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भाजपा नेता ने ममता को बताया पीएम पद का दावेदार

आगामी लोकसभा चुनावों के लिए राजनीतिक दलों की उल्टी गिनती शुरू हो चुकी है. महागठबंधन, तीसरा मोर्चा और इसी तरह की कई खबरें मीडिया में आ रही हैं. इसी बीच पश्चिम बंगाल के एक भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) नेता ने कहा है कि पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी में प्रधानमंत्री बनने की पूरी क्षमता है. यही नहीं भाजपा की पश्चिम बंगाल इकाई के अध्यक्ष दिलीप घोष ने तृणमूल अध्यक्ष ममता बनर्जी का जमकर महिमामंडन भी कर डाला. जिससे पूरी पार्टी में हड़कंप मचा दिया है.
भाजपा नेता ने ममता बनर्जी को जन्मदिन की शुभकामनाएं देते हुए कहा है कि, ‘वे उनकी अच्छी सेहत और जिंदगी में सफलता की दुआ करते हैं. क्योंकि हमारे राज्य का भविष्य उनकी कामयाबी पर निर्भर है. हम चाहते हैं कि वे फिट रहें ताकि वे राज्य में अच्छा काम कर सकें, उन्हें फिट रहने की आवश्यकता है क्योंकि अगर किसी बंगाली के प्रधानमंत्री बनने की संभावनाएं हैं तो उनमें वे ही एक हैं. अगर ऐसा होता है तो हमारे लिए गर्व की बात होगी.’’ ’
वहीं ममता बनर्जी ने 2019 में होने वाले लोकसभा चुनावों के लिए तैयारियां आरम्भ कर दी हैं. जब उनसे विपक्ष के पीएम दावेदार के बारे में सवाल किया गया तो उन्होंने कहा कि इसका निर्णय लोकसभा चुनाव के बाद ही लिया जाएगा. आपको बता दें कि कई विपक्षी पार्टियां राहुल गांधी को पीएम दावेदार बता रहे हैं.
महाराष्‍ट्र के मुख्‍यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने भी जनवरी 4 को प्रधानमंत्री पद को लेकर बयान दिया था. उनसे जब पूछा गया था कि क्‍या देश को 2050 तक महाराष्‍ट्र से कोई प्रधानमंत्री मिल सकता है, तो उन्‍होंने कहा हां, ऐसा बिलकुल होगा.
नागपुर में आयोजित मराठी जागरण सम्‍मेलन में महाराष्‍ट्र के मुख्‍यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने इस मुद्दे पर आगे बोलते हुए कहा था ‘अगर देश में किसी ने सच में शासन किया है तो वे महाराष्‍ट्र के लोग थे. हमारे अंदर शीर्ष पर पहुंचने की पूरी क्षमता है.’ उन्‍होंने कहा कि 2050 तक देश को महाराष्‍ट्र से एक से अधिक प्रधानमंत्री मिलेंगे.

टाइम्स नाउ सर्वे: जानिए अगर आज लोकसभा चुनाव हुए तो किसकी बनेगी सरकार, राज्यवार सीटों का पूरा विश्लेषण

Times Now Survey 2019पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव के बाद अब 2019 के लोकसभा चुनाव की चर्चा शुरु हो गई है। इन चुनावों को 2019 के सेमीफाइनल के तौर पर देखा जा रहा था। एक सवाल शायद हर किसी के मन में उठ रहा होगा कि यदि आज लोकसभा चुनाव होते हैं तो किसकी सरकार बनेगी? उत्तर प्रदेश में क्या भाजपा 2014 का करिश्मा दोहरा पाएगी? या बंगाल में भाजपा को उम्मीद से ज्यादा सीटें मिल सकती हैं? ऐसे बहुत सवाल हैं जो आम जन के मन में उठ रहे होंगे। इन्ही सवालों का जवाब जानने के लिए टाइम्स नाउ-सीएनएक्स ने मिलकर पूरे देश में एक सर्वे किया है, जिनमें हर राज्य का विश्लेषण किया है। इस सर्वे के मुताबिक यदि आज चुनाव होते हैं तो 543 लोकसभा सीटों में एनडीए के खाते में 281 सीटें, यूपीए के खाते 124 सीटें और अन्य के खाते में 138 सीटें जा सकती हैं।
राज्यवार सीटों का ब्यौरा
उत्तर प्रदेश
एनडीए को उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा नुकसान मिलता दिख रहा है यहां की 80 सीटों में से पिछली बार उसे 72 सीटें मिली थी जो टाइम्स नाउ-सीएनएक्स के सर्वे में यदि आज चुनाव होते हैं तो भाजपा को 55 सीटें मिलती दिख रही हैं जबकि को बसपा को 9, सपा को 9, कांग्रेस को 05 तथा अन्य खाते में 02 जीती दिख रही हैं।

