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30 करोड़ रुपए से ज्यादा की संपत्ति के मालिक हैं भाजपा अध्यक्ष अमित शाह

Amit Shah
भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के पास कुल 30 करोड़ 48 लाख रुपए से अधिक की चल अचल संपत्ति है, जबकि उनकी पत्नी सोनल बेन के पास भी सवा आठ करोड़ रुपए से अधिक की चल-अचल संपत्ति है।
शाह के हलफनामे से पता चलता है कि उनकी संपत्ति पिछले सात साल में तीन गुना बढ़ी है।  हलफनामे के मुताबिक, शाह और उनकी पत्नी की चल और अचल संपत्ति 2012 के 11.79 करोड़ रूपये से बढ़कर 38.81 करोड़ रूपये हो गयी है। 
भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने गुजरात की गांधीनगर संसदीय सीट से चुनाव लड़ने के लिए शनिवार को नामांकन किया। नामांकन पत्र के साथ अमित शाह ने अपनी और अपनी पत्नी सोनल शाह की संपत्ति और कमाई के बारे में बताया है। शाह की ओर से दिए गए शपथ पत्र के अनुसार, बीते पांच साल में सोनल की कमाई 16 गुना बढ़कर सालाना 14 लाख रुपए से 2.3 करोड़ हो गई है। 
Sonal Shah
25 किलो चांदी के मालिक हैं शाह
गांधीनगर लोकसभा सीट से पार्टी प्रत्याशी के तौर पर मार्च 30 को शाह की ओर से दायर नामांकन के साथ दिए गए हलफनामे में आय के ब्यौरे के अनुसार उनके पास सात कैरेट हीरे के अलावा 25 किलो चांदी समेत 35 लाख से अधिक के जेवरात है जिनमें लगभग 30 लाख के पुश्तैनी और शेष स्वयं अर्जित आय से खरीदे गए हैं। जबकि पत्नी के पास 63 कैरेट हीरे और एक किलो 620 ग्राम सोना समेत 63 लाख से अधिक के जेवरात हैं। शाह का शेयरों आदि में कुल निवेश 17 करोड़ 59 लाख रुपए से अधिक का है, जबकि उनकी पत्नी का शेयरों आदि में निवेश 4 करोड़ 36 लाख रुपए से अधिक का है।
बैंक खाते में जमा है 18 लाख से ज्यादा
शाह के पास मात्र 20633 रुपए की नकदी और पत्नी के पास 72578 रुपए की नकदी है जबकि दोनों के बैंक खातों में क्रमश: 18,89,710 रुपए और 18,72,172 रुपए हैं। दोनों के ऊपर कुल क्रमश: 15,77,037 रुपए और 31,92,550 रुपए का बैंक रिण/देनदारी भी है। शाह की कुल 12,24,75,093 रुपए मूल्य की अचल सपत्ति में 7,67,50,000 रुपए की पुश्तैनी और शेष उनके स्वयं की कमाई की है। 18,24,46,224 रुपए की चल संपत्ति में 14,97,92,563 रुपए पुश्तैनी है। 
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आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार अपनी 2014 चुनाव रैलियों में प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी कहते थे, "ना खाऊंगा, ना खाने दूँ.....


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उत्तर प्रदेश सरकार में कद्दावर मंत्री रहे शिवपाल सिंह यादव की पत्नी सरला उनसे भी ज्यादा रईस हैं। नामांकन पत्र के स...
पत्नी की कुल 3,05,23,738 रुपए की अचल संपत्ति में 80,23,738 रुपए की संपत्ति पुश्तैनी है शेष उनकी स्व अर्जित कमाई के हैं। श्रीमती शाह की पूरी 5,27,38,692 रुपए की चल संपत्ति उनकी स्व अर्जित कमाई का है। श्रीमती शाह को हलफनामे में गृहिणी बताया गया है पर किराए, शेयर आदि से उनकी आय बताई गई है। इसी तरह शाह को भी राज्यसभा सांसद के तौर पर उनके वेतन भत्ते के अलावा किराए, शेयर आदि से आय बताई गई है।
राजनीति में ऐसे करोड़पति नेताओं की कोई कमी नहीं, केवल नेता ही नहीं, कमाई में उनकी पत्नियाँ भी पीछे नहीं। कोई ग्रहणी है तो किसी की पत्नी किसी व्यवसायिक संगठन में निदेशक। नेता बनने पर इतनी सुविधाएँ, दूसरे अर्थों में यही कहा जा सकता है, कि नेता बनने पर जहाँ हाथ डालो, चाँदी ही चाँदी। जितनी तेजी से नेताओं की आय में वृद्धि होती है, आम जनता की नहीं, आम जनता टैक्सों और महँगाई से जूझती रहती है, परन्तु नेता किसी महाराजा से कम नहीं।  

मायावती ने मुझ पर लगाया था यौन शोषण का आरोप : शिवपाल यादव

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राजनीति ने रंग बदलने में गिरगिट को भी मात दे दी। मोदी विरोधी माया और अखिलेश के बीच हुए गठबन्धन पर जितने अधिक खुश हो रहे हैं, उससे कहीं अधिक खुश मायावती हैं। उसका कारण भी है, गेस्ट हाउस काण्ड का बदला लेने के लिए, इस गठबन्धन की आड़ में मायावती ने मुलायम सिंह वंश में फूट डाल, समाजवादी पार्टी के भविष्य को अंधकार में ढकेल दिया है।मायावती को तो संघी ब्रह्मदत्त ने बचा लिया, लेकिन अखिलेश को कौन बचाएगा, यह भविष्य के गर्भ में छिपा है?  
समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी (SP-BSP Alliance) के बीच हुए लोकसभा चुनाव को लेकर गठबंधन  हो गया है। अब सपा प्रमुख अखिलेश यादव के चाचा शिवपाल यादव ने 1995 लखनऊ गेस्ट हाउस कांड को लेकर बड़ा बयान दिया है। प्रगतिशील समाजवादी पार्टी (लोहिया) के प्रमुख शिवपाल सिंह यादव ने मायावती पर लखनऊ गेस्ट कांड को लेकर हमला करते हुए कहा कि बहन जी ने मुझ पर यौन शोषण का आरोप लगाया था। बुधवार को चंदौली के सकलडीहा में एक जनसभा को संबोधित करते हुए शिवपाल सिंह यादव ने कहा, 'बहन जी ने मुझ पर यौन शोषण का आरोप लगाया था। मैंने कहा था कि मैं जांच के लिए तैयार हूं, मैं नार्को टेस्ट के लिए तैयार हूं, मेरी शर्त यह है कि नार्को टेस्ट बहन जी का भी होना चाहिए, मेरा भी होना चाहिए।' View image on Twitter




