Showing posts with label #Fact Check. Show all posts
Showing posts with label #Fact Check. Show all posts

अखिलेश यादव ने फैलाया ‘नोटों के निजीकरण’ का झूठ, पॉलिमर शीट खरीदने के टेंडर पर गढ़ी कहानी: भूल गए UPA के दौर में विदेश से आता था करेंसी पेपर

                                            नोटों के निजीकरण पर अखिलेश का फर्जी दावा
विपक्ष का धरातल में जाने का मुख्य कारण झूठ परोस कर जनता को गुमराह करना है। अब तक जितने भी मुद्दों को विपक्ष ने उछाला सबके सब धराशाही हो गए। एक बात जो ध्यान देने वाली है कि राममन्दिर चढ़ावे में चोरी का मामला है यह चुनाव तक खींचेगा क्योकि उम्मीद की जा रही है कि अखिलेश और कुछ विपक्षी भी लपेटे में आएंगे। जो उत्तर प्रदेश में थाली में सजाकर योगी आदित्यनाथ को सत्ता सौंपने का काम करेगी।  

समाजवादी पार्टी के मुखिया और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने X पर एक पोस्ट कर सवाल उठाया है कि क्या भाजपा सरकार में अब भारतीय बैंक नोटों का भी निजीकरण किया जा रहा है। उन्होंने भारतीय रिजर्व बैंक नोट मुद्रण प्राइवेट लिमिटेड (BRBNMPL) द्वारा जारी एक टेंडर का हवाला दिया है।

इस टेंडर में नोटों की छपाई के लिए इस्तेमाल होने वाली ओपैसिफाइड पॉलिमर सब्सट्रेट शीट बनाने और सप्लाई करने के लिए कंपनियों से आवेदन माँगे गए हैं। इसे आधार बनाकर अखिलेश यादव ने X पर लिखा, “कमीशनखोरी का मॉडल इस हद तक गिर जाएगा, देश की जनता ने सोचा न था।”

उन्होंने लिखा, “भ्रष्ट BJP राज में अब नोटों का भी प्राइवेटाइजेशन हो जाएगा क्या? कमीशनख़ोरी का मॉडल इस हद तक गिर जाएगा, देश की जनता ने सोचा न था। जब देश की मुद्रा ही आत्मनिर्भर नहीं होगी तो अर्थव्यवस्था और देश आत्मनिर्भर कैसे होगा? अब क्या सरकार भी आउटसोर्सिंग पर दे दी जाएगी?”

अखिलेश ने लिखा, “इतने बड़े और संवेदनशील कार्य के लिए इतना छोटा कंजूसीभरा टेंडर निकालने के पीछे, कहीं चुपके से औपचारिकता पूरा करने का कोई गलत मंसूबा तो नहीं है। लगता है सेटिंग पहले ही हो चुकी है, दिखाने को ख़ानापूर्ति की जा रही है। भाजपा सरकार नहीं, मुनाफाखोरों की भागीदार है।”

जिस टेंडर का अखिलेश यादव जिक्र कर रहे हैं, वह 17 जुलाई 2026 को भारतीय रिजर्व बैंक नोट मुद्रण प्राइवेट लिमिटेड (BRBNMPL) द्वारा जारी किया गया एक एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट (EOI) है। इसमें भारतीय बैंक नोटों की छपाई के लिए उपयुक्त ओपैसिफाइड पॉलिमर सब्सट्रेट शीट बनाने और सप्लाई करने के लिए आवेदन माँगे गए हैं। अखिलेश यादव का यह दावा कि इससे बैंक नोटों का निजीकरण हो रहा है, पूरी तरह गलत और भ्रामक है।

यह टेंडर केवल BRBNMPL द्वारा एक विशेष प्रकार के कच्चे माल यानी बेस सब्सट्रेट की खरीद के लिए जारी किया गया है। इसका भारतीय मुद्रा की छपाई, डिजाइन, सुरक्षा फीचर्स या नोट जारी करने का अधिकार किसी निजी कंपनी को देने से कोई संबंध नहीं है। भारतीय नोटों की छपाई पहले की तरह ही केवल RBI के नियंत्रण वाली प्रेसों में होती रहेगी।

इनमें BRBNMPL की मैसूर और सालबोनी स्थित प्रेसें तथा सिक्योरिटी प्रिंटिंग एंड मिंटिंग कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (SPMCIL) की नासिक और देवास स्थित प्रेसें शामिल हैं।

भारतीय रिजर्व बैंक पिछले कुछ समय से पॉलिमर आधारित बैंक नोट लाने की संभावना पर विचार कर रहा है। खासकर छोटे मूल्य के नोटों के लिए क्योंकि वे जल्दी गंदे हो जाते हैं और उनकी जगह नए नोट छापने पड़ते हैं। जून 2026 में RBI के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने कहा था कि पॉलिमर नोटों का प्रस्ताव शुरुआती चरण में है और केंद्रीय बैंक इसके फायदे और नुकसान का अध्ययन कर रहा है। भविष्य में ऐसा निर्णय होने पर भी नोटों की छपाई इन्हीं सरकारी प्रेसों में होगी, किसी निजी कंपनी के पास नहीं जाएगी।

 भारत में अभी पॉलिमर नोट जारी नहीं किए जाते और इसलिए यहाँ पॉलिमर सब्सट्रेट शीट बनाने वाली कोई कंपनी भी नहीं है। दुनिया के केवल कुछ ही देश पॉलिमर नोट जारी करते हैं। जैसे सामान्य कागज वाले नोटों के लिए इस्तेमाल होने वाले कॉटन पेपर में सुरक्षा फीचर पहले से शामिल होते हैं, वैसे ही पॉलिमर शीट में भी निर्माण के दौरान सुरक्षा फीचर जोड़े जाते हैं। इसलिए यह एक विशेष प्रकार का उत्पाद है जिसे दुनिया की केवल कुछ कंपनियाँ ही बनाती हैं। इसी कारण BRBNMPL ने योग्य कंपनियों से वैश्विक स्तर पर एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट (EOI) माँगा है।

