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‘जिनके घर शीशे के होते हैं, वे दूसरों पर पत्थर नहीं फेंका करते’: केजरीवाल के चुनावी वादों पर बरसे सिद्धू

पंजाब विधानसभा चुनाव को लेकर आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हो गया है। इस फेहरिस्त में कांग्रेस और आम आदमी पार्टी सबसे आगे हैं। दोनों पार्टियाँ एक-दूसरे पर निशाना साध रही हैं। कांग्रेस नेता नवजोत सिंह सिद्धू ने अरविंद केजरीवाल पर तंज कसते हुए कहा कि दिल्ली में कितनी महिलाओं को एक हजार रुपए महीना दिया जा रहा है। सिद्धू ने दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को टैग करते हुए सिलसिलेवार कई ट्वीट किए हैं। उन्होंने लिखा, ”जिनके घर शीशे के होते हैं, वे दूसरों पर पत्थर नहीं फेंका करते। अरविंद केजरीवाल जी आप महिला सशक्तिकरण, नौकरी और शिक्षकों की बात करते हैं। हालाँकि, आपके मंत्रिमंडल में एक भी महिला मंत्री नहीं है। शीला दीक्षित जी द्वारा छोड़े गए राजस्व अधिशेष के बावजूद दिल्ली में कितनी महिलाओं को 1000 रूपए मिलते हैं।”

प्रदुषण एवं अन्य मदों के लिए मिले धन को विज्ञापन पर खर्च करने के लिए कभी किसी विभाग का तो कभी किसी विभाग का वेतन रोकने वाले क्या महिलाओं को 1000 रूपए महीना दे सकता है। आज दिल्ली में प्रदुषण की दयनीय स्थिति के लिए कौन ज़िम्मेदार है, और पंजाब को दोष देते हो?

सिद्धू ने आगे लिखा, ”महिला सशक्तिकरण का अर्थ है चुनावी प्रक्रिया के हर चरण में महिलाओं को अनिवार्य रूप से शामिल करना है, जिस तरह से कांग्रेस पंजाब में कर रही है। सच्चा नेतृत्व 1000 रुपए का लॉलीपॉप देने में नहीं है, बल्कि स्वरोजगार और महिला उद्यमियों को कौशल प्रदान करके उनके भविष्य को बेहतर बनाने में है। पंजाब मॉडल में ये सब शामिल है।”

शिक्षकों और नौकरियों को लेकर कांग्रेस नेता ने अरविंद केजरीवाल को आड़े ​हाथों लेते हुए कहा, ”2015 में दिल्ली में शिक्षकों की 12,515 रिक्तियाँ थीं और 2021 में दिल्ली में शिक्षकों की 19,907 रिक्तियाँ हैं और आप ज्यादातर रिक्त पदों को सिर्फ guest lecturers से भर रहे हैं।”

केजरीवाल पर बरसते हुए सिद्धू ने उनसे कई और सवाल पूछे। उन्होंने कहा, ”अपने 2015 के घोषणापत्र में ‘आप’ ने दिल्ली में 8 लाख नई नौकरियों और 20 नए कॉलेजों का वादा किया था। नौकरियाँ और कॉलेज कहाँ हैं? आपकी असफल गारंटियों के विपरीत, पिछले 5 वर्षों में दिल्ली की बेरोजगारी दर लगभग 5 गुना बढ़ गई है।

27 नवंबर को अरविंद केजरीवाल ने पंजाब के मोहाली में कहा था कि एक तरफ पंजाब सरकार दावा करती है कि वह अध्यापकों को नौकरियाँ दे रहे हैं। 36 हजार कर्मचारियों को पक्का कर दिया है, लेकिन बेरोजगार अध्यापक छह महीने पानी की टंकियों पर चढ़े हुए हैं। उन्होंने कहा था कि पंजाब सरकार झूठ बोलने की आदी है। इसका प्रमाण खुद भुक्तभोगी लोग हैं। पंजाब में पढ़े-लिखे लोगों के साथ शोषण हो रहा है।

पंजाब : कांग्रेस ने अपने वादे पूरे करने के बजाए जनता को पकड़ाया झुनझुना

उत्तर प्रदेश में अपनी जमीन खो चुकी कांग्रेस मनलुभावन प्रलोभन अपनी ओर आकर्षित करने का प्रयास कर रही है। प्रियंका वाड्रा ने उत्तर प्रदेश में योगी सरकार को सत्ता से दूर करने स्मार्टफोन आदि देने का वायदा किया, लेकिन वह भूल गयी कि राजस्थान में किसानों का कर्ज माफ़ी का वायदा पूरा नहीं हुआ, सत्ता में आने के लिए आतुर कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी आजकल उत्तर प्रदेश में वादों की लॉलीपॉप दे रही हैं, लेकिन हकीकत में जनता के हाथ में झुनझुना ही आता है। दरअसल, कांग्रेस की यही परंपरा रही है। कांग्रेस के पंजाब में साढ़े चार साल के कार्यकाल में हुए कामों और जनता के किए गए वादों की पड़ताल करें तो वास्तविकता बेहद चौंकाती है। जनता ने जिन उम्मीदों के साथ कांग्रेस को सत्ता सौंपी, वह तो पूरी हुई नहीं…मुश्किलें और बढ़ती गईं। दिग्गज कांग्रेस नेता जनता का भला करने के बजाए, आपस में ही लड़ते रहे। आइये,  2017 में कांग्रेस द्वारा पंजाब के लोगों से किए टॉप टेन वादों और उसके नतीजों की पड़ताल करते हैं…