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Shivpal Singh Yadav, PSP(L) on 1995 Lucknow guest house case: Behenji ne mujh par yaun shoshan ka aarop lagaya tha. Maine kaha tha mai jaanch ke liye taiyaar hu, mai narco test ke liye taiyaar hu, meri shart yeh hai ki narco test behenji ka bhi hona chahiye, mera bhi hona chahiye
12 जनवरी को जब अखिलेश और मायावती ने संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस कर गठबंधन का ऐलान किया था तो तब मायावती ने कहा था कि नई राजनीति के लिए वह गेस्ट हाउस कांड को भी भूलकर सपा के साथ हाथ मिलाने के लिए तैयार हुई हैं। इस दौरान मायावती ने शिवपाल सिंह यादव पर निशाना साधना साधते हुए कहा था कि वो (शिवपाल सिंह) को भाजपा की बी-टीम हैं।
क्या है गेस्ट हाउस कांड: साल 1993 में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाजवादी पार्टी ने एक साथ मिलकर चुनाव लड़ा था। दिसंबर 1993 में गठबंधन की सरकार बनी थी लेकिन इसके बाद जून 1995 में मायावती ने गठबंधन से समर्थन वापस ले लिया।  बाद में मायावती गेस्ट हाउस में बसपा विधायकों और कार्यकर्ताओं के साथ बैठक कर रही थीं। बसपा के समर्थन वापस लेते ही मुलायम सिंह यादव की पार्टी कम मतों की स्थिति में आ गई।

अखिलेश-मायावती से टक्कर लेने आ रही है ये लड़की

आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
एक शेर है:
दिल के फफोले जल उठे,
सीने की आग से,
इस घर को आग लग गयी,
घर के चिराग से।।
यह चरितार्थ सिद्ध हो रहा है अखिलेश यादव पर, जिसने मुख्यमन्त्री बनने के नशे में धुत होकर अपने ही पिता मुलायम सिंह को पार्टी से अलग कर दिया। यह मुलायम सिंह का ही साहस था कि स्वयं मुख्यमंत्री बनने की बजाए अपने अहंकारी पुत्र को राज की गद्दी सौंप दी। उसका परिणाम यह हुआ कि चाचा शिवपाल ने भी अलग पार्टी बनाकर भतीजे को मात देने मैदान में कमर कस ली है। यानि हबीब पेन्टर की कव्वाली "जब खून ही दुश्मन बने, फिर दोष किसे दीजियेगा....." सटीक बैठ रही है। देखा जाए तो मुलायम सिंह परिवार में ग्रहचाल ठीक नहीं चल रही। कभी साधना गुप्ता(यादव) कारण बनती है तो कभी अखिलेश और अब शिवपाल सिंह यादव। 
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मुलायम सिंह यादव कुनबे में बीच कलह उस समय क्लाइमेक्स पर पहुंच गई, मंत्रियों की बर्खास्तगी और फिर अखिलेश यादव को प्.....
अक्सर अपने इस ब्लॉग पर प्रकाशित लेखों में लिखता रहता हूँ कि "आज भारत में राजनीति एक व्यापार बन चुकी है, सेवा भाव के नाम पर जनता को मूर्ख और पागल बनाया बनाकर अपनी तिजोरियाँ भरने में तल्लीन रहते हैं।" जिसका सबसे बड़ा प्रमाण उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी से अलग हुए शिवपाल यादव द्वारा अपनी रोजी-रोटी की खातिर कोई व्यापार या नौकरी नहीं ढूंढी, विपरीत इसके बना ली एक नयी पार्टी। यानि जिसे "दान का खाना" मुँह लगा हो, मेहनत करने की क्या जरुरत। राजनीतिक पार्टियों को जो चंदा आता है, वह "दान" शब्द का पर्यायवाची शब्द है। शिवपाल ने अपनी पार्टी का नाम रखा है "प्रगतिशील समाजवादी पार्टी" अब यह भविष्य के गर्भ में छिपा है कि प्रगति किसकी होगी, जनजीवन की या अपने पारिवारिक समाज की?
जो जनसेवा आज से तीन दशक पूर्व थी, वही जनसेवा आज व्यापार बन चुकी है। जितनी सुख-सुविधाएँ इन तथाकथित जनसेवकों को मिल रही हैं, तीन दशक पूर्व तक नहीं किसी जनसेवक को नहीं ,मिलती थीं। व्यापारी रोता है व्यापार नहीं, आम आदमी रोता है महंगाई में रोटी खानी मुश्किल हो रही है, लेकिन पार्टी कार्यकर्ता बन अपनी पार्टी को दान दे रहे हैं। नेहरू-गाँधी परिवार को राजनीति में सक्रिय होने पर सब सियापा करते नज़र आते हैं, लेकिन मुलायम सिंह का लगभग सारा ही कुनबा राजनीति के अखाड़े में है, कोई नहीं बोलता, क्यों?
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आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार अक्सर अपने इस ब्लॉग पर प्रकाशित लेखों में लिखता रहता हूँ कि "आज भारत में राजनीति एक व्.....

