बार विरोध करते हैं क्योंकि वो मान चुके हैं कि उन्हें सत्ता में नहीं आना। उन्होंने कहा कि कॉन्ग्रेस और ‘ईस्ट इंडिया कंपनी’, दोनों को अंग्रेजों ने ही बनाया है। उन्होंने कहा कि 2024 का परिणाम आएगा जो हारे हुए और थके हुए निराश विपक्ष की संख्या और कम हो जाएगी।

गठबंधन का नाम ‘INDIA’ रखने पर 26 पार्टियों के खिलाफ दिल्ली पुलिस में दर्ज हुई शिकायत, इस कानून का दिया हवाला

गठबंधन के नए नाम 'INDIA' के हिलाफ दिल्ली पुलिस में शिकायत
किसी भी पार्टी या गठबंधन का नाम INDIA नहीं होना चाहिए। गठबंधन टुटते भी है, पार्टियां हारती भी है, तो न्यूज मीडिया ऐसी ब्रेकिंग नहीं चलाएगी इंडिया टुटा, इंडिया हार गया।
विपक्षी एकता बैठक में गठबंधन का नाम ‘INDIA’ रखे जाने के खिलाफ दिल्ली पुलिस में 26 राजनीतिक पार्टियों के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई गई है। ये शिकायत बारखम्बा पुलिस थाने में दर्ज कराई गई है। इस शिकायत में कहा गया है कि गठबंधन का नाम ‘INDIA’ रखा जाना ‘THE EMBLEMS AND NAMES (PREVENTION OF IMPROPER USE) ACT, 1950’ का उल्लंघन है। इस शिकायत के बाद इस नाम को लेकर विवाद बढ़ गया है।

इस शिकायत इन सभी 26 दलों के नाम भी लिखे गए हैं जो बेंगलुरु में हुई बैठक का हिस्सा थे। साथ ही उन पर आरोप लगाया गया है कि उन्होंने देश के नाम का गलत इस्तेमाल किया है। गठबंधन का टैगलाइन ‘जीतेगा भारत’ रखा गया है। 26 वर्षीय अवनीश मिश्रा ने ये शिकायत दर्ज कराई है। वो दिल्ली के ही रहने वाले हैं। उन्होंने इस शिकायत में कहा है कि चुनावी राजनीति के लिए देश के नाम का गलत इस्तेमाल किया जा रहा है।

इस शिकायत में उक्त कानून के पॉइंट संख्या 6 का हवाला दिया गया है, जिसमें लिखा है कि रिपब्लिक या यूनियन ऑफ इंडिया का नाम, चिह्न या सील का इस्तेमाल रजिस्टर नहीं कराया जा सकता है। एक्ट के सेक्शन 5 के तहत इन विपक्षी दलों के खिलाफ कार्रवाई किए जाने की माँग की गई है। बता दें कि अगर इस कानून के तहत विपक्षी दल दोषी पाए जाते हैं तो उन्हें 500 रुपए जुर्माना लगाया जा सकता है और साथ ही इस नाम का वो इस्तेमाल भी नहीं कर पाएँगे।

महाराष्ट्र भाजपा के सोशल मीडिया हेड और अधिवक्ता आशुतोष दुबे ने भी भारत निर्वाचन आयोग को एक पत्र लिखा है। इस पत्र में उन्होंने INDIA (इंडिया) नाम को राजनैतिक फायदों के लिए प्रयोग किए जाने का आरोप लगाया है। साथ ही उन्होंने इस पर आपत्ति जताते हुए इसे रोकने की माँग की है। मंगलवार (18 जुलाई, 2023) को लिखे गए इस पत्र में आशुतोष दुबे ने UPA (संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन) की 2024 लोकसभा चुनाव की तैयारियों के तरीके को आपत्तिजनक बताया।


कांग्रेस के लिए 2019 में अपने दम पर सत्ता में आना कठिन: सलमान खुर्शीद

Difficult for Congress to come to power on its own, says Salman Khurshid
आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
कांग्रेस नेता सलमान खुर्शीद का मानना है कि अगले लोकसभा चुनाव में अकेले दम पर उनकी पार्टी का सत्ता में आना कठिन है। विपक्षी पार्टियों का गठबंधन कांग्रेस को रोकने के लिए नहीं बल्कि भाजपा को रोकने के लिए बनना चाहिए। 