गौरतलब है कि ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन, कनाडा, न्यूजीलैंड, रोमानिया और वियतनाम जैसे कई देशों ने अपने सभी या अधिकांश मूल्य वर्ग के लिए पॉलिमर बैंक नोट अपनाए हैं। लेकिन ये देश भी इन नोटों के लिए जरूरी विशेष ओपैसिफाइड पॉलिमर सब्सट्रेट शीट खुद नहीं बनाते। ये शीट कुछ चुनिंदा निजी कंपनियों से खरीदी जाती हैं। इस क्षेत्र की सबसे बड़ी कंपनी ऑस्ट्रेलिया की CCL Secure है।

इसकी बेस फिल्म इसकी सहयोगी कंपनी Innovia Films तैयार करती है। इसके बाद CCL Secure उस पर ओपैसिफिकेशन लेयर और संबंधित केंद्रीय बैंक की जरूरत के मुताबिक सुरक्षा फीचर जोड़ती है। दूसरी बड़ी कंपनी ब्रिटेन की De La Rue है जो अपना Safeguard पॉलिमर सब्सट्रेट बनाती है और तैयार बैंक नोट भी छापती है। दुनिया के केंद्रीय बैंक और उनकी नोट छापने वाली प्रेसें इन विशेष कंपनियों से तैयार पॉलिमर शीट खरीदती हैं। वे इन्हें खुद नहीं बनातीं।

अखिलेश यादव जहाँ पॉलिमर शीट के आयात को बैंक नोटों का निजीकरण बता रहे हैं तो वहीं हकीकत यह है कि भारत में भी हाल तक कागज वाले नोट आयातित सुरक्षा कागज पर ही छपते थे। RBI लंबे समय तक जर्मनी और ब्रिटेन जैसे देशों से आयातित करेंसी पेपर पर निर्भर था।

हालाँकि, होशंगाबाद की सिक्योरिटी पेपर मिल से कुछ घरेलू उत्पादन होता था लेकिन आत्मनिर्भरता को बड़ी मजबूती तब मिली जब मैसूर में बैंक नोट पेपर मिल इंडिया प्राइवेट लिमिटेड ने काम शुरू किया। SPMCIL और BRBNMPL के इस संयुक्त उपक्रम ने 2016 में व्यावसायिक उत्पादन शुरू किया। इससे भारत की उत्पादन क्षमता काफी बढ़ी और मेक इन इंडिया पहल के तहत आयातित बैंक नोट पेपर पर निर्भरता काफी कम हुई।

इसका मतलब यह है कि जब केंद्र में अखिलेश यादव की पार्टी सत्तारूढ़ गठबंधन का हिस्सा थी, तब भारत विदेशी देशों से आयात किए गए कागज पर बैंक नोट छाप रहा था।

यह टेंडर भविष्य में इस्तेमाल हो सकने वाली नई सामग्री की जाँच और तैयारी की एक सामान्य प्रक्रिया है और यह पूरी तरह RBI की निगरानी में होगी। आयातित शीट का इस्तेमाल ₹10 और ₹20 के नोटों के सीमित पायलट प्रोजेक्ट के लिए किया जाएगा। इससे बैंक नोटों के निजीकरण या मुद्रा पर सरकार के नियंत्रण में किसी तरह की कमी का कोई संकेत नहीं मिलता।

दुनिया की सबसे अधिक आबादी वाले देशों में शामिल भारत में डिजिटल भुगतान बढ़ने के बावजूद अभी भी बड़ी संख्या में नकदी का इस्तेमाल होता है। इसलिए यदि पॉलिमर नोटों का प्रस्ताव लागू होता है तो बड़ी मात्रा में पॉलिमर शीट की जरूरत पड़ेगी। ऐसे में विदेशी कंपनियाँ भारतीय निजी या सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों के साथ मिलकर भारत में ही उत्पादन इकाइयाँ लगाने में रुचि लेंगी।

जहाँ तक अखिलेश यादव के इस आरोप का सवाल है कि इतने महत्वपूर्ण काम के लिए बहुत छोटा विज्ञापन जारी किया गया, तो आजकल टेंडर विज्ञापन इसी तरह प्रकाशित किए जाते हैं। विस्तृत निविदा दस्तावेज और सभी शर्तें संबंधित विभाग या एजेंसी की वेबसाइट पर उपलब्ध कराई जाती हैं जबकि अखबारों में केवल छोटा-सा विज्ञापन देकर वेबसाइट का पता बताया जाता है। इससे खर्च कम रहता है क्योंकि बड़े अखबारी विज्ञापनों पर ज्यादा पैसा खर्च होता है। इस विज्ञापन में भी इच्छुक कंपनियों से कहा गया है कि वे EOI दस्तावेज, पात्रता मानदंड और अन्य जानकारी के लिए www.brbnmpl.co.in पर जाएँ।

‘द वायर’ में सूरज येंगडे का ‘दलित पोर्न’ वाला लेख, संस्थापक-संपादक ने बताया ‘फर्जी’: वायरल स्क्रीनशॉट से छिड़ा विवाद

                      वायरल स्क्रीनशॉट में सूरज येंगड़े के जिस लेख का जिक्र है वह कभी पब्लिश ही नहीं हुआ
इस्लामी-वामपंथी पोर्टल ‘द वायर’ के नाम से एक कथित लेख का स्क्रीनशॉट सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। इस वायरल स्क्रीनशॉट में दावा किया गया है कि ‘बहुजन’ कंटेंट क्रिएटर्स को पोर्न इंडस्ट्री पर ‘कब्जा’ करने की वकालत की गई है जिसे लेखक सूरज येंगड़े ने ‘आखिरी किला’ बताया है।