अब उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक नया चेहरा एंट्री कर रहा है। दरअसल, नवाबगंज नगर पालिका की अध्यक्ष और बसपा नेता शहला ताहिर बसपा छोड़ कर शिवपाल की पार्टी में शामिल होने का एलान कर दिया है। शाहिला के साथ ही उनके तमाम समर्थक भी समाजवादी सेक्युलर मोर्चा में शामिल हो रहे हैं।
शहला ताहिर जल्द ही शिवपाल यादव से मुलाकात करेंगी। पत्रिका की रिपोर्ट के मुताबिक नवाबगंज नगर पालिका की अध्यक्ष शहला ताहिर 2019 में होने वाले लोकसभा चुनाव में अपनी बेटी समन ताहिर को चुनाव मैदान में उतारेंगी।अगर शिवपाल यादव चुनाव लड़ने का आदेश देते है तो वो खुद चुनाव लड़ेंगी या अपनी बेटी समन ताहिर को चुनाव मैदान में उतारेंगी। बताया जा रहा है कि पिछले दिनों शहला ताहिर और शिवपाल के बीच हुई मुलाकात में उन्हें चुनाव लड़ने का इशारा भी मिल चुका है।
नवाबगंज की धाकड़ नेता शहला ताहिर लम्बे समय तक समाजवादी पार्टी में रह चुकी है। समाजवादी पार्टी ने उन्हें 2017 के विधानसभा चुनाव में नवाबगंज से प्रत्याशी भी बनाया था लेकिन शिवपाल यादव और अखिलेश यादव के बीच हुए विवाद के बाद उनका टिकट काट दिया गया और वो आईएमसी के टिकट पर विधानसभा का चुनाव लड़ी और उन्होंने लगभग 36 हजार से ज्यादा वोट हासिल किए थे। विधानसभा चुनाव के बाद वो नगर निकाय के पहले बहुजन समाज पार्टी में शामिल हुई और नगर पालिका चेयरमैन का चुनाव लड़ा इस चुनाव में उन्होंने भाजपा के जिलाध्यक्ष के छोटे भाई की पत्नी को हराया। शहला ताहिर शिवपाल यादव की करीबी नेताओं में से एक थी और मोर्चा बनने के बाद माना जा रहा था कि वो जल्द ही शिवपाल यादव के सेक्युलर मोर्चा में शामिल होंगी।
अभी पिछले दिनों जब शिवपाल यादव बरेली आए थे तो शहला ताहिर ने उनसे सर्किट हाउस में मुलाक़ात की थी। इस दौरान दोनों के बीच लम्बी बात हुई थी। जिसके बाद कयास लगाए जा रहे थे कि वो जल्द ही शिवपाल यादव के समाजवादी सेक्युलर मोर्चा में शामिल होंगी और अब जब वो बसपा छोड़ चुकी है तो सेक्युलर मोर्चा से उनकी बेटी बरेली लोकसभा क्षेत्र से चुनाव मैदान में उतार सकती हैं।
बसपा को एक और झटका, शाही नगर पंचायत चेयरमैन साइकिल पर हुईं सवार
लोकसभा चुनाव से पहले बरेली की सियासत में दलबदलू भूचाल आया हुआ है। पहले, वीरपाल फिर शहला और अब नगर पंचायत शाही की चेयमैन ने पार्टी बदलते हुए सियासी समीकरण का गठजोड़ बदलना शुरू कर दिए हैं। 
बसपा छोड़ शाही नगर पंचायत की चेयरमैन रुखसाना तारिक अख्तर सपा में शामिल हो गई हैं । उनके साथ सात सभासदों ने भी सपा की सदस्यता ग्रहण की, जिसमें जफर मियां, मोहम्मद मोबीन, मुख्तार, सज्ज़ाद हुसैन, जमील अहमद, फिरोज कुरैशी, खतीबुल शामिल है। इसकी घोषणा जिलाध्यक्ष शुभलेश यादव ने सोमवार को पार्टी कार्यालय पर हुई प्रेसवार्ता में की। इस मौके पर इस्लाम साबिर, हैदर अली आदि मौजूद रहे। 

चुनाव 2019 : गठबंधन में गले की हड्डी बना शिवपाल का ‘मोर्चा’

क्या 2019 के लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पुनः  विजयी होंगे ..?
अकेला मोदी, सब पर भारी  
आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
2019 में नरेन्द्र मोदी को मात देने को हर कोई लगा हुआ है, लेकिन अपने अस्तित्व को भी कोई नहीं खोना चाहता। हर कोई अपनी ढपली अपना राग करने में व्यस्त हैं। कोई अपना अहम् त्यागने को तैयार नहीं। दूसरे अर्थों में यह भी कहा जा सकता है कि "गांव बसा नहीं, लुटेरे पहले आ गए।"
शिवपाल सिंह यादव के समाजवादी सेकुलर मोर्चे ने उत्तर प्रदेश में विपक्षी राजनीति का समीकरण गड्‌डमड्‌ड कर दिया है। समाजवादी पार्टी का भविष्य देखते हुए बसपा नेता मायावती ने गठबंधन के भविष्य को ही अधर में रख दिया है। मायावती अब अकेले दम पर लोकसभा चुनाव में उतरने का मन बना रही हैं। हालांकि घबराए अखिलेश यादव बसपा का पिछलग्गू बनने को भी तैयार हैं। चुनावी समीकरण बिगाड़ने के लिए भीम सेना के प्रमुख चंद्रशेखर भी ‘मैदाने जंग’ में उतर आए हैं। अब चंद्रशेखर भी मायावती को बुआ कहने लगे हैं। चुनावी समीकरण में दो नेताओं की बुआ के रूप में मायावती फिट नहीं बैठ रहीं, इसे भांपते-समझते हुए मायावती ने साफ-साफ कह ही दिया कि राजनीति में उनका कोई भाई-भतीजा नहीं है और वे किसी की बुआ नहीं हैं।छत्तीसगढ़ में अजित जोगी की पार्टी जनता कांग्रेस के साथ ‘अप्रत्याशित’ गठबंधन करके और मध्य प्रदेश में अकेले चुनाव लड़ने का ऐलान करके मायावती ने कांग्रेस को भविष्य का संदेश दे दिया है। यह संदेश उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव के लिए भी है।
फांसों में फंसा गठबंधन 
मायावती ने छत्तीसगढ़ ऐलान के पहले यूपी में गठबंधन को लेकर जो बयान दिया था उससे घबराए अखिलेश यादव ने फौरन ही यह कह कर बात संभालने की कोशिश की थी कि समाजवादी पार्टी गठबंधन के लिए दो कदम पीछे हटने के लिए भी तैयार है। छत्तीसगढ़ ‘डेवलपमेंट’ के बाद अब अखिलेश कितने कदम पीछे हटेंगे, इस बारे में उनका बयान आना अभी बाकी है। अखिलेश ने उस समय यह भी कहा था कि भाजपा जैसी साम्प्रदायिक पार्टी को हराने के लिए सभी दलों को एक साथ आगे आना चाहिए। अखिलेश यादव यह बयान देकर फंस गए, क्योंकि फौरन ही शिवपाल ने कह दिया कि साम्प्रदायिक शक्तियों के खिलाफ लड़ाई तभी सच्ची मानी जा सकती है, जब गठबंधन में समाजवादी सेकुलर मोर्चे को भी शामिल किया जाए। सीटों को लेकर सपा, बसपा और कांग्रेस में खींचतान चल ही रही थी कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अधिक सीटें देने की राष्ट्रीय लोकदल की मांग शामिल हो गई। इसके बाद अब समाजवादी सेकुलर मोर्चे को भी गठबंधन में शामिल करने की सेकुलर-सैद्धांतिक-अनिवार्यता फांस बन गई है।
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आर.बी.एल.निगम,वरिष्ठ पत्रकार मध्यप्रदेश में कांग्रेस के साथ गठबंधन न होने के लिए…
पत्नी सरला यादव के पास एक करोड़ 72 लाख 24 हजार 27 रुपये मूल्य की सकल चल और बाजार मूल्य के हिसाब से 4 करोड़ एक लाख 69 हजार 961 की अचल संपत्ति है। इसके अलावा प्रत्याशी शिवपाल सिंह यादव ने हिंदू अनडिवाइडेड फैमिली (एचयूएफ) के रूप में कुल 24 लाख 72 हजार 36 रुपये की सकल चल और बाजार मूल्य के तौर पर एक करोड़ 69 लाख 14 हजार 647 रुपये कीमत की अचल संपत्ति होने की जानकारी दी है।
उनके पास साढ़े 28 हजार रुपये की नगदी है। उनके इटावा स्थित बैंक ऑफ बड़ौदा, जिला कोऑपरेटिव बैंकों समेत लखनऊ की स्टेट बैंक ब्रांच में 60 लाख रुपये जमा हैं। पत्नी के बैंक खातों में साढ़े 17 लाख रुपये और एचयूएफ के बैंक खातों में करीब 13.95 लाख जमा है। शिवपाल के पास 60 लाख की एफडीआर और पत्नी के नाम 30 लाख की फिक्स डिपाजिट है। श्री यादव के पास पजेरो गाड़ी और दो अंगूठी हैं। जबकि पत्नी के पास 10 लाख 65 हजार 816 रुपये के जेवर हैं।


