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पांच साल में भारतीय व्हिस्की की मांग 50 प्रतिशत बढ़ी

In five years, the demand for Indian whiskey increased 50 percent, the coffin remained neutralभारतीय व्हिस्की ने बीते पांच साल में 50 प्रतिशत की वृद्धि हासिल की है। यही नहीं, हाइवे के आसपास 500 मीटर के दायरे वाले बैन, नोटबंदी और ऐसी ही कई मुश्किलों के बाद भी बीते साल बिक्री में 11 फीसदी  का इजाफा हुआ है। खास बात यह है कि वैश्विक स्तर बिकने वाली पर हर पांच में तीन भारतीय ब्रांड की व्हिस्की है। 

भारत में व्हिस्की का मतलब ही शराब 

इंटरनेशनल वाइन और स्प्रिट रिसर्च (IWSR) के नए आंकड़ों के अनुसार व्हिस्की, वोदका, जिन, रम और ब्रांडी में से एक भारतीय संस्करण का ब्रांड है। एलाइड ब्लेंडर्स के एक्जीक्यूटिव वाइस चेयरमैन दीपक रॉय ने कहा कि इंडियन ड्रिंक्स ज्यादा स्ट्रांग होते हैं इसलिए लोगों को पसंद आ रहे हैं। 34 मिलियन लीटर से ज्यादा की बिक्री वाले ऑफिसर्स च्वाइस के निर्माता कहते हैं कि व्हिस्की भारत में शराब का डिफ़ॉल्ट विकल्प है। इसमें दक्षिण भारत अपवाद हैं। वहां ब्रांडी ज्यादा पसंद की जाती है। इसके अलावा जिन और वोदका आम तौर पर कॉकटेल से जुड़ी होती हैं। इसलिए व्हिस्की की बिक्री ज्यादा है। 

पर रूसी वोदका की तरह पहचान नहीं 

हालांकि भारत में चीन के बैजू या रूसी वोदका की तरह कोई प्रमुख देशी शराब नहीं बिकती है। भारत में यूरीपीय स्प्रिट से ही भारत निर्मित विदेशी शराब बनाई जाती है। यूनाइटेड स्पिरिट्स लिमिटेड (USL) और Pernod Ricard के स्वामित्व वाले ब्रांडों का 90 प्रतिशत बाजार पर कब्जा है। 