पूर्व केंद्रीय मंत्री ने कहा- अगले लोकसभा चुनाव में भाजपा को हराने के लिए अन्य दलों को भी बलिदान और समझौते करने होंगे। कांग्रेस के सभी नेता अच्छी तरह से समझ गए हैं कि देश की सत्ता को बदलने के लिए गठबंधन बहुत जरूरी है। 
दरअसल, सच्चाई यह है कि समस्त गैर-भाजपाई पार्टियाँ अपनी बंद होती दुकान से परेशान हैं, ना कि मोदी सरकार से। मोदी सरकार से पूर्व योजनाएँ तो बनती थीं, कार्यविंत नहीं होती थीं, परन्तु अब योजनाएँ बनने के साथ साथ लागू भी हो रहीं हैं। ज्ञात हो, 2014 चुनाव से पूर्व बनी योजनाओं पर निर्धारित धन हर मंत्रालय एवं विभाग को आबंटित भी कर दिया गया था, लेकिन केवल सलमान खुर्शीद के अतिरिक्त किसी भी मंत्रालय ने जन सुविधाओं पर पैसा खर्च करने की बजाए चुनाव घोषित होने पर सरकारी खजाने में वापस जमा करवा दिया। इतना ही नहीं, सलमान खुर्शीद ने जितना धन खर्च किया, केवल अपनी बेगम के एनजीओ पर। और बेगम ने आधे से ज्यादा धन का घोटाला कर लिया, जिसका उल्लेख उस समय सम्पादित करते एक हिन्दी पाक्षिक में विस्तार से किया था।
दूसरे, प्रधानमंत्री मोदी द्वारा अक्टूबर 21 को दिल्ली स्थित लाल किले में नेताजी सुभाषचन्द्र बोस की आज़ाद हिन्द सरकार की 75वीं वर्षगांठ मनाकर इतिहास के एक नए अध्याय को खोलने का मार्ग दिखाया है, जो देश को वास्तविक इतिहास से अवगत करवाने में सहायक सिद्ध होगा, जिसे महात्मा गाँधी और नेहरू परिवार को ही इतिहास बता भारतीयों को गुमराह कर रखा था, उससे बहुत जल्द पर्दा हटने की तैयारी हो चुकी है। हकीकत यह है कि अब कांग्रेस बेनकाब होने जा रही है, जिस कारण हर ज़हर को पीकर कांग्रेस किसी भी नवगठित पार्टी से भी ये कोई भी गठबन्धन करने से परहेज नहीं करेगी।      
कांग्रेस महागठबंधन बनाने के लिए हर समझौते को तैयार
खुर्शीद ने कहा- गठबंधन के लिए जो भी बलिदान, समझौते या बातचीत जरूरी होगा, उसके लिए कांग्रेस तैयार है। यह तभी संभव है जब दूसरे दल भी इस तरह का सामंजस्य दिखाना होगा। 
कर्नाटक के मुख्यमंत्री कुमारस्वामी के शपथ ग्रहण में संभावित महागठबंधन के 13 दलों के नेताओं ने हिस्सा लिया था।
कांग्रेस गठबंधन के लिए काम कर रही 
अकेले दम पर सरकार बनाने के सवाल पर उन्होंने कहा- आज की स्थिति देखते हुए यह कठिन है। अगर हम अकेले दम पर सरकार बनाने का सोचते हैं, तो उसके लिए हमें पांच साल तक काम करना होगा क्योंकि पिछले तीन साल से कांग्रेस गठबंधन के लिए काम कर रही है। कांग्रेस अब अकेले चुनाव लड़ने के बारे में नहीं सोच सकती। इसके लिए हमें पांच साल तक लड़ना पड़ेगा।
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महागठबंधन नहीं बना तो सभी पार्टियों और देश की हार होगी
खुर्शीद ने कहा कि कांग्रेस ही ऐसी पार्टी है, जो देश भर से सीटें जीतेगी। बाकी सहयोगी पार्टियां अपने अपने राज्य से जीत हासिल करेंगी। उन्होंने मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनावों में बसपा और सपा से गठबंधन न होने को लेकर कहा कि महागठबंधन बनाने का उद्देश्य भाजपा को रोकने का है। ऐसे में अगर विपक्षी पार्टियां अपना लक्ष्य भूल जाती हैं तो महागठबंधन नहीं बन पाएगा। यह सभी पार्टियों और देश के लिए बड़ी हार होगा।

चुनाव 2019 : गठबंधन में गले की हड्डी बना शिवपाल का ‘मोर्चा’

क्या 2019 के लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पुनः  विजयी होंगे ..?