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यूपी सरकार में कद्दावर मंत्री रहे शिवपाल सिंह यादव की पत्नी सरला उनसे भी ज्यादा रईस हैं। नामांकन पत्र के साथ प्रस्...

किसी भी दल में अकेले चुनाव लड़ने की हैसियत नहीं --शिवपाल यादव  
समाजवादी सेकुलर मोर्चा के नेता शिवपाल सिंह यादव ने गठबंधन-तार पर अपना कटिया-कनेक्शन यह कहते हुए फंसा दिया कि समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी और कांग्रेस यदि असलियत में साम्प्रदायिक शक्तियों से लड़ना चाहती हैं, तो उन्हें समाजवादी पार्टी सेकुलर मोर्चे को भी गठबंधन में शामिल करना होगा। शिवपाल ने अखिलेश से भी कहा कि साम्प्रदायिक शक्तियों से उनकी लड़ाई प्रामाणिक तभी मानी जाएगी जब गठबंधन में मोर्चे को भी शामिल करने के लिए वे पहल करें। शिवपाल ने सपा और बसपा को चेतावनी भी दे डाली कि अगर समाजवादी सेकुलर मोर्चा को गठबंधन में शामिल नहीं किया गया तो मोर्चा अपने बूते पर चुनाव लड़ कर उन सीटों को तो जीत ही लेगा जो तालमेल में सपा द्वारा या बसपा द्वारा छोड़ी जाएंगी। गठबंधन में शामिल करने का प्रस्ताव उछालने वाले शिवपाल हालांकि पहले यह कह चुके हैं कि समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी का गठबंधन उसूलों का भटकाव है। लेकिन अब शिवपाल कह रहे हैं कि उत्तर प्रदेश में चाहे सपा-बसपा गठबंधन हो या कोई दूसरा गठबंधन, अब मोर्चा को दरकिनार कर या उसकी उपेक्षा कर कोई भी दल इस हैसियत में नहीं कि वह चुनाव लड़ सके और सरकार बना सके।
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गठबंधन को ‘प्रेशर’ में लाने के लिए शिवपाल ने प्रदेश भर के छोटे-छोटे दलों से बातचीत करने और उन्हें मोर्चे की तरफ करने की कवायद तेज कर दी है। इसके लिए उन्होंने शरद यादव समेत कई वरिष्ठ नेताओं से बातचीत भी की और बामसेफ के सम्मेलन में हिस्सा लेने फैजाबाद भी गए। शिवपाल बसपा और कांग्रेस से भी बात करेंगे और गठबंधन में मोर्चा को शामिल करने की सेकुलर-सैद्धांतिक-अनिवार्यता बताएंगे। शिवपाल कहते हैं कि फिर भी अगर मोर्चे को गठबंधन में शामिल करने से वे परहेज करते हैं, तो वे नुकसान झेलने के लिए तैयार रहें।शिवपाल दावा करते हैं कि समाजवादी सेकुलर मोर्चा गठबंधन में शामिल नहीं हुआ तो गठबंधन को 40 से 50 सीटों पर सीधा नुकसान पहुंचेगा। शिवपाल राजधानी लखनऊ में शीघ्र ही मोर्चे का विशाल सम्मेलन आयोजित करने की तैयारी में हैं।
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चले थे साथ मिलकर, तुम्हे रुकना पड़ेगा,
 मेरी आवाज़ सुनकर  ...
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तेरा जाना दिल के अरमानों का लुट जाना ....
शिवपाल राजनीति में अपनी प्रभावशाली जमीन तैयार करने की जद्दोजहद में लगे हैं। उनकी दूरंदेशी है कि वे मुलायम सिंह यादव का चेहरा अपने साथ लेकर चल रहे हैं। शिवपाल समाज में यह संदेश दे रहे हैं कि पुत्र होते हुए अखिलेश ने मुख्यमंत्री बनते ही पिता मुलायम को हाशिए पर रख दिया, लेकिन वे भाई होते हुए मुलायम को अपना सिरमौर बना कर चलना चाहते हैं। इसी इरादे से शिवपाल ने समाजवादी मोर्चे का अध्यक्ष पद मुलायम सिंह यादव के लिए रखा है। शिवपाल खुद को समाजवादी सेकुलर मोर्चे का संयोजक बताते हैं और साफ-साफ कहते हैं कि अध्यक्ष का पद नेता जी के लिए है। शिवपाल ने मुलायम सिंह यादव के समक्ष समाजवादी सेकुलर मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने का प्रस्ताव रखा है।
मुलायम सिंह और साधना गुप्ता की एक संतान है जिनका नाम प्रतीक यादव है।
काँटा लगा, हाय लगा ...
यह भी चर्चा सुनने को आ रही है कि अपनी ज़मीन खिसकती देख वापस पिता की गोद में बैठ जाएं। लेकिन मुलायम सिंह की दूसरी पत्नी साधना यादव(गुप्ता) संभव है, कोई अड़चन डाल दे। क्योकि अगर बाप-बेटे एक होते हैं, तो अमर सिंह को मुलायम अपने साथ ला सकते हैं। लेकिन आज़म खान और अखिलेश का अमर सिंह के साथ 36 का आंकड़ा है।
शिवपाल का कहना है कि मोर्चे का गठन नेताजी से बातचीत करने और उनका आशीर्वाद लेने के बाद ही किया गया। राजनीतिक पंडितों का भी मानना है कि शिवपाल का यह कदम राजनीतिक दूरदृष्टि से भरा है, क्योंकि अगर मुलायम ने मोर्चे का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनना स्वीकार कर लिया, तो खेल एकतरफा हो जाएगा। मुलायम के आते ही समाजवादी पार्टी में भगदड़ जैसी स्थिति हो जाएगी। शिवपाल भी कहते हैं कि नेता जी अगर मान गए, तो समाजवादी पार्टी में उपेक्षित नाराज नेता-कार्यकर्ता सब नेता जी की छाया में मोर्चे के साथ चले आएंगे। शिवपाल ने मुलायम सिंह यादव को मोर्चा के प्रत्याशी के रूप में मैनपुरी लोकसभा चुनाव में उतरने का भी प्रस्ताव दे रखा है। शिवपाल ने कहा कि नेता जी मैनपुरी से मोर्चे के प्रत्याशी होंगे।