महागठबंधन बनने की स्थिति में
यदि समाजवादी पार्टी, बसपा, कांग्रेस और आरएलडी का महागठबंधन होता है तो एनडीए को और ज्यादा नुकसान हो सकता है तब एनडीए के खाते में 31 महगठबंधन के खाते में 49 सीटें जा सकती हैं।
राजस्थान
टाइम्स नाउ-सीएनएक्स के सर्वे में राजस्थान में भाजपा को 13 सीटों का नुकसान हो रहा है। यहां की सभी 25 सीटों पर 2014 में भाजपा का कब्जा था लेकिन इस बार यदि आज चुनाव होते हैं भाजपा को यहां 12 तथा कांग्रेस को 13 सीटें मिल सकती हैं, यानि भाजपा को 13 सीटों को नुकसान हो रहा है। इस सर्वे के मुताबिक मध्य प्रदेश में भी भाजपा को खासा नुकसान होता दिख रहा है राज्य की 29 सीटों में 2014 में भाजपा का 27 सीटों पर कब्जा था जबकि कांग्रेस के पास मात्र 2 सीटें थी। इस बार यहां भाजपा को 20 और कांग्रेस के खाते में 9 सीटें मिलती दिख रही हैं।
मध्य प्रदेश
मध्य प्रदेश की कुल 29 सीटों में से भाजपा के खाते में यदि आज चुनाव होते हैं 20 सीटें मिलती हुई दिख रही हैं जबकि 2014 में भाजपा के खाते में 27 सीटें आईं थी। वहीं कांग्रेस को यहां 7 सीटों का फायदा मिलता दिख रहा है। कांग्रेस को यहां इस बार 9 सीटें मिल सकती हैं।
दिल्ली और जम्मू-कश्मीर
वहीं दिल्ली की सातों सीटों पर अगर आज चुनाव हुए तो वह भाजपा के खाते में जा सकती हैं। 2014 में भी भाजपा ने सातों सीटों पर कब्जा किया था। वहीं जम्मू-कश्मीर की 6 सीटों में से भाजपा को 2 सीटें मिल सकती हैं, जबकि कांग्रेस को एक, पीडीपी को एक तथा नेशनल कांन्फ्रेंस को 2 सीटें मिल सकती हैं।
महाराष्ट्र
महाराष्ट्र की 48 लोकसभा सीटों में अगर आज चुनाव हुए तो भाजपा को 30 सीटें मिल सकती है। कांग्रेस को 05 सीटें, शिवसेना को 08 सीटें और एनसीपी को 05 सीटें मिल सकती हैं।
बिहार और झारखंड
बिहार की बात करें तो राज्य में कुल 40 सीटें हैं और टाइम्स नाउ-सीएनएक्स के सर्वे के मुताबिक, यदि आज चुनाव होते हैं तो भाजपा को 15 और उसकी सहयोगी जेडीयू को 9 तथा आरजेडी को 10 और कांग्रेस को 1 तथा अन्य के खाते में 5 सीटें जाती हुई दिख रही हैं। झारखंड की कुल 14 सीटें में एनडीए को 8 तथा यूपीए को 5 और अन्य के खाते में 1 सीट जाती हुई दिख रही है।
गुजरात और छत्तीसगढ़
गुजरात ऐसा राज्य है जहां इस सर्वे के मुताबिक भाजपा को कोई नुकसान नहीं होता दिख रहा है। यहां भाजपा ने 2014 में सभी 26 सीटों पर जीत हासिल की थी जो इस बार भी बरकरार रह सकती हैं। सर्वे के मुताबिक, यदि आज चुनाव होते हैं तो इस बार भी कांग्रेस का कोई खाता नहीं खुलेगा। छत्तीसगढ़ की कुल 11 सीटों में से एनडीए के खाते में 7 तथा यूपीए के खाते में 4 सीटें जा सकती हैं।
हरियाणा
हरियाणा की कुल 10 लोकसभा सीटों में से भाजपा को 2014 में 7 सीटें मिली थी जबकि कांग्रेस के खाते में एक तथा आईएनएलडी के खाते में 2 सीटें गईं थी। इस सर्वे के मुताबिक,यदि आज चुनाव होते हैं तो भाजपा को 8, कांग्रेस तथा आईएनएलडी को 1-1 सीट मिल सकती हैं।
उत्तराखंड
वहीं पहाड़ी राज्यों की बात करें तो उत्तराखंड और हिमाचल में भी भाजपा को एक-एक सीट का नुकसान होता दिख रहा है। उत्तराखंड में भाजपा को पिछली बार सभी 5 सीटों पर जीत मिली थी। इस सर्वे के मुताबिक यदि आज चुनाव होते हैं तो भाजपा को एक सीट का नुकसान हो सकता है। जबकि एक सीट कांग्रेस के खाते में एक सीट जा सकती है।
हिमाचल प्रदेश
2014 में हिमाचल प्रदेश की सभी 4 सीटों पर भाजपा का कब्जा था लेकिन इस सर्वे के मुताबिक इस बार भाजपा को 3 तथा कांग्रेस को 1 सीट मिल सकती है।
पश्चिम बंगाल
पश्चिम बंगाल में यदि आज चुनाव होते हैं तो भाजपा को अच्छी सफलता मिल सकती है टाइम्स नाउ-सीएनएक्स के मुताबिक राज्य की 42 सीटों में से भाजपा के खाते में 8 सीटें जा सकती है जो 2014 के मुकाबले 6 ज्यादा हैं। टीएमसी को यहां 7 सीटों का नुकसान हो सकता है और 27 सीटें मिल सकती हैं। जबकि सीपीएम को 05, कांग्रेस को 02 मिल सकती हैं।
ओडिशा
वहीं ओडिशा में एनडीए को 5 सीटें तथा यूपीए को 0 और अन्य के खाते में 16 सीटें जा सकती हैं।
दक्षिण भारत
वहीं दक्षिण भारत की 132 सीटों जिसमें आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु, तेलंगाना, अंडमान निकोबार, लक्ष्यद्वीप और पुदुचेरी शामिल हैं, वहां में से एनडीए के खाते में यदि आज चुनाव होते हैं तो 19 सीटें, यूपीए की 45, टीडीपी की 8, टीआरएस की 13 तथा अन्य के खाते में 47 जाती हुई दिख रही हैं। यहां एनडीए को 2014 के मुकाबले 4 सीटों का नुकसान हो रहा है जहां उसे तब 23 सीटें मिली थीं। वहीं तब यूपीए को 24 सीटें मिली थी जो इस बार बढ़कर 45 होती दिख रही हैं। कर्नाटक की  कर्नाटक 28 सीटों में भाजपा को 15, कांग्रेस को 9 तथा जेडीएस को 4सीटें मिलती दिखत रही हैं।
पूर्वी भारत
पूर्वी भारत जिसमें पश्चिम बंगाल, ओडिशा, मिजोरम, नागालैंड, मेघालय आसाम, त्रिपुरा, मणिपुर, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश की कुल कुल 87 सीटें हैं वहां एनडीए को अच्छी खासी सफलता मिलती दिख रही है। 2014 में एनडीए को महज 12 सीटें मिली थी इस सर्वे में यदि आज चुनाव होते हैं तो एनडीए को 34 सीटें मिलती दिख रही हैं। जबकि यूपीए को 2014 के 14 सीटों के मुकाबले महज 4 सीटें मिलती दिख रही हैं। वहीं टीएमसी को 27 सीटें मिलती दिख रही हैं जबकि 2014 में टीएमसी को 34 सीटें मिली थीं। 2014 में 20 सीटें लाने वाली बीजेडी को 4 सीटों का नुकसान होता दिख रहा है और 16 सीटें इस सर्वे में मिल रही हैं। जबकि अन्य को 6 सीटें मिल रही है।



2019 में भाजपा के टिकट पर लोकसभा का चुनाव लड़ सकते हैं महेंद्र सिंह धोनी और गौतम गंभीर

MS Dhoni and Gautam Gambhir2019 के लोकसभा चुनाव के लिए भले ही अभी समय बाकि हो, लेकिन राजनीतिक दलों ने अपनी तैयारियां शुरू कर दी हैं।  इन सबके बीच एक बार फिर से यह खबर आ रही है कि टीम इंडिया के ओपनर रहे गौतम गंभीर भाजपा में शामिल होकर अपने गृह राज्य दिल्ली की किसी एक सीट लोकसभा का चुनाव लड़ सकते हैं। लेकिन इस लिस्ट में एक हैरान कर देने वाला नाम भी जुड़ रहा है और यह नाम किसी और का नहीं बल्कि टीम इंडिया के पूर्व कप्तान महेंद्र सिंह धोनी का है।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, भाजपा धोनी से लगातार संपर्क में है और वो झारखंड से चुनाव लड़ सकते हैं। इस रिपोर्ट्स के मुताबिक भाजपा इन दोनों क्रिकटरों की लोकप्रियता का लाभ उठाना चाहती है और देशभर में प्रचार करने की योजना बना रही है। दोनों खिलाड़ियों का क्रिकेट में शानदार योगदान रहा है और समाज के सभी वर्गों में इनकी लोकप्रियता भी रही है।
संडे गार्जियन की रिपोर्ट के मुताबिक, भाजपा नई दिल्ली लोकसभा सीट से मीनाक्षी लेखी की जगह गौतम गंभीर को टिकट दे सकती है। रिपोर्ट के मुताबिक, पार्टी को यह पता चला है कि लेखी के कार्यों से इस संसदीय क्षेत्र के लोग खुश नहीं है। गौतम गंभीर न केवल क्रिकेटर हैं बल्कि सामाजिक कार्यों में भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं।
धोनी अपनी कप्तानी में भारत को दो विश्व कप दिला चुके हैं। वहीं गंभीर भी टीम इंडिया के विश्व कप विजेता टीम के सदस्य रह चुके हैं और वर्तमान में दिल्ली की तरफ से घरेलू क्रिकेट खेल रहे हैं। गंभीर ने अपना अंतिम मैच नवंबर 2016 में खेला था। हाल ही में उन्होंने विजय हजारे ट्रॉफी में दिल्ली की कप्तानी करते हुए टीम को फाइनल में पहुंचाया था।

क्या, आम चुनाव 2019 से पहले AAP का पैसा खत्म?