बहुमत से दूर रह सकता है NDA

Image result for मनमोहन सिंह pngआर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
चुनावों की तारीख का ऐलान हो चुका है। 7 चरणों में होने वाले चुनावों के नतीजे 23 मई को सामने आएंगे। लेकिन उससे पहले प्री पोल सर्वे में दावा किया गया है कि बीजेपी नीत एनडीए बहुमत के आंकड़े से थोड़ा पीछे रह सकता है। यूपीए तमाम कोशिशों के बाद भी 141 तक ही पहुंच पाएगा. सी-वोटर-आईएएनएस के मत सर्वेक्षण में एनडीए को 264 सीटें मिलने की संभावना जताई गई है, जो सरकार बनाने के लिए आवश्यक 272 सीटों के आंकड़े से आठ कम है। 
लोकसभा चुनाव में मुख्य मुकाबला प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाले राजग और राहुल गांधी के नेतृत्व वाले संप्रग के बीच बना हुआ है, लेकिन अगली सरकार के गठन में गैर भाजपा और गैर कांग्रेस क्षेत्रीय दलों का गठबंधन महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। एनडीए में जनता दल युनाइटेड और लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा) बिहार में 20 सीटें जीत सकते हैं, जबकि 14 सीटों के साथ शिवसेना एक दूसरा मजबूत साझेदार बनकर उभर सकती है। मोदी सरकार की एक सर्वाधिक मुखर आलोचक शिवसेना चार सीटें गंवा सकती है।
सरकारी कर्मचारियों की पेंशन 
अटल बिहारी वाजपेयी कारगिल युद्ध जीतने के बाद भी सत्तामुक्त हो गए थे, उसका कारण था, सरकारी कर्मचारियों की पेंशन का बंद होना, जिस कारण सरकारी कर्मचारियों में वाजपेयी सरकार के प्रति काफी रोष था। लेकिन आज वही रोष पुनः सरकारी कर्मचारियों में घर कर रहा है। उनका कहना है कि जब हम इतने वर्ष नौकरी करने उपरान्त भी पेंशन के अधिकारी नहीं, फिर निगम पार्षद से लेकर सांसद तक को किस आधार पर पेंशन दी जाती है। इन्दिरा गाँधी ने प्रिवी पर्स समाप्त किया था, लेकिन ये आज के आधुनिक राजा बने हुए हैं। आज मोबाइल कम्पनियां इतनी सुविधाएँ दे रही है, उसके बावजूद इनको हज़ारों में टेलीफोन फ्री है, बिजली, पानी फ्री आदि आदि। परन्तु सरकारी कर्मचारियों को यह भी नहीं भूलना चाहिए कि यदि वाजपेयी सरकार ने उनकी पेंशन बंद की थी, तो उसे अटल बिहारी के बाद रही किसी सरकार ने नहीं दी। जो स्पष्ट करता है, कि सरकारी बाबू तो क्या किसी की किसी सरकार अथवा नेता को चिन्ता नहीं।   
भाजपा के विरुद्ध हो सकता है प्रचार 
जनता लोकसभा चुनावों में भाजपा को सफाई अभियान, अयोध्या में राममन्दिर, कश्मीरी पंडितों का मसला, कश्मीर में अनुच्छेद 370 और 35A के विषय में घेर सकती है। सफाई अभियान से भाजपा विरोधी तो क्या भाजपा के ही अधिकतर कार्यकर्ता/नेता खुश नहीं थे। अपने घरों में जो एक ग्लास पानी भी नौकर अथवा अपनी पत्नी से माँगकर पीते हैं, उन्हें सड़क पर झाड़ू लगानी पड़ी; हालाँकि जिस क्षेत्र में सफाई होती थी, वहाँ जनता के उठने से पूर्व ही नगर निगम के सफाई कर्मचारी झाड़ू लगा चूकते थे, अन्यथा अगली बार उनके फ़रिश्ते भी इस अभियान में भाग नहीं लेते। प्रमाण के लिए कभी भी उन क्षेत्रों में कूड़े के ढेर देखे जा सकते हैं। 
अयोध्या मुद्दा 
जहाँ तक अयोध्या में राममन्दिर की बात है, अन्य सरकारों की भाँति पूर्ण बहुमत वाली भाजपा सरकार भी लॉलीपॉप देकर मुर्ख बनाती रही। जो 5 सालों में अयोध्या, काशी और मथुरा लम्बित समस्याओं को नहीं सुलझा सकी, उस सरकार से हिन्दू क्या अपेक्षा कर सकता है? विपक्ष चुनावों तक इन समस्याओं को लटकाने में सफल रहा और बहुमत वाली सरकार असफल। 
कश्मीर समस्या 
कश्मीर समस्या भी लगभग ज्यूँ की त्यूं बनी हुई है। न वहाँ से धारा 370 और धारा 35A समाप्त हुई और न ही घाटी से निकाले गए कश्मीरी पंडितों को पुर्नवास करवाया जा सका। हुर्रियत नेताओं पर भी कार्यवाही अपने शासन के अन्तिम पड़ाव पर की, यदि यही कदम, एक वर्ष पूर्व उठाया गया होता, कश्मीर के हालात कुछ सुधर गए होते, जिसका अब चुनावों में भाजपा को लाभ भी मिलता।   
एनडीए को दक्ष‍िण में खोजने होंगे साझेदार