1. वादा – चार हफ़्ते में नशे का खात्मा..
नतीजा : साढ़े चार साल में और बढ़ गया
नशा पंजाब में बड़ा मुद्दा रहा है। कैप्टन अमरिंदर सिंह ने भटिंडा में प्रचार के दौरान हाथ में गटका साहिब उठा कर सरकार बनने पर चार हफ़्तों में नशा खत्म करने का वादा किया था…पर हकीकत यह है कि पंजाब में ड्रग्स का कारोबार अब भी जारी है. नवजोत सिंह सिद्धू और डिप्टी सीएम बने सुखजिंदर रंधावा तो पंजाब में नशे खासकर चिट्टे के लिए पूर्व कैबिनेट मंत्री बिक्रमजीत सिंह मजीठिया को सीधे दोषी ठहराते हुए उन्हें जेल में डालने की मांग करते रहे हैं। सिद्धू खेमा कैप्टन अमरिंदर सिंह पर आरोप लगाता रहा है कि उन्होंने जानबूझकर मजीठिया के खिलाफ सख्ती बरतने के ऑर्डर नहीं दिया। कैप्टन के कार्यकाल के दौरान विभिन्न जिलों में 50 से ज्यादा युवाओं की नशे से मौत के मामले दर्ज हुए हैं। यह संख्या और ज्यादा हो सकती है, क्योंकि ऐसे ज़्यादातर मामलों में पुलिस रिपोर्ट दर्ज नहीं होती। कांग्रेस सरकार ने ड्रग्स के ख़िलाफ़ बड़ी मुहिम कभी छेड़ी ही नहीं।

2. वादा– किसानों की कर्ज़ा-कुर्की ख़त्म, फ़सल की पूरी रकम

नतीजा : 90 हजार करोड़ में से सिर्फ सिर्फ 5 हजार करोड़ की माफी
कर्ज़ा-कुर्की ख़त्म, फसल की पूरी रकम का नारा लगाकर सत्ता में आई अमरिंदर सरकार ने न तो वादे के मुताबिक सभी किसानों का पूरा कर्ज़ा माफ किया और न ही प्रदेश में किसानों की कुर्की बंद हुई। इसके विपरीत कर्ज़ के बोझ तले किसान प्रदेश में ख़ुदकुशी कर रहे हैं. सरकार बनने से पहले सारे किसानों के सभी प्रकार के 90 हज़ार करोड़ रुपये के कर्ज़ माफ़ करने के वादा किया गया, लेकिन इसका परिणाम ऊंट के मुंह में जीरे के समान आया। कैप्टन सरकार ने कर्ज माफी की दिशा में जो थोड़ा-सा काम किया, उसमें बहुत ज्यादा शर्तें लगा दीं। नतीजा-कांग्रेस सरकार के साढ़े 4 साल के कार्यकाल में मात्र 5.64 लाख किसानों का 4623 करोड़ रुपए का कर्ज माफ हो पाया। 2.68 लाख मजदूरों का भी सिर्फ 526 करोड़ रुपए का लोन माफ किया गया।

3. वादा – घर घर नौकरी, हर घर नौकरी, हर साल 1.61 नौकरी
नतीजा : नौकरियां न दे पाने पर कांग्रेस ने ही कैप्टन की क्लास लगाई
कैप्टन अमरिंदर सिंह ने चुनावी घोषणा पत्र में पंजाब के हर घर से एक व्यक्ति को नौकरी देने का वादा किया था. वादा किया गया था कि सरकार हर साल 1.61 लाख लोगों को नौकरियां देगी. पिछले साढ़े चार साल में घर घर नौकरी, हर घर नौकरी का वादा हवा-हवाई ही साबित हुआ है। दिखावे के लिए रोजगार मेले लगे, नियुक्ति पत्र भी बंटे, लेकिन लाखों की छोड़िए कुछ हजार युवाओं को ही नौकरी नसीब हो पाई। कैप्टन अमरिंदर सिंह और उनकी सरकार पर ये वादा पूरा नहीं करने का आरोप लगता रहा है। जुलाई-2021 में सोनिया गांधी के बुलावे पर दिल्ली पहुंचे कैप्टन को जो 18 सूत्री कार्यक्रम दिया गया था, उसमें यह मुद्दा शामिल था। सिद्धू भी इसे लेकर कैप्टन सरकार पर सवाल उठाते रहे हैं।

4. वादा – खनन माफिया खत्म कर पंजाब का खजाना भरेंगे
नतीजा : माफिया हावी, रद्दी की टोकरी में सिद्धू की रिपोर्ट
पंजाब कांग्रेस ने अपने घोषणा पत्र की शुरुआत में तत्कालीन अकाली-भाजपा सरकार को माफ़िया राज पर कठघरे में खड़ा करने की कोशिश की थी। इसके साथ ही वादा किया था कि रेत माफ़िया, केबल माफ़िया, शराब माफ़िया, ड्रग्स माफ़िया औऱ ट्रांसपोर्ट माफ़िया को कांग्रेस सरकार बनने पर तुरंत खत्म किया जाएगा। लेकिन साढ़े चार साल में सरकार कुछ नहीं कर पाई। नवजोत सिंह सिद्धू और उनका खेमा इस बात को पूरी ताकत से उठाता रहा है कि पंजाब सरकार के पास रेत के अवैध खनन को रोकने के लिए न तो कोई पॉलिसी है और न ही सरकार ऐसी कोई पॉलिसी बनाना चाहती है। कांग्रेस सरकार ने खनन का खूनी खेल खेलने वाले किसी बड़े माफिया को जेल में नहीं पहुंचाया। इसके विपरीत कांग्रेस सरकार के ही एक मंत्री को गैरक़ानूनी खनन में नाम आने के कारण इस्तीफा देना पड़ा। 2017 में कैप्टन की कैबिनेट में मंत्री बनते ही सिद्धू, तेलंगाना और तमिलनाडू का मॉडल समझने के लिए खुद वहां गए और उसके बाद अपनी रिपोर्ट भी सरकार को दी, मगर कैप्टन ने उसे रद्दी की टोकरी के हवाले कर दिया।

5. वादा – सरकारी कर्मचारियों का रखेंगे पूरा ख्याल
नतीजा : लाखों कर्मचारी अपनी मांगों को लेकर आंदोलनरत
कैप्टन ने सत्ता में आने के लिए ठेका भर्ती बंद करने, कर्मचारियों को रेगुलर करने, खाली पदों को भरने, बकाया भत्ते जारी करने के लिए महंगाई भत्ते की किस्त जारी करने के वादे किए थे. इनमें से वादे पूरे नहीं हुए. पंजाब में इस समय अध्यापक, आशा वर्कर, एएनएम, ठेका कर्मचारी, रोडवेज कर्मचारी और डीसी कार्यालय के कर्मचारी अपनी-अपनी मांगों को लेकर आंदोलन कर रहे हैं। इन कर्मचारियों की संख्या एक लाख से अधिक है। खुद सिद्धू का विरोध भी यही था कि कैप्टन सरकार को कर्मचारियों की मांगों को पूरा करना चाहिए।

6. वादा -नौजवानों, छात्रों को देंगा स्मार्टफ़ोन
नतीजा : प्रियंका गांधी के वादे जैसा ही लॉलीपॉप
प्रियंका गांधी अब यूपी स्मार्टफ़ोन देने का लॉलीपॉप दे रही हैं। पंजाब में चुनाव के दौरान स्मार्टफ़ोन देने का वादा करते हुए कांग्रेस ने युवाओं से फॉर्म तक भरवाए। अब तक उनमें से किसी को भी फ़ोन नहीं मिला है. सरकार के ख़िलाफ़ की जा रही पोल खोल रैलियों में अकाली दल के अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल, कैप्टन के स्मार्टफ़ोन पर चुटकुले सुना रहे हैं..