अकेला मोदी, सब पर भारी  
आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
2019 में नरेन्द्र मोदी को मात देने को हर कोई लगा हुआ है, लेकिन अपने अस्तित्व को भी कोई नहीं खोना चाहता। हर कोई अपनी ढपली अपना राग करने में व्यस्त हैं। कोई अपना अहम् त्यागने को तैयार नहीं। दूसरे अर्थों में यह भी कहा जा सकता है कि "गांव बसा नहीं, लुटेरे पहले आ गए।"
शिवपाल सिंह यादव के समाजवादी सेकुलर मोर्चे ने उत्तर प्रदेश में विपक्षी राजनीति का समीकरण गड्‌डमड्‌ड कर दिया है। समाजवादी पार्टी का भविष्य देखते हुए बसपा नेता मायावती ने गठबंधन के भविष्य को ही अधर में रख दिया है। मायावती अब अकेले दम पर लोकसभा चुनाव में उतरने का मन बना रही हैं। हालांकि घबराए अखिलेश यादव बसपा का पिछलग्गू बनने को भी तैयार हैं। चुनावी समीकरण बिगाड़ने के लिए भीम सेना के प्रमुख चंद्रशेखर भी ‘मैदाने जंग’ में उतर आए हैं। अब चंद्रशेखर भी मायावती को बुआ कहने लगे हैं। चुनावी समीकरण में दो नेताओं की बुआ के रूप में मायावती फिट नहीं बैठ रहीं, इसे भांपते-समझते हुए मायावती ने साफ-साफ कह ही दिया कि राजनीति में उनका कोई भाई-भतीजा नहीं है और वे किसी की बुआ नहीं हैं।छत्तीसगढ़ में अजित जोगी की पार्टी जनता कांग्रेस के साथ ‘अप्रत्याशित’ गठबंधन करके और मध्य प्रदेश में अकेले चुनाव लड़ने का ऐलान करके मायावती ने कांग्रेस को भविष्य का संदेश दे दिया है। यह संदेश उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव के लिए भी है।
फांसों में फंसा गठबंधन 
मायावती ने छत्तीसगढ़ ऐलान के पहले यूपी में गठबंधन को लेकर जो बयान दिया था उससे घबराए अखिलेश यादव ने फौरन ही यह कह कर बात संभालने की कोशिश की थी कि समाजवादी पार्टी गठबंधन के लिए दो कदम पीछे हटने के लिए भी तैयार है। छत्तीसगढ़ ‘डेवलपमेंट’ के बाद अब अखिलेश कितने कदम पीछे हटेंगे, इस बारे में उनका बयान आना अभी बाकी है। अखिलेश ने उस समय यह भी कहा था कि भाजपा जैसी साम्प्रदायिक पार्टी को हराने के लिए सभी दलों को एक साथ आगे आना चाहिए। अखिलेश यादव यह बयान देकर फंस गए, क्योंकि फौरन ही शिवपाल ने कह दिया कि साम्प्रदायिक शक्तियों के खिलाफ लड़ाई तभी सच्ची मानी जा सकती है, जब गठबंधन में समाजवादी सेकुलर मोर्चे को भी शामिल किया जाए। सीटों को लेकर सपा, बसपा और कांग्रेस में खींचतान चल ही रही थी कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अधिक सीटें देने की राष्ट्रीय लोकदल की मांग शामिल हो गई। इसके बाद अब समाजवादी सेकुलर मोर्चे को भी गठबंधन में शामिल करने की सेकुलर-सैद्धांतिक-अनिवार्यता फांस बन गई है।
इस सन्दर्भ में अवलोकन करें:--

nigamrajendra.blogspot.com
आर.बी.एल.निगम,वरिष्ठ पत्रकार मध्यप्रदेश में कांग्रेस के साथ गठबंधन न होने के लिए…
पत्नी सरला यादव के पास एक करोड़ 72 लाख 24 हजार 27 रुपये मूल्य की सकल चल और बाजार मूल्य के हिसाब से 4 करोड़ एक लाख 69 हजार 961 की अचल संपत्ति है। इसके अलावा प्रत्याशी शिवपाल सिंह यादव ने हिंदू अनडिवाइडेड फैमिली (एचयूएफ) के रूप में कुल 24 लाख 72 हजार 36 रुपये की सकल चल और बाजार मूल्य के तौर पर एक करोड़ 69 लाख 14 हजार 647 रुपये कीमत की अचल संपत्ति होने की जानकारी दी है।
उनके पास साढ़े 28 हजार रुपये की नगदी है। उनके इटावा स्थित बैंक ऑफ बड़ौदा, जिला कोऑपरेटिव बैंकों समेत लखनऊ की स्टेट बैंक ब्रांच में 60 लाख रुपये जमा हैं। पत्नी के बैंक खातों में साढ़े 17 लाख रुपये और एचयूएफ के बैंक खातों में करीब 13.95 लाख जमा है। शिवपाल के पास 60 लाख की एफडीआर और पत्नी के नाम 30 लाख की फिक्स डिपाजिट है। श्री यादव के पास पजेरो गाड़ी और दो अंगूठी हैं। जबकि पत्नी के पास 10 लाख 65 हजार 816 रुपये के जेवर हैं।


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यूपी सरकार में कद्दावर मंत्री रहे शिवपाल सिंह यादव की पत्नी सरला उनसे भी ज्यादा रईस हैं। नामांकन पत्र के साथ प्रस्...