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एक तेरा साथ, हमें दो जहाँ से प्यारा है.....
शिवपाल यह भी कहते हैं कि अगर वे समाजवादी पार्टी से भी चुनाव लड़ते हैं, तो मोर्चा उनका समर्थन करेगा और उनके खिलाफ कोई प्रत्याशी नहीं खड़ा करेगा। यह राजनीतिक दूरदृष्टि ही है कि जहां समाजवादी पार्टी के पोस्टर-बैनरों से मुलायम सिंह का चेहरा हटता गया, वहीं समाजवादी सेकुलर मोर्चे के झंडों, बैनरों और पोस्टरों पर मुलायम की तस्वीर प्रमुखता से लगी है। शिवपाल ने पिछले दिनों अपनी नई राजनीतिक पार्टी समाजवादी सेकुलर मोर्चा का औपचारिक झंडा भी जारी किया। इस झंडे पर एक तरफ शिवपाल हैं, तो दूसरी तरफ मुलायम।शिवपाल और उनके समर्थकों की गाड़ियों पर अब समाजवादी सेकुलर मोर्चा का झंडा लग गया है। राजनीति के मैदान में शिवपाल की यह नई पारी तो है, लेकिन उन्होंने मुलायम के साथ रहकर राजनीति के दाव-पेंच सीखे हैं।अब शिवपाल के लिए उसे आजमाने और परखने का समय है.
थोड़ी बहुत सियासत समझने वाले लोग भी यह जानते हैं कि समाजवादी सेकुलर मोर्चे का जन्म किन वजहों से हुआ है। मुख्यमंत्री बनने के बाद अखिलेश यादव ने शिवपाल यादव के साथ जैसा व्यवहार किया और जिस तरह उनका राजनीतिक भविष्य चौपट करने की कोशिश की, उससे इतना तो जाहिर ही है कि समाजवादी सेकुलर मोर्चा कोई समाजवादी पार्टी को मजबूत करने के लिए नहीं बना है। चुनावी गणितज्ञों का भी मानना है कि मोर्चा सीटें जीते न जीते, लेकिन समाजवादी पार्टी को नुकसान तो पहुंचाएगा ही।
जब लोकदल से अलग होकर मुलायम सिंह ने बनाई थी समाजवादी पार्टी 
अखिलेश यादव ने समाजवादी पार्टी का स्वयंभू राष्ट्रीय अध्यक्ष बनते ही जिस तरह मुलायम और शिवपाल समर्थकों को किनारे लगाया और बाहर का रास्ता दिखाया, वह नाराज और उपेक्षित जमात आज शिवपाल के साथ खड़ी है और निश्चित तौर पर वह जमात अपना बदला साधेगी। ऐसी ही उपेक्षा से आहत होकर मुलायम सिंह यादव ने भी लोकदल से अलग होकर समाजवादी पार्टी बनाई थी। उस समय भी मुलायम के राजनीतिक भविष्य पर लोग सवाल खड़े करने लगे थे और तमाम आशंकाएं जताने लगे थे, लेकिन मुलायम के नेतृत्व में समाजवादी पार्टी ने राजनीतिक कामयाबियां पाईं और अपनी ठोस पहचान कायम की. मुलायम सिंह से जुड़े एक वरिष्ठ नेता ने कहा कि आज शिवपाल ने भी मोर्चा बना कर मुलायम का ही अनुकरण किया है।
इस प्रशिक्षण का ही असर है कि समाजवादी सेकुलर मोर्चे के ऐलानिया मैदान में उतरने के बाद से समाजवादी पार्टी में सन्नाटा व्याप्त है। अखिलेश यह दिखाने की पूरी कोशिश कर रहे हैं कि मोर्चे से सपा की सेहत पर कोई असर नहीं पड़ने वाला, लेकिन असलियत यही है कि सपा में बेचैनी है। यह ध्यान में रखना जरूरी है कि उत्तर प्रदेश में करीब आठ प्रतिशत यादव मतदाता हैं और पिछड़ी जाति में लगभग 20 फीसदी हिस्सेदारी यादवों की है। मायावती और अखिलेश की ‘बुआ-बबुआ पॉलिटिक्स’ यादव समुदाय को कभी भी रास नहीं आई और न पारम्परिक यादव समाज ने भतीजे के हाथों चाचा के अपमान को ही हजम किया।
मुलायम को अपदस्थ कर अखिलेश का अध्यक्ष बनना भी यादव समाज को गवारा नहीं हुआ. ऐसे में शिवपाल के उस बयान में दम है कि समाजवादी सेकुलर मोर्चे के सहयोग के बिना देश में अगली सरकार बनाना संभव नहीं होगा. शिवपाल ने कहा कि समाजवादी पार्टी को खड़ा करने में उन्होंने भी बड़े कष्ट झेले हैं, बड़ी मेहनत और जद्दोजहद की है, लेकिन उन्हें ही लगातार अपमान झेलना पड़ा. 29 अगस्त 2018 को समाजवादी सेकुलर मोर्चे के गठन की औपचारिक घोषणा के बाद शिवपाल को मिलते भारी जन-समर्थन से अखिलेश यादव को अपनी सियासी जमीन हिलती महसूस हुई. अखिलेश ने समाजवादी सेकुलर मोर्चे के गठन को भारतीय जनता पार्टी की साजिश कहना शुरू कर दिया, लेकिन अखिलेश की ऐसी प्रतिक्रिया को कोई तरजीह नहीं मिली. राजनीतिक विश्लेषकों का भी यह कहना है कि 2019 के लोकसभा चुनाव में शिवपाल यादव के समाजवादी सेकुलर मोर्चे की अहम भूमिका रहेगी. समाजवादी पार्टी में शिवपाल की छवि जनप्रिय नेता की रही है.
समाजवादियों पर मुलायम के बाद शिवपाल की ही सबसे अच्छी पकड़ है. इसीलिए मोर्चे को विस्तार लेने में अधिक मुश्किलें पेश नहीं आ रही हैं. राजनीति के जानकार भी यह मानने लगे हैं कि समाजवादी सेकुलर मोर्चा आगामी चुनावों में हार-जीत के समीकरणों को बदलेगा और समाजवादी पार्टी का समानान्तर विकल्प बनेगा. मुलायम सिंह के नजदीक रहकर सियासी दावपेंच गहराई से सीख चुके शिवपाल ने सटीक मौके पर मोर्चे का ऐलान किया और मुस्लिम मतदाताओं को अपने साथ जोड़े रखने के लिए भाजपा में जाने का प्रस्ताव ठुकरा दिया. शिवपाल के इस कदम से सियासी जगत में यह संदेश भी गया कि समाजवादी सेकुलर मोर्चा मुलायम के सिखाए रास्ते पर चल पड़ा है और भविष्य में मुलायम खुद भी सेकुलर मोर्चा से जुड़ सकते हैं.