आगामी 2019 लोकसभा चुनाव के लिए आम आदमी पार्टी ने चंदा जुटाने का प्लान बनाया है. पार्टी के मुखिया अरविंद केजरीवाल ने सोमवार को दिल्ली के तालकटोरा स्टेडियम में इस कैंपेन की शुरुआत की. इस कैंपेन के लिए “आप का दान, राष्ट्र का निर्माण” का नारा दिया गया है. इस सम्मेलन में देशभर से आए पार्टी के तमाम कार्यकर्ता, विधायक, सांसद, पार्षद और पदाधिकारी मौजूद रहे.
मोबाइल नंबर भी जारी
आम आदमी पार्टी के मुताबिक इस अभियान को  पूरे देश में चलाया जाएगा. चंदा जुटाने के लिए न सिर्फ सोशल मीडिया बल्कि घर – घर जाकर लोगों से हर महीने एक किस्‍त की तर्ज पर, पार्टी को चंदा देने की अपील की जाएगी. इस अभियान के लिए पार्टी ने एक मोबाइल नंबर  9871010101 जारी किया है. जो भी उस नंबर पर मिस कॉल करेगा, पार्टी द्वारा हायर कॉल सेंटर की तरफ से उस व्यक्ति को कॉल जाएगा और टीम उनसे चंदे के लिए संपर्क करेगी. पार्टी नेता गोपाल राय ने बताया कि आप की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य पृथ्वी रेड्डी इस अभियान के इंचार्ज होंगे. वहीं केजरीवाल ने कहा कि पूरे देश में मोबाइल नंबर 9871010101 का प्रचार किया जायेगा.
अवलोकन करें:--


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दिल्ली से लेकर कश्मीर और कश्मीर से कन्याकुमारी तक विपक्ष प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी के विरुद्ध कोई लगाए गए हर आरोप को सिद्ध करने में पूर्णरूप से नाकाम होने के कारण भाजपा अन्य नेताओं को मोहरा बनाने का प्रयत्न किया जा रहा है। प्रत्यक्ष को किसी प्रमाण की जरूरत नहीं होती। ऐसा भी नहीं है कि प्रधानमंत्री मोदी में कोई कमी नहीं है, गुजरात का मुख्यमन्त्री रहते मोदी ने केन्द्र सरकार के जिन निर्णयों का विरोध किया था, उन्हें ही सीढ़ी बनाकर सफलता की ओर अग्रसर हैं। दरअसल पिछली सरकार ने नि...
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आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार दिल्ली से भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के सांसद रमेश बिधूड़ी ने सोशल मीडिया पर उत्तर प्...

एक कॉल सेंटर हायर किया गया है. जो चंदा देने के लिए मिस्ड कॉल करने वालों को कॉल करेंगे. कॉल सेंटर से एक व्यक्ति उनके घर जाकर फॉर्म भरेगा और चंदा लेगा. केजरीवाल ने कहा कि आम आदमी पार्टी के हर एक कार्यकर्ता को अपने साथ ऐसे 5 लोगों को जोड़ना होगा जो पार्टी को हर महीने चंदा दें. केजरीवाल ने मंच से एलान किया कि वो अपनी सैलरी से 10 हजार रुपये, उनकी पत्नी और बेटी 5 हजार रुपये, इसके अलावा पिता हर महीने आम आदमी पार्टी को 500 रुपए का चंदा देंगे.
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जिसकी जितनी श्रद्धा है उतना चंदा दे
केजरीवाल का मानना है कि आम आदमी पार्टी में अब तक व्यवस्थित तरीके से चंदा नहीं लिया जाता था लेकिन होम डिलीवरी और मोहल्ला क्लीनिक की तरह आम आदमी पार्टी का नया चंदा अभियान भी दुनिया में एक मॉडल बनेगा. उन्‍होंने कहा कि आम आदमी पार्टी को चुनाव लड़ने के लिए पैसा चाहिए. हर पार्टी वॉलेंटियर का धर्म है कि कम से कम 100 रु महीना चंदा दे. जिसकी जितनी श्रद्धा है उतना चंदा दे. इसके अलावा वॉलेंटियर के परिवार को भी चंदा देना होगा. दिल्ली के जिन  लोगों को लगता है, शिक्षा बेहतर हुई वो पैरेंट्स 100 रु का चंदा दें ताकि हम ऐसे ही ईमानदारी से काम करें. जिन लोगों के बिजली बिल कम हुए वो भी पार्टी को चंदा दें. जिनका मोहल्ला क्लीनिक या अस्पताल में इलाज हुआ, वो हर महीने पार्टी को चंदा दें.
 दिल्ली सरकार में डिप्टी सीएम मनीष सिसोदिया भी कार्यकर्ताओं से चंदे की अपील करते नजर आए. उन्होंने कहा कि सरकार के पास पैसे की कमी नहीं बल्कि पार्टी में पैसे की कमी है. जंतर-मंतर में लोग गांव गांव से चंदा लेकर आते थे. अब उसी जनता के बीच जाकर चंदा मांगेंगे. इतना तय है कि देश की राजनीति दलाली के चंदे से नहीं चलेगी.  
राज्यसभा सांसद संजय सिंह ने बताया कि अलग-अलग राजनीतिक दलों में चंदा लेने की अपनी तकनीक है.  वाम पंथी दल के छोटे से छोटे कर्मचारी और विधायक भी अपनी सैलरी का एक हिस्सा चंदे के रूप में जमा करते हैं.  कैंपेन लांच के दौरान संजय सिंह ने अपनी सैलरी से 21 हजार रुपये पार्टी को चंदा देने का एलान भी किया है.  साथ ही संजय सिंह के नौकरी से रिटायर्ड माता-पिता भी पार्टी को चंदा देंगे.  दिल्ली संयोजक और मंत्री गोपाल राय ने कहा कि कुछ राजनीतिक दल सत्ता बनने के बाद सत्ता के पैसे से पार्टी चलाते हैं लेकिन आम आदमी पार्टी समर्थकों को राष्ट्र निर्माण के लिए एक परिवार की तरह पार्टी का ख्याल रखना होगा और ‘भिक्षामि देहि’ अभियान चलाना होगा.  