7. वादा – आटा दाल के साथ चीनी चाय पत्ती
नतीजा : अब लोगों को केवल गेहूं ही मिल पा रहा है
कांग्रेस ने अकाली-भाजपा सरकार की प्रतिष्ठित आटा दाल योजना के साथ चाय पत्ती और चीनी देने का वादा किया था। लेकिन अब लोगों को केवल गेहूं ही मिल पा रहा है. इस योजना में दाल, चीनी और चायपत्ती अब तक नहीं मिली। 

8. वादा – शराब माफिया पर पूरी तरह के नकेल कसेंगे
नतीजा : घर-घर में नकली और अवैध शराब की फैक्ट्रियां
कांग्रेस का वादा शराब माफिया पर पूरी तरह के नकेल कसने का था। लेकिन विपक्ष की छोड़िए कैप्टन सरकार के कई कैबिनेट मंत्री और नवजोत सिंह सिद्धू कहते रहे हैं कि प्रदेश में शराब माफिया हावी है। जगह-जगह अवैध शराब बिक रही है। घर-घर में नकली फैक्ट्रियां लगाकर शराब निकाली और बेची जा रही है। इससे पंजाब का खजाना बर्बाद हो रहा है। कांग्रेस हाईकमान को शराब माफिया के खिलाफ कैप्टन अमरिंदर सिंह को काम करने के लिए कहना पड़ा, लेकिन कुछ हुआ नहीं। पंजाब में केबल कारोबार भी पहले जैसा ही चल रहा है और शराब और ट्रांसपोर्ट के कारोबार में भी कहीं कोई अंतर नहीं दिख रहा।

9. वादा- बेघर दलितों को देंगे अपने घर की सौगात
नतीजा : राज्य में दलितों के खिलाफ अपराध बढ़े
कैप्टन सरकार ने पंजाब में दलितों के सशक्तिकरण के लिए बेघरों को मकान, 50 हज़ार रुपये तक कर्ज़ माफ़ करने जैसे वादे किए थे जो जमीन पर पूरे होते नहीं दिख रहे हैं। दलितों के खिलाफ अपराधों में जरूर बढ़ोतरी हुई है।

10. वादा- कर्ज के बोझ तले दबे किसानों की जान बचाएंगे
नतीजा : कर्ज के कारण किसानों की खुदकुशी अब भी जारी
कृषि प्रधान प्रदेश पंजाब का भूमिपुत्र बुरी तरह के कर्ज के बोझ तले दबा हुआ है। कर्ज पर कर्ज बढ़ने से परेशान किसान खुदकुशी को मजबूर है। कांग्रेस ने सत्ता पाने के लिए वादा किया कि वह किसानों की जान बचाने के लिए सारे जतन करेंगे। साढ़े चार साल के बाद भी न तो किसानों की कर्जमाफी हो पाई और न ही उन्हें अन्य मुश्किलों से छुटकारा मिल पाया है। इसके कारण पंजाब में किसानों की खुदकुशी के मामले लगातार सामने आ रहे हैं।

कोरोना के चलते 10 करोड़ नौकरियों पर खतरा

लॉकडाउन के चलते भारत में करीब 10 करोड़ नौकरियों पर खतरा पैदा हो गया है.
भारत में तेजी से बढ़ रही कोरोना संक्रमितों की संख्या के नरेंद्र मोदी सरकार ने एक बेहद महत्वपूर्ण आंकड़ा पेश किया है। दरअसल वाणिज्य मंत्रालय से जुड़ी संसदीय स्थायी समिति की बैठक में शामिल हुए सरकार के प्रतिनिधि ने कोरोना काल के दौरान देश में नौकरियों और रोजगार के हालत पर एक प्रेजेंटेशन दिया। इस प्रेजेंटेशन में सरकारी प्रतिनिधि ने बेहद ही चिंताजनक आंकड़ा पेश किया है। सूत्रों के मुताबिक संसदीय समिति के सामने पेश हुए अधिकारी ने बताया कि कोरोना और लॉकडाउन के चलते भारत में करीब 10 करोड़ नौकरियों पर खतरा पैदा हो गया है।
संसदीय समिति के सामने प्रेजेंटेशन के लिए पेश हुए सरकारी प्रतिनिधि ने यह नहीं बताया कि ये आंकड़ा आखिर कब तक का है और कोन-कौन से सेक्टर सबसे अधिक प्रभावित हुए हैं। मालूम हो कि कोरोना वायरस महामारी के चलते दुनियाभर में चल रहे लॉकडाउन और अन्य प्रतिबंधों ने भारत जैसे देशों की अर्थव्यवस्था के सामने एक बड़ा संकट खड़ा कर दिया है। सबसे बड़ा सवाल लोगों के रोजगार से जुड़ा है।
संसदीय समिति की बैठक का एजेंडा कोरोना के बाद निवेश के मामले में भारत के सामने चुनौतियां और अवसरों पर चर्चा करना था। बैठक में औद्योगिक और आंतरिक व्यापार संवर्धन विभाग के अधिकारी ने समिति के सदस्यों को अर्थव्यवस्था पर पड़ रहे कोरोने के असर को बताया। प्रेजेंटेशन में बताया गया कि चूंकि भारत कौशल और दक्ष श्रम शक्ति का एक बड़ा निर्यातक देश है लिहाजा दुनिया भर में आर्थिक शिथिलता का असर यहां भी पड़ा है।
बैठक में मोदी सरकार की ओर से बताया गया है कि भारत की अर्थव्यवस्था काफी हद तक अमेरिका, यूरोप और चीन से होने वाले निवेश और व्यापार निर्भर करती है। कोरोना के चलते इन देशों से व्यापार और निवेश में अलग-अलग कारणों से कमी आई है। सरकार ने बताया कि उसकी कोशिश अब मेडिकल उपकरणों समेत अन्य महत्वपूर्ण सामानों के आयात पर निर्भरता कम करने की है।