एनडीए को अगले चुनावों में 300 के पार जाने के लिए दक्ष‍िण के राज्‍यों में नए साझीदार बनाने होंगे।अनुमान जाहिर किया गया है कि आंध्र में जगन रेड्डी की वाईएसआरसीपी, केसीआर की टीआरएस और ओडि‍शा में बीजेडी 36 सीटें जीत सकती हैं। इसमें वाईएसआरसीपी को आंध्र प्रदेश में 11 सीटें मिल सकती हैं, बीजद को ओडिशा में नौ और टीआरएस तेलंगाना में 17 में से 16 सीटें जीत सकती है। इन तीनों पार्टियों के समर्थन से राजग न केवल बहुमत पा सकता है, बल्कि लोकसभा में 300 का आंकड़ा पार कर सकता है। 
चुनाव बाद गठबंधन से भी संप्रग के पास पर्याप्त सीटें नहीं
चुनाव पूर्व सर्वेक्षण में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन से पिछड़ने के बाद कांग्रेस नीत संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) की नजर उत्तर प्रदेश में महागठबंधन पर और पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस पर टिकी है, जिससे वह अपने खाते में कुछ सीटें जोड़ सके। सी-वोटर-आईएएनएस सर्वेक्षण में अनुमान लगाया गया है कि उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी (सपा) और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के महागठबंधन को 47 सीटें मिल सकती हैं। पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस 34 सीटों पर जीत बरकरार रख सकती है। संप्रग को 141 सीटें मिलने का अनुमान लगाया गया है, जिसमें कांग्रेस की 86 और सहयोगी दलों की 55 सीटें शामिल हैं। 
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चुनाव बाद गठबंधन से भी संप्रग के पास पर्याप्त सीटें नहीं
चुनाव पूर्व सर्वेक्षण में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन से पिछड़ने के बाद कांग्रेस नीत संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) की नजर उत्तर प्रदेश में महागठबंधन पर और पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस पर टिकी है, जिससे वह अपने खाते में कुछ सीटें जोड़ सके। सी-वोटर-आईएएनएस सर्वेक्षण में अनुमान लगाया गया है कि उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी (सपा) और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के महागठबंधन को 47 सीटें मिल सकती हैं। पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस 34 सीटों पर जीत बरकरार रख सकती है। संप्रग को 141 सीटें मिलने का अनुमान लगाया गया है, जिसमें कांग्रेस की 86 और सहयोगी दलों की 55 सीटें शामिल हैं। 
फ़ोटो का कोई वर्णन उपलब्ध नहीं है.
बस, जनता के सम्मुख नरेन्द्र मोदी के समक्ष कोई कद्दावर नेता न होने के कोई अन्य विकल्प नहीं। केन्द्र और राजधानी दिल्ली में सत्ता परिवर्तन होने पर जनता को भ्रष्टाचार से मुक्ति मिलने की पूरी उम्मीद थी, जिस पर दोनों पार्टियों-भाजपा और आप- ने पूर्णरूप से निराश किया। दिल्ली नगर निगम हो, बिजली विभाग हो(जब दिल्ली में बिजली विभाग का निजीकरण हुआ है, बिजली चोरी और भ्रष्टाचार बड़ा है, कम नहीं हुआ। उपभोक्ता को नाम बदलवाने में कितनी परेशानी होती है, अधिकारीयों को कोई मतलब नहीं, नया मीटर मिल जायेगा, लेकिन नाम बदलने में परेशानी। बहुत है समस्याएँ, जिनके बारे में बाद में।), या कोई अन्य सार्वजनिक उपक्रम भ्रष्टाचारी बिना रिश्वत लिए काम करने को तैयार नहीं। जहाँ तक अदालतों की बात है वहाँ तो एक कहावत तब से मशहूर है, --जब भारत ब्रिटिश सरकार के अधीन था, हाई कोर्ट लाहौर में होती थी और दिल्ली में कश्मीरी गेट स्थित रिट्ज सिनेमा के निकट कोर्ट होती थी, जहाँ मात्र 4 अथवा 5 जज होते थे, तब से-- "कोर्ट में केवल वही खड़ा हो सकता है, जिसके पैरों में लोहे का जूता हो और सोने(स्वर्ण) के हाथ", अन्यथा मुवक्किल जीता हुआ मुकदमा भी हार जाएगा। आज तक कोई भी सरकार झूठा केस दर्ज़ करने वालों के विरुद्ध कोई सख्त कानून नहीं बना सकी, यदि ऐसा कोई कानून है, तो उस पर अमल नहीं होता, और वह क्यों नहीं होता, पाठक मुझसे अधिक समझदार हैं।       