वायरल स्क्रीनशॉट के अनुसार, दलित अधिकार कार्यकर्ता ने तर्क दिया है कि अंबेडकरवादी विचारधारा को फैलाने के लिए पोर्नोग्राफी जैसे ‘फ्रंटियर’ में भी प्रवेश करना जरूरी है और इसके लिए ब्राह्मण महिलाओं को निशाना बनाया जाना चाहिए। हालाँकि, यह स्क्रीनशॉट भले ही येंगड़े और ‘द वायर’ के सवर्ण विरोधी रुख के कारण भरोसेमंद लगता हो लेकिन यह पूरी तरह से फर्जी और व्यंग्य के रूप में बनाया गया है।

इस वायरल स्क्रीनशॉट में जिस लेख का जिक्र है वह कभी पब्लिश ही नहीं हुआ है। इस कथित लेख की हेडलाइन “The Case for Dalit ‘Porn’ – Why Bahujan Content Creators Must Conquer this Last Frontier” लिखी गई है।

वहीं, इसकी समरी में लिखा है, “हर विचारधारा को विस्तार के लिए पॉप-कल्चर के साधनों की जरूरत होती है। जहाँ अंबेडकरवादी विचारधारा के पास ऑटो-ट्यून गाने और रील्स जैसे माध्यम मौजूद हैं लेकिन हम पोर्नोग्राफी के क्षेत्र में पीछे हैं जो सबसे ज्यादा देखे जाने वाला कंटेंट है। भले ही यह सुनने में आपत्तिजनक लगे लेकिन बहुजन कंटेंट क्रिएटर्स को इस दिशा में काम करना चाहिए जैसे कि एक ब्राह्मण या यादव हाउस वाइफ को शौचालय साफ करने आए एक सफाईकर्मी के साथ सेक्स करते दिखाना।

ऑपइंडिया ने द वायर की वेबसाइट और उसके सोशल मीडिया हैंडल्स की जाँच की जिससे यह पता लगाया जा सके कि वायरल स्क्रीनशॉट में दिखाया गया लेख कभी प्रकाशित हुआ था, उसमें कोई बदलाव किया गया था या उसे हटाया गया था। पता चला कि सुरज येंगड़े द्वारा ऐसा कोई एंटी-ब्राह्मण लेख न तो लिखा गया था और न ही द वायर ने उसे प्रकाशित किया था। हमारी रिसर्च के अनुसार, वायरल स्क्रीनशॉट के फर्जी होने की पूरी संभावना है।

द वायर के संस्थापक संपादक सिद्धार्थ वरदराजन ने 27 मार्च को X (ट्विटर) पर एक पोस्ट कर इस मामले पर प्रतिक्रिया दी। उन्होंने ‘जातिवादी और हिंदुत्व से प्रभावित हिंदुओं’ को यह फर्जी स्क्रीनशॉट बनाने और फैलाने का जिम्मेदार बताया। उनका दावा है कि इन लोगों ने एक झूठी कहानी गढ़ी और उसे ‘सम्मानित स्कॉलर’ सुरज येंगड़े और द वायर से जोड़ने की कोशिश की।

फर्जी स्क्रीनशॉट लोगों को क्यों लगा असली?

भले ही सिद्धार्थ वरदराजन ने इस मामले में तुरंत ‘जातिवादी’ हिंदुओं और हिंदुत्व को जिम्मेदार ठहराया और सुरज येंगड़े को ‘सम्मानित स्कॉलर’ बताया लेकिन यह फर्जी स्क्रीनशॉट लोगों को इसलिए असली लगा क्योंकि यह येंगड़े की पहले से चली आ रही एंटी-ब्राह्मण बयानबाजी और द वायर की कथित एंटी-हिंदू लाइन के पैटर्न से मेल खाता हुआ दिखा।

येंगड़े ने पहले भी ‘ब्राह्मणिकल पैट्रियार्की’ जैसे विषयों पर कई लेख लिखे हैं जिनमें ब्राह्मण महिलाओं पर खास फोकस देखा गया है। उनके लेखों और सोशल मीडिया पोस्ट्स में अक्सर ऊँची जाति के हिंदुओं को इस बात के लिए निशाना बनाया जाता है कि वे ‘जाति शुद्धता’ के कारण अपनी बेटियों की शादी दलितों से नहीं करते। इसी तरह के पुराने बयानों और विचारों के कारण यह फर्जी स्क्रीनशॉट कई लोगों को पहली नजर में असली और भरोसेमंद लगा।

सुरज येंगड़े की एंटी-ब्राह्मण बयानबाजी केवल अकादमिक टिप्पणी तक सीमित नहीं है बल्कि यह कई बार खुले तौर पर महिलाओं के प्रति अपमानजनक और उन्हें वस्तु की तरह पेश करने वाली भाषा तक पहुँच जाती है जैसा कि उनके सोशल मीडिया पोस्ट्स में देखने को मिलता है। ऐसे ही एक पोस्ट में येंगड़े ने लिखा था, “ब्राह्मण लड़कियाँ दलित पुरुषों के लिए लालायित रहती हैं। मुझसे पूछो।”

 एक पोस्ट में सुरज येंगड़े ने एक ब्राह्मण की पोस्ट का जवाब देते हुए ब्राह्मण समुदाय से कहा कि वे अपनी बेटियों को दलितों को ‘दे दें’ जैसे वे कोई वस्तु हों। उन्होंने इसे इस तरह पेश किया मानो अपने ‘विशेषाधिकार’ (प्रिविलेज) को दलितों के साथ साझा करना चाहिए और इसके लिए महिलाओं को ऐसी चीज समझा जाए जिसे आपस में बाँटा जा सकता है।

येगड़े पर यह आरोप भी रहा है कि वो एंटी-ब्राह्मण बातों को आगे बढ़ाने के लिए हिंदू इतिहास और शास्त्रों को तोड़-मरोड़ कर पेश करता है।