मोर्चे से बौखलाई सपा, सस्ते बयान पर उतरे अखिलेश के समर्थक
समाजवादी सेकुलर मोर्चे के अस्तित्व में आने से समाजवादी पार्टी इतनी बौखला गई कि अखिलेश यादव के समर्थक शिवपाल यादव पर सस्ते आरोपों पर उतर आए. अखिलेश के करीबी पूर्व मंत्री पवन पांडेय ने शिवपाल पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए और तीखा प्रहार किया. मोर्चा ने इसके जवाब में कहा कि अखिलेश और पवन जैसे नेताओं के कारण ही समाजवादी पार्टी का यह हश्र हुआ है. मोर्चा के प्रवक्ता दीपक मिश्र और अभिषेक सिंह आशू ने कहा कि मोर्चा बनने से घबराई समाजवादी पार्टी शिवपाल सिंह यादव की छवि धूमिल करने की कोशिश कर रही है.
मोर्चा प्रवक्ता कहते हैं कि शिवपाल यादव के प्रयासों से ही राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा को रोकने के लिए महागठबंधन बना था. इसमें पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवगौड़ा, पूर्व सांसद शरद यादव, राजद नेता लालू यादव और रालोद नेता अजित सिंह जैसे नेताओं ने भी मुलायम सिंह यादव को अपना अध्यक्ष मान लिया था. इस महागठबंधन को अखिलेश यादव और उनके गुरु रामगोपाल यादव ने महज इसलिए तोड़ डाला, क्योंकि वे सब यादव सिंह के महा भ्रष्टाचार के कीचड़ में सने थे और उन्हें भाजपा से डर लग रहा था. अगर अखिलेश और रामगोपाल महागठबंधन को नहीं तोड़ते तो मुलायम प्रधानमंत्री पद के लिए सर्व-स्वीकार्य नेता होते. उसका श्रेय शिवपाल यादव को ही मिलता. पिता ने पुत्र को मुख्यमंत्री बनाया, लेकिन पुत्र ने उसी पिता को कहीं का नहीं छोड़ा.
समाजवादी पार्टी छोड़ कर समाजवादी सेकुलर मोर्चा में शामिल हुए सपा की राज्य कार्यकारिणी व समाजवादी युवजन सभा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के पूर्व सदस्य और लखीमपुर खीरी स्थित निघासन से जिला पंचायत सदस्य राजीव गुप्ता ने कहा कि समाजवादी पार्टी डॉ. राम मनोहर लोहिया जैसे महापुरुषों के सिद्धांतों पर चलने वाली पार्टी रही है, लेकिन अखिलेश यादव में उस महान थाती को संभाल कर रख पाने की योग्यता नहीं थी.
जिस डाल पर वे बैठे थे उसे ही काट डाला और पूरी पार्टी को नष्ट कर डाला. रामगोपाल यादव की शह पर अखिलेश ने अपने पिता मुलायम सिंह यादव और चाचा शिवपाल सिंह यादव को अपमानित करने का अमर्यादित आचरण किया, जिसका खामियाजा उन्हें भुगतना पड़ रहा है. प्रदेश की जनता इस आचरण के लिए अखिलेश को कभी माफ नहीं करेगी. राजीव गुप्ता कहते हैं कि 2017 के विधानसभा चुनाव में उन्हें निघासन विधानसभा सीट से चुनाव लड़ने के लिए सपा का टिकट मिला था, लेकिन अखिलेश यादव ने उनका टिकट महज इसलिए काट दिया क्योंकि वे शिवपाल यादव के समर्थक थे. अखिलेश ने ईर्ष्या में निघासन की जीती हुई सीट भी गंवा दी. सेकुलर मोर्चा के आने से प्रदेश में परिपक्व राजनीति का नया अध्याय खुलेगा और समाज के सभी समुदाय के लोग शिवपाल यादव के नेतृत्व में एकजुट होंगे.
… और मुलायम को राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाने को राज़ी नहीं ही हुए अखिलेश
आखिरी वक्त में मुलायम ने अखिलेश और शिवपाल में सुलह कराने की कोशिश की थी, लेकिन शिवपाल ने मुलायम का दाव मुलायम के ही हवाले कर दिया. शिवपाल ने सुलह की शर्त यह रखी थी कि मुलायम को राष्ट्रीय अध्यक्ष और उन्हें प्रदेश अध्यक्ष बनाया जाए. लेकिन अखिलेश यादव ने यह शर्त नहीं मानी और सुलह वार्ता फेल हो गई.
मुलायम सिंह ने अपने आवास पर ही अखिलेश और शिवपाल की सुलह-बैठक बुलाई थी. पहले तो परिवार के सदस्य ही बैठक में शामिल थे, लेकिन थोड़ी देर बाद ही सपा नेता आजम खान और अखिलेशवादी समाजवादी पार्टी के कोषाध्यक्ष संजय सेठ भी वहां पहुंच गए. अखिलेश यादव शिवपाल यादव को सपा का प्रदेश अध्यक्ष बनाने के लिए तैयार थे, लेकिन मुलायम को राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाने की शर्त उन्हें मंजूर नहीं हुई.
अखिलेश अपने पिता को दोबारा राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाए जाने के लिए कतई तैयार नहीं थे. नतीजतन सुलह-वार्ता बेनतीजा समाप्त हो गई. बाद में मुलायम ने यह कहते हुए बात संभाली कि वे खुद राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के लिए इच्छुक नहीं हैं. बैठक में अखिलेश ने शिवपाल को पार्टी से निकाले जाने की धमकी भी दी थी, लेकिन इस धमकी का कोई असर नहीं दिखा. शिवपाल ने नई पार्टी की घोषणा भी कर दी, लेकिन अखिलेश अब तक शिवपाल यादव को समाजवादी पार्टी से निष्कासित नहीं कर पाए हैं.
नौरत्नों के बाद शिवपाल ने जोड़े पांच पांडव
समाजवादी सेकुलर मोर्चा के संयोजक शिवपाल सिंह यादव ने मोर्चे का औपचारिक ऐलान करने के बाद ही अपने नौ प्रवक्ताओं के मनोनयन की सूची जारी कर दी थी. 20 सितम्बर को शिवपाल ने फिर पांच प्रवक्ताओं का मनोयन किया और 14 प्रवक्ताओं की फौज खड़ी कर ली.