नोटबंदी का ब्लैकमनी पर नहीं होगा कोई असर, RBI ने पहले ही कर दिया था आगाह

RBI board warned of noteban's short-term impact on economy; no material effect on black money
रिजर्व बैंक (RBI) ने डिमोनेटाइजेशन (demonetisation) के अल्पकालिक नकारात्मक प्रभावों के बारे में पहले ही सरकार को आगाह कर दिया था। साथ ही RBI का अनुमान था कि इस अप्रत्याशित फैसले से ब्लैकमनी (black money) की चुनौती से पार पाने में कोई खास मदद नहीं मिलेगी। दिलचस्प यह है कि मौजूदा गवर्नर शक्तिकांत दास (Shaktikanta Das) भी तत्कालीन आरबीआई बोर्ड के सदस्य थे। एक आरटीआई (RTI) के जवाब में आरबीआई (RBI) द्वारा जारी मीटिंग के मिनट्स में ये बातें सामने आई हैं।

नोटबंदी के ऐलान से ढाई घंटे पहले हुई थी मीटिंग

यह मीटिंग प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Narendra Modi) द्वारा 8 नवंबर, 2016 को डिमोनेटाइजेशन (demonetisation) के फैसले के ऐलान से ठीक ढाई घंटे पहले हुई थी। देश को दिए गए इस झटके का प्रमुख उद्देश्य ब्लैकमनी पर शिकंजा कसना था, जिसके लिए देश में 500 और 1000 रुपए की वैल्यू वाले नोटों का सर्कुलेशन बंद कर दिया गया था। इन नोटों की देश में चलन में मौजूद कुल करंसी में 86 फीसदी हिस्सेदारी थी।

मीटिंग में ये लोग रहे थे मौजूद

इस अहम बोर्ड मीटिंग के मिनट्स तत्कालीन आरबीआई गवर्नर (RBI Governor) उर्जित पटेल (Urjit Patel) और तत्कालीन आर्थिक मामलों के सचिव शक्तिकांत दास की मौजूदगी में रिकॉर्ड किए गए थे। इसी मीटिंग में सरकार के डिमोनेटाइजेशन के अनुरोध पर मुहर लगाई गई थी। बोर्ड मीटिंग में तत्कालीन वित्त सेवा सचिव अंजलि छिब दुग्गल और आरबीआई डिप्टी गवर्नर आर गांधी और एस एस मूंदड़ा भी शामिल थे। गांधी और मूंदड़ा अब बोर्ड में शामिल नहीं हैं, वहीं दास को दिसंबर, 2018 में डिप्टी गवर्नर नियुक्त कर दिया गया था।

सराहनीय प्रयास, लेकिन ब्लैकमनी पर नहीं होगा असर

आरटीआई एक्टिविस्ट वेंकटेश नायक द्वारा कॉमनवेल्थ ह्यूमन राइट्स इनीशिएटिव पर पोस्ट किए गए मिनट्स के मुताबिक, ‘यह एक सराहनीय प्रयास है, लेकिन चालू वर्ष में जीडीपी पर इसके अल्पकालिक नकात्मक असर पड़ेंगे।’
बोर्ड ने दिल्ली में हुई 561वीं मीटिंग में माना था, ‘अधिकांश ब्लैकमनी कैश में नहीं है, बल्कि यह गोल्ड या रियल एस्टेट जैसी संपत्तियों के रूप में हैं। इस फैसले से इन एसेट्स पर कोई खास असर नहीं पड़ेगा।’ आम जनता को छोड़िये, नेताओं को ही देख लीजिए:

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60 लाख की ठगी में हरियाणवी नायिका गिरफ्तार