ब्राह्मण महिलाओं को लेकर की गई आपत्तिजनक बातें और उन्हें वस्तु की तरह पेश करने के अलावा येंगड़े उनके प्रति साफ तौर पर नफरत भी दिखाता है। उसने उन्हें ‘ध्यान भटकाने का हथियार’ बताते हुए कहा कि उनके लिए उसे कोई सहानुभूति नहीं है।

इस तरह की जातीय बदले की सोच और अतिवादी कल्पनाओं के कारण पोर्न इंडस्ट्री को ‘आखिरी किला’ बताने जैसे दावे भी लोगों को सच लगने लगते हैं। कई मौकों पर कुछ दलित ‘सामाजिक न्याय’ कार्यकर्ताओं द्वारा ऊँची जाति की महिलाओं को मानो इतिहास का बदला लेने के प्रतीक या ट्रॉफी की तरह ‘हासिल’ करने की बात भी कही गई है।

भारत में कई ऐसे उदाहरण सामने आए हैं, जहाँ कुछ दलित कार्यकर्ताओं और एक्टिविस्ट ने खुले तौर पर सामान्य (जनरल) वर्ग की महिलाओं को वस्तु की तरह पेश किया है। सिर्फ राजनेता ही नहीं बल्कि कुछ IAS अधिकारियों तक के ऐसे बयान सामने आए हैं जिनमें यह कहा गया कि सामान्य वर्ग की महिलाएँ मानो कोई ट्रॉफी या वस्तु हैं जिन्हें ‘सामाजिक न्याय’ के एजेंडे को सफल बनाने के लिए दलितों के साथ शेयर किया जाना चाहिए।

साथ ही, पश्चिमी लिबरल विचारधारा के प्रभाव में जहाँ खाने, संगीत और साहित्य जैसी चीजों को भी गलत और सीमित श्रेणियों में बाँटने की प्रवृत्ति है, उसी तरह भारतीय लिबरल वर्ग के कुछ लोग भी इन विचारों को कॉपी-पेस्ट करके भारत में लागू करने की कोशिश कर रहे हैं। यह तरीका मूल रूप से गलत माना जाता है क्योंकि भारतीय सांस्कृतिक विविधता और उसके पहलू पश्चिमी समाज से अलग हैं और उसका विकास अलग परिस्थितियों में हुआ है। ऐसे में पश्चिमी ढाँचे में उन्हें फिट करने की कोशिश सही नहीं बैठती।

                                                    वाइस के एक आर्टिकल का स्क्रीनशॉट

दलित भोजन, दलित संगीत, दलित ‘देवता’, दलित परंपराएँ जैसे विषयों पर कई लेख और किताबें सामने आई हैं। इनमें कुछ भारतीय लेफ्ट-लिबरल समूह पश्चिम की ‘सोशल जस्टिस’ विचारधारा से प्रभावित होकर भारत के समाज और संस्कृति को दलित बनाम ऊँची जाति जैसे सीमित खाँचों में बाँटने की कोशिश करते हैं। कई बार ये चर्चाएँ अजीब तुलना और गलत दावों तक पहुँच जाती हैं।

                       पोर्न को ‘कलंक खत्म करने के हथियार’ के रूप में सही ठहराने वाले एक लेख का स्क्रीनशॉट

इन्हीं बहसों के धीरे-धीरे आम हो जाने की वजह से वह वायरल स्क्रीनशॉट भी लोगों को काफी हद तक सच जैसा लगा। व्यंग्य (सटायर) समाज में चल रही चीजों को हल्के-फुल्के अंदाज में दिखाने का एक तरीका होता है। यह तथ्य कि एक अलग ‘दलित पहचान’ की चीजों को वाम-उदारवादी ‘यौन स्वतंत्रता’ के सामान्य विचारों के साथ मिलाकर वह व्यंग्यात्मक स्क्रीनशॉट बनाया गया और वह कई लोगों को ‘सच’ लगा…यह अपने आप में भी एक तरह का व्यंग्य है।

प्रसून शर्म कर; ‘वाराणसी में 50 बच्चों के पिता का नाम राजकमल दास’: राहुल गाँधी के ‘वोट चोरी’ प्रोपेगेंडा को हवा देने के लिए ‘गुरु-शिष्य’ परंपरा को बदनाम कर रहा कॉन्ग्रेसी इकोसिस्टम

                                                               राहुल गाँधी के झूठ का उजागर
राजनीति में जब कोई भी दल सत्ता में होता है, तो उस पर यह ज़िम्मेदारी होती है कि वह न्यायपालिका, कानून और संवैधानिक संस्थाओं की निष्पक्षता बनाए रखे। लेकिन जब लगातार कुछ विशेष लोगों को ही बार-बार अग्रिम जमानत मिलती है, तो जनता के मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या न्याय सबके लिए समान है?
साभार सोशल मीडिया 
राहुल गांधी, सोनिया गांधी, रॉबर्ट वाड्रा, पी. चिदंबरम जैसे बड़े नामों को अगर हर बार बिना किसी देरी के राहत मिलती है, तो आम नागरिक सोचने पर मजबूर हो जाता है कि क्या यह कानून केवल आम जनता के लिए ही सख्त है? क्या बड़े नामों के लिए अलग मानदंड हैं? यह बात लोकतंत्र की आत्मा पर चोट करती है।
भारत का संविधान सभी नागरिकों को बराबरी का हक़ देता है, फिर चाहे वो प्रधानमंत्री हो या एक आम नागरिक। जब बार-बार एक ही परिवार या पार्टी के लोगों को आसानी से राहत दी जाती है, तो यह न्याय प्रणाली की निष्पक्षता पर सवाल खड़ा करता है। न्यायपालिका का सबसे बड़ा मूल्य है – जनता का विश्वास, और उसे टूटने नहीं देना चाहिए।
इसलिए यह बहुत आवश्यक है कि ऐसे मामलों में केवल अभियुक्तों की जांच ही नहीं, बल्कि फैसला देने वाले न्यायाधीशों की भूमिका की भी समीक्षा की जाए। इससे ना केवल पारदर्शिता बढ़ेगी बल्कि न्यायपालिका में जनता का विश्वास भी मजबूत होगा।
अगर देश का आम नागरिक यह महसूस करने लगे कि उसे न्याय मिलने की संभावना कम है, लेकिन रसूखदारों को तुरंत राहत मिलती है, तो यह व्यवस्था की जड़ों को हिला सकता है। ऐसे में जांच की प्रक्रिया और निर्णय देने वाले न्यायाधीशों की निष्पक्षता पर भी नजर रखना एक ज़रूरी कदम बन जाता है।