जनसंख्या पर काबू नहीं होने से मंदी: कॉन्ग्रेस नेता जितिन प्रसाद ने मनमोहन की ‘चिंता’ की निकाली हवा

जितिन प्रसाद
अर्थव्यवस्था पर पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के ‘चिंता’ की हवा उनकी ही पार्टी के एक युवा नेता जितिन प्रसाद ने निकाल दी है। ​मनमोहन की कैबिनेट में रह चुके जितिन ने मंदी और बेरोजगारी का कारण बढ़ती जनसंख्या को बताया है। इससे पहले पूर्व प्रधानमंत्री ने इसे ‘मानव रचित संकट’ बताते हुए मोदी सरकार से बदले की राजनीति छोड़ अर्थव्यवस्था को उबारने के लिए कदम उठाने को कहा था।
जितिन प्रसाद ने कहा, “जनसंख्या नियंत्रण पर देशभर में व्यापक बहस होनी चाहिए। इस पर क़ानून भी बनाया जाना चाहिए। अगर देश को आगे बढ़ना है तो ठोस क़दम उठाने होंगे। मैं सरकार से माँग करता हूँ कि इस मुद्दे पर जो भी क़ानून लाना है, वह लाए।”
उन्होंने कहा, “अर्थव्यवस्था डूब रही है, बेरोज़गारी बढ़ रही है। ऐसा इसलिए हो रहा है क्योंकि आबादी को नियंत्रित नहीं किया गया। पर्यावरण पर इसका प्रभाव पड़ रहा। जल संकट, प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव भारत में आबादी बढ़ने के कारण हैं।”
जितिन प्रसाद ने सभी राजनीतिक दलों से अपील करते हुए कहा कि उन्हें जनसंख्या नियंत्रण जैसे गंभीर मुद्दे पर एकसाथ खड़े होना चाहिए। बता दें कि इस साल 15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जनसंख्या का मुद्दा उठाया था। उन्होंने कहा था कि जो लोग छोटा परिवार रख रहे हैं, वे भी एक तरह से देशभक्ति कर रहे हैं।


लाल किले की प्राचीर से जनसंख्या विस्फोट को लेकर अपनी चिंता जाहिर करते हुए पीएम मोदी ने देशवासियों से छोटे परिवार की अपील की थी। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देश में जनसंख्या विस्फोट पर चिंता जताते हुए कहा था कि यह आने वाली पीढ़ियों के लिए नयी चुनौतियाँ पेश करता है। इससे निपटने के लिए केन्द्र और राज्य सरकारों को क़दम उठाने चाहिए।

बेरोजगारी : चुनावी रैलियों में झूठलाया, सत्ता आते ही स्वीकारा

                                                                                         साभार 

आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
भारत भले ही विकास के रथ पर सवार हो सरपट दौड़ने को तैयार है लेकिन बेरोजगारी की  हकीकत है जो आने वाले दिनों में देश की इस तस्वीर को धुंधला कर सकती है। इंटरनेशनल लेबर आर्गनाइजेशन की रिपोर्ट मोदी सरकार और देश के युवाओं की चिंता बढ़ाने वाली है।इंटरनेशनल लेबर आर्गनाइजेशन की रिपोर्ट दावा करती है कि 2019 तक देश में बेरोजगारों की संख्या एक करोड़ 90 लाख तक पहुंच सकती है।
बेरोजगारी दर 45 साल के ऊंचे स्तर पर पहुंच गई है। मोदी सरकार ने अपने दूसरे कार्यकाल में  इसे आधिकारिक तौर पर स्वीकार कर लिया गया है। जबकि  कुछ महीने पहले लीक हुई इसी रिपोर्ट को खारिज कर दिया था। नवीनतम आंकड़ों के अनुसार, देश में जुलाई 2017 से लेकर जून 2018 के दौरान एक साल में बेरोजगारी  6.1 फीसदी बढ़ी। इससे पहले 1972-73 में बेरोजगारी दर का यही आंकड़ा था। 6.1% का आंकड़ा नेशनल सैंपल सर्वे ऑफिस (एनएसएसओ) की जनवरी में लीक हुई रिपोर्ट में भी बताया गया था। लेकिन तब नीति आयोग ने रिपोर्ट खारिज करते हुए कहा था कि यह फाइनल डेटा नहीं, बल्कि ड्राफ्ट रिपोर्ट है और सरकार ने नौकरियों पर कोई डेटा जारी नहीं किया है। हालांकि रिपोर्ट जारी करते हुए सांख्यकी सचिव प्रवीण श्रीवास्तव ने बताया कि सर्वे नए डिजाइन और नए मेट्रिक्स पर आधारित है। इसलिए पिछली रिपोर्टों से तुलना सही नहीं है। 45 साल में सबसे ज्यादा बेरोजगारी की व्याख्या मीडिया की है। 

दो सदस्यों ने दिया था इस्तीफा

गौरतलब है कि रिपोर्ट जारी नहीं करने पर राष्ट्रीय सांख्यिकी आयोग के दो सदस्यों ने इस्तीफा दे दिया था। केंद्र सरकार को महत्वपूर्ण आंकड़ों को रोकने के लिए विपक्षी दलों के आरोपों को झेलना पड़ा था। विपक्ष का आरोप था कि सरकार अपनी नाकामयाबी को जानबूझकर छिपा रही है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, शहरी क्षेत्र में रोजगार की चाहत रखने वाले 7.8 फीसदी युवा बेरोजगार हैं, जबकि ग्रामीण क्षेत्र में यह आंकड़ा 5.3 फीसदी है। बेरोजगारी दर का निर्धारण कुल कार्यबल में बेरोजगार व्यक्तियों की तादाद की गणना फीसदी में करके किया जाता है।