नोटबंदी (Demonetization) के दौरान एक महिला से 60 लाख रुपये की धोखाधड़ी करने के मामले में हरियाणा से एक्ट्रेस-सिंगर शिखा राघव (27) को दिल्ली पुलिस ने गिरफ्तार किया है। यह गिरफ्तारी जनवरी 10 को उत्तरी जिला पुलिस ने की है। उसे 60 लाख रुपये की धोखाधड़ी में दो साल पहले दिल्ली की कोर्ट ने भगोड़ा घोषित किया था। वह काफी समय से हरियाणा और दिल्ली पुलिस को चकमा दे रही थी, अब जाकर वह गिरफ्त में आई है। 
दिल्ली पुलिस की आधिकारिक जानकारी के मुताबिक, सिंगर शिखा राघव को बृहस्पतिवार को स्थानीय पुलिस की मदद से हरियाणा के बहादुरगढ़ से गिरफ्तार किया। गिरफ्तारी के दौरान शिखा शूटिंग कर रही थी।
आरोप
उत्तरी जिला पुलिस के मुताबिक, दो साल पहले नवंबर 2016 में हुई नोटबंदी के दौरान एक महिला के पास पुराने नोट थे। आरोप है कि हरियाणा की सिंगर-एक्ट्रेस ने महिला को नोट बदलवाने का झांसा देकर 60 लाख रुपये ले लिए, लेकिन उसने महीनों तक अपना वादा नहीं निभाया। महिला ने इस बाबत कई बार शिखा से गुजारिश की, लेकिन उसने साफतौर पर मना कर दिया। इसके बाद पीड़ित महिला ने अपनी शिकायत पुलिस में दर्ज करवाई थी, जिसमें शिखा को नामजद किया था।
ऐसे हुई गिरफ्तारीदिल्ली पुलिस ने बताया कि जनवरी 10 को दिन में शूटिंग के दौरान शिखा को हरियाणा के बहादुरगढ़ से गिरफ्तार कर लिया गया। इस मामले में पुलिस शिखा के साथी पवन को पहले ही गिरफ्तार कर चुकी है। पुलिस ने शिखा की गिरफ्तारी के लिए स्थानीय पुलिस की भी मदद ली। वहीं, शिखा को इस बात भनक नहीं थी कि पुलिस शूटिंग स्थल के इर्द-गिर्द तैनात है और वह गिरफ्तार होने वाली है।
कौन है पीड़िता, जिसके साथ हुई 60 लाख की धोखाधड़ी
जानकारी के मुताबिक, दिल्ली के राणा प्रताप बाग की रहने वाली संतोष भारद्वाज हरियाणा सिंगर-एक्ट्रेस शिखा राघव के झांसे में आई थी। शिखा ने अपने रसूख का हवाला देते हुए कहा था कि उसकी बड़े लोगों से जान पहचान है, इसलिए वह आसानी से पुराने नोट बदलवाकर नए नोट दिलवा देगी।  संतोष भी शिखा की बातों में आ गई और 60 लाख रुपये दे दिए।

दिल्ली की रामलीला में सीता बनती थी शिखा
ठगी की पीड़िता संतोष ने बताया कि वह सुभाष प्लेस रामलीला कमेटी में सलाहकार थी। इस दौरान उसकी मुलाकात एक्ट्रेस शिखा राघव व पवन से हुई थी। जहां  पवन राम की भूमिका तो सीता की भूमिका शिखा निभा रही थी।
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उत्तर प्रदेश के बहराइच स्थित कतर्नियाघाट वन्य जीव विहार में अवैध शिकार करने के आरोप में गिरफ्तार अंतरराष्ट्रीय ग...

इस दौरान हुई मुलाकात में संतोष ने शिखा को बताया कि उसके पास 60 लाख मूल्य के पुराने नोट पड़े थे। इस पर शिखा और पवन ने कहा कि नोट बदल जाएंगे। आश्वासन देने के साथ शिखा ने संतोष से 60 लाख रुपये ले लिए।