आम आदमी पार्टी के मुताबिक ये अभियान RBI द्वारा लागू E NACH फॉर्म के तहत होगा. टीम इसके तहत सहयोग राशि देने वालों से संपर्क करके ये फॉर्म भरवाएगी और मासिक सहायता लेगी. अगर कोई एक बार ही सहयोग करना चाहता है तो वो चेक ये क्रेडिट कार्ड से कर सकता. साथ ही अगर कोई कैश में सहयोग करना चाहता है तो 2000 की राशि तक सहयोग कर सकता है. कैश और एक बार सहायता देने वालों से भी पार्टी ENACH फॉर्म भरवाएगी. जो भी पार्टी को सहयोग राशि देगा उन्हें SMS, ई मेल या अन्य माध्यम से रसीद भी भेजी जाएगी. 

मिशन 2019ः दिल्ली जीतने के लिए AAP-BJP के खिलाफ कांग्रेस सोशल मीडिया पर सक्रिय

दिल्ली में फिर से अपने पांव पर खडे़ होने की कोशिश कर रही कांग्रेस सोशल मीडिया पर भी जमीन मजबूत करेगी। इसके लिए जल्द ही बाकायदा कार्यकारिणी घोषित की जाएगी। सातों लोकसभा क्षेत्रों से लेकर ब्लॉक और बूथ स्तर तक की यह कार्यकारिणी एक ओर ट्विटर, फेसबुक और वाट्सएप ग्रुप कांग्रेस के खिलाफ डाली जाने वाली पोस्ट की काट करेगी, वहीं दूसरी ओर कांग्रेस के पक्ष में माहौल भी बनाएगी।
सोशल मीडिया की टीम इसी माह घोषित कर दी जाएगी। सात लोकसभा अध्यक्ष, 70 विधानसभा अध्यक्ष, 280 ब्लॉक अध्यक्ष एवं हर बूथ पर भी एक एक अध्यक्ष घोषित किया जाएगा। तय रणनीति के तहत सोशल मीडिया टीम के सभी अध्यक्ष और कार्यकर्ता ऐसी हर पोस्ट पर निगाह रखेंगे जोकि कांग्रेस के खिलाफ हो। उस पोस्ट का सोशल मीडिया के ही जरिये प्रतिवाद किया जाएगा। जनता के सामने उसकी सच्चाई रखी जाएगी।

इसके अतिरिक्त सोशल मीडिया पर आए दिन कुछ ऐसी पोस्ट डाली जाएंगी जो कांग्रेस के पक्ष में प्रचार करेंगी। दिल्ली में कांग्रेस के 15 साल लंबे कार्यकाल की उपलब्धि पर पोस्ट डाली जाएंगी, आम आदमी पार्टी और भाजपा के चुनावी वादों की कलई खोलने वाली और उनके हर झूठ को सामने लाने वाली पोस्ट भी डाली जाएंगी।
विभिन्न वाट्सएप ग्रुप के जरिये पार्टी के हर संदेश को भी चुटकियों में प्रदेश से लेकर बूथ स्तर तक फैलाया जाएगा। साथ ही यह टीम सोशल मीडिया पर उस संघर्ष को सामने लाएगी जो पार्टी फिलहाल सत्ता से बाहर रहते हुए कर रही है। मसलन, सीलिंग के खिलाफ चल रहा न्याययुद्ध। जनता के सामने विभिन्न राष्ट्रीय एवं स्थानीय मुद्दे भी रखे जाएंगे।
अनिरुद्ध शर्मा, (अध्यक्ष, आइटी प्रकोष्ठ, प्रदेश कांग्रेस) का कहना है कि सोशल मीडिया पर सक्रियता आज राजनीति का अनिवार्य अंग बन गई है। बहुत जल्द प्रदेश कांग्रेस भी इस दिशा में पूर्णतया सक्रिय नजर आएगी। खास बात यह कि हम औरों की तरह अभद्र पोस्ट नहीं डालेंगे।

चुनाव 2019 : गठबंधन में गले की हड्डी बना शिवपाल का ‘मोर्चा’

क्या 2019 के लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पुनः  विजयी होंगे ..?
अकेला मोदी, सब पर भारी  
आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
2019 में नरेन्द्र मोदी को मात देने को हर कोई लगा हुआ है, लेकिन अपने अस्तित्व को भी कोई नहीं खोना चाहता। हर कोई अपनी ढपली अपना राग करने में व्यस्त हैं। कोई अपना अहम् त्यागने को तैयार नहीं। दूसरे अर्थों में यह भी कहा जा सकता है कि "गांव बसा नहीं, लुटेरे पहले आ गए।"
शिवपाल सिंह यादव के समाजवादी सेकुलर मोर्चे ने उत्तर प्रदेश में विपक्षी राजनीति का समीकरण गड्‌डमड्‌ड कर दिया है। समाजवादी पार्टी का भविष्य देखते हुए बसपा नेता मायावती ने गठबंधन के भविष्य को ही अधर में रख दिया है। मायावती अब अकेले दम पर लोकसभा चुनाव में उतरने का मन बना रही हैं। हालांकि घबराए अखिलेश यादव बसपा का पिछलग्गू बनने को भी तैयार हैं। चुनावी समीकरण बिगाड़ने के लिए भीम सेना के प्रमुख चंद्रशेखर भी ‘मैदाने जंग’ में उतर आए हैं। अब चंद्रशेखर भी मायावती को बुआ कहने लगे हैं। चुनावी समीकरण में दो नेताओं की बुआ के रूप में मायावती फिट नहीं बैठ रहीं, इसे भांपते-समझते हुए मायावती ने साफ-साफ कह ही दिया कि राजनीति में उनका कोई भाई-भतीजा नहीं है और वे किसी की बुआ नहीं हैं।छत्तीसगढ़ में अजित जोगी की पार्टी जनता कांग्रेस के साथ ‘अप्रत्याशित’ गठबंधन करके और मध्य प्रदेश में अकेले चुनाव लड़ने का ऐलान करके मायावती ने कांग्रेस को भविष्य का संदेश दे दिया है। यह संदेश उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव के लिए भी है।
फांसों में फंसा गठबंधन 
मायावती ने छत्तीसगढ़ ऐलान के पहले यूपी में गठबंधन को लेकर जो बयान दिया था उससे घबराए अखिलेश यादव ने फौरन ही यह कह कर बात संभालने की कोशिश की थी कि समाजवादी पार्टी गठबंधन के लिए दो कदम पीछे हटने के लिए भी तैयार है। छत्तीसगढ़ ‘डेवलपमेंट’ के बाद अब अखिलेश कितने कदम पीछे हटेंगे, इस बारे में उनका बयान आना अभी बाकी है। अखिलेश ने उस समय यह भी कहा था कि भाजपा जैसी साम्प्रदायिक पार्टी को हराने के लिए सभी दलों को एक साथ आगे आना चाहिए। अखिलेश यादव यह बयान देकर फंस गए, क्योंकि फौरन ही शिवपाल ने कह दिया कि साम्प्रदायिक शक्तियों के खिलाफ लड़ाई तभी सच्ची मानी जा सकती है, जब गठबंधन में समाजवादी सेकुलर मोर्चे को भी शामिल किया जाए। सीटों को लेकर सपा, बसपा और कांग्रेस में खींचतान चल ही रही थी कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अधिक सीटें देने की राष्ट्रीय लोकदल की मांग शामिल हो गई। इसके बाद अब समाजवादी सेकुलर मोर्चे को भी गठबंधन में शामिल करने की सेकुलर-सैद्धांतिक-अनिवार्यता फांस बन गई है।
इस सन्दर्भ में अवलोकन करें:--