Image result for बेरोजगारीशहरी क्षेत्र में युवा ज्यादा बेरोजगार 

इंटरनेशनल लेबर आर्गनाइजेशन की रिपोर्ट में सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इस रिपोर्ट में 15 से 24 साल तक के युवाओं को शामिल किया गया है जो रोजगार की तलाश में भटक रहे हैं।  रिपोर्ट का दावा है कि साल 2017 में एक करोड़े 83 युवा बेरोजगार हुए हैं और 2019 तक इनकी संख्या में बेतहासा वृद्धि हो सकती है।
एनएसएसओ रिपोर्ट में कहा गया था कि 2017-18 में बेरोजगारी दर ग्रामीण क्षेत्रों में 5.3% और शहरी क्षेत्र में सबसे ज्यादा 7.8% रही। पुरुषों की बेरोजगारी दर 6.2% जबकि महिलाओं की 5.7% रही। इनमें नौजवान बेरोजगार सबसे ज्यादा थे, जिनकी संख्या 13% से 27% थी। 2011-12 में बेरोजगारी दर 2.2% थी। जबकि 1972-73 में यह सबसे ज्यादा थी। बीते सालों में कामगारों की जरूरत कम होने से ज्यादा लोग काम से हटाए गए।

इतने लोगों पर किया गया सर्वे

सरकार के शुक्रवार को यहां जारी आंकड़ों के अनुसार जुलाई 2017 से जून 2018 की अवधि की रिपोर्ट के अनुसार कुल 12 हजार 800 बस्तियों में सर्वेक्षण किया गया। इन बस्तियों में 7024 गांव और 5776 शहर शामिल हैं। एक लाख दो हजार 113 परिवारों में सर्वेक्षण किया गया। इनमें 56 हजार 108 ग्रामीण तथा 46 हजार पांच शहरी परिवार शामिल हैं। सर्वेक्षण में चार लाख 33 हजार 339 लोगों ने हिस्सा लिया। इनमें से दो लाख 46 हजार 809 ग्रामीण और एक लाख 86 हजार 530 शहरी इलाकों से हैं।

नोटबंदी के बाद का पहला सर्वे

यह रिपोर्ट काफी महत्वपूर्ण है। यह जुलाई 2017 से जून 2018 के बीच जुटाए गए डेटा पर आधारित है। यानी यह नोटबंदी के बाद का पहला आधिकारिक सर्वेक्षण है। सरकार पर यही रिपोर्ट दबाने का आरोप लगाते हुए राष्ट्रीय सांख्यिकी आयोग के कार्यकारी अध्यक्ष सहित दो सदस्यों ने जनवरी में इस्तीफा दे दिया था। उनका कहना था कि रिपोर्ट को आयोग की मंजूरी मिलने के बाद भी सरकार जारी नहीं कर रही। यह रिपोर्ट दिसंबर 2018 में जारी की जानी थी।
रिपोर्ट में इस बात पर चिंता जाहिर की गई है कि 2019 तक 77 प्रतिशत युवाओं के रोजगार अपने आप खत्म हो जाएंगे। ये ऐसे रोजगार है जिनमें आमदनी बेहद कम है। ऐसे रोजगार में युवाओं को 198 रुपए प्रतिदिन से भी कम की कमाई होती है।   (एजेंसीज इनपुट्स सहित)

आखिर अमेठी से क्‍यों हार गए राहुल गांधी?