महाभारत 2019: अबकी बार होगी अजेय भारत की सरकार: पुण्य प्रसून वाजपेयी का विश्लेषण

punya prasun bajpai analysis under mahabharat 20192014 के नारे 2019 से पहले ही दामन से लिपट जाएंगे यह न तो नरेन्द्र मोदी ने सोचा होगा न ही 2014 में पहली बार खुलकर राजनीतिक तौर पर सक्रिय हुए सर संघचालक मोहन भागवत ने सोचा होगा। न ही भ्रष्ट्राचार और घोटालों के आरोपों को झेलते हुए सत्ता गंवाने वाली कांग्रेस ने सोचा होगा। न ही उम्मीद और भरोसे की कुलांचे मारती उस जनता ने सोचा होगा, जिसके जनादेश ने भारतीय राजनीति को ही कुछ ऐसा मथ दिया कि अब पारम्परिक राजनीति की लीक पर लौटना किसी के लिए संभव ही नहीं है।
Image result for मोदी2013-14 में कोई मुद्‌दा छूटा नहीं था। महिला, दलित, मुस्लिम, महंगाई, किसान, मजदूर, आतंकवाद, कश्मीर, पाकिस्तान, चीन, डॉलर, सीबीआई, बेरोजगारी, भ्रष्ट्राचार और अगली लाइन अबकी बार मोदी सरकार। तो 60 में से 52 महीने गुजर गए और बचे 8 महीने की जद्‌दोजहद में पहली बार पार्टियां छोटी पड़ गईं और ‘भारत’ ही सामने आ खड़ा हो गया। सत्ता ने कहा ‘अजेय भारत, अटल भाजपा’ तो विपक्ष बोला ‘मोदी बनाम इंडिया।’ यानी दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश को चलाने, संभालने या कहें सत्ता भोगने को तैयार राजनीति के पास कोई विज़न नहीं है कि भारत होना कैसा चाहिए।
कैसे उन मुद्‌दों से निजात मिलेगी जिन मुद्‌दों का जिक्र कर 2014 में गद्‌दी पलट गई। या फिर उन्हीं मुद्‌दों का जिक्र कर गद्‌दी पाने की तैयारी है। अजेय भारत में 2019 भी सत्ता हस्तांतरण की दिशा में जा रहा है, जैसे 2014 गया था। जैसे इमरजेंसी के बाद इंदिरा की गद्‌दी को जनता ने यह सोचकर पलट दिया था कि अब जनता सरकार आ गई, तो नए सपने, नई उम्मीदों को पाला जा सकता है। अतीत के इन पन्नों पर गौर जरूर करें, क्योंकि इसी के अक्स तले ‘अजेय भारत’ का राज छिपा है। 
Image result for इंदिरा गाँधी
आपातकाल में जेपी की अगुवाई में संघ के स्वयंसेवकों का संघर्ष रंग लाया। देशभर के छात्र-युवा आंदोलन से जुड़े। 1977 में जीत होने की खुफिया रिपोर्ट के आधार पर चुनाव कराने के लिए इंदिरा गांधी तैयार हो गईं और अजेय भारत का सपना पाले जनता ने उन्हें धूल चटा दी। जनता सरकार को 54.43 फीसदी वोट मिले। 295 सीटों (गठबंधन ने 345 सीटों) पर जीत हासिल की, जबकि इंदिरा गांधी को सिर्फ 154 सीटों (28.41% वोट) पर जीत मिली, लेकिन ढाई बरस के भीतर ही जनता के सपने कुछ इस तरह चूर हुए कि 1980 के चुनाव में इंदिरा गांधी की वापसी ही नहीं हुई, बल्कि जीत ऐतिहासिक रही और इंदिरा गांधी को 353 सीटों पर जीत मिली। कांग्रेस को रिकॉर्ड तोड़ 66.73 फीसदी वोट मिले। लेकिन सत्ता मिली तो हुआ क्या।
Related imageबेरोजगार के लिए रोजगार नहीं था। कॉलेज छोड़कर निकले छात्रों के लिए डिग्री या शिक्षा तक की व्यवस्था नहीं थी। महंगाई थमी नहीं। भ्रष्ट्राचार खत्म करने के नारे ही ढाई बरस तक लगते रहे। सत्ता के भीतर ही सत्ता के सत्ताधारियों का टकराव इस चरम पर भी पहुंचा कि 1979 में अटल बिहारी वाजपेयी पटना के कदमकुआं स्थित जयप्रकाश नारायण के घर पर उनसे मिलने पहुंचे। वाजपेयी दिल्ली से सटे सूरजकुंड में होने वाली जनता पार्टी संसदीय दल की बैठक को लेकर दिशा-निर्देश लेने के बाद जेपी के घर से सीढ़ियों से उतरने लगे तो पत्रकारों ने सवाल पूछा, बातचीत में क्या निकला। वाजपेयी ने अपने अंदाज में जवाब दिया, ‘उधर कुंड (सूरजकुंड), इधर कुआं (कदमकुआं) बीच में धुआं ही धुआं।’
अजेय भारत का सच यही है कि हर सत्ता परिवर्तन के बाद सिवाय धुएं के कुछ नज़र नहीं आता। यानी 1977 में जिस सरकार के पास जनादेश की ताकत थी। उस सरकार के पास भी अजेय भारत का कोई सपना नहीं था। हां, फॉर्जरी-घोटाले और कालेधन पर रोक के लिए नोटबंदी का फैसला तब भी लिया गया। 16 जनवरी 1978 को मोरारजी सरकार ने हजार, पांच हजार और दस हजार के नोट उसी रात से बंद कर दिए। उसी सच को प्रधानमंत्री मोदी ने 38 बरस बाद 8 नवंबर, 2016 को दोहराया। एलान कर दिया कि अब कालेधन, आतंकवाद, फॉर्जरी-घपले पर रोक लग जाएगी पर बदला क्या?
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विवादित पत्रकार पुण्य प्रसून वाजपेयी एक नए पचड़े में फंस गए हैं। दरअसल पिछले दिनों दिल्ली में हुए एक कार्यक्रम मे....