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आर.बी.एल.निगम,वरिष्ठ पत्रकार मध्यप्रदेश में कांग्रेस के साथ गठबंधन न होने के लिए…
पत्नी सरला यादव के पास एक करोड़ 72 लाख 24 हजार 27 रुपये मूल्य की सकल चल और बाजार मूल्य के हिसाब से 4 करोड़ एक लाख 69 हजार 961 की अचल संपत्ति है। इसके अलावा प्रत्याशी शिवपाल सिंह यादव ने हिंदू अनडिवाइडेड फैमिली (एचयूएफ) के रूप में कुल 24 लाख 72 हजार 36 रुपये की सकल चल और बाजार मूल्य के तौर पर एक करोड़ 69 लाख 14 हजार 647 रुपये कीमत की अचल संपत्ति होने की जानकारी दी है।
उनके पास साढ़े 28 हजार रुपये की नगदी है। उनके इटावा स्थित बैंक ऑफ बड़ौदा, जिला कोऑपरेटिव बैंकों समेत लखनऊ की स्टेट बैंक ब्रांच में 60 लाख रुपये जमा हैं। पत्नी के बैंक खातों में साढ़े 17 लाख रुपये और एचयूएफ के बैंक खातों में करीब 13.95 लाख जमा है। शिवपाल के पास 60 लाख की एफडीआर और पत्नी के नाम 30 लाख की फिक्स डिपाजिट है। श्री यादव के पास पजेरो गाड़ी और दो अंगूठी हैं। जबकि पत्नी के पास 10 लाख 65 हजार 816 रुपये के जेवर हैं।


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यूपी सरकार में कद्दावर मंत्री रहे शिवपाल सिंह यादव की पत्नी सरला उनसे भी ज्यादा रईस हैं। नामांकन पत्र के साथ प्रस्...