Rahul Gandhi
आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
लोकसभा चुनाव 2014 से कांग्रेस और इसके समर्थक समस्त छद्दमों ने कोई शिक्षा लेने का प्रयत्न नहीं किया। यही कारण है कि चुनाव 2019 में भी कांग्रेस का प्रदर्शन अच्छा नहीं रहा है। पार्टी को सिर्फ 52 सीटें मिली हैं। ऐसे में कांग्रेस को एक बार फिर से नेता प्रतिपक्ष का पद मिल पाना मुश्किल लग रहा है। लोकसभा के कुल सदस्यों की संख्या 543 है और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष का पद हासिल करने के लिए कम से कम इसका 10 फीसदी यानि 55 सीटों की जरूरत होती है और कांग्रेस को केवल 52 सीटें मिली हैं। 2014 में कांग्रेस को 44 सीटें मिली थीं। बबूल का पेड़ बोकर उस पर आमों की इच्छा करना मूर्खता ही कहा जाएगा।  
मोदी सुनामी क्यों और कौन लाया?
आखिर वो क्या कारण थे, जिसने कांग्रेस और अन्य दलों को हाशिये पर ला दिया? दरअसल, मोदी सुनामी लाने वाले भी यही दल हैं, हिन्दू आतंकवाद, भगवा आतंकवाद, शिव पर दूध मत चढ़ाओ, होली पर पानी की बर्बादी, दिवाली पर प्रदूषण, करवाचौध पर भूखे रहना मूर्खता, राम एक काल्पनिक, रामसेतू राम ने नहीं बनवाया, अयोध्या खुदाई में मिले मन्दिर के प्रमाणों को कोर्ट से छुपाना, राममन्दिर में अवरोध उत्पन्न करना, भारत के वास्तविक इतिहास को धूमिल कर आतताई मुगलों का गुणगान, आर्मी प्रमुख को सड़क का गुण्डा बोलना, सर्जिकल स्ट्राइक के सबूत माँगना, फिर बालाकोट में हुई एयर स्ट्राइक में मारे गए आतंकवादियों की लाशों की प्रमाणिकता माँगना, आतंकवाद के बहाने भारत में अस्थिरता उत्पन्न करने वाले पाकिस्तान को विश्व से अलग करने पर शोर मचाना, कश्मीरी अलगाववादियों पर कार्यवाही किये जाने पर बेचैनी, #metoo, #award vapsi, #not in my name, #moblynching आदि गैंगों के माध्यम से देश में अराजकता फ़ैलाने का प्रयास यानि स्पष्ट शब्दों में कहा जाए तो छद्दम धर्म-निरपेक्षों द्वारा तुष्टिकरण को चरम सीमा पर ले जाने ने ही भारत में मोदी सुनामी लाकर अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी दे मारी।    
उत्तर प्रदेश की प्रतिष्ठित अमेठी लोकसभा सीट पर भाजपा प्रत्याशी केन्द्रीय मंत्री स्मृति ईरानी की जीत के पीछे अमेठी की जनता का कहना है कि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी से उन्हें वह आत्मीयता नहीं मिल सकी, जो उनके दिवंगत पिता एवं पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी से मिलती थी। कांग्रेस का गढ़ माने जा रहे अमेठी सीट से भारतीय जनता पार्टी की उम्मीदवार स्मृति ईरानी ने कांग्रेस अध्यक्ष को 55 हजार 120 मतों के अंतर से पराजित किया।
इस चुनाव में स्मृति को चार लाख 67 हजार 598 मत मिले, जबकि कांग्रेस अध्यक्ष को चार लाख 12 हजार 867 मत प्राप्त हुए। इससे पहले 2014 के लोकसभा चुनाव में राहुल गांधी को 408,651 वोट मिले थे, जबकि भाजपा प्रत्याशी स्मृति ईरानी को 300,748 वोट मिले थे और कांग्रेस अध्यक्ष ने केंद्रीय मंत्री को 1,07,000 वोटों के अंतर से पराजित किया था। राहुल गांधी अमेठी से लगातार तीन बार सांसद रहे। उन्होंने 2009 में यह सीट 3,50,000 से भी ज्यादा मतों से जीती थी। कांग्रेस अध्यक्ष यहां से पहली बार 2004 में चुन कर संसद पहुंचे थे।
राहुल ने बेरोजगारी को बढ़ाया                        
अपनी चुनावी रैलियों में प्रधानमन्त्री मोदी पर देश में बेरोजगारी को बढ़ाने का आरोप लगाने वाले राहुल ने अपने ही संसदीय क्षेत्र में कितने लोगों को बेरोजगार किया, कभी नहीं बताया। इतना ही नहीं, कांग्रेस समर्थित समस्त पार्टियाँ भी चुप्पी साधे रहीं, क्योंकि चोर-चोर मौसेरे भाई। अमेठी के लोगों का कहना है कि राजीव गांधी के समय शुरू की गई कई परियोजनाएं और कार्यक्रम राहुल के सांसद रहते एक-एक कर बंद हो गए, जिससे हजारों लोगों की रोजी-रोजगार पर असर पड़ा। इसके चलते बड़ी संख्या में लोगों ने रोजगार के लिए अमेठी से पलायन किया। उनका कहना है कि और तो और गांधी परिवार से बरसों से पूरी निष्ठा से जुड़े बुजुर्गों का भी मन टूटा दिखता है। उन्हें मलाल है कि गांधी परिवार की वर्तमान पीढी से उन्हें वह प्यार और इज्जत नहीं मिली, जो इसे पहले की पीढियों से मिला करती थी।
अमेठी से सांसद रह चुके कैप्टन सतीश शर्मा के समय बनी मालविका स्टील फैक्टरी भी राहुल के समय में ही बंद हो गई। किसानों की जो जमीन गई, वह तो गई ही। साथ ही 10 हजार लोग बेरोजगार हो गए। ये वही बेरोजगार थे, जिन्हें किसानों से जमीन के बदले एक परिवार से एक व्यक्ति को फैक्टरी में रोजगार के लिए रखा गया था।
किसानो से धोखा  
अमेठी संसदीय सीट को कांग्रेस का दुर्ग कहा जाता है और इस सीट पर इससे पहले तक 16 लोकसभा चुनाव और 2 उपचुनाव हुए हैं। इनमें से कांग्रेस ने यहां 16 बार जीत दर्ज की है। 1977 में लोकदल और 1998 में भाजपा को यहां से जीत मिली थी जबकि बसपा और सपा इस सीट से अभी तक अपना खाता भी नहीं खोल सकी है। 'राजीव गांधी ने सम्राट बाइसिकिल्स नामक कंपनी स्थापित करने में मदद की थी। फैक्टरी घाटे में चली गई और उसे बंद कर दिया गया। उसके बाद कंपनी की जमीन नीलामी पर लग गई, क्योंकि कंपनी पर कर्ज था। जमीन को राजीव गांधी चैरिटेबिल ट्रस्ट ने खरीद लिया। ट्रस्ट में राहुल गांधी ट्रस्टी हैं और किसानों को जमीन लौटाने की मांग को लेकर स्मृति ईरानी ने पांच साल तक लड़ाई लड़ी। स्मृति के अलावा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने स्थानीय लोगों से किसानों की जमीन वापस लौटाने का वादा किया।
स्वास्थ्य सेवाएँ बाधित
राहुल ने दिल्ली के मुख्यमन्त्री अरविन्द केजरीवाल तक से कुछ नहीं सीखा। केजरीवाल लाख मोदी सरकार पर उनके कामों में अवरोध उत्पन्न करने का आरोप लगाते रहते हैं। फिर भी जगह-जगह मौहल्ला क्लिनिक खोल जनता को लाभ पहुंचा जा रहे हैं। 1986 से पालम गांव आना-जाना लगा रहता है, परन्तु जब से वहाँ आप विधायक निर्वाचित हुआ है, वहाँ की काया ही पलट गयी। पक्की सड़क, सीवर और पीने के पानी की लाइन एवं घर-घर पाइप गैस लाइन ने वहाँ का वातावरण ही बदल दिया।    
राजीव गांधी सचल स्वास्थ्य सेवा के तहत नौ गाड़‍ियां गांव-गांव जाकर गरीबों का इलाज करती थीं और मुफ्त में दवा बांटती थीं, लेकिन यह सेवा भी राहुल के सांसद रहते ही बंद हो गई और जनता की भारी मांग के बावजूद इसे पुन: शुरू कराने का प्रयास नहीं किया गया। 'राजीव गांधी जीवन रेखा एक्सप्रेस' साल में एक बार महीने भर के लिए अमेठी आती थी। इस ट्रेन पर डाक्टरों की विशेषज्ञ टीम होती थी, जो उपचार के साथ साथ सर्जरी भी करती थी । इस सेवा से लाखों लोगों को फायदा हुआ। लेकिन यह सेवा राहुल के सांसद रहते बंद हो गई और इस महत्वपूर्ण चिकित्सा सेवा को बहाल करने का कोई प्रयास नहीं किया गया।
राजीव गांधी गांव-गांव घर-घर जाकर एक-एक व्यक्ति से व्यक्तिगत तौर पर मिलते थे और इससे उनका अमेठी की जनता के साथ आत्मीय संबंध कायम हो गया था, राहुल ने अमेठी के दौरे तो बहुत किए, लेकिन कहीं न कहीं लोगों के साथ वह सीधा संवाद नहीं स्थापित कर पाए, जो राजीव गांधी के साथ होता था। राजीव गांधी के समय के पुराने और निष्ठावान कांग्रेसी धीरे-धीरे पार्टी से दूर होते चले गए, जबकि सच्चाई यह है कि ये लोग ही पार्टी के चुनाव अभियान की पूरी कमान संभालते थे। अगर ये लोग साथ होते तो शायद नतीजे राहुल के पक्ष में नजर आते।
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आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 1977 में इंदिरा गांधी रायबरेली सीट से 55,202 मतों से हार गईं थीं। 1977 में ही संजय गांधी अमेठी स.....