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उत्तराखंड के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत का एक वीडियो इन दिनों वायरल हो रहा है, जिसमें वो अपने पास फरियाद लेक...
फिर भी सत्ता ने खुद की सत्ता बरकरार रखने के लिए अपने को ‘अजेय भारत’ से जोड़ा और जीत के गुणा भाग में फंसे विपक्ष ने ‘मोदी बनाम देश’ कहकर उस सोच से पल्ला झाड़ लिया कि आखिर न्यूनतम की लड़ाई लड़ते-लड़ते देश की सत्ता तो लोकतंत्र को ही हड़प रही है और अजेय भारत इसी का अभ्यस्त हो चला है कि चुनाव लोकतंत्र है। जनादेश लोकतंत्र है। सत्ता लोकतंत्र है। अजेय भारत की राजधानी दिल्ली में भूख से मौत पर संसद-सत्ता को शर्म नहीं आती। उच्च शिक्षा के लिए हजारों छात्र देश छोड़ दें तो भी असर नहीं पड़ता।
बीते तीन बरस में सवा लाख बच्चों को पढ़ने के लिए वीज़ा दिया गया, ताल ठोककर लोकसभा में मंत्री ही बताते हैं। इलाज बिना मौत की बढ़ती संख्या भी मरने के बाद मिलने वाली रकम से राहत दे देगी, इसका एलान गरीबों के लिए इंश्योरेंस के साथ दुनिया की सबसे बड़ी राहत के तौर पर प्रधानमंत्री ही करते हैं। ये सब इसलिए, क्योंकि अजेय भारत का मतलब सत्ता और विपक्ष की परिभाषा तले सत्ता न गंवाना या सत्ता पाना है।
सत्ता बेफिक्र है कि उसने देश के तमाम संवैधानिक संस्थानों को खत्म कर दिया। सत्ता मानकर बैठी है  कि पांच बरस की जीत का मतलब न्यायपालिका उसके निर्णयों के अनुकूल फैसला दे। चुनाव आयोग सत्तानुकुल होकर काम करे। सीबीआई, ईडी, आईटी, सीवीसी, सीआईसी, सीएजी के अधिकारी विरोध करने वालों की नींद हराम कर दें।  2014 से निकलकर 2018 तक आते आते जब अजेय भारत का सपना 2019 के चुनाव में जा छुपा है तो अब समझना यह भी होगा कि 2019 का चुनाव या उसके बाद के हालात पारम्परिक राजनीति के नहीं होंगे।
भाजपा अध्यक्ष ने अपनी पार्टी के सांसदों को  झूठ नहीं कहा कि 2019 जीत गए तो 50 बरस तक राज करेंगे और संसद में कांग्रेस के अध्यक्ष राहुल गांधी ने भी झूठ नहीं कहा कि नरेन्द्र मोदी-अमित शाह जानते हैं कि चुनाव हार गए तो उनके साथ क्या कुछ हो सकता है। इसलिए ये हर हाल में चुनाव जीतना चाहते हैं तो आखिर में सिर्फ यही नारा लगाइए, अबकी बार...आज़ादी की दरकार।                                                                                (साभार)