कांग्रेस समर्थकों और कुछ कथित पत्रकारों ने इसे सच बताकर खूब प्रचारित किया। लेकिन जब इस वायरल स्क्रीनशॉट दावे की पड़ताल की तो सच्चाई कुछ और ही निकली। दरअसल यह कहानी 2023 के वाराणसी नगर निगम चुनाव की है और 48 बेटों वाली बात एक धार्मिक परंपरा का हिस्सा है, न कि कोई गड़बड़ी।

फैक्ट चेक: क्या रामकमल दास के 48 बेटे हैं?

सोशल मीडिया पर वायरल हुई वोटर लिस्ट के स्क्रीनशॉट में वाराणसी के वार्ड नंबर 51 की मतदाता सूची दिखाई गई है। इसमें एक ही पते पर रहने वाले कई मतदाताओं के पिता का नाम रामकमल दास लिखा गया है। इन सभी मतदाताओं की उम्र अलग-अलग है, जिससे यह दावा किया गया कि एक ही व्यक्ति के इतने सारे बेटे कैसे हो सकते हैं।

यह दावा पूरी तरह से गलत और भ्रामक है। सोशल मीडिया पर वायरल हो रही यह लिस्ट 2023 के वाराणसी नगर निगम चुनाव की है, जिसमें 48 वोटरों के पिता के रूप में राम जानकी मठ के महंत स्वामी रामकमल दास वेदांती का नाम दर्ज है। ये सभी उनके बच्चे नहीं, बल्कि शिष्य हैं।

जब से बिहार में चुनाव आयोग ने SIR यानी स्पेशल इंटेंसिव रिविजन शुरू करने का ऐलान किया है, तभी से विपक्ष बौखला रहा है। विपक्ष आरोप लगा रहा है कि इससे वोटिंग लिस्ट में गड़बड़ियाँ हो रही हैं। 7 अगस्त 2025 को कांग्रेस नेता राहुल गाँधी ने भी एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि वोटर लिस्ट से जानबूझकर छेड़छाड़ की जा रही है।

इसी गर्मा-गर्मी में 2 साल पुरानी एक वायरल तस्वीर सामने आई, जिसमें दावा किया गया कि एक ही व्यक्ति के 48 बेटे हैं। इस फोटो को लेकर सोशल मीडिया पर कई तरह की बातें की जा रही हैं।

असली सच्चाई क्या है?

वायरल तस्वीर की सच्चाई जानने के लिए हमने गूगल पर खोज की। हमें कई बड़े मीडिया प्लेटफॉर्म की खबरें भी मिलीं, जिनमें दैनिक जागरण, अमर उजाला और ईटीवी भारत शामिल है। इनमें सबसे पहले मई 2023 की एक रिपोर्ट पर ध्यान गया।

वायरल तस्वीर वाराणसी की वोटर लिस्ट की है। यह लिस्ट वार्ड नंबर 51 भेलूपुर की नगर निगम चुनाव के दौरान बनी थी। इसमें एक नाम है– रामकमल दास। उन्हें 48 लोगों का पिता बताया गया है।

अब जानिए असल बात। रामकमल दास एक साधु महात्मा हैं। वह शादीशुदा नहीं हैं। वह वाराणसी के राम जानकी मठ के महंत हैं। उनके साथ जो 48 लोग रहते हैं, वे उनके बेटे नहीं बल्कि शिष्य हैं। मठ में गुरु-शिष्य परंपरा चलती है। यहाँ शिष्य अपने गुरु को पिता जैसा मानते हैं।

जब ये शिष्य वोटर लिस्ट में नाम जुड़वाते हैं तो पिता के नाम की जगह गुरु का नाम लिखते हैं। इसलिए सभी ने रामकमल दास का नाम पिता के तौर पर दिया। यह कोई धोखा या फर्जीवाड़ा नहीं है।

मठ के प्रबंधक ने भी यही बात बताई। उन्होंने कहा कि ये सभी शिष्य मठ में ही रहते हैं। कुछ तो आजीवन वहीं रहते हैं। उनकी पढ़ाई के कागजों में भी पिता के नाम पर गुरु का नाम होता है। पहले लिस्ट में 150 और नाम भी थे, लेकिन बाद में कुछ हटाए गए। अब कुल 48 शिष्यों का नाम लिस्ट में है।

हमने निर्वाचन आयोग की वेबसाइट से लिस्ट भी चेक की। B, 24/19 नाम के घर में 51 वोटर्स हैं। इनमें 48 ने रामकमल दास को पिता बताया है। यह जानकारी आपको भाग-5, संख्या-725 पर मिलेगी। कई की उम्र एक जैसी है- जैसे 13 लोग 37 साल के हैं। बाकी की उम्र भी 39, 40 या 42 साल है।

रामकमल दास किसी के जैविक पिता नहीं हैं। जो नाम उनके नीचे लिखे हैं, वे शिष्य हैं, बेटे नहीं। यह परंपरा के तहत हुआ है। और यह सब कानूनी और सही तरीके से हुआ है। सोशल मीडिया पर जो बातें फैलाई गईं, वो अधूरी और भ्रामक हैं।

उत्तराखंड : ‘रुड़की का यूट्यूबर जला रहा है कुरान, वीडियो है वायरल’: जुबैर ने फैलाया झूठ, पोल खोलकर बैठ गई पुलिस; इस नफरती पर पुष्कर धामी और अमित शाह द्वारा सख्त कार्यवाही कब?