अमेठी लोकसभा सीट के तहत पांच विधानसभा सीटें आती हैं, इनमें अमेठी जिले की तिलोई, जगदीशपुर, अमेठी और गौरीगंज सीटें शामिल हैं, जबकि रायबरेली जिले की सलोन विधानसभा सीट आती है। 2017 में हुए विधानसभा चुनाव में 5 सीटों में से 4 सीटों पर भाजपा और महज एक सीट पर समाजवादी पार्टी को जीत मिली थी। सोनिया गांधी ने राजनीति में जब कदम रखा तो उन्होंने 1999 में अमेठी को ही अपनी कर्मभूमि बनाया था। वह इस सीट से जीतकर पहली बार सांसद बनीं, लेकिन 2004 के चुनाव में उन्होंने अपने बेटे राहुल गांधी के लिए ये सीट छोड़ दी और इसके बाद से राहुल ने लगातार तीन बार यहां से जीत हासिल की।
योगी आदित्यनाथ 
आखिर उत्तर प्रदेश के मुख्यमन्त्री योगी आदित्यनाथ क्यों कहते थे "जितनी जल्दी हो सके, राहुल गाँधी को अध्यक्ष बनाइए", क्योकि उन्हें मालूम था, राहुल ने अमेठी का सांसद बनने के बाद कांग्रेस के कहे जाने वाले दुर्ग की जड़ों को खोखला कर दिया है। जिसे बहुत ही सोंची-समझी निति से धवस्त किया जा सकता है। और उसको क्रियाविन्त करने के लिए स्मृति को मोहरा बनाकर व्यूरचना रची गयी। 
दूसरे, सोनिया ने हिन्दू विरोधी छवि होने के कारण पार्टी को जो क्षति पहुंचाई है, उसका भरपूर लाभ उठाकर मोदी-योगी-अमित रूपी त्रिमूर्ति केवल कांग्रेस ही नहीं, समस्त छद्दमों की दुकानें बंद करने को कटिबद्ध हैं। और इस महान कार्य में साध्वी प्रज्ञा, साक्षी महाराज आदि साधुओं का साधुवाद महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। 
कांग्रेस और इनके समर्थक छद्दम दल अब भारतीय संस्कृति को कलंकित करने का साहस नहीं कर पाएंगे। इन लोगों ने भारतीय संस्कृति को जितना नुकसान पहुँचाना था पहुंचा दिया, अब फ्रेंच ज्योतिष नॉस्त्रेदमस की भविष्यवाणियों के चरितार्थ होने का समय है, जिसका श्रीगणेश 2014 से हो चूका है। भारतीय संस्कृति की धूम अब केवल भारत तक सीमित नहीं रहने वाली, विश्व में अपना ध्वज फहराएगी।           