किसी भी दल में अकेले चुनाव लड़ने की हैसियत नहीं --शिवपाल यादव  
समाजवादी सेकुलर मोर्चा के नेता शिवपाल सिंह यादव ने गठबंधन-तार पर अपना कटिया-कनेक्शन यह कहते हुए फंसा दिया कि समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी और कांग्रेस यदि असलियत में साम्प्रदायिक शक्तियों से लड़ना चाहती हैं, तो उन्हें समाजवादी पार्टी सेकुलर मोर्चे को भी गठबंधन में शामिल करना होगा। शिवपाल ने अखिलेश से भी कहा कि साम्प्रदायिक शक्तियों से उनकी लड़ाई प्रामाणिक तभी मानी जाएगी जब गठबंधन में मोर्चे को भी शामिल करने के लिए वे पहल करें। शिवपाल ने सपा और बसपा को चेतावनी भी दे डाली कि अगर समाजवादी सेकुलर मोर्चा को गठबंधन में शामिल नहीं किया गया तो मोर्चा अपने बूते पर चुनाव लड़ कर उन सीटों को तो जीत ही लेगा जो तालमेल में सपा द्वारा या बसपा द्वारा छोड़ी जाएंगी। गठबंधन में शामिल करने का प्रस्ताव उछालने वाले शिवपाल हालांकि पहले यह कह चुके हैं कि समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी का गठबंधन उसूलों का भटकाव है। लेकिन अब शिवपाल कह रहे हैं कि उत्तर प्रदेश में चाहे सपा-बसपा गठबंधन हो या कोई दूसरा गठबंधन, अब मोर्चा को दरकिनार कर या उसकी उपेक्षा कर कोई भी दल इस हैसियत में नहीं कि वह चुनाव लड़ सके और सरकार बना सके।
Image result for चंद्रशेखर 'रावण'गठबन्धन को 40 से 50 सीटों पर सीधा नुकसान 
गठबंधन को ‘प्रेशर’ में लाने के लिए शिवपाल ने प्रदेश भर के छोटे-छोटे दलों से बातचीत करने और उन्हें मोर्चे की तरफ करने की कवायद तेज कर दी है। इसके लिए उन्होंने शरद यादव समेत कई वरिष्ठ नेताओं से बातचीत भी की और बामसेफ के सम्मेलन में हिस्सा लेने फैजाबाद भी गए। शिवपाल बसपा और कांग्रेस से भी बात करेंगे और गठबंधन में मोर्चा को शामिल करने की सेकुलर-सैद्धांतिक-अनिवार्यता बताएंगे। शिवपाल कहते हैं कि फिर भी अगर मोर्चे को गठबंधन में शामिल करने से वे परहेज करते हैं, तो वे नुकसान झेलने के लिए तैयार रहें।शिवपाल दावा करते हैं कि समाजवादी सेकुलर मोर्चा गठबंधन में शामिल नहीं हुआ तो गठबंधन को 40 से 50 सीटों पर सीधा नुकसान पहुंचेगा। शिवपाल राजधानी लखनऊ में शीघ्र ही मोर्चे का विशाल सम्मेलन आयोजित करने की तैयारी में हैं।
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चले थे साथ मिलकर, तुम्हे रुकना पड़ेगा,
 मेरी आवाज़ सुनकर  ...
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तेरा जाना दिल के अरमानों का लुट जाना ....
शिवपाल राजनीति में अपनी प्रभावशाली जमीन तैयार करने की जद्दोजहद में लगे हैं। उनकी दूरंदेशी है कि वे मुलायम सिंह यादव का चेहरा अपने साथ लेकर चल रहे हैं। शिवपाल समाज में यह संदेश दे रहे हैं कि पुत्र होते हुए अखिलेश ने मुख्यमंत्री बनते ही पिता मुलायम को हाशिए पर रख दिया, लेकिन वे भाई होते हुए मुलायम को अपना सिरमौर बना कर चलना चाहते हैं। इसी इरादे से शिवपाल ने समाजवादी मोर्चे का अध्यक्ष पद मुलायम सिंह यादव के लिए रखा है। शिवपाल खुद को समाजवादी सेकुलर मोर्चे का संयोजक बताते हैं और साफ-साफ कहते हैं कि अध्यक्ष का पद नेता जी के लिए है। शिवपाल ने मुलायम सिंह यादव के समक्ष समाजवादी सेकुलर मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने का प्रस्ताव रखा है।
मुलायम सिंह और साधना गुप्ता की एक संतान है जिनका नाम प्रतीक यादव है।
काँटा लगा, हाय लगा ...
यह भी चर्चा सुनने को आ रही है कि अपनी ज़मीन खिसकती देख वापस पिता की गोद में बैठ जाएं। लेकिन मुलायम सिंह की दूसरी पत्नी साधना यादव(गुप्ता) संभव है, कोई अड़चन डाल दे। क्योकि अगर बाप-बेटे एक होते हैं, तो अमर सिंह को मुलायम अपने साथ ला सकते हैं। लेकिन आज़म खान और अखिलेश का अमर सिंह के साथ 36 का आंकड़ा है।
शिवपाल का कहना है कि मोर्चे का गठन नेताजी से बातचीत करने और उनका आशीर्वाद लेने के बाद ही किया गया। राजनीतिक पंडितों का भी मानना है कि शिवपाल का यह कदम राजनीतिक दूरदृष्टि से भरा है, क्योंकि अगर मुलायम ने मोर्चे का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनना स्वीकार कर लिया, तो खेल एकतरफा हो जाएगा। मुलायम के आते ही समाजवादी पार्टी में भगदड़ जैसी स्थिति हो जाएगी। शिवपाल भी कहते हैं कि नेता जी अगर मान गए, तो समाजवादी पार्टी में उपेक्षित नाराज नेता-कार्यकर्ता सब नेता जी की छाया में मोर्चे के साथ चले आएंगे। शिवपाल ने मुलायम सिंह यादव को मोर्चा के प्रत्याशी के रूप में मैनपुरी लोकसभा चुनाव में उतरने का भी प्रस्ताव दे रखा है। शिवपाल ने कहा कि नेता जी मैनपुरी से मोर्चे के प्रत्याशी होंगे।
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एक तेरा साथ, हमें दो जहाँ से प्यारा है.....
शिवपाल यह भी कहते हैं कि अगर वे समाजवादी पार्टी से भी चुनाव लड़ते हैं, तो मोर्चा उनका समर्थन करेगा और उनके खिलाफ कोई प्रत्याशी नहीं खड़ा करेगा। यह राजनीतिक दूरदृष्टि ही है कि जहां समाजवादी पार्टी के पोस्टर-बैनरों से मुलायम सिंह का चेहरा हटता गया, वहीं समाजवादी सेकुलर मोर्चे के झंडों, बैनरों और पोस्टरों पर मुलायम की तस्वीर प्रमुखता से लगी है। शिवपाल ने पिछले दिनों अपनी नई राजनीतिक पार्टी समाजवादी सेकुलर मोर्चा का औपचारिक झंडा भी जारी किया। इस झंडे पर एक तरफ शिवपाल हैं, तो दूसरी तरफ मुलायम।शिवपाल और उनके समर्थकों की गाड़ियों पर अब समाजवादी सेकुलर मोर्चा का झंडा लग गया है। राजनीति के मैदान में शिवपाल की यह नई पारी तो है, लेकिन उन्होंने मुलायम के साथ रहकर राजनीति के दाव-पेंच सीखे हैं।अब शिवपाल के लिए उसे आजमाने और परखने का समय है.
थोड़ी बहुत सियासत समझने वाले लोग भी यह जानते हैं कि समाजवादी सेकुलर मोर्चे का जन्म किन वजहों से हुआ है। मुख्यमंत्री बनने के बाद अखिलेश यादव ने शिवपाल यादव के साथ जैसा व्यवहार किया और जिस तरह उनका राजनीतिक भविष्य चौपट करने की कोशिश की, उससे इतना तो जाहिर ही है कि समाजवादी सेकुलर मोर्चा कोई समाजवादी पार्टी को मजबूत करने के लिए नहीं बना है। चुनावी गणितज्ञों का भी मानना है कि मोर्चा सीटें जीते न जीते, लेकिन समाजवादी पार्टी को नुकसान तो पहुंचाएगा ही।
जब लोकदल से अलग होकर मुलायम सिंह ने बनाई थी समाजवादी पार्टी 