किसी भी दल में अकेले चुनाव लड़ने की हैसियत नहीं --शिवपाल यादव  
समाजवादी सेकुलर मोर्चा के नेता शिवपाल सिंह यादव ने गठबंधन-तार पर अपना कटिया-कनेक्शन यह कहते हुए फंसा दिया कि समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी और कांग्रेस यदि असलियत में साम्प्रदायिक शक्तियों से लड़ना चाहती हैं, तो उन्हें समाजवादी पार्टी सेकुलर मोर्चे को भी गठबंधन में शामिल करना होगा। शिवपाल ने अखिलेश से भी कहा कि साम्प्रदायिक शक्तियों से उनकी लड़ाई प्रामाणिक तभी मानी जाएगी जब गठबंधन में मोर्चे को भी शामिल करने के लिए वे पहल करें। शिवपाल ने सपा और बसपा को चेतावनी भी दे डाली कि अगर समाजवादी सेकुलर मोर्चा को गठबंधन में शामिल नहीं किया गया तो मोर्चा अपने बूते पर चुनाव लड़ कर उन सीटों को तो जीत ही लेगा जो तालमेल में सपा द्वारा या बसपा द्वारा छोड़ी जाएंगी। गठबंधन में शामिल करने का प्रस्ताव उछालने वाले शिवपाल हालांकि पहले यह कह चुके हैं कि समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी का गठबंधन उसूलों का भटकाव है। लेकिन अब शिवपाल कह रहे हैं कि उत्तर प्रदेश में चाहे सपा-बसपा गठबंधन हो या कोई दूसरा गठबंधन, अब मोर्चा को दरकिनार कर या उसकी उपेक्षा कर कोई भी दल इस हैसियत में नहीं कि वह चुनाव लड़ सके और सरकार बना सके।
Image result for चंद्रशेखर 'रावण'गठबन्धन को 40 से 50 सीटों पर सीधा नुकसान 
गठबंधन को ‘प्रेशर’ में लाने के लिए शिवपाल ने प्रदेश भर के छोटे-छोटे दलों से बातचीत करने और उन्हें मोर्चे की तरफ करने की कवायद तेज कर दी है। इसके लिए उन्होंने शरद यादव समेत कई वरिष्ठ नेताओं से बातचीत भी की और बामसेफ के सम्मेलन में हिस्सा लेने फैजाबाद भी गए। शिवपाल बसपा और कांग्रेस से भी बात करेंगे और गठबंधन में मोर्चा को शामिल करने की सेकुलर-सैद्धांतिक-अनिवार्यता बताएंगे। शिवपाल कहते हैं कि फिर भी अगर मोर्चे को गठबंधन में शामिल करने से वे परहेज करते हैं, तो वे नुकसान झेलने के लिए तैयार रहें।शिवपाल दावा करते हैं कि समाजवादी सेकुलर मोर्चा गठबंधन में शामिल नहीं हुआ तो गठबंधन को 40 से 50 सीटों पर सीधा नुकसान पहुंचेगा। शिवपाल राजधानी लखनऊ में शीघ्र ही मोर्चे का विशाल सम्मेलन आयोजित करने की तैयारी में हैं।
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चले थे साथ मिलकर, तुम्हे रुकना पड़ेगा,
 मेरी आवाज़ सुनकर  ...
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तेरा जाना दिल के अरमानों का लुट जाना ....
शिवपाल राजनीति में अपनी प्रभावशाली जमीन तैयार करने की जद्दोजहद में लगे हैं। उनकी दूरंदेशी है कि वे मुलायम सिंह यादव का चेहरा अपने साथ लेकर चल रहे हैं। शिवपाल समाज में यह संदेश दे रहे हैं कि पुत्र होते हुए अखिलेश ने मुख्यमंत्री बनते ही पिता मुलायम को हाशिए पर रख दिया, लेकिन वे भाई होते हुए मुलायम को अपना सिरमौर बना कर चलना चाहते हैं। इसी इरादे से शिवपाल ने समाजवादी मोर्चे का अध्यक्ष पद मुलायम सिंह यादव के लिए रखा है। शिवपाल खुद को समाजवादी सेकुलर मोर्चे का संयोजक बताते हैं और साफ-साफ कहते हैं कि अध्यक्ष का पद नेता जी के लिए है। शिवपाल ने मुलायम सिंह यादव के समक्ष समाजवादी सेकुलर मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने का प्रस्ताव रखा है।
मुलायम सिंह और साधना गुप्ता की एक संतान है जिनका नाम प्रतीक यादव है।
काँटा लगा, हाय लगा ...
यह भी चर्चा सुनने को आ रही है कि अपनी ज़मीन खिसकती देख वापस पिता की गोद में बैठ जाएं। लेकिन मुलायम सिंह की दूसरी पत्नी साधना यादव(गुप्ता) संभव है, कोई अड़चन डाल दे। क्योकि अगर बाप-बेटे एक होते हैं, तो अमर सिंह को मुलायम अपने साथ ला सकते हैं। लेकिन आज़म खान और अखिलेश का अमर सिंह के साथ 36 का आंकड़ा है।
शिवपाल का कहना है कि मोर्चे का गठन नेताजी से बातचीत करने और उनका आशीर्वाद लेने के बाद ही किया गया। राजनीतिक पंडितों का भी मानना है कि शिवपाल का यह कदम राजनीतिक दूरदृष्टि से भरा है, क्योंकि अगर मुलायम ने मोर्चे का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनना स्वीकार कर लिया, तो खेल एकतरफा हो जाएगा। मुलायम के आते ही समाजवादी पार्टी में भगदड़ जैसी स्थिति हो जाएगी। शिवपाल भी कहते हैं कि नेता जी अगर मान गए, तो समाजवादी पार्टी में उपेक्षित नाराज नेता-कार्यकर्ता सब नेता जी की छाया में मोर्चे के साथ चले आएंगे। शिवपाल ने मुलायम सिंह यादव को मोर्चा के प्रत्याशी के रूप में मैनपुरी लोकसभा चुनाव में उतरने का भी प्रस्ताव दे रखा है। शिवपाल ने कहा कि नेता जी मैनपुरी से मोर्चे के प्रत्याशी होंगे।
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एक तेरा साथ, हमें दो जहाँ से प्यारा है.....