महाभारत 2019: अबकी बार होगी अजेय भारत की सरकार: पुण्य प्रसून वाजपेयी का विश्लेषण

punya prasun bajpai analysis under mahabharat 20192014 के नारे 2019 से पहले ही दामन से लिपट जाएंगे यह न तो नरेन्द्र मोदी ने सोचा होगा न ही 2014 में पहली बार खुलकर राजनीतिक तौर पर सक्रिय हुए सर संघचालक मोहन भागवत ने सोचा होगा। न ही भ्रष्ट्राचार और घोटालों के आरोपों को झेलते हुए सत्ता गंवाने वाली कांग्रेस ने सोचा होगा। न ही उम्मीद और भरोसे की कुलांचे मारती उस जनता ने सोचा होगा, जिसके जनादेश ने भारतीय राजनीति को ही कुछ ऐसा मथ दिया कि अब पारम्परिक राजनीति की लीक पर लौटना किसी के लिए संभव ही नहीं है।
Image result for मोदी2013-14 में कोई मुद्‌दा छूटा नहीं था। महिला, दलित, मुस्लिम, महंगाई, किसान, मजदूर, आतंकवाद, कश्मीर, पाकिस्तान, चीन, डॉलर, सीबीआई, बेरोजगारी, भ्रष्ट्राचार और अगली लाइन अबकी बार मोदी सरकार। तो 60 में से 52 महीने गुजर गए और बचे 8 महीने की जद्‌दोजहद में पहली बार पार्टियां छोटी पड़ गईं और ‘भारत’ ही सामने आ खड़ा हो गया। सत्ता ने कहा ‘अजेय भारत, अटल भाजपा’ तो विपक्ष बोला ‘मोदी बनाम इंडिया।’ यानी दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश को चलाने, संभालने या कहें सत्ता भोगने को तैयार राजनीति के पास कोई विज़न नहीं है कि भारत होना कैसा चाहिए।
कैसे उन मुद्‌दों से निजात मिलेगी जिन मुद्‌दों का जिक्र कर 2014 में गद्‌दी पलट गई। या फिर उन्हीं मुद्‌दों का जिक्र कर गद्‌दी पाने की तैयारी है। अजेय भारत में 2019 भी सत्ता हस्तांतरण की दिशा में जा रहा है, जैसे 2014 गया था। जैसे इमरजेंसी के बाद इंदिरा की गद्‌दी को जनता ने यह सोचकर पलट दिया था कि अब जनता सरकार आ गई, तो नए सपने, नई उम्मीदों को पाला जा सकता है। अतीत के इन पन्नों पर गौर जरूर करें, क्योंकि इसी के अक्स तले ‘अजेय भारत’ का राज छिपा है। 
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आपातकाल में जेपी की अगुवाई में संघ के स्वयंसेवकों का संघर्ष रंग लाया। देशभर के छात्र-युवा आंदोलन से जुड़े। 1977 में जीत होने की खुफिया रिपोर्ट के आधार पर चुनाव कराने के लिए इंदिरा गांधी तैयार हो गईं और अजेय भारत का सपना पाले जनता ने उन्हें धूल चटा दी। जनता सरकार को 54.43 फीसदी वोट मिले। 295 सीटों (गठबंधन ने 345 सीटों) पर जीत हासिल की, जबकि इंदिरा गांधी को सिर्फ 154 सीटों (28.41% वोट) पर जीत मिली, लेकिन ढाई बरस के भीतर ही जनता के सपने कुछ इस तरह चूर हुए कि 1980 के चुनाव में इंदिरा गांधी की वापसी ही नहीं हुई, बल्कि जीत ऐतिहासिक रही और इंदिरा गांधी को 353 सीटों पर जीत मिली। कांग्रेस को रिकॉर्ड तोड़ 66.73 फीसदी वोट मिले। लेकिन सत्ता मिली तो हुआ क्या।
Related imageबेरोजगार के लिए रोजगार नहीं था। कॉलेज छोड़कर निकले छात्रों के लिए डिग्री या शिक्षा तक की व्यवस्था नहीं थी। महंगाई थमी नहीं। भ्रष्ट्राचार खत्म करने के नारे ही ढाई बरस तक लगते रहे। सत्ता के भीतर ही सत्ता के सत्ताधारियों का टकराव इस चरम पर भी पहुंचा कि 1979 में अटल बिहारी वाजपेयी पटना के कदमकुआं स्थित जयप्रकाश नारायण के घर पर उनसे मिलने पहुंचे। वाजपेयी दिल्ली से सटे सूरजकुंड में होने वाली जनता पार्टी संसदीय दल की बैठक को लेकर दिशा-निर्देश लेने के बाद जेपी के घर से सीढ़ियों से उतरने लगे तो पत्रकारों ने सवाल पूछा, बातचीत में क्या निकला। वाजपेयी ने अपने अंदाज में जवाब दिया, ‘उधर कुंड (सूरजकुंड), इधर कुआं (कदमकुआं) बीच में धुआं ही धुआं।’
अजेय भारत का सच यही है कि हर सत्ता परिवर्तन के बाद सिवाय धुएं के कुछ नज़र नहीं आता। यानी 1977 में जिस सरकार के पास जनादेश की ताकत थी। उस सरकार के पास भी अजेय भारत का कोई सपना नहीं था। हां, फॉर्जरी-घोटाले और कालेधन पर रोक के लिए नोटबंदी का फैसला तब भी लिया गया। 16 जनवरी 1978 को मोरारजी सरकार ने हजार, पांच हजार और दस हजार के नोट उसी रात से बंद कर दिए। उसी सच को प्रधानमंत्री मोदी ने 38 बरस बाद 8 नवंबर, 2016 को दोहराया। एलान कर दिया कि अब कालेधन, आतंकवाद, फॉर्जरी-घपले पर रोक लग जाएगी पर बदला क्या?
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उत्तराखंड के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत का एक वीडियो इन दिनों वायरल हो रहा है, जिसमें वो अपने पास फरियाद लेक...
फिर भी सत्ता ने खुद की सत्ता बरकरार रखने के लिए अपने को ‘अजेय भारत’ से जोड़ा और जीत के गुणा भाग में फंसे विपक्ष ने ‘मोदी बनाम देश’ कहकर उस सोच से पल्ला झाड़ लिया कि आखिर न्यूनतम की लड़ाई लड़ते-लड़ते देश की सत्ता तो लोकतंत्र को ही हड़प रही है और अजेय भारत इसी का अभ्यस्त हो चला है कि चुनाव लोकतंत्र है। जनादेश लोकतंत्र है। सत्ता लोकतंत्र है। अजेय भारत की राजधानी दिल्ली में भूख से मौत पर संसद-सत्ता को शर्म नहीं आती। उच्च शिक्षा के लिए हजारों छात्र देश छोड़ दें तो भी असर नहीं पड़ता।
बीते तीन बरस में सवा लाख बच्चों को पढ़ने के लिए वीज़ा दिया गया, ताल ठोककर लोकसभा में मंत्री ही बताते हैं। इलाज बिना मौत की बढ़ती संख्या भी मरने के बाद मिलने वाली रकम से राहत दे देगी, इसका एलान गरीबों के लिए इंश्योरेंस के साथ दुनिया की सबसे बड़ी राहत के तौर पर प्रधानमंत्री ही करते हैं। ये सब इसलिए, क्योंकि अजेय भारत का मतलब सत्ता और विपक्ष की परिभाषा तले सत्ता न गंवाना या सत्ता पाना है।
सत्ता बेफिक्र है कि उसने देश के तमाम संवैधानिक संस्थानों को खत्म कर दिया। सत्ता मानकर बैठी है  कि पांच बरस की जीत का मतलब न्यायपालिका उसके निर्णयों के अनुकूल फैसला दे। चुनाव आयोग सत्तानुकुल होकर काम करे। सीबीआई, ईडी, आईटी, सीवीसी, सीआईसी, सीएजी के अधिकारी विरोध करने वालों की नींद हराम कर दें।  2014 से निकलकर 2018 तक आते आते जब अजेय भारत का सपना 2019 के चुनाव में जा छुपा है तो अब समझना यह भी होगा कि 2019 का चुनाव या उसके बाद के हालात पारम्परिक राजनीति के नहीं होंगे।
भाजपा अध्यक्ष ने अपनी पार्टी के सांसदों को  झूठ नहीं कहा कि 2019 जीत गए तो 50 बरस तक राज करेंगे और संसद में कांग्रेस के अध्यक्ष राहुल गांधी ने भी झूठ नहीं कहा कि नरेन्द्र मोदी-अमित शाह जानते हैं कि चुनाव हार गए तो उनके साथ क्या कुछ हो सकता है। इसलिए ये हर हाल में चुनाव जीतना चाहते हैं तो आखिर में सिर्फ यही नारा लगाइए, अबकी बार...आज़ादी की दरकार।                                                                                (साभार)