पुलिस ने जुबैर के मंसूबो पर पानी फेर दिया (चित्र साभार: Swarajya & iamharunkhan/X)
ऑल्ट न्यूज के मोहम्मद जुबैर ने एक बार फिर एक भड़काऊ खबर साझा की है। मोहम्मद जुबैर ने कुरान जलाने को लेकर एक खबर साझा की जिसका हरिद्वार पुलिस ने फैक्ट चेक कर दिया। जुबैर ने अपने पोस्ट में कुरान जलाने की बात को एकदम सही मान लिया था लेकिन पुलिस ने उसके मंसूबों पर पानी फेर दिया।
जिस Ex-Muslim समीर को बदनाम करने इस फिरकापरस्त ने कोशिश की है, इसी समीर और अन्य Ex-Muslims द्वारा youTube पर Jaipur Dialogue और News Nation चैनल पर 'इस्लाम क्या कहता है' आदि पर नूपुर शर्मा विवाद के दिनों इन जैसे कट्टरपंथियों को बेनकाब करते देखे गए हैं। सारा डरपोक मीडिया नूपुर को ही गलत बता रहे थे, लेकिन इन Ex-Muslim के प्रहारों के आगे air condition कमरों में बैठने के बावजूद बड़े-बड़े मौलानाओं को पसीने पोंछते देखा गया है। 

उत्तराखंड और केंद्र सरकार को मालूम होना चाहिए कि इसी नफरती द्वारा नूपुर शर्मा की गलत वीडियो फैलाने से देश में कितना उपद्रव मच चुका है। कट्टरपंथियों के हाथों कन्हैया लाल अपनी जान गँवा चुका है, उस दर्दनाक मौत को नहीं भूलना चाहिए। हालाँकि बीच में इसने ऐसी ही कोशिश की थी, गनीमत है मुसलमानों ने उसे गंभीरता से नहीं लिया। लेकिन यह मुद्दा बहुत संवेदन है, इसे केवल warning देकर नहीं छोड़ना चाहिए। ऐसी भ्रामक खबरें फ़ैलाने के कौन इसे finance कर रहा है, गंभीर जाँच की जरुरत है। क्या उत्तराखंड और केंद्र सरकारें दूसरा नूपुर शर्मा कांड का इंतज़ार कर रहे हैं?  

स्वघोषित फैक्ट चेकर मोहम्मद जुबैर ने एक्स (पहले ट्विटर) पर एक पोस्ट में लिखा, “सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हो रहा है जिसमें रूड़की का एक यूट्यूबर कुरान जलाते और उसे नष्ट करते हुए दिख रहा है। इस मामले को रूड़की पुलिस जल्दी देखे।” जुबैर ने यह लिखते हुए वीडियो साझा नहीं की।

हर बात का फैक्ट चेक करने वाले जुबैर ने इस मामले में फैक्ट चेक करके सच्चाई सामने लाना सही नहीं समझा और इस खबर को इस तरीके से साझा किया कि लोग सच ही मान लें। जुबैर ने ना ही यह बताया कि यह वीडियो पुराना है और ना ही यह बात स्पष्ट की कि वीडियो बनाने वाले के बारे में अभी कोई स्पष्ट जानकारी उपलब्ध नहीं है।

हालाँकि, मोहम्मद जुबैर की इस मंशा को हरिद्वार पुलिस ने ध्वस्त कर दिया। उसने इस वीडियो की सच्चाई बताते हुए लिखा, “संदर्भित प्रकरण में Ex-मुस्लिम समीर पिछले लगभग 03 साल से ‘पाडली गुर्जर’ नामक स्थान में नहीं रह रहा है और न ही जनपद हरिद्वार में कहीं भी पवित्र कुरान की बेअदबी का कोई प्रकरण हुआ है। अतः बिना जानकारी के प्रकरण को शेयर न करें अन्यथा आपके विरुद्ध वैधानिक कार्यवाही की जा सकती है।”

लोगों ने हरिद्वार पुलिस के स्पष्टीकरण के बाद जुबैर को प्रश्न उठाए और कार्रवाई की माँग की। एक यूजर ने लिखा, “पुलिस इस तरह की किसी भी घटना होने से इनकार कर रही है। तुमने तथ्यों की जाँच क्यों नहीं की और पुलिस से स्पष्टीकरण प्राप्त किए बिना इसे पोस्ट क्यों नहीं किया? तुमने स्पष्टीकरण के लिए हर दूसरी घटना की तरह उत्तराखंड पुलिस से संपर्क क्यों नहीं किया? उत्तराखंड पुलिस कृपया इस पोस्ट पर संज्ञान ले। जुबैर नाम का शख्स फर्जी जानकारी देकर सांप्रदायिक हिंसा भड़काने की कोशिश कर रहा है।”

ऐसी खबरों से साम्प्रादायिक तनाव फैलने का खतरा लगातार बना रहता है। इससे पहले जब मोहम्मद जुबैर ने भाजपा प्रवक्ता नुपूर शर्मा का एक कटा हुआ वीडियो साझा किया था, तब उन्हें मारने और ‘सर तन से जुदा’ की धमकियाँ मिली थीं। कट्टरपंथियों ने देश में इसके बाद हिंसा की थी। इसी के बाद उदयपुर में दरजी कन्हैया लाल की हत्या कर दी गई थी। ऐसे प्रकरणों के बाद जुबैर पर कार्रवाई की माँग तेज हो गई है।