शिवपाल यह भी कहते हैं कि अगर वे समाजवादी पार्टी से भी चुनाव लड़ते हैं, तो मोर्चा उनका समर्थन करेगा और उनके खिलाफ कोई प्रत्याशी नहीं खड़ा करेगा। यह राजनीतिक दूरदृष्टि ही है कि जहां समाजवादी पार्टी के पोस्टर-बैनरों से मुलायम सिंह का चेहरा हटता गया, वहीं समाजवादी सेकुलर मोर्चे के झंडों, बैनरों और पोस्टरों पर मुलायम की तस्वीर प्रमुखता से लगी है। शिवपाल ने पिछले दिनों अपनी नई राजनीतिक पार्टी समाजवादी सेकुलर मोर्चा का औपचारिक झंडा भी जारी किया। इस झंडे पर एक तरफ शिवपाल हैं, तो दूसरी तरफ मुलायम।शिवपाल और उनके समर्थकों की गाड़ियों पर अब समाजवादी सेकुलर मोर्चा का झंडा लग गया है। राजनीति के मैदान में शिवपाल की यह नई पारी तो है, लेकिन उन्होंने मुलायम के साथ रहकर राजनीति के दाव-पेंच सीखे हैं।अब शिवपाल के लिए उसे आजमाने और परखने का समय है.
थोड़ी बहुत सियासत समझने वाले लोग भी यह जानते हैं कि समाजवादी सेकुलर मोर्चे का जन्म किन वजहों से हुआ है। मुख्यमंत्री बनने के बाद अखिलेश यादव ने शिवपाल यादव के साथ जैसा व्यवहार किया और जिस तरह उनका राजनीतिक भविष्य चौपट करने की कोशिश की, उससे इतना तो जाहिर ही है कि समाजवादी सेकुलर मोर्चा कोई समाजवादी पार्टी को मजबूत करने के लिए नहीं बना है। चुनावी गणितज्ञों का भी मानना है कि मोर्चा सीटें जीते न जीते, लेकिन समाजवादी पार्टी को नुकसान तो पहुंचाएगा ही।
जब लोकदल से अलग होकर मुलायम सिंह ने बनाई थी समाजवादी पार्टी 
अखिलेश यादव ने समाजवादी पार्टी का स्वयंभू राष्ट्रीय अध्यक्ष बनते ही जिस तरह मुलायम और शिवपाल समर्थकों को किनारे लगाया और बाहर का रास्ता दिखाया, वह नाराज और उपेक्षित जमात आज शिवपाल के साथ खड़ी है और निश्चित तौर पर वह जमात अपना बदला साधेगी। ऐसी ही उपेक्षा से आहत होकर मुलायम सिंह यादव ने भी लोकदल से अलग होकर समाजवादी पार्टी बनाई थी। उस समय भी मुलायम के राजनीतिक भविष्य पर लोग सवाल खड़े करने लगे थे और तमाम आशंकाएं जताने लगे थे, लेकिन मुलायम के नेतृत्व में समाजवादी पार्टी ने राजनीतिक कामयाबियां पाईं और अपनी ठोस पहचान कायम की. मुलायम सिंह से जुड़े एक वरिष्ठ नेता ने कहा कि आज शिवपाल ने भी मोर्चा बना कर मुलायम का ही अनुकरण किया है।
इस प्रशिक्षण का ही असर है कि समाजवादी सेकुलर मोर्चे के ऐलानिया मैदान में उतरने के बाद से समाजवादी पार्टी में सन्नाटा व्याप्त है। अखिलेश यह दिखाने की पूरी कोशिश कर रहे हैं कि मोर्चे से सपा की सेहत पर कोई असर नहीं पड़ने वाला, लेकिन असलियत यही है कि सपा में बेचैनी है। यह ध्यान में रखना जरूरी है कि उत्तर प्रदेश में करीब आठ प्रतिशत यादव मतदाता हैं और पिछड़ी जाति में लगभग 20 फीसदी हिस्सेदारी यादवों की है। मायावती और अखिलेश की ‘बुआ-बबुआ पॉलिटिक्स’ यादव समुदाय को कभी भी रास नहीं आई और न पारम्परिक यादव समाज ने भतीजे के हाथों चाचा के अपमान को ही हजम किया।
मुलायम को अपदस्थ कर अखिलेश का अध्यक्ष बनना भी यादव समाज को गवारा नहीं हुआ. ऐसे में शिवपाल के उस बयान में दम है कि समाजवादी सेकुलर मोर्चे के सहयोग के बिना देश में अगली सरकार बनाना संभव नहीं होगा. शिवपाल ने कहा कि समाजवादी पार्टी को खड़ा करने में उन्होंने भी बड़े कष्ट झेले हैं, बड़ी मेहनत और जद्दोजहद की है, लेकिन उन्हें ही लगातार अपमान झेलना पड़ा. 29 अगस्त 2018 को समाजवादी सेकुलर मोर्चे के गठन की औपचारिक घोषणा के बाद शिवपाल को मिलते भारी जन-समर्थन से अखिलेश यादव को अपनी सियासी जमीन हिलती महसूस हुई. अखिलेश ने समाजवादी सेकुलर मोर्चे के गठन को भारतीय जनता पार्टी की साजिश कहना शुरू कर दिया, लेकिन अखिलेश की ऐसी प्रतिक्रिया को कोई तरजीह नहीं मिली. राजनीतिक विश्लेषकों का भी यह कहना है कि 2019 के लोकसभा चुनाव में शिवपाल यादव के समाजवादी सेकुलर मोर्चे की अहम भूमिका रहेगी. समाजवादी पार्टी में शिवपाल की छवि जनप्रिय नेता की रही है.