अखिलेश यादव ने समाजवादी पार्टी का स्वयंभू राष्ट्रीय अध्यक्ष बनते ही जिस तरह मुलायम और शिवपाल समर्थकों को किनारे लगाया और बाहर का रास्ता दिखाया, वह नाराज और उपेक्षित जमात आज शिवपाल के साथ खड़ी है और निश्चित तौर पर वह जमात अपना बदला साधेगी। ऐसी ही उपेक्षा से आहत होकर मुलायम सिंह यादव ने भी लोकदल से अलग होकर समाजवादी पार्टी बनाई थी। उस समय भी मुलायम के राजनीतिक भविष्य पर लोग सवाल खड़े करने लगे थे और तमाम आशंकाएं जताने लगे थे, लेकिन मुलायम के नेतृत्व में समाजवादी पार्टी ने राजनीतिक कामयाबियां पाईं और अपनी ठोस पहचान कायम की. मुलायम सिंह से जुड़े एक वरिष्ठ नेता ने कहा कि आज शिवपाल ने भी मोर्चा बना कर मुलायम का ही अनुकरण किया है।
इस प्रशिक्षण का ही असर है कि समाजवादी सेकुलर मोर्चे के ऐलानिया मैदान में उतरने के बाद से समाजवादी पार्टी में सन्नाटा व्याप्त है। अखिलेश यह दिखाने की पूरी कोशिश कर रहे हैं कि मोर्चे से सपा की सेहत पर कोई असर नहीं पड़ने वाला, लेकिन असलियत यही है कि सपा में बेचैनी है। यह ध्यान में रखना जरूरी है कि उत्तर प्रदेश में करीब आठ प्रतिशत यादव मतदाता हैं और पिछड़ी जाति में लगभग 20 फीसदी हिस्सेदारी यादवों की है। मायावती और अखिलेश की ‘बुआ-बबुआ पॉलिटिक्स’ यादव समुदाय को कभी भी रास नहीं आई और न पारम्परिक यादव समाज ने भतीजे के हाथों चाचा के अपमान को ही हजम किया।
मुलायम को अपदस्थ कर अखिलेश का अध्यक्ष बनना भी यादव समाज को गवारा नहीं हुआ. ऐसे में शिवपाल के उस बयान में दम है कि समाजवादी सेकुलर मोर्चे के सहयोग के बिना देश में अगली सरकार बनाना संभव नहीं होगा. शिवपाल ने कहा कि समाजवादी पार्टी को खड़ा करने में उन्होंने भी बड़े कष्ट झेले हैं, बड़ी मेहनत और जद्दोजहद की है, लेकिन उन्हें ही लगातार अपमान झेलना पड़ा. 29 अगस्त 2018 को समाजवादी सेकुलर मोर्चे के गठन की औपचारिक घोषणा के बाद शिवपाल को मिलते भारी जन-समर्थन से अखिलेश यादव को अपनी सियासी जमीन हिलती महसूस हुई. अखिलेश ने समाजवादी सेकुलर मोर्चे के गठन को भारतीय जनता पार्टी की साजिश कहना शुरू कर दिया, लेकिन अखिलेश की ऐसी प्रतिक्रिया को कोई तरजीह नहीं मिली. राजनीतिक विश्लेषकों का भी यह कहना है कि 2019 के लोकसभा चुनाव में शिवपाल यादव के समाजवादी सेकुलर मोर्चे की अहम भूमिका रहेगी. समाजवादी पार्टी में शिवपाल की छवि जनप्रिय नेता की रही है.
समाजवादियों पर मुलायम के बाद शिवपाल की ही सबसे अच्छी पकड़ है. इसीलिए मोर्चे को विस्तार लेने में अधिक मुश्किलें पेश नहीं आ रही हैं. राजनीति के जानकार भी यह मानने लगे हैं कि समाजवादी सेकुलर मोर्चा आगामी चुनावों में हार-जीत के समीकरणों को बदलेगा और समाजवादी पार्टी का समानान्तर विकल्प बनेगा. मुलायम सिंह के नजदीक रहकर सियासी दावपेंच गहराई से सीख चुके शिवपाल ने सटीक मौके पर मोर्चे का ऐलान किया और मुस्लिम मतदाताओं को अपने साथ जोड़े रखने के लिए भाजपा में जाने का प्रस्ताव ठुकरा दिया. शिवपाल के इस कदम से सियासी जगत में यह संदेश भी गया कि समाजवादी सेकुलर मोर्चा मुलायम के सिखाए रास्ते पर चल पड़ा है और भविष्य में मुलायम खुद भी सेकुलर मोर्चा से जुड़ सकते हैं.
मोर्चे से बौखलाई सपा, सस्ते बयान पर उतरे अखिलेश के समर्थक
समाजवादी सेकुलर मोर्चे के अस्तित्व में आने से समाजवादी पार्टी इतनी बौखला गई कि अखिलेश यादव के समर्थक शिवपाल यादव पर सस्ते आरोपों पर उतर आए. अखिलेश के करीबी पूर्व मंत्री पवन पांडेय ने शिवपाल पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए और तीखा प्रहार किया. मोर्चा ने इसके जवाब में कहा कि अखिलेश और पवन जैसे नेताओं के कारण ही समाजवादी पार्टी का यह हश्र हुआ है. मोर्चा के प्रवक्ता दीपक मिश्र और अभिषेक सिंह आशू ने कहा कि मोर्चा बनने से घबराई समाजवादी पार्टी शिवपाल सिंह यादव की छवि धूमिल करने की कोशिश कर रही है.
मोर्चा प्रवक्ता कहते हैं कि शिवपाल यादव के प्रयासों से ही राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा को रोकने के लिए महागठबंधन बना था. इसमें पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवगौड़ा, पूर्व सांसद शरद यादव, राजद नेता लालू यादव और रालोद नेता अजित सिंह जैसे नेताओं ने भी मुलायम सिंह यादव को अपना अध्यक्ष मान लिया था. इस महागठबंधन को अखिलेश यादव और उनके गुरु रामगोपाल यादव ने महज इसलिए तोड़ डाला, क्योंकि वे सब यादव सिंह के महा भ्रष्टाचार के कीचड़ में सने थे और उन्हें भाजपा से डर लग रहा था. अगर अखिलेश और रामगोपाल महागठबंधन को नहीं तोड़ते तो मुलायम प्रधानमंत्री पद के लिए सर्व-स्वीकार्य नेता होते. उसका श्रेय शिवपाल यादव को ही मिलता. पिता ने पुत्र को मुख्यमंत्री बनाया, लेकिन पुत्र ने उसी पिता को कहीं का नहीं छोड़ा.
समाजवादी पार्टी छोड़ कर समाजवादी सेकुलर मोर्चा में शामिल हुए सपा की राज्य कार्यकारिणी व समाजवादी युवजन सभा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के पूर्व सदस्य और लखीमपुर खीरी स्थित निघासन से जिला पंचायत सदस्य राजीव गुप्ता ने कहा कि समाजवादी पार्टी डॉ. राम मनोहर लोहिया जैसे महापुरुषों के सिद्धांतों पर चलने वाली पार्टी रही है, लेकिन अखिलेश यादव में उस महान थाती को संभाल कर रख पाने की योग्यता नहीं थी.
जिस डाल पर वे बैठे थे उसे ही काट डाला और पूरी पार्टी को नष्ट कर डाला. रामगोपाल यादव की शह पर अखिलेश ने अपने पिता मुलायम सिंह यादव और चाचा शिवपाल सिंह यादव को अपमानित करने का अमर्यादित आचरण किया, जिसका खामियाजा उन्हें भुगतना पड़ रहा है. प्रदेश की जनता इस आचरण के लिए अखिलेश को कभी माफ नहीं करेगी. राजीव गुप्ता कहते हैं कि 2017 के विधानसभा चुनाव में उन्हें निघासन विधानसभा सीट से चुनाव लड़ने के लिए सपा का टिकट मिला था, लेकिन अखिलेश यादव ने उनका टिकट महज इसलिए काट दिया क्योंकि वे शिवपाल यादव के समर्थक थे. अखिलेश ने ईर्ष्या में निघासन की जीती हुई सीट भी गंवा दी. सेकुलर मोर्चा के आने से प्रदेश में परिपक्व राजनीति का नया अध्याय खुलेगा और समाज के सभी समुदाय के लोग शिवपाल यादव के नेतृत्व में एकजुट होंगे.
… और मुलायम को राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाने को राज़ी नहीं ही हुए अखिलेश
आखिरी वक्त में मुलायम ने अखिलेश और शिवपाल में सुलह कराने की कोशिश की थी, लेकिन शिवपाल ने मुलायम का दाव मुलायम के ही हवाले कर दिया. शिवपाल ने सुलह की शर्त यह रखी थी कि मुलायम को राष्ट्रीय अध्यक्ष और उन्हें प्रदेश अध्यक्ष बनाया जाए. लेकिन अखिलेश यादव ने यह शर्त नहीं मानी और सुलह वार्ता फेल हो गई.
मुलायम सिंह ने अपने आवास पर ही अखिलेश और शिवपाल की सुलह-बैठक बुलाई थी. पहले तो परिवार के सदस्य ही बैठक में शामिल थे, लेकिन थोड़ी देर बाद ही सपा नेता आजम खान और अखिलेशवादी समाजवादी पार्टी के कोषाध्यक्ष संजय सेठ भी वहां पहुंच गए. अखिलेश यादव शिवपाल यादव को सपा का प्रदेश अध्यक्ष बनाने के लिए तैयार थे, लेकिन मुलायम को राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाने की शर्त उन्हें मंजूर नहीं हुई.