मोर्चे के गठन के बाद शिवपाल ने पूर्व मंत्री शारदा प्रताप शुक्ल और पूर्व मंत्री शादाब फातिमा को मोर्चे का प्रवक्ता मनोनीत किया था. इनके अलावा दीपक मिश्र, नवाब अली अकबर, सुधीर सिंह, प्रो. दिलीप यादव, अभिषेक सिंह आशू, मोहम्मद फरहत रईस खान और अरविंद यादव भी मोर्चा के प्रवक्ता बनाए गए थे. प्रवक्ताओं की दूसरी लिस्ट में मोहम्मद शाहिद, अरविंद विद्रोही, देवेंद्र सिंह, राजेश यादव और इरफान मलिक के नाम शामिल हैं. अब समाजवादी सेकुलर मोर्चा के 14 प्रवक्ता हैं, जो आधिकारिक तौर पर मीडिया के समक्ष पार्टी का पक्ष रखेंगे. सपा से दो बार इटावा के सांसद रह चुके रघुराज सिंह शाक्य और पूर्व विधायक मलिक कमाल युसुफ जैसे वरिष्ठ नेता पहले ही मोर्चे में शामिल हो चुके हैं.
मुलायम मैनपुरी से लड़ेंगे, आज़मगढ़ शिफ्ट होंगे तेजू!
मैनपुरी के मौजूदा सांसद और लालू यादव के दामाद तेज प्रताप यादव अब मैनपुरी के बजाय आजमगढ़ से चुनाव लड़ सकते हैं. मैनपुरी से मुलायम सिंह यादव खुद चुनाव लड़ेंगे. समाजवादी पार्टी के निर्णय-निर्माताओं में से एक के काफी अंतरंग सपा नेता ने कहा कि समाजवादी पार्टी ने मुलायम को विश्राम की सलाह देकर मैनपुरी से तेज प्रताप यादव को ही लड़ाने का मन बना लिया था. लेकिन शिवपाल ने मुलायम को मोर्चा के टिकट पर मैनपुरी से चुनाव लड़ने का प्रस्ताव देकर सपा के निर्णय-निर्माताओं को पैर पीछे खींचने पर विवश कर दिया. अब बदली हुई स्थितियों में तेज प्रताप यादव को आजमगढ़ शिफ्ट किया जा सकता है. तेज प्रताप ने आजमगढ़ का दौरा शुरू भी कर दिया है और उनकी बोली भी बदली हुई सामने आ रही है. अब तेज प्रताप खुलेआम यह बयान दे रहे हैं कि शिवपाल यादव के समाजवादी पार्टी से अलग होने से पार्टी को काफी नुकसान होगा. तेज प्रताप के इस बयान के राजनीतिक निहितार्थ भी हैं.
सपाई ही कहते हैं कि तेज प्रताप के चुनाव लड़ने में सपा ने हीला-हवाली की तो वे समाजवादी सेकुलर मोर्चे में शामिल होकर चुनाव मैदान में उतर पड़ेंगे. मोर्चा कन्नौज में अखिलेश यादव के खिलाफ और बदायूं में धर्मेंद्र यादव के खिलाफ भी अपने प्रत्याशी उतारेगा. शिवपाल ने राजेश यादव को समाजवादी सेकुलर मोर्चे का कन्नौज लोकसभा का प्रभारी नियुक्त किया है. कन्नौज में अखिलेश यादव के खिलाफ सेकुलर मोर्चा ताकतवर मुस्लिम प्रत्याशी को मैदान में उतारने की तैयारी कर रहा है. मोर्चा ने कन्नौज को प्राथमिकता पर रखा है और वहां जल्दी ही मोर्चे का जिलाध्यक्ष भी नियुक्त कर दिया जाएगा.
Image may contain: 2 people, textछत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश के ज़रिए मायावती ने दिया अखिलेश-राहुल को संदेश
छत्तीसगढ़ में कांग्रेस को छोड़ कर अजित जोगी की पार्टी जनता कांग्रेस के साथ गठबंधन करके बसपा नेता मायावती ने उत्तर प्रदेश में गठबंधन की आस लगाए अखिलेश यादव और राहुल गांधी को 2019 का संकेत दे दिया है. मायावती ने यह भी कह दिया कि वे गठबंधन के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन दूसरी पार्टियों को भी अपना दिल बड़ा करना होगा. मायावती ने मध्य प्रदेश के विधानसभा चुनाव में भी कांग्रेस का हाथ नहीं पकड़ा और अकेले दम पर चुनाव लड़ने का ऐलान कर दिया है. ये दोनों घोषणाएं खास तौर पर समाजवादी पार्टी के लिए करारा झटका हैं, क्योंकि अखिलेशवादी समाजवादी पार्टी में अपने बूते लोकसभा चुनाव में उतरने का दम नहीं है.
सपा को गठबंधन का सहारा चाहिए. यही वजह है कि अखिलेश यादव गठबंधन को लेकर कुछ अतिरिक्त ही सक्रिय और बेचैन नजर आ रहे हैं. अखिलेश लगातार यह बयान दे रहे हैं कि वे ‘गठबंधन के लिए दो कदम पीछे हटने को तैयार हैं.’ राजनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि अखिलेश यादव की यह बेसब्री समाजवादी पार्टी के लिए भारी पड़ सकती है और पार्टी को डुबा भी सकती है. अखिलेश के इस बचकानेपन का फायदा राजनीतिक परिपक्वता से भरी मायावती उठा ले जाएंगी और अखिलेश देखते ही रह जाएंगे.
छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में बसपा के फैसले से अखिलेश का वह दावा भी धूमिल हो गया कि उत्तर प्रदेश में सपा, बसपा और कांग्रेस मिल कर गठबंधन बनाएंगे. छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में मायावती ने जिस तरह कांग्रेस को अपने से परे किया, उससे कांग्रेस बुरी तरह बिफरी हुई है. छत्तीसगढ़ के प्रभारी कांग्रेस नेता और यूपी की तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती के प्रमुख सचिव रहे पीएल पुनिया ने बसपा के ऐसे रवैये पर तीखी टिप्पणियां भी कर डालीं. लिहाजा, राजनीतिक प्रेक्षक भविष्य में बसपा और कांग्रेस के यूपी में हाथ मिलाने को लेकर आशंका जाहिर कर रहे हैं.