समाजवादियों पर मुलायम के बाद शिवपाल की ही सबसे अच्छी पकड़ है. इसीलिए मोर्चे को विस्तार लेने में अधिक मुश्किलें पेश नहीं आ रही हैं. राजनीति के जानकार भी यह मानने लगे हैं कि समाजवादी सेकुलर मोर्चा आगामी चुनावों में हार-जीत के समीकरणों को बदलेगा और समाजवादी पार्टी का समानान्तर विकल्प बनेगा. मुलायम सिंह के नजदीक रहकर सियासी दावपेंच गहराई से सीख चुके शिवपाल ने सटीक मौके पर मोर्चे का ऐलान किया और मुस्लिम मतदाताओं को अपने साथ जोड़े रखने के लिए भाजपा में जाने का प्रस्ताव ठुकरा दिया. शिवपाल के इस कदम से सियासी जगत में यह संदेश भी गया कि समाजवादी सेकुलर मोर्चा मुलायम के सिखाए रास्ते पर चल पड़ा है और भविष्य में मुलायम खुद भी सेकुलर मोर्चा से जुड़ सकते हैं.
मोर्चे से बौखलाई सपा, सस्ते बयान पर उतरे अखिलेश के समर्थक
समाजवादी सेकुलर मोर्चे के अस्तित्व में आने से समाजवादी पार्टी इतनी बौखला गई कि अखिलेश यादव के समर्थक शिवपाल यादव पर सस्ते आरोपों पर उतर आए. अखिलेश के करीबी पूर्व मंत्री पवन पांडेय ने शिवपाल पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए और तीखा प्रहार किया. मोर्चा ने इसके जवाब में कहा कि अखिलेश और पवन जैसे नेताओं के कारण ही समाजवादी पार्टी का यह हश्र हुआ है. मोर्चा के प्रवक्ता दीपक मिश्र और अभिषेक सिंह आशू ने कहा कि मोर्चा बनने से घबराई समाजवादी पार्टी शिवपाल सिंह यादव की छवि धूमिल करने की कोशिश कर रही है.
मोर्चा प्रवक्ता कहते हैं कि शिवपाल यादव के प्रयासों से ही राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा को रोकने के लिए महागठबंधन बना था. इसमें पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवगौड़ा, पूर्व सांसद शरद यादव, राजद नेता लालू यादव और रालोद नेता अजित सिंह जैसे नेताओं ने भी मुलायम सिंह यादव को अपना अध्यक्ष मान लिया था. इस महागठबंधन को अखिलेश यादव और उनके गुरु रामगोपाल यादव ने महज इसलिए तोड़ डाला, क्योंकि वे सब यादव सिंह के महा भ्रष्टाचार के कीचड़ में सने थे और उन्हें भाजपा से डर लग रहा था. अगर अखिलेश और रामगोपाल महागठबंधन को नहीं तोड़ते तो मुलायम प्रधानमंत्री पद के लिए सर्व-स्वीकार्य नेता होते. उसका श्रेय शिवपाल यादव को ही मिलता. पिता ने पुत्र को मुख्यमंत्री बनाया, लेकिन पुत्र ने उसी पिता को कहीं का नहीं छोड़ा.
समाजवादी पार्टी छोड़ कर समाजवादी सेकुलर मोर्चा में शामिल हुए सपा की राज्य कार्यकारिणी व समाजवादी युवजन सभा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के पूर्व सदस्य और लखीमपुर खीरी स्थित निघासन से जिला पंचायत सदस्य राजीव गुप्ता ने कहा कि समाजवादी पार्टी डॉ. राम मनोहर लोहिया जैसे महापुरुषों के सिद्धांतों पर चलने वाली पार्टी रही है, लेकिन अखिलेश यादव में उस महान थाती को संभाल कर रख पाने की योग्यता नहीं थी.
जिस डाल पर वे बैठे थे उसे ही काट डाला और पूरी पार्टी को नष्ट कर डाला. रामगोपाल यादव की शह पर अखिलेश ने अपने पिता मुलायम सिंह यादव और चाचा शिवपाल सिंह यादव को अपमानित करने का अमर्यादित आचरण किया, जिसका खामियाजा उन्हें भुगतना पड़ रहा है. प्रदेश की जनता इस आचरण के लिए अखिलेश को कभी माफ नहीं करेगी. राजीव गुप्ता कहते हैं कि 2017 के विधानसभा चुनाव में उन्हें निघासन विधानसभा सीट से चुनाव लड़ने के लिए सपा का टिकट मिला था, लेकिन अखिलेश यादव ने उनका टिकट महज इसलिए काट दिया क्योंकि वे शिवपाल यादव के समर्थक थे. अखिलेश ने ईर्ष्या में निघासन की जीती हुई सीट भी गंवा दी. सेकुलर मोर्चा के आने से प्रदेश में परिपक्व राजनीति का नया अध्याय खुलेगा और समाज के सभी समुदाय के लोग शिवपाल यादव के नेतृत्व में एकजुट होंगे.