अखिलेश अपने पिता को दोबारा राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाए जाने के लिए कतई तैयार नहीं थे. नतीजतन सुलह-वार्ता बेनतीजा समाप्त हो गई. बाद में मुलायम ने यह कहते हुए बात संभाली कि वे खुद राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के लिए इच्छुक नहीं हैं. बैठक में अखिलेश ने शिवपाल को पार्टी से निकाले जाने की धमकी भी दी थी, लेकिन इस धमकी का कोई असर नहीं दिखा. शिवपाल ने नई पार्टी की घोषणा भी कर दी, लेकिन अखिलेश अब तक शिवपाल यादव को समाजवादी पार्टी से निष्कासित नहीं कर पाए हैं.
नौरत्नों के बाद शिवपाल ने जोड़े पांच पांडव
समाजवादी सेकुलर मोर्चा के संयोजक शिवपाल सिंह यादव ने मोर्चे का औपचारिक ऐलान करने के बाद ही अपने नौ प्रवक्ताओं के मनोनयन की सूची जारी कर दी थी. 20 सितम्बर को शिवपाल ने फिर पांच प्रवक्ताओं का मनोयन किया और 14 प्रवक्ताओं की फौज खड़ी कर ली.
मोर्चे के गठन के बाद शिवपाल ने पूर्व मंत्री शारदा प्रताप शुक्ल और पूर्व मंत्री शादाब फातिमा को मोर्चे का प्रवक्ता मनोनीत किया था. इनके अलावा दीपक मिश्र, नवाब अली अकबर, सुधीर सिंह, प्रो. दिलीप यादव, अभिषेक सिंह आशू, मोहम्मद फरहत रईस खान और अरविंद यादव भी मोर्चा के प्रवक्ता बनाए गए थे. प्रवक्ताओं की दूसरी लिस्ट में मोहम्मद शाहिद, अरविंद विद्रोही, देवेंद्र सिंह, राजेश यादव और इरफान मलिक के नाम शामिल हैं. अब समाजवादी सेकुलर मोर्चा के 14 प्रवक्ता हैं, जो आधिकारिक तौर पर मीडिया के समक्ष पार्टी का पक्ष रखेंगे. सपा से दो बार इटावा के सांसद रह चुके रघुराज सिंह शाक्य और पूर्व विधायक मलिक कमाल युसुफ जैसे वरिष्ठ नेता पहले ही मोर्चे में शामिल हो चुके हैं.
मुलायम मैनपुरी से लड़ेंगे, आज़मगढ़ शिफ्ट होंगे तेजू!
मैनपुरी के मौजूदा सांसद और लालू यादव के दामाद तेज प्रताप यादव अब मैनपुरी के बजाय आजमगढ़ से चुनाव लड़ सकते हैं. मैनपुरी से मुलायम सिंह यादव खुद चुनाव लड़ेंगे. समाजवादी पार्टी के निर्णय-निर्माताओं में से एक के काफी अंतरंग सपा नेता ने कहा कि समाजवादी पार्टी ने मुलायम को विश्राम की सलाह देकर मैनपुरी से तेज प्रताप यादव को ही लड़ाने का मन बना लिया था. लेकिन शिवपाल ने मुलायम को मोर्चा के टिकट पर मैनपुरी से चुनाव लड़ने का प्रस्ताव देकर सपा के निर्णय-निर्माताओं को पैर पीछे खींचने पर विवश कर दिया. अब बदली हुई स्थितियों में तेज प्रताप यादव को आजमगढ़ शिफ्ट किया जा सकता है. तेज प्रताप ने आजमगढ़ का दौरा शुरू भी कर दिया है और उनकी बोली भी बदली हुई सामने आ रही है. अब तेज प्रताप खुलेआम यह बयान दे रहे हैं कि शिवपाल यादव के समाजवादी पार्टी से अलग होने से पार्टी को काफी नुकसान होगा. तेज प्रताप के इस बयान के राजनीतिक निहितार्थ भी हैं.
सपाई ही कहते हैं कि तेज प्रताप के चुनाव लड़ने में सपा ने हीला-हवाली की तो वे समाजवादी सेकुलर मोर्चे में शामिल होकर चुनाव मैदान में उतर पड़ेंगे. मोर्चा कन्नौज में अखिलेश यादव के खिलाफ और बदायूं में धर्मेंद्र यादव के खिलाफ भी अपने प्रत्याशी उतारेगा. शिवपाल ने राजेश यादव को समाजवादी सेकुलर मोर्चे का कन्नौज लोकसभा का प्रभारी नियुक्त किया है. कन्नौज में अखिलेश यादव के खिलाफ सेकुलर मोर्चा ताकतवर मुस्लिम प्रत्याशी को मैदान में उतारने की तैयारी कर रहा है. मोर्चा ने कन्नौज को प्राथमिकता पर रखा है और वहां जल्दी ही मोर्चे का जिलाध्यक्ष भी नियुक्त कर दिया जाएगा.
Image may contain: 2 people, textछत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश के ज़रिए मायावती ने दिया अखिलेश-राहुल को संदेश
छत्तीसगढ़ में कांग्रेस को छोड़ कर अजित जोगी की पार्टी जनता कांग्रेस के साथ गठबंधन करके बसपा नेता मायावती ने उत्तर प्रदेश में गठबंधन की आस लगाए अखिलेश यादव और राहुल गांधी को 2019 का संकेत दे दिया है. मायावती ने यह भी कह दिया कि वे गठबंधन के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन दूसरी पार्टियों को भी अपना दिल बड़ा करना होगा. मायावती ने मध्य प्रदेश के विधानसभा चुनाव में भी कांग्रेस का हाथ नहीं पकड़ा और अकेले दम पर चुनाव लड़ने का ऐलान कर दिया है. ये दोनों घोषणाएं खास तौर पर समाजवादी पार्टी के लिए करारा झटका हैं, क्योंकि अखिलेशवादी समाजवादी पार्टी में अपने बूते लोकसभा चुनाव में उतरने का दम नहीं है.
सपा को गठबंधन का सहारा चाहिए. यही वजह है कि अखिलेश यादव गठबंधन को लेकर कुछ अतिरिक्त ही सक्रिय और बेचैन नजर आ रहे हैं. अखिलेश लगातार यह बयान दे रहे हैं कि वे ‘गठबंधन के लिए दो कदम पीछे हटने को तैयार हैं.’ राजनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि अखिलेश यादव की यह बेसब्री समाजवादी पार्टी के लिए भारी पड़ सकती है और पार्टी को डुबा भी सकती है. अखिलेश के इस बचकानेपन का फायदा राजनीतिक परिपक्वता से भरी मायावती उठा ले जाएंगी और अखिलेश देखते ही रह जाएंगे.
छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में बसपा के फैसले से अखिलेश का वह दावा भी धूमिल हो गया कि उत्तर प्रदेश में सपा, बसपा और कांग्रेस मिल कर गठबंधन बनाएंगे. छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में मायावती ने जिस तरह कांग्रेस को अपने से परे किया, उससे कांग्रेस बुरी तरह बिफरी हुई है. छत्तीसगढ़ के प्रभारी कांग्रेस नेता और यूपी की तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती के प्रमुख सचिव रहे पीएल पुनिया ने बसपा के ऐसे रवैये पर तीखी टिप्पणियां भी कर डालीं. लिहाजा, राजनीतिक प्रेक्षक भविष्य में बसपा और कांग्रेस के यूपी में हाथ मिलाने को लेकर आशंका जाहिर कर रहे हैं.

उनका मानना है कि अब अखिलेश और राहुल ही तालमेल की साइकिल चलाते नजर आएंगे, ऐसी ही संभावना है. आप याद करें राज्यसभा चुनाव के दरम्यान मायावती कह चुकी हैं, ‘अखिलेश यादव को राजनीति का कम अनुभव है. अगर मैं उनकी जगह होती तो अपने उम्मीदवार के बजाय बसपा उम्मीदार को जिताने की कोशिश करती.’ राज्यसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी के विधायकों की क्रॉस वोटिंग के चलते बसपा प्रत्याशी नहीं जीत पाया था, जबकि सपा के समर्थन के बल पर ही बसपा ने अपना एक प्रत्याशी खड़ा किया था. लेकिन अखिलेश यादव ने अपना पूरा ध्यान जया बच्चन को जिताने पर लगा दिया था.