गुरुग्राम में हिन्दू संगठनों के नाम से पोस्टर लगाने वाला निकला आसिफ, ‘झुग्गी खाली करें मुस्लिम, वरना होगा बहन-बीवी का बलात्कार’: कांग्रेस-सपा ने हिन्दुओं को कहा भला-बुरा

VHP और बजरंग दल को बदनाम करने के लिए आसिफ (बाएँ) ने लगाए धमकी वाले पोस्टर
गुरुग्राम के सेक्टर 69- A क्षेत्र में 26-27 अगस्त 2023 की रात लगे कुछ पोस्टरों से माहौल तनावपूर्ण हो गया था। इन पोस्टरों में ‘विश्व हिन्दू परिषद’ (VHP) और ‘बजरंग दल’ के नाम से झुग्गी-झोपड़ी खाली करने की धमकी लिखी थी। धमकी में झुग्गियाँ खाली करने की डेडलाइन 28 अगस्त रखी गई थी। इन पोस्टरों को ले कर इस्लामी और वामपंथी समूहों सहित कॉन्ग्रेस पार्टी के नेताओं ने हिन्दू संगठनों को बदनाम करने की पूरी कोशिश की।

आखिरकार इस पूरी साजिश की जड़ में आसिफ नाम का एक कबाड़ी शामिल मिला। पुलिस ने आसिफ को गुरुवार (21 सितंबर, 2023) को गिरफ्तार कर लिया।

कबाड़ कारोबार पर बादशाहत की चाहत

मामला गुरुग्राम के थाना क्षेत्र बादशाहपुर का है। 22 सितंबर, 2023 को गुरुग्राम पुलिस ने आसिफ की गिरफ्तारी की सूचना सार्वजनिक की। पुलिस ने बताया कि 26-27 अगस्त की रात लगे पोस्टरों की FIR 28 अगस्त को दर्ज हुई थी। मामले की जाँच क्राइम ब्रांच ने की थी। पुलिस ने धमकी भरे पोस्टरों को लगाने के आरोप में उत्तराखंड के उधमसिंहनगर के गाँव सरकहड निवासी आसिफ को गिरफ्तार किया। पूछताछ में आसिफ ने बताया कि उसकी कबाड़ की दुकान गुरुग्राम के सेक्टर 69 के पास है। दुकान के पास एक अन्य कबाड़ी की भी दुकान है।
पुलिस के मुताबिक, आसिफ ने बताया कि वह कबाड़ के काम में आसपास कोई कम्पटीशन नहीं चाहता था। वह पड़ोस के दुकानदार को भगाना चाहता था। इसी साजिश के तहत उसने पड़ोसी की दुकान के आगे धमकी भरे पोस्टर चिपका दिए थे। आसिफ ने पुलिस के आगे अपना गुनाह कबूल कर लिया है। उसे जेल भी भेज दिया गया है। हालाँकि, केस में अभी जाँच जारी है।

आसिफ की साजिश को कट्टरपंथी, वामपंथी और राजनैतिक हवा

बड़े-बड़े शब्दों में सूचना हेडिंग के साथ इस पोस्टर में लिखा था, “सारे झुग्गी वालों को सूचित किया जाता है 28-08-2023 तक खाली कर के चले जाओ वरना इसका अंजाम बहुत बुरा होगा। अगर नहीं गए तो अपनी मौत का जिम्मेदार खुद होगा। जितना जल्दी हो सके तुम सब खाली कर दो। साले मुल्ले लोगों की बहन-बीवी का बलात्कार होगा। अगर इज्जत बचाना है तो बचा लोग। तुम्हारे पास दो दिन हैं। फिर मत चिल्लाना।” पोस्टर के अंत में बहन की गालियाँ देते हुए नीचे लिखा, “तुम्हारा बाप बजरंग दल।” लगभग इन्हीं शब्दों के साथ लिखे एक अन्य पोस्टर में नीचे विश्व हिन्दू परिषद लिख दिया गया था। हाथ से लिखे इन पोस्टरों को गोंद से चिपकाया गया था।
आफरीन नाम के हैंडल ने नूहं हिंसा के दौरान फर्जी ट्वीट कर के बिना माफ़ी माँगे डिलीट करने वाले पुनीत कुमार सिंह के ‘बोलता हिंदुस्तान’ की इस मुद्दे पर बनी खबर शेयर की। 31 अगस्त को कैप्शन में उन्होंने लिखा था, “ये ज़रूर सड़े हुए नारंगी संतरों के छिलकों का काम है क्या पुलिस इस मामले की जाँच करेगी? या जब यह मामला खराब हो जाएगा तब एक्शन लेगी पुलिस, वो भी सिर्फ़ मुसलमानों पर, क्योंकि धमकी मुस्लिमों को मिल रही हैं। अभी खामोश रहिए क्योंकि खट्टर सरकार और गुड़गांव (गुरुग्राम) पुलिस सो रही है।”
NDTV ने तो बाकायदा इस पर एक शो बना डाला। NDTV के एंकर मुसलमानों के खिलाफ आपत्तिजनक पोस्टर लगाने वालों की गिरफ्तारी की माँग जोर-शोर से उठाते दिखे। NDTV ने इसी शो में मुस्लिम कामगारों को डरा हुआ घोषित कर दिया। NDTV ने अपने शो में नफरती पोस्टर लगाने की वजह झुग्गी में रहने वाले ज्यादातर लोगों के मुस्लिम समुदाय का होना बताया। 3 मिनट से अधिक लम्बे 
इसी शो में यह भी बताते का प्रयास हुआ कि नूहं हिंसा में भी मुस्लिम ही पीड़ित हैं।
गुरुग्राम में रहने वाले बिहार के अररिया से कॉन्ग्रेस नेता बदरे आलम ने इस खबर को शेयर किया। 31 अगस्त को उन्होंने लिखा, “दिल्ली से सटे हुए हरियाणा गुरुग्राम में मुस्लिम कामगार डरे हुए हैं। गुरुग्राम के सेक्टर 70 के पास एक मुसलमान की झुग्गी में धमकी भरी पोस्टर लगाए गए। कहा जा रहा है कि वह यहाँ छोड़ कर चले जाएँ वरना झुग्गी जला दी जाएगी।”
लगातार हिन्दू संगठनों के खिलाफ भ्रामक खबरें छापने वाले पोर्टल ‘जर्नो मिरर’ ने तो 29 अगस्त को इस मामले में हिन्दू संगठनों को दोषी ठहरा दिया था। पुलिस जाँच का इंतज़ार किए बिना ही सीधे तौर पर मीडिया संस्थान ने इन पोस्टरों के पीछे VHP और ‘बजरंग दल’ वालों को जिम्मेदार बता डाला था।
                                                               चित्र- journomirror.com
इन सभी के अलावा सदफ आफरीन के साथ-साथ समाजवादी पार्टी के नेता संतोष कुमार यादव और कॉन्ग्रेस नेता डॉ अरुणेश कुमार यादव ने भी इस मुद्दे पर बिना पुलिस की जाँच रिपोर्ट आए ही हंगामा मचाना शुरू कर दिया। कुछ के निशाने पर हरियाणा सरकार थी तो कुछ के हिंदूवादी संगठन। इन सभी के ट्वीट 28 अगस्त से 1 सितंबर के बीच सिलसिलेवार ढंग से आए।
                                                चित्र साभार- ट्विटर पोस्ट के स्क्रीनशॉट्स