… और मुलायम को राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाने को राज़ी नहीं ही हुए अखिलेश
आखिरी वक्त में मुलायम ने अखिलेश और शिवपाल में सुलह कराने की कोशिश की थी, लेकिन शिवपाल ने मुलायम का दाव मुलायम के ही हवाले कर दिया. शिवपाल ने सुलह की शर्त यह रखी थी कि मुलायम को राष्ट्रीय अध्यक्ष और उन्हें प्रदेश अध्यक्ष बनाया जाए. लेकिन अखिलेश यादव ने यह शर्त नहीं मानी और सुलह वार्ता फेल हो गई.
मुलायम सिंह ने अपने आवास पर ही अखिलेश और शिवपाल की सुलह-बैठक बुलाई थी. पहले तो परिवार के सदस्य ही बैठक में शामिल थे, लेकिन थोड़ी देर बाद ही सपा नेता आजम खान और अखिलेशवादी समाजवादी पार्टी के कोषाध्यक्ष संजय सेठ भी वहां पहुंच गए. अखिलेश यादव शिवपाल यादव को सपा का प्रदेश अध्यक्ष बनाने के लिए तैयार थे, लेकिन मुलायम को राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाने की शर्त उन्हें मंजूर नहीं हुई.
अखिलेश अपने पिता को दोबारा राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाए जाने के लिए कतई तैयार नहीं थे. नतीजतन सुलह-वार्ता बेनतीजा समाप्त हो गई. बाद में मुलायम ने यह कहते हुए बात संभाली कि वे खुद राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के लिए इच्छुक नहीं हैं. बैठक में अखिलेश ने शिवपाल को पार्टी से निकाले जाने की धमकी भी दी थी, लेकिन इस धमकी का कोई असर नहीं दिखा. शिवपाल ने नई पार्टी की घोषणा भी कर दी, लेकिन अखिलेश अब तक शिवपाल यादव को समाजवादी पार्टी से निष्कासित नहीं कर पाए हैं.
नौरत्नों के बाद शिवपाल ने जोड़े पांच पांडव
समाजवादी सेकुलर मोर्चा के संयोजक शिवपाल सिंह यादव ने मोर्चे का औपचारिक ऐलान करने के बाद ही अपने नौ प्रवक्ताओं के मनोनयन की सूची जारी कर दी थी. 20 सितम्बर को शिवपाल ने फिर पांच प्रवक्ताओं का मनोयन किया और 14 प्रवक्ताओं की फौज खड़ी कर ली.
मोर्चे के गठन के बाद शिवपाल ने पूर्व मंत्री शारदा प्रताप शुक्ल और पूर्व मंत्री शादाब फातिमा को मोर्चे का प्रवक्ता मनोनीत किया था. इनके अलावा दीपक मिश्र, नवाब अली अकबर, सुधीर सिंह, प्रो. दिलीप यादव, अभिषेक सिंह आशू, मोहम्मद फरहत रईस खान और अरविंद यादव भी मोर्चा के प्रवक्ता बनाए गए थे. प्रवक्ताओं की दूसरी लिस्ट में मोहम्मद शाहिद, अरविंद विद्रोही, देवेंद्र सिंह, राजेश यादव और इरफान मलिक के नाम शामिल हैं. अब समाजवादी सेकुलर मोर्चा के 14 प्रवक्ता हैं, जो आधिकारिक तौर पर मीडिया के समक्ष पार्टी का पक्ष रखेंगे. सपा से दो बार इटावा के सांसद रह चुके रघुराज सिंह शाक्य और पूर्व विधायक मलिक कमाल युसुफ जैसे वरिष्ठ नेता पहले ही मोर्चे में शामिल हो चुके हैं.
मुलायम मैनपुरी से लड़ेंगे, आज़मगढ़ शिफ्ट होंगे तेजू!
मैनपुरी के मौजूदा सांसद और लालू यादव के दामाद तेज प्रताप यादव अब मैनपुरी के बजाय आजमगढ़ से चुनाव लड़ सकते हैं. मैनपुरी से मुलायम सिंह यादव खुद चुनाव लड़ेंगे. समाजवादी पार्टी के निर्णय-निर्माताओं में से एक के काफी अंतरंग सपा नेता ने कहा कि समाजवादी पार्टी ने मुलायम को विश्राम की सलाह देकर मैनपुरी से तेज प्रताप यादव को ही लड़ाने का मन बना लिया था. लेकिन शिवपाल ने मुलायम को मोर्चा के टिकट पर मैनपुरी से चुनाव लड़ने का प्रस्ताव देकर सपा के निर्णय-निर्माताओं को पैर पीछे खींचने पर विवश कर दिया. अब बदली हुई स्थितियों में तेज प्रताप यादव को आजमगढ़ शिफ्ट किया जा सकता है. तेज प्रताप ने आजमगढ़ का दौरा शुरू भी कर दिया है और उनकी बोली भी बदली हुई सामने आ रही है. अब तेज प्रताप खुलेआम यह बयान दे रहे हैं कि शिवपाल यादव के समाजवादी पार्टी से अलग होने से पार्टी को काफी नुकसान होगा. तेज प्रताप के इस बयान के राजनीतिक निहितार्थ भी हैं.