उनका मानना है कि अब अखिलेश और राहुल ही तालमेल की साइकिल चलाते नजर आएंगे, ऐसी ही संभावना है. आप याद करें राज्यसभा चुनाव के दरम्यान मायावती कह चुकी हैं, ‘अखिलेश यादव को राजनीति का कम अनुभव है. अगर मैं उनकी जगह होती तो अपने उम्मीदवार के बजाय बसपा उम्मीदार को जिताने की कोशिश करती.’ राज्यसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी के विधायकों की क्रॉस वोटिंग के चलते बसपा प्रत्याशी नहीं जीत पाया था, जबकि सपा के समर्थन के बल पर ही बसपा ने अपना एक प्रत्याशी खड़ा किया था. लेकिन अखिलेश यादव ने अपना पूरा ध्यान जया बच्चन को जिताने पर लगा दिया था.

पति शिवपाल सिंह यादव से अधिक अमीर पत्नी सरला

Image result for मुलायम सिंह यादव साधना गुप्ताउत्तर प्रदेश सरकार में कद्दावर मंत्री रहे शिवपाल सिंह यादव की पत्नी सरला उनसे भी ज्यादा रईस हैं। नामांकन पत्र के साथ प्रस्तुत शपथ पत्र में यादव ने यह जानकारी दी थी। 61 वर्षीय शिवपाल ने शपथ पत्र में वृत्ति एवं उप जीविका के रूप में समाजसेवा एवं कृषि से जुड़ा होना दर्शाया है। उनके पास एक करोड़ 45 लाख 30 हजार 620 रुपये की सकल चल संपत्ति और बाजार मूल्य में 22 लाख 75 हजार 77 रुपये की अचल संपत्ति है। जबकि उनकी पत्नी सरला यादव अंकुर पेट्रोलियम दतावली की स्वामी और अंकुर राइस गोरापुरा व विंकी इंडस्ट्रीज की डायरेक्टर हैं।
अवलोकन करें:--
अक्सर अपने इस ब्लॉग पर प्रकाशित लेखों में लिखता रहता हूँ कि "आज भारत में राजनीति एक व्यापार बन चुकी है, सेवा भाव के नाम पर जनता को मूर्ख और पागल बनाया बनाकर अपनी तिजोरियाँ भरने में तल्लीन रहते हैं।" जिसका सबसे बड़ा प्रमाण उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी से अलग हुए शिवपाल यादव द्वारा अपनी रोजी-रोटी की खातिर कोई व्यापार या नौकरी नहीं ढूंढी, विपरीत इसके बना ली एक नयी पार्टी। यानि जिसे "दान का खाना" मुँह लगा हो, मेहनत करने की क्या जरुरत। राजनीतिक पार्टियों को जो चंदा आता है, वह "दान" शब्द का पर्यायवाची शब्द है। शिवपाल ने अपनी पार्टी का नाम रखा है "प्रगतिशील समाजवादी पार्टी" अब यह भविष्य के गर्भ में छिपा है कि प्रगति किसकी होगी, जनजीवन की या अपने पारिवारिक समाज की?
जो जनसेवा आज से तीन दशक पूर्व थी, वही जनसेवा आज व्यापार बन चुकी है। जितनी सुख-सुविधाएँ इन तथाकथित जनसेवकों को मिल रही हैं, तीन दशक पूर्व तक नहीं किसी जनसेवक को नहीं ,मिलती थीं। व्यापारी रोता है व्यापार नहीं, आम आदमी रोता है महंगाई में रोटी खानी मुश्किल हो रही है, लेकिन पार्टी कार्यकर्ता बन अपनी पार्टी को दान दे रहे हैं। नेहरू-गाँधी परिवार को राजनीति में सक्रिय होने पर सब सियापा करते नज़र आते हैं, लेकिन मुलायम सिंह का लगभग सारा ही कुनबा राजनीति के अखाड़े में है, कोई नहीं बोलता, क्यों?


nigamrajendra.blogspot.com
आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार अक्सर अपने इस ब्लॉग पर प्रकाशित लेखों में लिखता…
पत्नी सरला यादव के पास एक करोड़ 72 लाख 24 हजार 27 रुपये मूल्य की सकल चल और बाजार मूल्य के हिसाब से 4 करोड़ एक लाख 69 हजार 961 की अचल संपत्ति है। इसके अलावा प्रत्याशी शिवपाल सिंह यादव ने हिंदू अनडिवाइडेड फैमिली (एचयूएफ) के रूप में कुल 24 लाख 72 हजार 36 रुपये की सकल चल और बाजार मूल्य के तौर पर एक करोड़ 69 लाख 14 हजार 647 रुपये कीमत की अचल संपत्ति होने की जानकारी दी है।
उनके पास साढ़े 28 हजार रुपये की नगदी है। उनके इटावा स्थित बैंक ऑफ बड़ौदा, जिला कोऑपरेटिव बैंकों समेत लखनऊ की स्टेट बैंक ब्रांच में 60 लाख रुपये जमा हैं। पत्नी के बैंक खातों में साढ़े 17 लाख रुपये और एचयूएफ के बैंक खातों में करीब 13.95 लाख जमा है। शिवपाल के पास 60 लाख की एफडीआर और पत्नी के नाम 30 लाख की फिक्स डिपाजिट है। श्री यादव के पास पजेरो गाड़ी और दो अंगूठी हैं। जबकि पत्नी के पास 10 लाख 65 हजार 816 रुपये के जेवर हैं।
शिवपाल के पास 10 एकड़ कृषि योग्य भूमि और पत्नी के पास 6 एकड़ कृषि योग्य भूमि है। जिनकी कीमत 22 लाख है। इटावा, लखनऊ, देहरादून व गोरापुरा में प्लाट एवं पत्नी के पास 10 लाख कीमत के प्लाट हैं। इसके अलावा नगर इटावा में आवासीय भवन है। जबकि संयुक्त परिवार के रूप में 1.09 करोड़ की लखनऊ 7 वी मार्ग पर बिल्डिंग है। इसी तरह दिल्ली में भी एक आवासीय भवन है। उनकी पत्नी व एचयूएफ पर बैंकों की करीब सवा करोड़ रुपये की देनदारियां हैं। कोई भी सरकारी बकाया नहीं है। न ही कोई मामला कोर्ट में विचाराधीन है।