27 अगस्त को ही आ चुका था आसिफ का नाम

इस मामले में इस्लामी, वामपंथी हैंडलों, NDTV के अलावा कॉन्ग्रेसी और समाजवादी पार्टी नेताओं ने हंगामे की शुरुआत 28 अगस्त से की। लेकिन, ख़ास बात ये है कि घटना में आसिफ कबाड़ी का नाम एक दिन पहले 27 अगस्त को ही आ चुका था। 27 अगस्त, 2023 को ही मोजेद अली नाम के शिकायतकर्ता ने पुलिस में आसिफ के खिलाफ नामजद FIR दर्ज करवा दी थी। मोज़ेद अली की ही दुकान पर 26-27 सितंबर को आसिफ ने VHP और बजरंग दल के नाम से धमकी भरे पोस्टर चिपकाए थे। पुलिस में दर्ज कराई गई FIR में मोज़ेद अली ने पोस्टर चिपकाने के पीछे आसिफ के होने की आशंका जताई थी।
                                                                     FIR कॉपी
मोज़ेद ने यह भी बताया था कि 3-4 दिन पहले आसिफ ने उन्हें धमकी दे कर कबाड़ी की दुकान बंद करने के लिए कहा था। FIR में आसिफ पर धार्मिक भावनाएँ भड़काने का आरोप लगाया गया। आसिफ को नामजद करते हुए पुलिस ने FIR में IPC की धारा 188, 294, 295- A, 504 और 506 लगाई थी। मोज़ेद अली उसी ऋषि पंडित की झुग्गी में रहते हैं जिसे खाली करने के पोस्टर लगाए गए थे। शिकायतकर्ता मोज़ेद मूल रूप से पश्चिम बंगाल के मालदा के रहने वाले हैं। वह सेक्टर 69 गुरुग्राम में चाय-पानी बेचते हैं और कबाड़ का काम करते हैं।

कई हिन्दू हुए हैं ऐसी साजिशों के शिकार

ऑपइंडिया ने इस मामले में गुरुग्राम निवासी और ‘हरियाणा प्रदेश शिवसेना युवा मोर्चा’ (शिंदे गुट) अध्यक्ष रितुराज अग्रवाल से बात की। ऋतुराज ने बताया कि भले ही इस मामले में गुरुग्राम पुलिस ने खुलासा करते हुए असल आरोपित आसिफ को पकड़ लिया लेकिन इस से पहले भी ऐसी कई साजिशें हो चुकी हैं। शिवसेना नेता का दावा है कि उन साजिशों के शिकार कई हिन्दू संगठन के सदस्यों को कानूनी कार्रवाई झेलना पड़ा है। उन्होंने यह भी बताया कि जिस जगह यह पोस्टर लगाए गए उसके आसपास के सेक्टरों में कुछ माह पहले खुले में नमाज़ को ले कर भी तनातनी हुई थी।

नूहं से जोड़ कर थी सनसनी फैलाने की साजिश

ऑपइंडिया से बात करते हुए ‘विश्व हिन्दू परिषद’ गुरुग्राम के जिला मंत्री यशवंत ने पोस्टर लगाने और उसे वायरल करने की टाइमिंग पर सवाल खड़ा किया। यशवंत ने हमें बताया कि हिन्दू संगठनों ने 28 अगस्त को अधूरी बृजमंडल यात्रा को पूरा करने का संकल्प लिया था। इस बीच 26-27 की रात ये पोस्टर लग गए। ऐसा तब हुआ जब पुलिस हाई अलर्ट पर थी। यशवंत ने आशंका जताई कि इस पूरे मामले को बृजमंडल यात्रा से जोड़ कर बड़ी सनसनी की साजिश रही होगी। उन्होंने हमें बताया कि वो जल्द ही पुलिस को ज्ञापन दे कर इस मामले की गहराई से जाँच करने की माँग करेंगे।
VHP नेता ने यह भी बताया कि जैसे ही ये पोस्टर घटना के बाद वायरल हुए थे तभी उन लोगों ने खुल कर लोगों और मीडिया के साथ प्रशासन को भी बता दिया था कि ऐसी हरकतें VHP या बजरंग दल नहीं करते। यशवंत ने तनाव के माहौल में पुलिस द्वारा रखे धैर्य और अंत में सही कार्रवाई की तारीफ की।                                                         (साभार)