सपाई ही कहते हैं कि तेज प्रताप के चुनाव लड़ने में सपा ने हीला-हवाली की तो वे समाजवादी सेकुलर मोर्चे में शामिल होकर चुनाव मैदान में उतर पड़ेंगे. मोर्चा कन्नौज में अखिलेश यादव के खिलाफ और बदायूं में धर्मेंद्र यादव के खिलाफ भी अपने प्रत्याशी उतारेगा. शिवपाल ने राजेश यादव को समाजवादी सेकुलर मोर्चे का कन्नौज लोकसभा का प्रभारी नियुक्त किया है. कन्नौज में अखिलेश यादव के खिलाफ सेकुलर मोर्चा ताकतवर मुस्लिम प्रत्याशी को मैदान में उतारने की तैयारी कर रहा है. मोर्चा ने कन्नौज को प्राथमिकता पर रखा है और वहां जल्दी ही मोर्चे का जिलाध्यक्ष भी नियुक्त कर दिया जाएगा.
Image may contain: 2 people, textछत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश के ज़रिए मायावती ने दिया अखिलेश-राहुल को संदेश
छत्तीसगढ़ में कांग्रेस को छोड़ कर अजित जोगी की पार्टी जनता कांग्रेस के साथ गठबंधन करके बसपा नेता मायावती ने उत्तर प्रदेश में गठबंधन की आस लगाए अखिलेश यादव और राहुल गांधी को 2019 का संकेत दे दिया है. मायावती ने यह भी कह दिया कि वे गठबंधन के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन दूसरी पार्टियों को भी अपना दिल बड़ा करना होगा. मायावती ने मध्य प्रदेश के विधानसभा चुनाव में भी कांग्रेस का हाथ नहीं पकड़ा और अकेले दम पर चुनाव लड़ने का ऐलान कर दिया है. ये दोनों घोषणाएं खास तौर पर समाजवादी पार्टी के लिए करारा झटका हैं, क्योंकि अखिलेशवादी समाजवादी पार्टी में अपने बूते लोकसभा चुनाव में उतरने का दम नहीं है.
सपा को गठबंधन का सहारा चाहिए. यही वजह है कि अखिलेश यादव गठबंधन को लेकर कुछ अतिरिक्त ही सक्रिय और बेचैन नजर आ रहे हैं. अखिलेश लगातार यह बयान दे रहे हैं कि वे ‘गठबंधन के लिए दो कदम पीछे हटने को तैयार हैं.’ राजनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि अखिलेश यादव की यह बेसब्री समाजवादी पार्टी के लिए भारी पड़ सकती है और पार्टी को डुबा भी सकती है. अखिलेश के इस बचकानेपन का फायदा राजनीतिक परिपक्वता से भरी मायावती उठा ले जाएंगी और अखिलेश देखते ही रह जाएंगे.
छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में बसपा के फैसले से अखिलेश का वह दावा भी धूमिल हो गया कि उत्तर प्रदेश में सपा, बसपा और कांग्रेस मिल कर गठबंधन बनाएंगे. छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में मायावती ने जिस तरह कांग्रेस को अपने से परे किया, उससे कांग्रेस बुरी तरह बिफरी हुई है. छत्तीसगढ़ के प्रभारी कांग्रेस नेता और यूपी की तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती के प्रमुख सचिव रहे पीएल पुनिया ने बसपा के ऐसे रवैये पर तीखी टिप्पणियां भी कर डालीं. लिहाजा, राजनीतिक प्रेक्षक भविष्य में बसपा और कांग्रेस के यूपी में हाथ मिलाने को लेकर आशंका जाहिर कर रहे हैं.

उनका मानना है कि अब अखिलेश और राहुल ही तालमेल की साइकिल चलाते नजर आएंगे, ऐसी ही संभावना है. आप याद करें राज्यसभा चुनाव के दरम्यान मायावती कह चुकी हैं, ‘अखिलेश यादव को राजनीति का कम अनुभव है. अगर मैं उनकी जगह होती तो अपने उम्मीदवार के बजाय बसपा उम्मीदार को जिताने की कोशिश करती.’ राज्यसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी के विधायकों की क्रॉस वोटिंग के चलते बसपा प्रत्याशी नहीं जीत पाया था, जबकि सपा के समर्थन के बल पर ही बसपा ने अपना एक प्रत्याशी खड़ा किया था. लेकिन अखिलेश यादव ने अपना पूरा ध्यान जया बच्चन को जिताने पर लगा दिया था.